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उत्तर प्रदेश की सियासी संभावनाएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/07/2007 12:13:00 AM

एमजे अकबर इस बार उत्तर प्रदेश में सियासी संभावनाओं की तलाश कर रहे हैं. प्रभात खबर से साभार.
एमजे अकबर
यदि आप जीत नहीं सकते तो इसका सबसे बेहतर और स्वाभाविक तरीका यह है कि आप जीत की परिभाषा अपने अनुसार गढ़ लें. कुछ ऐसा ही हाल उत्तर प्रदेश चुनाव में सभी राजनीतिक दलों का है. वहां कोई भी राजनीतिक पार्टी स्पष्ट जीत की स्थिति में नहीं है. लिहाजा वे सभी अपनी-अपनी सफलता के दावे को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं. चुनाव विश्लेषक और मीडिया पंडित भी कुछ इसी तरह की घालमेल और चतुराई भरी बात फैला रहे हैं. सफलता एक तुलनात्मक कथन है, जबकि जीत एक स्पष्ट और सर्वस्वीकृत पैमाना है. यदि आप अपनी जीत की अपेक्षाओं को काफी नीचे रखते हैं तथा बाद में इससे आगे निकल जाते हैं, तो फिर आप अपनी आवाज बुलंद करने की स्थिति में हो जाते हैं. यह एक ऊंची कूद का खेल-युद्ध है, जिसमें काफी नीचे से आप छलांग लगाते र्है.
अभी समाजवादी पार्टी सत्ता में है और वह अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत सत्ता में पुनर्वापसी के रूप में कर रही है. हालिया चुनावों में यदि वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आती है, तो वह अपनी जीत का दावा करेगी. इसी तरह बहुजन समाज पार्टी सोचती है कि वह जीत की लहर पर सवार है. यदि वह 130 से 140 तक सीटें निकाल ले जाती है, तो उसके पास नोटों का अंबार सामने होगा. इस समय भाजपा ज्यादा आराम की स्थिति में है, क्योंकि तीन वर्ष पहले के आम चुनावों में वह बुरी तरह विफल रही थी. इसीलिए उसने बगैर किसी अपेक्षा के अपनी शुरुआत की है. यदि भाजपा 100 सीटों की संख्या को भी पार करती है, तो उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को यह कहने का अवसर होगा कि उनकी पार्टी फिर से जीवित हो रही है. यदि भाजपा 120 सीटों की संख्या पार कर लेती है, फिर तो वह इसके लिए डुगडुगी पीटने की स्थिति में होंगे. 2004 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली अप्रत्याशित सफलता ने उसकी उम्मीदों को काफी उठा दिया है, जिस वजह से वह अपनी आवाज बुलंद करने की बेहतर स्थिति में है. तीन वर्ष बाद अब वह तीन अंकों में अपने परिणाम की आशा कर सकती है. इससे उसे अपने लंबे अवसान से उबरने का मौका मिलेगा, हालांकि उसके लिए यह बहुत छोटी छलांग होगी. कुल 400 सीटों में यदि कांग्रेस 35 सीटें भी निकाल पाती है, तो कांग्रेस के रणनीतिकारों के लिए अपनी पीठ थपथपाने का यह बेहतर मौका होगा. 1984-85 के चुनावों में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर जीत दर्ज की थी. उस समय जन्मे लोग इस बार विधानसभा चुनावों में पहली बार वोट डालेंगे. इन 20 वर्षों में भारत में तीन राष्ट्रपति हो चुके हैं और एक पूरी पीढ़ी मतदाता के रूप में परिपक्व हो चुकी है, लेकिन कांग्रेस अभी भी भारत के इस सबसे महत्वपूर्ण राज्य की राजनीतिक नब्ज को पहचान पाने में विफल रही है. किसी भी सामान्य चुनाव में जीत का गणितशास्त्र यह बताने के पर्याप्त होता है कि कौन-सी पार्टी जीत रही है. लेकिन उत्तर प्रदेश में विजेताओं का निर्धारण बीजगणित से तय होता है. गंठबंधन का निर्धारण चुनाव परिणाम आने के बाद तय होगा. इसी तरह मुख्यमंत्री का चुनाव मतदाताओं की इच्छा से नहीं, बल्कि राजनीतिज्ञों की इच्छा से तय होगा. इसलिए चुनाव के दौरान दिये जानेवाले सारे बयानों को भुला देना चाहिए. जिस तरह विवाह पूर्व के समझौते में सब कुछ स्वीकृत होता है, वैसे ही उत्तर प्रदेश में भी कोई भी किसी के साथ भी उठने-बैठने व समझौते को तैयार है. गंठबंधन की संभावना के बारे में अगर कुछ इनकार किया जा सकता है, तो वह है भाजपा और कांग्रेस के बीच गंठबंधन. इस बारे में राहुल गांधी की बात की जाये तो उनके चुनाव प्रचार से यह साफ है कि वह किसी अन्य के बजाय पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के खिलाफ ज्यादा हैं. इस बारे में वह कहते भी हैं कि 1996 में राव द्वारा बसपा के साथ गंठबंधन एक बड़ी ऐतिहासिक भूल थी. यह कथन बिल्कुल ठीक भी है, लेकिन यदि चुनावों में बसपा 140 सीटें और कांग्रेस 40 सीटें पाती है, तो यह कांग्रेस को मायावती सरकार में शामिल होने या बाहर से समर्थन करने से नहीं रोकेगी. संभवत: इस बारे में राजनाथ सिंह का कथन ज्यादा सटीक और साफ है. वह कहते हैं कि भाजपा के लिए कोई भी अछूत नहीं है. यदि संख्यात्मक आंकड़ों को पूरा करने की जरूरत हुई तो मायावती और मुलायम सिंह दोनों खुशी-खुशी अपनी सरकार बनाने के लिए भाजपा का समर्थन लेने को तैयार होंगे. हालांकि वे भाजपा को समर्थन देने के मामले में कम खुश होंगे, लेकिन यह सब कुछ मिलनेवाली सीटों की संख्या पर निर्भर करेगा. यदि उत्तर प्रदेश चुनावों में खंडित जनादेश आता है, तो कांग्रेस को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का मौका मिल जायेगा. हालांकि 10 फीसदी से भी कम सीटें पाने के बाद भी कांग्रेस के हाथों में सौ प्रतिशत यह अधिकार होगा. इसके लिए उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सिर्फ यह घोषित करना होगा कि कोई भी राजनीतिक दल राज्य में स्थिर सरकार बनाने के लिए निर्णायक स्थिति में नहीं है. और इस तरह से कांग्रेस को राज्य में अपने निर्णयों और विशेषाधिकारों को थोपने के लिए एक बहाना मिल जायेगा. इस बारे में कांग्रेस के पास राज्य में उनका अपना आज्ञापालक राज्यपाल होने के बावजूद केवल एक बाधा भारत के निष्पक्ष राष्ट्रपति हैं. राष्ट्रपति कलाम की बढ़ती लोकप्रियता की वजह उनका सही होना है. वह संवैधानिक बातों के प्रति पर्याप्त सतर्क रहते हैं और राजनीतिक खेल के लिए नैतिक बातों को तोड़ने-मरोड़ने में विश्वास नहीं करते. वह अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के प्रथम दौर के अंतिम समय में किसी तरह का समझौता नहीं करना चाहेंगे. हालांकि उत्तर प्रदेश के चुनावों का बहुत बड़ा प्रभाव कलाम के दूसरी बार चुने जाने पर पड़ेगा. इस बारे में किसी तरह के बहस की जरूरत नहीं है. चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से पता चलता है कि 80 प्रतिशत लोग कलाम को राष्ट्रपति के रूप में पसंद करते हैं. लेकिन चुनाव मंडल का निर्माण सांसदों और विधायकों को मिलाकर होता है, जिस वजह से यह राजनीतिक पार्टियों के बीच का खेल हो जाता है. हालांकि केंद्र सरकार अभी पूर्ण बहुमत की स्थिति में है, लेकिन प्रश्न यह है कि सरकार गुप्त मतदान में खुद को कितना सहज पायेगी? यह कोई नहीं जानता कि संयुक्त प्रगतिशील गंठबंधन सरकार को समर्थन कर रहे 45 से अधिक सांसद चुनाव के दौरान किधर जायेंगे? किसी भी गंठबंधन सरकार में सहभागी दलों को मुख्य दल की लोकप्रियता का ध्यान रखना चाहिए. यह विश्वास कांग्रेस से घटता नजर आ रहा है. पिछले दो वर्ष में बिहार और पश्चिम बंगाल के बाद यदि उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस के पुनर्जीवित होने की संभावना नहीं बनती तो यह कांग्रेस के लिए एक बड़ा विस्मयात्मक प्रश्न होगा, जो अभी मेरे दिमाग में छोटे प्रश्न के रूप में उभर रहा है. इस सबके लिए केंद्र की कांग्रेस सरकार अकेले उत्तरदायी है, जो भारतीय राजनीति में सहज स्थान पाने के ऐतिहासिक अवसर को भुनाने में विफल रही. सरकार के पास अब भी अवसर है कि वह अपने फिर से चुने जाने के लिए मतदाताओं के एक निश्चित खेमे का निर्माण करे. 2004 में केंद्र में कांग्रेस ने बड़ी कुशलता से एक गंठबंधन का निर्माण किया. इससे उसे संसद में अपना प्रभुत्व स्थापित करने में मदद मिली. लेकिन उसने मतदाताओं का गंठबंधन बनाने के काम को भुला दिया. परिणामस्वरूप वह अपनी उस बढ़त को कायम रख पाने में विफल हो रही है. यह एक सच है कि जब सत्ता आपके सिर पर हो तो आप नीचे की तरफ नहीं देख सकते. यह शक्ति बाद में शीर्ष से ओजोन स्तर में चली जाती है. इस तरह मैं कह सकता हूं कि सत्ता आपके हाथों से धीरे-धीरे फिसल जाती है. आज कांग्रेस में गंगा के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक कोई पार्टी संगठन नहीं दिखता. उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल या बिहार में कोई भी समय के साथ चलनेवाला नेतृत्व नहीं दिख रहा और न ही कोई जमीनी स्तर पर क ड़ी मेहनत करने के लिए इच्छुक है. यदि सब कुछ ठीक रहता, तो उत्तर प्रदेश में अभी तक चार मुख्यमंत्री और भारत में पांच प्रधानमंत्री ही होते.

अनुवाद : योगेंद्र केसरवानी

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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