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मायावती : स्वागत, पर कुछ सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/28/2007 11:51:00 PM

मायावती के चुन कर आने को कुछ लोगों ने बडी़ सामाजिक क्रांति भी माना है. हमारा यह मानना रहा है कि मायावती का जीतना भले अपने समय की एक अहम घटना हो, यह भारतीय समाज के जड़ता को तोड़ने का माध्यम नहीं बन सकता. इसके लिए सामाजिक और आर्थिक संबंधों में जो ज़रूरी आधार और बदलाव चाहिए, वे केवल चुनाव जीतने से किसी समुदाय के हाथों में आये नेतृत्व भर से संभव नहीं है. यह मायावती के बस में नहीं है. इसी के साथ मायावती के सत्ता में आने के बाद जो सवाल उभरे हैं उन पर सत्येंद्र रंजन की एक नज़र. आलेख प्रभात खबर में प्रकाशित.
सत्येंद्र रंजन

उत्तर प्रदेश में मायावती की जीत कई मायने में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अहम घटना है. मगर इससे ही जुड़ा हुआ और उतना ही अहम सवाल यह है कि क्या इतिहास ने मायावती को जो अवसर दिया है, क्या वे सचमुच खुद को उसके काबिल साबित कर पायेंगी? अगर मायावती ने दूरदृष्टि एवं न्यूनतम वैचारिक प्रतिबद्धता का परिचय दिया और उन ऊंचे आदर्शों को ध्यान में रखा जो बाबा साहेब आंबेडकर एवं बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के संघर्षों से पैदा हुए, तो उनकी मौजूदा उपलब्धि इतिहास में एक मील का पत्थर बन सकती है.
मायावती की उपलब्धि बेमिसाल है. यह पहला मौका है, जब दलित नेतृत्व में ऐसा सामाजिक-राजनीतिक गंठबंधन बना, जो अपने दम पर सत्ता में आने में कामयाब हुआ है. इस नेतृत्व और इस गंठबंधन में कई खामियां बतायी जा सकती हैं. मसलन कहा जा सकता है कि नेतृत्व निजी महत्त्वाकांक्षाओं व सत्ता लिप्सा से प्रेरित है और जो सामाजिक गंठबंधन बना, वह अवसरवादी है. इसके बावजूद इस घटना के राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्त्व की अनदेखी नहीं की जा सकती. बसपा ने दलितों की एकजुटता कड़ी मेहनत से हासिल की. चूंकि यह एकजुटता चुनावी सफलता के लिए काफी नहीं थी, इसलिए इसे एक नये सामाजिक समीकरण का हिस्सा बनाने के अलावा बसपा नेतृत्व के पास कोई और विकल्प नहीं था. हाल के चुनाव की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि ऐसा समीकरण बनाने में मायावती कामयाब रहीं. सबसे अहम बात यही है कि उन्होंने जो सामाजिक गंठबंधन बनाया, उसका नेतृत्व बिना किसी संदेह के उनके हाथ में रहा. सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई से जु़डे संगठनों में यह लंबे समय से बहस का मुद्दा रहा है कि जिसकी लड़ाई, उसका नेतृत्व कैसे स्थापित किया जाये. इन तबकों की वकालत करनेवाली कम्युनिस्ट पार्टियों, अब इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन चुके सोशलिस्ट आंदोलन और यहां तक कि नक्सली संगठनों में भी नेतृत्व मध्यवर्गीय और अधिकांश मौकों पर सवर्ण वर्ग का रहा है. यह बात कहने का मतलब इन पार्टियों या संगठनों के नेतृत्व की वैचारिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाना कतई नहीं है, लेकिन ये सवाल खुद इनके भीतर उठते रहे हैं कि आखिर कैसे सबसे उत्पीड़ित समूहों के भीतर से नेतृत्व पैदा किया जाये? यह सवाल इसलिए अहम है कि सामाजिक और आर्थिक समता की लड़ाई तब तक पूरी नहीं होगी, जब तक सबसे वंचित तबकों से उभरनेवाला नेतृत्व सबसे अगली कतार में नहीं आयेगा. इसी लिहाज से बसपा की उपलब्धियां बेमिसाल हैं. यह पार्टी एक दलित नेता ने खड़ी की और उन्होंने दलितों के भीतर अपने उत्तराधिकारी का चुनाव किया. उस उत्तराधिकारी ने राजसत्ता पर लोकतांत्रिक ढंग से कब्जे कर उनका सपना पूरा करने के लिए कारगर रणनीति बनायी और आज वे बिना किसी मेहरबानी के देश के सबसे बड़ी राज्य की मुख्यमंत्री हैं. एक अखबार में छपी एक खबर बताती है कि दलितों के लिए इस सफलता का क्या अर्थ है- जब उप्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने लगे और मायावती आगे निकलने लगीं तो उनके एक समर्थक ने शराब पीनी शुरू कर दी. बसपा के आगे बढ़ते हर कदम के साथ वह मायावती जिंदाबाद के नारे लगाता रहा और शराब पीता रहा. इसके पहले कि मायावती को पूरा बहुमत मिलने की खबर आती, हर्षोन्माद ने उस व्यक्ति की जान ले ली. क्या ऐसी खुशी आज किसी और पार्टी की जीत पर उसके किसी समर्थक को हो सकती है? ऐसा इसलिए नहीं हो सकता, क्योंकि मायावती की जीत के साथ करोड़ों दलितों का कोई आर्थिक या कारोबारी स्वार्थ नहीं जुड़ा हुआ है, बल्कि सदियों के शोषण से उनकी मुक्ति की उम्मीद जुड़ी हुई है. इसीलिए मायावती से उनकी ईमानदार भावनाएं जुड़ी हुई हैं. उनके लिए मायावती ऐसी प्रतीक हैं, जिसकी अहमियत समझना शायद किसी गैरदलित के लिए मुमकिन न हो. मायावती की देश की राजनीति में जो हैसियत बनी है, उसके साथ अब उन पर कुछ उतनी ही बड़ी जिम्मेदारियां भी आ गयी हैं. मायावती के सामने यक्ष प्रश्न यह है कि क्या वे अब भी अगर अपना फायदा हो तो किसी भी पार्टी के साथ जाने की रणनीति पर चलती रहेंगी? यूपी में उन्होंने इसके पहले जब तीन बार सरकार बनायी तो उन्होंने इसके लिए भाजपा से हाथ मिलाया. 2002 में भाजपा का समर्थन बरकरार रखने की कोशिश में वे गुजरात में नरेंद्र मोदी तक का प्रचार करने चली गयीं. इस तरह उन्होंने अपना और अपनी पार्टी का नाम उस पार्टी से जोड़ा, जो भारतीय राजनीति में सामाजिक रूढ़िवाद और दक्षिणपंथ की नुमाइंदगी करती है और अपने मूल चरित्र में समता एवं जनतंत्र के खिलाफ है. अगर बसपा कहती है कि उसने सिर्फ अल्पकालिक रणनीति के तहत भाजपा से हाथ मिलाया तो असल में उनका समर्थन करने के पीछे भाजपा का भी यही मकसद था. भाजपा और पूरे संघ परिवार की विचारधारा असल में मानवीय स्वतंत्रता को सीमित और नियंत्रित करने का उपक्रम है, और उसका मकसद समाज में जारी शोषण और गैर बराबरी को कायम रखना है. सवाल यह है कि इसका दलित आंदोलन के उद्देश्यों से क्या मेल हो सकता है? भारत में इस समय जब जनतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई आगे बढ़ रही है, उसी समय धार्मिक कट्टरपंथी ताकतों की तरफ से देश की संवैधानिक व्यवस्था के लिए जोरदार चुनौतियां पैदा की जा रही हैं. हिंदू सांप्रदायिक-फासीवाद, इस्लामी आतंकवाद और सिख कट्टरपंथ के उग्र चेहरे हमारे सामने हैं. ऐसे में देश की सभी प्रगतिशील शक्तियों के सामने चुनौती है कि वे धर्मनिरपेक्षता को आस्था व न्यूनतम राष्ट्रीय सहमति का सवाल बनाये रखें. उत्तर प्रदेश में बसपा ने सवर्ण जातियों, खासकर ब्राह्मणों को अपनी राजनीतिक योजना का हिस्सा बनाकर नये सोच का परिचय दिया. उसने यह भी दिखाया है कि जब वह कोई नया सोच लेकर आती हैं तो उस पर अमल भी करती हैं, और उसकी बातों पर लोग भरोसा करते हैं. इसीलिए बसपा की जीत ने देश के प्रगतिशील खेमे में नयी उम्मीदें पैदा की हैं. बसपा की जीत का एक परिणाम यह भी हुआ कि भाजपा यूपी की राजनीति में लगभग अप्रासंगिक हो गयी. वह महज 120 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. यानी 280 से भी ज्यादा सीटों पर वह मुकाबले में भी नहीं रही. इससे दिल्ली की गद्दी पर उसका दावा कमजोर जरूर हुआ है. लेकिन उसकी वापसी आज भी मुमकिन है. इसलिए देश की प्रगतिशील शक्तियां बसपा से यह उम्मीद जरूर करेंगी कि जैसे उसने उत्तर प्रदेश में सामाजिक गठबंधन बनाया, वैसे ही वह राष्ट्रीय राजनीति में राजनीतिक गठबंधन बनाने की राजनीतिक बुद्धि और उदारता दिखाये. जाहिर है, वैचारिक आधार पर यह गठबंधन धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के साथ ही बन सकता है. यहां यह बात जरूर है कि ऐसे गठबंधन की सारी जिम्मेदारी मायावती पर नहीं है. इसके लिए कांग्रेस, यूपीए के बाकी दलों और वामपंथी पार्टियों को भी वैसी समझ और उदारता दिखानी होगी. अगर ये सभी दल भारत की इस ऐतिहासिक जरूरत को समझ सके, तो निश्चित रूप से देश को फिलहाल एक बड़े खतरे से बचाया जा सकता है. मायावती के सामने दूसरा बड़ा सवाल आर्थिक नीतियों का है. कांशीराम के जमाने में बसपा चुनाव घोषणापत्र जारी नहीं करती थी. कांशीराम का मानना था कि राजसत्ता पर कब्जे के बाद उनकी पार्टी बहुजन के हित में नीतियां बना लेगी. अब यह मकसद पूरा हो गया है. मायावती ने बहुजन से सर्वजन की यात्रा पूरी कर ली है और इस सफर से वे लखनऊ की गद्दी पर हैं. क्या अब भी उन्हें दलित आंदोलन के आर्थिक एजेंडे की जरूरत महसूस नहीं होती? बहरहाल, यह बात पूरे यकीन के साथ कही जा सकती है कि अब ऐसे एजेंडे की अनदेखी वो सिर्फ अपने नुकसान की कीमत पर ही कर सकती हैं. मायावती की जीत स्वागतयोग्य है. सिर्फ यह जीत ही उप्र के विकास की दिशा में एक बड़ा मुकाम है. लेकिन यह मायावती के लिए अंतिम मुकाम नहीं होना चाहिए. दोहराव के जोखिम के बावजूद यह कहने की जरूरत है कि उनके सामने अब चुनौती संवैधानिक जनतंत्र की रक्षा के लिए धर्मनिरपेक्ष ताकतों को मजबूत करने और दलित आंदोलन का आर्थिक एजेंडा पेश करने की है. अगर वे ऐसा नहीं कर सकीं तो वे एक बड़ा ऐतिहासिक मौका खो देंगी. यह उनके और भारतीय लोकतंत्र दोनों के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ मायावती : स्वागत, पर कुछ सवाल ”

  2. By चन्द्रिका on May 29, 2007 at 10:06 AM

    माया जी एक व्यवस्था के अंदर आयी है , उसकी अपनी एक सीमा है,वो कोई क्रांति नहीं करने जा रही है कि सब कुछ बदल जायेगा हां जनता को कोई विकल्प नहीं मिल रहा था किसि को चुनना था माया ने अच्छा बैलेंस बना लिया, इससे ज्यादा और कुछ नहीं असल में इससे दलितों का भी भला नहीं होने जा रहा है......dakhalkiduniya.blogspot.com

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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