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उत्तर प्रदेश : हाथ की बेकारी और कमल की बदबू

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/07/2007 12:28:00 AM

हाथ, हाथी, साइकिल और कमल
रविभूषण
राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्रों के अर्थ अक्सर हमारे लिए विचारणीय नहीं होते. नाजिम हिकमत की `हाथ' पर लिखी मशहूर कविता को अगर हम याद न भी करें, तो इतना तो सभी जानते हैं कि हाथ ने ही मनुष्य को सबसे पहले मानवेतर प्राणियों से अलग किया. जो कुछ संदर और सार्थक है, उसमें हाथ की सर्वोपरि भूमिका है. अब हाथ कांग्रेस का चुनाव चिह्र है और जहां तक हाथ का साथ देने का प्रश्न है, 1989 के बाद भारत के बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस की भूमिका क्रमश: घटती गयी है. फिलहाल उत्तर प्रदेश के चुनाव को ध्यान में रखते हुए वहां कांग्रेस, बसपा, सपा और भाजपा के भविष्य पर विचार किया जा सकता है. अभी द इंडियन एक्सप्रेस सीएनएन-आइबीएन, सीएसडीएस ने जो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण किया है, उसमें बसपा की स्थिति अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में सर्वाधिक अच्छी है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या 403 है. उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक विधानसभा में किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं होने जा रहा है. 403 सीटों पर कुल 2,972 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं, जिनमें 117 राजनीतिक दलों के प्रत्याशी हैं और स्वतंत्र/निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या 2,275 है. राजनीतिक दल संख्या में जितने हों, उत्तर प्रदेश में बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा ही प्रमुख हैं. किसी भी राजनीतिक दल को 202 सीटें प्राप्त नहीं होंगी. यह वह जादुई संख्या है, जिसे प्राप्त कर कोई भी राजनीतिक दल बहुमत प्राप्त होने का दावा कर सकता है. जहां तक दूसरे राजनीतिक दलों की बात है, अजीत सिंह और राज बब्बर का राजनीतिक दल उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली नहीं है. उमा भारती की पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही है. विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल के अनुरोध पर उमा भारती ने अपने प्रत्याशियों को चुनावी होड़ से अलग कर लिया. भाजपा के कल्याण सिंह और उमा भारती दोनों लोध जाति के हैं. उत्तर प्रदेश के चुनाव में इस बार रामजन्मभूमि का मुद्दा नहीं है. हिंदुत्व के सहारे बार-बार सामान्य जनता को जन समस्याओं से विमुख नहीं किया जा सकता. प्रदेश के इतिहास में पहली बार विधानसभा का चुनाव सात चरणों में संपन्न हो रहा है. जिस प्रकार चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा का चुनाव सात चरणों में संपन्न हो रहा है. जिस प्रकार चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी सक्रियता से चुनाव को सही रूप में संपन्न कराया, उसी प्रकार उत्तर प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं. अब तक हो चुके मतदान में मतदान का प्रतिशत पिछले चुनावों की तुलना में निश्चित रूप से कम है, पर मतदान केंद्रों पर कोई भी राजनीतिक दल गलत ढंग से प्रभावकारी भूमिका में नहीं है.
21वीं सदी का भारत अपनी मौजूदा समस्याओं से घिरा हुआ है. हाथ खाली और बेकार हैं. कमल की वास्तविक सुगंध से सब परिचित हैं. हाथ अपने विशाल आकार में अब भी लोगों का ध्यान खींच रहा है और तमाम तरह की कारों के बाद भी साइकिलों का बाजार घटा नहीं है. उत्तर प्रदेश के चुनाव में कई नारों में से एक नारा अधिक गूंज रहा है - ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी आगे जाएगा. हाथी बसपा का चुनाव चिह्र है और बहुजन समाज पार्टी ने अब बहुजन के स्थान पर सर्वजन को स्थान दे दिया है. मायावती ने अपनी पार्टी से ऊंची जातियों के 139, पिछड़ी जातियों के 110, अनुसूचित जातियों के 93 और 61 मुसलिम प्रत्याशी खड़े किये हैं. 1989 में उसने 364 प्रत्याशी खड़े किये थे, जिनमें केवल 13 विजयी हुए थे. 1991 के चुनाव में भी बसपा की स्थिति बहुत बेहतर नहीं हुई थी. 370 प्रत्याशियों में से केवल 12 प्रत्याशी विधानसभा चुनाव जीत पाये थे. बसपा को मिले वोटों का प्रतिशत भी सामान्य था. 1989 में उसे 9.63 प्रतिशत तथा 1991 में 9.70 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे. बाद में बसपा की स्थिति बेहतर होने लगी. 1993 में 69, 1996 में 66 और 2002 में उसके 98 प्रत्याशी विजयी हुए थे. वोट प्रतिशत तेरह (1989 से 2002) में 9.63 प्रतिशत से बढ़ कर 23.06 प्रतिशत हो गया. मायावती ने 1995-96 में मुलायम सिंह के साथ मिल कर सरकार बनायी थी. 1996-97 में बसपा की मैत्री भाजपा से हुई. बाद में राष्ट्रपति शासन के बाद भी उसकी मैत्री भाजपा से बनी.
इस बार के चुनाव में सर्वाधिक सीटें बसपा को प्राप्त होंगी, यह तय है, पर यह तय नहीं है कि वह किस राजनीतिक दल से जुड़ कर सरकार बनायेंगी. मायावती मुलायम सरकार की कट्टर विरोधी हैं. बसपा का एक नारा है- चल गुंडों की छाती पर, बटन दबाओ हाथी पर. मुलायम सिंह मायावती के निशाने पर हैं और मुलायम सिंह के निशाने पर कोई नहीं है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में उन्हीं की सरकार है. सदी के महानायक उत्तर प्रदेश में दम देख रहे हैं और उनके अनुसार वहां कोई अपराध नहीं है. मायावती के अनुसार उत्तर प्रदेश में गुंडा राज है. वे सार्वजनिक भाषणों में कई बार यह कह चुकी हैं कि मुलायम सिंह और अमर सिंह को वे जेल में बंद करेंगी. राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों में अपराधी भी हैं. वे पहले भी थे. स्मिता गुप्त ने अपने लेख डज लॉ एंड ऑर्डर मैटर में (सेमिनार 571, मार्च, 2007) 403 विधायकों में से 205 विधायकों को अपराधी सूची में डाला है. उनके अनुसार सपा के 81, बसपा के 49, भाजपा के 39, कांग्रेस के 9 रालोद के 8 और 16 निर्दलीय विधायक अपराधी हैं. फिर भी चुनाव में अपराध कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. विकास, आजीविका, रोजगार और भ्रष्टाचार के मुद्दे बड़े हैं. चुनाव में जाति और समुदाय की तुलना में पार्टी और प्रत्याशी का अधिक महत्व है.
उत्तर प्रदेश चुनाव सामान्य चुनाव नहीं है. यह देश का सर्वप्रमुख राज्य है और इसके चुनावी परिणाम केंद्र को भी प्रभावित करते रहे हैं. अब राजनीतिक मूल्य नष्ट हो चुके हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में कल्याण सिंह की अपनी अलग पार्टी थी, राष्ट्रीय क्रांति पार्टी. हमारे नेता शब्दों, विचारों, स्थापनाओं और मूल्यों के साथ जिस तरह खिलवाड़ करते हैं, यह उनके दल के नामकरण से ही समझा जा सकता है. कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी मर चुकी है. अब वे भाजपा में हैं. अपने घर में वापस लौट चुके हैं. उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी कांग्रेस में प्राण फूंक रहे हैं. 15 वर्ष से उत्तर प्रदेश में गैर कांग्रेसी शासन है और राहुल गांधी इस अवधि में होनेवाली बदहाली को फोकस में ला रहे हैं. आरोप-प्रत्यारोप का खेल भारतीय राजनीति का दिलचस्प खेल है. एक-दूसरे पर वार-प्रहार करके अपने को संतुष्ट किया जाता है. अभिनेत्रियां- जया बच्च्न और जयाप्रदा- सपा को गति नहीं दे सकतीं. मायावती इन दोनों की तुलना में बहुत आगे हैं और राजनीति में अभिनेताओं-अभिनेत्रियों के लिए स्थान नहीं है. वे महज आकर्षण हैं. मुलायम सिंह के साथ अमर सिंह, अंबानी, अमिताभ बच्च्न और अभिनेत्रियां हैं, पर यह लोकतंत्र का कमाल है या फि र जीवन की वे विकट-कठिन समस्याएं हैं, जहां इनकी उपस्थिति कोई अर्थ नहीं रखती.
मुलायम सिंह की राजनीति भी पेंडुलम की तरह रही है. कभी भाजपा की ओर और कभी कांग्रेस की ओर. साइकिल सामान्य जनों की सवारी है. पर मुलायम सिंह को सामान्य जन और समाजवाद से मतलब नहीं रहा है.
मंडल-कमंडल की राजनीति के दिन लद चुके हैं. अब नंगा यथार्थ सामने है. भूमंडलीकरण का दैत्य सबके सम्मुख है. इससे आंखें नहीं फेरी जा सकतीं. पिछले 15 वर्ष से उत्तर प्रदेश में भाजपा, बसपा और सपा की जीत होती रही है. त्रिशंकु विधानसभा पहले भी थी. अब भी रहेगी. राजनीतिक दलों का क्रम बदलता चलेगा. इस बार यह क्रम बसपा, सपा और भाजपा का होगा, ऐसी संभावना है. 40 प्रतिशत जनता वहां अशिक्षित है. समस्याएं सामने हैं और समाधान किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है. कभी चरण सिंह का गढ़ रहा पश्चिमी उत्तर प्रदेश उनके बेटे अजीत सिंह के पक्ष में नहीं है. हाथी पर मायावती के साथ कौन बैठेगा? हाथी पर साइकिल नहीं लदेगी, यह तय है. जो भी बैठे उसके हाथ में क्या होगा? क्या उसके हाथ में कमल होगा? अगर कमल नहीं, तो फि र क्या होगा? फि र बड़ी बात यह भी है कि हाथी की चाल कैसी होगी? महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हाथी पर सवार कौन है? महत्वपूर्ण यह है कि हाथी और उस पर बैठे हुए व्यक्ति किस राहों से गुजर रहे हैं? क्या यह शोभायात्रा होगी या और कुछ?

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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