हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

इसलिए उसे जिबह कर दिया गया

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/20/2007 12:56:00 AM

ब्रेष्ट की यह कविता नयी दुनिया के निर्माण का सपना देखने और उसे ज़मीन पर उतारने में अपना खून देनेवाले हर शहीद के नाम है. देखना और पूछना ज़रूरी है कि क्यों हर वह आदमी जो मनुष्य की तरह जीना चाहता है, आज जानवरों की तरह जिबह किया जा रहा है. क्या हमें मनुष्यता और नयी दुनिया की कोई ज़रूरत नहीं रही?

अज्ञात क्रांतिवीर का शिलालेख
बर्तोल्त ब्रेष्ट क्रांति का
अज्ञात वीर मारा गया
मैंने उसका शिलालेख
सपने में देखा
वह कीचड़ में पड़ा था
दो शिलांश थे
उन पर कुछ नहीं लिखा था
पर उनमें से एक कहने लगी
जो यहां सोया है
वह दूसरे की धरती को
जीतने नहीं जा रहा था
वह जा रहा था
अपनी ही धरती को मुक्त करने
उसका नाम कोई नहीं जानता
पर इतिहास की पुस्तकों में
उनके नाम हैं
जिन्होंने उसे मिटा दिया

वह मनुष्य की तरह जीना चाहता था
इसीलिए एक जंगली जानवर की तरह
उसे जिबह कर दिया गया

उसने कुछ कहा था
फंसी-फंसी आवाज में
मरने से पहले
क्योंकि उसका गला रेता हुआ था
पर ठंडी हवाओं ने उन्हें चारों ओर फैला दिया
उन हजारों लोगों तक
जो ठंड से जकड़ रहे थे.
अनुवाद : रामकृष्ण पांडेय
ब्रेष्ट की कुछ और कविताएं जल्दी ही हाशिया पर.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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