हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

यूनान की हिमायत में एक खत

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/03/2015 09:24:00 PM


पिछले पांच वर्षों के दौरान यूरोपीय संघ (ईयू) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने यूनान पर खर्चों में कटौती का एक ऐसा कायदा (ऑस्टेरिटी) थोप रखा है, जिसकी इतिहास में पहले कोई मिसाल नहीं मिलती. और यह बुरी तरह नाकाम रहा है. अर्थव्यवस्था 26 फीसदी सिकुड़ गई है, बेरोजगारी 27 फीसदी तक बढ़ी है, नौजवानों में बेरोजगारी 60 फीसदी है और सकल घरेलु उत्पाद के मुकाबले कर्ज का अनुपात 120 फीसदी से बढ़ कर 180 फीसदी हो गया है. आर्थिक तबाही ने एक इंसानी संकट को जन्म दिया है, जिसमें तीस लाख से ज्यादा लोग गरीबी रेखा या उसके नीचे गुजर कर रहे हैं.

इस पृष्ठभूमि में, यूनान की अवाम ने 25 जनवरी को सीरिजा के नेतृत्व में एक सरकार को चुना जिसको खर्चों में कटौती का एक साफ साफ अवामी फरमान हासिल था. इसके बाद जारी बातचीत के दौर में, सरकार ने इसे साफ किया कि यूनान का भविष्य यूरोजोन और ईयू में ही है. हालांकि कर्जदाताओं ने अपने नाकाम रहे नुस्खों को ही जारी रखने पर जोर दिया और कर्ज को माफ करने के इन्कार किया, जिसको आईएमएफ ने बाकायदा अव्यावहारिक माना है. और आखिरकार 26 जून को कर्जदारों ने यूनान को बातचीत से परे एक पैकेज के साथ अल्टीमेटम जारी किया, जो खर्चों में कटौती को और भी बढ़ाएगा. इसके बाद यूनानी बैंकों में पैसों के लेन-देन (लिक्विडिटी) को निलंबित कर दिया गया और पूंजी पर नियंत्रण लागू कर दिया गया.

इस हालत में सरकार ने इस रविवार को होनेवाली एक रायशुमारी में यूनानी अवाम से मुल्क के भविष्य का फैसला करने की मांग की है. हम यकीन करते हैं कि यूनानी अवाम और जम्हूरियत को दिया गया यह अल्टीमेटम खारिज होना चाहिए. यूनानी रायशुमारी यूरोपीय संघ को एक मौका देती है कि यह एनलाइटेनमेंट (प्रबोधन) के अपने मूल्यों – बराबरी, इंसाफ, एकजुटता – और जम्हूरियत के अपने उसूलों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराए, जिस पर इसकी वैधानिकता टिकी हुई है. जिस जमीन पर जम्हूरियत पैदा हुई थी, वह जमीन आज यूरोप को 21वीं सदी में अपने आदर्शों पर फिर से खड़े होने का एक मौका दे रही है.
 

एटेनी बालिबार
कोस्तास दोजिनास
बारबरा स्पिनेली
रोवन विलियम्स
इमानुएल वैलरस्टेन
स्लैवोज जिजेक
माइकेल मैंस्फील्ड
जूडिथ बटलर
शैंटेल मोऊफ
होमी भाभा
वेंडी ब्राउन
एरिक फसीन
तारिक अली


अनुवाद: रेयाज उल हक। मूल: गार्डियनवर्सो बुक्स पर यह विशेष सामग्री भी पढ़ें

एक लेखक की जिम्मेदारियां: एदुआर्दो गालेआनो

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/20/2015 04:05:00 PM


एदुआर्दो गालेआनो का ज्यादातर लेखन बिखरे हुए छोटे छोटे काव्यात्मक गद्यांशों से बना है, जिनमें वे व्यक्तिगत अनुभवों, संस्मरणों, बातचीत, लोककथाओं, इतिहास के टुकड़ों और खबरों के जरिए मौजूदा व्यवस्था की नाइंसाफियों को उजागर करते हैं, उसे चुनौती देते हैं और एक नई दुनिया के निर्माण की जरूरत पर जोर डालते हैं. उनके लेखन से चुने हुए कुछ अंश, जो गालेआनो की वैचारिकी और उनकी अनोखी लेखन शैली दोनों का नमूना पेश करते हैं. मूल स्पेनी भाषा से अनुवाद: रेयाज उल हक.

कला की जिम्मेदारी /1

दिएगो ने कभी भी समुद्र नहीं देखा था. उसके पिता सांतियागो कोवादियोफ उसे समंदर दिखाने ले गए.

वे दक्षिण गए.

रेत के टीलों के पार पसरा हुआ समंदर उनका इंतजार कर रहा था.

जब काफी पैदल चलने के बाद बच्चा और उसके पिता आखिर में टीलों तक पहुंचे, तो समंदर उनकी आंखों के आगे फट पड़ा.

और सागर और उसकी चमक इतनी अपार थी कि बच्चा उसकी खूबसूरती से अवाक रह गया.

और जब वह कुछ बोलने के काबिल हुआ, तो कांपते हुए, हकलाते हुए, उसने अपने पिता से कहा:

‘देखने में मेरी मदद करो!’

कला की जिम्मेदारी /2

उपदेशक मिगेल ब्रुन ने मुझे बताया कि कुछ बरस पहले वे पारागुवाई चाको के इंडियन लोगों से मिलने गए थे. वे एक ईसाई प्रचार अभियान का हिस्सा थे. मिशनरियों ने वहां के मुखिया से भेंट की, जिन्हें काफी समझदार माना जाता था. उस खामोश, मोटे से, मुखिया ने वह धार्मिक प्रचार बिना पलक झपकाए हुए सुना जो उन्हें उन्हीं की भाषा में पढ़ कर सुनाया जा रहा था. अपनी बात खत्म करने के बाद, मिशनरी उनके जवाब का इंतजार करने लगे.

मुखिया ने कुछ वक्त लिया. फिर बोले:

‘यह खुजलाता है. यह बहुत सख्ती से खुजलाता है और बहुत अच्छा खुजलाता है.’

और फिर उन्होंने जोड़ा:

‘लेकिन यह वहां खुजलाता है, जहां खुजली ही नहीं होती है.’

पाठक की जिम्मेदारी /1

जब लुसिया पेलाएस बहुत छोटी थी, वो चादर के नीचे छुप कर एक उपन्यास पढ़ा करती थी. वह उसे रात दर रात, टुकड़ों में पढ़ती और तकिए के नीचे छुपा कर रखती. उसने वह किताब देवदार से बनी किताबों की एक अल्मारी से चुराई थी, जहां उसके चाचा अपनी पसंदीदा किताबें रखा करते थे.

साल बीतते गए, लुसिया ने दूर दूर तक का सफर किया.

लुसिया लंबे रास्तों पर चलती और सफर के दौरान हमेशा उसके साथ उन दूर दराज की आवाजों की गूंज की गूंज बनी रहती, जो उसने अपनी आंखों से तब सुनी थीं जब वो बच्ची थी.

लुसिया ने फिर कभी वह किताब नहीं पढ़ी. अब वह उसे पहचान नहीं सकती. वह उसके भीतर इस कदर फल-फूल गई है कि वह कुछ और हो गई है: अब यह उसकी अपनी हो गई है.

पाठक की जिम्मेदारी /2

सेसार वायेखो[1] की मौत को आधी सदी बीत चुकी थी, और जश्न मनाए जा रहे थे. स्पेन में, खूलियो वेलेस ने व्याख्यान और गोष्ठियां आयोजित कीं, स्मारिकाओं का प्रकाशन किया और कवि, उसकी जमीन, उसके वक्त और उसके लोगों की तस्वीरों की एक प्रदर्शनी लगाई गई.

लेकिन तब खूलियो वेलेस की भेंट खोसे मानुएल कास्तान्योन से हुई, और इसके बाद सारी श्रद्धांजली बेमानी लगने लगी.

खुलियो मानुएल कास्तान्योन स्पेनी युद्ध में कप्तान हुआ करते थे. फ्रांको के लिए लड़ते हुए, उन्होंने अपना एक हाथ गंवा दिया था और अनेक तमगे जीते थे.

जंग खत्म होने के कुछ ही दिनों बात, एक रात कप्तान को इत्तेफाक से एक प्रतिबंधित किताब मिली. उन्हें उस पर नजर डाली, उसकी एक पंक्ति पढ़ी, फिर दूसरी पंक्ति पढ़ी और फिर वे खुद को उस किताब से दूर नहीं कर सके. कप्तान कास्तान्योन, उस विजेता फौज का नायक, पूरी रात उस किताब का कैदी बना रहा और सेसार वायेखो को पढ़ता और बार बार पढ़ता रहा, जो हारे हुए पक्ष का कवि था. अगली सुबह उन्होंने फौज से इस्तीफा दे दिया और फिर फ्रांको सरकार से एक भी कौड़ी लेने से इन्कार कर दिया.

बाद में, उन्होंने उन्हें जेल में डाल दिया और फिर वे निर्वासन में चले गए.

नौकरशाही/1

फौजी तानाशाही के दिनों में, साल 1973 के बीच में उरुग्वे[2] के एक सियासी कैदी खुआन खोसे नोउचेद को नियम तोड़ने के लिए पांच दिनों की सजा मिली: उसे ये पांच दिन बिना किसी मुलाकाती के और बिना व्यायाम किए गुजारने थे, किसी भी चीज के बिना पांच दिन. जिस कप्तान ने यह सजा थोपी थी, उसके नजरिए से नियम, बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ता था. नियम में साफ साफ यह कहा गया था कि कैदियों को अपने दोनों हाथ पीछे की तरफ किए हुए, एक कतार में चलना होगा. नोउचेद को सजा मिली थी, क्योंकि उसने सिर्फ एक ही हाथ पीछे किया था.

नोउचेद का एक ही हाथ था.

उसे दो किस्तों में कैद किया गया था. पहली बार, उसका हाथ ले लिया गया. इसके बाद खुद उसको. उसका हाथ मोंतेविदेओ[3] में कैद किया गया था. नोउचेद के पैर उसको जितना खींच सकते थे, वो उतनी तेजी से भाग रहा था, कि उसका पीछा कर रहे पुलिसकर्मी ने उसे पकड़ लिया और चिल्लाया: ‘तुम गिरफ्तार किए जाते हो!’ और उसने पाया कि उसने तो बस एक हाथ पकड़ रखा है. बाकी का नोउचेद डेढ़ साल के बाद पायसंदू[4] में पकड़ा गया.

जेल में, नोउचेद अपना हाथ वापस चाहता था.

एक दरख्वास्त लिखो,’ उन्होंने उसे कहा.

उसने समझाया कि उसके पास पेंसिल नहीं है:

‘पेंसिल के लिए एक आवेदन लिखो,’ उन्होंने उससे कहा.

तब उसे पेंसिल मिल गई, लेकिन फिर कागज नहीं था.

‘कागज के लिए एक आवेदन लिखो,’ उन्होंने उससे कहा.

जब आखिर में उसके पास पेंसिल और कागज था, उसने अपने हाथ के लिए दरख्वास्त लिखी.

आखिर में, उसे जवाब मिला. नहीं. यह मुमकिन नहीं था. उसका हाथ एक अलग ही अदालत के अख्तियार में था. उस पर एक फौजी अदालत में सुनवाई हो रही थी. उसके हाथ पर एक नागरिक अदालत में मुकदमा चल रहा था.

नौकरशाही/3

सिक्सतो मार्तिनेस ने सेविय्ये[5] में बैरकों में अपनी फौजी सेवाएं पूरी कीं. उस बैरक के आंगन के बीच में एक छोटी सी बेंच थी. उस छोटी सी बेंच की बगल में एक फौजी जवान खड़ा रहता था. यह बात कोई नहीं जानता था कि बेंच को पहरेदारी की जरूरत क्यों है. उसकी पहरेदारी चौबीसों घंटे होती थी – हर रोज, हर रात और एक पीढ़ी के अधिकारी से लेकर अगली पीढ़ी के अधिकारी तक आदेश आगे बढ़ते रहे और फौजी उस पर अमल करते रहे. किसी ने कभी कोई शक जाहिर नहीं किया या नहीं पूछा कि क्यों. अगर कोई चीज ऐसी ही होनी थी, तो उसकी कोई वजह तो होनी चाहिए.

और यह इसी तरह तब तक चलता रहा, जब किसी ने, किसी जनरल या कर्नल ने, उस आदेश की मूल प्रति नहीं देखनी चाही. उसे सारी फाइलों के अंबार की खाक छाननी पड़ी. काफी मशक्कत के बाद, उसको जवाब मिल ही गया. इकतीस बरस, दो महीने और चार दिन पहले, एक अफसर ने एक पहरेदार को उस छोटी सी बेंच की बगल में खड़े रहने का आदेश जारी किया था, जिस पर अभी अभी पेंट लगाई गई थी, ताकि कोई उस गीली पेंट वाली बेंच पर बैठ न जाए.

आतंक की संस्कृति/6

वकील पेद्रो आलगोर्ता ने मुझे दो महिलाओं के कत्ल के बारे में एक मोटी सी फाइल दिखाई. यह दोहरा कत्ल मोंतेविदेओ के बाहरी इलाके में 1982 के आखिरी दिनों में, एक छुरे से किया गया था.

मुल्जिमा आल्मा दी आगोस्तो ने जुर्म कबूल कर लिया था. वह एक साल से ज्यादा वक्त तक जेल में रही और यह साफ दिखता था कि वह अपनी पूरी जिंदगी वहीं सड़ने वाली है.

जैसा कि रिवाज है, पुलिस ने उसका बलात्कार किया था और यातनाएं दी थीं. एक महीने तक लगातार पीटने के बाद उन्होंने उससे अनेक कबूलनामे निकाल लिए थे. आल्मा दी आगोस्तो के कबूलनामे एक दूसरे से बहुत मेल नहीं खाते थे, मानो उसने एक ही कत्ल अलग अलग तरीकों से किया हो. हरेक कबूलनामे में अलग अलग लोग आते, बिना नाम और पतों वाले गजब-गजब के भूत, क्योंकि जानवरों को पीटने वाली बिजली की छड़ी किसी को भी एक धुआंधार किस्सागो में बदल सकती है. इससे भी अधिक, लेखिका ने अपने कबूलनामे में एक ओलंपिक धावक की फुर्ती, भरे हुए मेले की ताकत, सांडों की लड़ाई के एक पेशेवर लड़ाके (मातादोर) की महारत को भी जाहिर किया. 


लेकिन सबसे हैरान कर देने वाली थी उसके ब्योरों की बहुलता: हरेक कबूलनामे में मुल्जिमा ने सूई की नोक जैसी सटीक बारीकी के साथ कपड़ों, हाव-भाव और हरकतों, माहौल, स्थितियों और चीजों का ब्योरा दिया था...

आल्मा दी आगोस्तो अंधी थी.

उसको जानने वाले और उसे प्यार करनेवाले उसके पड़ोसियों को यकीन था कि वह दोषी थी:

क्यों?’ वकील ने पूछा.

‘क्योंकि अखबारों में ऐसा लिखा है.’

‘लेकिन अखबार झूठ बोलते हैं,’ वकील ने कहा.

‘लेकिन रेडियो में भी यही बताया गया,’ पड़ोसियों ने समझाया.

‘और टीवी में भी.’
 
(एल लिब्रो दे लोस आब्रासोस से)

व्यवस्था

तानाशाही के अपराधों के इल्जाम, ऐसी फेहरिश्तों पर ही खत्म नहीं होते, जो उनके बारे में बताती हैं जिन्हें यातनाएं दी गई हैं, मार दिया गया है या जो गायब कर दिए गए हैं. मशीन आपको अहंकार और झूठ के सबक भी देती है. एकजुटता जाहिर करना अपराध है. मशीन सिखाती है, कि खुद को बचाने के लिए आपको दोमुंहा और कमीना होना होगा. जो इंसान आज आपको चूमता है, वह कल आपको बेच डालेगा. हरेक मदद, बदले की एक कार्रवाई को जन्म देती है. आप जो सोचते हैं, अगर वह कह डालें, तो वे आपको कुचल डालेंगे और कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहता. क्या एक बेरोजगार मजदूर मन ही मन यह चाहत नहीं रखता कि कारखाना दूसरों को निकाल बाहर करे, ताकि वह उनकी जगह पा सके? क्या आपका पड़ोसी ही आपका मुकाबिल और दुश्मन नहीं है? बहुत समय नहीं गुजरा, जब मोंतेविदेओ में एक नन्हें से बच्चे ने अपनी मां से कहा कि वो उसे अस्पताल में ले चले, क्योंकि वह अब अपनी पैदाइश को वापस लौटाना चाहता था.

बिना खून की एक बूंद भी बहाए, बिना किसी आंसू के, हरेक जेल में बेहतरीन लोगों का रोजाना कत्लेआम हो रहा है. मशीन जीत रही है: लोग बात करने से और एक दूसरे को देखने से डरते हैं. कहीं भीं, कोई भी, किसी और से न मिले. जब कोई तुम्हें देखता है और देखता रहता है, आप सोचते हैं, ‘वह मुझे नुकसान पहुंचाने जा रहा है.’ मैनेजर अपने कर्मचारी से कहता है, जो कभी उसका दोस्त था:
 

‘मुझको तुम्हारी खबर देनी ही होगी. उन्होंने मुझसे एक सूची मांगी है. कुछ नाम दिए जाने हैं. अगर तुम कर सको, तो मुझे माफ कर देना.’

उरुग्वे के हर तीस इंसानों में से, एक का काम निगरानी रखना, लोगों को मार डालना और सजाएं देना है. गैरिसनों और पुलिस थानों के बाहर कोई काम नहीं है, और हर हालत में अपने काम को जारी रखने के लिए आपको पुलिस द्वारा दी गई, लोकतांत्रिक आस्था के एक प्रमाणपत्र की जरूरत है. छात्रों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने साथी छात्रों के बारे में खबर देंगे,  बच्चों से अपने शिक्षकों के बारे में बताने को कहा जाता है.

आर्खेंतीना में टीवी पूछता है, ‘क्या आपको पता है, आपका बच्चा ठीक अभी क्या कर रहा है?’

आत्मा में जहर भर कर उसकी हत्या करने की खबरें अखबारों के अपराध पन्नों पर क्यों दर्ज नहीं की जातीं?

व्यवस्था

मशीन नौजवानों पर मुकदमे थोपती है: वह उन्हें कैद करती है, यातनाएं देती है, मार डालती है. ये नौजवान इस मशीन के नाकारेपन के जीते जागते सबूत हैं. यह उन्हें निकाल बाहर करती है: यह उन्हें बेचती है, इंसानी गोश्त, सस्ता श्रम, विदेशों में.

निकम्मी मशीन हर उस चीज से नफरत करती है, जो फलफूल रही है और हरकत कर रही है. यह सिर्फ जेलों और कब्रिस्तानों की तादाद ही बढ़ाने के काबिल है. यह और कुछ नहीं बल्कि कैदियों और लाशों, जासूसों और पुलिस, भिखारियों और जलावतनों को ही पैदा कर सकती है.

नौजवान होना एक जुर्म है. हर सुबह हकीकत इसकी तस्दीक करती है, और इतिहास भी-जो हर सुबह नए सिरे से जन्म लेता है.
 

इसलिए हकीकत और इतिहास दोनों पर पाबंदी है.  
(दिआस ई नोचेस दे आमोर ई दे गेर्रा से)

बेरोजगारी एक बेकार का ऐब है

बेरोजगारी, अपराध की दरों में भारी बढ़ोतरी लाती है और जलील करने वाली दिहाड़ी इसे कोंच कर और ऊंचा उठा देती है. यह स्पेनी मुहावरा इससे ज्यादा मुनासिब कभी नहीं हुआ: ‘चालाक लोग बेवकूफों की मेहनत पर पलते हैं और बेवकूफ लोग अपनी मेहनत पर.’ इसके उलट, कोई यह नहीं कहता, ‘कड़ी मेहनत करो और तुम फलो-फूलोगे,’ क्योंकि अब कोई इसमें यकीन ही नहीं करता.

श्रम अधिकार घट कर अब महज काम का अधिकार बन गए हैं, कोई भी काम, जिसे आप अपने बर्दाश्त करने लायक जैसी तैसी दशा में हासिल करते हैं. काम सारे ऐबों में सबसे बेकार का ऐब है. दुनिया में कोई भी माल मेहनत से सस्ता नहीं है. मजदूरियां घटती हैं और काम के घंटे बढ़ते हैं, और श्रम बाजार लोगों की उल्टी करता रहा है. लो या फिर रास्ता नापो – तुम्हारे पीछे एक लंबी कतार है.

खौफ के दौर में रोजगार और बेरोजगारी

खौफ का साया आपकी एड़ियों पर दांत गड़ाए हुए है, चाहे आप जितना तेज भाग लें. अपनी नौकरी खोने का खौफ, अपना पैसा खोने का खौफ, अपना खाना खोने का खौफ, अपना घर खोने का खौफ. कोई भी ताबीज आपको अचानक आई बदकिस्मती के शाप से बचा नहीं सकती है. एक पल से लेकर अगले पल तक, सबसे बड़ा विजेता भी हारे हुए में बदल सकता है, जो किसी माफी या हमदर्दी के काबिल नहीं रह जाता.

बेरोजगारी की दहशत से कौन महफूज है? नई तकनीक से या भूमंडलीकरण से, या आज दुनिया को झकझोर रहे किसी भी तूफान से अपने जहाज के डूब जाने का किसको डर नहीं है? लहरें गुस्से में टक्कर मार रही हैं: स्थानीय उद्योग तबाह हो रहे हैं या बोरिया बिस्तर समेट रहे हैं, सस्ते श्रम को लेकर दूसरे इलाकों के साथ मुकाबला है, मशीनों की बेरहम तरक्की जारी है जिन्हें न तो तनख्वाह चाहिए और न ही छुट्टियां या बोनस या पेंशन या सेवेरेंस पे या कुछ भी, उसे बस बिजली चाहिए जो उसका पेट भरती है.

तकनीक के विकास का अंजाम न तो पहले के मुकाबले ज्यादा फुरसत के पल हैं और न ही आजादी, बल्कि सिर्फ ज्यादा बेरोजगारी और खौफ. गुलाबी स्लिप के भूत का खौफ हर कहीं पाया जाता है: हमें अफसोस के साथ आपको बताना पड़ता है कि नई बजट नीति की वजह से हमें आपकी सेवाओं से महरूम होना पड़ेगा. या फिर झटके को हल्का बनाने के लिए अच्छी अच्छी बातों के बिना ही, जैसी है वैसी खरी खरी बात. कोई भी कभी भी, कहीं भी, निशाना बन सकता है. चालीस बरस की उम्र में, कोई भी आज से कल बीतते न बीतते पुराना पड़ सकता है.

1996 और 1997 में हालात पर आई एक रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का कहना है, ‘दुनिया में रोजगार की तरक्की मायूस करनेवाली बनी हुई है.’ औद्योगिकीकृत देशों में बेरोजगारी ऊंची बनी हुई है जो सामाजिक गैर बराबरी को बढ़ाने में योगदान करती है और तथाकथित विकासशील देशों में, बेरोजगारी और गरीबी गैरमामूली तरीके से बढ़ी हैं. ‘यही चीज खौफ को फैलाती है,’ रिपोर्ट फैसला सुनाती है. और खौफ फैसला सुनाता है: या तो आपके पास नौकरी है या फिर कुछ नहीं है. ऑस्वित्ज के प्रवेश द्वार पर यह लिखा हुआ था: ‘काम आपको आजाद बनाएगा.’ आधी सदी से थोड़ा ज्यादा वक्त बीतने के बाद, किसी भी रोजगारशुदा मजदूर को कंपनी को उसकी रहमदिली का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिसने उसे पीठ तोड़ देने वाले दिनों को जारी रखने की इजाजत दी है, और इसकी इजाजत दी है कि वो दफ्तर या कारखाने की जिंदगी की थकान का चारा बन जाए. एक नौकरी हासिल करने, या नौकरी में बने रहने का जश्न इस तरह मनाया जाता है मानो वह कोई चमत्कार हो, भले यह नौकरी बिना छुट्टियों के, बिना पेंशन के या बिना किसी फायदे के मिले और यहां तक कि इसकी मजदूरी गलाजत से भरी हुई क्यों न हो.

मशहूर शब्द
28 नवंबर 1990 को आखेंतीना के अखबारों ने अब राजनेता बन चुके एक मजदूर नेता की बुद्धि की एक बानगी पेश की. अपनी रातों रात हासिल की गई दौलत का राज लुईस बार्रिनुएवो ने इस तरह खोला: ‘काम करते हुए आप पैसे नहीं बनाते.’
जब उन पर धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए, उनके दोस्तों ने उनकी तारीफ में दावतें दीं. बाद में, वे प्रथम श्रेणी के सॉकर क्लब के अध्यक्ष चुने गए, और इस पूरे दौरान वे खाद्य सेवा के मजदूरों के संघ के नेता बने रहे.

सेंट काखेतान बेरोजगारों के सरपरस्त हैं और आर्खेंतीना के सबसे लोकप्रिय संत हैं. लोगों की भीड़ उनसे काम की भीख मांगने आती है. चाहे वह औरत हो या मर्द, किसी भी दूसरे संत के इतने ज्यादा चाहने वाले नहीं हैं. मई से अक्तूबर 1997 के बीच, जब एकाएक दो सौ डॉलर हर माह देने वाली नई नौकरियां सामने आईं तो अनेक लोगों ने इस पर हैरानी जताई कि इसके लिए कौन जिम्मेदार था – संत काखेतान या फिर लोकतंत्र. चुनाव आने वाले थे और आर्खेंतीनी सरकार ने संत को हैरान करते हुए पांच लाख नौकरियां देने का ऐलान किया था. लेकिन वे प्रचार अभियान से आगे नहीं जा पाईं. कुछ वक्त बाद, राष्ट्रपति मेनेम ने आर्खेंतीनियों को सलाह दी कि वे गोल्फ खेलना शुरू करें, क्योंकि यह सुकून देने वाला है और आपके दिमाग को मुश्किलों से दूर रखता है.

बेरोजगारों की तादाद बढ़ती रहती है. दुनिया में फाजिल लोगों की तादाद बढ़ रही है. धरती के मालिक इतनी सारी बेकार की इंसानियत का क्या करेंगे? क्या उन्हें चांद पर भेज देंगे? 1998 की शुरुआत में, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय देशों में हुए भारी प्रदर्शनों ने दुनिया भर में सुर्खियां बनाईं. जुलूस में शामिल में कुछ लोगों ने आज की दुनिया में श्रम के तमाशे का प्रदर्शन करते हुए कूड़े की काली थैलियां पहन रखी थीं. यूरोप में हो सकता है कि बेरोजगारी की बदनसीबी को आसान बनाने के लिए अभी भी बीमा मौजूद हो, लेकिन यह तथ्य अपनी जगह पर कायम है कि वहां भी हर चार में से एक नौजवान एक भरोसेमंद नौकरी नहीं हासिल कर सकता. यूरोप में पर्दे के पीछे चलने वाले और गैरकानूनी काम पिछली चौथाई सदी में तीन गुना बढ़ गए हैं. ग्रेट ब्रिटेन में घर पर काम करने वाले मजदूरों की तादाद बढ़ी है, जो हमेशा उपलब्ध रहते हैं और तब तक उन्हें एक धेले की कमाई भी नहीं होती, जब तक फोन की घंटी नहीं बजती. फिर वे एक रोजगार एजेंसी के लिए थोड़े वक्त काम करते हैं और फिर घर लौट आते हैं ताकि अगली बार फोन की घंटी बजने का इंतजार कर सकें.

भूमंडलीकरण एक जादुई जहाज है, जो कारखानों की आत्मा को गरीब देशों से निकाल भगाता है. तकनीक, जो किसी भी चीज के उत्पादन के लिए जरूरी श्रम के समय को कम करने की काबिलियत रखती है, अपनी इस काबिलियत में कमजोर है, कि यह कामगारों को और भी गरीब और उत्पीड़ित बनाती है न कि उन्हें जरूरतों और गुलामी से आजादी दिलाती है. और पैसे बनाने के लिए श्रम अब जरूरी नहीं रह गया है. किसी कच्चे माल को बदलने की जरूरत नहीं रही, उन्हें छूने तक की जरूरत नहीं रही, क्योंकि पैसा तब सबसे ज्यादा फलता-फूलता है, जब यह खुद से प्यार करता है. दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक कंपनियों में से एक सिएमंस अपनी उत्पादक गतिविधियों के मुकाबले अपने वित्तीय निवेशों से कहीं ज्यादा कमाई करती है.

संयुक्त राज्य में, यूरोप के मुकाबले कहीं कम बेरोजगारी है, लेकिन नई नौकरियां अस्थायी हैं, उनका मेहनताना बहुत कम है और उनमें फायदे नहीं हैं. ‘मैं इसे अपने छात्रों में देख सकता हूं,’ नोम चोम्स्की कहते हैं. ‘वे डरे हुए हैं कि अगर उन्होंने मुनासिब रवैया नहीं अपनाया, तो उन्हें कभी नौकरी नहीं मिलेगी और इसका उन पर सजा की तरह असर होता है.’ संयुक्त राज्य की पांच सौ बड़ी कंपनियों में, दस कर्मचारियों में से सिर्फ एक के पास ही स्थायी, पूरावक्ती नौकरी हासिल होने का नसीब हासिल है.
 
(पातास आरीबा से)

अदालतें और इंसाफ

लेखक डेनियल ड्री कहते हैं कि कानून मकड़ी का एक ऐसा जाल है, जिसे मक्खियों और छोटे कीड़ों को पकड़ने के लिए बुना गया है, न कि बड़ी प्रजातियों का रास्ता रोकने के लिए. एक सदी पहले, कवि खोसे एरनांदेस ने कानून की तुलना एक छुरे से की थी, जो कभी उसकी ओर नहीं मुड़ता, जिसने उसे पकड़ रखा हो.

अप्रैल 1997 में, ब्रासीलिया[6] शहर गए एक आदिवासी नेता खाल्दिनो खेसुस दोस सांतोस को तब जिंदा जला कर मार दिया गया, जब वे एक बस स्टॉप पर सो रहे थे. शहर घूमने निकले, अच्छे परिवारों के पांच किशोरों ने उन पर अल्कोहल छिड़क कर आग लगा दी थी. उन्होंने यह कहते हुए अपनी हरकत को जायज ठहराया, ‘हमने सोचा कि वो एक भिखारी था.’ एक साल के बाद उन्हें कैद की हल्की सी सजा हुई; बहरहाल, यह पहले से सोच समझ कर की गई हत्या का मामला नहीं था. जैसा कि संघीय जिला अदालत के प्रवक्ता ने समझाया, बच्चे जितना अल्कोहल ले गए थे, उसका आधा ही उन्होंने इस्तेमाल किया था, जो साबित करता है कि उन्होंने यह काम ‘मौज-मस्ती के मकसद से किया, न कि हत्या के इरादे से.’

(पातास आरीबा से एक संपादित अंश)

अदृश्य तानाशाहियों की खिड़की

तकलीफ सहने वाली मां, गुलामी की तानाशाही को अमल में लाती है.

मददगार दोस्त, मदद की तानाशाही को अमल में लाता है.

खैरात, कर्जे की तानाशाही को अमल में लाती है.

मुक्त बाजार, हमें वो कीमतें कबूल करने की इजाजत देता है जो हम पर थोपी गई हैं.

आजाद अभिव्यक्ति हमें वो सब सुनने की इजाजत देती है जो हमारे नाम पर कहा जाता है.

आजाद चुनाव हमें उस चटनी को चुनने की इजाजत देते हैं, जिसके साथ हम सबको खाया जाएगा.
 
(लास पालाब्रास आंदांतेस से)

अनुवादकीय टिप्पणियां

1.सेसार वायेखो पेरु के कवि, नाटककार और पत्रकार थे. 1892 में जन्मे वायेखो को पिछली सदी की किसी भी भाषा के महानतम कवियों में से एक माना जाता है. 1938 में उनकी मौत तब एक अनजान बीमारी से हो गई थी, जिसे अब मलेरिया की एक किस्म माना जाने लगा है. 1930 के दशक में फ्रांको के नेतृत्व में हुए फौजी तख्तापलट के खिलाफ वायेखो भावनात्मक और बौद्धिक दोनों रूपों में गृहयुद्ध में शामिल हुए और उनकी कविताएं स्पेन में बहस का मुद्दा बनीं.
2.लातीनी अमेरिका का एक देश. गालेआनो इसी देश के निवासी थे.
3. उरुग्वे की राजधानी.
4. पश्चिमी उरुग्वे का एक शहर.
5. स्पेन के आंदालुसिया स्वायत्त कम्युनिटी का सबसे बड़ा शहर और राजधानी.
6. ब्रासीलिया, ब्रासील की संघीय राजधानी है.

इंसाफ कहां है?

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/18/2015 11:06:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े
''यह अदालत बड़े अपराधियों के लिए सुरक्षित स्वर्ग बन गई है।’’
-सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान और न्यायमूर्ति एस.ए. बोडबे की पीठ।[1]

भारत के संविधान की प्रस्तावना में बाकी चीजों के साथ 'सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक इंसाफ’ शामिल है जो यकीनन आम जनता को दिया गया सबसे अहम आश्वासन है। लेकिन विरोधाभास यह है कि ज्यों-ज्यों हम 'विकास’ के राजमार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं, ये तेजी के साथ दूर होते चले जा रहे हैं। संविधान का पहला पन्ना भारतीय जनता के लिए एक कड़वा व्यंग्य बन गया है और संविधान का भाग चार, 'राज्य के नीति-निर्देशक तत्व’, जो इस पर और भी जोर देते हैं कि देश के शासक किस तरह शासन करेंगे, सिवा 'पवित्र गाय’ के प्रावधान को छोड़ कर एक मुर्दा दस्तावेज बन गया है। गरीब लोग, जो संवैधानिक रूप से इस मुल्क के मालिक हैं, इंसाफ के लिए तरसते हैं जबकि अमीर लोग अपराध करते हैं और वीवीआईपी की तरह बेधड़क घूमते हैं। पूरी की पूरी न्यायिक प्रक्रिया थैलीशाहों द्वारा अगवा कर ली गई है, जैसा कि इस मुल्क की सबसे बड़ी अदालत ने भी कबूल किया है:
''यह कहते हुए हमें अफसोस होता है कि अदालत का वक्त वरिष्ठ वकीलों और बड़े अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है...हम शपथ लेकर कह सकते हैं कि सिर्फ पांच फीसदी वक्त ही आम नागरिकों के लिए इस्तेमाल में आता है, जिनकी अपीलें 20 या 30 बरसों से इंतजार कर रही हैं...।’[2]

बदकिस्मती से यह बात सिर्फ वक्त तक ही सीमित नहीं है; यह गरीबों और मजलूमों के खिलाफ न्यायिक पूर्वाग्रहों की गहराई तक जाती है, जिन्हें इंसाफ की जरूरत सबसे ज्यादा है। एक ओर जब सरकार केइस पांव (न्यायपालिका) के बारे में कहा जा सकता है कि इसने दूसरे दोनों पांवों—विधायिका और कार्यपालिका —से बेहतर प्रदर्शन किया है, या ऐसा दिखता है क्योंकि लोग बेचारगी में इस पर भरोसा करते हैं, लेकिन अक्सर इंसाफ ही है जो नहीं मिल पाता। इसे साफ-साफ देखना हो कि कैसे इंसाफ को नकारा जाता है तो इसे दलितों, आदिवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के मामलों में देखा जा सकता है, और कैसे इसकी ज्यादती होती है तो इसे राजनेताओं, शोहरत वाले अपराधियोंऔर कॉरपोरेट घपलेबाजों के मामले में देखा जा सकता है। पिछले महीने जल्दी-जल्दी, एक के बाद एक आए दो फैसले, जो वैसे तो गैरमामूली नहीं थे, निश्चित रूप से इस बात को मजबूत करते हैं। दो अलग-अलग राज्यों  के उच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए फैसलों से जुड़े ये मामले थे सलमान खान का 'हिट एंड रन केस’ जिसने इंसाफ पर अमीरों के असर को जाहिर किया और जे. जयललिता का 'आमदनी से अधिक संपत्ति का मामला’ जो इंसाफ पर राजनीति के असर का इशारा करता है।

सलमान बनाम साईबाबा

'जमानत कायदा है, अपवाद नहीं’, विचाराधीन कैदियों को जमानत देने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की हिदायत यह है। लेकिन अदालतों द्वारा किस तरह इसे भेदभाव के साथ अमल में लाया जाता है इसकी मिसालों की भरमार है। पैसे वाले अपराधी भारी-भरकम वकीलों को लगाते हैं जो उनके लिए गिरफ्तार होने से पहले या इसके फौरन बाद जमानत हासिल कर लेते हैं और फिर इसकी अवधि को जितना संभव हो लंबा खींचा जाता है। जैसा सलमान के मामले में हुआ। तब तक ज्यादातर गवाह मर जाते हैं या मरने की हालत में पहुंचा दिए जाते हैं। अपराध को साबित करने वाले जो भी सबूत मौजूद होते हैं वे या तो हल्के बना दिए जाते हैं या मिटा दिए जाते हैं। तफ्तीश करने वाली एजेंसी के बारे में जितना कम कहा जाए, उतना बेहतर है, जो कि इस मामले में पुलिस है। बॉलीवुड के दबंग, सलमान ने 28 सितंबर 2002 की आधी रात के बाद, बिना लाइसेंस के, नशे की हालत में अपनी टोयटा लैंड क्रूजर को उन लोगों के ऊपर दौड़ा दिया जो सड़क की पटरी पर सो रहे थे। एक आदमी मारा गया और दूसरे चार गंभीर रूप से जख्मी हुए। सलमान मौके से भाग गए और बाद में एक वकील के घर से गिरफ्तार हुए। हालांकि वह ऐसे 'दंडनीय कत्ल जो हत्या के बराबर नहीं’ था के लिए पकड़े गए, इसलिए उन्हें जमानत मिल गई और उन्होंने अगले 13 वर्ष एक सेलिब्रिटी की जिंदगी जी। जब आखिरकार उनका कसूर साबित हुआ और उन्हें पांच साल कैद की सजा मिली, तब कुछ घंटों के भीतर ही बंबई उच्च न्यायालय ने उनके वकील की अर्जी सुनी और उन्हें सुपरसोनिक गति से जमानत दे दी गई। यह वह अदालत है जहां मामूली इंसानों को अपना मामला सुनवाई के लिए आने के लिए बरसों तक इंतजार करना पड़ता है। अपने आप में जमानत नहीं, बल्कि उसको दिए जाने का तरीका न्यायपालिका के उस रवैए को उजागर करता है, जो वह अमीरों के प्रति अपनाती है और इसके उलट गरीबों से नफरत करती है।

इसके बरअक्स आप डॉ. जी.एन. साईबाबा के मामले को रखें, जो 90 फीसदी अक्षमता वाले शरीर के साथ व्हीलचेयर पर चलने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में प्रोफेसर हैं। वह कुछ साल पहले तक सिर्फ अपने हाथों से रेंगते थे और वह बिना मदद के जिंदा नहीं रह सकते हैं, उन्हें बार-बार जमानत देने को नकारा जा रहा है, जबकि उनकी गिरती हुई सेहत को लेकर सार्वजिनक तौर पर काफी चिंताएं हैं। वर्षों के शारीरिक तौर पर पडऩे वाले प्रभाव ने उनके दिल और फेफड़ों पर गंभीर नुकसान पहुंचाया है और यह लगातार उनकी रीढ़ (स्पाइनल सिस्टम) को नुकसान पहुंचा रहा है। इसके अलावा, खबर है कि जेल में अनियमित और अनुपयुक्त इलाज ने, जिसके लिए उनके वकीलों को लगातार जद्दोजहद करनी पड़ती है, उनके दोनों गुर्दों को खराब कर दिया है। साईबाबा ने कभी अपने राजनीतिक नजरिए को छिपाया नहीं और जैसा कि पुलिस दावा करती है, उनके माओवादियों के साथ संपर्क भी हो सकते हैं, लेकिन यह अकल्पनीय है कि उन्होंने कोई अपराध किया है। संविधान आस्था रखने और बोलने की आजादी देता है और सर्वोच्च न्यायालय ने यह साफ-साफ कहा है कि महज किसी प्रतिबंधित संगठन के साथ जान-पहचान होना या महज उसके उद्देश्यों से सहानुभूति रखना कोई अपराध नहीं है। एक प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होना भी अपराध नहीं है, जब तक व्यक्ति संगठन की गैर कानूनी गतिविधियों में भागीदारी न करे। पुलिस ने अब तक रत्तीभर सबूत मुहैया नहीं किया है कि साईबाबा माओवादियों की किसी गैरकानूनी गतिविधि में शरीक थे, तो जब कोई ऐसा इंसान भयावह गैरकानूनी गतिविधि निरोधक कानून (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार हो जाता है और कुख्यात नागपुर जेल की एकाकी अंडा-सेल में कैद कर लिया जाता है तो इसका क्या मतलब है? जब न्यायपालिका सलमान जैसे लोगों को लगातार जमानतें देती है लेकिन साईबाबा को देने से लगातार इनकार करती है, जो गरीबों की हिमायत में बोलते हैं तो इसका क्या मतलब है? क्या वो यह सोचती है कि अगर उन्होंने एक अपराध किया है तो वह जमानत तोड़कर भाग जाएंगे और कसूरवार साबित होने पर सजा से बच जाएंगे?

अम्मा की रिहाई

11 मई को कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भाजपा के सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा जून 1996 में दायर किए गए 'आमदनी से अधिक संपत्ति’ रखने के मामले में विशेष अदालत द्वारा जे. जयललिता को कसूरवार साबित किए जाने को पलट दिया। मुकदमा 19 बरस तक चला और इस बीच सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे चेन्नई से बेंगलुरु भेज दिया गया। विशेष अदालत ने 27 सितंबर 2014 को फैसला सुनाया, जिसने जयललिता और उनके तीन सहयोगियों, शशिकला नटराजन, इलावरसी और वी.एन. सुधाकरण को कसूरवार पाया। उन्हें चार साल की साधारण कैद और जयललिता पर 100 करोड़ का जुर्माना और बाकियों में से हरेक पर 10 करोड़ का जुर्माना लगाया गया। जयललिता तीसरी बार कसूरवार साबित हुई थीं और दूसरी बार उन्हें मुख्यमंत्री का पद छोडऩा पड़ा था। सभी चारों कसूरवार साबित व्यक्तियों को गिरफ्तार करके पोरापन्ना अग्रहार केंद्रीय जेल में रखा गया। उनकी जमानत की अर्जी कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा खारिज कर दी गई, लेकिन इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में उसे मंजूर करके जमानत दे दी गई। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उनकी जमानत की अर्जी पर फैसला करते हुए उन सभी को सभी मामलों में बरी कर दिया। अब जयललिता ने औपचारिक तरीके से राज्य की मुख्यमंत्री का पद संभाल भी लिया है।

खबरों के मुताबिक यह रिहाई जज द्वारा संपत्तियों और देनदारियों का गलत हिसाब लगाए जाने पर आधारित है। अगर इस मामले में शामिल जायदाद की सिर्फ फेहरिश्त ही पढ़ ली जाए (चेन्नई में फार्म हाउस और बंगला, तमिलनाडु में खेतिहर जमीन, हैदराबाद में फार्म हाउस, नीलगिरी पहाडिय़ों में चायबागान, बहुमूल्य गहने, औद्योगिक शेड, जमा नकदी, बैंकों में निवेश और लक्जरी कारों का सेट; 800 किलो चांदी, 28 किलो सोना, 750 जोड़ी जूते, 10, 500 साडिय़ां, 91 घडिय़ां और चेन्नई के भारतीय रिजर्व बैंक की तिजोरी में रखी गई बहुमूल्य चीजें) तो कोई भी साफ कह सकता है कि यह भ्रष्टाचार का मामला है। लेकिन अदालत को यह कहने में 18 साल लगे और उच्च न्यायालय को उसे पलटने में महज एक साल। इस फैसले का तर्क भाजपा की राजनीतिक जरूरत से जुड़ा हुआ है। लोकसभा में 37 और ऊपरी सदन (राज्य सभा) में 11 सांसदों वाली जयललिता भाजपा के लिए अनमोल सहयोगी हैं, जिसके लिए पहले उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों से छुटकारा दिलाना जरूरी है। और जब ऐसा कर दिया गया, तब किसी और ने नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले उन्हें मुबारकबाद देने के लिए फोन किया। भाजपा, राज्य सभा में अपनी कमजोरी से पार पाने के लिए बेकरार है जैसा कि उत्तर प्रदेश में मुलायम को लुभाने और पश्चिम बंगाल में ममता से दोस्ती बनाने की इसकी कोशिशों में देखा जा सकता है। ऐसे हालात में जयललिता पर से दाग हटाने के लिए जज यह अंदाजा लगाते हुए हिसाब में कुछ गोलमाल कर सकेकि इसको चुनौती नहीं दी जाएगी। सुब्रमण्यम स्वामी ने भी साफ कर दिया है कि वह कुछ नहीं करेंगे। अगर राज्य (कर्नाटक) की कांग्रेस सरकार ऐसा करती है, तो फैसला होने में लंबा समय लगेगा।

न्यायिक आजादी

हमें सिखाया गया है कि भारतीय लोकतंत्र तीन बराबर और स्वतंत्र पैरों पर खड़ा है: विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, जो एक दूसरे के कामों पर अंकुश रखने वाली संवैधानिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं। आजादी की यह सैद्धांतिक धारणा, सिद्धांत के रूप में अपने आप में ही समस्याजनक है क्योंकि जो सरकार सदन में बहुमत वाले दल द्वारा बनाई जाती है, वह विधायिका और कार्यपालिका के विलय का प्रतिनिधित्व करती है; यह कार्यपालक शक्तियों को अपने पास रखती है और नौकरशाही पर सीधा नियंत्रण करती है, जबकि यह विधायिका के काम भी साथ में जारी रखती है; उनका बेमेल वजूद मायने नहीं रखता। एक अरसे से, सबसे ज्यादा वोट हासिल करने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने वाली हमारी चुनावी प्रणाली द्वारा बनाए गए राजनीतिक आदर्श ने दलों के बीच के बुनियादी अंतर को धुंधला कर दिया है और नौकरशाही ने विधायिका (राजनेताओं) के आदेश को लागू करना सीख लिया है। अशोक खेमका जैसे इक्के-दुक्के उदाहरण असल में इस पूरी गतिकी को जाहिर करते हैं। जो कुछ भी आजादी मौजूद थी वह न्यायपालिका में थी, जो संविधान की सर्वोच्च संरक्षक और कानून के शासन की गारंटी करने वाली है। यह कार्यपालिका और विधायिका के कामों को संविधान द्वारा दिए गए अख्तियार से बाहर करार देकर खारिज कर सकती थी। देरियों और मौके-बेमौके होने वाले विवादों के बावजूद, भारतीय जनता इंसाफ के लिए ज्यादातर न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा करती थी।

मौजूदा संसद ने संवैधानिक (99वें संशोधन) अधिनियम, 2014 के तहत राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया है जो 13 अप्रैल 2015 से काम करने लगा है। आयोग ने जजों की नियुक्ति और तबादले के लिए पहले के कॉलेजियम सिस्टम की जगह ली है। जबकि सिद्धांत में आयोग के अध्यक्ष भारत के सर्वोच्च न्यायाधीश होंगे और सर्वोच्च न्यायालय के दो और जज इसके सदस्य होंगे; केंद्रीय कानून मंत्री इसके पदासीन सदस्य होंगे और दो गणमान्य व्यक्तियों का मनोनयन प्रधान न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता की सदस्यता वाली समिति करेगी, जिनमें से किन्हीं भी दो सदस्यों को समिति के फैसले पर वीटो का इस्तेमाल कर सकने का प्रावधान है। इन मनोनीत दो सदस्यों में से एक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग या अल्पसंख्यक समुदाय या एक महिला होंगी। ऊपर से यह बदलाव ठीक दिखता है, लेकिन इसने बुनियादी तौर पर राजनीति के लिए जगह बना दी है और इसने न्यायपालिका की आजादी को संभावित रूप से नुकसान पहुंचाया है। आयोग ने बस काम करना शुरू ही किया है लेकिन इसका असर उन फैसलों में दिखने लगा है जो सत्ताधारी राजनीति को फायदा पहुंचाते दिख रहे हैं।

अनुवाद: रेयाज उल हक

नोट्स:

1. http://www.dailymail.co.uk/indiahome/indianews/article-2449211/Top-judges-admit-Indias-justice-tragedy-common-citizens-ignored-favour-high-profile-cases.html#ixzz3ajoMZPpZ पर उपलब्ध। आखिरी बार 20 मई 2015 को देखा गया.
2. वही.

आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर लगी पाबंदी पर अरुंधति रॉय का बयान

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/30/2015 03:46:00 PM


कार्यकर्ता-लेखिका अरुंधति रॉय ने यह बयान आईआईटी मद्रास द्वारा छात्र संगठन आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर लगाई गई पाबंदी (नामंजूरी) के संदर्भ में जारी किया है. एक दूसरी खबर के मुताबिक, एपीएससी को लिखे अपने पत्र में भी उन्होंने यही बात कही है कि ‘आपने एक दुखती हुई रग को छू दिया है – आप जो कह रहे हैं और देख रहे हैं यानी यह कि जातिवाद और कॉपोरेट पूंजीवाद हाथ में हाथ डाले चल रहे हैं, यह वो आखिरी बात है जो प्रशासन और सरकार सुनना चाहती है. क्योंकि वे जानते हैं कि आप सही हैं. उनके सुनने के लिहाज से आज की तारीख में यह सबसे खतरनाक बात है.’

आखिर एक छात्र संगठन आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल (एपीएससी) में ऐसा क्या है जिसने आईआईटी मद्रास के डीन ऑफ स्टूडेंट्स को इतना डरा दिया कि उन्हें एकतरफा तौर पर उसको ‘डीरेकग्नाइज’ (नामंजूर) करना पड़ा?

इसकी जो वजह बताई गई वह हमेशा की तरह वही बेवकूफी भरा भुलावा है: ‘‘वे समुदायों के बीच में नफरत फैला रहे थे.’’ छात्रों का कहना है कि जो दूसरी वजह उन्हें बताई गई वह यह थी कि उनके संगठन के नाम को बेहद ‘राजनीतिक’ माना गया. जाहिर है कि यही बात विवेकानंद स्टडी सर्किल जैसे छात्र संगठनों पर लागू नहीं होती.

एक ऐसे वक्त में, जब हिंदुत्व संगठन और मीडिया की दुकानें आंबेडकर का, जिन्होंने सरेआम हिंदू धर्म को छोड़ दिया था, घिनौने तरीके से खास अपने आदमी के रूप में प्रचार कर रही हैं, एक ऐसे वक्त में जब हिंदू राष्ट्रवादी घर वापसी अभियान (आर्य समाज के ‘शुद्धि’ कार्यक्रम का एक ताजा चेहरा) शुरू किया गया है ताकि दलितों को वापस ‘हिंदू पाले’ में लाया जा सके, तो ऐसा क्यों है कि जब आंबेडकर के सच्चे अनुयायी उनका नाम या उनके प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं तो उनकी हत्या कर दी जाती है, जैसे कि खैरलांजी में सुरेखा भोटमांगे के परिवार के साथ किया गया? ऐसा क्यों है कि अगर एक दलित के फोन में आंबेडकर के बारे में एक गीत वाला रिंगटोन हो तो उसे पीट पीट कर मार डाला जाता है? क्यों एपीएससी को नामंजूर कर दिया गया?

ऐसा इसलिए है कि उन्होंने इस जालसाजी की असलियत देख ली है और मुमकिन रूप से सबसे खतरनाक जगह पर अपनी उंगली रख दी है. उन्होंने कॉरपोरेट भूमंडलीकरण और जाति के बने रहने के बीच में रिश्ते को पहचान लिया है. मौजूदा शासन व्यवस्था के लिए इससे ज्यादा खतरनाक बात मुश्किल से ही और कोई होगी, जो एपीएससी ने की है- वे भगत सिंह और आंबेडकर दोनों का प्रचार कर रहे थे. यही वो चीज है, जिसने उन्हें निशाने पर ला दिया. यही तो वह चीज है, जिसे कुचलने की जरूरत बताई जा रही है. उतना ही खतरनाक वीसीके का यह ऐलान है कि वो वामपंथी और प्रगतिशील मुस्लिम संगठनों के साथ एकजुटता कायम करने जा रहे हैं.

एपीएससी की नामंजूरी, एक किस्म की मंजूरी है. यह इस बात की मंजूरी है कि ऐसे रिश्ते कायम करना बिल्कुल सही और वाजिब है, जैसे रिश्ते इसने बनाए. और यह भी कि अनेक लोग ये रिश्ते बनाने लगे हैं.

अनुवाद: रेयाज उल हक

नागौर: एक और खैरलांजी

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2015 10:43:00 AM



राजस्थान के नागौर में हुए दलितों के जनसंहार पर भंवर मेघवंशी की यह रिपोर्ट इस मुल्क का चेहरा है, जो रोज ब रोज दलित-मुस्लिम-आदिवासी बस्तियों में देखने को मिलता है. भंवर राजस्थान में दलित, आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के लिए संघर्षरत है. प्रतिरोध से साभार.

राजस्थान का नागौर जिला दलितों की कब्रगाह बनता जा रहा है. राजधानी जयपुर से तक़रीबन ढाई सौ किलोमीटर दूर स्थित अन्य पिछड़े वर्ग की एक दबंग जाट जाति की बहुलता वाला नागौर जिला इन दिनों दलित उत्पीडन की निरंतर घट रही शर्मनाक घटनाओं की वजह से कुख्यात हो रहा है. विगत एक साल के भीतर यहाँ पर दलितों के साथ जिस तरह का जुल्म हुआ है और आज भी जारी है, उसे देखा जाये तो दिल दहल जाता है, यकीन ही नहीं आता है कि हम आजाद भारत के किसी एक हिस्से की बात कर रहे है. ऐसी ऐसी निर्मम और क्रूर वारदातें कि जिनके सामने तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों द्वारा की जाने वाली घटनाएँ भी छोटी पड़ने लगती है. क्या किसी लोकतान्त्रिक राष्ट्र में ऐसी घटनाएँ संभव है? वैसे तो असम्भव है, लेकिन यह संभव हो रही है, यहाँ के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचें की नाकामी की वजह से.

नागौर जिले के बसवानी गाँव में पिछले महीने ही एक दलित परिवार के झौपड़े में दबंग जाटों ने आग लगा दी जिससे एक बुजुर्ग दलित महिला वहीँ जल कर राख हो गयी और दो अन्य लोग बुरी तरह से जल गए जिन्हें जोधपुर के सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया. इसी जिले के लंगोड़ गाँव में एक दलित को जिंदा दफनाने का मामला सामने आया है. मुंडासर में एक दलित औरत को घसीट कर ट्रेक्टर के गर्म सायलेंसर से दागा गया और हिरडोदा गाँव में एक दलित दुल्हे को घोड़ी पर से नीचे पटक कर जान से मरने की कोशिश की गयी. राजस्थान का यह जाटलेंड जिस तरह की अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहा है, उसके समक्ष तो खाप पंचायतों के तुगलकी फ़रमान भी कहीं नहीं टिकते है, ऐसा लगता है कि इस इलाके में कानून का राज नहीं, बल्कि जाट नामक किसी कबीले का कबीलाई कानून चलता है,जिसमे भीड़ का हुकुम ही न्याय है और आवारा भीड़ द्वारा किये गए कृत्य ही विधान है.



डांगावास: दलित हत्याओं की प्रयोगशाला

नागौर जिले की तहसील मेड़ता सिटी का निकटवर्ती गाँव है डांगावास, जहाँ पर 150 दलित परिवार निवास करते है और यहाँ 1600 परिवार जाट समुदाय के है. तहसील मुख्यालय से मात्र 2 किलोमीटर दुरी पर स्थित है डांगावास… जी हाँ, यह वही डांगावास गाँव है जहाँ पिछले एक साल में चार दलित हत्याकांड हो चुके है, जिसमे सबसे भयानक हाल ही में हुआ है. एक साल पहले यहाँ के दबंग जाटों ने मोहन लाल मेघवाल के निर्दोष बेटे की जान ले ली थी, मामला गाँव में ही ख़त्म कर दिया गया. उसके बाद 6 माह पहले मदन पुत्र गबरू मेघवाल के पाँव तोड़ दिये गए. 4 माह पहले सम्पत मेघवाल को जान से ख़त्म कर दिया गया, इन सभी घटनाओं को आपसी समझाईश अथवा डरा धमका कर रफा दफाकर दिया गया. पुलिस ने भी कोई कार्यवाही नहीं की.

स्थानीय दलितों का कहना है कि बसवानी में दलित महिला को जिंदा जलाने के आरोपी पकडे नहीं गए और शेष जगहों की गंभीर घटनाओं में भी कोई कार्यवाही इसलिए नहीं हुयी क्योंकि सभी घटनाओं के मुख्य आरोपी प्रभावशाली जाट समुदाय के लोग है. यहाँ पर थानेदार भी उनके है, तहसीलदार भी उनके ही और राजनेता भी उन्हीं की कौम के है, फिर किसकी बिसात जो वे जाटों पर हाथ डालने की हिम्मत दिखाये? इस तरह मिलीभगत से बर्षों से दमन का यह चक्र जारी है, कोई आवाज़ नहीं उठा सकता है, अगर भूले भटके प्रतिरोध की आवाज़ उठ भी जाती है तो उसे खामोश कर दिया जाता है.

जमीन के बदले जान

एक और ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि राजस्थान काश्तकारी कानून की धारा 42 (बी) के होते हुए भी जिले में दलितों की हजारों बीघा जमीन पर दबंग जाट समुदाय के भूमाफियाओं ने जबरन कब्ज़ा कर रखा है. यह कब्जे फर्जी गिरवी करारों, झूठे बेचाननामों और धौंस पट्टी के चलते किये गए है, जब भी कोई दलित अपने भूमि अधिकार की मांग करता है, तो दबंगों की दबंगई पूरी नंगई के साथ शुरू हो जाती है. ऐसा ही एक जमीन का मसला दलित अत्याचारों के लिए बदनाम डांगावास गाँव में विगत 30 वर्षों से कोर्ट में जेरे ट्रायल था, हुआ यह कि बस्ता राम नामक मेघवाल दलित की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन कभी मात्र 1500 रूपये में इस शर्त पर गिरवी रखी गयी कि चिमना राम जाट उसमे से फसल लेगा और मूल रकम का ब्याज़ नहीं लिया जायेगा. बाद में जब भी दलित बस्ता राम सक्षम होगा तो वह अपनी जमीन गिरवी से छुडवा लेगा. बस्ताराम जब इस स्थिति में आया कि वह मूल रकम दे कर अपनी जमीन छुडवा सकें, तब तक चिमना राम जाट तथा उसके पुत्रों ओमाराम और काना राम के मन में लालच आ गया, जमीन कीमती हो गयी. उन्होंने जमीन हड़पने की सोच ली और दलितों को जमीन लौटने से मना कर दिया. पहले दलितों ने याचना की. फिर प्रेम से गाँव के सामने अपना दुखड़ा रखा. मगर जिद्दी जाट परिवार नहीं माना. मजबूरन दलित बस्ता राम को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी. करीब तीस साल पहले मामला मेड़ता कोर्ट में पंहुचा, बस्ताराम तो न्याय मिलने से पहले ही गुजर गया. बाद में उसके दत्तक पुत्र रतनाराम ने जमीन की यह जंग जारी रखी और अपने पक्ष में फैसला प्राप्त कर लिया. वर्ष 2006 में उक्त भूमि का नामान्तरकरण रतना राम के नाम पर दर्ज हो गया तथा हाल ही में में कोर्ट का फैसला भी दलित खातेदार रतना राम के पक्ष में आ गया. इसके बाद रतना राम अपनी जमीन पर एक पक्का मकान और एक कच्चा झौपडा बना कर परिवार सहित रहने लग गया लेकिन इसी बीच 21 अप्रैल 2015 को चिमनाराम जाट के पुत्र कानाराम तथा ओमाराम ने इस जमीन पर जबरदस्ती तालाब खोदना शुरू कर दिया और खेजड़ी के वृक्ष काट लिये. रत्ना राम ने इस पर आपत्ति दर्ज करवाई तो जाट परिवार के लोगों ने ना केवल उसे जातिगत रूप से अपमानित किया बल्कि उसे तथा उसके परिवार को जान से मार देने कि धमकी भी दी गयी. मजबूरन दलित रतना राम मेड़ता थाने पंहुचा और जाटों के खिलाफ रिपोर्ट दे कर कार्यवाही की मांग की. मगर थानेदार जी चूँकि जाट समुदाय से ताल्लुक रखते है सो उन्होंने रतनाराम की शिकयत पर कोई कार्यवाही नहीं की ,दोनों पक्षों के मध्य कुछ ना कुछ चलता रहा.

निर्मम जनसंहार

12 मई को जाटों ने एक पंचायत डांगावास में बुलाने का निश्चय किया, मगर रतना राम और उसके भाई पांचाराम के गाँव में नहीं होने के कारण यह स्थगित कर दी गयी. बाद में 14 मई को फिर से जाट पंचायत बैठी. इस बार आर पार का फैसला करना ही पंचायत का उद्देश्य था. अंततः एकतरफा फ़रमान जारी हुआ कि दलितों को किसी भी कीमत पर उस जमीन से खदेड़ना है. चाहे जान देनी पड़े या लेनी पड़े. दूसरी तरफ पंचायत होने की सुचना पा कर दलित अपने को बुलाये जाने का इंतजार करते हुये अपने खेत पर स्थित मकान पर ही मौजूद रहे. अचानक उन्होंने देखा कि सैंकड़ों की तादाद में जाट लोग हाथों में लाठियां, लौहे के सरिये और बंदूके लिये वहां आ धमके है और मुट्ठी भर दलितों को चारों तरफ से घेर कर मारने लगे. उन्होंने साथ लाये ट्रेक्टरों से मकान तोडना भी चालू कर दिया.

लाठियों और सरियों से जब दलितों को मारा जा रहा था. इसी दौरान किसी ने रतनाराम मेघवाल के बेटे मुन्नाराम को निशाना बना कर फ़ायर कर दिया लेकिन उसी वक्त किसी और ने मुन्ना राम के सिर के पीछे की और लोहे के सरिये से भी वार कर दिया जिससे मुन्नाराम गिर पड़ा और गोली रामपाल गोस्वामी को जा कर लग गयी जो कि जाटों की भीड़ के साथ ही आया हुआ था. गोस्वामी की बेवजह हत्या के बाद जाट और भी उग्र हो गये. उन्होंने मानवता की सारी हदें पार करते हए वहां मौजूद दलितों का निर्मम नरसंहार करना शुरू कर दिया.

ट्रेक्टर जो कि खेतों में चलते है और फसलों को बोने के काम आते है. वे निरीह, निहत्थे दलितों पर चलने लगे. पूरी बेरहमी से जाट समुदाय की यह भीड़ दलितों को कुचल रही थी. तीन दलितों को ट्रेक्टरों से कुचल कुचल कर वहीँ मार डाला गया. इन बेमौत मारे गए दलितों में श्रमिक नेता पोकर राम भी था जो उस दिन अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए अपने भाई गणपत मेघवाल के साथ वहां आया हुआ था. जालिमों ने पोकरराम के साथ बहुत बुरा सलूक किया. उस पर ट्रेक्टर चढाने के बाद उसका लिंग नोंच लिया गया तथा आँखों में जलती लकड़ियाँ डाल कर ऑंखें फोड़ दी गयी. महिलाओं के साथ ज्यादती की गयी और उनके गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गयी. तीन लोग मारे गए ,14 लोगों के हाथ पांव तोड़ दिये गए, एक ट्रेक्टर ट्रोली तथा चार मोटर साईकलें जलाकर राख कर दी गयी, एक पक्का मकान जमींदोज कर दिया गया और कच्चे झौपड़े को आग के हवाले कर दिया गया. जो भी समान वहां था उसे लूट ले गए. इस तरह तकरीबन एक घंटा मौत के तांडव चलता रहा, लेकिन मात्र 4 किलोमीटर दूरी पर मौजूद पुलिस सब कुछ घटित हो जाने के बाद पंहुची और घायलों को अस्पताल पंहुचाने के लिए एम्बुलेंस बुलवाई, जिसे भी रोकने की कोशिश जाटों की उग्र भीड़ ने की. इतना ही नहीं बल्कि जब गंभीर घायलों को मेड़ता के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां भी पुलिस तथा प्रशासन की मौजूदगी में ही धावा बोलकर बचे हुए दलितों को भी खत्म करने की कोशिश की गयी. यह अचानक नहीं हुआ, सब कुछ पूर्वनियोजित था.



ऐसी दरिंदगी जो कि वास्तव में एक पूर्वनियोजित जनसंहार ही था, इसे नागौर की पुलिस और प्रशासन जमीन के विवाद में दो पक्षों की ख़ूनी जंग करार दे कर दलित अत्याचार की इतनी गंभीर और लौमहर्षक वारदात को कमतर करने की कोशिश कर रही है. पुलिस ने दलितों की ओर से अर्जुन राम के बयान के आधार पर एक कमजोर सी एफआईआर दर्ज की है जिसमे पोकरराम के साथ की गयी इतनी अमानवीय क्रूरता का कोई ज़िक्र तक नहीं है और ना ही महिलाओं के साथ हुयी भयावह यौन हिंसा के बारे में एक भी शब्द लिखा गया है. सब कुछ पूर्वनियोजित था, भीड़ को इकट्टा करने से लेकर रामपाल गोस्वामी को गोली मारने तक की पूरी पटकथा पहले से ही तैयार थी ताकि उसकी आड़ में दलितों का समूल नाश किया जा सके. कुछ हद तक वो यह करने में कामयाब भी रहे, उन्होंने बोलने वाले और संघर्ष कर सकने वाले समझदार घर के मुखिया दलितों को मौके पर ही मार डाला. बाकी बचे हुए तमाम दलित स्त्री पुरुषों के हाथ और पांव तोड़ दिये जो ज़िन्दगी भर अपाहिज़ की भांति जीने को अभिशप्त रहेंगे, दलित महिलाओं ने जो सहा वह तो बर्दाश्त के बाहर है तथा उसकी बात करना ही पीड़ाजनक है ,इनमे से कुछ अपने शेष जीवन में सामान्य दाम्पत्य जीवन जीने के काबिल भी नहीं रही. इससे भी भयानक साज़िश यह है कि अगर ये लोग किसी तरह जिंदा बच कर हिम्मत करके वापस डांगावास लौट भी गये तो रामपाल गोस्वामी की हत्या का मुकदमा उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, यानि कि बाकी बचा जीवन जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगा, अब आप ही सोचिये ये दलित कभी वापस उस जमीन पर जा पाएंगे. क्या इनको जीते जी कभी न्याय हासिल हो पायेगा? आज के हालात में तो यह असंभव नज़र आता है.

कुछ दलित एवं मानव अधिकार जन संगठन इस नरसंहार के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है मगर उनकी आवाज़ कितनी सुनी जाएगी यह एक प्रश्न है. सूबे की भाजपा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है. कोई भी ज़िम्मेदार सरकार का नुमाइंदा घटना के चौथे दिन तक ना तो डांगावास पंहुचा था और ना ही घायलों की कुशलक्षेम जानने आया. अब जबकि मामले ने तूल पकड़ लिया है तब सरकार की नींद खुली है, फिर भी मात्र पांच किलोमीटर दूर रहने वाला स्थानीय भाजपा विधायक सुखराम आज तक अपने ही समुदाय के लोगों के दुःख को जानने नहीं पंहुचा. नागौर जिले में एक जाति का जातीय आतंकवाद इस कदर हावी है कि कोई भी उनकी मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता है. दूसरी और जाट समुदाय के छात्र नेता, कथित समाजसेवक और छुटभैये नेता इस हत्याकाण्ड के लिए एक दुसरे को सोशल मीडिया पर बधाईयाँ दे रहे है तथा कह रहे है कि आरक्षण तथा अजा जजा कानून की वजह से सिर पर चढ़ गए इन दलितों को औकात बतानी जरुरी थी, वीर तेज़पुत्रों ने दलित पुरुषों को कुचल कुचल कर मारा तथा उनके आँखों में जलती लकड़ियाँ घुसेडी और उनकी नीच औरतों को रगड़ रगड़ कर मारा तथा ऐसी हालत की कि वे भविष्य में कोई और दलित पैदा ही नहीं कर सकें. इन अपमानजनक टिप्पणियों के बारे में मेड़ता थाने में दलित समुदाय की तरफ से एफआईआर भी दर्ज करवाई गयी है, जिस पर कार्यवाही का इंतजार है.

अगर डांगावास जनसंहार की निष्पक्ष जाँच करवानी है तो इस पूरे मामले को सीबीआई को सौपना होगा क्योंकि अभी तक तो जाँच अधिकारी भी जाट लगा कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया है कि वह कितनी संवेदनहीन है. आखिर जिन अधिकारियों के सामने जाटों ने यह तांडव किया और उसकी इसमें मूक सहमति रही जिसने दलितों की कमजोर एफआईआर दर्ज की और दलितों को फ़साने के लिए जवाबी मामला दर्ज किया तथा पोस्टमार्टम से लेकर मेडिकल रिपोर्ट्स तक सब मैनेज किया, उन्हीं लोगों के हाथ में जाँच दे कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया कि उनकी नज़र में भी दलितों की औकात कितनी है.




इतना सब कुछ होने के बाद भी दलित ख़ामोश है, यह आश्चर्यजनक बात है. कहीं कोई भी हलचल नहीं है. मेघसेनाएं, दलित पैंथर्स, दलित सेनाएं, मेघवाल महासभाएं सब कौनसे दड़बे में छुपी हुयी है? अगर इस नरसंहार पर भी दलित संगठन नहीं बोले तब तो कल हर बस्ती में डांगावास होगा, हर घर आग के हवाले होगा, हर दलित कुचला जायेगा और हर दलित स्त्री यौन हिंसा की शिकार होगी, हर गाँव बथानी टोला होगा, कुम्हेर होगा, लक्ष्मणपुर बाथे और भगाना होगा. इस कांड की भयावहता और वहशीपन देख कर पूंछने का मन करता है कि क्या यह एक और खैरलांजी नहीं है? अगर हाँ तो हमारी मरी हुयी चेतना कब पुनर्जीवित होगी या हम मुर्दा कौमों की भांति रहेंगे अथवा जिंदा लाशें बन कर धरती का बोझ बने रहेंगे. अगर हम दर्द से भरी इस दुनिया को बदल देना चाहते है तो हमें सडकों पर उतरना होगा और तब तक चिल्लाना होगा जब तक कि डांगावास के अपराधियों को सजा नहीं मिल जाये और एक एक पीड़ित को न्याय नहीं मिल जाये, उस दिन के इंतजार में हमें रोज़ रोज़ लड़ना है, कदम कदम पर लड़ना है और हर दिन मरना है, ताकि हमारी भावी पीढियां आराम से, सम्मान और स्वाभिमान से जी सके.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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