हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीबी नहीं, मिटायी जा रही गरीबों की पहचान

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/09/2007 12:59:00 AM

एक साम्राज्य की विश्वस्त और दलाल सरकार किस तरह काम करती है, यह देखने के लिए हमें किसी लेख की ज़रूरत बिलकुल नहीं है. हम उसे देखते हैं अपने सामने और अपने साथ होता हुआ...मगर हम यह मानते हैं कि घटनाएं दर्ज हों तो सनद के लिए एक चीज़ हो जाती है. इसी के तौर पर यह आलेख.
सचिन कुमार जैन

सिकरोदा गांव मुरैना जिले के पहाड़गढ़ ब्लॉक में स्थित है. बीपीएल सर्वेक्षण में गांव में कोई भी बंधुआ मजदूर नहीं पाया गया. जब मार्च 2004 में एक शोध दल गांव में पहुंचा तो कई लोगों ने बताया कि वे बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहे हैं. अधिकारियों ने इस सूचना को गलत ठहराया. बाद में जुलाई, 2004 को हमने अखबारों में पढ़ा कि गांव से 20 बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया गया. मध्यप्रदेश के 22 लाख परिवारों के लिए गरीबी रेखा एक ऐसी रेखा है जो गरीब परिवारों के ऊपर से और अमीर परिवारों के नीचे से निकलती है. सर्वेक्षण प्रक्रिया ने लोक अधिकारों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है. सरकार ने आदेश जारी किया था कि ऐसे परिवार जिन्हें भरपेट खाना नहीं मिलता या जो बंधुआ मजदूर हैं, उन्हें गरीब माना जाये, पर ऐसा हुआ नहीं. क्योंकि सर्वेक्षणकर्ताओं ने या तो अंदरूनी और दुर्गम गांवों तक जाने की तकलीफ ही नहीं उठायी या फिर किसी संपन्न परिवार के आंगन में बैठ कर पूरे गांव के फार्म भर लिये. इस कारण कई वास्तविक परिवार गरीबी रेखा सूची में आने से वंचित रह गये. बाद में सरकार ने व्यवस्था दी कि ऐसे वंचित परिवार अपने नाम का दावा पेश करें या किसी दूसरे नाम पर आपत्ति करके कटवायें. गलती सरकारी अमले ने की परंतु गांव में संपन्न व्यक्तियों से दुश्मनी और झगड़ा मोल लेने की सजा गरीब परिवारों को दे दी गयी. इसके बावजूद मध्यप्रदेश में 11.42 लाख लोगों ने दावे पेश किये. सरकार को मानना पड़ा कि मानकों के अनुसार 44.77 लाख परिवारों की इस सूची में 8.71 लाख और लोगों के नाम होने चाहिए. यानी 25 फीसदी नाम गलत दर्ज हुए. जन संगठनों के एक अध्ययन के मुताबिक मात्र 37 प्रतिशत लोगों ने ही दावे पेश किये. यानी 25 लाख से ज्यादा परिवार इस लापरवाही के शिकार हुए हैं. भारत सरकार की नीतिगत प्रक्रिया के तहत राज्य सरकारें अपने क्षेत्र में रहनेवाले गरीब परिवारों की पहचान का काम करती है. राज्य सरकार को गरीबी स्तर मापने और उसके अनुरूप विकास योजनायें चलाने का अधिकार नहीं है. केन्द्र सरकार भी वि व बैंक जैसे अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के दिशा-निर्देश के अनुसार यह तय करती है. जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन केवल उन परिवारों के लिये किया जाता है जो सरकार की परिभाषा के अनुरूप गरीबी की परिभाषा पर खरे उतरते हैं. लेकिन पिछले दस सालों में सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पायी कि समाज के सभी गरीब परिवारों की पहचान मानवीय और न्यायपूर्ण तरीके से की जा सके. 1997-98 के सर्वेक्षण में देश के हर गांव में यह समानता जरूर पाई गई कि सरकार के मुलाजिमों ने गांव के भूस्वामियों, ट्रेक्टर मालिकों, भवन मालिकों और सत्ता सम्पन्न परिवारों के नाम गरीबों की सूची में सबसे ऊपर रखे. चूंकि सरकार यह पहले से ही तय कर देती है कि एक निश्चि सीमा में ही परिवारों की पहचान करनी है, अत: वास्तविक गरीब परिवार इस सूची में शामिल ही नहीं हो पाये. इसके ठीक पांच साल बाद सरकार ने घोषणा की कि देश में गरीबी रेखा में दस फीसदी और मध्यप्रदेश में साढ़े पांच फीसदी की कमी आयी है. जबकि खुद भारत सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (तीन) के आंकड़े गरीबी कम होने के सरकार के दावे को झुठलाते हैं. इसके अनुसार पिछले आठ साल (1998-06) में मध्यप्रदेश में खून की कमी की शिकार महिलाओं की संख्या 48 प्रतिशत से बढ़ कर 58 प्रतिशत हो गयी. एनीमिया के शिकार बच्चों की संख्या 71.3 प्रतिशत से बढ़ कर 82.6 प्रतिशत हो गयी है. आज भी केवल 14.9 प्रतिशत नवजात बच्चों को ही जन्म के तत्काल बाद मां का दूध नसीब हो रहा है. अगर गरीबी कम हुई है तो फिर कुपोषण और एनीमिया में वृद्धि कैसे हुई? सबसे तकलीफदेह बात यह है कि आज भी स्वास्थ्य का मुद्दा मानव विकास का सूचक नहीं बन पाया है. राज्य सरकार ने भी गरीबी रेखा सर्वेक्षण के सूचकों में इसे शामिल नहीं किया है. जबकि राज्य में स्वास्थ्य के ऊपर खर्च होने वाले 100 में से 75 रूपये, हर व्यक्ति को अपनी जमा पूंजी या आय में से खर्च करने पड़ते हैं. सरकार केवल 25 रूपये का भार वहन करती है और वह भी अनुत्पादक मदों में ही खर्च होता है. सूचकों में घरों में शौचालय को शामिल न करने से चार फीसद गरीबी का स्तर सीधे प्रभावित हुआ है. सर्वोच्च न्यायालय में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज द्वारा दायर जनहित याचिका में न्यायालय ने माना कि बहुत से गरीब परिवारों को गरीबी रेखा सूची में शामिल नहीं किया गया है. न्यायालय ने निर्देश भी दिया कि जितने भी वृद्ध, विकलांग, गर्भवती महिलायें और पिछड़ी हुई आदिम जनजाति के परिवारों केे नाम गरीबी रेखा सूची में नहीं हैं, उन्हें अतिगरीबी की अन्त्योदय अन्न योजना का लाभ दिया जाये. यह दरसाता है कि सबसे वंचित और बहिष्कृत परिवार सरकार की नजरों से उपेक्षित हैं. राज्य ने जब इन परिवारों को योजना का लाभ देना शुरू किया गया तो अन्त्योदय अन्न योजना के हितग्राहियों की संख्या 5 लाख से बढ़ कर 15.81 लाख हो गयी. यानी 11 लाख परिवार अति गरीब होते हुए भी गरीबी रेखा सुची में नहीं हैं. दावा-आपत्ति करने वालों और सर्वोच्च न्यायालय से इंसाफ पाये पारिवारों को जोड़ें तो पता चलता है कि लगभग 22 लाख परिवार गरीब होने के बावजूद पहचान से वंचित हैं. खुद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 20 दिसम्बर 2006 को भारतीय विपणन विकास केन्द्र के कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि भले ही भारत सरकार राज्य में 37 प्रतिशत लोगों को ही गरीब मानती है पर उनकी संख्या 60 प्रतिशत से ज्यादा है. बतौर मुख्यमंत्री वह यह जानते हैं कि गरीबी के मानकीकरण, पहचान की प्रक्रिया और व्यवस्था की गैर जवाबदेहिता के चलते समाज के एक बड़े तबके की जिन्दगी धीमी मौत में तब्दील हो रही है. फिर क्या राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह भारत सरकार की अमानवीय वैज्ञानिक अवधारणाओं का विरोध करे? यह इस बात का प्रमाण है कि किस तरह नीतियों और राजनैतिक मंशा के अभाव के चलते समाज में नित नये सामाजिक-आर्थिक रूप से बहिष्कृत वर्ग पैदा हो रहा है. इससे साफ जाहिर है कि बाजारवादी व्यवस्था की समर्थक सरकार का ध्यान गरीबी नहीं बल्कि गरीबों की पहचान मिटाने पर है. (चरखा)

(तसवीर नेट से ली गयी हैं)

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ गरीबी नहीं, मिटायी जा रही गरीबों की पहचान ”

  2. By Sanjay Tiwari on June 9, 2007 at 2:29 AM

    मैं आपके ब्लाग का लिंक अपने यहां दे रहा हूं. आशा है आप अनुमति देंगे. भूमंडलीकरण और कंपनीराज के खिलाफ और भी ब्लागों की जानकारी हो तो सूचना दें. धन्यवाद और नमस्ते

  3. By Reyaz-ul-haque on June 9, 2007 at 2:22 PM

    शुक्रिया भाई
    इसमें अनुमति की क्या ज़रूरत? सब कुछ सबका है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें