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बीच सफ़हे की लड़ाई

एक कवि जिहादी की अंतिम दिनलिपि

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/19/2007 11:08:00 PM


केन सारो वीवा का परिचय पाठक उनकी कविताओं के साथ जान चुके हैं. यहां उनकी गिरफ़्तारी और अंतिम जेल प्रवास का बयान उन्हीं की जुबानी, किस्तों में, दिया जा रहा है. आज पढ़िए पहली किस्त.
अचानक चीख मार कर मेरी कार रुक गयी. चौंक कर मैंने अपना सिर उठाया. मेरे सामने हथियारबंद एक सैनिक था, जिसके संकेत ने कार को रोक दिया, उसकी राइफल मेरे शोफ़र के सिर को निशाना बनाये हुए थी. तभी, उसी तरह अचानक सादे लिबास में और कई सुरक्षाकर्मी कार के पीछे के दरवाज़े की ओर बढ़े और घुमा कर उसे जोरदार ढंग से खोला व मुझे उतरने के लिए कहा. ऐसा करने को मैंने अस्वीकार किया. उन्होंने और रूखे स्वर में कहा, मगर मैं अडिग रहा. फिर उन्होंने मेरे शोफ़र को अवैध रूप से यु-टर्न लेने का आदेश दिया. उसने वैसा ही किया. हम लोगों की कार के पीछे सुरक्षाकर्मियों से खचाखच भरी हुई सुरक्षाबलों की एक कार थी.
यह 1993 के 21 जून की बात है. हम लोग पोर्ट हारकोर्ट के एक चौराहे पर, आबा शहर को उत्तर से जोड़नेवाली बहुत ही व्यस्त एक्सप्रेस-वे के समान रूप से व्यस्त जंकशन पर थे. यह नाटक सफ़र कर रहे लोगों के सामने घटा और मैं कल्पना कर सकता हूं कि बहुतों ने अंदाज़ा भी लगा लिया कि मैं गिरफ़्तार हो चुका हूं. इसके बारे में मैं तो निश्चिंत था. तीन महीने में यह मेरी चौथी गिरफ़्तारी थी. मेरे मन में कोई शक नहीं था कि हम कहां जा रहे हैं : असंबद्ध टुकडे़-टुकडे़ में बनी राज्य सुरक्षा सेवा(एसएसएस) के दफ़्तर में जा रहे हैं. जैसा कि नाइजीरिया में कहा जाता है, मैं वहां का पुराना ग्राहक हूं. मैं खुद-ब-खुद हंसा.
दीवारों से घिरे डरावने एसएसएस के अहाते में जब हम पहुंचे, वहां काफ़ी सरगर्मी थी. मुझे गिरफ़्तार करनेवालों में जो वरिष्ठतम अफ़सर थे, वे जर्जर सीढ़ियों से ऊपर-नीचे भागदौड़ कर रहे थे. मैं क्या कर रहा हूं, उसके बारे में किसी को ज्यादा फ़िक्र नहीं थी. इससे पहले जब भी मैं आया तो युवा सुरक्षा एजेंटों से मैं हंसी-मज़ाक किया करता था. इस बार आसपास के माहौल से मैंने मह्सूस किया कि मामला काफ़ी गंभीर हो गया है और ऐसी स्थिति में वहां मज़ाक की कोई गुंजाइश नहीं है. क्यारी की हुई लान से घिरी हुई इमारत, जो कभी बहुत ही खूबसूरत जगह थी, अब गिरती हालत में और गंदगी से भरी हुई है-आज वहां अशुभ हवा बह रही है.
थोडी़ देर बाद अफ़सर, जो ऊपर गया था, काग़ज़ का एक टुकड़ा नचाते हुए लौटा. इंतज़ार कर रही कारों में से एक की पिछली सीट पर अगल-बगल मुस्कानरहित दो रूखे सुरक्षकर्मियों की निगरानी में मुझे ले जाने का आदेश हुआ. एसएसएस के अहाते से हम बाहर चल पड़े. दस मिनट में हम केंद्रीय थाने में पहुंच गये. इस जगह से मैं अपरिचित नहीं था. नाइजीरियाई पुलिस बल का यह राज्य मुख्यालय रहा, मगर जब बल के नये दफ़्तर की इमारत बन गयी, तो यह राज्य गुप्तचर तथा खोज ब्यूरो को सौंप दिया गया. नाइजीरिया की जन-संपत्ति की यह जीर्ण दशा आम है.
एक छोटी-सी कोठरी में, कुछ जांच करनेवाले पुलिस अधिकारियों के लिए जो दफ़्तर के तौर पर इस्तेमाल होती होती है, मुझे ले जाया गया, और लकडी़ की बेंच पर बैठने के लिए कहा गया. वहां बैठे-बैठे में पाइप का तना चबा रहा था, जबकि जांच करनेवाले अधिकारियों में से एक ने, जो अभियुक्त का बयान लिख रहा था, अविश्वाश भरी निगाह से मेरी ओर देखा. वह शायद स्तंभित हुआ था. पिछले दिनों मैं बहुत अधिक खबरों में था, और अक्सर ऐसे लोगों की, जिनकी वह बदकिस्मती होती है, वे अक्सर खून-मांस के एक जीवित व्यक्ति के बजाय एक न्यूज़ आइटम माने जाते हैं. मेरी हालत देख मेरे उपरोक्त मित्र अचंभे में पड़ गये. उनकी घबराहट को मैंने समझा और मुस्कुराया.
अगले 15 मिनट में मेरे सामने एक फ़ार्म बढा़ दिया गया और 12 जून, 1993 को चुनाव के दिन की मेरी गतिविधि पर एक बयान लिखने के लिए कहा गया.
पढ़िए बाकी हिस्सा कल...

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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