हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

होना एक कवि

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/16/2007 06:54:00 PM

रेयाज़-उल-हक

मैंने कभी नहीं चाहा
एक कवि होना
जिसके बारे में लोग कहें
कि उसने लिखीं अनुपम कविताएं

मैंने चाहा है होना
दुश्मन की घात में छिपी
जनता की देह पर वरदी
उसके हाथों में बंदूक
जेब में कारतूस
होठों पर के गीत

किसान,
मज़दूर,
खेतिहर, चरवाहे, बढ़ई, कुम्हार, गड़रिये
कहें मेरे बारे में
कि उसने हमारे गीत गाये
उसने हमारी भूख को
और हमारे आंसुओं को शब्द दिये
मुखर की हमारी पीडा़
उसने नहीं बताया सिर्फ़ मरहम
वह लडा़
हमारी कतारों में
और उसका खून भी बहा
हमारे साथ
और हमने युद्धभूमि में
उसकी कविताएं सुनीं
बंदूकों की गरज के बीच

युद्ध के मैदान में मेरे शब्द
संगीनों की तरह चमकें
और पहचानें दुश्मन के
मोरचे लगे दिलों को
गोलियों की तरह

मैं चाहता हूं
कि लोग मेरे बारे में इस तरह सोचें
जैसे सोचता है
युद्ध के मैदान में एक सिपाही
दूसरे के बारे में

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ होना एक कवि ”

  2. By anu on February 20, 2007 at 4:57 PM

    bahut achhi kaita hai yaar reyaz. mujhe aaj ki date me sabse jyada pareshan karne wala sawal hai yah ki main kavi kyun banoon? ya fir lekhan se kya hoga?

    ek baar bahut achii kavitaon ke liye badhai.
    aur ek suggestion bhi ki
    jaldi hi in kawitaon ko kisi magazine me chhapne ke liye bhejo taki hindi ka asali pathak varg ise padhkar uska mulyankan apne tareeke se kar sake.
    any kavitayen bhi achhi lagi lekin...............
    sabse achhi yahi lagi.

    anil

  3. By lenin on August 18, 2010 at 4:33 PM

    aap aise hi kabi hoyen.aap ki kabitayen padh raha huin.apna ghao jaisa lagata hai kabhi surkh to kabhi hara.

    lenin kumar
    bhubaneswar

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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