हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मुक्ति के विचार विजय तक जिंदा रहेंगे

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/21/2007 11:17:00 PM

योद्धा जीतने का इरादा रखते हैं, प्रतिद्वंद्वी को मुहंतोड़ जवाब देने के लिए अंतिम समय तक डटे रहते हैं न कि घणित षड्यंत्रकारियों की तरह सामनेवाले के हट जाने, भाग जाने, मारे जाने की बाट जोहते हैं. इससे भी न हुआ तो वे घटियापा पर उतर आते हैं और प्रतिद्वंद्वी को मार देने के लिए सुपारी तक देते हैं. अमेरिका का इतिहास ऐसे ही घृणित शासकों का इतिहास रहा है. फ़िदेल आज भी, मुक्ति और नयी दुनिया का सपना देखने वाली कौमों के लिए रोशनी की मीनार और उम्मीद की तरह हैं. पेश है हाल ही में लिखा गया उनका लेख जो भारत में द हिंदू में छपा था.इसे यहां देशबंधु की वेबसाइट से साभार दिया जा रहा है.

विचारों की हत्या नहीं की जा सकती

फिदेल कास्रो

पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने अपनी क्यूबा नीति के बारे में किसी मेहमान से कहा था कि 'वे फिदेल कास्त्रो के मरने का रास्ता देख रहे हैं।' कास्त्रो जो कि अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं, ने इस लेख द्वारा न केवल राष्ट्रपति बुश को करारा जवाब ही दिया है बल्कि उन्होंने पुन: एक बार यह दर्शा दिया है कि उनमें वह क्या है जो आज भी उन्हें अधिकांश विश्व का सर्वमान्य नेता व प्रणेता मानता है। इस लेख में कास्त्रों की सामाजिक प्रतिबध्दता की अभिव्यक्ति भी चरम पर है।
कुछ दिनों पूर्व एस्टयूट शृंखला में निर्मित हो रही तीन पनडुब्बियों पर हो रहे खर्च का विश्लेषण करते हुए मैंने कहा था, 'अगर हम अमेरिका में चिकित्सा शिक्षा पर किए जा रहे खर्च से एक तिहाई ही प्रशिक्षण पर खर्च करें तो इस धन के माध्यम से 75000 चिकित्सकों को प्रशिक्षण दिया जा सकता है। जो कि 15 करोड़ व्यक्तियों का उपचार करने में समर्थ होंगे। मैं विस्मयपूर्वक यह सोचने को बाध्य हूं कि अमेरिका ने ईराक पर मात्र एक वर्ष अपना कब्जा बनाए रखने हेतु बुश के हाथ में जो 100 अरब डॉलर दिए हैं उससे कितने चिकित्सक शिक्षा ग्रहण कर सकते थे? उत्तर है, 9 लाख 99 हजार चिकित्सक, जो कि उन दो अरब व्यक्तियों की देखरेख कर सकते थे जिन्हें आज तक किसी भी प्रकार की आधुनिक चिकित्सा सहायता उपलबध नहीं है।' ईराक पर अमेरिकी हमले के बाद 6 लाख से अधिक व्यक्तियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है और 20 लाख से ज्यादा पलायन को मजबूर हो गए हैं।

अमेरिका में आज भी 5 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध नहीं है। वहां के निष्ठुर बाजार मूलक कानून यह संचालित करते हैं कि किस प्रकार से यह महत्वपूर्ण सेवा संचालित हो। स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते मूल्य के कारण अब तो विकसित देशों में भी अनेक लोगों की पहुंच इन सेवाओं तक नहीं रह गई है। चिकित्सा सेवाएं अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान तो करती है परंतु इसके बावजूद जो इसे उपलब्ध कराते हैं उनके जमीर को यह जगा नहीं पाती और न ही यह उन व्यक्तियों को मानसिक संतोष पहुंचा पाती है जो कि इसे प्राप्त करते हैं।

जिन देशों में विकास कम हुआ है और बीमारियां ज्यादा हैं वहाँ सबसे कम चिकित्सक उपलब्ध हैं अर्थात् 5,10,15,20 हजार या उससे भी अधिक व्यक्तियों पर एक चिकित्सक। हाल ही में प्रकाश में आए यौन जनित रोग जैसे- एचआईवीएड्स ने पिछले बीस वर्षों में लाखों व्यक्तियों को मार डाला हैं। जिसमें अनेक माताएं और बच्चे भी शामिल हैं। हालांकि इससे पार पाने के छोटे-मोटे प्रयास चल रहे हैं परंतु प्रति मरीज प्रतिवर्ष दवाईयों का खर्च पांच हजार से दस हजार डॉलर और कुछ स्थितियों में 15 हजार डॉलर तक पहुंच जाता है।
अधिकांश विकासशील देशों के लिए यह चौंका देने वाला आंकडा है। जहां पर कुछ एक सार्वजनिक अस्पताल बीमारों से उफन रहे हैं और जिस तादाद में वे मर रहे हैं वहाँ उनका इस तरह से ढेर लग रहा है, जैसे वे जानवर हों और एकाएक किसी महामारी के शिकार बन गए हों। इस वास्तविकता पर यदि हम प्रकाश डालेंगे तो हम इस त्रासदी को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे। इसमें लगने वाले धन और तकनीक की बात करने का उद्देश्य इसकी लागत का व्यावसायिक विज्ञापन करना भी नहीं है।

इतना ही नहीं एक ओर लाखों लाख व्यक्ति भूख से मर रहे हैं और वहीं दूसरी ओर अन्न को ईंधन में परिवर्तित करने के विचार के प्रतीक चिन्ह के बारे में मंथन कीजिए, इसका उत्तर 'जार्ज बुश' ही होगा।
हाल ही में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वारा जार्ज बुश से यह पूछे जाने पर कि क्यूबा के संबंध में उनकी नीति क्या है? उनका उत्तर कुछ इस प्रकार था-'मैं एक कठोर प्रकृति का राष्ट्रपति हैं और महज कास्रो की मृत्यु की बाट जोह रहा हूं।' एक इतने शक्तिशाली सान की इच्छा मेरे लिए कोई छोटा सम्मान नहीं है।
मैं न कोई पहला व्यक्ति हूं और न ही आखिरी व्यक्ति हूंगा जिसकी हत्या का आदेश बुश ने दिया।

'विचारों की हत्या नहीं की जा सकती' सारिया ने अत्यंत भावुक होकर कहा था। सारिया बातिस्ता की सेना की उस टुकड़ी की एक अश्वेत लेफ्टिनेंट थी जिसने कि मोंकाडा गैरिसन पर कब्जे के दौरान हम तीनों साथियों को तब गिरफ्तार किया था जबकि हम वहाँ से उनके कब्जे को हटाने हेतु प्रयत्न करते-करते इतने अधिक थक गए थे कि वहीं एक पहाड़ी झोपड़ी में सो गए थे। वे सिपाही इतनी घृणा से भरे हुए थे कि मुझे पहचाने बिना ही अपनी बंदूकों से हमें मारने को तत्पर हो गए थे। इस सबके बीच वह अश्वेत लेफ्टिनेंट अपनी शांत आवाज में लगातार यंत्रवत् दोहरा रही थी, 'विचारों की हत्या नहीं की जा सकती।'

'मैं ये शानदार शब्द श्रीमान बुश आपको समर्पित करता हूं।'
(सप्रेस)

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ मुक्ति के विचार विजय तक जिंदा रहेंगे ”

  2. By अनूप शुक्ला on June 22, 2007 at 7:53 PM

    अच्छा लगा यह लेख पढ़कर!

  3. By Aflatoon on June 22, 2007 at 10:50 PM

    सप्रेस ने अनुवादक का नाम नहीं दिया है । पता चले तो यहाँ दें । धन्यवाद ।

  4. By Reyaz-ul-haque on June 23, 2007 at 12:26 AM

    शुक्रिया अनूप जी

    अफ़लातून जी
    मैं कोशिश कर रहा हूं कि वह नाम मिल जाये. जरूर दूंगा. आप आये यह अच्छा लगा.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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