हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सामाजिक वर्गों की पैदाइश और दूसरी कहानियां

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/16/2015 12:15:00 AM


 उरुग्वे में जन्मे और दुनिया भर में जन पक्षधर लेखक-पत्रकार के रूप में मशहूर एदुआर्दो गालेआनो के निधन के बाद उनके लेखन और जीवन के बारे में बहुत कुछ लिखा और पढ़ा जा रहा है. साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों में उनके जाने से एक तरह की उदासी है और कुछ देर की खामोशी, कि एक आवाज जो झूठ और फरेब के मलबे के बीच फावड़े की तरह अपना रास्ता बनाती थी और परचम की तरह गरदन ताने दुनिया का सफर करती थी, अब चुप हो गई. हालांकि उनके शब्द मौजूद हैं, और उन्हीं में से एक इंतखाब यहां पेश है. उनकी किताब एस्पेखोस: उना इस्तोरिया कासी उनिवेर्साल (आईने: करीब करीब हरेक की कहानी) से कुछ अध्याय. स्पेनिश से अनुवाद: रेयाज उल हक.

सामाजिक वर्गों की पैदाइश

शुरुआती दिनों में, भूख के उन दिनों में, पहली औरत मिट्टी कुरेद रही थी कि सूरज की किरनें  पीछे से आकर उसके भीतर दाखिल हो गईं. पल भर में ही, एक बच्चे का जन्म हुआ.

पचाकमाक देवता को सूरज की यह हरकत बिल्कुल पसंद नहीं आई और उसने अभी अभी पैदा हुए बच्चे के टुकड़े टुकड़े कर दिए. उस मरे हुए बच्चे में से पहले पौधे फूटे. दांतों से अनाज के दाने बने, हड्डियां युका बनीं, मांस आलू, यैम और स्क्वैश में तब्दील हुआ...

फिर तो सूरज को बहुत तेज गुस्सा आया. उसकी किरनों ने पेरु के तट को जला डाला और उसे हमेशा के लिए सूखा बना दिया. बदले की आखिरी हरकत के बतौर उसने मिट्टी में तीन अंडे फोड़े.

सुनहरे अंडे से मालिक पैदा हुए.
रुपहले अंडे से मालिकों की औरतें पैदा हुईं.
और तांबे के अंडे से वे पैदा हुए, जो मेहनत करते हैं.

गुलाम और मालिक

काकाओ को सूरज की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उसके पास अपना सूरज था.

उसकी भीतरी चमक से चॉकलेट का मजा और उससे मिलने वाली खुशी बनती थी.

बुलंदी पर रहनेवाले देवताओं ने गाढ़े रोगन पर कब्जा कर लिया और हम इंसान नादानी में रहने के लिए मजबूर कर दिए गए.

केत्जालकोआत्ल ने उसे तोल्तेक्स के लिए चुरा लिया. जब बाकी के देवता सो रहे थे, उसने कुछ बीज लिए और उन्हें अपनी दाढ़ी में छुपा लिया. फिर वो मकड़ी के जाल के एक बड़े से धागे से सहारे धरती पर उतरा और उन बीजों को उसने तुला शर में पेश किया.

केत्जालकोआत्ल के तोहफे को शहजादों, पुजारियों और जंगी सरदारों ने हड़प लिया.

उनकी पसंद को ही पसंद के लायक समझा गया.

और चूंकि जन्नत के मालिकों ने फानी इंसानों के लिए चॉकलेट को हराम ठहराया था, इसलिए धरती के मालिकों ने इसे आम इंसानों के लिए हराम बना दिया.

एक खतरनाक हथियार

तीस से ज्यादा देशों में रिवाज यह है कि (औरतों के यौनांग) क्लिटोरिस को काट कर हटा दिया जाए.

यह खतना पति को अपनी औरत या अपनी औरतों को अपनी जायदाद मानने के अधिकार की तस्दीक करता है.

औरतों का अंग काटने वाले यह कह कर इस जुर्म को जायज ठहराते हैं कि वे औरतों के मजे को पाक बना रहे हैं और वे बताते हैं कि क्लिटोरिस
 
एक जहरीला तीर है
बिच्छू का एक डंक है
दीमकों का खोता है
यह मर्दों को मार डालता है या उन्हें बीमार बनाता है
औरतों को उकसाता है
उनके दूध में जहर घोलता है
और उनकी प्यास को बुझने नहीं देता
और उन्हें पागल बना देता है

 
वे अपनी इस हरकत को जायज ठहराने के लिए पैगंबर मुहम्मद का हवाला देते हैं, जिन्होंने कभी इस मामले में कुछ नहीं कहा. वे कुरान का भी हवाला देते हैं, जबकि उसमें भी इसका कोई जिक्र तक नहीं है.

शैतान गरीब है

आज शहर एक बहुत बड़ी जेल हैं, जिसमें खौफ के कैदी रहते हैं, जहां मोर्चेबंदियों को घरों की शक्ल दी गई है और कपड़े बख्तरों की शक्लें हैं.

एक घेरेबंदी. अपना ध्यान भटकने मत दो, अपनी चौकसी को कभी ढीला मत पड़ने दो, कभी भरोसा मत करो, इस दुनिया के मालिक यह कहते हैं. बेधड़क मालिक जो आबोहवा से बलात्कार करते हैं, देशों को अगवा करते हैं, मजदूरियां छीन लेते हैं और सामूहिक जनसंहार करते हैं. वे चेतावनी देते हैं, खबरदार, बुरे लोग भरे पड़े हैं, बदनसीब झुग्गियों में ठसमठस, अपनी अदावत को अपने भीतर सुलगाते हुए, अपने जख्मों को बेकरारी से कुरदते हुए.

गरीब: हर तरह की गुलामी के लिए एक फटेहाल कंधा, सभी जंगों के लिए लाशें, सभी जेलों के लिए मांस, सभी नौकरियों के लिए मोलभाव के हाथ.

भूख, जो खामोशी से मारती जाती है, खामोश लोगों को भी मार डालती है. विशेषज्ञ उनके लिए बोलते हैं, गरीबी के माहिर, जो हमें बताते हैं कि गरीब क्या नहीं करते हैं, कि वे क्या नहीं खाते हैं, कि वे कितने वजनी नहीं हैं, कि वे किस बुलंदी तक नहीं पहुंच सकते, कि वे क्या नहीं सोचते, कि वे किन पार्टियों को वोट नहीं देते, कि वे किसमें यकीन नहीं करते.

अकेला सवाल, जिसका जवाब नहीं दिया जाता कि गरीब लोग गरीब क्यों हैं. क्या शायद ऐसा इसलिए है कि हम उनकी भूख पर पलते हैं और उनकी बेपर्दगी से अपना तन ढंकते हैं?

शासक और शासित

येरुशेलम का बाइबल कहता है कि बनी इस्राइल खुदा के चुने हुए लोग थे. वे खुदा की औलाद थे.
दूसरी आयत के मुताबिक, चुने हुए लोगों को राज करने के लिए दुनिया बख्शी गई थी:
मुझसे मांगो, और मैं विरासत में तुम्हें काफिर दूंगा, और तुम्हारी मिल्कियत में धरती का सबसे ऊपरी हिस्सा.

लेकिन बनी इस्राइल ने खुदा को बहुत नाराज किया, वे नाशुक्रे और गुनहगार थे. और अनेक धमकियों, बद्दुआओं और सजाओं के बाद खुदा का सब्र तमाम हुआ.

तब से दूसरे लोगों ने तोहफे पर दावा ठोंक रखा है.

सन 1900 में, संयुक्त राज्य के सीनेटर अलबर्ट बेवेरिज ने कहा: 'सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने चुने हुए लोगों के रूप में हमारी निशानदेही की है,  आगे से दुनिया को फिर से पैदा करने में रहनुमाई के लिए.'

मेहनत के बंटवारे की शुरुआत

कहते हैं कि यह राजा मनु थे, जिन्होंने भारत की जातियों को दैवीय बनाया.

उसके मुंह से पुरोहित पैदा हुए. उसकी बांहों से राजा और योद्धा. उसकी जांघों से व्यापारी. उसके पैरों से गुलाम और कारीगर.

और इस बुनियाद पर एक सामाजिक पिरामिड खड़ा हुआ, भारत में जिस पर तीन हजार से ज्यादा कहानियां हैं.

हरेक वहीं पैदा होता है, जहां उसे पैदा होना चाहिए. वही करने के लिए, जो उसे करना चाहिए. पालने में ही कब्र है, पैदाइश ही मंजिल है: हमारी जिंदगियां हमारी पहले की जिंदगियों का मुआवजा हैं या वाजिब सजा और यह विरासत ही हमारी जगह और हमारी भूमिका को तय करती है.

भटकावों को ठीक करने के लिए राजा मनु ने सिफारिश की: 'अगर निचली जाति का कोई इंसान पवित्र ग्रंथों के श्लोकों को सुन लेता है, तो उसके कानों में पिघला हुआ शीशा डाला जाए; और अगर वह उनका पाठ करता है, तो उसकी जीभ काट ली जाए.' ऐसी सीख अब चलन में नहीं है, लेकिन जो कोई भी अपनी जगह से हिलता-डुलता है, प्यार में, काम में, या चाहे जिस भी वजह से, वह सरेआम कोड़ों से पीटे जाने का जोखिम उठाता है, जिसका अंजाम उसे मुर्दा बना सकता है या वह बच भी गया तो मुर्दा ही ज्यादा बचता है.

जातिहीन (अवर्ण) लोग, हरेक पांच में से एक भारतीय, सबसे नीचे हैं. उन्हें 'अछूत' कहा जाता है, क्योंकि उनसे छूत फैलती है: वे घिनौनों में भी घिनौने हैं, वे दूसरों से बात नहीं कर सकते, उनके रास्तों पर चल नहीं सकते, उनका गिलास या प्लेटें नहीं छू सकते. कानून उनकी हिफाजत करता है, लेकिन हकीकत उन्हें छांट कर अलग करती है. मर्दों को कोई भी जलील कर सकता है, औरतों के साथ कोई भी बलात्कार कर सकता है, और सिर्फ तभी ये अछूत, छूने लायक बन जाते हैं.

2004 के आखिर में, जब सुनामी ने भारत के तटों पर रौंद डाला, वे मलबा और लाशें उठा रहे थे.

हमेशा की तरह.

अन्याय की पहली सीख: एदुआर्दो गालेआनो

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/14/2015 02:34:00 AM


 आज एदुआर्दो गालेआनो नहीं रहे। दुनिया में हर तरह के शोषण, गैरबराबरी और नाइंसाफी के खिलाफ लिखने-बोलने वाले इस बहादुर योद्धा पत्रकार और लेखक गालेआनो का एक और लेख। दुनिया जिस ढांचे पर चल रही है और इसके बारे में जो झूठ प्रचारित किया जाता है गालेआनो ने पूरे जीवन अपने लेखन में उसको रेशा रेशा उधेड़ दिया है- चाहे उनकी डायरीनुमा किताबें हों या लातीन अमेरिका (मेमोरीज ऑफ फायर) और दुनिया (मिरर्स) के इतिहास का पुनर्लेखन। उनका लेखन विडंबनाओं और व्यंग्यों का एक लंबा सिलसिला है। यहां पेश लेख यह उनकी किताब पातास आरीबा से लिया गया है। अनुवाद पी. कुमार मंगलम का है। गालेआनो के दूसरे लेखों और साक्षात्कारों को यहां पढ़ा जा सकता है।

रंग-रंगीले विज्ञापन बुलाते हैं कि आओ खरीदो और खर्च करो, वहीँ आज की आर्थिक व्यवस्था यूँ रोकती है, मानो कहती हो, चलो पास भी न फटको! खरीदने-खर्चने के ये बुलावे, जो हम सभी पर थोप दिए गए हैं, ठीक उसी वक्त ज्यादातर लोगों की पहुँच से बाहर भी रखे गए हैं। न्योता देकर दुत्कार देनेवाले बाजारी हिसाब-किताब का कुल जोड़ फिर यह निकलता है कि कुछ और कदम अपराध की तरफ बढ़ जाते हैं। अखबारों में आए दिन छप रही अपराध की ख़बरें हमारे समय की ऐसी ही विडंबनाओं को किसी आर्थिक और राजनीतिक रपट से कहीं ज्यादा उजागर करती हैं!

अपने बाजारी सज-धज की दावत में यह दुनिया सबको मोहती और बुलाती तो है, लेकिन बहुतों के लिये अपना दरवाजा बंद ही रखती है। इस तरह, यहाँ एक ही समय बराबरी और गैरबराबरी दोनों का खेल खेला जाता है। सभी को एक ही तरह की सोच और आदतों में ढालते हुए जहाँ ‘बराबरी’ का डंडा चलाया जाता है, वहीं बात जब सबको समान अवसर देने की आती है, तो यहाँ मौजूद गैरबराबरी छिपाए नहीं छिपती!

‘बराबरी’ का डंडा और गैरबराबरी

सिर्फ खरीदने और खर्च कर देने का हुक्म देनेवाली सोच आज हम सब पर बुरी तरह हावी है। पूरी दुनिया में आज जो गैरबराबरी की ‘व्यवस्था’ कायम की जा रही है, वह इस सोच से अलग देखी ही नहीं जा सकती। इस तरह एक-दुसरे की जड़ें सेंकती और चेहरा बनाती-छुपाती इन दो जुड़वा बहनों की हुकूमत बिना किसी भेदभाव के हम सब के ऊपर थोप दी गयी है।

सबको एक जैसा बना देने पर तुली यह पूरी व्यवस्था इंसानियत के सबसे खूबसरत अहसास को ख़त्म किए दे रही है। वही अहसास जिसके हम सबमें मौजूद कई-कई रंग आपस में कहीं गहरे जुड़े भी हुए हैं। आखिर, इस दुनिया का सबसे बड़ा खजाना इसी एक दुनिया में बसी बहुत सारी अलग-अलग दुनियायें ही तो हैं, जिनके अपने अलग-अलग संगीत, दुख-दर्द, रंग, जीवन जीने, कुछ कहने, सोचने, कुछ बनाने, खाने, काम करने, नाचने, खेलने, प्यार करने, पीड़ा झेलने और खुशी मनाने के हजारों तरीके हैं, जिन्हें हमने धरती पर अपने लाखों साल के सफर में ढूंढ़ा है।

हम सबको सिर्फ मुंह बाए तमाशा देखते रहने वालों में तब्दील कर देने वाली ‘बराबर’ व्यवस्था किसी हिसाब में नहीं समाती। ऐसा कोई कम्प्यूटर नहीं बना, जो यह बता सके कि कैसे ‘मास कल्चर’ का कारोबार हमारी सतरंगी दुनियाओं और अस्मिता के बिलकुल बुनियादी हक़ पर रोज ही हमले कर रहा है। हकीकत, हालांकि, यही है कि इस कारोबार के टूजी-थ्रीजी फाड़[1]  ‘तरक्की’ ने हमारा देखना-सोचना ख़त्म कर दिया है। हाल यह है की समय अपने इतिहास से तथा जगहें अपनी अद्भुत विविधताओं से खाली और अनजान होने लग गई हैं। दुनिया के मालिक लोग, माने वही जिनके पास संचार-सूचना के ‘बड़े’ माध्यमों की लगाम है, हमें खुद को हमेशा एक ही आईने में देखते रहने की हिदायत देते हैं। वही आईना, जहां दूसरी तरफ से सिर्फ खरीदने और खर्च डालने की सीखें निकलती हैं।

जिसके पास कुछ नहीं है, वह कुछ नहीं है। जिनके पास कार नहीं है, जो ब्रांडेड जूते या विदेशी परफ्यूम इस्तेमाल नहीं करते वे तो जीने का दिखावा ही कर रहे हैं। आयात पर पलती अर्थव्यवस्था और पाखण्ड फैलाती संस्कृति! ऐसे ही बकवासों के राज में हम सभी ठेल-ठेलकर एक बड़े और भड़कीले जहाज पर बिठा दिए गए हैं। उपभोक्तावाद का पाठ रटाता यह जहाज बाजार की उठती-मचलती लहरें नापता है। जाहिर है, ज्यादातर लोग इस जहाज से बाहर फेंक दिए जाने को अभिशप्त हैं। लेकिन सफर का पूरा मजा लेने वालों का खर्च, जो विदेशी कर्जे लेकर चुकाया जाता है, सबके मत्थे चढ़ता है। कर्जे की रकम से यह इंतजाम किया जाता है कि एक बहुत ही छोटा-सिमटा तबका अपने-आप को ‘नए फैशन’ की तमाम गैरजरूरी चीजों से भर ले। यह हमारे उस मध्यवर्ग के लिए होती है, जो कुछ भी खरीद कर ‘बड़ा’ और हाई-फाई दिख जाना चाहता है। और उस ऊँचे तबके के लिए भी, जो अपने जैसे लोगों की नकल कर उनसे भी ऊँचा हो जाने की जुगत भिड़ाए रहता है। फिर टीवी तो है ही इन सारे तबकों को यह भरोसा देने के लिए कि वे तमाम मांगें कितनी जरुरी है जो, दरअसल, दुनिया का उत्तर बिना रूके बनाता और पूरी कामयाबी से दक्षिणी हिस्से को भेजता रहता है।[2]

लातिन अमेरिका के उन करोड़ों बच्चों के इस जिंदगी के क्या मायने हैं जो इस पूरे दौर में बड़े हो रहे हैं और बेकारी और भुखमरी देखने के लिये जवान हो रहे हैं। विज्ञापनों दुनिया विचित्र दुनिया। मांग बढ़ाती है या हिंसा? टेलीविजन भी बाजार को अपनी पूरी सेवा देता है। यह हमें सामानों के विज्ञापन के ढेर बिठाकर हमें जिंदगी के अच्छी-भली चलने का भ्रम पालना सिखाता है, साथ ही रोज हिंसा की ऑडियोविजुअल’खुराक भी देता है। जिसकी लत ‘विडियोगेम्स’ से हमें पहले ही लग चुकी होती है। अपराध टी।वी। पर आने वाला सबसे मनोरंजक कार्यक्रम बन गया है। विडियोगेम्स की हिंसा से भरी दुनिया हमें रोज और ज्यादा हिंसक और बर्बर होने के नए मंत्र देती है। जैसे कि ‘मारो उन्हें, इससे पहले कि वे तुम्हें मारें’ या ‘आप अकेले हैं, सिर्फ खुद पर भरोसा करें’। इस सब उथल-पुथल की गवाह बन रहे आधुनिक शहर बढ़ रहे हैं। लातिन अमेरिका के शहर बढ़कर दुनिया के बड़े शहरों में शुमार हो रहे हैं। बढ़तो शहरों के साथ अपराध भी उससे या उससे कहीं ज्यादा घबरा देने वाली, रफ्तार से बढ़ रहे हैं।

आज की आर्थिक व्यवस्था को बढ़ते उत्पादन की खपत और फायदा बनाए रखने के लिये बाजार बढ़ाते जाने की जरूरत है। साथ ही लागत कम बनाए रखने के लिये यह सबसे सस्ते मजदूर और कच्चा माल भी चाहता है। यह अंतर्विरोध ही बाजार का मूलमंत्र है जो हम हर दिन बढ़ते दामों और मजदूरों को उनकी न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दिये जाने के आम होते मामलों में देख सकते हैं। यह अंतर्विरोध ही दुनिया के दो गैरबराबर हिस्सों में बंटे रहने के मूल में है, जब विकसित उत्तरी भाग साम्राज्यवाद दक्षिणी और पूर्वी भागों को अपनी कंपनियों के लिये खरीदार बना रहा है। यह साम्राज्यवाद का नया रूप है जो बड़े और विकसित देशों की बाजारवादी धौंस से जाहिर होता है। खरीददार बढ़ाते रहने की इस अंधाधुन्ध रफ्तार से बढ़ाया है तो तो सिर्फ हाशिये पर खड़े लोगों की संख्या जो अपराधी बनने को मजबूर है। सब कुछ खरीद लेने की इस सनक में हर आदमी वो सब कुछ खरीद लेना चाहता है, जो वह दूसरों के पास देखता है और इसके लिये उसे हिंसा से भी कोई परहेज नहीं है। सभी इस आपधापी और मुठभेड़ के लिये खुद को तैयार कर रहे हैं। कोई भी कभी भी मार दिया जा सकता है, वे लोग जो भूख से मर रहे हैं और वे भी जिनके पास खाने को जरूरत से ज्यादा है।

सांस्कृतिक विविधताओं को खत्म कर सबको एक जैसा खरीदार बना देने की यह पूरी प्रक्रिया कैसे काम कर रही है, इसे आंकडों से नहीं दिखाया जा सकता। हालांकि इसके उलट व्यवस्था की आर्थिक गैरबराबरी बयां करने को कई आंकड़े हैं। हम इसे देख सकते हैं। इस पूरी व्यवस्था को बनाए रखने के लिये विश्वबैंक इस कड़वी सच्चाई को स्वीकारता है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र के कई संगठन भी इसकी पुष्टि करते हैं। दुनिया की अर्थव्यवस्था कभी भी इतनी गैरबराबरी बढ़ाने वाली नहीं रही और न कभी दुनिया इतनी क्रूर अन्याय की गवाह बनी थी। 1960 में दुनिया की आबादी का सबसे धनी 20 फीसदी हिस्सा सबसे गरीब 20 फीसदी के मुकाबले 30 गुना ज्यादा धनी और साधन सम्पन्न था। इसके बाद तो यह खाई और चैड़ी होती रही है। सन 2000 तक यह अंतर बढ़कर 90 गुना हो जाएगा।

अनुवादकीय टिप्पणी

1. मूल लेख में “demoledores progresos” phrase का उपयोग हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ विध्वंसक विकास होगा। लेकिन भारत के सन्दर्भ में बात को और मौजूं बनाने के लिए “टूजी-थ्रीजी फाड़ तरक्की” का प्रयोग किया गया है।
2. उत्तर और दक्षिण से यहां तात्पर्य धरती पर मौजूद संसाधनों के वितरण से है और यह सभी मामलों में भौगोलिक संकल्पना नहीं है।

‘मर्द’ तैयार करती सोच की पहली सीख: एदुआर्दो गालेआनो

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/13/2015 08:16:00 PM


आज उरुग्वे निवासी, लातीन अमेरिकी लेखक-पत्रकार एदुआर्दो गालेआनो का निधन हो गया. वे लेखकीय और पत्रकारीय साहस की मिसाल थे. राजकीय दमन को बहुत करीब से देखने वाले, प्रतिरोध और जनसंघर्षों के साथ अडिग रूप से खड़े और बदलाव की उम्मीद को हमेशा जिंदा रखनेवाले और गालेआनो का जाना मायूस कर देनेवाला है. उनके निधन पर उनकी किताब पातास आरीबा (अपसाइड डाउन) का एक अंश। इस किताब का अनुवाद अनुवाद जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में लातीनी अमरीकी साहित्य के शोधार्थी पी. कुमार मंगलम कर रहे हैं। साथ में दिए गए नोट्स अनुवादक के हैं।

नजरिया 1

जरा सोचिए अगर ईसाई उपदेश धर्मप्रचारिकाओं की कलम से निकले होते तो क्या होता! ईसा युग की पहली रात का बखान कैसे होता? उनकी कलम यही बताती कि संत खोसे उस रात कुछ उखड़े-उखड़े से थे। भीड़भाड़ और होहल्ले से भरी उस जगह में घास-फूस और पंखों के पालने में झुलते नवजात ईसा के करीब होकर भी वह अनमने ही बने रहे। वर्जिन मेरी, फरीश्तों, चरवाहों, भेड़ों, बैलों, खच्चरों, पूरब से आए जादूगरों और बेलेन तक का रास्ता दिखाते सितारे के मदमस्त झुंड में वह अकेले ही, उदास खड़े थे। कुरेदे जाने पर कुछ अस्पष्ट-सी आवाज़ में उन्होंने कहा: “मुझे तो एक बच्ची चाहिए थी”!


नजरिया 2

क्या होता अगर हव्वा ने जेनेसिस[1] लिखी होती! इंसानी सफर की पहली रात तब कैसी होती ! उसने किताब की शुरुआत ही यह बताते हुए की होती कि वह न तो किसी जानवर की हड्डी से पैदा हुई थी न ही वह किसी सांप को जानती थी; उसने किसी को सेब भी नहीं दिए थे। ईश्वर ने उससे यह नहीं कह था कि बच्चा जनते समय उसे दर्द होगा और उसका पति उसपर हुकूमत करेगा। वह बताती कि यह सब तो सिर्फ़ झूठ और झूठ है जिसे आदम ने प्रेसवालों को बताकर ‘इतिहास’ और ‘सच’ का रूप दे दिया था।

‘‘अरे छोड़ो भाई, ये सब औरतों की बाते हैं।’’ अक्सर हम यह कह-सुन लेते हैं। दुनिया में रंगभेद और मर्दों की हुकूमत का सिलसिला साथ ही शुरू हुआ और चलता रहा है। अपनी धमक बनाए रखने के उनके दावे-हवाले भी एक जैसे ही होते हैं। इस दोहरे लेकिन घुले-मिले खेल को उजागर करते एउखेनिओ राउल साफ्फारोनि स्पेन में 1546[2]  में बने कानून ‘एल मार्तिल्यो दे लास ब्रुखास’ का हवाला देते हैं। ‘डायन’ करार दी गई औरतों को ‘ठीक’ करने वाला यह फरमान बाद में आधी आबादी के खिलाफ़ कई कानूनों का आधार बना। वह यह भी बताते हैं कि धर्म-ईमान के ‘पहरेदारों’ ने कैसे यह पूरा पोथा ही औरतों पर जुल्म को जायज़ ठहराने और मर्दों के मुकाबले उनकी  ‘कमजोरी’ बार-बार साबित करने के लिए लिख डाला था!

वैसे भी, बाइबिल और यूनानी किस्सों-कहावतों के जमाने से ही औरतों को कमतर बताने-बनाए जाने की शुरुआत हो चुकी थी। तभी से यह याद दिलाया जाता रहा है कि वो हव्वा ही थी जिसकी बेवकूफी ने इंसान को स्वर्ग से धरती पर ला पटका। और, दुनिया को मुसीबतों से भर देने वाले पिटारे का ठीकरा भी एक औरत पांडोरा पर ही फोड़ा जाता है। अपने चेलों को संत पाब्लो यही सबक रटाया करते थे कि ‘‘औरत के शरीर का एक ही हिस्सा मर्दों वाला होता है, और वह है उसका दिमाग’’! वहीं, उनसे उन्नीस सौ साल बाद सामाजिक मनोविज्ञान के आरंभकर्ताओं में रहे गुस्ताव ले गोन भी इसी धूर्त खेल को बढ़ाते रहे। और तो और, वह यह भी फरमा गए कि ‘‘किसी औरत का अक्लमंद होना उतना ही अजूबा है, जितना दो सिरों वाले चिम्पांजी का पाया जाना ’’!  घटनाओं का अंदाजा लगा सकने की औरतों की खूबियां गिनाने वाले चार्ल्स डार्विन भी इसे ‘नीची’ नस्ल की खासियत ही बताते रहे।

अमरीकी महादेशों पर यूरोपीय हमलों के समय से ही वहां समलैंगिकों को मर्दानगी के ‘कुदरती ढांचों’ के खिलाफ़ ठहरा दिया गया था। अपने नाम से ही पुरूष जान पड़ते ईसाई भगवान के लिए मूलवासियों में मर्दों का औरतों की तरह होना सबसे बड़ा पाप था। ऐसे  ईश्वर के ‘सभ्य’ सेवकों के लिए मूलवासी मर्द “बिना स्तन और प्रजनन क्षमता वाली स्त्री” ही रहे। इसी वजह से कि वे व्यवस्था के लिए जरूरी मजदूर नहीं पैदा करतीं, आजकल भी समलैंगिक औरतें ‘स्त्री’ होने के ‘कायदों’ के उलट बता दी जाती हैं।

गढ़ी और बार-बार दुहराई गई धारणाओं में एक औरत बच्चे पैदा करने, नशेड़ियों को आनंद देने और ‘महात्माओं’ के पापों को अपनी चुप्पी से ढंकने वाली ही रही है। यही नहीं, वह मूलवासियों और अश्वेतों की तरह ही स्वभाव से पिछड़ी भी बताई जाती रही है। आश्चर्य नहीं कि इन्हीं तबकों की तरह वह भी इतिहास के हाशिए पर फेंक दी गई है! अमरीकी  महादेशों के सरकारी इतिहास में आज़ादी के ‘महान’ जंगबाजों की मांओं और विधवा औरतों की बहुत धुंधली मौजूदगी यही साबित करती है। इस इतिहास में मर्द नए मुल्कों के झंडों की अगुवाई हासिल करते हैं और औरतों को कढ़ाई और मातम की घरेलू सीमाओं में बांध दिया गया है।

यही इतिहास यूरोपीय हमलों में आगे-आगे रही औरतों और फिर आज़ादी की लड़ाईयों की क्रियोल[3] महिला योद्धाओं को विरले ही याद करता है। युद्ध और मार-काट का बखान करने वाले इतिहासकार इन औरतों की ‘मर्दाना’ बहादुरी का जिक्र तो कर ही सकते थे![4] इतना ही नहीं, गुलामी के खिलाफ़ खड़ी हुई अनगिनत मूलवासी और अश्वेत नायिकाओं का तो यहां कोई जिक्र ही नहीं है। इतिहास से गायब कर दी गईं इनकी आवाज़ें कभी-कभार और अचानक ही किसी जादू की तरह सामने आती, बहुत कुछ कह जाती हैं। मसलन, हाल ही में सूरीनाम पर लिखी एक किताब पढ़ते हुए,  मैंने मुक्त हुए गुलामों की नेता काला को जाना। पूजे जाने वाले अपने डंडे से वह दूर-दूर से भाग कर आते गुलामों की अगुवाई किया करती थी। उसकी एक और खास बात यह लगी कि उसने अपने निहायत ही नीरस पति को छोड़ा और पीट-पीट कर मार डाला था।

अश्वेतों और मूलवासियों की तरह ही औरत का ‘पिछड़ापन’ भी सभी तरह से साबित कर दिया गया है।  हालांकि, वह एक संभावित “खतरा” भी रही है। ‘‘भाई, एक औरत की तमाम अच्छाइयों से एक मर्द की बुराई कहीं अच्छी’’, यह सीख ईसाई गुरू एक्लेसियास्तेस की थी! वहीं, सुनी-सुनाई कहानियां यही गाती आई हैं कि यूनानी लड़ाका उलिसेस कैसे मर्दों को भरमाने वाली सुरीली आवाज़ों को बखूबी भांप लेता था। वहां सभी मानते थे कि ये आवाज़ें जलपरी का रूप धर मर्दों को गायब करने वाली औरतों की ही होती हैं। हथियारों और शब्दों पर मर्दों का कब्जा जायज़ ठहराती ऐसी ही रीतियों की दुनिया में कोई कमी नहीं है। फिर, उन्हें नीचा दिखाए जाने या एक खतरा बताए जाने की हामी भरने वाली मान्यताएं भी अनगिनत हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे मुहावरे सबक देते हैं: ‘‘औरत और झूठ इस दुनिया में एक ही दिन आए थे’’। यह और जोड़ा जाता है कि ‘‘औरत के बात की कीमत एक रत्ती भी नहीं होती’’ । ऐसे ही विश्वासों के साथ पले-बढ़े लातीनी अमरीकी किसान  मानते आए हैं कि रात में राहगीरों पर घात लगाए, बदले की प्यासी बुरी आत्माएं औरतों की ही होती हैं। बातों से होकर चौकन्नी आंखों और सपनों तक पसरे इन भ्रमजालों का आखिर मतलब क्या है! यह सब कुछ आनंद और सत्ता के मौकों पर औरतों के संभावित दावे से उपजती मर्दाना बेचैनी ही जाहिर करता है।

बात की बात में ‘डायन’  बतलाकर सरेआम मार दिया जाना औरतों की नियति रही है। और यह स्पेनी ‘धर्म अदालतों’ तक ही सीमित नहीं रहा है। अपनी यौनिकता और, सबसे बढ़कर, इसका अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर सकने की संभावनाएं औरतों को बौखलाई निगाहों, धमकियों और कड़वे बोल का ‘तोहफ़ा’ देती आई हैं। तमाम पहरों-पाबंदियों से छिटकती ऐसी ‘विस्फोटक’[5] संभावनाओं को कुचलने के उपाय भी सदियों पुराने हैं। इनका हौवा खड़ा कर औरतों को शैतान का रूप बताया जाना, इसी सिलसिले की शुरुआत है। फिर, मानो यह दिखाते हुए कि आग की सजा आग ही होती है, इन ‘गंदी’ औरतों को ईश्वर की ‘मर्जी’ से जिंदा भी जलाया जाता रहा है।

इस तरह की तमाम करतूतों में जाहिर होती बौखलाहट को यही डर हवा देता आया है कि औरत भी जिंदगी खुल कर और मजे से जी सकती है।  सालों-साल से अलग-अलग जगहों की कई संस्कृतियों में दुहराई गई एक खास मान्यता के मायने कुछ यही हैं। योनि को मुंह फाड़े किसी भयंकर मछली की तरह पेश करता इसका ‘सच’ यह सिखाता है: "औरत तो नरक का द्वार होती है"[6]।और आज भी जब एक सदी खत्म होकर नई शुरू हो चुकी है, करोड़ों औरतों के यौनांगों पर हमला बदस्तूर जारी है।

ऐसी कोई भी औरत नहीं मिलेगी जिसपर बुरी “चाल-चलन” का ठप्पा न लगा हो। लातीनी अमरीका के लोकप्रिय नृत्यों बोलेरो और तांगो में सभी औरतें धोखेबाज और वेश्या (मां को छोड़कर) ही रही हैं। वहीं, दुनिया के दक्षिणी देशों में हर तीसरी शादीशुदा औरत रोज़ाना घरेलू हिंसा झेलती है। “सात जन्मों के बंधन” का यह ‘तोहफ़ा’ उसे उन सब कामों की सजा देता है, जो वह करती है या फिर कर सकती है।

मोंतेवीदियो[7] की बस्ती कासाबाये की एक मजदूरिन बताती है :

“सोते में ही किसी बड़े घर का लड़का आकर हमें चूमता और हमारे साथ सोता है। जगने पर वही हमें मारता-दुत्कारता है”।
 

वहीं, दूसरी कहती है:

“मुझे अपनी मां से डर लगता है, मेरी मां भी मेरी नानी से डरा करती थी।”

समाज और परिवार में ‘संपत्ति के अधिकार’ को मनवा लिए जाने की ऐसी मिसालें और भी हैं। जैसे,  मार-पीटकर औरत  पर अपनी हुकूमत चलाते मर्द  और बच्चों पर अपनी जबर्दस्ती थोपते औरत-मर्द दोनों। और क्या बलात्कार इसी हुकूमत को मनवा लेने की सबसे हिंसक और खौफ़नाक नुमाईश नहीं है?

एक बलात्कारी को सिर्फ आनन्द नहीं चाहिए। वह तो उसे मिलता भी नहीं। उसे चाहिए औरत के शरीर पर अपना पूरा और मनमाना कब्जा। हर बार और बर्बर होता बलात्कार अपने शिकारों की देह पर संपत्ति के ऐसे ही दावों के कभी न भरने वाले घाव छोड़ जाता है। और, यह हमेशा से तीर, तलवार, बंदूक, मिसाइल और दूसरे साजो-सामान के साथ चले सत्ता के मर्दाना खेल का सबसे भयानक चेहरा है। संयुक्त राज्य अमेरिका में हर छ्ह मिनट और मेक्सिको में हर नौ मिनट में एक औरत सत्ता का यह ‘अधिकार’ झेलती है। मेक्सिको की एक महिला कहती हैं:

‘‘बलात्कार का शिकार होना और किसी गाड़ी के नीचे आ जाना एक बराबर ही है, सिवाय इसके कि बलात्कार के बाद मर्द यह पूछते हैं कि जो हुआ उन्हें पसंद आया कि नहीं।’’

आंकड़ों से बलात्कार के सिर्फ़ उन मामलों का पता चलता है, जिनकी रपट लिखाई जाती है। लातीनी अमरीका में ऐसे मामले सच्चाई के आंकड़ों से हमेशा बहुत कम होते हैं। बलात्कार झेलने वाली ज्यादातर औरतें तो डर की वजह से चुप रह जाती हैं। अपने ही घर में  बलात्कार का शिकार हुई बच्चियां  ‘अवैध’ संतानों को किसी सड़क पर जन्म देती हैं। यहीं पलने वाले लड़कों की तरह, इन ‘सस्ती’ देहों का आसरा भी यह सड़कें ही रह जाती हैं। रियो दी जानेइरो[8]  की गलियों में "भगवान भरोसे" पली-बढ़ी चौदह साल की लेलिया बताती है:

“हाल यह है कि चारों ओर लूट है। मैं किसी को लूटती हूं, और कोई मुझे।“

देह बेचने के एवज में लेलिया को या तो बहुत कम मिलता है या फिर मिलती है सिर्फ़ मार और दुत्कार।  और जब कभी गुजारे की गरज से वह चोरी करती है, तब पुलिस उससे वह भी  झपट लेने के अलावा उसकी इज्जत भी लूटती है। मेक्सिको सिटी[9] की गलियों में भटकते हुए बड़ी हुई सोलह साल की आंखेलिका बताती है:

‘‘मेरे यह बताने पर कि मेरा भाई मेरा शारीरिक शोषण कर रहा है, मां ने मुझे ही घर से बाहर कर दिया। अब मैं एक लड़के के साथ रह रही हूं और पेट से हूं। वह कहता है कि अगर लड़का हुआ तो  मेरी मदद करेगा। लड़की होने की सूरत में उसने कुछ भी वायदा नहीं किया।’’

यूनिसेफ[10] की निदेशिका का मानना है: ‘‘आज की दुनिया में लड़की होना खतरों से खाली नहीं है”। यहां वह नारीवादी  आंदोलनों की तमाम सफल मांगों के बावजूद बचपन से ही  औरतों के खिलाफ़ चले मारपीट और भेदभाव को भी सामने लाती हैं। 1995 में बीजिंग में स्त्री-अधिकारों पर हुई अंतर्राष्ट्रीय बैठक में यह बात खुली कि एक ही काम के एवज में उन्हें मर्दों के मुकाबले तिहाई मजदूरी ही मिलती है। किन्हीं दस गरीबों में सात तो औरतें ही होती हैं, वहीं सौ में से बमुश्किल एक  के पास कोई संपत्ति होती है। यह सब ‘तरक्की’ और ‘खुशहाली’ के रास्ते पर इंसानियत की अधूरी उड़ान ही जाहिर करता है।  वहीं, संसदों की बात करें तो औसतन दस सांसदों में एक  और कहीं-कहीं तो एक भी महिला सांसद नहीं है।

जब औरतों की जगह घर, कारखानों तथा  दफ्तरों में थोड़ी-बहुत  और रसोई घर तथा बिस्तर में पूरी तरह पक्की कर दी गई है, सत्ता और युद्ध की चाभी मर्दों के हाथ ही है। ऐसे में यूनिसेफ की निदेशिका कारोल बेल्लामी जैसी मिसालें इक्का-दुक्का ही हैं। संयुक्त राष्ट्र समानता के अधिकारों की बात करता है, उसे खुद के ऊपर लागू नहीं करता। दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत में हर दस अहम पदों में आठ पर मर्द काबिज हैं।

अनुवादक के नोट्स

1. बाईबिल की पहली किताब
2. यह मध्ययुग में कायम रहे तथाकथित धर्म अदालतों ‘इन्किसिसीयोन’ के दौर की बात है। ये कचहरियां नए ईसाई बने मुस्लिमों और यहूदियों की ‘पवित्रता’ जांचने के साथ-साथ ‘अधर्मियो’ की पहचान कर उन्हें सजा भी देती थीं।
3. लातीनी अमरीका में गुलामी के दौर में स्पेनी, पुर्तगाली, मूलवासी और अफ्रीकी समुदायों के मेल से कई जाति और उपजातियां बनी थीं। ‘शुद्ध’ यूरोपीय खून के अपने दावे के साथ क्रियोल खुद को इस बहुरंगी सामाजिक सीढ़ी के सबसे ऊपर रखते थे।
4. ठीक उसी तरह जैसे झांसी की रानी की वीरता समझने-समझाने के लिए उनकी बहादुरी को मर्दाना होने का तमगा दिया जाता रहा है। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता बताती है: "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी"
5. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, हिंदू लड़कियों व मुस्लिम लड़कों की शादियों को देश की एकता-अखंडता के लिए गंभीर खतरा मानने वाले बाबू बजरंगी ने यह बयान दिया था "हिंदू घरों में बैठी हर कुंवारी लड़की एक बम है जो अपनी मर्जी से चल जाए तो हिंदू समाज के लिए बड़ा खतरा है"।
6. हाल में बिहार में लोगों की जुबान पर चढ़े एक गाने के बोल थे "मिस काल करताड़ु किस/देबू का हो, अपना मशीनिया में पीस देबू का हो"।
7. लातीनी अमरीकी देश उरुग्वे की राजधानी।
8. ब्राजील का सबसे बड़ा शहर
9. लातीनी अमरीकी देश मेक्सिको की राजधानी
10. UNICEF (UNITED NATIONS CHILDREN EMERGENCY FUND) संयुक्त राष्ट्र की एक महत्वपूर्ण संस्था जो बच्चों के हित में काम करती है।

'हिंदू राज को रोकना होगा'- बाबासाहेब आंबेडकर

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/13/2015 12:41:00 AM


आरएसएस, भाजपा और भारतीय राज्य एक बार फिर बाबासाहेब आंबेडकर को अपनी राजनीति को जायज ठहराने के लिए उनको 'अपनाने' की कोशिश कर रहा है. उन्हें एक 'हिंदू राष्ट्रवादी' बताना इसी साजिश का हिस्सा है. लेकिन जातियों के उन्मूलन और ब्राह्मणवाद के ध्वंस के लिए लड़ने वाले  बाबासाहेब का जीवन, चिंतन, उनके संघर्ष और उनका लेखन उन सभी चीजों के खिलाफ खड़ा है, जिनका प्रतिनिधित्व संघ, भाजपा या भारतीय राज्य करते हैं. मिसाल के लिए देखिए कि उन्होंने हिंदू राज के बारे में क्या कहा था. उनकी किताब पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया से. बाबासाहेब की जयंती पर उन्हें याद करते हुए.

''अगर हिंदू राज असलियत बन जाता है, तो इसमें संदेह नहीं कि यह इस देश के लिए सबसे बड़ी तबाही होगी. हिंदू चाहे जो कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे के लिए खतरा है. इस लिहाज से यह लोकतंत्र के साथ नहीं चल सकता. हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोकना होगा.''- डॉ. बी.आर. आंबेडकर

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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