हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

1857 और हिंदू फ़ासिस्टों के षड्यंत्र

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/13/2007 11:53:00 PM

आज भी उन लोगों की कमी नहीं है जो यह मानते हैं कि अंगरेज़ों ने देश को मुसलमानों की गुलामी से आज़ाद कराया. वे इसी के साथ कम्युनिस्टों को गरियाते रहते हैं कि वे अंगरेज़ों के हाथों में खेलते रहे हैं और उनके इशारों पर ही वामपंथी इतिहासकार देश का गलत इतिहास लिखते आये हैं. मगर यह लेख आप पढें और हमें बताएं कि कौन अंगरेज़ों की चाकरी में लगा था (और अब भी है), किसने अंगरेज़ों के हाथों की कठपुतली बनना स्वीकार किया और अब भी बना हुआ है, और यह कि कौन अब भी अंगरेज़ों ( अब के साम्राज्यवादियों) के इशारे पर अपने ही देश की जनता के खिलाफ़ युद्धरत है.

प्रणय कृष्ण

अंगरेजों ने सांप्रदायिक आग भड़काने की कोशिशों में
कोई कमी नहीं रखी, फिर भी 1857 के स्वाधीनता संग्राम में साम्राज्यवाद विरोधी धुरी के इर्द-गिर्द हिंदू-मुस्लिम एकता बरकरार रही. वहीं 1857 के विद्रोह के दमन के बाद का राष्ट्रीय आंदोलन अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति का बार-बार शिकार होता रहा. कारण यह था कि कांग्रेसी नेतृत्व कभी उस साझा संस्कृति या
गंगा-जमुनी तहजीब की ताकत को पहचान ही न पाया जो सैकड़ों वर्षों
के दौरान विकसित हुई थी. 1857 के विद्रोहियों ने राष्ट्रवाद और
धर्मनिरपेक्षता को आधुनिक विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में बैठ कर
योरप से नहीं सीखा था, पूरे मध्यकाल के दौरान अनेक मुस्लिम राजवंश जो
दिल्ली की गद्दी पर बैठे उन सभी ने धर्म और धर्माचार्यों को राजकाज
से अलग रखा. शरीयत के कानून को कभी भी राज्य के अपने कानूनों
पर तरजीह नहीं दी गयी. धर्मचार्यों को पठन-पाठन का काम दिया गया
और राजकाज से उन्हें अलग रखा गया. मध्यकाल का भारतीय राज्य कभी भी
धर्मराज्य नहीं बन सका. मुगलकाल के दौरान न केवल हिंदू-मुस्लिम शासक
वर्गों के बीच सत्ता की साझेदारी विकसित हुई बल्कि सूफी और
भक्ति आंदोलनों के प्रभाव से समाज में सांप्रदायिक सौहार्द भी स्थापित
हुआ. 1857 की बेमिसाल हिंदू-मुस्लिम एकता सूअर और गाय की चर्बी
वाले कारतूसों के कारण नहीं पैदा हुई थी (जैसा कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने
षड्यंत्रपूर्वक साबित करने की कोशिश की थी) बल्कि यह इसी दीर्घ पृष्ठभूमि की उपज थी.
साथ ही साथ इस एकता का आधार पूर्णत: लौकिक था. बर्तानवी उपनिवेशवाद ने अपनी लूट-खसोट
की नीति के तहत भारत की कृषि, व्यापार, उद्योग-धंधों सबको चौपट कर
दिया था और उसकी लूट के शिकार सभी धर्मों के लोग बन रहे थे. इस बात
ने धर्मों की भिन्नता के परे पीड़ितों की एकता का भौतिक आधार
मुहैया कराया था.
यह महज संयोग नहीं कि कांग्रेस का जन्मदाता बना एलन
आक्टोवियन ह्यूम, जो इस विद्रोह के समय इटावा का चीफ मजिस्ट्रेट था, 23,
मई 1857 को जब इटावा बुलंदशहर और मैनपुरी में विद्रोह हुआ तो वह
औरत का भेष धर कर भागा था. इस गदर के भुक्तभोगी के रूप में ह्यूम ने
महसूस कि या कि यदि क्रांति से बचना है तो हिंदुस्तानियों के गुस्से
को एक सेफ्टी वाल्व देना जरूरी होगा. इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि
1857 से अंगरेजों ने यह भी सबक लिया कि हिंदू-मुस्लिम एकता को
तोड़े बगैर भारत पर राज करना मुश्किल होगा. इस सिलसिले में 1873-77
में प्रकाशित 8 खंडोंवाली पुस्तकमाला 'हिस्ट्री आफ इंडिया ऐज टोल्ड
बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस' का जिक्र किया जा सकता है, जिसे ब्रिटेन
के विदेश मंत्री सर हेनरी एलियट द्वारा तैयार कराया गया और प्रो जॉन
डाउसन द्वारा संपादित किया गया था. इस पुस्तकमाला में बड़ी सावधानी से
कल्पना और तथ्यों को मिलानेवाली ऐसी अतिशयोक्तिपूर्ण व सांप्रदायिक
सामग्री का चयन किया गया है, जिससे कि यह सिद्ध किया जा सके कि भारत
में दो राष्ट्र थे. देशी हिंदुओं पर विदेशी मुसलमानों ने विजय प्राप्त की
ओर यह विदेशी मुस्लिम अत्याचार 600 वर्षों तक चलता रहा और वास्तव में
अंगरेजों ने आकर हिंदुओं को इससे मुक्त किया. लेकिन अपने
धूर्ततापूर्ण उद्देश्य से गढे गये इस नये इतिहास में भी अंगरेजों को
मानना पड़ा है कि भारतीय अपनी साझी विरासत से पूरी तरह नावाकिफ नहीं
है. इसलिए पुस्तक की भूमिका में इलियट ने दुख व्यक्त किया है कि भारत
के हिंदू लेखकों ने भी ऐसा विवरण दिया है कि मानो मुस्लिम शासक
भारतीय थे और उन्होंने मुसलमानों के हाथों अपने देशवासियों के
उत्पीड़न की चर्चा नहीं की है. कहना न होगा कि दूसरी ओर भारतीय
इतिहास का हिंदू-मुस्लिम भाष्य तैयार करनेवाले भी अंगरेजों के ही खैरख्वाह
थे और ये दो किस्म के भाष्य 'द्विराष्ट्रवाद' के सिद्धांतकारों के काम
आये, इस प्रकार अंगरेजों की कृपा से जो नया इतिहासबोध तैयार हुआ
उसने इस तथ्य को झुठला दिया कि दरअसल मध्यकाल में हिंदू और मुस्लिम
सामंतों की सत्ता में साझेदारी थी. किसान और आम जनता इस साझी सत्ता
से पीड़ित थी, किसी शासक के मुस्लिम या हिंदू होने से नहीं. इसी सामंती
सत्ता के खिलाफ आम जनता के संघर्ष की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के
बतौर भक्ति तथा सूफी आंदोलन पैदा हुए, जिनमें दोनों समुदायों के
किसानों, मेहनतकशों की एकता झलकी. सच तो यह है कि अलग-अलग
धार्मिक पहचानोंवाले राजनैतिक समुदायों के बतौर हिंदू और
मुसलमान पूरे मध्यकाल में दिखाई ही नहीं देते. इसलिए कुछ
इतिहासकारों ने अतीत पर आरोपित इन धार्मिक अस्मिताओं को कल्पित
समुदाय का बना दिया है. हिंदुत्व के सबसे बड़े सिद्धांतकार सावरकर ने
भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा में पितृभूमि और पुण्यभूमि की जुड़वां
कसौटी निर्धारित की. यह कसौटी बड़ी कुटिलता से मुसलमानों और
ईसाइयों को ही भारतीय राष्ट्र से बाहर क रने के लिए बनायी गयी है
क्योंकि उनकी पुण्यभूमि अर्थात उनके धर्मों का उद्गमस्थल भारत से
बाहर हैं. पितृभूमि यदि एकमात्र आधार होता है तो वे भी भारतीय राष्ट्र का
हिस्सा होते क्योंकि वे भी पीढ़ी दर पीढ़ी इस देश में रहते आ रहे हैं.
भारतीय बौद्ध, जैन और सिख, जिनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों ही
भारत है, संघियों के अनुसार हिंदू धर्म में जबरन समेट लिये जाते है.
सावरकर की इस बेहद तंगनजर और बेवकूफीभरी अवधारणा का इस्तेमाल यदि
दूसरे देश में करने लग जायें तो उन देशों में बसे हिंदुओं का क्या
होगा? चीनी, जापानी, सिंहली से लेकर तमाम पूर्व एशियाई देशों के
बौद्धों को तो उन राष्ट्रों का नागरिक ही नहीं कहा जा सकेगा.
अमेरिका, यूरोप से लेकर दुनिया भर के ईसाइयों को इजरायल
फलस्तीन का नागरिक बनना होगा. फिर मुसलमानों, ईसाइयों की
पुण्यभूमि भी क्या सिर्फ़ मक्क, मदीना या येरूशलम तक ही सीमित है? उनकी
हजारों दरगाहें खानकाहें, मस्जिद और गिरिजाघर तो इसी देश में आबाद
है. अधिकतर भारतीय मुसलमान अपनी कथित पुण्यभूमि अर्थात मक्का-मदीना
कभी गये ही नहीं. आम लोगों की बात छोड़िए बहुतेरे मुगल बादशाहों तक
ने हज नहीं किया था. इसलिए पुण्यभूमि की बात ही उठानी बेमानी है, देश तो
उनका होता है जिनका देश की सत्ता और संपत्ति में हिस्सा होता है. इसे
अच्छी तरह जाननेवाले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पैरोकार संघी लोग देश
की बहुसंख्यक जनता को अपने ही देश की संपत्ति से महरूम करके
साम्राज्यवाद और उसके मुट्टी भर दलालों की झोली में देश की प्रभुसत्ता
और संपत्ति की अर्पित करते जाने के सत्ता षड्यंत्र के सहभागी हैं.
जाहिर है कि सच्चे राष्ट्रवाद को अमल में लाने के लिए देश की सत्ता और
संपत्ति पर देश की बहुसंख्यक मेहनतकशों के अधिकार की स्थापना करनी
होगी और यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के धूर्ततापूर्ण कुचक्र को
धूल में मिला कर ही संभव है. आजादी के आंदोलन के दौरान कांग्रेस
के अंदर अंगरेजी राज के प्रति ढुलमुल रुख तो था ही, जमींदारी और कट्टर
पूंजीवादी हितों के ऐसे पैरोकार भी मौजूद रहे जिन्होंने हिंदुत्व
को हवा दी. कई बार मदन मोहन मालवीय जैसे हिंदू महासभाई तत्व
कांग्रेस की नेतृत्वकारी भूमिका में रहे. तिलक , लाजपत राय की पीढी़
के हिंदू आग्रहों को छोड़ भी दिया जाये तो स्वयं महात्मा गांधी द्वारा
हिंदू प्रतीकों के इस्तेमाल ने अवश्य ही राष्ट्रीयता की संकल्पना को एक
हिंदू रंग देने में सहायता की और मुसलमानों के अलगाव को बढा़या.
गांधी जी द्वारा साम्राज्यवाद विरोधी जनकार्रवाइयों के ऊंचाई पर
पहुंचने के समय आंदोलन वापस लेने की घटनाओं ने भी बार-बार
सांप्रदायिक ताकतों को राजनीतिक शून्य भरने का अवसर दिया. सरकारी
इतिहास विभाजन का दोष महज जिन्ना और मुस्लिम लीग पर मढ़ता है, लेकिन
वास्तविकता यह है कि हिंदू कट्टरपंथ को कांग्रेस के भीतर लगातार
संरक्षण मिला है. पहले तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस ने दो
राष्ट्र के सिद्धांत (सावरकर और जिन्ना दोनों ही जिसके पैरोकार थे) के
समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और बंटवारा होने दिया, और फिर बंटवारे
के बाद भी उसकी आग को बीच-बीच में होनेवाले सांप्रदायिक दंगों के
जरिये और पाकिस्तान विरोधी युद्धोन्माद के सहारे लगातार जीवित रखा गया.
यहां तक कि नेहरू के दौर से ही कम्युनिस्टों का विरोध करने के
लिए संघ को संरक्षण दिया गया, और इंदिरा व राजीव के दौर में तो
हिंदू वोटों के लिए कांग्रेस और संघ परिवार की सांठ-गांठ अब
सर्वज्ञात तथ्य है. जहां आजादी के बाद भी देश की नसों में इस तरह
सांप्रदायिक जहर लगातार घोला जाता रहा हो,वहां क्या आश्चर्य कि अनुकूल
परिस्थिति आने पर एक पक्की सांप्रदायिक और फासिस्ट विचारधारा सत्ता की
मंजिल पा ले. कांग्रेसी राष्ट्रवाद और भाजपाई सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में
जरूर कई फर्क हो सकते हैं, मगर इतना तो तय है कि 1857 की
जुझारू हिंदू-मुस्लिम एकता का दोनों निषेध करते हैं. इस निषेध का
निषेध करके ही हम अपनी क्रांतिकारी राष्ट्रवादी विरासत को फि र से प्राप्त
कर सकते हैं.

समाप्त

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ 1857 और हिंदू फ़ासिस्टों के षड्यंत्र ”

  2. By Aflatoon on May 14, 2007 at 3:48 PM

    प्रणय कृष्ण का लेख ठीक है । क्या अपने उन कम्युनिस्ट विद्वानों को नही पढ़ा है जो यह कहते हैं कि १८५७ की क्रान्ति यदि सफल हो जाती तो देश का विकास अवरुद्ध हो जाता?

  3. By Priyankar on May 15, 2007 at 12:43 PM

    प्रणय कृष्ण का लेख अच्छा है पर शीर्षक अहमकाना . पता नहीं उनका दिया है कि आपका . ध्यानाकर्षण के लिए नेट पर ऐसे शीर्षक देने का रिवाज़ चल पड़ा है .

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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