is kavita ko padte hue ajib sa mahsush hotai. Alag alag mouton ke liye alag-alag "Moun"..Kya yah aapko uchit lagta hai? america ho ya koi garib desh,Aam aadmi ki mout par mai isa vibhed nahi kar sakta. Yah mughe Pratikryabad lagta hai. Pratikiryabad sif takatwaro ka hi nahi hare huon ka bhi ho hai.
गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?
किसने हमारे कुंओं में कैरोसिन तेल डाला?... नये जमींदार ने। किसने चावल में जहर भरी दवाई मिला दी? ... नये जमींदार ने। किसने हमें हमारी जमीन से उजाड़ा?... नये जमींदार ने। पुलिस किसकी है.? नये जमींदार की। सेना किसके लिये है?... नये जमींदार के लिये। तो अब लड़ाई किससे है ?.. नये जमींदार से। यह नारे लालगढ के हैं । 16 जून को लालगढ़ टाउन के बीच मैदान में करीब छह सौ गांव के पन्द्रह हजार से ज्यादा लोग जमा हुये तो मंच से यही नारे लग रहे थे। मंच से आवाज आती... नये जमींदार पर निशाना है और हजारो की तादाद में जमा लोग इस आवाज को आगे बढाते हुये कहते.... या खुद निशाना बन जाना है। वाममोर्चा के तीस साल के शासन में पहली बार माओवादियो का रुख वामपंथियो के खिलाफ ठीक उसी तरह है, जैसे चालीस साल पहले कांग्रेस के खिलाफ वामपंथियो ने हथियार उठाकर कांग्रेस को जमींदार और फासिस्ट करार दिया था। वहीं चालीस साल बाद अब संघर्ष से निकल कर सत्ता में पहुची सीपीएम को फासिस्ट और जमींदार का तमगा माओवादी दे रहे है। पश्चिम बंगाल में वाम राजनीति का चक्का एक सौ अस्सी डिग्री में किस तरह घूम चुका है, इसका अंदाजा सीपीआई माओवादी की सीधी पहल से समझा जा सकता है। 16 जून को लालगढ़ टाउन के मैदान की सभा को संबोधित करने और कोई नहीं, उसी आंदोलन से निकले नेता पहुंचे थे, जिन्होंने साठ के दशक में नक्सलबाडी में हथियार उठाकर कांग्रेस के शासन के खिलाफ बिगुल फूंका था । और आंदोलन की आग उस वक्त इतनी तेज हुई थी कि सीपीआई में दो फाड़ हो गया था। और तीन साल बाद यानी 1967 में ही पहली बार गैर कांग्रेसी संयुक्त मोर्चा सरकार बनी, जिसमें ज्योति बसु उप-मुख्यमंत्री थे। लेकिन साठ के दशक में नक्सलबाडी की आग ने वामपंथियो को यह सीख जरुर दे दी की बंगाल की जमीन वामपंथियो के भटकाव को भी बर्दाश्त नहीं करेगी। -पुण्य प्रसून बाजपेयी
1 टिप्पणियां: Responses to “ एक मिनट का मौन ”
By Vikalp on February 13, 2007 9:21 PM
is kavita ko padte hue ajib sa mahsush hotai.
Alag alag mouton ke liye alag-alag "Moun"..Kya yah aapko uchit lagta hai?
america ho ya koi garib desh,Aam aadmi ki mout par mai isa vibhed nahi kar sakta.
Yah mughe Pratikryabad lagta hai. Pratikiryabad sif takatwaro ka hi nahi hare huon ka bhi ho hai.