हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

...तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/30/2007 12:07:00 AM

यह जश्न, यह गीत किसी को बहुत हैं...
जो कल तक हमारे लहू की खामोश नदी में
तैरने का अभ्यास करते थे.




बेदखली के लिए विनयपत्र
9 सितंबर, 1950 को पंजाब के तलवंडी में जन्मे
पाश ने देश को कई अविस्मरणीय कविताएं दीं. पाश ने समय पर जो लकीरें खींचीं वे आज भी हैं और हमारे समय के जख्मों को याद दिलाती हैं. आज जब भारत अपने ही नागरिकों के प्रति निरंतर असहिष्णु होता जा रहा है, अरुंधति राय के शब्दों में कहें तो-अपने ही लोगों को गुलाम बना चुका है, पाश की यह कविता हमें खरोंचती है. इसी के साथ यह देश की मनगढ़ंत परिभाषा देनेवालों और राष्ट्रीयता के अपने मापदंड तय करने वालों के खिलाफ़ है. हम इसे यहां इस देश और समाज को और अधिक असहिष्णु होने से बचाने की आर्त पुकार के बतौर प्रस्तुत कर रहे हैं.

भूल सुधार : मैंने खुद को इस वीभत्स कत्ल की साजिश में पाया की जगह पढें
मैंने खुद को इस कत्ल की साजिश में पाया

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  1. 9 टिप्पणियां: Responses to “ ...तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें ”

  2. By Divine India on May 30, 2007 at 1:05 AM

    Haque sahab,
    दूसरी बार रक्त को बहने से कोई फायदा नहीं है…
    जो बित चुका है वह पुन: हमारे सामने खड़ा होने की कोशिश कर रहा है और हम दरवाजा बंद करने की बजाए पूरी खोल रहे हैं…

  3. By Reyaz-ul-haque on May 30, 2007 at 1:21 AM

    दिव्याभ भाई
    काश ये चीज़ें हमारे देश के लिए अतीत का हिस्सा हो जातीं. मगर लगता नहीं है कि हमने कुछ सीखा है. आज ही राजस्थान में लोग मारे गये हैं पुलिस की गोलियों से. यह तो 'बीत' नहीं गया है?
    और दरवाज़ा बंद कर देने के बावजूद खतरा हमारे लिए बरकरार रहेगा, क्योंकि यह अंदर मौजूद है.
    रक्त जिस क्षण बहता है वह सबसे काला क्षण होता है. यह हमें, और नयी दुनिया का सपना देखनेवाले मुझ जैसे हरेक आदमी की यही चिंता है कि रक्त न बहे.
    आप हमारी इस चिंता में शामिल हैं, जान कर अच्छा लगा.

  4. By L3 on June 2, 2007 at 1:27 PM

    आपकी साइट पैर मैं पेहली बार आयन हूँ और अचंभीत हूँ की आज भी कोई इतना सोचता है | इस तेज़ रफ़्तार की ज़िंदगी मैं लोगों के पास इतना समय है की जीवन व्यतीत करने के आगे भी सोचने की क्षमता है | मैने इस साइट को बूक्मार्क कर लिया है और फिर आउन्गा |

    अब अपनी साइट मैं हिंदी मैं खोज करें: http://quillpad.in/new/quill.html से!

  5. By Reyaz-ul-haque on June 2, 2007 at 4:10 PM

    सोचना तो पडे़गा ही. नहीं सोचेंगे तो फिर हम बतदर होते जा रहे हालात पर सिर्फ़ आंसू बहायेंगे. सोचेंगे तो उसे बदलने के बारे में सोचेंगे. आप आये, अच्छा लगा. आपकी लिंक भी बहुत उपयोगी है. सादर

  6. By irfan on June 2, 2007 at 5:05 PM

    रेयाज़ भाई,
    पाश की कविता आपने बडे ही अच्छे ढंग से पब्लिश की है.मैने कई मित्रों को भी यहां भेजा सबको पसंद आया ये ढंग.हां सबकी एक कॉमन राय थी कि आपका ब्लॉग देर से खुलता है.

  7. By Reyaz-ul-haque on June 3, 2007 at 2:00 PM

    शुक्रिया इरफ़ान भाई
    हम आगे भी कुछ दूसरे कवियों के साथ इसी तरीके से हाज़िर होंगे. मैंने कोषिश की है कि पेज को हल्का बनाया जाये. इसके लिए फ़िल्मों के लिंक हटा दिये हैं. अब भी अगर परेशानी हो रही हो तो बतायेंगे.

  8. By बजार वाला on June 7, 2007 at 10:36 PM

    मैं मुरीद हूँ पाश का , और आपकी कला का भी मुरीद बनना ही पड़ेगा . शानदार ढंग से पाश को प्रस्तुत करने के लिए बधाई और धन्यवाद भी.
    और हाँ , मेरा नाम भी उस लिस्ट से काट दिया जाय

  9. By बजार वाला on June 7, 2007 at 10:45 PM

    और ये डिवाईन इंडिया के लिए ,
    भाई साहब आप जो डूसरी बार ख़ून ना बहाने की बात कर रहे हैं , चलिए मान ली आपकी बात कि हम ख़ून नही बहाएँगे . लेकिन अगर हमारे शांत रहने पर भी हमारे पडोसियों का ख़ून बहाया जाय तो हम क्या करें ? आप महान हैं कि आप शांत बैठ सकते हैं लेकिन मैं महान नही , और मैं ये समझता हूँ कि जो भी ख़ुद के लिए ईमानदार होगा , वो महान बनना पसंद कतई नही करेगा . और ये दरवाज़ा किसके लिए खोला जा रहा है , मेरा ख़्याल है कि आप इससे बख़ूबी वाकिफ़ होंगे . बहारवालों मे अमेरिका और घर मे मोदी और वसुंधरा राजे . वाह ...क्या ख़ूब दरवाज़े खोले हैं आपने .

  10. By Reyaz-ul-haque on June 8, 2007 at 11:40 PM

    राहुल भाई
    हम कोशिश कर रहे हैं कि कुछ और कवियों की कविताओं को इसी तरह पेश करें. आपको अच्छा लगा, जान कर खुशी हुई.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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