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बीच सफ़हे की लड़ाई

सरस्वती, दुर्गा और द्रौपदी को नंगा कौन कर रहा है?

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/27/2007 11:47:00 PM

रविभूषण
अस्सी वर्षीय आलोचक नामवर सिंह, नब्बे वर्षीय विश्वप्रसिद्ध कलाकार मकबूल फिदा हुसैन और सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ोदरा के ललितकला संकाय के तेईस वर्षीय स्नातकोत्तर छात्र चंद्रमोहन श्री लक्ष्मनतुला भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत अभियुक्त हैं. भारत धर्म प्रधान देश है, पर यहां धार्मिक कट्टरता का इतिहास नया है. भूमंडलीकरण के दौर में यह धार्मिक कट्टरता बढ़ी है. हम मानवीय भावनाओं के आहत होने की चर्चा और चिंता नहीं करते; धार्मिक भावनाओं के आहत होने की बातें करते हैं. जबसे भाजपा चमकी है, धार्मिक भावनाओं के आहत होने के उदाहरण बढ़े हैं. भारत में इसलामी कट्टरता और हिंदू कट्टरता बढ़ती गयी है और सदाशयता-सहिष्णुता नष्ट हो रही है. भारतीय दंड संहिता की विविध धाराओं में वर्णित अपराधों की संख्या कम नहीं है. तो क्या नामवर, हुसैन और चंद्रमोहन सचमुच अपराधी अभियुक्त हैं?
नामवर आलोचक हैं और उन्हें पंत-साहित्य के एक बड़े भाग को कूड़ा कहने का अधिकार है. पिछले 20-30 वर्ष में देश में कूड़ा अधिक इकट्ठा हो गया है. साहित्य की भाषा में सिर्फ अभिधा प्रयोग नहीं होता. वहां लक्षणा और व्यंजना के लिए अधिक जगह है. कूड़ा का एक अर्थ फालतू है और पंत काव्य के मर्मज्ञ जानते हैं कि पंत का परवर्ती काव्य उल्लेखनीय नहीं रहा. आज बहुत कम ऐसे राजनीतिज्ञ हैं, जिन्हें कला, साहित्य व संस्कृति की गहरी समझ हो और वे उनमें वर्णित-चित्रित रंग-रेखा, ध्वनि, शब्द, वाक्य तथा उनके विविध आशय-अर्थ से अवगत हों. राजनीति जिस मुकाम पर पहुंच गयी है, वहां केवल छीना-झपटी, कुटिलता, धोखाधड़ी और फरेब है. कला-साहित्य-संस्कृति का दृश्य इससे भिन्न है. कवि-लेखक, संस्कृतिकर्मी और कलाकार जीवन की रक्षा ही नहीं कर रहे, उसे गति भी दे रहे हैं.
मकबूल फिदा हुसैन ने 1996 में सरस्वती, दुर्गा और द्रौपदी के नग्न चित्र बनाये थे. हिंदुत्व परिवार के सदस्यों ने इन चित्रों का विरोध किया. हुसैन के एक चित्र में सीता हनुमान की पूंछ पर बैठ रही थीं. 1998 में मुंबई के उनके घर में तोड़-फोड़ की गयी. इंदौर और राजकोट में उन पर आपराधिक मुकदमे दायर हुए. हरिद्वार की एक अदालत ने मुंबई में हुसैन की संपत्ति जब्त करने का आदेश भी दिया. हुसैन के चित्रों के गंभीर आशयों को समझना चाहिए. रंगों, रेखाओं, ध्वनियों और शब्दों से सबका संबंध और सरोकार नहीं है. यह जानने का प्रयत्न होना चाहिए कि एक बड़ा कलाकार एक विशेष समय में देवी-देवताओं के नग्न चित्र क्यों बना रहा है? क्या उसी ने नग्न चित्रों की रचना की है या नग्न चित्रों का अपना एक इतिहास भी है? हिंदू देवी-देवताओं की नग्न मूर्तियां भी हैं. क्या खजुराहो, कोणार्क जैसे मंदिरों की मूर्तियां तोड़ी जायेंगी? ऐसे पौराणिक साहित्य, जिसमें ऐसे वर्णन हैं, जला दिये जायेंगे? शिवलिंग को पूजनेवाली स्त्रियों के साथ हमारा व्यवहार कैसा होगा? हुसैन के चित्रों के गहरे अभिप्राय हैं. क्या हमारे समय में सरस्वती, दुर्गा और द्रौपदी को नंगा करनेवाले नहीं हैं? क्या हम उनकी पहचान नहीं करेंगे? जिनके पास राजनीतिक सत्ता है और जो इस सत्ता के करीबी हैं, वे सब देवी-देवता के कार्यों से अलग उन्हें विकृत और नग्न करने में लगे हुए हैं. वे हमारे देश में हैं और हुसैन अपने देश से बाहर हैं - निर्वासित.
भाजपा सांसद मेनका गांधी ने विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी को 12 मई 2007 को लिखे पत्र में आग्रह किया है कि वे भाजपा की गुजरात और महाराष्ट्र शाखाओं को उन कलाकारों के विरुद्ध अभियान बंद करने के लिए कहें, जिनकी कृतियां उन्हें पसंद नहीं हैं. कलाकार, कवि व लेखक सत्य के पक्षधर हैं और झूठ को सच बनाने की कला में दक्ष लोग सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते. लोकतंत्र में जिनकी आस्था नहीं है, वे अभिव्यक्ति के विविध माध्यमों को अपने मनोनुकूल बनाना चाहेंगे. भारत में फासीवादी शक्तियां कई हैं और इनके कार्य ध्वंसात्मक हैं. तेलुगुभाषी चंद्रमोहन सयाजीराव विश्वविद्यालय बड़ोदरा के विश्व प्रसिद्ध ललितकला संकाय के अंतिम वर्ष के छात्र हैं. मितभाषी, अपने कार्य के प्रति समर्पित, सहपाठियों के लिए प्रेरक और अनुशासित चंद्रमोहन गुजरात ललितकला अकादमी द्वारा पुरस्कृत हैं. चंद्रमोहन द्वारा बनाये गये चित्र उनकी परीक्षा के लिए थे. इन चित्रों पर उन्हें अंक प्राप्त होने थे. यह चित्र प्रदर्शनी परीक्षा से संबद्ध थी, खुली प्रदर्शनी नहीं थी. जिस चित्र प्रदर्शनी को कायदे से विश्वविद्यालय के अधिकारी भी नहीं देख सकते थे, उसे भाजपा के नीरज जैन के नेतृत्व में आये लोगों ने क्षतिग्रस्त किया. विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश कर चंद्रमोहन के साथ मारपीट करना अपराध था, पर गुजरात में अपराध का अर्थ दूसरा है. भाजपा तथा उसके अनुषंगी संगठनों से जुड़े सभी लोग वहां नैतिक हैं. पुलिस उनकी है. चंद्रमोहन को पुलिस ने भादंसं की धारा 153-ए के तहत गिरफ्तार किया. पांच दिन जेल में रहने के बाद उन्हें जमानत मिली. पुलिस ने उपद्रवियों को नहीं, चंद्रमोहन को गिरफ्तार किया. कुलपति के कहने पर भी संकाय के अध्यक्ष (डीन) प्रोफेसर शिवजी पणिक्कर ने न तो प्रदर्शनी बंद की और न माफी मांगी. विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने यह प्रदर्शनी बंद करा दी. आरोप यह था कि इस प्रदर्शनी से हिंदुओं और ईसाइयों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं. भारतीय दंड संहिता में 153-ए और 295-ए ऐसी धाराएं हैं, जो धार्मिक भावनाओं के अपमान से जुड़ी हुई हैं. नामवर सिंह पर बनारस में राजनीति विज्ञान के अध्यापक कौशल किशोर मिश्र ने एक अदालत में नालिश की है. भारतीय दंड संहिता में उपर्युक्त धाराओं के अतिरिक्त कलाकारों, कवियों, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों को परेशान करनेवाली अन्य कई धाराएं हैं.
इस मुद्दे पर भाजपा, उसके कार्यकर्ता और उसके सहयोगी, जो प्रोफेसर और कुलपति हैं, एकजुट हैं. यह एक चिंताजनक स्थिति है, जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए. सयाजीराव विवि के कुलपति ने विश्वविद्यालय की गरिमा घटायी है. संकाय के डीन पणिक्कर ने जहां प्रजातांत्रिक उसूलों और नियमों पर ध्यान दिया, वहां विश्वविद्यालय के अधिकारी उससे उदासीन ही नहीं, उसके विरुद्ध रहे. छात्रों ने जो विरोध-प्रदर्शनी लगायी, विश्वविद्यालय ने उसे बंद करा दिया. पणिक्कर ने अपने छात्रों के साथ परीक्षा संबंधी प्रदर्शनी का विरोध किया और विवि के अधिकारियों की आलोचना की. कुलपति ने उपद्रवियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. क्या कुलपति किसी राजनीतिक दल के एजेंट की तरह काम कर सकता है? सजा परीक्षार्थी की उत्तरपुस्तिका फाड़नेवालों को मिलनी चाहिए या परीक्षार्थी को? कुलपति ने एक कदम आगे बढ़ कर डीन को निलंबित कर दिया. रोमिला थापर और दीपक नैयर ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में कुलपति के कार्य को विश्वविद्यालय के अनुपयुक्त बताया है.
दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) में सयाजीराव विवि ने यूजीसी से 676.84 लाख रुपये प्राप्त किये हैं. यूजीसी विश्वविद्यालयों को राशि उनके अकादमिक विकास के लिए देती है. विश्वविद्यालय जैसे संस्थान राजनीतिक दलों और उनकी सरकारों के हित साधन के लिए नहीं हैं. परीक्षा को बाधित करना अपराध है और ऐसे अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए. सयाजीराव विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों ने यूजीसी को लिखा और अब मानव संसाधन मंत्रालय को यूजीसी की रिपोर्ट देखनी है.
भारतीय संस्कृति के स्वनियुक्त रक्षकों की संख्या बढ़ रही है. रचना-सृजन, सच बोलने और लिखने पर पाबंदियां लगायी जा रही हैं. कलाकार, लेखक, चित्रकार, फिल्मकार निशाने पर हैं. अगर अकादमिक संस्थाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला होता है, तो इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
नामवर, हुसैन और चंद्रमोहन- तीनों को अदालत के समक्ष उपस्थित होना है. जिन लोगों ने हुसैन की आंखें फोड़ने, हाथ काटने और सर कलम करने की धमकियां दीं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी. आज नामवर, हुसैन और चंद्रमोहन अभियुक्त हैं. कल दूसरे होंगे. यह सिलसिला थमनेवाला नहीं है. कला धर्म को क्षतिग्रस्त नहीं करती. धार्मिक मानक काल सापेक्ष हैं, जबकि कलाएं कालविहीन हैं. यह सार्थक और रचनात्मक अभिव्यक्तियों के विविध माध्यमों के लोगों के एकजुट होने का समय है.

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ सरस्वती, दुर्गा और द्रौपदी को नंगा कौन कर रहा है? ”

  2. By अनामदास on May 28, 2007 at 3:14 AM

    रियाज़ साहब
    अच्छा लेख पढ़वाने के लिए धन्यवाद. भारत में बढ़ती असहिष्णुता पर एक सार्थक और संतुलित टिप्पणी.

  3. By imran on May 28, 2007 at 7:33 AM

    प्रणाम भाई,
    मै science का छात्र हु लेकिन कला और साहित्य मे भी रुची है.आपके पिछले कुछ लेखो ने मेरा काफी मार्गदर्शन किया है और मै इस पर काफी सोच रहा हु कुछ लिखने के क्रम मे कि पता नही कोइ आहत तो नही हो रहा है न.
    लेकिन मेरा यह कम्बख्त दिमाग ही आहत हो गया है उन आहत होने वाले खास वुद्धिजिवियो से. कैसे समझाउ कि उनका काम ही केवल आहत होना है हमारे लिए. उनके लिये कुछ खास रचनाए जो ............. समर्थित है दिल कि आवाज लगती है चाहे सच कुछ और हि हो.
    खुदा हाफ़िज भाई.

  4. By sushil k on April 25, 2009 at 12:20 PM

    samaj ko aaina dikhane ki ek imandaar koshish....ek sarthak bahas... manviya bhawnaye nahi balki dharmik bhawnaye hamari prathmikta hai...yeh durbhgya hai is desh ka...


    Aakaash

  5. By RAJ SINH on May 18, 2009 at 4:16 AM

    जनाब आप्ने यदि मोहम्मद पर बनाये कर्तून पर कुछ लिखा है . एक पत्रकर आलोक तोमर को सताये जाने पर कुछः लिखा पढा सुना है ? या सिर्फ़ हिन्दु प्रतिक्रिया पर ही छाती पीटते हैं .

    मैं हर तरह की आज़ादी को सही मानता हूं .और उस्की वकालत करता हूं . आप भी ? तो दोगलापन छोडिये और पूरे मुद्दों को लिजिये. दरसल आप जैसे लोग सिर्फ़ सिमीत ’ छद्म’ उद्देशों से जो करते हो वही दोगलापन आप्के मुखौतों को तो उघडता ही है , हिन्दु प्रतिक्रिया को भी जोर और एक विधता भी देता है .

    अब आप जैसे लोग नन्गे हो गये हो .

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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