हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

वे अब किसके लिए आयेंगे ?

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/25/2007 01:29:00 AM

हम पहले भी बता चुके हैं, किस तरह देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आवाज़ दबायी जा रही है. डा विनायक सेन की गिरफ़्तारी के बाद छत्तीसगढ़ पीयूसीएल के अध्यक्ष राजेंद्र सायल को भी गिरफ़्तार कर लिया गया है. बहुचर्चित शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड मामले में अदालत के फैसले पर टिप्पणी करने के आरोप में उनको आज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। लगभग नौ साल पहले की गई इस टिप्पणी पर जबलपुर हाईकोर्ट ने उन्हें छ: माह की सजा सुनाई थी। श्री सायल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील करने पर सजा की अवधि कम कर एक सप्ताह तय कर दी गई। विस्तार से जानें देशबंधु पर. यहां हम डा विनायक सेन की गिरफ़्तारी पर देशबंधु में छपे अनिल चमड़िया के आलेख को पुनर्प्रस्तुत कर रहे हैं. हम इस मुद्दे को भी नामवर सिंह, चंद्रमोहन, हुसेन आदि मामलों से अलग कर के नहीं देख रहे.

डॉ. विनायक सेन का सिलसिला नहीं रूका तो...


अनिल चमड़िया
दिल्ली के प्रेस क्लब में पूर्व न्यायाधीश राजिन्दर सच्चर, वकील प्रशांत भूषण, लेखिका अरूंधति राय, जेपी आंदोलन के नेता अख्तर हुसैन, विधायक डॉ. सुनीलम और दूसरे कई लोग मीडिया वालों से यह अनुरोध कर रहे थे कि छत्तीसगढ़ में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी की सूचना छापने की कृपा करें। उन्हें चौदह मई को बिलासपुर में जन सुरक्षा विशेष कानून 2005 और गैर कानूनी गतिविधि रोधक कानून 1967 के तहत गिरफ्तार किया गया था। डॉ. विनायक सेन पहले दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में डॉक्टर थे। लेकिन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के नेता शंकर गुहा नियोगी के आंदोलन के प्रभाव में आकर वे आदिवासियों के बीच वहां जाकर काम करने लगे। कामगारों द्वारा चलाए जाने वाला शहीद अस्पताल खड़ा किया। इन दिनों खासतौर से यह देखा जाता है कि मीडिया के पत्रकारों की मानसकिता कामगारों की तरह नहीं रही। वे अधिकारियों की तरह सोचते और हुक्म देते हैं। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के संबंध में भी उन्हाेंने पुलिस के आरोपों की तरफ से सोचना शुरू किया। इसीलिए उनके भीतर लोकतंत्र के मूल्य बोध को जगाने की कोशिश करनी पड़ रही है। एक व्यापारी पीयूष गुहा ने पुलिस द्वारा खुद को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखे जाने के दौरान यह बयान दिया है कि डॉ. विनायक सेन का माओवादियों से रिश्ता हैं। स्टिंग आपरेशन में फंसे छत्तीसगढ़ के एक सांसद संसद भवन में तो यह तक कह रहे थे कि उन्हें पुलिस के एक बड़े अधिकारी ने बताया है कि उनके पास पक्के सबूत हैं। रायपुर जेल तक उड़ाने की योजना थी। इसीलिए एक बड़े नक्सलवादी को (संभवत: नारायण सन्याल) को वहां से बिलासपुर की जेल में भेज दिया गया है। पिछले पचास-साठ वर्षों में ऐसे न जाने कितने उदाहरण मिल सकते हैं जिसमें कि सरकार और पुलिस ने लोगों के लिए लड़ने वाले या लोकतंत्र के पक्ष में बोलने वालों के खिलाफ तरह-तरह के आरोपों में मुकदमें लादे हैं। कांग्रेस की सरकारों ने शासन के ढांचे को इस दिशा में मजबूत किया। इंदिरा गांधी तानाशाही तक पहुंच गईं। आपातकाल लगाया। देश के बडे-बड़े नेताओं को बड़ौदा डायनामाइट कांड में फंसाया था। सरकार अपने विरोधियों को पकड़वाने के बाद हमेशा ही कहती है कि उसके पास पुख्ता सबूत हैं। लेकिन इस देश में क्या कभी देश के किसी बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ पुख्ता सबूत साबित हो सकें?
यहां इस बात से ज्यादा चिंता हो रही है कि सरकारी मशीनरियां तेजी से फासीवाद की तरफ बढ़ रही हैं। आपातकाल लगा तो विरोध हुआ। न्यायपालिका ने घुटने टेके। लेकिन मीडिया के कम से कम एक हिस्से ने तो लड़ाई लड़ी। कई पत्रकार जेल गए। संसदीय राजनीतिक पाटयों से लेकर नक्सलवादियों तक ने तानाशाही के खिलाफ एकजुटता दिखाई। लेकिन आपातकाल के बाद सत्ता मशीनरी ने दमन के साथ-साथ उसके विरोध की ताकतों को तरह-तरह से अलग-थलग किया और अब अमेरिकी शासन शैली को स्वीकृति मिलने के बाद तो वह आक्रमकता की स्थिति में आ गई है। मीडिया की पूरी मानसिकता इस तरह से तैयार की जा रही है कि वह सरकारी मशीनरी की तरह सोचे। वह लोकतंत्र का कोई सवाल ही नहीं खड़ा करें। सरकारी नीतियों की वजह से संघर्ष की परिस्थितियां खड़ी हो तो वह नीतियों के बजाय संघर्ष को विकास विरोधी बताने की मुहिम में शामिल हो। संघर्षों को राष्ट्र विरोधी तक करार करने के तर्कों में मददगार हो। शासन व्यवस्था के पास एक बड़ा हथियार पहले ही मौजूद है। किसी संघर्ष को हिंसक बताकर उसे कानून एवं व्यवस्था के समस्या के रूप में खड़ी करे। वह शांति की एकतरफा जिम्मेदारी स्थापित करने में कामयाब होती रही है। इस गणतांत्रिक ढांचे में यह भी किया गया है कि राय और केन्द्र की नीतियों को एक रूप करने के तरीके खोजे गए। छत्तीसगढ़ की सरकार जब दमन करे तो केन्द्र सरकार कानून एवं व्यवस्था को राय का विषय बता दे और जब छत्तीसगढ़ में कानून एवं व्यवस्था के नाम पर दमन की कार्रवाइयां चलाने के लिए फौज की जरूरत हो तो केन्द्र सरकार उसे अपना राष्ट्रीय और संवैधानिक कर्तव्य बताए। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल से एक प्रतिनिधिमंडल मिला तो उन्होंने कहा कि ये छत्तीसगढ़ का मामला है और वे केवल सरकार को लिखकर पूछ सकते हैं। प्रतिनिधिमंडल चाहें तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायालय में जा सकता है। देश का गृहमंत्री किन मामलों में लाचार दिखने लगा है?
छत्तीसगढ़ एक ऐसा उदाहरण है जहां संसदीय लोकतंत्र में संस्थाओं के स्तर पर दिखने वाले भेद मिट गए हैं। छत्तीसगढ़ आदिवासियों के राय के रूप में अलग हुआ। आदिवासी विधायक बहुमत में चुनाव जीते लेकिन सरकार का नेतृत्व गैर आदिवासी करता है। भाजपा की सरकार है और सलवा-जुडूम कांग्रेस के नेतृत्व चलता में हैं। सलवा-जुडूम के जुर्मों के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग चुप है। न्यायालय में इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने वहां की स्थितियां बयान की है। अनुभव रहा है कि सत्ता मशीनरी जिस संघर्ष को राष्ट्र विरोधी, विकास विरोधी और हिंसक के रूप में स्थापित करने के तर्कों को समाज के मध्य वर्ग तक ले जाने में सफल हो जा रहा है तो उसके खिलाफ तमाम संस्थाओं की राय एक सी बन जाती है। सरकारी मशीनरियों को कौन सा एक आक्रमक विचार संचालित कर रहा है?
छत्तीसगढ़ में जन सुरक्षा विशेष कानून 2005 बना है, वह पोटा से भी ज्यादा दमनकारी है। लेकिन उसे लेकर कोई मतभेद छत्तीसगढ़ की दोनों सत्ताधारी पाटयों के बीच नहीं दिखा। दरअसल कांग्रेस और भाजपा की नीतियों में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। कांग्रेस ने जो दमनकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया है, भाजपा उसका इस्तेमाल ही नहीं करना चाहती है बल्कि उसे और मजबूत करना चाहती है। कांग्रेस ने टाडा लगाया तो भाजपा ने पोटा लगाया। पोटा खत्म किया तो राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर गैरकानूनी गतिविधि रोधक कानून 1967 में उसके प्रावधानों को जोड़ दिया गया। दोनों ही पाटयों का सामाजिक, आथक और राजनीतिक आधार एक है। कांग्रेस के जमाने में जिस तरह से दलितों और आदिवासियों को नक्सलवादी के नाम पर मारा गया है उसी तरह से भाजपा शासित रायों में भी मारा गया है। छत्तीसगढ़ में सलवा-जुडूम की ज्यादतियों को लेकर देश के उन बड़े अधिकारियों एवं न्यायाधीशों ने कई कई रिपोटर्ें पेश की हैं जो भारत सरकार के महत्वपूर्ण ओहदे पर रह चुके हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में काम करने वाले प्रोफेसर्स, पत्रकारों, वकीलों ने बताया कि कैसे छत्तीसगढ़ में आदिवासी मारे जा रहे हैं। अमेरिका ने कहा था कि जो हमारे साथ नहीं है वह आतंकवाद के साथ है। छत्तीसगढ़ में इसी वाक्य को दोहराया गया कि जो सलवा-जुडूम के साथ नहीं है वो माओवादियों के साथ है। जब राजनैतिक सत्ता इस तरह से आक्रमक हो जाए तो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है। यहां तो सरकार के साथ हां में हां नहीं मिलाने वाले सभी के सभी माओवादी माने जा सकते हैं। संसदीय लोकतंत्र का ढांचा इस तरह का समझा जाता रहा है कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों और मूल्यों पर हमलों पर अंकुश लगाने की गुंजाइश रहती है। लेकिन अनुभव बताता है कि पूरा ढांचा एकरूप हो चुका है। ऐसी स्थितियों के लिए ही मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। मीडिया भी जब सरकारी संस्थाओं की तरह सोचने लगे तो लोकतंत्र में लोग अपनी बात कहने के लिए कहां जा सकते हैं? जब लोकतंत्र ही नहीं बचेगा तो मीडिया अपनी ताकत को कैसे बचाकर रख सकेगा। लोकतंत्र एक सिद्धांत है और यह सोचना कि वह किसी मामले में तो लोकतंत्र की आवाज उठाएगा और किसी में नहीं तो वह गफलत में है। स्टार न्यूज के मुंबई दफ्तर पर हमले के बाद पिछले दिनों दिल्ली के प्रेस क्लब में हुई विरोध सभा में चंद ही लोग जमा हो सके।
लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए पिछले वर्षों में जो कुछ हासिल किया उस पर तेजी से हमले हो रहे है। लोकतंत्र के मूल्यों पर हमले के लिए राष्ट्रवाद और शांति की आड़ ली जाती है। सत्ता मशीनरी बराबर इस किस्म की दुविधा पैदा करने की कोशिश करती है। राष्ट्र चाहिए या लोकतंत्र? लेकिन जागरूकता इसी में सिद्ध होती है कि वह दो में से एक के चुनाव करने के प्रश्न के तरीके को ही ध्वस्त कर दे। राष्ट्र अपनी व्यवस्था के लिए जाना जाता है। राष्ट्र की जब व्यवस्था ही लोकतांत्रिक नहीं होगी तो उसका क्या अर्थ रह जाता है? लगातार शांतिपूर्ण संघर्षों की उपेक्षा जानबूझकर की जा रही है। उन बुद्धिजीवियों को ठिकाने लगाने का है जो जन संघर्षों के साथ रहते हैं। छत्तीसगढ़ भारतीय समाज व्यवस्था की भविष्य की नीति की जमीन तैयार कर रहा है। देश का बड़ा हिस्सा आदिवासियों जैसा ही होता जा रहा है। यह सोचना कि वहां आदिवासी मारे जा रहे हैं, ऐसा नहीं है। आदिवासी जैसे हालात में रहने वाले लोग मारे जा रहे हैं।

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ वे अब किसके लिए आयेंगे ? ”

  2. By चन्द्रिका on May 25, 2007 at 7:12 PM

    जिस तरह से राजेन्द्र सायल की गिरफ्तारी हुई वह पूरी तरह से नाटकीय था विनायक सेन की रिहाई के लिये जो धरना हुआ उसमें तकरीबन 500 से ज्यादा मजदूर किसान इकट्ठा हुए उन्होंने कहा कि यदि विनायक सेन जो कि मानवाधिकार के लिये ,हमारे हक के लिये लड़ते रहे है,जिन्होने सलवा जुडुम की सच्चाई को उजागर किया,और ऐसे न जाने कितने लोगों के हक अधिकारों के लिये लड़ा है, यदि वे नक्सली है तो हम सब नक्सली है क्योंकी हम उनका समर्थन करते है,इसके बाद सायल ने विस्तार से बातों को रखा और खा कि हम जनता की ताकत के साथ तब तक लड़ते रहेंगे जब तक हमारी ये तीन मांगे पूरी नहीं हो जाती
    1.डा. सेन को निःशर्त रिहा करो.
    2.छत्तिसगढ़ से विशेष जन सुरक्षा अधिनियम(काला कानून )हटाओ.
    3.फर्जी मुठभेंड़ो की जाच हो(निष्पक्ष)
    इन बातों को देखते हुए पुलिस ने अपनें खिलाफ सच्चाई को उजागर होता देख जनता का बढ़ता आक्रोश देख आनन-फानन मे 6 साल पुराने केश को उघाड़ा और सायल को गिरफ्तार किया.
    छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम एक ऐसा कानून है जिसको दूसरे शब्दों में हर सोचने समझने वाले,अधिकार की लड़ाई लड़ने वाले,शोषकों के खिलाफ बोलनें वालों के नाम वारेंट खा जा सकता है.. क्या आप भी सोचते है
    क्या आप हक अधिकार की लड़ाइ लड़ते है
    क्या आपके चश्में का लेंस
    देख सकता है
    बढ़ी हुई बढ़ती खांई को
    फिर आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे है

  3. By तपेश on July 4, 2007 at 5:36 PM

    यह वहीं छत्तीसगढ़ है जहाँ नालंदा विश्वविद्यालय से भी प्राचीन शिक्षा का कैन्द्र था जहाँ दस हजार से भी ज्यादा बौद्ध भिक्षु शिक्षा प्राप्त करते थे, जहां महाप्रतापी राजा जाजल्यदेव से ले कर महान वैज्ञानिक आयुर्वेद और धर्मगुरु आदि शंकराचार्य ने शिक्षा प्राप्त की। आज इस छत्तीसगढ़ में रहने को कुछ विश्वविद्यालय हैं और यहाँ की 60 प्रतिशत से भी ज्यादा आवादी अनपढ़ है। बहूमूल्य खनिज संपदा हीरा, अलेक्जेड्राइट, कोरंडम, क्वार्टज, लाइमस्टोन, टीन लौह सयस्क, डोलोमाइट, कोयला की भरपूर खदान होने के बाद भी राज्य पिछड़ा हुआ है और साल-सागौन, तेंदूपत्ता, आम, ईमली और महुआ के अलावा कई वनोपजों की भरपूर पैदावार के बाद भी 75 प्रतिशत वनवासी बेहद गरीब हैं। “अमीर धरती के गरीब लोग” ये उक्ति पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अपने भाषणों में हर बार दुहराते रहे, उन्ही गरीब लोगों के नुमाइंदों ने 5 जून 2005 को एक ऐसे अभियान की शुरुआत की जिसने महात्मा गांधी के सत्याग्रह को याद दिलवा दिया। विश्वप्रसिद्ध बस्तर जहाँ आदिम जाति की परंपराएं आज भी जीवित हैं, के फरसगढ़ थाना क्षेत्र के छोटे से गाँव अंबेली में 5जून 2005 को करीब पाँच हजार आदिवासियों का जुडूम हुआ।

    जुडूम गोंडी बोली का शब्द है जिसका अर्थ है जुड़ना, वहीं सलवा का मतलब होता है शांति । ये सभा पिछले 25 बरसों से बस्तर मं आतंक और हिंसा का पर्याय बन चुके नक्सली आंदोलन की प्रतिक्रिया थी। हिंसा का प्रतिकार अहिंसा के साथ । इस आंदोलन ने तेजी से लोकप्रियता हासिल की और देखते –देखते दंतेवाड़ा जिला अब नारायणपुर और बीजापुर के भी 500 से ज्यादा गाँवों में इसकी लहर पहुँच गई है। इसके चलते पहली बार ‘नो मेंस लैण्ड’ जैसे अबूझमाड़ क्षेत्र के ग्राम चेरपाल में दस हजार से भी ज्यादा आदिवासी जुड़े । अब तक सौ से भी ज्यादा ग्राम सभाओं से ये शांति अभियान तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद रुकने का नाम नहीं ले रहा है।

    गौरतलब है कि सलवा जुडूम अभियान इस बार फिर चर्चा में है, जोर-शोर से देश भर के कथित जनवादी नक्सली समर्थक नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में इस आंदोलन को मानव अधिकार से जोड़ कर जोर-शोर से हल्ला बोल दिए हैं। देश भर के तमाम आंदोलनकारियों का जमावड़ा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जुट रहा है और एक ऐसे अभियान पर निशाना साधा जा रहा है जो हिंसा के खिलाफ़ स्वस्फूर्त खड़ा हुआ है। यहाँ यह याद दिलाना लाजिमी होगा कि देश-दुनिया से दूर बस्तर के आदिवासियों ने सन 1948 में हैदराबाद निजाम द्वारा बस्तर को अपने राज्य में मिलाने के लिए की गई सैनिक कार्यवाही का डर कर मुकाबला किया था और अपनी स्वतंत्रता बरकरार रखी थी। ये इतिहास ये बताता है कि वनवासियों में ये कूवत है कि वे अगर ठान लें तो हजारों बलिदान के बाद भी हिम्मत नहीं हारते। इसकी याद इसलिए आई कि नक्सलवादी सलवा जुडूम अभियान से बौखला कर बस्तर अंचल में हिंसा का ताण्डव मचा रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री के बयान के अनुसार देश भर में हुई नक्सली हिंसा में छत्तीसगढ़ अव्वल है और यहाँ कल हुई हत्यों के साठ प्रतिशत हिस्सा इस राज्य का है। राज्य सरकार के मुताबिक भी सलवा जुडूम के बाद बस्तर में जून 2005 से जून 2006 के बीच 272 नागरिकों की हत्याएं हुई, वहीं 28 नक्सली लोग मारे गए । यानी अब तक अनुमानतः दो साल में 600 से भी ज्यादा मौत घाट उतार दिए गए हैं।

    सलवा जुडूम के घोर विरोधी मुख्यमंत्री अजीत जोगी की मानें तो बस्तर में सलवा जुडूम के चलते बीते साल 272 नहीं बल्कि एक हजार से भी ज्यादा हत्याएं हुई हैं और हजारों लोग बस्तर छोड़ आंध्र प्रदेश पलायन कर चुके हैं। कांग्रेस नेता श्री जोगी के अलावा कम्युनिस्ट पार्टियां और कथित जनवादी संगठन सलवा जुडूम के खिलाफ हैं। विरोध है कि इस अभियान के चलते नक्सली लगातार हत्या कर रहे हैं। बड़े दुख की बात है कि कथित जनवादी नक्सली हिंसा का विरोध करना छोड़ कर प्रतिकार में चल रहे अहिंसक अभियान के खिलाफ़ हैं। इससे उनका मुखौटा जगजाहिर हो जाता है कि वे सशस्त्र जन आंदोलन नक्सवाद का समर्थन करते हैं और गांधीवादी तरीके से नक्सलपंथ के खिलाफ संघर्ष कर रहे आदिवासियों का विरोध भी ।

    सलवा जुडूम अभियान से बौखलाए नक्सलियों द्वारा अधाधुंध गाँवों में हमले के बाद आदिवासियों को अपनी जमीन छोड़ कर जंगल के बाहर निकलना पड़ा है। सड़क के किनारे बसे गाँवों में करीब साठ हजार से भी ज्यादा लोग तंबू तान कर रहे रहे हैं। वजह ये है कि रात में नक्सली लूटपाट कर उनकी झोंपड़ियों जला देते हैं और पशु उठा कर ले जाते हैं। ऐसी ही एक गाँव भैरमगढ़ से करीब दस किलोमीटर दूर चिहका गाँव का दौरा करने पर लेखक चरमपंथियों के आतंक से रुबरू हुआ। सलवा जुडूम के बाद राहत शिविरों में सरकारी सहायता में बेहद कमी है लेकिन क्या करें, कहाँ जाएं और अब तो राहत शिविर जहाँ सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है वहाँ भी नक्सली दुःसाहस कर हमला कर रहे हैं। 16-17 जुलाई 2006 की दरम्यानी रात एर्राबोर राहत शिविर पर प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी को दण्डकारण्य जोनल कमेटी ने घेर कर आग लगाने के बाद जबर्दस्त गोलीबारी की जिसमें दो बच्चों सहित 33 महिला-पुरुष हलाक हो गए । इस हमले के बाद बड़े शान से मीडिया के सामने जोनल कमेटी के सचिव कोसा और प्रवक्ता गुड़सा उसेंडी ने इसकी जवाबदारी लेते हुए सलवा जुडूम को बंद करने का फरमान जारी किया । लेकिन सलवा जुडूम अभियान कोई भारतीय जनता पार्टी या विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस विधायक महेंद्र कर्मा का छोड़ा हुआ अभियान नहीं है जो बंद हो जाएगा।

    गृहमंत्री रामविचार नेताम के अनुसार राहत शिविरों में पहले एक साल 30 जून 2006 तक मात्र पाँच करोड़ आठ लाख 84 हजार 227 रुपए का सालाना बजट में ये राशन ऊंट के मुँह में जीरे के समान ही है। नगम्य राशन के खर्च से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार कहीं ना कहीं दबाव में है और राहत शिविरों में रहने वाले भोले-भाले लोगों के भोलेपन का नाजायज़ फायदा उठा रही है। वहीं आंध्रप्रदेश में नक्सली नेता माधव और महाराष्ट्र में गढ़चिरौली के जोनल कमांडर विकास की बैमौत मारे जाने की घटना के बाद छत्तीसगढ़ में अपना अस्तित्व बचाने में जुटे नक्सलियों पर गृहमंत्री देशद्रोही की उपमा दे कर शब्दबाण चला रहे हैं, जबकि जरूरत ग्राउंड हंट की है । यह सरकार की जवाबदेही है कि वह जैसे को तैसा का जवाब दे। अभी तो बिना राजनैतिक महत्वकांक्षा के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह केवल बयानों से ही सलवा जुडूम की वाहवाही लूट रहे हैं। असल नायक तो संघर्ष कर रहे हैं लेकिन ये लड़ाई परिणाम तक जरूर पहुँचेगी और इसे पहुँचाना भी चाहिए क्योंकि यही इंसाफ का तकाज़ा है।

    (तपेश जैन स्वतंत्र पत्रकार हैं और टेलिफिल्म निर्माण से संबंद्ध हैं)

  4. By Reyaz-ul-haque on July 7, 2007 at 1:24 AM

    शुक्रिया तपेश जी
    हम चाहते हैं कि इस आंदोलन से जुडे़ हर पहलू पर बातें सामने आयें, बहसें हों. उम्मीद है आगे भी आप ब्लाग पर आयेंगे और टिप्पणियां करेंगे.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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