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बीच सफ़हे की लड़ाई

क्यों डरती रही है भारत की सरकारें 1857 से

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/10/2007 12:30:00 AM

1857 का प्रसंग कोई निर्विवाद प्रसंग नहीं रहा है. इसे अब तक कई नज़रियों से देखा जाता रहा है. इसको लेकर इतिहासकार भी एकमत नहीं है. जो इसके समर्थक हैं उनके भी और जो इसके आलोचक हैं उनके भी पक्षों को सुना जाना चाहिए, क्योंकी उनकी अपनी साफ़ दलीलें हैं और अपने समुदायगत अनुभव-यादें. 1857 का जश्न साल भर चलेगा और हम भी साल भर तक कोशिश करेंगे इसपर लगातार बहस करने की. शुरुआत प्रणय के लेख से. प्रणय ने 1857 पर विशेष अध्ययन किया है जिसका नतीजा है यह लेख. यह पहली बार समकालीन जनमत में छपा. यहां इस लेख का शुरुआती हिस्सा भर दिया जा रहा है, ताकि पढने में सुविधा रहे. बाकी के हिस्से कल-परसों में.
भारतीय राष्ट्र की प्रसव पीड़ा

प्रणय कृष्ण

भारतीय राष्ट्र के जन्मकाल की प्रसव पीड़ा का प्रतीक था, 1857 का विद्रोह. संभवत: कार्ल मार्क्स वह पहले इनसान थे, जिन्होंने इसे भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम कहा था. दरअसल भारतीय राष्ट्र की ओर से अंगरेजों से आजादी पाने और अपने आप को राष्ट्र के रूप में गठित करने की यही पहली कोशिश थी. इससे पहले हिंदुस्तान नाम का भूखंड था, वह अनेकों बादशाह-नवाबों, राजा-महाराजाओं आदि के राज्यों में बंटा था. उस दौर में चाहे राणा प्रताप और शिवाजी जैसे हिंदू मुगल बादशाह से या हिंदू और मुसलमान सामंत आपस में ही क्यों न लड़ते हों, सभी का उद्देश्य अपनी-अपनी रियासत का बचाव करना होता था. बस उतना ही भूखंड उनका देश था या उनकी मातृभूमि थी, जिसके वे अन्नदाता कहलाते थे. अंगरेजों ने एक -एक करके इन रियासतों को अपने कब्जे में या अपनी छत्रछाया में ले लिया था.
अंगरेज किसी एक हिंदुस्तानी से लड़ते थे तो दूसरा हिंदुस्तानी सामंत उनकी मदद क रता था. जैसे 1857 के विद्रोह के बस 50-60 साल पहले जब अंगरेज टीपू सुलतान के खिलाफ लड़ रहे थे तो उन्होंने मराठों और निजाम को अपने पक्ष में कर रखा था. राष्ट्र नाम की कोई चेतना होती तो टीपू सुलतान के साथ मराठों, निजाम और दिल्ली दरबार का एक संश्रय बन गया होता और उसने अंगरेजों ही नहीं फ्रांसिसियों, डचों, पुर्तगालियों आदि तमाम उपनिवेशवादियों को हिंदुस्तान से निकाल बाहर किया होता. पिछले इतिहास में 1857 का फर्क सबसे बढ़ कर इसी बात में है कि इसके दौरान पूरब से लेक र पश्चिम तक हिंदुस्तान की आम आवाम अंगरेजों के खिलाफ इसी चेतना के साथ संघर्ष में उतरी कि वे बाहरी ताकत हैं जो हमारे देश को गुलाम बना रहे हैं. यह चेतना उन हजारों-हजार किसानों में फैली थी जो अंगरेजी उपनिवेशवाद से हथियारबंद होकर लड़े थे. यानी उसका मूल चरित्र किसान विद्रोह का था. इसे शुरू करनेवाले थे अंगरेजी सेना के भारतीय सिपाही, जो उत्तर भारत के ग्रामीण किसान पृष्ठभूमि से आते थे. इस विद्रोह का नाभिकेंद्र अवध प्रांत था. लेकिन इस विद्रोह के आगोश में समूचा हिंदी-उर्दू क्षेत्र आ गया और साथ ही इसका असर पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र, असम, झारखंड के आदिवासी अंचल तथा सुदूर दक्षिण में गोदावरी जिले तक फैला. भले ही इस विद्रोह को कोई सुसंगठित अखिल भारतीय नेतृत्व न प्राप्त रहा हो, लेकिन राजनीतिक रूप से 1857 का संग्राम भारतीय स्तर के राष्ट्रीय आंदोलन का सूचक था. यूं तो इस विद्रोह की शुरुआत मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को कलकत्ता के पास बैरकपुर छावनी में कर दी थी, किंतु इसकी विधिवत शुरुआत 10 मई, 1857 को मेरठ छावनी में हिंदुस्तानी पलटन के विद्रोह से मानी जाती है. 1857 से 1859, तीन वर्षों तक अंगरेजों के खिलाफ खुला छापामार युद्ध चला, जिसमें सैनिकों और किसानों के साथ-साथ समाज के सभी वर्गों ने यहां तक कि देशभक्त सामंतों ने भी हिस्सा लिया. झांसी में कोरी और कांछी तथा लखनऊ में सुरंगों की लड़ाई में पासियों की अदभुत वीरता से लेकर सिंहभूम और मानभूम के आदिवासियों की शौर्य की गाथाएं इतिहास में दर्ज हैं. इस विद्रोह में हजारों अनाम शहीद समाज के ऊंचे वर्गों या वर्णों से ही नहीं निचले वर्गों व वर्णों से भी थे. सिंधिया, पटियाला, नाभा, जिंद तथा कश्मीर व नेपाल जैसे गद्दार राजे-रजवाड़े के सहयोग से अंगरेजों को इस विद्रोह को कु चलने में सहायता जरूर मिली, लेकिन भारतीय राष्ट्र की नींव पड़ चुकी थी. इसलिए राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम को कुचलना अब अंगरेजों के बूते की बात नहीं रही. 1857 के विद्रोह को कुचलने के बाद भी अंगरेज उस विद्रोह को बदनाम करने, उसके महान योद्धाओं के चरित्र हनन करने तथा उसे भारतीय जनता की सामूहिक स्मृति से मिटा देने की लगातार कोशिश करते रहे. 19 वीं सदी के अंतिम भाग से लेकर 20 वीं सदी के मध्य तक जो स्वाधीनता संग्राम कांग्रेसी नेतृत्व में चला, उस पर समझौतापरस्त उद्योगपति वर्ग और मध्यमवर्गीय बौद्धिक तत्वों का दबदबा रहा. दुर्भाग्य की बात है कि उनके लिए भी 1857 शुरू से ही दु:स्वप्न बना रहा. इसी वजह से कांग्रेसी धारा किसानों, मजदूरों के संगठित क्रांतिकारी आंदोलनों तथा भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी देशभक्तों के राष्ट्रवाद से उसी तरह भयभीत रही जैसे कि अंगरेज. आजादी के आंदोलन की जो क हानी सरकारी तौर पर प्रचारित की जाती रही है, उसके अनुसार देश की आजादी अहिंसात्मक आंदोलन द्वारा प्राप्त की गयी थी. इस कहानी का सीधा सा मतलब यह है कि आजादी के आंदोलन में 1857 से लेकर भगत सिंह और नौसैनिक विद्रोह (1946) तक का कोई खास योगदान नहीं है. साम्राज्यवाद के खिलाफ सशस्त्र और सक्रिय प्रतिरोध से जन्मे किसानों व मजदूरों के तमाम आंदोलनों का कोई खास महत्व नहीं है. भारत की आजादी में अगर कहीं आम आदमी, मजदूर या किसान को जगह भी दी गयी तो महज संख्या के बतौर. बिना चेहरेवाले के गुमनाम लोगों की संख्या के बतौर. जाहिर है कि मेहनतकश जनता को न सिर्फ वर्तमान में उनके हक से वंचित कि या जा रहा है वरन अतीत में उनकी भूमिका को नकारा भी जा रहा है. आज अपनी इस शानदार विरासत का पुनरुद्धार करने और भारतीय जनता की अस्मिता के न्यायोचित गौरव को पुनर्स्थापित करने का कार्यभार इसलिए भी जरूरी हो उठा है, क्योंकि देश की सत्ता पर काबिज रही ताकतें न सिर्फ हमारे पूरे इतिहास को विकृत करने पर आमादा हैं बल्कि हमारी राष्ट्रीय भावना को, आजादी के आंदोलन के सारे मूल्यों को ही मटियामेट कर रही है. 1857 ने जिस राष्ट्रवाद का आगाज किया था, उसकी विरोधी शक्तियां आजाद भारत में सत्ता के शिखर पर पहुंच चुकी हैं. यानी पहली जंग-ए-आजादी ने नया हिंदुस्तान बनाने की जो चुनौतियां हमारे सामने उपस्थित की थीं, जो लक्ष्य निर्धारित किये थे, जो सपने देखे थे, वे आज न सिर्फ अधूरे हैं बल्कि सबसे बड़ी बाधा का सामना कर रहे हैं.

जारी

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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