हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सावधान : संघ जब सामाजिक समरसता की बात करे

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/28/2007 10:41:00 PM

यह साल गोलवलकर की जन्मशती के समापन का वर्ष है. इस अवसर पर संघ ने बडे़ कार्यक्रम किये, काफ़ी डींगें हांकी. ऐसे में उसने सामाजिक समरसता का डंका भी पीटा. इस अवसर पर झूठ के पुलंदे के रूप में एक फ़िल्म भी आयी-कर्मयोगी.

सुभाष गाताडे का यह लेख कुछ समय पहले आया था. थोडी़ देर हो गयी है पर संघ के खतरे को देखते हुए यह अब भी मौज़ूं है.
सामाजिक समरसता के संघी निहितार्थ
सुभाष गाताडे
वह साठ के दशक के उत्तरार्ध की बात है. महाराष्ट्र एक तरह के आंदोलन का प्रत्यक्षदर्शी बना था. वजह बना था `नवा काल' नामक मराठी अखबार में (एक जनवरी, 1969) राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर का छपा विवादास्पद साक्षात्कार, उसमें जिस बौद्धिक अंदाज में गोलवलकर ने मनुस्मृति को सही ठहराया था और छुआछूत पर टिकी वर्ण जाति को ईश्वरप्रदत्त घोषित किया था, वह बात लोगों को बेहद नागवार गुजरी थी.
अपने साक्षात्कार में गोलवलकर ने साफ -साफ कहा था कि ...`स्मृति ईश्वरनिर्मित है और उसमें बतायी गयी चातुर्वर्ण्य व्यवस्था भी ईश्वरनिर्मित है. किंबहुना वह ईश्वरनिर्मित होने के कारण ही उसमें तोड़-मरोड़ हो जाती है, तब भी हम चिंता नहीं करते. क्योंकि मनुष्य आज तोड़-मरोड़ करता भी है, तब जो ईश्वरनिर्मित योजना है, वह पुन:-पुन: प्रतिस्थापित होकर ही रहेगी'
अपने इस साक्षात्कार ने गोलवलकर ने जाति प्रथा की हिमायत करते हुए चंद बातें भी कही थीं, जैसे`...अपने धर्म की वर्णाश्रम व्यवस्था सहकारी पद्धति ही तो है. किंबहुना आज की भाषा में इसे गिल्ड कहा जाता है, और पहले जिसे जाति कहा गया उसका स्वरूप एक ही है... जन्म से प्राप्त होनेवाली चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में अनुचित कुछ भी नहीं है, किंतु इसमें लचीलापन रखना ही चाहिए और वैसा लचीलापन था भी. लचीलेपन से युक्त जन्म पर आधारित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था उचित ही है.'
अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस सूबे में औपनिवेशिक काल में ज्योतिबा तथा सावित्रीबाई फुले की अगुआई में `शेटजी' (सेठ-साहूकार) और भट जी (पुरोहित वर्ग) के खिलाफ प्रचंड सांस्कृतिक विद्रोह खड़ा हुआ था, जिस सूबे में 20वीं सदी में डॉ आंबेडकर जैसे उत्पीड़ितों के महान सपूत की अगुआई में विद्रोह को आगे बढ़ाया गया, वहां पर गोलवलकर के विचारों ने लोगों में किस किस्म के गुस्से को पैदा कि या होगा.
जिंदगी भर मनुस्मृति की बुनियाद पर शासन कायम करने के लिए लालायित, परंपरा और संस्कृति के नाम पर स्त्रियों को सीमित अधिकार देने के प्रस्ताव के भी विरोध, धार्मिक अल्पसंख्यकों को दोयम दरजे का नागरिक बनाने के लिए सदा प्रयासरत, संघ के इस द्वितीय सरसंघचालक का जन्मशती वर्ष है. उनके अनुयायियों ने यह तय किया है कि इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाये. साल भर चलनेवाले इन जन्मशती कार्यक्रमों की कें द्रीय विषयवस्तु `सामाजिक समरसता' तय की गयी है, जिसके तहत समूचे देश के पैमाने पर बैठकों, सेमिनारों एवं रैलियों का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें विशेष जोर दलित, आदिवासी जैसे वंचित तबकों पर है.
वे सभी जो राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के चिंतन एवं कार्यप्रणाली से परिचित हैं, वे अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह इस मुहिम के जरिये जनसाधारण के समक्ष गोलवलकर को `महान राष्ट्रनेता' ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक प्रेरणा से लैस साधु पुरुष घोषित किया जा रहा है. उनके तखल्लुस `गुरुजी' के साथ `श्री गुरुजी' जोड़ना इसी बात का परिचायक है ताकि कोई भी उनके विवादास्पद अतीत के बारे में कोई सवाल न उठा सके . कोई यह न पूछ सके कि वियतनाम पर अमेरिकी आक्रमण में किस बेशरमी के साथ गोलवलकर ने अमेरिकी आक्रांताओं की हौसलाअफ जाई की थी, कोई यह न पूछ सके कि बंटवारे के दिनों में दंगा फैलाने के आरोप में किस तरह वे पकड़े जानेवाले थे. या कोई यह न पूछ सके कि हिंदुस्तानी जनता जिन दिनों बरतानवी सामराजियों के खिलाफ व्यापक संग्राम में सन्नद्ध थी तब किस तरह गोलवलकर और उसके अनुयायी इस संग्राम से दूर संघ की शाखाओं में एकत्रित होकर अपनी कर्णकर्कश आवाज में `नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' का जाप कर रहे थे.
सोचने का प्रश्न यह उठता है कि क्या गोलवलकर की जन्मशती का यह अवसर उन सभी के लिए भी विशेष
कार्यभार उपस्थित करता है जो हिंदू राष्ट्र की उनकी परियोजनाओं से असहमत हैं या कि उनके मुखालिफ हैं और उसे देश तथा समाज की प्रगति में बाधक मानते हैं. इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि छिटपुट अखबारी टिप्पणियों या पत्रिकाओं के लेखों को छोड़ दें तो किसी भी सियासी-समाजी संगठन में, जो धर्मनिरपेक्षता की हामी भरता हो, यह प्रक्रिया नहीं चलती दिखी है कि वे इस बात को बेबाकी से समझने की कोशिश करें कि अपनी मानवद्रोही अंतर्वस्तु के बावजूद हिंदोस्तां की सरजमीन पर गोलवलकर की परियोजना की सफलता का क्या राज है. क्या यह सही नहीं कि 50 के दशक में राजनीति और समाज के हाशिये पर चला गया राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ आज की तारीख में अपने तमाम आनुषंगिक संगठनों के ताने-बाने के जरिये हिंदुस्तान की सियासत और समाज में एक ऐसी स्थिति में पहुंचा है जहां से उसे आसानी से हटाया नहीं जा सकता.





देखें गुजरात में संघी उत्पात. यह फ़िल्म गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार की योजनाओं और उसके फ़ायदों पर है. राकेश शर्मा की फ़ाइनल साल्युशन.

एक बात जो इस संदर्भ में ध्यान रखी जानी चाहिए कि 2004 के आम चुनावों में भले ही भाजपा को शिकस्त मिली हो या खुद हिंदुत्व बिग्रेड की मुहिम फिलवक्त संकट के दौर से गुजर रही हो, लेकिन यह कहना उचित नहीं होगा कि यहां हिंदुत्व के प्रकल्प के अमली शक्ल धारण क रने की स्थिति फिर उभर नहीं सकती. कई सूबों में अपने बलबूते तथा चंद सूबों में अन्य पार्टियों के साथ हिंदुत्व के फलसफे को माननेवाले हुकूमत कर रहे हैं. जहां पर वे बिना कि सी डर-भय के अपनी इस परियोजना पर अमल कर रहे हैं. राजस्थान हो, झारखंड हो या गुजरात हो या मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ हो, ये ऐसे प्रांत हैं जहां अपने-अपने तरीकों से हिंदुत्व की `प्रयोगशालाओं' के बनने का काम जोरों पर हैं. यह भी साफ तौर पर देखने में आ रहा है कि कें द्र में सहयोगियों के साथ सत्तासीन कांग्रेस सरकार धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपने समझौतापरस्त रवैये से या अपने क ई `नरम हिंदुवादी' क दमों से संघ-भाजपा परिवार को नया `स्पेस' प्रदान क रती दिख रही है. कांग्रेस से नाराज चल रहे चंद राजनीतिक दल जो इन दिनों भले ही कें द्र सरकार को समर्थन दे रहे हैं, अपने सियासी कारणों से भाजपा से पींगे बढ़ाते दिख रहे हैं, ऐसे समय में इस प्रकल्प के अहम सिद्धांतकार के महिमामंडन का जो सिलसिला जन्मशती पर चलेगा उसके बारे में खामोश कै से रहा जा सक ता है?
दूसरा मसला है हिंदुत्व की सामाजिक जड़ों की तलाश का, अर्थात अपने समाज के समाजशास्त्रीय अध्ययन का. अपनी आंखों के सामने ही हम इसी समाज के पढ़े-लिखे तबके के एक हिस्से को पाला बदलते तथा हिंदुत्व की परियोजना के साथ जुड़ते देख सकते हैं. बाबरी मसजिद के विध्वंस का आंदोलन हो, भाजपा द्वारा कें द्र में छह सालवाली हुकूमत हो या गुजरात के जनसंहार जैसी त्रासदी हो, इन सभी मामलों में हिंदू जनमत का एक अच्छा-खासा हिस्सा संघ की अगुआई में जारी `सोशल इंजीनियरिंग' के विशिष्ट प्रयोगों में शामिल होता दिखा है. इस पृष्ठभूमि में यह विचारणीय प्रश्न बन जाता है कि आखिर घृणा तथा द्वेष पर आधारित परियोजना में आम कहलानेवाले लोगों का एक हिस्सा क्यों साथ खड़ा होता है, या होता आया है. हमारी सभ्यता, संस्कृति के वे कौन से तत्व हैं जो हिंदुत्व के प्रचार-प्रसार के लिए मुफीद रहे हैं?
तीसरा मसला है कि लंबे समय तक हाशिये पर रह कर धीरे-धीरे अपने विचारों की स्वीकार्यता कायम करने में इस दक्षिणपंथी परियोजना को जो सफलता मिली उससे इस देश की सेक्युलर-जनतांत्रिक तथा वामपंथी ताकतें संगठन निर्माण के क्षेत्र में किस तरह का सबक ग्रहण कर सकती हैं. अर्थात क्या यह सही नहीं कि बरतानवी हुक्मरानों के खिलाफ संघर्ष से बनायी दूरी तथा गांधी हत्या के मामले में अपनी विवादास्पद भूमिका से संदेह के घेरे में रहते आये संघ ने 50 के दशक में शिक्षा से लेकर समाज के विभिन्न क्षेत्रों के संगठन निर्माण का जो उपक्रम शुरू कि या, उसने उसे अपने विस्तार में मदद पहुंचायी.
चौथा मसला फासीवाद के भविष्य से जुड़ा है. इसके लिए दूरगामी किस्म के अध्ययन की जरूरत पड़ेगी, ताकि जाना जा सके कि 21वीं सदी की इन पैड़ियों पर फासीवाद किन-किन रास्तों से आ सकता है तथा अपने मुल्क में उसकी क्या-क्या खासियतें हो सकती हैं? भारत जैसे तीसरी दुनिया के विशाल मुल्क में, जहां लोकतांत्रिक प्रणाली की जड़ें गहरी हो चुकी हैं, वहां पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए क्या वह चुनावों का रास्ता अख्तियार कर सकता है? प्रो एजाज अहमद का वक्तव्य हमें नहीं भूलना चाहिए कि हर देश को वैसा ही फासीवाद मिलता है जिसके लिए वह तैयार होता है.
हिंदोस्तां की सरजमीन पर गोलवलकरी परियोजना की `सफलता' जहां जनतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता के लिए चंद सवाल खड़े करती है, वहीं इस जन्मशती की तैयारियों में गोलवलकर को लेकर संघ परिवार में मौजूद दुविधा को भी देखा जा सकता है. साफ कर दें कि यह दुविधा गोलवलकरी प्रोजेक्ट की मानवद्रोही अंतर्वस्तु को लेक र नहीं है, वह उसके बाह्य रूप अर्थात `पैकेजिंग' को लेकर है. 21वीं सदी की इस बेला में अपने यूनिफार्म `लंबी मोहरीवाली खाकी निक्कर और सफेद शर्ट' पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर संघ के अगुआ इस बात को भी ठीक से समझते हैं कि जिस निर्लज्जता के साथ गोलवलकर ने नाजी प्रयोगों की प्रशंसा की थी, वह बात अब किसी को पचनेवाली नहीं है. 1938 में गोलवलकर द्वारा रचित `वी आर अवर नेशनहुड डिफाइंड' किताब के रचयिता का सेहरा किन्हीं बाबा राव सावरकर के माथे बांधने के प्रसंग में हम संघ की इसी कवायद को देख सकते हैं.
भले हिंदू एकता कायम क रने के सवाल पर गोलवलकर के बाद आनेवाले लोगों ने एक वैकल्पिक रास्ते का प्रयोग किया हो, लेकिन इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता कि अपने चिंतन, विश्वदृष्टिकोण के धरातल पर संघ के मौजूदा नेता गोलवलकर से किसी मायने में अलग हैं. गुजरात-2002 के प्रायोजित जनसंहार में हम इसकी झलक देख चुके हैं. दलित स्त्रियों, शूद्रों, अतिशूद्रों को अपने साथ जोड़ने में वे भले ही गोलवलकर से आगे निकल गये हों, लेकि न उनकी अपनी परियोजना में इन तबकों के वास्तविक सशक्तीकरण का कोई कार्यक्रम नहीं है. ये सभी उत्पीड़ित तबके उनकी निगाह में हिंदू राष्ट्र के `दुश्मनों' के खिलाफ लड़ने में प्यादे मात्र हैं.
यह अकारण नहीं कि गोलवलकर के जन्मशती कार्यक्रमों के कें द्रीय नारे के तौर पर `सामाजिक समरसता' को उन्होंने तय किया है, ताकि इसी बहाने गोलवलक र की मानवद्रोही परियोजना को नयी वैधता प्रदान की जा सके , जिसको साकार करने के लिए सभी प्रतिबद्ध हैं.
सुभाष गाताडे के एक लंबे लेख के प्रमुख अंश.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ सावधान : संघ जब सामाजिक समरसता की बात करे ”

  2. By Vikalp on April 29, 2007 at 6:49 AM

    रेयाज भाई,
    आपका हाि‍श्‍या ि‍नरंतर बेहतर होता जा रहा है । सुभाष्‍ जी का यह लेख्‍ अच्‍छा लगा


    .प्रमोद रंजन

  3. By akbnat\ on August 4, 2010 at 2:09 AM

    gujrat tango ko dekhakar aiea laga jise hum bhi bhi binavajaha ladrahe hain. Modi aur islamic kattervadi ( bhadve) hum bharatvasiyonko lada rahe hain. ye sab roka ja sakta hain. Modi jaayesi harami aur muslim kateerrvadi haevanko haatana hoga tabhi. hum surakshit ra sakte hain.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें