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बीच सफ़हे की लड़ाई

राजेश जोशी की (नयी) कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/16/2007 12:44:00 AM

राजेश जोशी

एक कवि कहता है

नामुमकिन है यह बतलाना कि एक कवि
कविता के भीतर कितना और कितना रहता है

एक कवि है
जिसका चेहरा-मोहरा, ढाल-चाल और बातों का ढब भी
उसकी कविता से इतना ज्यादा मिलता-जुलता सा है
कि लगता है कि जैसे अभी-अभी दरवाजा खोल कर
अपनी कविता से बाहर निकला है

एक कवि जो अक्सर मुझसे कहता है
कि सोते समय उसके पांव अक्सर चादर
और मुहावरों से बाहर निकल आते हैं
सुबह-सुबह जब पांव पर मच्छरों के काटने की शिकायत करता है
दिक्कत यह है कि पांव अगर चादर में सिकोड़ कर सोये
तो उसकी पगथलियां गरम हो जाती हैं
उसे हमेशा डर लगा रहता है कि सपने में एकाएक
अगर उसे कहीं जाना पड़ा
तो हड़बड़ी में वह चादर में उलझ कर गिर जायेगा

मुहावरे इसी तरह क्षमताओं का पूरा प्रयोग करने से
आदमी को रोकते हैं
और मच्छरों द्वारा कवियों के काम में पैदा की गयी
अड़चनों के बारे में
अभी तक आलोचना में विचार नहीं किया गया
ले देकर अब कवियों से ही कुछ उम्मीद बची है
कि वे कविता की कई अलक्षित खूबियों
और दिक्कतों के बारे में भी सोचें
जिन पर आलोचना के खांचे के भीतर
सोचना निषिद्ध है
एक कवि जो अक्सर नाराज रहता है
बार-बार यह ही कहता है
बचो, बचो, बचो
ऐसे क्लास रूम के अगल-बगल से भी मत गुजरो
जहां हिंदी का अध्यापक कविता पढ़ा रहा हो
और कविता के बारे में राजेंद्र यादव की बात तो
बिलकुल मत सुनो.

प्रौद्योगिकी की माया

अचानक ही बिजली गुल हो गयी
और बंद हो गया माइक
ओह उस वक्ता की आवाज का जादू
जो इतनी देर से अपनी गिरफ्त में बांधे हुए था मुझे
कितनी कमजोर और धीमी थी वह आवाज
एकाएक तभी मैंने जाना
उसकी आवाज का शासन खत्म हुआ
तो उधड़ने लगी अब तक उसके बोले गये की परतें

हर जगह आकाश

बोले और सुने जा रहे के बीच जो दूरी है
वह एक आकाश है
मैं खूंटी से उतार कर एक कमीज पहनता हूं
और एक आकाश के भीतर घुस जाता हूं
मैं जूते में अपना पांव डालता हूं
और एक आकाश मोजे की तरह चढ़ जाता है
मेरे पांवों पर
नेलकटर से अपने नाखून काटता हूं
तो आकाश का एक टुकड़ा कट जाता है

एक अविभाजित वितान है आकाश
जो न कहीं से शुरू होता है न कहीं खत्म
मैं दरवाजा खोल कर घुसता हूं, अपने ही घर में
और एक आकाश में प्रवेश करता हूं
सीढ़ियां चढ़ता हूं
और आकाश में धंसता चला जाता हूं

आकाश हर जगह एक घुसपैठिया है

चांद की आदतें

चांद से मेरी दोस्ती हरगिज न हुई होती
अगर रात जागने और सड़कों पर फालतू भटकने की
लत न लग गयी होती मुझे स्कूल के ही दिनों में

उसकी कई आदतें तो
तकरीबन मुझसे मिलती-जुलती सी हैं
मसलन वह भी अपनी कक्षा का एक बैक बेंचर छात्र है
अध्यापक का चेहरा ब्लैक बोर्ड की ओर घुमा नहीं
कि दबे पांव निकल भागे बाहर...

और फिर वही मटरगश्ती सारी रात
सारे आसमान में.

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ राजेश जोशी की (नयी) कविताएं ”

  2. By परमजीत बाली on May 16, 2007 at 1:02 PM

    रियाज जी,अच्छी रचनाएं प्रेषित की हैं ।यह रचना बचपन की शैतानियों को उजागर करने मे पूर्ण समर्थ रही है।बधाई।-
    चांद से मेरी दोस्ती हरगिज न हुई होती
    अगर रात जागने और सड़कों पर फालतू भटकने की
    लत न लग गयी होती मुझे स्कूल के ही दिनों में

    उसकी कई आदतें तो
    तकरीबन मुझसे मिलती-जुलती सी हैं
    मसलन वह भी अपनी कक्षा का एक बैक बेंचर छात्र है
    अध्यापक का चेहरा ब्लैक बोर्ड की ओर घुमा नहीं
    कि दबे पांव निकल भागे बाहर...

    और फिर वही मटरगश्ती सारी रात
    सारे आसमान में.

  3. By anu on May 17, 2007 at 12:29 PM

    thoda kamjoor kavitayen lagin, lekin anya blogees se alag sahityik mijaj ki posting dekhkar sukhad anubhuti hui.

  4. By Reyaz-ul-haque on May 17, 2007 at 3:21 PM

    anu apko dekh kar achha laga. Mohalle meN kuchh log apko Didi jee(bahan jee) samjh baithe hain. HA... HA... HA...

  5. By anu on May 18, 2007 at 3:28 PM

    aapne usaka jo jawab diya hai dil ko khush kar diya.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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