हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

...क्योंकि गलियां हमारी हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/21/2007 01:29:00 AM

बर्तोल्त ब्रेष्ट की चिंता में समतापूर्ण समाज की तखलीक थी. उनकी हर रचना में चाहे वह उनके नाटक हों, कविताएं हों या छोटी कहानियां, अपने समय की पूंजीवादी बुराइयों और विस्तारवादिता, ढोंग, सैन्यशाही और नस्लपरस्ती के खिलाफ़ उनके मजबूत स्वर उनमें सुनायी देते हैं. ब्रेष्ट ने इन कविताओं में जिन प्रवत्तियों की ओर इशारा किया है वे क्या हमारे देश और हमारे समय की याद नहीं दिलातीं? सोचें और हमें बताएं. भारतीय राष्ट्र की वही विस्तारवादिता, नाज़ियों का वही आतंक (ब्लाग तक की दुनिया में) उनसे लड़ने में कम्युनिस्टों में वही लड़खडाहट... और वही शहादतें... सब कुछ वही...

नयी पीढ़ी के प्रति मरणासन्न कवि का संबोधन

आगामी पीढ़ी के युवाओं
और उन शहरों की नयी सुबहों को
जिन्हें अभी बसना है
और तुम भी ओ अजन्मों
सुनो मेरी आवाज सुनो
उस आदमी की आवाज
जो मर रहा है
पर कोई शानदार मौत नहीं

वह मर रहा है
उस किसान की तरह
जिसने अपनी जमीन की
देखभाल नहीं की
उस आलसी बढ़ई की तरह
जो छोड़ कर चला जाता है
अपनी लकड़ियों को
ज्यों का त्यों

इस तरह
मैंने अपना समय बरबाद किया
दिन जाया किया
और अब मैं तुमसे कहता हूं
वह सबकुछ कहो जो कहा नहीं गया
वह सबकुछ करो जो किया नहीं गया
और जल्दी

और मैं चाहता हूं
कि तुम मुझे भूल जाओ
ताकि मेरी मिसाल तुम्हें पथभ्रष्ट नहीं कर दे
आखिर क्यों
वो उन लोगों के साथ बैठा रहा
जिन्होंने कुछ नहीं किया
और उनके साथ वह भोजन किया
जो उन्होंने खुद नहीं पकाया था
और उनकी फालतू चर्चाओं में
अपनी मेधा क्यों नष्ट की
जबकि बाहर
पाठशालाओं से वंचित लोग
ज्ञान की पिपासा में भटक रहे थे

हाय
मेरे गीत वहां क्यों नहीं जन्में
जहां से शहरों को ताकत मिलती है
जहां वे जहाज बनाते हैं
वे क्यों नहीं उठे
उस धुंए की तरह
तेज भागते इंजनों से
जो पीछे आसमान में रह जाता है

उन लोगों के लिए
जो रचनाशील और उपयोगी हैं
मेरी बातें
राख की तरह
और शराबी की बड़बड़ाहट की तरह
बेकार होती है

मैं एक ऐसा शब्द भी
तुम्हें नहीं कह सकता
जो तुम्हारे काम न आ सके
ओ भविष्य की पीढ़ियों
अपनी अनिश्चयग्रस्त उंगलियों से
मैं किसी ओर संकेत भी नहीं कर सकता
क्योंकि कोई कैसे दिखा सकता किसी को रास्ता
जो खुद ही नहीं चला हो
उस पर

इसलिए
मैं सिर्फ यही कर सकता हूं
मैं, जिसने अपनी जिंदगी बरबाद कर ली
कि तुम्हें बता दूं
कि हमारे सड़े हुए मुंह से
जो भी बात निकले
उस पर विश्वास मत करना
उस पर मत चलना
हम जो इस हद तक असफल हुए हैं
उनकी कोई सलाह नहीं मानना
खुद ही तय करना
तुम्हारे लिए क्या अच्छा है
और तुम्हें किससे सहायता मिलेगी
उस जमीन को जोतने के लिए
जिसे हमने बंजर होने दिया
और उन शहरों को बनाने के लिए
लोगों के रहने योग्य
जिसमें हमने जहर भर दिया


जब फासिस्ट मजबूत हो रहे थे

जर्मनी में
जब फासिस्ट मजबूत हो रहे थे
और यहां तक कि
मजदूर भी
बड़ी तादाद में
उनके साथ जा रहे थे
हमने सोचा
हमारे संघर्ष का तरीका गलत था
और हमारी पूरी बर्लिन में
लाल बर्लिन में
नाजी इतराते फिरते थे
चार-पांच की टुकड़ी में
हमारे साथियों की हत्या करते हुए
पर मृतकों में उनके लोग भी थे
और हमारे भी
इसलिए हमने कहा
पार्टी में साथियों से कहा
वे हमारे लोगों की जब हत्या कर रहे हैं
क्या हम इंतजार करते रहेंगे
हमारे साथ मिल कर संघर्ष करो
इस फासिस्ट विरोधी मोरचे में
हमें यही जवाब मिला
हम तो आपके साथ मिल कर लड़ते
पर हमारे नेता कहते हैं
इनके आतंक का जवाब लाल आतंक नहीं है
हर दिन
हमने कहा
हमारे अखबार हमें सावधान करते हैं
आतंकवाद की व्यक्तिगत कार्रवाइयों से
पर साथ-साथ यह भी कहते हैं
मोरचा बना कर ही
हम जीत सकते हैं
कामरेड, अपने दिमाग में यह बैठा लो
यह छोटा दुश्मन
जिसे साल दर साल
काम में लाया गया है
संघर्ष से तुम्हें बिलकुल अलग कर देने में
जल्दी ही उदरस्थ कर लेगा नाजियों को
फैक्टरियों और खैरातों की लाइन में
हमने देखा है मजदूरों को
जो लड़ने के लिए तैयार हैं
बर्लिन के पूर्वी जिले में
सोशल डेमोक्रेट जो अपने को लाल मोरचा कहते हैं
जो फासिस्ट विरोधी आंदोलन का बैज लगाते हैं
लड़ने के लिए तैयार रहते हैं
और शराबखाने की रातें बदले में मुंजार रहती हैं
और तब कोई नाजी गलियों में चलने की हिम्मत नहीं कर सकता
क्योंकि गलियां हमारी हैं
भले ही घर उनके हों

अनुवाद: रामकृष्ण पांडे

उपहार

सैनिक की पत्नी ढक्कन खोल आवाक
बूढ़े शहर प्राग ने भेजा है उपहार
एक जोड़ी ऊंची ऎड़ीवाली खूबसूरत जूती
बूढ़े शहर प्राग ने सौंपी है संभार
सैनिक की बीवी खोल रही धीरे-धीरे
सागर पार से क्या भेजा असलो ने
आदमी ने भेजी फर की कीमती टोपी
खुशी से पागल अर्मानी.
सैनिक की बीवी आवाक होकर सोचती है
ब्रासेल्स फिर इतना रंगदार, शौकीन
गजब की लेस भेजी है डाक से
आज का दिन बहुत अच्छा बितेगा
सैनिक की पत्नी बहुत ही भाग्यशालिनी है
पारी की रोशनी से आंखें चौधियाती उसकी
फैशन स्वर्ग की रेशमी कुरती से
शौक पूरा हुआ है उस वामा का
सैनिक की बीवी आराम से आंखें बंद कर लेती है
दूर बुखारेस्ट ने भेजा है ब्लाउज
जिसे उसके आदमी ने खोज-खोज कर पाया है
रंग और नक्शे में दिलबहार
नाजी सेनानी की बीवी हक्का-बक्का
बरफ ढंके रूस देश का उपहार
तुषार धवल देश ने उसके नाम भेजा
सद्य विधवा का काला लिबास

मेरा भाई था विमान चालक
मेरा भाई था विमान चालक
उसे एक दिन एक कार्ड मिला
बक्से में भर कर अपना सामान
दक्षिण की ओर उसने कदम बढ़ाया

दिग्विजय था मेरा भाई,
लोगों के मुकाबले जगह चाहिए,
सीमा तोड़ कर देश पर कब्जा
आदिकाल से उसका लोभ
अंत में मेरे भाई ने हासिल किया
ग्वादामारा मैकसिफ का मैदान,
लंबाई में छह फीट दो इंच
चौड़ाई में चार-छह की एक कब्र

अनुवाद: सुबीर मालाकार

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ ...क्योंकि गलियां हमारी हैं ”

  2. By Aflatoon on June 21, 2007 at 12:08 PM

    बहुत खूब । मालाकारजी और आपकी मेहरबानी ।

  3. By Reyaz-ul-haque on June 21, 2007 at 11:07 PM

    शुक्रिया अफ़लातून जी.
    बाकी?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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