हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

शासक के लिए

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/07/2007 02:38:00 AM

10 नवंबर, 1954 को जन्मे जय गोस्वामी प्रसिद्ध बांग्ला कवि हैं. उनके राजनीतिक पिता ने उन्हें साहित्य के प्रति उत्साहित किया. लघु पत्रिकाऒं में छपने के बाद अंतत: वे बांग्ला की प्रतिष्ठित पत्रिका देश में छपने लगे. उनका पहला कविता संग्रह आय़ा- क्रिसमस ऒ शीतेर सोनेटगुच्छ. उन्होंने 1989 में अपनी किताब घुमियेछो झौपता पर प्रतिष्ठित आनंद पुरस्कार पाया. 2000 में पगली तोमारा संगे पर उन्हें साहित्य अकादेमी सम्मान मिला. जय ने केवल लेखन तक ही अपने को सीमित नहीं किया. वे लगातार जनता के संघर्षों के साथ जुडे़ रहे, उसकी आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहे. अभी हाल ही में जब नंदीग्राम में किसानों का निर्मम नरसंहार हुआ तो जय अपनी कविताओं के साथ सड़कों पर आ गये. हम यहां हिंदी के उन लिजलिजे कवियों-लेखकों को, दुर्भाग्य से, याद कर सकते हैं जो अपने लेखेन में तो दुनिया के रोज बदलने की बात कहते हैं, पर जनता के किसी संघर्ष में कभी हिस्सा लेना तो दूर, उसकी आवाज़ में अपनी आवाज़ तक नहीं मिलाते. और जब उनसे कहा जाता है कि आप नंदीग्राम पर क्या कहते हैं तो वे कहते हैं कि वे राजनाथ सिंह का साथ नहीं दे सकते इसलिए नंदीग्राम हत्याकांड की निंदा भी नहीं कर सकते. आप ध्यान दें कि राजनाथ सिंह की आड़ लेकर वे किसके पक्ष में खडे होना चाहते हैं. हिंदी में ऐसे लिजलिजे विद्वान भरे पडे़ हैं. वे जनता की परवाह नहीं करते, यही वज़ह है कि जनता उनकी परवाह नहीं करती.
यहां प्रस्तुत कविताएं
जय गोस्वामी ने नंदीग्राम की इस घटना के विरोध में हुई एक सभा में पढी़ थीं. यहां इन मूल बांग्ला कविताओं का हिंदी अनुवाद दिया जा रहा है. अनुवाद किया है बांग्ला कवि, कथाकार और बिहार बांग्ला अकादेमी के निदेशक विश्वजीत सेन ने. जय की और कविताएं (अंगरेज़ी में) पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. ये कविताएं जन विकल्प के अप्रैल अंक में छपी हैं. वहां से साभार. बहुत जल्द नंदीग्राम पर कुछ और बांग्ला कविताओं का हिंदी अनुवाद हम लेकर आयेंगे.

शासक के
लिए

जय गोस्वामी
आप जो कहेंगे-मैं वही करूंगा
वही सुनुंगा, वही खाऊंगा
उसी को पहन कर खेत पर जाऊंगा
मैं अपनी ज़मीन छोड़ कर चला जाऊंगा
एक शब्द नहीं बोलूंगा.

आप कहेंगे
गले में रस्सी डाल कर
झूलते रहो सारी रात
वही करूंगा
केवल
अगले दिन
जब आप कहेंगे
अब उतर आओ
तब लोगों की ज़रूरत पड़ेगी
मुझे उतारने के लिए
मैं खुद उतर नहीं पाऊंगा

सिर्फ़ इतना भर मैं नहीं कर पाऊंगा
इसके लिए आप मुझे
दोषी न समझें.


स्वेच्छा से

उन्होंने ज़मीन दी है स्वेच्छा से
उन्होंने घर छोडा़ है स्वेच्छा से
लाठी के नीचे उन्होंने
बिछा दी है अपनी पीठ.

क्यों तुम्हें यह सारा कुछ
दिखायी नहीं देता?

देख रहा हूं, सब कुछ देख रहा हूं
स्वेच्छा से
मैं देखने को बाध्य हूं
स्वेच्छा से
कि मानवाधिकार की लाशें
बाढ़ के पानी में दहती जा रही हैं

राजा के हुक्म से हथकडी़ लग चुकी है
लोकतंत्र को
उसके शरीर से टपक रहा है खून
प्रहरी उसे चला कर ले जा रहे हैं
श्मशान की ओर

हम सब खडे़ हैं मुख्य सड़क पर
देख रहा हूं केवल
देख रहा हूं
स्वेच्छा से.


हाजिरी बही

पहले छीन लो मेरा खेत
फिर मुझसे मज़दूरी कराओ

मेरी जितनी भर आज़ादी थी
उसे तोड़वा दो लठैतों से
फिर उसे
कारखाने की सीमेंट और बालू में
सनवा दो

उसके बाद
सालों साल
मसनद रोशन कर
डंडा संभाले बैठे रहो.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ शासक के लिए ”

  2. By अनूप शुक्ला on April 7, 2007 at 10:42 AM

    ये कवितायें पढ़वाने के लिये शुक्रिया!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें