हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जो वाकई एक गंदे नेपकिन की तरह है

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/19/2007 12:58:00 AM

राहुल, अविनाश आदि के पूरे प्रकरण के पीछे गुजरात का काला चेहरा ही था, जिसे मोदी की हत्यारी राजनीति को खाद-पानी देनेवाले ब्लागरों और उच्च तकनीकी क्षमता से लैस उनके कुछ आत्ममुग्ध साथियों ने अपने भद्दे तरीके से अंजाम तक पहुंचाया. उन्हें यह स्वीकार्य नहीं, कि मोदी के गुजरात को गाली दी जाये. जो अपने आप में सभ्य समाज और मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए एक भद्दी गाली की तरह है उस मोदी को, संघ परिवार को, भाजपा को और मोदियाए हुए गुजरात को गाली न दी जाये? जो राज्य विशेष समुदाय के लिए आतंक का पर्याय बन गया हो, जो निरंतर अपने यहां बसे मुसलमानों के खिलाफ़ खुली-छुपी हिंसा कर रहा हो, जो लाखों लोगों के जीने के बुनियादी अधिकारों को जबरन छीने बैठे हो और उन्हें जंजीरों में जकडी़ जिंदगी जीने को विवश किये हुए हो वह और उसके चारण असल में सम्मान पाने के हरेक अधिकर को खो चुके हैं. वे असल में एक ऐसे शासक के लिए संयत भाषा का आग्रह कर रहे हैं जिसने अपने देश की संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ़ और उनके अधिकारियों के खिलाफ़ लगातार जहर उगला, देश की सबसे पुरानी और सबसे बडी़ राजनीतिक पार्टी की अध्यक्ष को कुतिया कहा... हमसे आग्रह है कि हम उसी शासक और उसके चारण ब्लागरों के प्रति सम्मानजनक भाषा के साथ पेश आयें. यह असंभव है. आपने परिवेश को इतना सम्मानजनक रहने ही नहीं दिया है. राहुल के ही शब्द को उधार लूं तो कहूंगा, पूरे गुजरात की राजनीति एक गंदे नेपकिन की तरह हो गयी है. उसे बिना साफ़ किये उसका बने रहना देश के लिए खतरनाक है.
गुजरात की राजनीति की इसी गंदगी और इस पूरी प्रवृत्ति पर गौहर रज़ा का यह आलेख. इसे समकाल ने हाल ही में छापा है. गौहर रज़ा देश के जाने-माने इनसानदोस्त संस्कृतिकर्मी हैं. आप इन्हें इनकी फ़िल्म ज़ुल्मतों के दौर में से जान सकते हैं. फ़िल्म को देखना एक थरथरा देनेवाले अनुभव से गुजरने जैसा है. इसके अलावा इनकी शायरी इनकी चिंताओं के बडे़ फ़लक को सामने रखती है.

फासीवाद का खूनी पंजा

गौहर रजा
फासीवाद के कई चेहरों के पीछे बस एक ही चेहरा होता है. नफरत और अहिंसा का चेहरा. कभी नफरत सामने होती है तो कभी हिंसा, नफरत के बिना हिंसा का भड़कना नामुमकिन है और हिंसा के बिना नफरत को ज्यादा देर तक हवा देना मुश्किल.
वक्त और जरूरत के हिसाब से बाकी सब कुछ बदलता रहता है. इस नफरत की बाती को जलाये रखने के लिए स्थायी दुश्मन की जरूरत होती है जो कमजोर भी हो. कमजोर इसलिए कि अगर दुश्मन ज्यादा मजबूत होगा तो फासीवाद पनप ही नहीं सकता.
देश के हिंदू और मुसलमानों के सांप्रदायिक गुटों ने कभी अंगरेज़ सरकार से टक्कर नहीं ली, क्योंकि वह बड़ी ताकत थी.
सावरकर और वाजपेयी जैसे लोगों ने तो अंगरेज़ी सरकार से माफी मांगी. खुद जेल से बाहर आये और स्वतंत्रता सेनानियों को काला पानी की सजा दिलवायी.
आज भी आरएसएस, भाजपा, विहिप, बजरंग दल या दुर्गा वाहिनी के लोग कभी भी पुलिस के खिलाफ नारे नहीं लगाते, यह अंदर की बात है, पुलिस हमारे साथ है. या हिंदू पुलिस भाई-भाई, देश के किसी और राजनीतिक दल ने इस तरह के नारे नहीं लगाये.
प्रश्न यह है कि इस नारे की जरूरत क्यों पड़ती हैं. हिंसा भड़काने के लिए समाज विरोधी तत्वों को लामबंद करना फासीवाद की एक जरूरत है. इस नारे का मतलब है, तुम हिंसा करो, घरा जलाओ, लूटो, दुष्कर्म करो, पुलिस से डरे बिना, क्योंकि हमने उससे पहले ही सांठगांठ कर रखी है.
फासीवाद के पनपने के लिए दुश्मन का कमजोर होना जरूरी है. मगर नफरत न तो एक दुश्मन के भरोसे पनप सकती है और न उसे एक दुश्मन तक सीमित रखा जा सकता है. आरएसएस का इतिहास बताता है कि पहले उनके दुश्मन मुसलमान थे, फिर कम्युनिस्ट इस सूची में शामिल हुए, फिर इसाई, फिर दीपा मेहता, एमएफ हुसैन, फिर दीपा मेहता, एमएफ हुसैन, राहुल ढोलकिया जैसे कलाकार, लेखक और इतिहासकार, फिर वे नौजवान लड़के-लड़कियां, जो वेलंटाइन डे पर दूसरे से दोस्ती व्यक्त करना चाहते हैं फिर वे लड़कियां जो स्कर्ट या जींस पहनने की आजादी चाहती हैं. आमतौर पर अवाम इस तरह के हमलों को जुर्म समझते हैं, इसलिए परंपराओं, धाराओं, जाति विशेष पर एक बड़े खतरे का एहसास दिलाया जाता है. फिर परंपराओं और अस्मिता की दुहाई और भावनाओं पर ठेस के डंडे से किसी को भी लहूनुहान किया जा सकता है. एक बार यह डंडा चलना शुरू हो तो इसे रोकना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर होता है.
यह वही मानसिकता है, जिसकी गूंज सारी दुनिया में हाल में सुनी गयी. जो हमारे साथ नहीं वह हमारा दुश्मन है. आरएसएस के सरसंघ चालक पहले ही कह चुके हैं कि यह महाभारत है. यानी जो आरएसएस में नहीं वह कौरव है. यह मानसिकता है धीरे-धीरे नये दुश्मन तलाश करने की. इस परिप्रेक्ष्य में गुजरात में घटी तीन घटनाओं को परखना जरूरी है. गुजरात के भाजपा संसद सदस्य की एक औरत को अपनी बीबी बना कर अमेरिका ले जाने की घिनौनी साजिश, पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी का तीन लोगों (जिस में दो मुसलमान और एक हिंदू था) का बर्बरता से कत्ल और पुलिस की मदद से एक गुंडे का आर्ट के छात्रों पर हमला. ये तीनों घटनाएं फासीवाद के नफरत और हिंसा भरे चेहरे को दरसाती हैं.
जब आप परंपरा, अस्मिता और मुसलमान या ईसाइयों से दुश्मनी के नाम पर समाज के सब से घिनौने गुटों को इकट्ठा कर के उनको राजगद्दी तक पहुंचाते हैं तो उनसे यह उम्मीद नहीं रख सकते कि वे अपने अतीत को भूल कर राजपाट चलाने के लिए सभ्य हो जायेंगे. यह एसपी 2002 में मुसलमानों के कत्लेआम में शामिल था और यही उसके संसद तक पहुंचने का आधार बना. यह कैसे सोचा जा सकता है कि वह अपने पद को विदेशों में भारतीय महिलाएं और बच्चे सप्लाई करने का धंधा चलाने के लिए नहीं इस्तेमाल करेगा. मुसलमानों और गरीब (दलित) इनसानों का घर लूट कर पेट नहीं भरा जा सकता. जब पेट बड़ा हो तो धंधा भी बड़ा होना चाहिए. उसके इस काम से न गुजरात बदनाम हुआ और न अस्मिता को चोट पहुंची. आरएसएस पर डॉक्युमेंट्री फिल्मों के बनने से ही खतरे में आती है. सोचिए, इस सांसद के लिए यह नारा कितना जरूरी है. यह अंदर की बात है पुलिस हमारे साथ है. दूसरा मामला पुलिस अधिकारों का है. ये उसी तरह के अधिकार हैं जिनके बारे में पाकिस्तान के मशहूर शायर अहमद फराज ने बांग्लादेश में पाकिस्तानी फौज के दमन को देख कर लिखा था, पेशेवर कातिलो तुम सिपाही नहीं. यही सारे हथियार बांग्लादेशी आवाम पर पाकिस्तानी फ़ौजी सरकार ने इस्तमाल किये थे. प्रोपेगंडे की खाद से जब जमीन तैयार हो जाती है तो दुश्मन के सारे अधिकार छीन लिये जाते हैं. उसे इनसान से नीचे का दर्जा दे दिया जाता है और उससे जीने का हक भी छीना जा सकता है. मीडिया हमें बताता है कि सोहराबुद्दीन एक मुजरिम था, तो या कानून और संविधान किसी को यह इजाजत देता है कि एक मुजरित को चलती बस में से उतारो और उस पर आंतकवादी होने का इलजाम लगाओ, कहो कि वह मोदी को मारने आया था और फिर उस को बर्बरता से एक फार्म हाउस में ले जा कर कत्ल कर दो. चलो मान लिया कि संगमरमर के व्यापारियों ने वंजारा को इस काम के लिए सुपारी नहीं दी थीं. मगर क्या उसकी पत्नी कौसर बी के साथ दुष्कर्म करना भी देशप्रेम और संविधान की रखा करना माना जायेगा. प्रेस ने हमें बताया कि उसकी पत्नी की यह दूसरी शादी थी, यानी वह चरित्रहीन थी. मान लिया वंजारा जी, तूम चरित्रवान हो इसलिए चरित्रहीन औरत के साथ दुष्कर्म करना तुम्हारा हक है, उसकी देह को जला कर उसकी हड्डियों को जलाना तुम्हारा हक है. आखिर वह एक चरित्रहीन मुसलमान थी, और यह सब तुम 2002 में कर चुके थे. एक महिला क्या सैकड़ों के साथ दुष्कर्म किया था, वे सब मुसलमान थीं, पर वह तीसरा कौन था जिसके नाम लेने से मीडिया भी कतरा रहा है. तुलसी राम प्रजापति, वह हिंदू था या मुसलमान, जो भी था एक भारतीय नागरिक था,उसके भी कुछ अधिकार थे. उसे भी तुम फार्म हाउस ले गये और कत्ल कर दिया. मीडिया नहीं बतायेगा कि किस तरह ये अधिकारी प्रमोशन की सीड़ियां चढ़े, किस तरह कार और घर खरीदने के लिए इन अधिकारियों को धन उपलब्ध करवाया गया, किस तरह उन्होंने मोदी को खुश करने के लिए एक-दो नहीं बल्कि दसियों लोगों को आंतकवादी कह कर एनकाउंटर में मार दिया. और ज्यादातर लोगों ने मान भी लिया कि वे आंतकवादी थे. मीडिया ने मनगढंत कहानियां खूब मसाला लगा कर छापीं.
फासीवादियों के लिए एक परेशानी यह भी थी कि गुजरात नरसंहार के बाद मुसलमानों ने बदला लेने की कोई कोशिश नहीं की. कर भी नहीं सकते थे. मगर मोदी और विहिप के गुंडों ने गुजराती अवाम को यही कह कर डराया था कि अगर हमारी सरकार नहीं बनाओगे तो तुम पर हमले होंगे. इसे साबित करना जरूरी था.
तीसरा मामला और भी संगीन है. एक गरीब घर का लड़का बड़ौदा की मशहूर एमएस यूनिवर्सिटी के आर्ट डिपार्टमेंट में एडमिशन लेता है. वह अपने इम्तिहान के लिए चित्र बनाता है. अचानक विहिप-भाजपा के गुंडे अंदर घुस आते हैं, चंद्रमोहन और दो छात्रों को बुरी तरह पीटते हैं. पुलिस आकर तीनों छात्रों को गिरफ्तार करती है. दो को छोड़ देती है और चंद्रमोहन को पांच दिन जेल में रहना पड़ता है. न्यायालय उसे पांच दिन तक जमानत नहीं देता. इलजाम-उसने ऐसे चित्र बनाये जिन्होंने हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचायी. कार्यकारी डीन और वीसी, आरएसएस के करीबी हैं. इसमें कई प्रश्न हैं जो पूछे ही नहीं गये. इन गुंडों को किस ने बताया कि कु छ चित्र हैं जिन पर हमला किया जा सकता है. क्या किसी को भी यूनिवर्सिटी में घुस कर मारपीट करने की आजादी होनी चाहिए, हां शायद गुजरात में है, अगर वे विहिप के कार्यकर्ता हैं तो, अगर वे दरगाह तोड़ने में सक्रिय रहे हों तो, और दंगे करवाने मं माहिर हों तो.
क्या वीसी को छात्रों और अध्यापकों पर हमला करनेवालों के खिलाफ एफआइआर करनी चाहिए? ऐसा कैसे हो सकता है, अगर वीसी आरएसएस का हो और हमला करनेवाले विहिप के हों. इसका फैसला कौन करेगा कि चित्र अच्छा है या बुरा. अध्यापक या विहिप? गुजरात में हर फैसले का हक बस विहिप को है. मुद्दे बहुत सारे हैं और इन में हम उलझे रह सकते हैं. समझने की बात यह है कि चंद्रमोहन पर हमला एक नये दुश्मन की तलाश है. कल अगर फासीवादी सोच के विस्तार के लिए खजुराहो ध्वस्त करने की अवश्यकता होगी तो विहिप उससे भी नहीं कतरायेगी. वह मसजिदों और दरगाहों पर पहले ही हाथ साफ कर चुकी है.
गुजराज की जनता को ही नहीं पूरे देश के अवाम को समझना होगा कि अगर यही हाल रहा तो जो वंजारा से बच जायेगा वह प्रवीन जैन के हाथ लगेगा. एक सीमा के बाद दुश्मन का हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई होना अर्थहीन हो जाता है, नहीं कहा जा सकता कि कब किसे दुश्मन ठहरा दिया जायेगा. हम सब फासीवादी निशाने पर हैं, कोई सुरक्षित नहीं.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ जो वाकई एक गंदे नेपकिन की तरह है ”

  2. By notepad on June 19, 2007 at 9:16 AM

    आपका ब्लाग पसन्द आया । भरा पूरा है जानकारियो से ।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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