हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अगर आपको बांझी याद हो तो पढें, न हो तो जरूर पढें

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/10/2007 11:54:00 PM

एक और बांझी
देश का पूरा तंत्र जिस तरह अंतरराष्ट्रीय महाजनों और युद्धक शक्तियों के महागंठबांधन के आगे दंडवत है उसी तरह देश के समाज में भी तंत्र और देसी महाजनों का आतंक दिनों-दिन बढ़ रहा है. मगर इसके खिलाफ़ जो आवाज़ उठती है उसे भर मुट्ठी दबाने के भी प्रयास होते है, हो रहे हैं. यह आलेख बिहार में समाजवादी आंदोलन से जुडे़ रहे, और बिहार विधान परिषद के सभापति रह चुके उर्दू लेखक-राजनेता जाबिर हुसेन की डायरी, जो आगे हैं (2004 में प्रकाशित) से लिया गया है. क्या आप इसके इशारों को समझ रहे हैं?

जाबिर हुसेन
जिन लोगों को 1985 का बांझी संहार याद होगा, वो शायद यह भी नहीं भूले होंगे कि इस संहार में बांझी के महाजनों ने आठ संथालों तथा पुलिस ने सात संथालों की निर्मम हत्या की थी. इनमें पूर्व सांसद फादर मुर्मू भी थे. केवल आदिवासी जगत में ही नहीं, पूरे देश में इस नरसंहार की तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी. विभिन्न जन एवं मानवाधिकार संगठनों के दबाव पर राज्य सरकार ने एक जांच आयोग गठित किया था. आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को पेश कर दी थी, जिसमें पुलिस द्वारा संपन्न इस जघन्य हत्याकांड को उचित ठहराया गया था. कुछ राजनीतिक अपवादों को छोड़ दें, तो समूचे राज्य ने जैसे आयोग के इस निष्कर्ष को स्वीकार कर लिया था. मानवाधिकार संगठनों के प्रतिनिधि भी आयोग की इस रिपोर्ट को अपने अस्तित्व की कसौटी मान कर कोई ठोस कार्यक्रम नहीं बना सके. सबसे दुखद यह रहा कि आयोग की रिपोर्ट को न्याय की मर्यादा के संदर्भ में देखा गया. यह दलील भी दी गयी कि आयोग की रिपोर्ट को प्रतिकार का विषय बनाने से न्याय व्यवस्था की मानहानि होगी. यह अपने आप में एक आश्चर्यजनक दलील है. इस दलील से यह विश्वास जन्म लेता है कि न्याय व्यवस्था से जुड़ी संस्थाएं चाहे जितनी जनविरोधी व्यवस्थाएं स्थापित करें, उन्हें चुनौती देने की बात नहीं सोची जा सकती. यही कारण है, बांझी आयोग के गर्भ से जन्मी अवहेलना किसी जन आंदोलन का आधार नहीं बन पायी. मैं उन लोगों में हूं, जो मानते हैं कि बांझी आयोग की रिपोर्ट ने राज्य की सीमा में जनविरोध का एक अश्लील उदाहरण प्रस्तुत किया है. इसने अन्याय पर टिकी एक सामाजिक व्यवस्था के पक्ष में पांडित्यपूर्ण दलीलों का सहारा लेकर जनता के साथ घोर विश्वासघात किया है. यह रिपोर्ट दरअसल बाद की कई न्यायिक व्यवस्थाओं की नींव बन गयी है. मैं पड़रिया के संदर्भ में दिये गये न्यायिक फैसले को भी इसी रोशनी में देखने को मजबूर हूं. इतने दिन बीत जाने पर भी मैं बांझी के नरसंहार और बांझी आयोग की रिपोर्ट का जिक्र आखिर क्यों कर रहा हूं. इसलिए कि बांझी की घटना अपने इलाके की आखिरी घटना नहीं थी. इस घटना और इसके बाद समूचे राज्य की चुप्पी ने संथाल इलाकों में महाजनी व्यवस्था के किले की दीवारों को और भी मजबूत कर दिया है. उनके हौसले और भी ऊंचे हो गये है. उन्होंने मान लिया है कि राज्य की सत्ता नौ फ़ीसद उनकी पीठ पर है. ओर वो आजादी से जो चाहें कर सकते हैं. महाजनों की इसी निश्चिंतता ने पिछले महीने दो पहाड़िया जवानों और एक संथाल दंपत्ति को मौत के घाट उतार दिया. मुमकिन है, अखबारों में इस घटना की चर्चा तक नहीं छप पायी हो. चुनाव और सांप्रदायिक दंगों की धुंध में ऐसी घटना का प्रकाश में नहीं आना कोई आश्चर्य की बात नहीं. मैं स्वयं इस हत्याकांड के तथ्यों से अनभिज्ञ रह जाता, अगर मुझे बांझी इलाके के 60-70 गांवों में भूमि स्तर पर कार्यरत फादर थॉमस कावला का एक परिपत्र नहीं मिलता. इस परिपत्र ने ही मुझे तथ्यों की छानबीन के लिए प्रेरित किया. मेरी फादर थॉमस कावला से मुलाकात नहीं हो पायी. वो संभवत: बांझी से बाहर रह रहे हैं. मगर मैंने समान रूप से पहाड़िया लोगों और संथालों के बीच फादर कावला की लोकप्रियता के किस्से सुने. बांझी हत्याकांड के बाद से ही फादर कावला लगातार इस क्षेत्र में कार्यरत हैं. उन्होंने महाजनों द्वारा स्थानीय गरीब संथालों के शोषण और लूट के रास्ते बंद करने की दिशा में अभूतपूर्व साहस और लगन के साथ काम किया है. संथालों की एक रजिस्टर्ड समिति द्वारा फादर कावला ने सस्ते दाम पर सामान की लूट प्रथा का एक प्रकार से अंत ही कर दिया है. इलाके भर के गरीब संथालों को फादर कावला के प्रयासों में अपनी सामाजिक -आर्थिक जिंदगी बदलने की संभावना दिख रही है. उनके मन में आशा की एक हल्की मगर ठोस किरण जग गयी है. इन हालात में, संथाल गांवों के गरीब लोगों पर से महाजनी ठेकेदारों का भरोसा उठ जाना एक स्वाभाविक परिणाम है. वो उन्हें अपना शत्रु मानने लगे हैं. और उनसे निपटने की तैयारी भी कर रहे हैं. उस रात बांझी में जो घटना घटी, वो दरअसल महाजन-पुलिस गठजोड़ की इसी तैयारी का नतीजा है. उस रात बांझी और उससे सटे सबाया गांव में अलग-अलग देवी पूजा और सिद्ध-कानू मेला का आयोजन था. दूर-दराज के लोग इसमें भाग लेने आये थे. देव पहाड़ गांव के पहाड़िया और केंदुआ गांव के मोंगोल मुर्मू तथा उसकी औरत देवमाई भी इस मेले में भाग लेने आयी थी. बांझी बाजार के महाजनों को इस बात से तकलीफ पहुंची कि बांझी के मेले में सबाया के मेले में कम भीड़ जुटी. इलाके की संथाल आबादी पर से अपने घटते प्रभाव के कारणों को समझे बिना वो उनके खिलाफ हिंसक रवैया अपनाने को तत्पर हो गये. दूसरे दिन गांव के गड़ेरियों को दो पहाड़िया और दो संथालों की लाशें मिलीं. इस बात के एक से ज्यादा प्रमाण मौजूद हैं कि संथालों की हत्या के बाद बांझी नरसंहार के एक प्रमुख नायक ने गांव के संथालों को पैसों और शराब का प्रलोभन देकर यह भ्रम फैलाने की कोशिश की कि हत्या के पीछे स्वयं फादर कावला और संथाल समिति का हाथ है. यह और बात है कि महाजनी दिमाग की यह साजिश फादर कावला के व्यापक जनाधार के आगे टिक नहीं पायी. इलाके भर के संथालों को इस बात का आश्चर्य है कि बांझी और इसके आस-पास जो तत्व अपने-आपको राजनीतिक मानते हैं, वो पूरे तौर पर महाजन ठेकेदारों की जंगल और खाद्य लूट के हिस्सेदार हैं. इनमें आदिवासी और संथाल मूल के राजनीतिज्ञ भी शामिल हैं. कोई भी पार्टी इस आरोप से बरी नजर नहीं आती. इस बात की आशंका है कि बिहार के सांप्रदायिक दंगों की भट्टी में बांझी और इसके आसपास असंतोष की जो नहर फैल रही है, उसे इतनी असानी से दबा सकना मुमकि न नहीं. रोज-रोज इस असंतोष की जड़ें गहरी होती जा रही हैं, क्यॊंकि यह असंतोष किसी आयातित विचारधारा की देन नहीं. इसका संबंध संथालों की धरती से है. संथालों की धरती, जहां महाजनों के शोषण के मुकाबले संथालों का संघर्ष एक नया आकार ले रहा है.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ अगर आपको बांझी याद हो तो पढें, न हो तो जरूर पढें ”

  2. By Sanjay Tiwari on June 11, 2007 at 11:54 PM

    दो सुझाव है. आप पैराग्राफ दीजिए जिससे पढ़ने में आसानी हो और अपनी साईट पर इतना गैजेट्स का बोझ न लादें की मूल को पढ़ना मुश्किल हो जाए.

  3. By Reyaz-ul-haque on June 12, 2007 at 1:20 AM

    beshak.

  4. By indscribe on June 17, 2007 at 6:40 AM

    umda blog hai....just that the posts are slightly longer....

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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