हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

गुजरात बनता सारा देश

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/26/2007 12:53:00 AM

यह पोस्ट किसी ब्लागर की खुराफ़ात के कारण कल नारद पर दिख नहीं पायी. इसलिए इसे फिर से पोस्ट किया जा रहा है.

अपने समय के कई सवाल हमारे समय जवाब के इंतज़ार में हैं. क्या हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बंधक समय में यों ही रहते रहेंगे? क्या इस समय से निकलने का रास्ता नहीं? क्या सारा देश इसी तरह गुजरात में बदलता रहेगा और हम अपने दड़बों में सिकुडे़ सहमे बैठे रहेंगे? क्या इस गुजरात का मुकाबला करने का समय अब नहीं आ गया है? क्या इस देश की बहुप्रचारित आज़ादी का यही मतलब रह गया है कि भगवाधारी अपना मध्ययुगीन कचडा़ हम पर उंडे़लते रहें, पूरे देश को एक भयावह मोदीयुग में धकेलते रहें और देश का पूरा ढांचा उसके आगे दंडवत हो जाये? जैसा अपूर्वानंद जी ने सवाल उठाया है क्या आज गा़लिब होते, कबीर होते, मीरां होतीं तो हम उन्हें यों ही अदालतों में घसीटते और अदालतें यह तय करतीं कि गालिब कौन-सा दोहा लिखें और कौन जला दें, मीरां क्या गायें और क्या न गायें और गा़लिब की कौन-सी गज़ल आपत्तिजनक है? आप भले इससे इनकार करें, हम ठीक ऐसे ही दौर से गुज़र रहे हैं. और हमें अपने समय के इन सवालों से कतरा कर निकलने के बजाय उनसे जूझने की ज़रूरत है.

तर्क और तरकश

अपूर्वानंद

क्या अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब परीक्षा भवनों में, अखबारों में संपादकों के कक्ष में, फिल्मों में सेट पर, गानों के स्टूडियो में ऐसे लोग बैठे रहेंगे जो लिखे जानेवाले उत्तरों, संपादक के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट, फिल्मों के दृश्यांकन और गानों के बोल की निर्माण के स्तर पर ही चौकसी करेंगे और उनमें काट-छांट करेंगे? या क्या वह समय पहले ही नहीं आ पहुंचा है?

भारतीय न्याय व्यवथा की आरंभिक इकाइयों की निगाह में नामवर सिंह, एमएफ हुसेन और चंद्रमोहन एक मायने में समान हैं. अलग-अलग जगहों पर निचली अदालतों ने तीनों को ही अलग-अलग मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 295ए के तहत मुकदमों में हाजिर होने का हुक्म सुनाया है. इन धाराओं का संबंध में ऐसे अपराध से है, जो विभिन्न समुदायों के बीच धर्म, नस्ल, जन्मस्थल, निवास, जाति या समुदाय के आधार पर शत्रुता पैदा करने और सौहार्द बिगाड़ने की नीयत से और किसी समुदाय के धर्म या धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के लिए जान-बूझ कर द्वेषपूर्ण कृत्य के रूप में किया गया हो.
हुसेन पर कई शहरों की निचली अदालतों में इन धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज हुए और हर जगह से उन्हें अदालत में पेश होने का हुक्म सुनाया गया. ध्यान देने की बात यह है कि इन धाराओं में वर्णित अपराधों की सुनवाई प्रथम श्रेणी मजिस्टेट द्वारा की जानी होती है और ये गैर-जमानती हैं. पुलिस को मामले की तहकीकात करनी ही होगी. विधिवेत्ता राजीव धवन के अनुसार ऐसे मामले में पुलिस को गिरफ्तार करने का हक है, लेकिन जमानत देने का अधिकार नहीं है. हालांकि गिरफ्तारी की अवधि साठ दिनों की है, लेकिन धवन के मुताबिक उस व्यक्ति को दिमागी, शारीरिक और आत्मिक नुकसान हो ही चुका होता है. 2006 के पहले ऐसे मामलों में आगे बढ़ने के पहले राज्य की अनुमति जरूरी होती थी. पर 2006 में उच्च्तम न्यायालय ने पैस्टर राजू बनाम कर्नाटक राज्य के मुकदमे में कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस निर्णय को पलट दिया, जिसके हिसाब से तहकीकात के दौरान, पुलिस अभियुक्त को हिरासत में नहीं ले सकती. इसके चलते अब हुसेन हों या चंद्रमोहन या नामवर सिंह, गिरफ्तारी का खतरा तीनों पर है.
















जब-जब फ़ासीवाद समाज, कला और राजनीति को खरोंचने की कोशिश करता है, याद आती है पिकासो की गुएर्निका. यह आज भी गुजरातों और केसरिया फ़ासीवाद समेत सभी तरह के फ़ासीवाद के खिलाफ़ लडा़ई में हमारे लिए रोशनी की मीनार की तरह है.


हुसेन अब तक किसी मामले में गिरफ्तार नहीं हुए हैं, लेकिन पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा दिल्ली और मुंबई पुलिस को उनके खिलाफ मुनासिब कार्रवाई के आदेश देने के बाद यह खतरा उन पर बढ़ तो गया ही है. महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा के कला संकाय के अंतिम वर्ष के छात्र चंद्रमोहन को छह दिनों तक हिरासत में रहना पड़ा. नामवर सिंह को अभी बनारस के मजिस्ट्रेट ने अपने सामने हाजिर होने को कहा है.
नामवर सिंह ने पिछले दिनों बनारस में आयोजित किसी गोष्ठी में सुमित्रानंदन पंत की एक चौथाई रचनाओं को कूड़ा कहा, ऐसा बताते हैं. इससे पंत जी के समर्थकों या उपासकों की भावनाओं को चोट पहुंची. जख्म इतना गहरा था कि वे अदालत तक नामवर सिंह के खिलाफ गुहार लगाने पहुंच गये. जिन्होंने भी इस लायक समझा कि मामला दर्ज किया जाये, वे निश्चय ही आहत भावनाओं के प्रति सहानुभूतिशील होंगे. न्यायिक प्रावधानों का इतने हास्यास्पद ढंग से दुरुपयोग भारत में सभ्य विचार-विमर्श को किस तरह के झटके दे सकता है, इसका अनुमान संबंधित न्यायिक अधिकारियों को शायद नहीं है. अमर्त्य सेन भारत को तर्क करनेवालों की परंपरा का देश कहते हैं. उनकी इस गर्वपूर्ण उक्ति पर पिछले सालों में जिम्मेदारी की जगह से होनेवाले ऐसे फैसलों की वजह से निश्चय ही सवालिया निशान लग गया है. चंद्रमोहन पर हमले के बाद हमलावर द्वारा ही की गयी शिकायत के बाद उसे गिरफ्तार कर लेना अत्यंत ही गंभीर घटना थी.
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने ठीक ही सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा को नोटिस जारी किया और पूरे मामले पर रिपोर्ट मांगी. कुछ लोग इसे केंद्रीय हस्तक्षेप के रूप में देखेंगे, लेकिन वडोदरा का मामला लितना कला और अभिव्यक्ति पर आक्रमण का नहीं था, उतना एक अकादेमिक संस्था का खुद को विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल जैसे आततायियों के सुपुर्द कर देने का था. प्रासंगिक प्रश्न यह है कि कला संकाय में होनेवाले इम्तहान में कौन-सा छात्र कौन-सी कृति प्रविष्टि के रूप में देने जा रहा है, यह खबर बाहर कैसे गयी? यह अधिकार क्या किसी को दिया जा सकता है कि वह परीक्षा कक्ष में घुस जाये? क्या इम्तहान में लिखे जाने या दिये जानेवाले उत्तरों पर परीक्षक के अलावा किसी को टिप्पणी करने का हक है? ये वे आरंभिक प्रश्न हैं जो चंद्रमोहन के मामले में संबंधित न्यायिक अधिकारी को पूछने चाहिए थे, पर शायद पूछे नहीं गये. हुसेन के मामले में भी मामला दर्ज करने के पहले यह पूछा जा सकता था कि क्या वे सार्वजनिक प्रचार सामग्री तैयार कर रहे थे. कलाकृतियों को क्या सार्वजनिक बयान या भाषण के बराबर का दर्जा दिया जाना उचित है? किसी निजी-संग्रह में या सीमित पहुंचवाली कला दीर्घा में लगी कलाकृति को क्या दो समुदायों के बीच विद्वेष भड़काने के उद्देश्य से प्रेरित बताना तर्कपूर्ण है?
नामवर सिंह के खिलाफ दर्ज मामला चंद्रमोहन या हुसेनवाले मामलों की श्रेणी का नहीं क्योंकि पहले दोनों ही प्रसंगों में संघ से जुड़े संगठन की योजना है, जबकि नामवर सिंह के प्रसंग में ऐसा नहीं है. लेकिन तीनों के ही सिलसिले में यह प्रश्न तो प्रसंगिक है ही: क्या हमारे देश में सार्वजनिक विचार-विमर्श या व्यक्तिगत रचनाशीलता के लिए स्थान घटता जा रहा है? क्या 21वीं सदी में गालिब का होना खतरनाक नहीं? क्या वे धर्म और धर्मोपदेशक की खिल्ली उड़ाने को स्वतंत्र होंगे? उसी प्रकार क्या प्रेमचंद या हरिशंकर परसाई का लेखन अबाधित रह पायेगा? मजाक उड़ाना, व्यंग्य करना कला और साहित्य का एक अनिवार्य हिस्सा रहा है. कलाकार अपनी ही मूर्ति बनाता और ढालना नहीं है, वह बने बनाये गये बुतों को ध्वस्त कर सकता है. अगर बुतपरस्ती वह करता है, तो बुतशिकन भी उसे होना ही होगा. पर क्या हमारे दौर में कला के क्या रचना के स्वभाव से अंतर्भूत बुतशिकनी की इजाजत है?

क्या अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब परीक्षा भवनों में, अखबारों में संपादकों के कक्ष में, फिल्मों में सेट पर, गानों के स्टूडियो में ऐसे लोग बैठे रहेंगे जो लिखे जानेवाले उत्तरों, संपादक के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट, फिल्मों के दृश्यांकन और गानों के बोल की निर्माण के स्तर पर ही चौकसी करेंगे और उनमें काट-छांट करेंगे? या क्या वह समय पहले ही नहीं आ पहुंचा है? आखिरकार, दीपा मेहता अपनी फिल्म वाटर भारत में नहीं बना सकीं, हुसेन लंबे समय से भारत से निर्वासन में हैं, कला दीर्घाओं के मालिक गुजरात में ही नहीं, अन्यत्र भी कलाकारों को असुविधाजनक कलाकृतियां प्रदर्शित न करने की भद्र सलाह दे रहे हैं. जेम्स लेन की शिवाजी पर लिखी किताब पर अदालत द्वारा पाबंदी हटाये जाने के बाद भी शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के आक्रामक बयानों पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है.
क्या तर्क वागीशों का यह देश मूर्खता के प्रदेश में बदल रहा है? 1857 के 150वें, भगत सिंह के 100वें और आजादी के 60वें साल में यह दुर्भाग्यपूर्ण प्रश्न हमारे सामने है.

अपूर्वानंद जी का यह आलेख जनसता के 23 मई के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ है. वहां से साभार.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ गुजरात बनता सारा देश ”

  2. By ज़ाकिर on May 26, 2007 at 12:37 PM

    ''हमें अपने समय के इन सवालों से कतरा कर निकलने के बजाय उनसे जूझने की ज़रूरत है. ''
    - काश वो समय भी आये।

  3. By imran on May 26, 2007 at 9:18 PM

    एक दम लगे रहिए इन नाजीयो के बिरुध, ये अपने देश को भी जर्मनी बनाने पर लगे हुए है.
    बेहाया सब ...........

  4. By Reyaz-ul-haque on May 27, 2007 at 2:32 AM

    इमरान भाई
    आपको देख कर अच्छा लगा. हमारी लडा़ई तो अनवरत की लडा़ई है. आप जैसे लोग साथ हैं जान कर बल मिलता है. उम्मीद है आगे भी आयेंगे.

    जाकिर भाई
    समय तो है ही, हम ही कतरा कर निकल जाते हैं.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें