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बीच सफ़हे की लड़ाई

...मगर यह शर्मनाक है नारद जी

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/18/2007 12:23:00 AM

नारद जी
हमारा आपसे यह पहला सार्वजनिक संवाद है.
आपने बाजार को नारद पर से हटा दिया (पोस्ट करने तक वह फिर से जोडा नहीं गया था) और चूंकि आप नारद को चलाते हैं आप ने इस अधिकार का प्रयोग किया कि आप जिस को चाहेंगे वही नारद पर दिखेगा.
बेशक यह आपका अधिकार है. हमें उससे असमति नहीं. मगर आप फिर भी गलती पर हैं. आप एक कमजोर जमीन पर हैं.
ऐसे समय में जब देश भर में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बहस चली हो, और हर सत्ता प्रतिष्ठान की तरफ़ से यह कोशिश की जा रही हो कि असहमति के हर स्वर को दबा दिया जाये आपने अपने समय का एक बदतरीन और शर्मनाक उदाहरण प्रस्तुत किया है.
हम नहीं समझ पा रहे हैं कि आपका यह कदम अंततः भाजपा, संघ परिवार, विहिप और बजरंग दल जैसी गुंडावाहिनियों के उन कदमों से अलग कैसे है जो पूरे देश को बर्बर युग में धकेल देना चाहते हैं. वे देश और संस्कृति की रक्षा के नाम पर युवक-युवतियों पर हमले करते हैं, वे वाटर जैसी फ़िल्म को शूट नहीं होने देते और परज़ानिया, फ़ाइनल साल्युशन जैसी फ़िल्मों को नहीं दिखाने देते. वे यह चाहते हैं कि फ़िल्मकार उनकी मरजी से फ़िल्में बनायें, उनकी मरजी से किताबें लिखी जायें, लोग उनकी मरज़ी से ही सोचें, बोलें. वे पेंटिंग्स को जलाते हैं और कलाकारों को मारते-पीट्ते हैं. मुझे नहीं समझ में आता कि आप उनसे खुद को कैसे असहमत पायेंगे.
आपका यह कदम उन कट्टरपंथी मध्ययुगीन मुल्लाओं से कैसे अलग है जो कलाकारों, औरतों, लेखकों, फ़िल्मकारों की आज़ादी से खौफ़ खाते हैं और उनके खिलाफ़ फ़तवे देते हैं? वे हर तरह की असहमतियों को दबा देना चाहते हैं.
देश में सरकारों को निहत्थे डाक्टरों और कवियों से डर लगने लगा है- वे उन्हें पकड़ कर जेलों में बंद कर रही हैं. उनको चुप करा देना, बोलने के उनके मंच उनसे छीन लेना- यही तो है उनकी मंशा. बहुत दुख होता है जब आपकी मंशा भी इसी से मिलती जुलती दिखती है.
आपने बाजार को हटाया, इसके लिए आपके द्वारा दी जा रही तमाम दलीलें बेमतलब हैं क्योंकि आपकी असली मंशा आपके और दूसरों के ब्लाग पर आपकी (और आपकी टीम से जुडे़ लोगों की) टिप्पणियों से जाहिर है. वैसे अगर भाषा ही ब्लाग को नारद से हटाने के लिए एक वजह है तो अनेक ऐसे संघी ब्लाग हैं जिन पर इससे भी गंदी भाषा प्रयोग में लायी जाती है. इसके अलावा अपमानजनक भाषा तो आपके अनेक मान्यवर लोग प्रयोग में लाते रहे हैं. 'मान्यवर' संजय बेंगानी जी खुद एक बार कह चुके हैं- संभल जाओ अविनाश यह किस तरह की सभ्य भाषा है, क्या बतायेंगे? और क्या आप संसद की तरह कोई कोष बना रहे हैं भाषा का जिसमें असभ्य भाषा के बारे में साफ़-साफ़ लिखा हुआ होगा? और अगर नहीं तो फिर यह तय करने का आपका मानक क्या है कि किसी की भाषा आपत्तिजनक है?
आपको समझना होगा कि आप लाठी लेकर बैठे हुए स्वयंभू पहरुए नहीं हैं जो यह तय करे कि कौन क्या लिख-बोल रहा है. आप फ़ीड एकत्रक हैं, जैसा आप खुद कहते हैं, न कि सेंसर बोर्ड या ऐसा ही कुछ.
अगर आप ऐसे ही करते रहेंगे तो अपनी प्रासंगिकता खो देंगे. नये लोग आयेंगे और आप बाहर कर दिये जायेंगे. लोग खुद आपको 'बैन' कर देंगे. प्रक्रिया शुरू हो ही चुकी है. (रवि रतलामी जी ने अपने ब्लाग पर बताया है इस बारे में) बेशक हिंदी ब्लाग को आपका बडा़ योगदान है, मगर आपके ऐसे सभी कदम काले अध्याय की तरह याद किये जायेंगे.
अंत में हम कहेंगे कि बाज़ार ने जो कुछ भी लिखा-कहा हम उससे शत-प्रतिशत सहमत हैं. आप हमें भी सजा दे सकते हैं.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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