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भगत सिंह की याद और सीपीएम के गुंडे : पटना प्रसंग

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/24/2007 01:13:00 AM

रेयाज़-उल-हक़
आज भगत सिंह जन्मशताब्दी आयोजन समिति, पटना ने भगत सिंह के शहादत दिवस पर एक कार्यक्रम किया. गया तो था कि भगत सिंह पर शायद कुछ सार्थक मिलेगा, मगर जो सामने आया वह था सीपीएम की गुंडई. कार्यक्रम के दौरान संचालक ( जो सीपीएम से जुडे़ हुए हैं) ने एआइडीएसओ के एक वक्ता को बुलाया, जो समिति का घटक है. उसने बोलते हुए नंदीग्राम और सिंगुर में हुई किसानों की हत्याऒं और पुलिसिया कार्रवाई का ज़िक्र बिना सीपीएम का नाम लिये किया. उसका नंदीग्राम का ज़िक्र करना था कि वहीं बैठे सीपीएम के लोगों ने चीख-पुकार मचानी शुरू कर दी. कुछ दौड़ते हुए आये और लगभग गाली-गलौज करते हुए वक्ता से माइक छीन लिया, उसके साथ धक्कामुक्की की और अनधिकृत रूप से बोलने लगे. उनकी भाषा यह थी-ममता के दलालों को बोलने नहीं दिया जायेगा, ज़मींदारों को बोलने नहीं दिया जायेगा.
लोगों ने बीच बचाव किया और उसके बाद संचालक ने प्रो नवल किशोर चौधरी को बुलाया. मगर उनके हाथ‍ से माइक छीन कर फिर सीपीएम के उन्हीं लोगों ने गालीगलौज शुरू कर दी और भाषण देना शुरू कर दिया. जब यह सब हो रह था, आयोजन समिति चुपचाप थी.

आखिरकार उस वक्ता को फिर नहीं बोलने दिया गया. इस मांग पर कि समिति की ओर से संचालक इस तरह अनधिकृत लोगों द्वारा माइक छीने जाने की निंदा करें, संचालक ने इनकार कर दिया. यही नहीं वे बार-बार जाकर उन गुंडों से गलबांही डाल कर बतियाते रहे और मुदित होते रहे.
और इसके बाद भगत सिंह पर ज़ोरदार नारे लगे, गीत गाये गये. प्रहसन समाप्त हुआ.

पर बात समाप्त नहीं हुई. पहली बात तो यह कि क्या किसी को इसका अधिकार नहीं कि वह अपनी बात रखे? अगर वक्ता ने सीपीएम का नाम लिया होता तो बात समझ में आनेवाली थी (हालांकि तब भी माइक छीन लेना और बोलने न देना, कहीं से भी उचित न था), मगर इसके बगैर ही सीपीएम के गुंडों का इस तरह बौखला जाना क्या यह नहीं दिखाता कि वे किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं? वे कितने अलगाव में हैं और खुद को कितना घिरा हुआ पाते हैं. यह तो पूरी तरह शासकवर्गीय चरित्र है, किसी को बोलने न देना और उसकी जगह खुद शोर मचाने लग जाना ताकि समांतर आवाज़ दब जाये.
अरुण मिश्रा आदि माकपाई गुंडों ने जो किया वह तो कडी़ भर्त्सना का विषय है ही, आयोजन समिति के ऊपर भी इसने कुछ सवालिया निशान लगाये हैं. अगर समिति द्वारा अधिक्रित तौर पर बुलाये गयी एक वक्ता से माइक छीन लिया जाता है, और माइक छीननेवाले अनधिकृत लोग अगर खुद बोलने लग जाते हैं और अगले वक्ता के साथ भी यही होता है तो समिति और संचालक की क्या जिम्मेवारी बनती है? वह इस व्यवहार की निंदा करे. मगर यहां तो माइक छीन लिये जाने में संचालक का छुपा हुआ हाथ दिख रहा था. कायदे से होना चाहिये था कि फिर से वक्ता को बोलने दिया जाता और अगर किसी को विरोध जताना था तो वह बाद में आता. मगर ऐसा नहीं हुआ.
और समिति ने क्या कहा? इससे जुडे़ लोगों का कहना था कि वक्ता ने अपना नाम कुछ समय पहले ही दिया, जबकि उनसे काफ़ी पहले से कहा जा रहा था? मगर आखिर यह कह कर समिति साबित क्या करना चाह्ती है? क्या यह कि माइक छीन लिया जाना सही था?
और ममता की दलाली? हमारे माननीय माकपाई बंधु क्या बतायेंगे कि उन्होंने नंदीग्राम में जिन 160 लोगों को मारा है और जिन 800 लोगों को 'गायब' कर दिया है, वह किनकी दलाली में किया? क्या वे अमेरिकी कंपनियों और एमएनसीज की दलाली में ही अपने लोगों पर गोलियां नहीं चला रहे हैं?
समिति पर इससे पहले भी कई आरोप लगते रहे हैं. इसने गत सात-आठ महीनों में जितने बैनर-पोस्टर बनवाये उनमें भगत सिंह के उद्धरणों को इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है कि वे भगत सिंह की एक अलग ही और विकृत छवि पेश करते हैं. इस पर पूछने पर समिति के लोग बराबर कहते रहे कि ये बैनर-पोस्टर गलती से बन गये. मगर उनका बराबर इस्तेमाल होता रहा. वे कभी बदले नहीं गये.
और आलोकधन्वा ने आज शाम इसी कार्यक्रम के उद्घाटन में इसी समिति के गठन को बिहार के पिछले एक दशक के इतिहास में सबसे बडी़ घटना बताया.
तो दोस्तों क्या यह सब यूं ही चलता रहेगा? क्या कोई कुछ नहीं बोलेगा? किसी को कुछ नहीं बोलने दिया जायेगा? और वह भी भगत सिंह के शहादत दिवस पर?
क्या इससे बडा़ दुखद संयोग और क्या होगा? बांग्ला कवि विश्वजीत सेन कहते है- यह तो भगत सिंह की विरासत पर कलंक है. भगत सिंह की याद में सभा हो और इस तरह का व्यवहार हो...

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ भगत सिंह की याद और सीपीएम के गुंडे : पटना प्रसंग ”

  2. By Rohit on March 30, 2007 at 12:03 AM

    it's shameful act done by the cpm's lumpens.i strongly condemn this.this was the attack on freedom of expression and minimum democratic values.it's dispointing that no strong protest was made neither,by the eminent people who were sitting there nor bhagat singh janmshatabdi aayojan samiti,it shows their undemocratic behaviour.you wrote a statement of vishwajit sen,he was there what was he doing when this incident took place?

  3. By Rohit on March 30, 2007 at 12:03 AM

    it's shameful act done by the cpm's lumpens.i strongly condemn this.this was the attack on freedom of expression and minimum democratic values.it's dispointing that no strong protest was made neither,by the eminent people who were sitting there nor bhagat singh janmshatabdi aayojan samiti,it shows their undemocratic behaviour.you wrote a statement of vishwajit sen,he was there what was he doing when this incident took place?

  4. By Rohit on March 30, 2007 at 12:04 AM

    it's shameful act done by the cpm's lumpens.i strongly condemn this.this was the attack on freedom of expression and minimum democratic values.it's dispointing that no strong protest was made neither,by the eminent people who were sitting there nor bhagat singh janmshatabdi aayojan samiti,it shows their undemocratic behaviour.you wrote a statement of vishwajit sen,he was there what was he doing when this incident took place?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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