हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

पूरी दुनिया एक आधा बना हुआ बांध है-3: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/30/2015 09:04:00 PM


आंबेडकर-गांधी बहस के संदर्भ में राजमोहन गांधी को अरुंधति रॉय के जवाब ‘ऑल द वर्ल्ड’ज अ हाफ-बिल्ट डैम’ के हिंदी अनुवाद की तीसरी किस्त. अनुवाद: रेयाज उल हक

[यहां पढ़ें पहली और दूसरी किस्तें]

जाति और छुआछूत के खिलाफ अभियान

मेरी कमजोरियों की राजमोहन गांधी की फेहरिश्त में सबसे ऊपर यह इल्जाम है कि मुझे ‘इसका सीमित ज्ञान’ भी नहीं है कि ‘जाति, नस्ल और धर्म के मामले में गांधी कहां खड़े थे.’ गांधी जिन लोगों को ‘हरिजन’ कहा करते थे उनके प्रति उनकी हमदर्दी और प्यार को दिखाने के लिए राजमोहन गांधी ने ‘द सिन ऑफ अनटचेबिलिटी’[3] के शीर्षक वाले एक लंबे हिस्से में अनेक मिसालों का हवाला दिया है. ऐसा लगता है कि इस नफरत किए जाने वाले और सरपरस्ती भरे शब्द के इस्तेमाल को लेकर बहसों से राजमोहन गांधी या तो नावाकिफ हैं या बेपरवाह हैं. वे कहते हैं: ‘चूंकि (गांधी ने कहा था) ईश्वर सबसे ऊपर है जो मजबूरों का संरक्षक है और चूंकि ‘अछूतों’ से ज्यादा मजबूर कोई नहीं है, इसलिए ‘हरिजन’ शब्द उन्हें मुनासिब लगा था.’ यह राजमोहन गांधी को भी मुनासिब लगता है.

अपने लेख के इस हिस्से में, वे हमें यह समझाते हैं कि कैसे गांधी ने छुआछूत के खिलाफ तब भी अभियान चलाया, जब उन्हें हिंदू कट्टरपंथ के गुस्साए हुए प्रतिनिधियों द्वारा धमकाया गया था. ‘ऊपर दिए गए पैराग्राफों में जो कुछ कहा गया है, रॉय उनमें से कुछ भी जानने की इजाजत अपने पढ़नेवालों को नहीं देतीं,’ वे कहते हैं. मिसाल के लिए ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ में से इसे देखिए:

पूना समझौते के बाद, गांधी ने अपनी सारी ऊर्जा और जोश को छुआछूत को खत्म करने की तरफ मोड़ दिया. शुरुआत के लिए, उन्होंने अछूतों का नाम बदलते हुए उन्हें एक सरपरस्ती भरा नाम दिया जो हिंदू आस्था से मजबूती से बंधा हुआ था: हरिजन. उन्होंने हरिजन नाम से एक नया अखबार शुरू किया. उन्होंने हरिजन सेवक संघ की शुरुआत की जिसके बारे में उन्होंने जोर दिया कि उसमें सिर्फ विशेषाधिकार प्राप्त सर्वण हिंदू ही काम करें जिन्हें अछूतों के खिलाफ पहले के पापों का प्रायश्चित करना हो. आंबेडकर ने इन सबको ‘दयालुता से अछूतों की हत्या’ करने की कांग्रेस की योजना के रूप में देखा.

गांधी ने छुआछूत के खिलाफ उपदेश देते हुए देश भर का दौरा किया. उन्हें अपने से भी ज्यादा रूढ़िवादी हिंदुओं द्वारा सवाल पूछ-पूछ कर तंग किया गया और उन पर हमले किए गए, लेकिन वे अपने मकसद से नहीं हटे. जो कुछ भी हुआ उसे छुआछूत को खत्म करने के मकसद के इस्तेमाल में लाया गया. जनवरी 1934 में बिहार में एक बड़ा भूकंप आया. तकरीबन बीस हजार लोगों ने अपनी जिंदगियां खो दीं. हरिजन में 24 फरवरी को लिखते हुए गांधी ने कांग्रेस के अपने सहकर्मियों तक को हिला दिया जब उन्होंने कहा कि यह छुआछूत के पाप पर चलने के लिए ईश्वर द्वारा लोगों को दी गई सजा है... (रॉय 2014: 129).

इन सबमें सबसे परेशान कर देने वाली बात यह है कि राजमोहन गांधी (गांधी के साथ साथ हिंदू महासभा और उनके पहले से कुछ हिंदू सुधारवादी संगठनों की तरह) छुआछूत के खिलाफ लड़ाई और जाति के खिलाफ लड़ाई को एक ही चीज बना कर रख देते हैं. ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ इस सियासत पर थोड़े विस्तार से चर्चा करती है (रॉय 2014: 53-58, 98-102). उसमें मैंने जो कुछ कहा है, उसे यहां थोड़े में पेश करने दीजिए:

विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के सुधारवादी संगठनों द्वारा छुआछूत की प्रथा के खिलाफ जोरदार प्रचार की शुरुआत 19वीं शताब्दी के आखिर में शुरू हुई थी. उसके पहले, मातहत जातियों में पैदा हुए करोड़ों लोगों ने जाति के अभिशाप से बचने के लिए इस्लाम, ईसाइयत और सिख धर्म अपना लिए थे. ऐसा नहीं लगता था कि किसी को कोई परवाह थी. हालांकि सदी बदलने के साथ जब साम्राज्य के पुराने विचार राष्ट्र राज्य के नए विचारों की शक्ल लेने लगे और प्रतिनिधित्व पर आधारित सरकार की अवधारणा चलन में आई तो एक नया और विस्फोटक सवाल पैदा हुआ: किसका प्रतिनिधित्व करने का अधिकार किसके पास है? अचानक मुसलमान, सिख, ईसाई, हिंदू ऐसे अलग अलग हिस्सों में बंटने लगे जिन्हें आज हम ‘वोट बैंक’ के नाम से जानते हैं. अचानक आबादी की बनावट (जनसांख्यिकी) अहम हो गई. अचानक ही विशेषाधिकार वाले सवर्ण हिंदुओं के लिए यह जरूरी हो गया कि वे 4.45 करोड़ की मजबूत अछूत आबादी को ‘हिंदू पाले’ में रखते हुए अपनी तादाद को बढ़ा लें (यह ऐसी अवधारणा थी, जो इस दौर के पहले वजूद में नहीं थी). धर्मपरिवर्तन की धारा को रोकने के लिए और अछूतों का दिल और दिमाग जीतने के लिए, विशेषाधिकार प्राप्त सवर्ण हिंदू सुधारवादी संगठनों का एक बेड़ा उभर आया. (उनमें से आर्य समाज से जन्मा जात-पांत-तोड़क मंडल एक था, जिसने आंबेडकर को बोलने के लिए बुलाया और फिर जैसा कि सबको पता है, उन्हें तब मना कर दिया जब उन्होंने उनके भाषण एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट को देखा, जिसमें आंबेडकर ने हिंदू ग्रंथों को खारिज किया था.) इन सुधारवादियों को, जिनमें से ज्यादातर जाति में यकीन रखते थे, एक ऐसा तरीका खोजना था, जिससे अछूत बड़ी हवेली में बने रहें, लेकिन उन्हें नौकरों की कोठरियों में रखा जाए. इस मकसद से 1875 में आर्य समाज की स्थापना हुई थी, जो ‘दूषित लोगों की शुद्धि’ करने की शुद्धि योजना चला रहा था और अछूतों की हिंदू धर्म में ‘घर’ लौटा कर ला रहा था. 1899 में स्वामी विवेकानंद ने कहा, ‘हिंदू बाड़े को छोड़ कर जाने वाला हरेक आदमी न सिर्फ एक कमतर आदमी है, बल्कि एक बड़ा दुश्मन है.’ आज नरेंद्र मोदी की निगरानी में शुद्धि को ‘घर वापसी’ के रूप में फिर से शुरू किया गया है.

बेशक ब्रिटिश सरकार बदमाशी के साथ और खतरनाक तरीके से समुदायों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करते हुए इन सब चिंताओं से खेल रही थी. उसने मनमुटाव की जो आग लगाई थी, उसका अंजाम आखिरकार बंटवारे के खूनखराबे में हुआ.

गांधी के दक्षिण अफ्रीका से (1915) और आंबेडकर के कोलंबिया में अपने अध्ययन के बाद (1917) भारत लौटने के वक्त तक, छुआछूत के खिलाफ सुधारकों का अभियान शिखर पर था. कांग्रेस ने छुआछूत के खिलाफ एक प्रस्ताव मंजूर किया था. गांधी और तिलक ने छुआछूत को एक ऐसी ‘बीमारी’ करार दिया था जो हिंदू धर्म के उसूलों के खिलाफ थी. पहली ऑल-इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कॉन्फ्रेंस (विशेषाधिकार प्राप्त जातियों द्वारा आयोजित) बंबई में रखी गई. ऑल-इंडिया एंटी अनटचेबिलिटी मेनिफेस्टो पर तिलक को छोड़ कर सबने दस्तखत किए. 


आंबेडकर इन सभाओं में नहीं गए. वे अछूतों के लिए सरपरस्ती के इस अस्वाभाविक प्रदर्शन को लेकर शंकित थे. उन्होंने देखा कि ये बदलते वक्त के वे तरीके हैं, जिनके जरिए विशेषाधिकार प्राप्त जातियां अछूत समुदाय पर अपने कब्जे को मजबूत करने की कवायद कर रही थीं. वे मानते थे कि सिर्फ कलंक और छुआछूत के इर्द-गिर्द शुद्धता-दूषण के मुद्दे को नहीं, बल्कि खुद जाति को ही खत्म करना होगा. छुआछूत का क्रूर व्यवहार - दूषित करने वाले कदमों के निशानों को बुहारने के लिए कमर से बंधी झाड़ू, दूषित करने वाले थूक को जमा करने के लिए गले में बंधा घड़ा – तो जाति प्रथा का एक प्रदर्शनकारी, कर्मकांडी सिरा था. वे जानते थे कि जाति की असली हिंसा तो हकदारियों को नकारे जाने से पैदा होती थी: जमीन से, धन से, ज्ञान से, बराबरी भरे मौके से.

हिंदू सुधारवादियों ने बड़ी चालाकी से जाति के सवाल को छुआछूत तक सीमित कर दिया था, जिसका मकसद जाति को ठीक-ठीक राजनीतिक अर्थव्यवस्था से और गुलामी के उन हालात से अलग करना था, जिनमें ज्यादातर अछूत रहने और काम करने के लिए मजबूर किए गए थे. जिसका मकसद ठीक ठीक हकदारी के सवाल को, भूमि सुधारों और धन के फिर से बंटवारे के सवालों को छुपा देना था. उन्होंने इसे एक गलत धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथा के रूप में पेश किया जिसमें सुधार की जरूरत थी. गांधी ने इसे और भी संकीर्ण बनाते हुए इसे ‘भंगियों’ का मुद्दा बना दिया – जो ज्यादातर एक शहरी और इसलिए कुछ हद तक राजनीति में दखल रखने वाला समुदाय है.

जब राजमोहन गांधी इन सबकी अनदेखी करते हैं और गांधी की परोपकारी हमदर्दी और छुआछूत के खिलाफ उनके जोरदार अभियान की एक के बाद एक मिसालें पेश करते हैं, तो मैं नहीं कह सकती कि उनकी नजरों का धुंधलापन असली है या चालाकी से अपनाया हुआ. चाहे जो भी हो, इसका अंजाम परेशान कर देने वाली सियासत है.

आंबेडकर और अलग निर्वाचक मंडल

आंबेडकर मानते थे कि जब तक अछूत अपने खुद के प्रतिनिधियों के साथ एक राजनीतिक जनाधार के रूप में में विकसित नहीं होते, तब तक जाति सिर्फ और ज्यादा गहरी ही होगी. उनका मानना था कि ‘हिंदू पाले’ में या कांग्रेस के भीतर अछूतों के लिए आरक्षित सीटें महज दब्बू उम्मीदवारों को ही पैदा करेंगी – ये ऐसे नौकर होंगे जो जानते हों कि मालिकों को कैसे खुश रखना है. लंदन में 1930 में गोलमेज सम्मेलन होने के बरसों पहले उन्होंने अलग निर्वाचक मंडलों के विचार को विकसित करना शुरू कर दिया था. 1919 में उन्होंने चुनावी सुधारों पर साउथबरो कमेटी को एक लिखित बयान सौंपा था:
प्रतिनिधित्व का अधिकार और राज्य के तहत पद रखने का अधिकार वे दो सबसे अहम अधिकार हैं जो नागरिकता को बनाते हैं. लेकिन अछूतों का अछूतपन इन अधिकारों को पहुंच से बाहर कर देता है. कुछ जगहों पर तो निजी आजादी और निजी सुरक्षा जैसे मामूली अधिकार भी उनके पास नहीं हैं और कानून के आगे बराबरी हमेशा उनको सुनिश्चित नहीं होती है. ये अछूतों के हित हैं. और जैसा कि आसानी से देखा जा सकता है, इनका प्रतिनिधित्व सिर्फ अछूतों द्वारा ही किया जा सकता है. ये खास तौर से उनके अपने हित हैं और कोई भी दूसरा उनकी सचमुच पैरवी नहीं कर सकता...(बीएडब्ल्यूएस 1:256, रॉय 2014: 103 में उद्धृत.)

दूसरी तरफ गांधी उल्टी बात में यकीन रखते थे. वे अछूतों और मजदूर वर्ग के लोगों को ऐसे लोगों के रूप में देखते थे, जिन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व की नहीं बल्कि परोपकारी देखरेख की जरूरत थी. चाहे वह (कारखाना मालिकों की तरफ से) गांधी के नेतृत्व वाले मिल मजदूर संघों की बात हो, या फिर 1924 वायकोम सत्याग्रह की बात हो या गोलमेज सम्मेलन या हरिजन सेवक संघ की, उन्होंने बड़ी सावधानी से इसे यकीनी बनाया कि मजदूरों और अछूतों का प्रतिनिधित्व और उनके बारे में बातचीत विशेषाधिकार प्राप्त जातियों द्वारा ही की जाए, जिसमें भी वे खुद को ही तरजीह देते थे.

1931 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधी ने जोर डाला कि आंबेडकर को नहीं बल्कि खुद गांधी को भारत के अछूतों का वाजिब प्रतिनिधित्व करना चाहिए. उन्होंने आंबेडकर पर (जो भारत में एक अछूत के रूप में पले-बढ़े थे और उन्हें अपमान और सामाजिक अलगाव को जानने के लिए दूर दक्षिण अफ्रीका का सफर करने की जरूरत नहीं थी) ‘अपने [गांधी के] भारत को नहीं जानने’ का इल्जाम लगाया. गांधी इस पर राजी थे कि मुसलमान और सिखों के अलग निर्वाचक मंडल हो सकते हैं लेकिन, हालांकि उन्होंने छुआछूत की प्रथा को नकार दिया था (‘छुआछूत बने रहने से अच्छा है कि हिंदू धर्म खत्म हो जाए’), वे अलग निर्वाचक मंडल के लिए आंबेडकर के प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेंगे (देखें रॉय 2014: 124). राजमोहन गांधी मुझ पर तोहमत लगाते हैं कि गांधी इस विचार के मुखालिफ क्यों थे इसकी घोषित वजह को मैंने छोड़ दिया है:

सिख इसी रूप में हमेशा बने रह सकते हैं, मुहम्मडन भी, इसी तरह यूरोपीय लोग भी. क्या अछूत हमेशा अछूत बने रहेंगे? (सीडब्ल्यूएमजी 48:298).

लेकिन आंबेडकर ने अछूतों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग हमेशा के लिए नहीं की थी. उनकी दलील यह थी: चूंकि अछूत आबादी देश भर में हिंदू गांवों के बाहर छोटी बस्तियों में बिखरी हुई थी (और अब भी है), उन्होंने महसूस किया कि एक राजनीतिक चुनाव क्षेत्र के भौगोलिक दायरे में वे हमेशा ही एक अल्पसंख्यक बने रहेंगे और कभी भी अपनी पसंद के एक उम्मीदवार को चुनने की हैसियत में नहीं होंगे. इस वजह से वे यकीन करते थे कि अकेले सभी वयस्कों का मत डालने का अधिकार (सबसे ज्यादा वोट पाने वाले को विजेता घोषित करने की व्यवस्था) अछूतों के लिए बराबर अधिकारों को यकीनी नहीं बना सकता. उन्होंने सुझाव दिया कि अनेक सदियों से जिन अछूतों के साथ नफरत और उनकी बेकद्री की जाती रही है, उन्हें एक अलग निर्वाचक मंडल दिया जाए, ताकि वे हिंदू रूढ़िवाद की किसी दखलंदाजी के बिना, अपने खुद के नेतृत्व के साथ एक राजनीतिक जनाधार के रूप में विकसित हो सकें. और वे मुख्यधारा की राजनीति से अपना रिश्ता बनाए रख सकें, इसलिए इसके साथ ही उन्होंने सुझाया कि उन्हें आम उम्मीदवारों के लिए वोट डालने का अधिकार भी दिया जाए. अलग निर्वाचक मंडल और दोहरे वोटों की व्यवस्था दोनों को सिर्फ दस बरसों की मुद्दत तक ही चलना था (देखें रॉय 2014: 122).

एक बरस बाद, जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडॉनल्ड ने उनके प्रस्ताव को मंजूर कर लिया और अछूतों को 20 बरसों की मुद्दत के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल सौंपते हुए कम्युनल अवार्ड की घोषणा की तो गांधी इस प्रावधान को वापस लेने की मांग करते हुए येरवदा जेल में अपने ऐतिहासिक आमरण अनशन पर बैठ गए. आंबेडकर पीछे हटने को मजबूर कर दिए गए और आखिरकार 24 सितंबर 1932 को उन्होंने पूना समझौते पर दस्तखत कर दिए.

पूना समझौता

यह राजमोहन गांधी की आलोचना का शायद सबसे कमजोर हिस्सा है. बेशक वे खुद इस समझौते को मंजूरी देते हैं:
एक साझे निर्वाचक मंडल में दलितों समेत सभी जातियों के अच्छे लोग कभी कभी अपनी जाति से बाहर के वोटों से हारेंगे और कभी ‘बाहरी’ वोटों की बदौलत जीतेंगे.

यह राय गोलमेज सम्मेलन में आंबेडकर के प्रस्ताव के बारे में नादानी को और चुनावों में जाति के काम करने के तरीकों के प्रति नासमझी को उजागर करती है. मामलों को और बदतर बनाते हुए राजमोहन गांधी यह इशारा करते हैं कि आंबेडकर समझौते से खुश भी थे. वे कहते हैं:
आंबेडकर ने 1945 की अपनी हंगामाखेज किताब में न केवल समझौते की शर्तों की आलोचना करने से परहेज किया, बल्कि जहां तक मैं जान पाया हूं, उन्होंने तब या बाद में कभी उस समझौते को खारिज करने या बदलने की कोई कोशिश नहीं की. समझौते को एक ‘शिकस्त’ मानने के बजाए, ऐसा लगता है कि वो इसे एक ऐसी सुलह के रूप में देखते थे, जिसने दलितों समेत हरेक को फायदा पहुंचाया.

यह है वह बात, जो आंबेडकर ने अपने 1945 की ‘हंगामाखेज’ (अगर आप खोज रहे हों तो मालूम हो कि, अब यह एक अच्छी खूबियों वाला, एक हल्का दाग है) किताब में कही थी:

उपवास में कुछ भी नेक नहीं था. यह एक गंदी और गलीज हरकत थी...यह बेसहारा लोगों को प्रधानमंत्री के अवार्ड से हासिल संवैधानिक सुरक्षाओं को छोड़ देने के लिए मजबूर करने और हिंदू लोगों के रहमोकरम पर जीने के लिए राजी कर लेने का घटिया तरीका था. यह एक घिनौनी और दुष्टता भरी हरकत थी. अछूत एक ऐसे आदमी को कैसे ईमानदार और सच्चा मान सकते हैं?

राजमोहन गांधी आंबेडकर की 1945 की मशहूर किताब व्हाट द कांग्रेस एंड गांधी हैव डन दू अनटचेबल्स को गंभीरता से काटना जारी रखते हैं:

आंबेडकर के 1945 की किताब की उग्र भाषा का संदर्भ क्या था, जिसे उन्होंने नई दिल्ली में पृथ्वीराज रोड के अपने आधिकारिक निवास में बैठ कर लिखा था? उस वक्त वे वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य थे...1945 की किताब लिख रहा प्रतिभाशाली चिंतक और सदस्य (असल में मंत्री) वह इंसान भी था जो किसी भी नई ब्रिटिश योजना को प्रभावित करने की चाहत रखता था. साथ ही, वे एक ऐसे सियासी नेता थे जो 1937 के चुनावी नतीजों को भूल पाने में नाकाबिल थे...उन्होंने 1945-46 में बेहतर नतीजों की उम्मीद की थी. 1937 के नतीजों से दुखी आंबेडकर ने 1945 की किताब के जरिए, अपना पक्ष ब्रिटेन के नेताओं और साथ साथ भारत के मतदाताओं के सामने पेश किया.

तो राजमोहन गांधी के मुताबिक आंबेडकर के लेख का जो सीधा मतलब है, उसे वैसा नहीं लिया जाना चाहिए, क्योंकि वो चुनावों में जाने को तैयार एक राजनेता थे और क्योंकि वे ब्रिटिश सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे. तो क्या गांधी एक राजनेता नहीं थे? क्या वे सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश नहीं कर रहे थे? या फिर यहां, पुराने चलन के मुताबिक उन्हें जलील किया जा रहा है? छुपा हुआ इशारा यह है कि गांधी तो आजादी के लिए लड़ रहे थे और आंबेडकर एक ब्रिटिश पिट्ठू थे. शायद, सिर्फ दलील के इस सिलसिले को खत्म करने के लिए, हमें आंबेडकर के इन शब्दों की याद दिलाए जाने की जरूरत है:


इस तथ्य से खुश होना बेवकूफी है कि चूंकि कांग्रेस भारत की आजादी के लिए लड़ रही है, इसीलिए यह भारत के अवाम और सबसे दबे-कुचले इंसान की आजादी के लिए भी लड़ रही है. कांग्रेस आजादी के लिए लड़ रही है कि नहीं, यह सवाल इस सवाल के मुकाबले कम अहमियत रखता है कि कांग्रेस किसकी आजादी के लिए लड़ रही है? (बीएडब्ल्यूएस 9: 202, रॉय 2014: 43 में उद्धृत)

राजमोहन गांधी बिल्कुल सही हैं. आंबेडकर ने पूना समझौते को खारिज करने की न कोशिश की न खारिज करवाया. उन्होंने कुछ ऐसा किया जो कहीं ज्यादा गहरा असर डालने वाला था. पूना समझौते को अंजाम देने वाली घटनाओं के प्रति उनकी नफरत ने उन्हें इस बात का कायल बना दिया था कि जब तक अछूत ‘हिंदू पाले’ में बने रहेंगे, तब तक वे अपनी गुलामी की बेड़ियों को फेंक पाने के काबिल नहीं हो पाएंगे. इसलिए उन्होंने अपने लोगों से हिंदू धर्म को छोड़ने का आह्वान किया. 13 अक्तूबर 1935 को बंबई प्रेसिडेंसी (अब महाराष्ट्र) में येवला के डिप्रेस्ड क्लासेड कॉन्फ्रेंस में 10,000 से ज्यादा लोगों से मुखातिब आंबेडकर ने कहा:

चूंकि बदकिस्मती से हम खुद को हिंदू कहते हैं, इसलिए हमारे साथ उसी तरह से पेश भी आया जाता है. अगर हम किसी और आस्था [धर्म- अनु.] के सदस्य होते तो कोई भी हमारे साथ इस तरह पेश नहीं आया होता. आप कोई ऐसा धर्म चुन लीजिए जो आपको बराबरी का दर्जा दे और बराबरी से पेश आए. अब हम अपनी गलतियों को सुधार लेंगे. मेरी बदकिस्मती थी कि मैं अछूत होने के दाग के साथ पैदा हुआ. हालांकि यह मेरी गलती नहीं है; लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा, क्योंकि यह मेरे बूते में है.

अगले साल 1936 में उन्होंने एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट लिखी.
 

79 बरसों के बाद यह शर्मनाक है कि हम इस बहस को थोड़ा भी आगे बढ़ा पाने के काबिल नहीं हो पाए हैं. असल में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने वाली चुनावी व्यवस्था सबके लिए, और खास कर दलित समुदायों के लिए, लोकतंत्र का मजाक बना रही है.
 

राजमोहन गांधी इतिहास की धंसान में गहरे गोते लगाते हैं और फिर आजादी के बाद के भारत में नमूदार होते हैं:
कांशीराम द्वारा आंबेडकर की विरासत पर बनाई गई बहुजन समाज पार्टी ने हमारे सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में एक बार से ज्यादा सरकार का नेतृत्व किया है, जिसके बारे में कोई कह सकता है कि इसका श्रेय कुछ तो पूना समझौते और साझे निर्वाचक मंडल को जाता है.

यह ‘कोई’ वे ‘कौन लोग’ हैं जो यह ‘कह सकते हैं’? यकीनन कांशीराम यह नहीं कह सकते, जो हमेशा ही पूना समझौते के बाद के दौर को ‘चमचा युग’ कहते थे. 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना करने से पहले उन्होंने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का गठन किया था. 24 सितंबर 1982 को पूना समझौते की 50वीं सालगिरह पर उन्होंने समझौते को खारिज करने के लिए पूना से लेकर जालंधर तक गांवों और शहरों में एक साथ 60 सभाएं बुलाईं. इस समझौते का भारी उत्सव मनाने की योजना बना चुकी इंदिरा गांधी मंसूबे को रद्द करने पर मजबूर हुई थीं. अनेक दलित संगठनों ने 1932 के कम्युनल अवार्ड की बहाली की मांग की थी और अब भी कर रहे हैं. राजमोहन गांधी ने पूना समझौते को लेकर आंबेडकर की जिस खुशी की खोज की है, उसके बारे में उन्हें बसपा से या फिर तकरीबन किसी भी दलित राजनेता, बुद्धिजीवी या कार्यकर्ता से चर्चा करने के पर विचार करना चाहिए. (देखिए एस. आनंद, ‘ए नोट ऑन द पूना पैक्ट’, बी. आर. आंबेडकर, एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट, पृ. 359-72 में, नवयाना 2014.)

(जारी)

संदर्भ

3. यह आरजी (ईपीडब्ल्यू) का शीर्षक है. आरजी.कॉम पर इस हिस्से का शीर्षक है 'गांधी, अनटचेबिलिटी एंड कास्ट.' 

कत्लेआम जब देशभक्ति बन जाए

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2015 07:30:00 PM


याकूब मेमन की अदालती आदेश से होने वाली हत्या के खिलाफ, लेखक और कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी की यह कविता दिखाती है, कि कैसे कानून और अदालतों के पूरे आडंबर के बीच, व्यवस्था कितनी हिंसक, बर्बर और मध्ययुगीन है.

‘फांसीवाद’ के दौर में एक कविता

अदालतें और हत्यारे
दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू
हत्यारे आवेशित हो कर करते हैं
हत्याएं
पर अदालतें बिलकुल भी नहीं
करतीं ऐसा
वे आवेशित नहीं होती
संपूर्ण शांति से
पूरी प्रक्रिया अपना कर
हर लेती हैं प्राण

दोनों ही करते है हत्याएं
हत्यारे-गैर कानूनी तरीके से
मारते हैं लोगों को
अदालतें कानूनन मारती हैं
सबकी सुनते दिखाई पड़ते हैं मी लार्ड
पर सुनते नहीं हैं
फिर अचानक अपने पेन की
निब तोड़ देते हैं
इससे पहले सिर्फ इतना भर कहते हैं
तमाम गवाहों और सबूतों के मद्देनज़र
ताजिराते हिन्द की दफा 302 के तहत
सो एंड सो को सजा-ए-मौत दी जाती है
मतलब यह कि नागरिकों को
मार डालने का हुक्म देती है
अदालतें
राज्य छीन सकता है
नागरिकों के प्राण
वैसे भी निरीह नागरिकों के प्राण
काम ही क्या आते हैं
सिवा वोट देने के?
अदालतें इंसाफ नहीं करतीं
अब सुनाती हैं सिर्फ फैसले
वह भी जनभावनाओं के मुताबिक
फिर अनसुनी रह जाती हैं दया याचिकाएं

हत्यारे, दुर्दांत हत्यारे,
सीरियल किलर, मर्डरर
सब फीके हैं,
न्याय के नाम पर होने वाले
कत्ल के आगे
फिर इस तरह के हर कत्लेआम को
देशभक्ति का जामा पहना दिया जाता है!

और अंध देशभक्त
नाचने लगते हैं
मरे हुए इंसानी जिस्मों पर
और जीत जाता है प्रचंड राष्ट्रवाद
इस तरह फासीवाद
फांसीवाद में तब्दील हो जाता है
और इसके बाद अदालतें तथा हत्यारे
फिर व्यस्त हो जाते हैं
क़ानूनी और गैर कानूनी कत्लों में।

सामूहिक विवेक

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2015 06:46:00 PM

अपमान, बेदखली, जातीय अत्याचार, आगजनी, फौजी कब्जा, मजलूमों की पीट पीट कर होने वाली हत्याएं, जनसंहार, हत्या, जेल, फांसी: यह इस मुल्क का सामूहिक विवेक है. याकूब मेमन की फांसी कुछ घंटे पहले, विष्णु शर्मा ने इस मुल्क में एक मुसलमान और उसमें भी एक कश्मीरी मुसलमान की आजमाइश का एक खाका खींचने की कोशिश की है.

भाग-1

‘अफजल गुरु की फांसी पर तुम क्या कहते हो, यासिर’, उसने पूछ ही लिया। सुबह जब से टीवी में यह समाचार आना शुरू हुआ है तब से अफलज की मौत पर मैंने उतना नहीं सोचा जितना इस सवाल के पूछे जाने के बारे में! मेरे नाम यासिर है और मैं कश्मीरी हूं। क्या इसलिए यह जरूरी है कि कसाब, यासिन मलिक, हाफिज सईद पर मेरे पास हमेशा एक जवाब हो। और यह भी कि जवाब देते वक्त मेरी शक्ल में ‘सॉरी’ शब्द का एक एक हर्फ साफ दिखाई देता हो। SORRY

हमारा एक दफ्तर है। दफ्तर में हम सात लोग हैं। समाचार चैनल के इस ब्यूरो में बस मेरा ही नाम यासिर है और मैं ही कश्मीरी हूं। अब पूरा एक साल होने को है मुझे यहां काम करते हुए और अब मुझे यह पता होता है कि किन खबरों पर चार गर्दनें मेरी ओर घूम जाती हैं। मुझे अहसास हो ही जाता है। मुझे मुड़ कर देखना नहीं पड़ता। मैं कीबोर्ड पर उंगलियां ठकठकता रहता हूं। मुझे पता है इतने दिनों में ये चार गर्दनें भी इतनी ‘संवेदशील’ हो गई हैं कि घूमने के लिए अक्ल के हुक्म की मोहताज नहीं हैं। बस झट से घूम जाती हैं। मेरे पड़ोस में रहने वाले फैज़ के कुत्ते की तरह। हाथ में कुछ हो न हो बस फेंकने का इशारा करो और वो लेने दौड़ पड़ता है।

आपस में ये लोग कैसी बातें करते हैं?

‘तिलक, वो फिल्म देखी?’

‘न मोहन भाई, टाईम ही नहीं मिला।’

‘किसी दिन वल्लभ के घर पार्टी करते है, क्यों जवाहर?’

‘किसी और दिन क्यों आज ही चलों।’

लेकिन मेरे पहुंचते ही जैसे पाकिस्तान ने हमला कर दिया हो। अचानक सब के सब देशभक्त हो जाते हैं।

‘क्यों यासिर, कब तक ऐसा चलेगा यार?’

‘क्या?’

‘यही यार सालों ने सर काट दिए हमारे जवानों के। मतलब ह्यूमन राईट्स कोई चीज है कि नहीं।’

मैंने भी तो सुन रक्खा है इस ह्यूमन राईट्स के बारे में। अक्सर इसे बोलते भी सुना है। पर न जाने क्यों यहां इसकी भाषा हमेशा हिंदी होती है। जैसे ही यह भाषा बदलता है वैसे ही राईट्स का तलफ्फुज़ बगावत हो जाता है। और बागी की सजा मौत है।

फिर ऐसा नहीं है कि तिलक, मोहन, वल्लभ और जवाहर को ह्यूमन राईट्स की, अभिव्यक्ति की आजादी की चिंता नहीं है। है। अभी हाल में इन लोगों ने ‘विश्वरूपम्’ पर लगी रोक के खिलाफ खूब नारेबाजी की थी। मुफ्ती आज़म ने जब कश्मीरी बैंड के खिलाफ फतवा जारी किया था तब भी इन लोगों ने जमीन-आसमान एक कर दिया। ‘कानून से बड़ा कोई नहीं हैं’, वल्लभ ने कहा था। जिसे अन्य तीनों ने हर थोड़े अंतराल के बाद दोहराया था। फिर सबने मिल कहा था, ‘साला इस देश का गृह मंत्री है कि पाकिस्तान का? कुछ नहीं मिला कहने को तो ‘हिंदू आतंकवाद’ कह दिया। ऐसे साले गद्दारों को तो चैराहे पर फांसी देनी चाहिए। क्यों यासिर?’

मैं क्या कहता? कह तो देता कि तुम साले गृह मंत्री के बयान के जीते जागते सबूत हो। पूछ तो लेता कि क्या उस दाढ़ियल गुजराती से, जो हर दशहरा वाले दिन हथियारों की पूजा करता है, जिसके लिए तुम्हारे दिल दिवानों की तरह धड़कते है, असंख्यक लोग आतंकित नहीं रहते हैं। मैं पूछना चाहता था कि कैसे यह आतंकवाद नहीं है, लेकिन मैने जाने दिया। एक बार ऐसा कहा था, तो तिलक चीखने लगा। ‘तो तू क्यों नहीं चला जाता पाकिस्तान। तुम लोग यहां रहते क्यों हो। साले खाते यहां का हो लेकिन सोचोगे वहां के बारे में। कुछ तो शर्म करो बे।’

ऐसा नहीं है कि उसने इस सब के लिए बाद में माफी नहीं मांगी। उसने बाद में आ कर कहा था, ‘सॉरी यार मैंने कुछ ज्यादा ही कह दिया। लेकिन तू देख तो रहा है न, क्या हो रहा है इस देश में? मैं तुझे कुछ नहीं कह रहा। तू तो हमारा अपना है। लेकिन कुछ लोग समझते नहीं कि उनके एक कदम से सारी कौम का नाम खराब होता है।’ मैने इस बार भी कुछ नहीं कहा बस सर हिलाता रहा। शायद उन्हें उम्मीद है कि एक दिन मैं भी ए वेन्सडे फिल्म का नसीरूद्दीन शाह बनूंगा।

भाग-2

इस शहर में यह मेरा दूसरा साल है। मैं तो आना ही नहीं चाहता था। मां ने मिन्नतें कीं तो चला आया। वहां रह भी कहां पाता। गुमशुदा हो जाता, मर जाता या खामोश हो जाता। वहां बाजार जाते वक्त, स्कूल जाते वक्त सतर्क रहना पड़ता है। एक दिन ‘अबे बहनचोद, उधर से निकल’, सुनते ही मैं लौट आया था और फिर कभी बाजार नहीं गया। यहां भी बाजार कभी नहीं जाता। चुपचाप अपने कमरे में लेटा टीवी देखता रहता हूं। वहां पुलिस के हाथों में बंदूक है, यहां के लोग पुलिस की आखें हैं।

जब से आईआईएमसी में दाखिला लिया तभी से ज़ाकिर नगर के इसी कमरे में रहता हूं। जाना चाहता हूं यहां से पर जा नहीं पा रहा हूं। शुरू शुरू में यह शहर कितना खुशनुमा लगता था। बाद में मैं इससे भी डरने लगा। दो चार लोग एक साथ ऊपर नीचे होते हैं तो लगता है किसी की तलाशी हो रही है, किसी को लेने आए हैं। मगर शुरू में ऐसा बिलकुल नहीं था। मैं कॉलेज के बाद अक्सर सीसी बाजार चला जाता था। लोगों से मुलाकात करता था। फिल्म देखने जाता था। लेकिन उस दिन जैसी बात उस रेढ़ी वाले ने की उसके बाद सीसी को मैने अलविदा कह दिया। भाई दिल्ली घूमने आए थे। हम उनके लिए एक पैंट खरीद कर लाए। पैंट पीछे से फटी निकली। लौटाने गए तो साले ने लेने से ही मना कर दिया। मन तो किया कि साले को पीट दूं लेकिन फिर मकान मालिक की वह बात याद आ गई जो उसने मकान किराए से देते हुए कही थी। ‘देखों भाई, सब कुछ करो लेकिन पुलिस घर पर नहीं आनी चाहिए। हमें यहीं रहना है।’ हम दोनों भाई लौट आए। पैंट मैंने रिक्शे में ही छोड़ दी।

हिंदुस्तान में केरल है, मुम्बई है और भी बहुत सी जगहें हैं जहां मैं जाना चाहता हूं। मेरे मुल्क के लोग जाते हैं। लेकिन कोई अकेला नहीं जाता। हमें साथ चलना होता है। अब मैं अकेला रहता हूं इसलिए कहीं नहीं जाता। हर तीन-चार माह में एक बार कश्मीर जाता हूं। फिर आ जाता हूं।

भाग-3

अक्सर मुझे कुछ भले लोग मिलते हैं। मेरे दोस्त बन जाते हैं। लेकिन फिर न जाने क्यों मुझे यह यकीन दिलाने के लिए कि वे मेरे अच्छे दोस्त हैं मुझ से कुरआन मांगते है। कुरआन तो कहीं भी मिल सकता है। पढ़ने के लिए मेरा ही इंतजार कर रहे थे क्या। मैं फिर भी कहीं से ढूंढ़ कर ला देता हूं।

‘यार देखो, सभी धर्मों में एक ही बात है।’ उसने कुरआन हाथ में लेते हुए कहा।

‘जी’, मैंने उसका दिल रखने के लिए कह दिया।

‘कब तक हम आपस में लड़ते रहेंगे, भाई? हमें मिल कर रहना सीखना होगा। हमारे नौजवान भटके हुए है।’

‘मैं आप की इस बात से एकदम सहमत हूं’, मैंने उससे कहा।

‘एकदम’, उसने एक बड़े भाई की तरह मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।

मैंने फिर कहना शुरू कर दियाः ‘न जाने क्या पढ़ाया जाता है इन्हें। न इतिहास का पता है, न भूगोल का। बस कश्मीर हमारा, कश्मीर हमारा की रट लगाए रहते हैं।’

‘बिलकुल।’

‘हां। अरे, कब से कश्मीर तुम्हारा हो गया। कश्मीर कश्मीरियों का है। जबरन सेना घुसेड़ दी, कब्जा कर लिया। कलम तुम्हारा, कागज़ तुम्हारा लिख दिया कश्मीर हमारा। खुद ही इन लोगों ने हिंदोस्तान का ऐसा नक्शा बनाया कि वह वह ‘मां’ दिखाई देने लगा। अरे कौन समझाए इन लोगों को कि धरती गोल है। जो तुम्हें सर दिखता है वह दूसरे को पैर दिखता है, तीसरे को...।’ मैं ऐसा कह ही रहा था कि वह उठ कर चला गया। कुरआन ले जाना भी भूल गया।

भाग-4

‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’, तिलक ने कोई आठ-नौ बार कहा था लेकिन ठीक से नहीं हो पाया। भगत सर ने मुझसे कहा कहने के लिए तो मैंने एक ही बार में ठीक से कह दिया। उन्होंने मुझे तिलक का रोल दे दिया। हम सब आईआईएमसी के वार्षिक समारोह की तैयारी कर रहे थे। उस साल के समारोह का थीम ‘1857’ था। भगत सर का लिखा नाटक 1857 से 30 जनवरी 1948 के हिंदुस्तानी इतिहास की झांकी था।

आनंद, जो अंग्रेज बना था, मोहन, जो गांधी बना था, से कहता हैः ‘अगर अंग्रेज हिंदुस्तान से चले गए तो यहां निरंकुशों का राज हो जाएगा। हैंडिल नहीं कर पाओगे तुम।’

गांधी के किरदार में मोहन कहता है, ‘मैं विदेशी दयावान मालिकों की अपेक्षा स्वदेशी निरंकुशों के अधीन रहना अधिक पसंद करूंगा।’

हमने वह नाटक बामुश्किल एक साल पहले खेला था लेकिन इन सालों को कुछ याद ही नहीं है। अभी अभी कुछ ही दिन पहले ये मोहन इसी न्यूज रूम में चीख रहा था, ‘कश्मीर को एक मिनट के लिए हिंदुस्तान से अलग कर दो, साले चला नहीं पाएंगे।’ और इस तिलक के बच्चे के लिए ‘स्वराज’ कहने वाला हर कश्मीरी आतंकवादी है। कभी कभी सोचता हूं इतिहास का कोई मतलब-वतलब होता भी है कि नहीं।

वापस: भाग-1

‘अफजल गुरु की फांसी पर तुम क्या कहते हो, यासिर?’

‘मुझे क्या कहना चाहिए, मालिक?’

‘भाजपा से सारे चुनावी मुद्दे छीन लिए कांग्रेस ने।’

‘यही तो मैं कहना चाहता था। अफजल आतंकी नहीं था। वो एक चुनावी मुद्दा था। कल तक मारा नहीं यह सोच कर कि वोटों पर असर पड़ेगा। आज मार दिया कि वोटों पर असर पड़ेगा। सालों, वह आदमी था, मेंढक नहीं कि उस पर लोकतंत्र का प्रयोग कर रहे थे तुम लोग। साले आतंकियों, कितनी दहशत फैलाओगे बे तुम लोग।’

‘ये क्या बोल रहा है, भाई तू?’

‘चुपबे साले। एक बार और मुझे भाई कहा ना तो तेरा वो हाल करूंगा कि...’

तिलक, जवाहर और वल्लभ सब अपनी अपनी अपनी सीटों पर जा कर बैठ गए। अब साले कम से कम मेरे आगे तो कुछ नहीं बोलेंगे। अब भले एक दिन ये लोग मुझे भी सूली पर लटका ही क्यों न दें।

नेपाल में गायः पवित्र जीव से राष्ट्रीय पशु तक

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2015 12:55:00 PM

पत्रकार विष्णु शर्मा नेपाल के मौजूदा सियासी और समाजी हालात पर लेखों की एक शृंखला लिख रहे हैं. पेश है उसकी पहली कड़ी, जिसमें वे गाय को नेपाल का राष्ट्रीय पशु मानने के संदर्भ से शुरू करके, संविधान बनने की कवायद में निहित प्रतिक्रियावादी राजनीति की पड़ताल कर रहे हैं. 

नेपाल के नए संविधान में भी गाय को राष्ट्र पशु स्वीकार किया गया है। अब एक ‘गणतंत्र’, ‘धर्मनिर्पेक्ष’, ‘समाजवाद उन्मुख’, ‘बहुजातीय’, ‘बहुभाषिक’, ‘बहुधार्मिक’, ‘बहुसांस्कृतिक’ तथा ‘भौगोलिक विविधायुक्त’ देश की मां गाय होगी जो दूध देगी और पंचगव्य से रोगों का निदान होगा। अब नेपाली जनता बिना किसी धार्मिक दबाव के कानूनी तौर पर गाय पर गर्व कर सकेगी। इसके साथ गौ हत्या के आरोपियों को मौत की सजा देने की धर्मनिरपेक्ष मांग का विकल्प खुला रहेगा। अभी गौ हत्या की अधिकतम सजा 12 वर्ष है। एक अध्ययन के अनुसार गौ हत्या के मामले में सारे आरोपी जनजाति, पिछड़ी मानी जाने वाली हिन्दू जातियां या अल्पसंख्यक समुदाय से हैं।

वैसे 1962 से ही नेपाल का राष्ट्रीय जानवार गाय है। और गाय इसलिए है कि 1962 के संविधान में ही पहली बार नेपाल को राजसी हिन्दू राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया गया था। इससे पहले नेपाल में गाय एक पवित्र जानवर था। अधुनिक नेपाली राष्ट्रवाद का जन्म भी इसी समय शुरू हुआ। राजा महेन्द्र ने हिन्दू धर्म को नेपाली राष्ट्रवाद का रूप दिया और गैर हिन्दू आबादी का जबरन हिन्दूकरण करना शुरू किया। राजा महेन्द्र ने ‘एक देश, एक वेष, एक भाषा’ नेपाल की तमाम राष्ट्रीयताओं पर लागू किया। यह अनायास नहीं है कि नेपाली इतिहास के ठीक इसी बिन्दु पर नास्तिक माने जाने वाले कम्युनिष्ट दल नेपाली राजनीति के रंगमंच पर स्थापित होना शुरू हुए।

नेपाल के संदर्भ में गाय का सवाल मात्र एक जानवर का सवाल नहीं है बल्कि यह इतिहास के उस कालखण्ड से जुड़ा है जब वर्तमान नेपाली भू-क्षेत्र में हिन्दू रियासतें स्थापित होना शुरू हुईं। भारत में इस्लामिक सत्ताओं के विस्तार और बढ़ते प्रभाव ने हिन्दू राजाओं को पहाड़ों की और ढकेल दिया। इन लोगों ने पहाड़ों में कई छोटे छोटे राज्यों की स्थापना की। बाद में गोरखा राज्य के राजा पृथ्वीनारायण शाह ने इन्हीं राज्यों का ‘एकीकरण’ करके आधुनिक नेपाल राज्य का निर्माण किया। गोरखा नाम संस्कृत शब्द गौरक्षा से आया है। इसलिए जब गाय को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का राष्ट्रीय पशु माना जाता है तो तमाम भलमनसाहत के बावजूद हिन्दू राष्ट्र के प्रवेश का चोर दरवाजा खुला रह जाता है।

यह दलील दी जा सकती है कि नेपाली राजनीति को भारतीय ढांचे में रख कर नहीं देखना चाहिए या इसका अध्ययन भारतीय संवेदना के साथ नहीं होना चाहिए। यह भी कहा जा सकता है कि शायद नेपाल के लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता। यह सच है कि नेपाल के लोग गाय के सवाल पर वैसी बहस नहीं कर रहे हैं जैसी बहस भारतीय संविधान के निर्माण के वक्त हो रही थी। भारत की संविधान सभा में बहस करते वक्त डॉ आम्बेडकर कहते हैं कि हम पिछले सात दिनों से इस (गाय) पर बहस कर रहे हैं। नेपाल की संविधान सभा ने एक मिनट भी इस पर चर्चा हुई हो ऐसा प्रमाण नहीं मिलता।

लेकिन जरूरी बात इस बात की जांच करना है कि नेपाल के संविधान निर्माता गाय को कैसे देखते हैं। जब वो गाय को राष्ट्रीय पशु कहते हैं तो गाय के कौन से गुणों को चिह्नित करते हैं। बेशक कृषि प्रधान देश में गाय एक उपयोगी पशु है। लेकिन गाय की उपयोगिता सिर्फ दूध, बैल पैदा करने और गोबर देने में नहीं है। गाय स्वस्थ मांस का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। यहीं वह पेंच है जिसकी पड़ताल किए बिना गाय को संविधान को चरने के लिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए था।

इन्टरनेट पर उपलब्ध नेपाली पाठ्यक्रम की पाठ्य पुस्तकों में गाय पर सामग्री का अध्ययन करने से संविधान और नीति निर्माताओं की जिस मानसिक स्थिति का संकेत मिलता वो वाकई देश के धर्मनिरपेक्ष भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। पाठ्यक्रम में जो सामग्री है उसके अनुसार गाय राष्ट्रीय पशु है क्योंकि वह दूध देती है और हिन्दूओं के लिए पूज्य है। यदि पाठ्यक्रम यह भी संदेश होता कि गाय के दूध के साथ उसका मांस भी प्रोटीन का अच्छा स्रोत है तो भी शायद गाय का विरोध नहीं करना पड़ता। गाय और हिंदू धर्म का गहरा संबंध है। एक तरह से ये दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक हैं। डॉ आम्बेडकर ने गौ मांस खाने वाले और न खाने वालों को छूत और अछूत की विभाजन रेखा माना है।

राष्ट्रीय प्रतीक क्या है? किसी पशु, पक्षी या चिह्न को राष्ट्रीय घोषित करने के क्या मायने होता है? इन सवालों के कई जवाब हो सकते हैं लेकिन सबसे तार्किक जवाब यही लगता है कि राष्ट्रीय प्रतीक या चिह्न राष्ट्र के इतिहास और संस्कृति के वे चिह्न होते हैं और इनका चुनाव करते समय लोग यह तय करते हैं कि वे राष्ट्र को किस संस्कृति और इतिहास के किस हिस्से से जोड़ कर देखना चाहते हैं। राष्ट्रीय प्रतीकों का चुनाव समावेश और बहिष्कार की एक साथ होने वाली प्रक्रिया हैं। और ठीक इन्ही बिन्दु पर देश का चरित्र स्पष्ट होता है। नेपाल में गाय को इस तरह समझना आज की आवश्यकता है।

इसके साथ यदि नेपाल को उसके इतिहास और दक्षिण एशिया के संदर्भ से अलग करके देखा जा सकता तो भी गाय कोई बहुत गंभीर बहस को पैदा नहीं करती। लेकिन अफसोस कि नेपाल को दक्षिण एशिया और उसके इतिहास के साथ ही समझा जा सकता है। इसलिए यहां गाय एक राष्ट्रीय पशु से बढ़कर एक राष्ट्रीय चुनौती है जिसने अक्सर राष्ट्रीय आपदा को जन्म दिया है।

जैसा कि उपर कहा गया है भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भी गाय पर लंबी बहस की। संविधान सभा में गौ हत्या पर निरपेक्ष (ब्लैंकेट) प्रतिबंध लगाने की मांग भी हुई लेकिन डॉ आम्बेडकर ने इस प्रतिबंध के पक्ष में धार्मिक आस्था वाली दलील को अस्वीकार कर आर्थिक दलीलों को स्वीकार किया और संशोधन में यह रखा गया कि राज्य उपयोगी जानवरों की हत्या पर रोक लगाने का प्रयास करेगा। इस तरह संविधान निर्माताओं ने एक बड़ी आबादी को राहत दिलाई।

द किंग एण्ड काउः ऑन ए क्रूशियल सिंबल ऑफ हिन्दूआईजेशन इन नेपाल में एक्सिल माईकल्स लिखते हैं कि नेपाल में गाय का प्रयोग कतिपय राष्ट्रीय समूहों और दुर्गम क्षेत्रों के एकीकरण और उन पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए किया गया। वे इसी निबंध में लिखते है कि शाह राजाओं और राणाओं ने नेपाल राज्य की विचारधारा को गौ हत्या पर प्रतिबंध से जोड़ कर देखा। 1854 के मुल्की ऐन अथवा सिविल कोड में कहा गया है कि, ‘कलयुग में यही एक मात्र राज्य है जहां गाय, स्त्री और ब्राह्मण की हत्या नहीं हो सकती।’

1939 में जब तत्कालीन राणा प्रधान मंत्री महाराजा जुद्धा शमशेर ने कलकत्ता का भ्रमण किया तो तमाम भारतीय समाचार पत्रों ने उन की यह कह कर प्रशंसा की कि वे एक ऐसे देश के प्रतिनिधि हैं जो हिन्दू राष्ट्र का प्रतीक है। हिन्दू आउटलुक नाम की पत्रिका में छपे एक लेख में जुद्धा शमेशर की प्रशंसा करते हुए लेखक ने लिखा है, ‘एक पवित्र हिन्दू की तरह महाराजा महान गौ पूजक हैं’।

उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में गाय को इस आसानी से राष्ट्रीय पशु स्वीकार कर लेना चिंतनीय होने के साथ निंदनीय भी है। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी ऐसे जानवर को राष्ट्रीय पशु की मान्यता कैसे दे सकता है जिसके हवाले से नेपाली की बहुसंख्य जनता का उत्पीड़न किया जाता रहा है। गाय का राष्ट्रीय पशु हो जाना नेपाल को आज ठीक उसी बिन्दु पर खड़ा कर दे रहा है जहां से असंख्य विद्रोहों का सूत्रपात हुआ था।

(जारी)

पूरी दुनिया एक आधा बना हुआ बांध है-2: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/25/2015 12:52:00 AM


यहां पेश है आंबेडकर-गांधी बहस के संदर्भ में राजमोहन गांधी को अरुंधति रॉय के जवाब ‘ऑल द वर्ल्ड’ज अ हाफ-बिल्ट डैम’ के हिंदी अनुवाद की दूसरी किस्त. पहली किस्त यहां पढ़ें. इस अनुवाद में गांधी की रचनाओं या भाषणों के उद्धरणों के हिंदी अनुवाद के लिए भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा हिंदी में प्रकाशित गांधी के अधिकृत समग्र लेखन संपूर्ण गांधी वांग्मय से मदद नहीं ली जा रही है क्योंकि उसमें हिंदी में दिए गए पाठ और उसके अंग्रेजी संस्करण (सीडब्ल्यूएमजी) के पाठ में काफी फर्क है, जिसका हवाला इस बहस में बार बार दिया जा रहा है. इसलिए बहस को उसकी सही शक्ल में पेश करने के लिए इस अनुवाद में उद्धृत अंशों का भी अनुवाद किया जा रहा है. अनुवाद: रेयाज उल हक

 

अब मुझे राजमोहन गांधी के कुछ खास और बड़े आरोपों पर गौर करने दीजिए:

‘द आइडियल भंगी’

वे कहते हैं,
यहां (अनगिनत संभावित छूटों में से) एक और चीज छोड़ी गई है. वे गांधी की एक रचना ‘द आइडियल भंगी’ के काफी मजे लेती हैं (पृ.132-33) और सफाई को लेकर गांधी की चिंता का मजाक उड़ाती हैं और इसमें से कई वाक्य पेश करती हैं. लेकिन वे बड़ी सावधानी से उस वाक्य को छोड़ देती हैं जो भंगियों के साथ तब/अब होने वाले व्यवहार पर गांधी के गुस्से को जाहिर करता है. यह 28 नवंबर 1936 को हरिजन में प्रकाशित हुआ था: ‘लेकिन मैं इतना जानता हूं कि भंगी को तुच्छ मान कर हम – हिंदू, मुसलमान, ईसाई और सभी – पूरी दुनिया की नफरत के लायक हो गए हैं.’ (सीडब्ल्यू 64:86) हां, गांधी जातीय नाइंसाफियों से और भारत की गंदगी से और बहुत कुछ से परेशान थे (आरजी.कॉम).

नीचे मैं ‘द आइडियल भंगी’ से वह हिस्सा पेश कर रही हूं, जिसे मैंने ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ में अपनी टिप्पणी के साथ उद्धृत किया है (रॉय 2014: 132-33). पढ़नेवाले खुद ही फैसला कर सकते हैं कि जिस वाक्य को मैंने बड़े ‘शरारती तरीके से’ छोड़ दिया था, क्या उसकी गैरमौजूदगी से निबंध के मतलब या उसकी आत्मा पर कोई फर्क पड़ रहा है:

1936 में उन्होंने [आंबेडकर ने] आग लगा देने वाली (और महंगी, जैसा कि गांधी ने सरपरस्ती वाले लहजे में टिप्पणी की थी) रचना एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट प्रकाशित की […] उसी साल गांधीजी ने भी साहित्य में यादगार योगदान दिया. वे अब तक अड़सठ साल के हो चुके थे. उन्होंने ‘द आइडियल भंगी’ नाम से एक प्रतिष्ठित निबंध लिखा: ब्राह्मण का धर्म जैसे आत्मा को साफ रखना है, उसी तरह भंगी का धर्म समाज के शरीर को साफ रखना है...ऐसा होते हुए भी अभागा भारतीय समाज भंगी को सामाजिक अछूत बताता है, उसे पायदान की सबसे निचली सीढ़ी पर रखा जाता है, उसे गाली और लात खाने लायक माना जाता है, वह एक ऐसा जीव है जो जाति के लोगों की जूठन पर पलता है और कूड़े के ढेर पर रहता है.

अगर हमने सिर्फ भंगी की हैसियत को ब्राह्मण के बराबर मान लिया होता, हमारे गांव और उनके निवासी साफ-सफाई और व्यवस्था की तस्वीर बन गए होते. इसलिए मैं बिना किसी हिचक या संदेह के यह कहने का साहस करता हूं कि जब तक ब्राह्मण और भंगी के बीच अपमानजनक फर्क को मिटा नहीं दिया जाता, तब तक हमारा समाज सेहत, समृद्धि और शांति का सुख नहीं उठा सकेगा और खुशहाल नहीं हो पाएगा.

फिर [गांधी ने] उन शैक्षणिक जरूरतों, व्यावहारिक कौशल और हुनर का एक खाका दिया जो एक आदर्श भंगी में होनी चाहिए:

‘तब समाज के ऐसे एक सम्मानित सेवक के व्यक्तित्व में किन गुणों की झलक होनी चाहिए? मेरी राय में एक आदर्श भंगी को सफाई के उसूलों का पूरा ज्ञान होना चाहिए. उसे पता होना चाहिए कि एक सही शौचालय कैसे बनता है और उसे साफ करने का सही तरीका क्या है. उसे पता होना चाहिए कि पेशाब-पाखाने की बदबू से कैसे पार पाएं और उसे खत्म कैसे करें. इसको नुकसान रहित बनाने के लिए विभिन्न असंक्रामकों के बारे में भी उसे पता होना चाहिए. इसी तरह उसे पेशाब और पाखाने को खाद में बदलने के तरीके के बारे में पता होना चाहिए. लेकिन इतना ही काफी नहीं है. मेरे आदर्श भंगी को पाखाने और पेशाब की गुणवत्ता के बारे में पता होगा. वह उन पर नजदीकी से नजर रखेगा और संबद्ध व्यक्ति को सही वक्त पर चेतावनी देगा...’

मनुस्मृति कहती है कि काबिलियत होने के बावजूद शूद्र को धन जमा नहीं करना चाहिए, क्योंकि धन जमा करने वाला शूद्र ब्राह्मण को खटकता है. गांधी एक बनिया थे, जिसके लिए मनुस्मृति सूदखोरी को ईश्वरीय धंधा करार देती है, यही गांधी कहते हैं:

‘ऐसा आदर्श भंगी अपने पेशे से अपनी रोजी हासिल करते हुए, इसे सिर्फ एक पवित्र धर्म मानेगा. दूसरे शब्दों में, वह धनी बनने के सपने नहीं देखेगा.’

इसे ध्यान में रखें कि गांधी नहीं चाहते थे कि ‘भंगी’ (पाखाना साफ करने वालों को वे यही कहना पसंद करते थे) कथित तौर पर ईश्वर द्वारा तय किए गए, दूसरे लोगों के पाखाने को साफ करने के अपने इस पेशेवर धंधे से भी धन जमा नहीं करें, जबकि दूसरी ओर उन्होंने ट्रस्टीशिप का अपना मशहूर उसूल विकसित किया था: ‘अमीर लोगों की दौलत उनकी मिल्कियत में रहने दी जानी चाहिए...’ (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी यानी सीडब्ल्यूएमजी 79:133-34, रॉय 2014: 90 पर उद्धृत). तब की तरह अब भी बनिया लोग ही अमीर हैं. यकीनन गांधी जातीय नाइंसाफियों से परेशान थे, लेकिन खुद जाति से उन्हें कोई परेशानी नहीं थी. उन्होंने एक बार भी साफ साफ और निश्चित शब्दों में इसको खारिज नहीं किया. अपने बाद के जीवन में कुछ मौकों पर जब उन्होंने नरमी के साथ इसकी आलोचना भी की तो उन्होंने सुझाव दिया कि इसकी जगह वर्ण व्यवस्था को लाया जाना चाहिए – जिसको आंबेडकर ने जाति व्यवस्था का
जनक बताया था. गांधी ने वंशानुगत पेशों की परंपरा में अपने यकीन को लगातार दोहराया. और चूंकि राजमोहन गांधी हमें ऐसी तारीफ के साथ ‘द आइडियल भंगी’ पेश करते हैं तो क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि वे अपने दादा के नजरिए से सहमत हैंॽ

इत्तेफाक से, ऐसा एक और इंसान भी है जो इस नजरिए से सहमत है: अपनी किताब कर्मयोगी में (जिसको बाल्मीकि समुदाय के विरोध के बाद उन्होंने वापस ले लिया), नरेंद्र मोदी ने लिखा है:

मैं नहीं मानता कि वो यह काम केवल अपनी आजीविका चलाने के लिए करते रहे हैं. अगर ऐसा होता तो उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे काम को जारी नहीं रखा होता...किसी समय किसी व्यक्ति को यह ज्ञान प्राप्त हुआ होगा कि समग्र समाज और देवताओं की खुशी के लिए काम करना उनका (बाल्मीकियों का) धर्म है; कि देवताओं द्वारा उन्हें सौंपा गया यह काम करना होगा; और यह काम सदियों से आंतरिक आध्यात्मिक गतिविधि की तरह जारी रहना चाहिए. (शाह 2012 से उद्धृत, रॉय 2014: 133).

महाड सत्याग्रह

राजमोहन गांधी ने मुझ पर इल्जाम लगाया है कि मैंने मार्च 1927 में महाड सत्याग्रह पर गांधी की टिप्पणियों को जानबूझ कर और बेईमानी से महज यह कहते हुए दबा दिया है कि गांधी ने ‘हमले के सामने अछूतों के सब्र बारे में सहमति जताते हुए’ लिखा. उनका कहना है कि मुझे यह जोड़ना चाहिए था कि सत्याग्रह के एक महीने के बाद 28 अप्रैल 1927 में यंग इंडिया में गांधी ने लिखा था कि ‘डॉ. आंबेडकर द्वारा कथित अछूतों को तालाब पर जाकर अपनी प्यास बुझाने की सलाह देते हुए बंबई लेजिस्लेटिव काउंसिल और महाड म्युनिसिपैलिटी के प्रस्ताव को परखना न्यायोचित था.’ यह भी कि महात्मा ने ‘छुआछूत का विरोध करनेवाले हरेक हिंदू’ से कहा कि वे महाड के अछूतों का सार्वजनिक बचाव करें ‘भले ही उनका अपना सिर फूट जाने का जोखिम हो’ (सीडब्ल्यू 33: 268). यह सच है कि मैंने इन उद्धरणों को शामिल नहीं किया था. (हालांकि इसे बेईमानी से दबाया जाना कहना, मेरे ख्याल से, थोड़ा ज्यादा ही है.)

‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ में तथ्यों को इस तरह पेश किया गया है. गांधी पहले महाड सत्याग्रह में मौजूद नहीं थे. आंबेडकर और उनके साथियों ने मंच पर उनकी एक तस्वीर लगाई क्योंकि तब वे उनकी प्रेरणा के स्रोत थे. राजमोहन गांधी ने जिस बात का जिक्र छोड़ दिया है वो यह है कि उस साल बाद में एक दूसरा महाड सत्याग्रह भी हुआ था (दिसंबर 1927) जिसमें पहले के मुकाबले ज्यादा तादाद में लोग जमा हुए थे. उसी महीने में गांधी, लाहौर में ऑल इंडिया सप्रेस्ड क्लासेज कॉन्फ्रेंस में बोले थे, जहां उन्होंने अछूतों से कहा था कि वे अपने अधिकारों की खातिर लड़ने के लिए ‘मीठी मीठी बातों से समझाने-बुझाने से काम लें, न कि सत्याग्रह से क्योंकि जब लोगों के भीतर गहराई तक जड़ें जमाए बैठे पूर्वाग्रहों को झटका पहुंचाने के मकसद से इसका [सत्याग्रह का] उपयोग किया जाता है तो यह दुराग्रह बन जाता है.’ ‘दुराग्रह’ को उन्होंने ‘शैतानी शक्ति’ बताया, जो सत्याग्रह यानी ‘आत्मिक शक्ति’ के ठीक उल्टा है (प्रशाद 1996: 2015 में उद्धृत, सीडब्ल्यूएमजी 16: 126-28 भी देखें – रॉय 2014: 106-07 में उद्धृत).

महाड सत्याग्रह पर गांधी की प्रतिक्रिया पर व्हाट कांग्रेस एंड महात्मा हैव डन टू द अनटचेबल्स (पहली बार 1945 में प्रकाशित) में लिखते हुए आंबेडकर ने कहा था:

अछूत मि. गांधी का नैतिक समर्थन पाने को लेकर नाउम्मीद नहीं थे. असल में उन्हें इसको पाने की बहुत अच्छी वजह भी थी. क्योंकि सत्याग्रह का हथियार – जिसकी बुनियादी बात यह है कि अपनी तकलीफों से अपने विरोधी के दिल को पिघला दिया जाए – वह हथियार था जिसको मि. गांधी ने बनाया था और जिन्होंने स्वराज हासिल करने के लिए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कांग्रेस से इसका अमल कराया था. स्वाभाविक बात थी कि अछूतों ने हिंदुओं के खिलाफ अपने सत्याग्रह में मि. गांधी से पूरी हिमायत की उम्मीद की थी, जिसका मकसद सार्वजनिक कुओं से पानी लेने और हिंदू मंदिरों में दाखिल होने के अधिकार को कायम करना था. हालांकि मि. गांधी ने सत्याग्रह को समर्थन नहीं दिया. सिर्फ इतना ही नहीं कि उन्होंने समर्थन नहीं दिया, बल्कि उन्होंने कड़े शब्दों में इसकी निंदा की (बाबासाहेब आंबेडकर: राइटिंग्स एंड स्पीचेज या बीएडब्ल्यूएस 9: 247, रॉय 2014: 109-10 में उद्धृत).

क्या राजमोहन गांधी की दलील यह हो सकती है कि आंबेडकर सच्चाई को ‘दबा’ रहे थेॽ

(जारी)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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