हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मालदा की हिंसा सांप्रदायिक हिंसा नहीं थी: एक रिपोर्ट

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/20/2016 01:00:00 PM


मालदा के कालियाचक के दौरे के बाद जेजेएसएस की टीम की शुरुआती रिपोर्ट बताती है कि वहां हुई हिंसा,  हिन्‍दू-मुसलमानों के बीच हिंसा नहीं थी.

मालदा के कालियाचक में 3 जनवरी को हुई हिंसा, साम्‍प्रदायिक हिंसा नहीं दिखती है। इसे मुसलमानों का हिन्‍दुओं पर आक्रमण भी नहीं कहा जा सकता है। यह जुलूस में शामिल होने आए हजारों लोगों में से कुछ सौ अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का पुलिस प्रशासन पर हमला था। इसकी जद में कुछ हिन्‍दुओं के घर और दुकान भी आ गए। गोली लगने से एक युवक जख्‍मी भी हुआ। ये पूरी घटना शर्मनाक और निंदनीय है। ऐसी घटनाओं का फायदा उठाकर दो समुदायों के बीच नफरत और गलतफहमी पैदा की जा सकती है। यह राय मालदा के कालियाचक गई जन जागरण शक्ति संगठन (जेजेएसएस) की पड़ताल टीम की है। 

हिन्‍दू महासभा के कथित नेता कमलेश तिवारी के पैगम्‍बर हजरत मोहम्‍मद के बारे में दिए गए विवादास्‍पद बयान का विरोध देश के कई कोने में हो रहा है। इसी सिलसिले में मालदा के कालियाचक में 3 जनवरी को कई इस्‍लामी संगठनों ने मिलकर एक विरोध सभा का आयोजन किया। इसी सभा के दौरान कालियाचक में हिंसा हुई। इस हिंसा को मीडिया खासकर इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने जिस रूप में पेश किया,  वह काफी चिंताजनक दिख रहा है। इस पर जिस तरह की बातें हो रही हैं, वह भी काफी चिंताजनक हैं।

10 दिन बाद भी जब कालियाचक की घटना की व्‍याख्‍या साम्‍प्रदायिक शब्‍दावली में हो रही थी तब जन आंदोलनों का राष्‍ट्रीय समन्‍वय (एनएपीएम) से सम्‍बद्ध जन जागरण शक्ति संगठन (जेजेएसएस) ने तय किया कि वहां जाकर देखा जाए कि आखिर क्‍या हुआ है? जेजेएसएस ने तीन लोगों की एक टीम वहां भेजी। इसमें पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता नासिरूद्दीन, जेजेएसएस के आशीष रंजन और शोहनी लाहिरी शामिल थे। मालदा में एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्‍शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एपीडीआर) के जिशनू राय चौधरी ने इस टीम की मदद की। ये टीम 16 जनवरी को मालदा पहुंची और 17 को वापस आई। इन्‍होंने जो देखा और पाया उसका संक्षेप में शुरुआती ब्‍योरा यहां पेश किया जा रहा है। टीम ने खासकर उन लोगों से ज्‍यादा बात की जो नाम से हिन्‍दू लगते हैं या जो अपने को हिन्‍दू मानते है।

टीम की शुरुआती संक्षिप्‍त बिंदुवार राय-   

  • कालियाचक में हिंसा की शुरुआत कैसे हुई- इस बारे में कई राय या कहानी सुनाई देती है। जुलूस में शामिल लोगों की संख्‍या के बारे में भी लोगों की अलग-अलग राय है।  
  • बातचीत में हमें पता चला कि जुलूस में शामिल होने आए लोगों ने थाने पर हमला किया। थाने में आग लगाई। थाने में तोड़फोड़ की। कई दस्‍तावेज जलाए गए। वहां खड़ी जब्‍त और पुलिस की गाडि़यों को जलाया गया। हमें एक गाड़ी जली दिखाई दी। थाने में मौजूद सिपाही भी जख्‍मी हुए। वहां जब्‍त कई सामान और हथियार भी लूटे जाने की खबर है।
  • जब यह टीम थाने पहुंची तो वहां मरम्‍मत का काम चलता दिखा। रंगाई-पुताई होती दिखी। हालांकि इस टीम ने पुलिस अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन यह मुमकिन नहीं हो पाया। थाने में भी इस घटना के बारे में लोग जल्‍दी खुलकर बात नहीं करते हैं।
  • थाने परिसर में ही एक लड़कियों का नया हॉस्‍टल दिखा। हालांकि उसमें अभी लड़कियां नहीं है। उसमें किसी तरह की तोड़फोड़ नहीं दिखती है। इसी परिसर में दूसरे विभागों कें कुछ और दफ्तर भी हैं। उनमें भी तोड़फोड़ या आगजनी जैसी चीज नहीं दिखाई देती है।  
  • थाने के ठीक पीछे एक मोहल्‍ला है जिसे बालियाडांगा हिन्‍दू पाड़ा कहा जाता है। इस मोहल्‍ले का एक रास्‍ता थाने से होकर भी गुजरता है। इस मोहल्‍ले की शुरुआत में एक पान गुमटी जली दिखी। चार-पांच दुकानों की होर्डिंग, बोर्ड, टिन शेड टूटे या फटे दिखे। एक मकान के कांच के शीशे टूटे दिखाई दिए। एक दुकानदार का दावा है कि उसकी दुकान का शटर तोड़ने की भी कोशिश हुई। एक चाय दुकानदार का भी कहना है कि उसकी दुकान में रखा दूध गिरा दिया गया।  
  • यहां एक मोटरसाइकिल जलाए जाने की भी बात सुनने को मिली।
  • इसी मोहल्‍ले में थाने के ठीक पीछे एक मंदिर है। उस मंदिर के बाहर जाली की बैरिकेडिंग टूटी दिखाई दी। पड़ोसियों का कहना है कि इसे उपद्रवियों ने ही तोड़ा है। मंदिर का भवन और मूर्ति पूरी तरह सुरक्षित दिखी।
  • इसी तरह थाने के सामने के एक बड़े मकान के कांच के शीशे टूटे दिखाई दिए।
  • थाने के बगल में एक लाइब्रेरी है, उसमें भी तोड़फोड़ हुई।
  • थाने के अंदर एक बड़ा मंदिर है। हमें उस मंदिर में कुछ भी टूटा या गायब नहीं दिखा। मंदिर में लोहे का ग्रिल है, वह भी पूरी तरह सुरक्षित है। मूर्तियां अपनी जगह पर थीं। हमने पुजारी को काफी तलाशने की कोशिश की पर वह नहीं मिले।
  • इस हिंसा के दौरान एक युवक को गोली भी लगी है। वह अस्‍पताल से अपने घर लौट चुका है। हम उससे मिलने और बात करने उसके घर गए। हालांकि उसने और उसके परिवारीजनों ने बात करने से मना कर दिया।
  • इस युवक के अलावा हमें किसी और को गोली लगने या किसी और के जख्‍मी होने की बात पता नहीं चली।
  • हिन्‍दूपाड़ा लगभग एक किलोमीटर में दोनों ओर बसा है। हालांकि थाने के पीछे हिन्‍दूपाड़ा में हिंसा के निशान सिर्फ 50 मीटर के दायरे में ही कुछ जगहों पर दिखते हैं। हम एक छोर से दूसरी छोर तक गए। लोगों से बात की। इस 50 मीटर के दायरे के बाहर किसी ने अपने यहां पथराव, तोड़फोड़ की बात नहीं बताई।
  • हालांकि कुछ लोगों ने यह जरूर बताया कि जुलूस में शामिल कुछ लोग आपत्तिजनक नारे लगा रहे थे।
  • हमने कई हिन्‍दू महिलाओं से भी बात की। इनमें से किसी ने अपने साथ अभद्रता या गाली गलौज की बात नहीं बताई। हालांकि पूछने पर वे बताती हैं कि ऐसा सुनने में आया है।  
  • थाने के ठीक सामने के बाजार में ज्‍यादातर दुकानें हिन्‍दुओं की हैं। हमने अनेक दुकानदारों से बात की। इनके दुकानों में भी तोड़फोड़ नहीं हुई है।
  • हिन्‍दूपाड़ा के कुछ लोगों का कहना है कि जब थाने में हिंसा हुई और कुछ उपद्रवी मोहल्‍ले की तरफ आए और मंदिर की तरफ बढ़े तो इधर से भी प्रतिवाद हुआ। इसके बाद मोहल्‍ले में पथराव या आगजनी हुई।
  • यानी, हिंसा का दायरा काफी सीमित था। उसका लक्ष्‍य थाना ही था।
  • रथबाड़ी, देशबंधु पाड़ा, कलेक्‍ट्रेट का इलाका, झलझलिया, स्‍टेशन सहित मालदा के कई इलाकों में गए। हमने खासकर हिन्‍दुओं से बात की। मालदा शहर में हमें एक भी ऐसा शख्‍स नहीं मिला जो इसे साम्‍प्रदायिक गंडगोल या मुसलमानों का हिन्‍दुओं पर हमला मानता हो।
  • यही हाल कालियाचक का भी दिखा। कालियाचक में भी ज्‍यादातर लोग इसे अपराधियों की हरकत बताते हैं। सबकी वजहें अलग-अलग हैं। हमें सिर्फ एक शख्‍स मिले, जिन्‍होंने बातचीत के दौरान खुलकर कहा कि यह हिन्‍दुओं पर जानबूझ किया गया हमला था। हिन्‍दूपाड़ा में कुछ लोग पूछने पर जरूर इसे कुछ कुछ साम्‍प्रदायिक कह रहे थे। कुछ घटनास्‍थलों को दिखाने को उत्‍साहित भी दिख रहे थे।
  • मालदा शहर में हिंसा का कोई असर नहीं दिखता है।
  • मालदा से कालियाचक के बीच लगभग 28-30 किलोमीटर के सफर में, रास्‍ते में कई गांव पड़ते हैं। कहीं भी कुछ भी असमान्‍य नहीं दिखता है। बाजार पूरी तरह खुले दिखे। खूब चहल-पहल दिखी। महिलाएं भी सड़क पर बदस्‍तूर काम करती दिखाई दीं।
  • यही हाल कालियाचक का है। कालियाचक में बाजार ऐसे गुलजार दिेखे, जैसे यहां कभी कुछ हुआ ही न हो। थाने के ठीक सामने के बाजारों की सभी दुकानें खुली थीं। लोगों का हुजूम सड़कों पर था। स्‍त्री-पुरुष, बच्‍चे-बूढे़ सभी आते जाते दिखाई दिए। इनमें से कोई थाने की टूटी बाउंड्री को पलट कर या ठहरकर देखता भी नहीं मिला।
  • थाने के अंदर भी सबकुछ सामान्‍य लग रहा था। फरियादी दिख रहे थे। कई महिलाएं या नौजवान अपनी शिकायतें लेकर आए हुए थे। थाना परिसर में ही वेटनरी विभाग का दफ्तर है, उसमें महिलाएं अपनी बकरियों के साथ आती-जाती दिखीं।  
  • हिन्‍दू पाड़ा के ठीक सटे मुस्लिम पाड़ा है। हम यहां भी गए। हम उन लोगों से बात करना चाह रहे थे, जो जुलूस में गए हों। हमें कोई ऐसा नौजवान या शख्‍स नहीं मिला, जो यह कहे कि वह जुलूस में शामिल था। हर नौजवान या अधेड़ हमें यही कहता मिला कि वह जुलूस में नहीं गया था। वह कहीं और था। लोगों की बातें उनके मन के डर को साफ जाहिर कर रही थीं। यह डर उस वक्‍त खुलकर सामने आ गया जब हमारी साथी ने महिलाओं से बातें कीं।
  • इस मुस्लिम पाड़ा से दो लोग गिरफ्तार हुए हैं। हम इनके परिवारीजनों से मिले। दोनों परिवारों का कहना है कि उनके लोग बेकसूर हैं। पुलिस उन्‍हें गलत तरीके से ले गई है। एक घर में पुलिस के जबरन घुसने और गिरफ्तार करने की भी बात पता चली।
  • मुस्लिम पाड़ा के लोगों का कहना है कि पुलिस के पास सीसीटीवी फुटेज है। वह देखें और हमें दिखाएं। अगर हमारे लोग तोड़फोड़ में शामिल हैं तो हम उन्‍हें गिरफ्तार करवाएंगे। लेकिन हमारे साथ ज्‍यादती न की जाए।
  • हमने वाम मोर्चा, भारत की कम्‍युनिस्‍ट पाटीं- मार्क्‍सवादी (माकपा), तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), शोधकर्ताओं, पत्रकारों से भी बात की। कमोबेश सबका यह मानना है कि यह साम्‍प्रदायिक घटना नहीं है। यह मुसलमानों का हिन्‍दुओं पर हमला नहीं था। भारतीय जनता पार्टी के नेता भी इस घटना को खुलकर साम्‍प्रदायिक नहीं कहते हैं।
  • बातचीत में लोगों का यह भी कहना है कि पुलिस को जिस तरह तैयारी करनी चाहिए थी, उसने नहीं की। साथ ही इलाके में चलने वाली गैर कानूनी गतिविधियों पर भी पुलिस का रवैया ढीला रहता है। हालांकि पिछले कुछ म‍हीनों में बंगाल में पुलिस और थानों पर हमले बढ़े हैं। इस नजरिए से भी इस घटना को देखा जाना चाहिए।  

हमें पता चला कि इस इलाके में तस्‍करी, अफीम की खेती, जाली नोट का धंधा, बम और कट्टा बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता है। इन धंधों में शामिल लोग या वे लोग जिनका हित इस धंधे से जुड़ा है, उन्‍हीं का इस हिंसा से रिश्‍ता दिखता है। हमारा मानना है कि अगर यह साम्‍प्रदायिक घटना होती या हिंसा का मकसद हिन्‍दुओं पर हमला करना होता तो हिन्‍दूपाड़ा या आसपास के इलाके की शक्‍ल आज अलग होती। इसे साम्‍प्रदायिक बनाने की कोशिश वस्‍तुत: अगले साल होने वाले चुनाव के परिप्रेक्ष्‍य में देखी जा सकती है।

2011 की जनगणना के मुताबिक, कालियाचक की कुल आबादी 392517 यानी तीन लाख 92 हजार 517 है। इसमें महज 10.6 फीसदी हिन्‍दू (41456) है और 89.3 फीसदी मुसलमान (350475) हैं। आबादी की इस बनावट से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस तरह की बात हो रही है, अगर वह सच होता तो आज हालात क्‍या होते।

इस टीम की कोशिश है कि इसकी विस्‍तृत रिपोर्ट जल्‍द ही बनाई जाए।

आशीष रंजन,  शोहिनी लाहिरी, नासिरूद्दीन
सम्‍पर्क- 09973363664 / ashish.ranjanjha@gmail.com

उसने अपने शब्दों के साथ हमें अकेला छोड़ दिया है: मीना कंदसामी

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/19/2016 08:14:00 PM


सांप्रदायिक और ब्राह्मणवादी
ताकतों  के खिलाफ आंदोलनरत हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहिथ वेमुला की आत्महत्या पर मीना कंदसामी का लेख. द हिंदू में प्रकाशित मूल अंग्रेजी से अनुवाद: रेयाज उल हक 
 
एक दलित छात्र की खुदकुशी बच निकलने की एक अकेले इंसान की हिकमत नहीं होती, यह उस समाज को शर्मिंदा करने की कार्रवाई होती है, जो उसके साथ खड़े न रह सका. रोहिथ वेमुला की मौत उनके द्वारा जातिवादी, सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ चलाए जा रहे एक संघर्ष के एक ऐसे उदासी भरे अंजाम के रूप में सामने आई है, जिसका पहले से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था. उन पांच दलित अध्येताओं में से एक रोहिथ अपने आखिरी पल तक मजबूती से डटे रहे, जिन्हें दक्षिणपंथी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्धी परिषद द्वारा लगाए गए आरोपों पर हैदराबाद विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया था. यहां तक कि मौत की तरफ धकेले जाते हुए भी रोहिथ अपने सबसे जुझारू छात्रों की असुरक्षाओं को हमें दिखाते गए, और हमारी शैक्षिक व्यवस्था की असली दशा को भी उजागर किया: दलित छात्रों को निकालने के दशकों पुराने इतिहास वाला एक वाइस चांसलर, दक्षिणपंथी हिंदू ताकतों की तरफ से बदला लेने के लिए केंद्रीय मंत्रियों की भागीदारी, पूरी प्रशासनिक मशीनरी का शासक राजनीतिक दलों की कठपुतली बन जाना और सामाजिक बेपरवाही के त्रासद नतीजे.

इन पांच दलित छात्रों को निकाले जाने से बढ़ कर इसकी कोई कारगर मिसाल नहीं मिल सकती कि जाति व्यवस्था कैसे काम करती है. हालांकि उनके निकाले जाने की वजह से दलित बहुजन छात्र समुदाय के बीच में एकजुटता की भावना मजबूत हुई थी, लेकिन उनको निकाले जाने की कार्रवाई ने खौफनाक बातों की याद दिला दी थी. ठीक मनुस्मृति द्वारा अवर्णों (यानी दलितों) को जातीय दायरों से बाहर रहने के फरमान की तरह ही, इस सजा में ही वे सारे प्रतीक शामिल थे जिनमें जातीय सफाई की अवधारणा छुपी हुई है. शिक्षा अब अनुशासित करनेवाला एक उद्यम बन गई है, जो दलित छात्रों के खिलाफ काम कर रही है: वे लगातार रस्टिकेट कर दिए जाने, हमेशा के लिए निकाल दिए जाने, बदनाम हो जाने या पढ़ाई रुक जाने के खौफ में रहते हैं. एक ऐसे समाज में जहां छात्रों ने उच्च शिक्षण संस्थानों में पहुंचने के अपने अधिकार को आरक्षण की नीतियों की सक्षम बनाने वाली, सुरक्षा देने वाली धारणा के तहत यकीनी बनाने के लिए व्यापक संघर्ष किया है, किसी ने भी इस बात पर रोशनी डालने का साहस नहीं किया है कि इनमें से कितने छात्रों को इसकी इजाजत मिलती है कि वे डिग्री हासिल करके इन संस्थानों से लौटें, और कितनों को पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ती है और इस तरह वे अवसाद के स्थायी शिकार बन जाते हैं और कितने आखिरकार मौत के अंजाम तक पहुंचते हैं.

रोहिथ जैसे छात्र

रोहिथ वेमुला जैसे दलित छात्र एक डॉक्टरल डिग्री के लिए विश्वविद्यालयों में दाखिल हो पाते हैं, यही उनकी समझदारी, जिद और जातीय भेदभाव के खिलाफ उनके अथक संघर्ष की निशानी होती है, वह भेदभाव जो पहले दिन से ही उनको तबाह कर देने की कोशिश करता है.
 

जातीय वर्चस्व से भरी हुई पाठ्य पुस्तकें, अलगाव को और भी मजबूत कर देने वाला कॉलेज कैंपसों का माहौल, अपने प्रभुत्वशाली जातीय रुतबे पर गर्व करनेवाले सहपाठी, उनको एक बदतर भविष्य की तरफ धकेलने वाले शिक्षक जो इस तरह उनके नाकाम रहने की अपनी भविष्यवाणी को सच साबित करते हैं – ये सब दलित छात्रों के लिए पार करने के लिहाज से नामुमकिन चुनौतियां हैं. बौद्धिक श्रेष्ठता के विचार में रंगी हुई जाति पर जब अकादमिक दुनिया के दायरों में पर अमल किया जाता है, तो वह जिंदगियों को खा जाने और जानें लेने वाला एक ज़हर बन जाती है. क्लासरूम जाति के खिलाफ प्रतिरोध और उसके खात्मे की जगहें बनने की बजाए उन लोगों की बेकाबू जातीय ताकत की दावेदारी बन जाते हैं जो द्विज होने और ज्ञान के संचरण के पवित्र धागों में यकीन करते हैं और जो अपनी पैदाइश से ही यथास्थिति को कायम रखने को मजबूर हैं.

बहिष्कार के डर से अपनी पहचान छुपाए रखनेवाले उत्पीड़ित पृष्ठभूमियों के उन थोड़े से छात्रों की असली पहचान उजागर होने पर सजा दी जाती है – मिथकीय कर्ण की तरह उन्हें जानलेवा नाकामी का अभिशाप दिया जाता है. अपने बूते उभरनेवाले दलित छात्रों को, जिनकी पहचान सबके सामने पहले से ही जाहिर होती है और जो किंवदंतियों के एकलव्य बन जाते हैं, जिंदा छोड़ दिया जाता है लेकिन उन्हें अपनी कला को अमल में लाने में नाकाम बना दिया जाता है. ऐसा अकेले छात्रों के साथ ही नहीं होता, क्योंकि जातीय सत्ता के इन गलियारों में दलित-बहुजन फैकल्टी भी अलग-थलग कर दिए जाने का सामना करते हैं. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी), मद्रास में अपनी मां के संघर्ष को मैंने जितने आदर से देखा है, उतनी ही बेचारगी के साथ मैंने इस औरत को टूटते और बिखरते हुए भी देखा है, जिसे मैं प्यार करती हूं. अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों/अन्य पिछड़ा वर्गों के फैकल्टी मेंबरों का हमारे आईआईटी/भारतीय प्रबंधन संस्थानों और विश्वविद्यालयों में नाम भर का प्रतिनिधित्व इस जातीय भेदभाव को और बढ़ा देता है, क्योंकि इससे मिलती जुलती पृष्ठभूमियों से आने वाले छात्रों को एक ऐसा सहायता देने वाला समूह तक नहीं मिलता, जो उनकी मुश्किलों के बारे में सुन सके या उन्हें सलाह दे सके.

ब्राह्मणवादी प्रोफेसरों के एक इंटरव्यू पैनल के सामने, जिनकी अदावत एक फायरिंग दस्तों की याद दिलाती है, एक छात्र कैसे अपने बूते पर टिका रह सकता या सकती है? ये प्रोफेसर, जिन्होंने एक तरफ हो सकता है कि न्यूक्लियर फिजिक्स में महारत हासिल कर ली हो, लेकिन दूसरे तरफ अपने प्यारे जातीय पूर्वाग्रहों को पालते-पोसते रहते हैं. और ये अकादमिक दुनिया में जातीय आतंकवाद की समस्या के सिर्फ एक पहलू का ही प्रतिनिधित्व करते हैं. जब इसका मेल एबीवीपी जैसे दक्षिणपंथी राजनीतिक छात्र गिरोहों से होता है तो यह एक खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है.

हमारे विश्वविद्यालय आधुनिक कत्लगाह बन गए हैं. सभी दूसरे जंग के मैदानों की तरह, उच्च शिक्षा के संस्थान भी जातीय भेदभाव के साथ साथ दूसरी चीजों में भी महारत हासिल कर रहे हैं. वे छात्राओं और महिला फैकल्टी के यौन उत्पीड़न के लिए बदनाम हो चुके हैं, कहानियां जो दबा दी जाती हैं, कहानियां जिन्हें उन शिकायतकर्ताओं का चरित्र हनन करने के लिए तोड़-मरोड़ दिया जाता है जो विरोध करती हैं, आवाज उठाती हैं और जो अपने साथ धमकी से, मजबूरी से या जबरदस्ती सेक्स करने की किसी भी कोशिश को कारगर नहीं होने देतीं. ठीक जिस तरह से रोहिथ की खुदकुशी ने चुप्पियों को तोड़ते हुए जाति की हत्यारी पहचान उजागर की है, एक दिन हम उन औरतों की कहानियां भी सुनेंगे, जिन्हें इन एकाकी टापुओं से मौत के समंदर में ले जाया गया.

हमने हैदराबाद विश्वविद्यालय के मामले में जो देखा है वह जातीय श्रेष्ठता और राजनीतिक सहभागिता का खतरनाक मेलजोल है. छात्रों को धमकाने और दबाने में राज्य मशीनरी और खासकर पुलिस बल की भूमिका कैंपसों में दमन के एक पुराने और आजमाए हुए तरीके के रूप में स्थापित हुई है. आईआईटी मद्रास में आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल की मान्यता खत्म करने के बाद के दिनों में वर्दी वाले मर्द और औरतें कैंपस में हर जगह दिन रात मौजूद रहते थे और इसके दरवाजों की पहरेदारी करते थे. (यह फैसला काफी विरोध के बाद वापस लिया गया था.) अब इसी तरह हैदराबाद कैंपस में हथियारबंद पुलिस की ऐसी ही भारी तैनाती और धारा 144 के तहत कर्फ्यू लगा दिया गया है.

एक वादा जिस पर अमल करना है

रोहिथ, तुमने कार्ल सेगान की तरह एक विज्ञान लेखक बनने का अपना एक सपना अपने पीछे छोड़ा है और हमें सिर्फ अपने शब्दों के साथ अकेला कर गए हो. अब हमारे हर शब्द में तुम्हारी मौत का वजन है, हर आंसू में तुम्हारा अधूरा सपना है. हम धमाके को तैयार सितारों का वह समूह बन जाएंगे, जिसके बारे में तुमने बात की है, वह समूह जिसकी जबान पर जाति की इस उत्पीड़नकारी व्यवस्था की दास्तान होगी. इस मुल्क के हर विश्वविद्यालय में, हर कॉलेज में, हर स्कूल में, हमारे हर नारे में तुम्हारे संघर्ष का जज्बा भरा होगा. डॉ. आंबेडकर ने जाति को एक ऐसा शैतान बताया है, जो आप जिधर भी रुख करें आपका रास्ता काटेगा और भारतीय शैक्षिक संस्थानों के अग्रहारों के भीतर हमारी शारीरिक मौजूदगी में ही जाति के उन्मूलन के संदेश निहित होने चाहिए. अकादमिक दुनिया पर अपनी दावेदारी ठोकनेवाले एक दलित, एक शूद्र, एक आदिवासी, एक बहुजन, एक महिला से अपना सामना होने पर हरेक घिनौनी जातीय ताकत को घबराने दो, उन्हें इसका अहसास होने दो कि हम यहां पर एक ऐसी व्यवस्था का खात्मा करने आए हैं, जो हमें खत्म करने की पुरजोर कोशिश करती रही है, कि हम यहां पर उन लोगों के लिए बुरे सपनों की वजह बनने आए हैं, जिन्होंने हमसे हमारे सपनों को छीनने की हिम्मत की है. उन्हें इसका अहसास हो जाने दो कि वैदिक दौर, पवित्र ग्रंथों को सुन लेने वाले शूद्र के कानों में पिघला हुआ सीसा डालने का दौर, वंचित किए गए ज्ञान को अपनी जबान पर लाने का साहस करने वालों की जबान काट लेने का दौर बीत चुका है. उन्हें यह समझ लेने दो कि हमने शिक्षित बनने, संघर्ष करने और संगठित होने के लिए इन गढ़ों-मठों पर धावा बोला है; हम यहां मरने के लिए नहीं आए हैं. हम सीखने के लिए आए हैं, लेकिन जाति के शैतानों और उनके कारिंदों को यह बात समझ लेने दो कि हम यहां पर उन्हें एक ऐसा सबक सिखाने भी आए हैं, जिसे वे कभी भुला नहीं पाएंगे.

'जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन' की भूमिका: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/15/2016 02:29:00 PM



जाने-माने जनवादी अधिकार कार्यकर्ता और चिंतक आनंद तेलतुंबड़े ने यह भूमिका आधार प्रकाशन से रुबीना सैफी के संपादन में प्रकाशित हुई अपनी किताब जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन के लिए लिखी है. किताब में शामिल निबंध जाति के उन्मूलन को एक केंद्रीय कार्यभार के रूप में देखते हुए एक सच्चे जनवादी समाज के निर्माण की चुनौतियों, संघर्षों, वैचारिकी और जरूरत को रेखांकित करते हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

मुझे युवा अध्येता रूबीना सैफी द्वारा तैयार किए गए इस संकलन की भूमिका लिखते हुए बहुत खुशी हो रही है, जिसके निबंध मैंने अलग अलग वक्त में अलग अलग विषयों पर लिखे हैं लेकिन वे किसी न किसी तरीके से जाति के सवाल के साथ जुड़े हुए हैं. ये मूल लेख अंग्रेजी में हैं और पढ़नेवालों के एक बड़े तबके के लिए वे यहां हिंदी में पेश किए जा रहे हैं.

जाति को लेकर मेरा नजरिया ज्यादातर लोगों और स्थापित बौद्धिक जमात से बहुत अलग है, और इसीलिए वर्ग को लेकर मेरा नजरिया भी अलग है. बुनियादी तौर पर मैं इन दोनों अवधारणाओं को आपस में एक दूसरे से अलग अलग करके देखने के रुझान में समस्याएं पाता हूं. खास तौर से बौद्धिक बहसों में जाति और वर्ग का इस कदर अलग अलग होना मुझे उलझन में डालता है. मार्क्सवादी सिद्धांत में वर्ग, इतिहास में द्वंद्ववाद को आगे बढ़ाने की एक अवधारणात्मक श्रेणी थे. इस खांचे में जातियों को कैसे और कहां समोया जा सकता था? वे कैसे एक साथ वजूद में रह सकती हैं? इसी तरह मैं आंबेडकर द्वारा जातियों की जड़ को हिंदू धर्मशास्त्रों में देखने और धर्म बदल लेने के उनके समाधान को लेकर भी बेचैनी महसूस करता हूं. मुझे इस पर हैरानी थी कि आंबेडकर ने कम्युनिस्टों के इस दावे के लिए सामान मुहैया कराया कि जातियां महज ऊपरी ढांचे का हिस्सा थीं. आंबेडकर वाजिब ही कम्युनिस्टों से परेशान थे कि उन्होंने जातियों के सवाल को नजरअंदाज किया और क्रांति को लेकर अड़े हुए थे. लेकिन जब आंबेडकर ने अपनी जाति-विरोधी दलील को पेश किया, तो अनजाने में ही, उनकी दलील ने कम्युनिस्टों की मदद की. यह सब तो एक बात, आखिर जाति कैसे बस हिंदू धर्मशास्त्रों में ही हो सकती है, या फिर हिंदू धर्म की तरकीब हो सकती है? अगर ऐसा है तो भारत के दूसरे धर्मों में जातियों के वजूद को कैसे समझा जा सकता है? मैं इस खयाल को हजम नहीं कर पाया कि किसी एक इंसान ने कुछ लिख दिया और समाज उसके आधार पर ढल गया. जातियों के पैदा होने की कुछ भौतिक वजह होनी चाहिए. धर्म के आधार पर विचारधारा इसको कायम रखने में अपना योगदान दे सकती है, लेकिन यकीनन यह इसे पैदा नहीं कर सकती.

शुरू-शुरू में मुझे अपने नजरिए के लिए आंबेडकरियों और मार्क्सवादियों दोनों से ही खासे विरोध का सामना करना पड़ा. आंबेडकरी मार्क्सवाद की अपनी सतही धारणाओं के साथ आसानी से मुझे मार्क्सवादी करार देते थे. मार्क्सवादियों को उतना सतही होने की भी जरूरत नहीं थी, उनके लिए मेरा दलित होना ही मुझसे आंबेडकरी के रूप में पेश आने के लिए काफी था. यह एक ऐसा नसीब है, जो भारत में हरेक प्रगतिशील दलित कार्यकर्ता के हिस्से आता है. आप हमेशा ही जाति के खोखल में वापस फेंक दिए जाते हैं या फिर आपको जाति से बाहर कर दिया जाता है, उसी तरह जैसे जातियां बुनियादी तौर पर काम करती हैं. इसने भी इसे साबित किया कि भारतीय समाज में अभी भी कितना जहर है कि मार्क्सवादी भी इससे बचे नहीं रह सकते. यह बुश की उस दलील से मिलती जुलती है, कि या तो आप हमारे साथ हैं या फिर हमारे खिलाफ. इसके लिए दलितों को माफ किया जा सकता था, पहली बात तो इसलिए कि मार्क्सवादियों के उलट वे अपने को राह दिखाने वाले किसी महान सिद्धांत का दावा नहीं करते और दूसरी कि वे शासक वर्गों द्वारा की जा रही हर तरह की सियासी धांधलियों से महफूज नहीं हैं.

लेकिन इन सबसे मुझे फिक्र नहीं हुई; क्योंकि मैं जानता था कि मैं क्या था. इसके उलट, इस पूरे दौरान मुझे इन वादों के बारे गंभीर संदेह पैदा होने लगे, जो अपने मानने वालों में पहचान पर आधारित पूर्वाग्रहों का जहर भरने के अलावा कोई काम नहीं करते. मैंने अनेक ऐसे लोगों को देखा है, जो पक्के आंबेडकरी होने का दावा करते थे, मगर लेकिन जिन्होंने असल में आंबेडकर की लिखी हुई एक भी किताब नहीं पढ़ी है. और इसी तरह मैं ऐसे मार्क्सवादियों को जानता हूं (अब वे महज मार्क्सवादी ही नहीं हैं, वे मार्क्सवादी-लेनिनवादी और माओवादी हैं) जो इसी तरह से मार्क्सवाद के बुनियादी उसूलों से अनजान हैं. यह इन संभावित क्रांतिकारी आंदोलनों के लिए हंसी के काबिल, लेकिन साथ ही त्रासदी भरी हुई हालत है (हालांकि आंबेडकरी शायद इसे क्रांति कहें या न कहें, लेकिन जातियों का उन्मूलन भारत में किसी क्रांति से कम नहीं है) कि वे अपनी नादानी पर फिदा होने वाली खोखली पहचानों में सिमट कर रह गए हैं. बेशक, दोनों तरफ ऐसे लोग हैं जो अपने क्रांतिकारी वायदों को लेकर काफी संजीदा हैं लेकिन वे अपने चारों ओर मौजूद, पहचान पर काम करने वाली भीड़ में दब गए हैं. मेरा लिखी हुई रचनाओं का अनुवाद होता है, उन पर जवाब आते हैं और उनके आधार पर आगे चीजें लिखी जाती हैं, यह तथ्य दिखाता है कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. और फिर बोहेमियाई खुशफहमियों के हाथों बिक चुके नौजवानों के उस बड़े से नवउदारवादी हिस्से को अलग कर देने के बाद भी, नौजवानों की एक बढ़ती हुई आबादी है, जो अपने भविष्य को लेकर बहुत उलझन में है. यह आबादी मेरी बातों को सुनती हुई लगती है. इस नजरिए से, मुझे महसूस होता है कि यह किताब मेरे विचारों को समझने में और भी मदद करेगी.

जाति और वर्ग पर मेरी समझदारी न तो प्रयोगों से पैदा हुई है और न ही किताबों से. अपनी सार्वजनिक सक्रियता (एक्टिविज्म) के जरिए भी जाति के सवाल पर सोचना मैंने काफी बाद में शुरू किया. हालांकि मैं एक दलित के रूप में पैदा हुआ था, लेकिन दूसरों के उलट मुझे अपने बचपन में जाति के कड़वे अनुभवों का सामना नहीं हुआ हालांकि दलितों का ढांचागत अलगाव दूसरे किसी भी गांव की तरह मेरे गांव में भी था. दलितों और गैर-दलितों को एक सड़क अलग करती थी, जो आगे चल कर खेतों से होते हुए एक पतली सी पगडंडी में बदल जाती और दो खेतों के बाद दलितों के एक कुएं तक और फिर आखिर में एक दूसरे गांव तक ले जाती थी. हालांकि दलितों और दूसरों के बीच आपसी रिश्तों में यह कोई मायने नहीं रखता था. लोगों ने शायद इस बात को अपने अंदर जज्ब कर लिया था कि उन्हें क्या करना है और वे अपनी अपनी दुनिया के दायरों में जी रहे थे.

अब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं तो लगता है कि इसकी बड़ी वजह गांव की अजीबोगरीब राजनीतिक अर्थव्यवस्था थी. यह गांव कोयले, चूनापत्थर, डोलोमाइट वगैरह से भरपूर था, यहां देश की सबसे पुरानी कोयले की खदानों में से एक खदान थी, हालांकि यह मेरे पूरे बचपन के दौरान बंद रही थी. दूसरी तरफ यहां दो दर्जन चूना भट्ठियां थीं और उनके लिए चूनापत्थर का खनन होता था. पूरा इलाका गतिविधियों से भरपूर था. सबसे अहम तथ्य ये था कि कोलियरी की वजह से मुख्य गांव से दोएक किलोमीटर दूर एक महानगरीय आबादी वाला एक औद्योगिक कस्बा (टाउनशिप) विकसित हो गया था, जिसमें देश के करीब-करीब सभी इलाकों से आए लोग रहते थे, लेकिन उनमें दलित आबादी सबसे ज्यादा थी. यहां तक कि हमारे गांव से भी ज्यादातर दलित मर्द और औरतें दोनों, चूना कारखानों और चूनापत्थर की खदानों में काम करते थे. इस तरह दूसरे गांवों के उलट, यहां के दलित अपने गुजर-बसर के लिए कुनबी किसानों पर निर्भर नहीं थे. इसके उलट, दलितों को हर हफ्ते नकद मजदूरी मिलने के कारण वे ज्यादातर किसानों से बेहतर हालत में दिखते थे, जिनके पास नकद रकम सिर्फ अपनी पैदावार बेचने के बाद ही आती थी. सूखी जमीन पर खेती के कारण वैसे भी आमदनी कम ही थी. इसका असर दलितों और गैर-दलितों के बीच रिश्तों में दिखता था, जिन्हें किसी न किसी रिश्ते के नाम से ही बुलाया जाता था, जैसे कि मामा, काका (चाचा), आजा, आजी (दादा, दादी) वगैरह.

इसके बजाए, मेरे बचपन का अनुभव अपने आसपास की गैरबराबरी को लेकर बेचैनी वाला था. गांव में भी, जहां कोई भी बहुत अच्छी हालत में नहीं था, कुछ लोगों के पक्के घर थे जो अपने चूने से रंगी दीवारों के साथ आस पास की मिट्टी की झोंपड़ियों के बीच अलग ही दिखते थे. इन कुछ घरों को छोड़ कर, जो सड़क के दोनों और स्थित थे, दलितों और दूसरों के घरों के बीच कोई खास फर्क नहीं था. घरों के अलावा, ज्यादातर लोगों के पास मवेशी थे, जिन्हें मैं गांव के किसी भी बच्चे की तरह पसंद करता था, लेकिन हमारे पास एक भी जानवर नहीं था. असल में हमारा परिवार अकेला परिवार था, जिसके पास न जमीन थी न जानवर. अपनी मां से मैं भोलेपन से पूछता कि हमारे पास कोई बकरी क्यों नहीं है और फिर इसकी मांग करते हुए आसमान सिर पर उठा लेता कि वो अभी के अभी मेरे लिए एक बकरी लेकर आएं. किसी तरह वो जवाब देने की कोशिश करतीं लेकिन जल्दी ही वो सब्र खो देतीं और मुझे पीटने लगतीं. न तो उनकी पिटाई ने मुझे उन सवालों को उठाने से रोका और न ही उनके जवाब मुझे कायल कर पाए.

जवाब का इंतजार करते उन सभी सवालों का एक दिन अचानक ही जवाब मिल गया, या शायद ऐसा मुझे लगा, जब मुझे अपनी तीसरी कक्षा में अव्वल आने पर मुझे ईनाम में एक किताब दी गई. असल में मैं बीमार होने की वजह से परीक्षा ही नहीं दे सका था, लेकिन मेरे शिक्षकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. इम्तहान दूं या न दूं, मेरे लिए अव्वल जगह तय थी. ईनाम में मिली हुई किताब जोसेफ स्तालिन की मराठी जीवनी थी. यहां तक कि जिस शिक्षक ने तहसील के कस्बे की अकेली दुकान से वह किताब खरीदी थी, उसे भी इसका अंदाजा नहीं था कि वह क्या थी. यह उनके लिए बस एक किताब थी, जो स्कूल के रिवाज के मुताबिक इनाम में देने के लिए उनके बजट के भीतर थी. लेकिन मेरे हाथ में यह किताब एक बम का गोला बन जानेवाली थी. एक तरह से इसने मुझे भीतर तक इस कदर बिखेर दिया कि अब मैं वह पहले वाला बच्चा नहीं रह गया. मैंने उस किताब को पढ़ा और बार बार पढ़ा. स्तालिन की शख्सियत बहुत असरअंदाज थी, लेकिन मार्क्सवाद, समाजवाद, साम्यवाद और रूस में बोल्शेविक क्रांति जैसे एकदम नए शब्दों ने मुझे बांध लिया. एक झटके में मुझे महसूस हुआ कि मेरे सारे सवालों के जवाब हासिल हो गए. आठ साल की नाजुक उम्र में, मैंने मार्क्सवाद, साम्यवाद और रूसी क्रांति के बारे में जानकारी खोजनी शुरू कर दी. जब भी मैं शहर में अपने मामा के घर जाता, मैं उन्हें सुत्रवे बुक सेलर के यहां खींच ले जाता, जो अपनी छोटी सी गुमटी में अपना किताबों और कैलेंडरों का सौदा फैलाए रहते. वे बुजुर्ग मेरी मांगें सुन कर हैरान होते. लेकिन उन्होंने मेरे मामा के जरिए मुझे किताबें भेजनी शुरू कर दीं. मैंने सोचा कि मैं कम्युनिस्ट बन चुका था जिसका मिशन भारत में एक ऐसी क्रांति लाना थी, जिसमें सभी बच्चों के पास चूना पुती दीवारों वाले पक्के मकान, उनके अपने खेत, अपनी बकरियां, गाएं और भैंसे और बेशक बहुत सारी मुर्गियां होंगी.

अगले साल मैंने भगत सिंह के बारे में पढ़ा, जिन्होंने फौरन मेरे नायक के रूप में स्तालिन की जगह ले ली. मैंने कल्पना से उनकी एक तस्वीर बनाई और उसका शीर्षक रखा ‘भारत रत्न शहीद भगत सिंह’, जो मेरे स्कूल छोड़ने के बरसों बाद भी स्कूल के दफ्तर में सजा रहा. यह तब की बात है, जब मैंने नहीं जाना था कि ‘भारत रत्न’ एक सरकारी सम्मान है. यह हमेशा एक प्रेरणा देने वाले शहीद के लिए मेरी तस्दीक थी, जिसका मेरे नायक के रूप में रुतबा आज कर जस का तस बना हुआ है.

जाति के साथ मेरी मुलाकात गांव में एक अनोखी घटना से हुई, जिसमें मेरी मां ने एक नायक जैसी भूमिका निभाई थी. एक शाम, जब वे पीने का पानी लाने के लिए हमारे कुएं पर गईं, तो औरतों के बीच हलचल थी जिन्होंने पानी पर गंदगी तैरती हुई देखी थी. ऐसा शक किया गया कि कुनबी परिवार के बच्चों ने यह हरकत की थी, जो उस खेत के मालिक थे, जिनमें हमारा कुआं था. शायद उन्होंने सोचा होगा कि दलित लोग कुएं का इस्तेमाल बंद कर देंगे, और तब यह कुआं उनका हो जाएगा और खेतों की सिंचाई करने के काम आएगा. मेरी मां अभी अभी खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करके लौटी थी. वो आगबबूला हो गईं और उन्होंने औरतों को कहा कि वे उनके साथ गांव में सवर्णों के कुएं तक चलें. आशंका के मुताबिक, कुछ कुनबी औरतों ने इसका विरोध किया और दलित औरतों के घड़े फेंक दिए. मेरी मां ने उनमें से एक को पीट कर उन्हें डरा कर भगा दिया और पानी लाने के लिए कुएं तक पहुंच गईं. खबर फैली कि महार औरतों ने कुएं को गंदा कर दिया है और कुछ आगे बढ़े हुए कुनबियों ने इसका विरोध करने के लिए लोगों को जमा किया.

अगली सुबह जब मेरी मां दलित औरतों को लेकर कुएं से पानी लाने गईं तो वहां मर्दों की भीड़ लगी हुई थी. उन्होंने रोकने की कोशिश की लेकिन दलित औरतों के चेहरों पर चुनौती के भाव देख कर वे पीछे हट गए. कुछ झड़प हुई, लेकिन दलित औरतों को जीत हासिल हुई. इसने गांव में एक साफ-साफ तनाव पैदा कर दिया. ऐसी अफवाहें थीं कि कुनबी लोग दलितों पर हमले करेंगे. उस शाम दलितों की एक बैठक बुलाई गई. हम बच्चे लड़ाई लड़ने का मौका मिलने से खासे उत्साहित थे. लेकिन मर्द लोग डरे हुए थे. उनमें से कुछ ने सिर पर आ खड़ी हुई इस मुसीबत के लिए औरतों को दोष देने की कोशिश की. लेकिन मेरी मां की चुनौती को देख कर और दूसरी औरतों द्वारा उनके साथ खड़े होने की वजह से वे पीछे हट गए. हालांकि मैं दूसरे बच्चों के साथ इस बहस को देख रहा था, लेकिन मैं अपनी ब्रिगेड का नेतृत्व करने का मौका मिलने की कल्पना में खो चुका था. बैठक के बाद, हमने पास के मैदान से पत्थर जमा करने, घरों से लोहे के सरिए और छुरियां निकालने और तैयार रहने का फैसला किया. हमने अपनी फॉर्मेशन तय की और जिम्मेवारियां आपस में बांट लीं यानी जंग की रणनीति तय हो गई.

लेकिन कोई भी हम पर हमला करने नहीं आया. अगली सुबह गांव के कोलियरी वाले हिस्से में खबर भेजी गई, जहां दलित कहीं ज्यादा संगठित और जुझारू थे. कुछ नौजवान महिलाएं एक समूह में आईं और पानी भरने जा रही हमारी गांव की औरतों की हिफाजत में खड़ी रहीं. कुनबी लोग पास फटकने से भी डर रहे थे. दोपहर बाद कोलियरी के अनेक लोगों के साथ एक बैठक हुई, जिसमें तय किया गया कि जिला आरपीआई के नेता को बुलाया जाए और इस मुद्दे पर एक बड़ी जनसभा की जाए. इस बीच, महारों को कोलियरी से मिली मदद से डरे हुए कुनबी इस मामले को दोस्ताना तरीके से सुलझाना चाहते थे. यह तय किया गया कि वे दलितों को तब तक कुएं से पानी लेने देंगे, जब तक हमारे कुएं की सफाई नहीं हो जाती, जो इसके फौरन बाद कर दी गई. लेकिन दलित गांव में साफ साफ तनाव बना रहा, क्योंकि उन्हें डर था कि कुनबी लोग हालात के सामान्य होने के बाद अपनी बेइज्जती का बदला ले सकते हैं. इस पूरे दौरान कोलियरी के नौजवान मर्दों और औरतों की एक टोली अक्सर हमारे गांव का दौरा करती रही, जिसकी वजह से कुनबियों को सुलह-सफाई का रुख अपनाना पड़ा था. जैसा कि तय किया गया था, एक बड़ी भारी जनसभा हुई जिसमें आरपीआई के जिला अध्यक्ष मि. सोंडावले आए थे. हिंदू धर्म की निंदा करते हुए और जातिवादी कुनबियों को धमकाते हुए ढेरों भाषण दिए गए. बात में ग्राम पंचायत द्वारा गांव के हमारे हिस्से में एक सार्वजनिक कुआं बनाने का फैसला किया गया, जिसका उपयोग सभी जातियों द्वारा होना था. यह वो घटना थी, जिसने जाति नाम के शैतान से मेरी भेंट करवाई.

लेकिन इस मुलाकात में जातियों का सताने वाला पहलू शामिल नहीं था. यह बात समझ में आई कि जिन लोगों को कुनबी कहा जाता है, उन लोगों से हम अलग थे और अलग रहते थे. इतना ही. कमतर होने का कोई खयाल नहीं था. जाति के साथ इस मुठभेड़ में अगर ऐसा कुछ था भी तो यह था कि जीतनेवाले हम थे. कुनबियों को झुकते हुए पूरे गांव के एक आम कुएं पर आने के लिए मान जाना पड़ा था. स्कूल में पढ़ाई-लिखाई में अच्छा प्रदर्शन करने की वजह से मेरा सम्मान था, हालांकि मेरे अजीबोगरीब व्यवहार से कुछ शिक्षकों द्वारा खास तौर से मुझे पसंद नहीं करते थे. उन दिनों एक बोर्ड के तहत आनेवाले स्कूलों के बीच एक होड़ होती था. चौथी और सातवीं कक्षाओं के लिए इम्तहान बोर्ड द्वारा किसी बड़े गांव में लिए जाते थे. अगर किसी गांव का छात्र बोर्ड में अव्वल आता तो यह उसके लिए बड़ी इज्जत की बात होती थी. चूंकि मैं अपने गांव के लिए यह सम्मान ला सकता था, इसलिए पूरा गांव मेरा आदर करता था. इससे भी आगे बढ़ कर कुछ कुनबी परिवार हमें मट्ठा, दही, घी और खेती की कुछ उपज दे जाते, क्योंकि हमारे परिवार के पास कोई जमीन या मवेशी नहीं थे. शायद इसमें गांव में जातियों की आपसी निर्भरता की झलक मिलती थी.

जाति के साथ मेरी मुलाकात में रत्ती भर भी कमतरी का खयाल जुड़ा हुआ नहीं था. अपने गांव के स्कूल से सातवीं पास करने के बाद जब मैं शहर में उच्च विद्यालय में गया, तो मैं मामा के घर में रहने लगा. यह घर स्कूलों के झुंड की ओर ले जाने वाली एक सड़क के किनारे था, जिस पर कुछ ब्राह्मण लड़के चलते थे. उन्हें रोक कर उनसे ‘आंबेडकर की जय’ बुलवाना हमारा खेल हुआ करता था. बेचारे लड़के मान जाते और तंग किए जाने से बच जाते. बाद में, वे सड़क के उस हिस्से से दौड़ कर भाग जाते और कुछ तो एक लंबा रास्ता पकड़ लेते और उस सड़क से ही आने से बचते. उच्च विद्यालय में हमें ब्राह्मण बच्चों के खिलाफ एक सीधी लडाई लड़नी पड़ी, जिन्हें आरएसएस की काली टोपियां पहनने की इजाजत थी, जो स्कूली पोशाक का उल्लंघन थी. जब मैं दसवीं में पहुंचा और तब तक पढ़ाई-लिखाई में अच्छे प्रदर्शन के चलते मेरा कहना मानने वाले बच्चों की एक बड़ी तादाद हो गई थी, एक दिन हमने दलित छात्रों को सुबह की प्रार्थनाओं में नीली टोपियां पहनाईं. इस पर पीटी टीचर द्वारा आपत्ति जताई गई, जो खुद भी एक दलित थे. लेकिन हमने उन्हें चुनौती दी. मुसलमान हेडमास्टर ने हमसे बातचीत की और वादा किया कि वे ब्राह्मण अभिभावकों से अपने बच्चों को सिर्फ स्कूली पोशाक पहना कर भेजने को कहेंगे. इसके बाद जल्दी ही, काली टोपियां गायब हो गईं. जाति के साथ ऐसे अनुभव थे, जो मेरे बचपन के इस ‘कम्युनिस्ट’ भरोसे से मेल खाते थे कि अगर हमने संघर्ष किया तो हम जीत सकते हैं.

इस पूरे दौरान, आंबेडकर एक मिथक थे, जिनके बारे में कोई जानकारी नहीं थी, सिवाय उन गीतों के जो कुछ उत्सवों के मौकों पर लाउडस्पीकरों पर जोर जोर से बजते थे. सिर्फ नागपुर पहुंचने बाद ही मैं यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय में उनकी किताबें पढ़ पाया. इस पढ़ाई के साथ साथ होस्टलों में साथी छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव की कहानियों ने मुझे जाति के बारे में, और आंबेडकर और मार्क्स के आपस में एक दूसरे की जगह लेने वाले नजरियों के बारे में सोचने पर मजबूर किया जिसके दौरान जाति को बार बार वर्ग के बरअक्स खड़ा करके देखता. तभी मुझे उन तरीकों में कुछ गलत होने का हल्का-हल्का अहसास होने लगा था जिनके तहत जाति और वर्ग के खिलाफ लड़ाइयों को एक दूसरे के समांतर रखा जाता है, जबकि व्यापक तौर पर उनके विषय एक दूसरे में शामिल थे. इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद इंजीनियरिंग कॉलेज में पहुंचने के बाद मैंने अपने होस्टल में, एक दूसरे से पूरी तरह अलग थलग रहने वाले दूसरे छात्रों के साथ दो स्टडी सर्किल शुरू किए, एक स्टडी सर्किल में मार्क्स पर विचार किया जाता और दूसरे में आंबेडकर पर. हम हफ्ते में एक बार मिलते, जब मैं इन लोगों की किसी रचना की व्याख्या करता और इसके बाद बहस होती. मैं वहां अपने नजरिए को परखना चाहता, लेकिन मैं निराश हो जाता क्योंकि उन्हें चुनौती देने वाला वहां कोई नहीं था. नक्सलवादी आंदोलन आम चर्चा में था और अखबारों से रोज ही कोई न कोई खबर या नजरिया सामने आता.

मैंने सोचा कि बेकार ही बौद्धिक की तरह लगने के बजाए, आत्मकथात्मक लगने का जोखिम उठाते हुए यह लंबी भूमिका एक गांव के एक बच्चे के रोज-ब-रोज के आम अनुभवों की दुनिया में वर्ग और जाति के आपसी मेल-जोल को देखने का शायद बेहतर तरीका होगी. मैं सार्वजनिक रूप से अपने बारे में बोलने से बचता हूं कि कहीं यह एक और दलित जीवनी न बन जाए जो हमेशा ही लेखक की अपनी शख्सियत को सामने लाने के लिए सामाजिक पहलू पर हावी हो जाती है. मेरी नजर में यह छोटा सा ब्योरा इसके बारे में समझाता है कि जाति और वर्ग के बारे में मेरे विचारों के बीज कैसे पड़े और कैसे हालात ने उन्हें एक खास तरीके से ढाला. यह आलोचनात्मक सोच की भूमिका को देखने में मदद कर सकती है.

मैं नहीं जानता कि रूबीना ने किस आधार पर इन निबंधों को चुना है. ये मुझे खासे बेतरतीब लगे. लेकिन उन्होंने जिस भी आधार पर इन्हें चुना हो, ये इस मायने में कारगर हैं कि एक परिचय के रूप में यह संकलन जाति और वर्ग के संबंध में अनेक मुद्दों पर मेरे नजरिए का एक जायजा पेश करता है. मैं उनके और विस्तार में जाने के उकसावे में पड़ने से खुद को रोकूंगा और पाठकों को खुद फैसला करने के लिए इसे उन्हीं पर छोड़ देना पसंद करूंगा. इस पहलकदमी के लिए मुझे रूबीना का और तारीफ के काबिल इस अनुवाद के लिए रेयाज का जरूर ही शुक्रिया अदा करना चाहिए.


किताब: जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन
लेखक: आनंद तेलतुंबड़े
प्रकाशक: आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा
मूल्य: 200.00 (पेपरबैक)

ब्राह्मणवादी अहंकार: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/11/2016 03:43:00 PM


आज जबकि दक्षिणपंथी शासक परिवार में आंबेडकर के लिए बेपनाह प्यार उमड़ रहा है और वह अथाह भक्ति दिखा रहा है, ऐसे में आंबेडकर के प्रति बेधड़क अपमानों की बौछार करते हुए किसी ऐसे इंसान को सुनना दिलचस्प है, जिसको हिंदू संस्कृति और परंपरा की महानता के सिद्धांत बघारने के लिए जाना जाता रहा है. एस.एन. बालगंगाधर की हालिया ब्राह्मणवादी करतूतों के बारे में बता रहे हैं आनंद तेलतुंबड़े. अनुवाद: रेयाज उल हक

इंडिया टुडे के वेब संस्करण डेलियो.इन पर 27 नवंबर को बेल्जियम के घेंट यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर एस.एन. बालगंगाधर का एक लेख प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था “व्हिच इनटॉलरेंस इज ग्रोइंग इन इंडिया?”. यह उस गुस्से के जवाब में लिखा गया था, जो हैदराबाद में इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेज यूनिवर्सिटी (एफ्लु) में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए डॉ. आंबेडकर के प्रति अपमानजनक बातें कहने पर उनके खिलाफ पैदा हुआ था. अपनी बातों पर माफी मांगने के बजाए उन्होंने आंबेडकर के प्रति अपनी अवमानना को जायज ठहराया और यह कहते हुए उसको दोहराया कि ‘उनकी समझदारी आलिया भट्ट से भी बदतर है.’ ऐसा घटिया अपमान और बदसलूकी आंबेडकर के लिए नई नहीं है, लेकिन इसके पहले कभी भी किसी सार्वजनकि बौद्धिक मंच पर किसी ने उनके लिए ऐसी गंदी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया था. आज जबकि दक्षिणपंथी शासक परिवार में आंबेडकर के लिए बेपनाह प्यार उमड़ रहा है और वह अथाह भक्ति दिखा रहा है, ऐसे में आंबेडकर के प्रति बेधड़क अपमानों की बौछार करते हुए किसी ऐसे इंसान को सुनना दिलचस्प है, जिसको हिंदू संस्कृति और परंपरा की महानता के सिद्धांत बघारने के लिए जाना जाता रहा है.

बालगंगाधर शायद कभी भी संघ परिवार से अपने जुड़ाव को स्वीकार नहीं करें जैसा कि उनके जैसे अनेक लोग करते हैं, लेकिन वे बार बार अपने ब्राह्मण होने की बात को कबूल करते हैं और एक बेकार के घमंड के साथ इसे दोहराते हैं. इसके पहले अरुण शौरी ने – और यह बात कहनी पड़ेगी कि बेवकूफी में वे गंगाधर से कमतर ही हैं – अपनी किताब वर्शिपिंग फाल्स गॉड में अपने घटिया तथ्यों को नई खोज के आभामंडल के साथ पेश किया था, कि आंबेडकर भारत के संविधान के निर्माता नहीं. उन्हें और दलितों के बीच उनके अनेक आलोचकों को यह बात समझ में नहीं आई कि इस नुक्ते पर इतनी मेहनत करके वे हवा में तलवार भांज रहे थे, क्योंकि खुद आंबेडकर ने ही इस संविधान को नकार दिया था और खुद को एक किराए के लेखक (हैक) के रूप में इस्तेमाल करने की ब्राह्मणवादी साजिश को उजागर किया था. शौरी ने यह भी कहा कि उनका संघ परिवार से कोई रिश्ता नहीं था लेकिन यह तथ्य अपनी जगह कायम रहा कि उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के नेतृत्व में भाजपा की पहली कैबिनेट में सबसे ज्यादा सक्रिय मंत्रालयों में से एक का मुखिया चुना गया था. बालगंगाधर भी संघ परिवार से अपना कोई जुड़ाव नहीं होने का दावा करेंगे, लेकिन वे जिस जुबान में बोल रहे हैं और जो दलीलें वे पेश कर रहे हैं, वे अनजाने में ही इस सच्चाई को उजागर कर रही हैं कि वे भी उसी गिरोह से ताल्लुक रखते हैं, जो अपने हिंदुत्व को धर्मनिरपेक्ष मुल्लम्मे में छिपा कर रखता है. भाजपाई कुनबा आंबेडकर का गुणगान करने के उल्लास में जो ज्यादतियां कर रहा है, उस दौर में यह घटना ब्राह्मणवादी खेमे में आंबेडकर के प्रति गहराई तक जड़ें जमा कर बैठी नफरत पर से परदा उठाती है.

बालगंगाधर की करतूतें

बालगंगाधर जिस तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोल रहे थे, वह ‘देरिदा के धर्म अध्ययन में कानून की ताकत और ताकत के कानून’ पर था और इस तरह आंबेडकर या आंबेडकरी लोग इस सम्मेलन का विषय नहीं थे, सिवाय इसके कि शायद उन्हें देरिदा के नकारात्मक धर्मविज्ञान की मिसाल बताया जाता. दूसरे वक्ताओं ने उनका कोई जिक्र नहीं किया. लेकिन बालगंगाधर पर तो उन्माद सवार हो गया, उन्होंने आंबेडकर को बेवकूफ कहा और इस पर हैरानी जताई कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने कैसे उन्हें डॉक्टरेट की डिग्री दे दी. संयोग से उन्हें उतने ही प्रतिष्ठित एक दूसरे संस्थान लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के बारे में याद दिलाने की जरूरत है, जिसने आंबेडकर को डॉक्टर ऑफ साइंस की डिग्री दी थी, जो इत्तेफाक से किसी भारतीय को दी गई पहली डिग्री थी. उन्होंने एक और इंसान को बेवकूफ कहा (उन्होंने नाम नहीं लिया, लेकिन लोगों ने अंदाजा लगा लिया कि ये नरेंद्र जाधव के बारे में था, जिन्होंने आंबेडकर की प्रमुख रचनाओं को तीन खंडों में संपादित किया है). खैर, ऐसा हो सकता है कि आंबेडकर की किताबों को संपादन के नाम पर बहुतायत में गैरपेशेवर रूप से फिर से पेश करना एक दोषमुक्त बौद्धिक काम न हो. फिर उन्होंने इस्लाम और ईसाइयत पर अपमानजनक टिप्पणियां कीं. उनके भाषण में गाली-गलौज वाली टिप्पणियों की भरमार थी, वह उस विद्वत्ता से खाली था, जो सम्मेलन के विषय और रुतबे के लिए जरूरी थी. मिसाल के लिए वे हर उस चीज के लिए ‘बुलशिट’ (बकवास) शब्द का इस्तेमाल करते रहे, जिसे आम तौर पर लोगों द्वारा पवित्र माना जाता है, शायद ऐसा वे देरिदा के नकारवाद (अपोफेटिशिज्म) को समझाने के लिए ऐसा कर रहे हों. उन्होंने मेजबान एफ्लू तक को नहीं बख्शा और उसे पागलखाना कह दिया, जाहिर है कि उनके हमले का निशाना यह था कि एफ्लू के फैकल्टी और छात्रों में गैर-ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व तुलनात्मक रूप से बेहतर है. अगले दिन, जब कुछ वरिष्ठ प्रोफेसरों ने जाति और छुआछूत के उनके हवालों पर टोका, तो उन्होंने सीधे सीधे उन पर तीखा हमला बोल दिया और टिप्पणी की कि छात्रों को ऐसे में अपने भविष्य की चिंता करनी चाहिए, जब ‘जाति प्रमाणपत्र वाले’ नाकाबिल, बेवकूफ ‘गधे’ उन्हें पढ़ा रहे हों. जाहिर है कि उनका इशारा दलित, आदिवासी और ओबीसी की तरफ था. इसी तरह, उन्होंने मुस्लिम फैकल्टी द्वारा किए गए एक सवाल का जवाब देते वक्त यह कहते हुए अपनी नफरत उगली कि वे (मुस्लिम फैकल्टी) आतंक फैला रहे थे.

सुनने वाले छात्र और फैकल्टी दोनों ही उनके इस खुलेआम जातिवादी और सांप्रदायिक बयानों से बेचैन थे. बालगंगाधर बेशर्मी से यह दोहराते रहे कि वे एक ब्राह्मण हैं. खास तौर से हैदराबाद जैसी जगह में ऐसी बात कहना बड़ा दुस्साहस भरा था, जो अपने ऐसे कैंपसों के लिए जाना जाता है जहां दलित प्रतिरोधों का एक इतिहास रहा है. उनका पूरा व्याख्यान आरक्षित श्रेणी के छात्रों और फैकल्टी के खिलाफ न सिर्फ हतोत्साहित कर देने वाली टिप्पणियों से भरा हुआ था, बल्कि वह आईपीसी की 295 (ए), 154 (ए) और 298 धाराओं और उत्पीड़न (निवारण) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत सजा के काबिल भी है. हालांकि एफ्लु प्रशासन की तरफ से कोई सवाल नहीं किया गया, जिसने उनके अपराधों पर उन्हें रोका नहीं और न ही उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की. दूसरों की प्रतिक्रियाएं भी खासी देरी से, आयोजन के एक हफ्ते से भी ज्यादा देरी से आईं, जिसमें 11 नवंबर को एफ्लु के फैकल्टी सदस्यों द्वारा उप कुलपति के नाम एक याचिका दी गई. हालांकि डेक्कन हेराल्ड ने 6 नवंबर को ही एक छोटी सी खबर छापी थी कि उस्मानिया के छात्र बालगंगाधर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करने पर विचार कर रहे थे. गुस्सा बढ़ रहा था और इसी के जवाब में बालगंगाधर ने वह लेख लिखा, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है, जिसमें उन्होंने अपने उद्दंडता भरे बयानों के लिए आंबेडकरियों द्वारा नाराजगी जताए जाने पर शिकायत की थी. इसको असहिष्णुता कहते हुए उन्हें यह बात समझ में नहीं आई कि अगर दलित असहिष्णु रहे होते तो उन्होंने उन पर मौके पर ही हमला कर दिया होता.

असहिष्णुता नहीं, आतंकवाद

सबसे पहले तो डॉ. नरेंद्र दाभोलकर, कॉमरेड गोविंद पानसरे और डॉ. कलबुर्गी की हत्याओं को या फिर आम नागरिकों के खिलाफ हिंसा और जानलेवा हमलों को (जैसे कि उत्तर प्रदेश के दादरी और जम्मू-कश्मीर के उधमपुर वगैरह जगहों पर हुए हैं) असहिष्णुता कहना गलत है और उनकी गंभीरता को घटा कर देखना है. इसके लिए सही शब्द आतंकवाद है. क्योंकि संगठित गिरोहों द्वारा की गई इस सामाजिक हिंसा में, जिसमें राज्य की मिलीभगत है, कुछेक व्यक्तियों या समूहों के व्यवहार की विशेषता नहीं है, जिसमें वे अपने से भिन्न विचारों के खिलाफ असहिष्णुता दिखा रहे हैं, बल्कि यह उनका विरोध करने का साहस दिखाने वालों के खिलाफ एक आतंकी कार्रवाई है. बालगंगाधर ने अपनी अति-समझदारी की झलक देते हुए दादरी में पीट पीट कर की गई हत्याओं को जायज ठहराया, जिसमें इन मनगढ़ंत तथ्यों का उपयोग किया गया था एक दूसरे आदमी की गोशाला से एक गाय चुराने के लिए मोहम्मद अखलाक को पीट पीट कर मार डाला गया और उनके बेटे दानिश को क्रूरता से पीटा गया था. वे इसी के लायक थे, क्योंकि प्राचीन यूरोप और अमेरिका में मवेशी चुराने के लिए लोगों को पीट पीट कर मार दिया जाता था. बालगंगाधर ने ऐसी ही बेवकूफी भरी टिप्पणी कलबुर्गी के बारे में की, कि वे खुद ही एक असहिष्णु आदमी थे. बालगंगाधर ने उनकी ‘नैतिक और बौद्धिक ईमानदारी’ पर सवाल उठाए, उनके मुताबिक जिनके आचरण से ‘मिथकीय छोटा राजन भी शर्मिंदा’ हो जाएगा. उन्होंने यह तोहमत भी लगाई कि कलबुर्गी की हत्या के पीछे उनके ये कथित दुराचार भी हो सकते हैं. हम पाते हैं कि यहां उनकी समझदारी की बानगियों में दिख रही उनकी उपमाओं की गुणवत्ता और कुल मिला कर उनकी दलीलें पुख्ता तरीके से उन्हें एक बेवकूफ के रूप में स्थापित कर रही हैं. अगर नहीं तो फिर जिन सैकड़ों बुद्धिजीवियों, कलाकारों, साहित्यकारों ने प्रतीकात्मक विरोध करते हुए इन करतूतों में मिलीभगत के खिलाफ सरकार को अवार्ड लौटाए, वे बेवकूफ थे, वे ऐसे अनाड़ी थे जो ‘इंसानी इतिहास की भारी अज्ञानता’ को जाहिर कर रहे थे. कहा जाए तो 135 से अधिक वैज्ञानिक भी बेवकूफ हैं, जिन्होंने भारी तबाही की तस्वीर खींची है और कहा है कि देश में शांति और मेल-जोल को ‘हाल में बढ़ गई संकीर्णतावादी और धर्मांध कार्रवाइयों के एक सिलसिले ने खतरे में डाल दिया है’! ज्ञान की गठरी तो सिर्फ बालगंगाधर के ब्राह्मण के पास ही है!

‘क्या भारत में कोई जाति व्यवस्था है?’ जैसे बेवकूफी भरे सवाल उठाने और ‘वर्ल्ड्स विदाउट व्यूज एंड व्यूज विदाउट वर्ल्ड्स’ (यह उनकी पीएच.डी. थीसिस का शीर्षक है) की लफ्फाजी करने से आगे उनमें ऐसी कौन सी समझदारी पाई जाती है, जिसमें परंपरागत रूप से ब्राह्मण माहिर बताए जाते हैं. जाति के सवाल पर, उनका जवाब नकारात्मक था और उन्होंने ब्रिटिश मिशनरियों पर इल्जाम लगाया कि वे अपने साथ भ्रष्ट पुरोहितों और कैथोलिक धर्म की दूसरी बुराइयों में सराबोर ईसाई धर्मशास्त्र और खास कर प्रोटेस्टेंट धर्मशास्त्र ले आए, जिसने भारत के समाज की व्याख्या एक जातीय समाज के रूप में की. यानी पूरी श्रमण परंपरा ने जिस जाति के खिलाफ विद्रोह किया और हिंदू धर्मशास्त्रों की बहुसंख्या ने जिसको जोरदार तरीके से बचाव किया, वह ईसाई पुरोहितों की मनगढ़ंत और कपोल कल्पना थी, जिसको पता नहीं क्यों हम सबने सच मान लिया! उन्होंने ऐसी बकवास शिमोगा के कुवेंपु यूनिवर्सिटी स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ लोकल कल्चर्स के जरिए फैलाई, जहां के वे निदेशक थे. उनके ‘शोध’ के छुपे हुए ब्राह्मणवादी मंसूबे को अनेक लोगों ने उजागर किया है. उनके द्वारा और उन पर लिखे गए अनेक लेखों पर महज एक सरसरी निगाह भी इस बात को उजागर कर देगी कि उनका ताल्लुक ‘सनातन धर्म अमर रहे गिरोह’ से है. वे इस बात के लिए पर्याप्त शातिर हैं कि अपनी बातों का मकड़जाल बुनकर पश्चिम को बेवकूफ बना सकें जो बैठ कर उनकी बातें सुने और उनको एक प्रकांड विद्वान समझकर उन पर गौर करे. लेकिन गलती मत कीजिए; वे परिवार के नकली विद्वानों में से हैं, जो अपनी पतनशील परियोजना को बौद्धिकता का जामा पहना रहे हैं.

आंबेडकर की बात

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि ऐसे एक आदमी के लिए आंबेडकर तो एक अभिशाप ही होंगे, जिन्होंने ब्राह्मणवाद को चुनौती दी थी. आंबेडकर बेकार की लफ्फाजियों को विद्वत्ता के रूप में पेश करने के फेर में कभी नहीं पड़े. उन्होंने इस दुनिया के बालगंगाधरों की बैठे-ठाले की पुरोहिती के उलट, आजादी, बराबरी और भाईचारे पर आधारित एक समाज की स्थापना के मकसद की दिशा में सिद्धांत और व्यवहार को एक साथ मिलाते हुए मानवता के बुनियादी मुद्दों पर गौर किया. एक इंसान के रूप में आंबेडकर गलत हो सकते हैं, वे बहुत गलत भी हो सकते हैं. लेकिन उन्हें बेवकूफ कहना खुद सिर्फ और सिर्फ अपनी बेवकूफी को ही जाहिर करना है. आंबेडकर पर टिप्पणी करने के लिए किसी के पास ऊंची बौद्धिक ईमानदारी और सच्चाई होना जरूरी है, जो जाहिर है कि बालगंगाधर में नहीं है. वे ‘जाति प्रमाणपत्र वाले गधे’ कह कर अपनी नफरत दिखा सकते हैं, लेकिन उनमें यह समझने की साधारण बुद्धि भी नहीं है कि प्रतिभा (मेरिट) की यह घिसी-पिटी दलील अपने पैरवीकारों पर ही पलट कर भारी पड़ती रही है. जबकि आरक्षण का समर्थन नहीं है, जिसको हमेशा मैंने ठोस अर्थ में दलितों के लिए नुकसानदेह माना है, लेकिन गुलामी का इतिहास प्रतिभा की इस दलील के पुर्जे पुर्जे बिखेर देता है, जो प्राकृतिक संपदा से भरपूर इस उपमहाद्वीप में कथित (ऊंची जाति के) प्रतिभावान लोगों की देन था. उन्हें अपने इस अतीत पर शर्मिंदा होना चाहिए, न कि अपनी हिंदुत्व परियोजना के जरिए उसको फिर से रचने की कोशिश करनी चाहिए.

यह सिर्फ एक बदजुबान बालगंगाधर से निबटने का मामला नहीं है, जिससे एक आम दलित भी आसानी से निबट सकता है. यह इस बात को जानने का मामला है कि पूरा हिंदुत्व गिरोह सचमुच में किस बात का प्रतिनिधित्व करता है. एक तरफ तो यह उन सभी जगहों पर स्मारक बना-बना कर आंबेडकर की पूजा शुरू करना चाहता है, जहां जहां उन्होंने पांव रखे थे, लेकिन वहीं दूसरी तरफ यह उनकी बौद्धिकता को नकार कर, उन्हें बौद्धिक रूप से मामूली इंसान बना देना चाहता है. असल में यह हिंदुत्व का यह बुनियादी चरित्र है जिसे बालगंगाधर ने अनजाने में ही उजागर कर दिया है, जिसकी आम तौर पर जनता के लिए और खास तौर से दलितों के लिए अहमियत है. हजार सिरों वाला यह गिरोह ऐसे अनेक बालगंगाधरों को बेलगाम छोड़ देगा ताकि वे अपने भड़काऊ बयानों से हमारे सब्र का इम्तहान लें और फिर इसके नतीजों से खुद को दूर कर लेगा. यह भारत में अवर्णों को मिथ्या और औपनिवेशिक साजिश बता कर पूरी आंबेडकरी परियोजना को ही नाकाम कर देना चाहता है. यह विद्वत्ता नहीं है, यह गोएबल्स की वह बदनाम तरकीब है कि बड़े बड़े झूठों को बार बार दोहराते रहो जब तक वे सच न लगने लगें और आखिर में जनता द्वारा सच्चाई के रूप में कबूल कर लिए जाएं.

(जरूरी सामग्री मुहैया कराने के लिए मैं एफ्लु के शोधार्थी कार्थिक नवयान का शुक्रिया कहना चाहूंगा.)

इतिहास और वर्तमान का संबंध-3: रोमिला थापर

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/02/2016 08:00:00 AM


प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है। पहले दो हिस्से यहां पढ़ें: भाग-1, भाग-2अनुवाद: शुभनीत कौशिक।  

आज यह भी कहा जा रहा है कि कुछ ऐतिहासिक शोध या पुस्तकें, एक समुदाय की भावनाओं को आहत कर सकते हैं, इसलिए इतिहास की ऐसी पुस्तकों को प्रतिबंधित कर देना चाहिए। यह एक खतरनाक रुझान है।

यह सचमुच खतरनाक रुझान है क्योंकि इस तरह तो हर किसी की भावनाएं अलग-अलग कारणों से आहत हो सकती हैं। और कुछ लोगों के लिए यह दावा करना कि वे पूरे समुदाय के प्रतिनिधि हैं, बिलकुल आसान काम है। समुदाय के बाकी लोगों को तो पता ही नहीं होता कि आखिर यह सब चल क्या रहा है।

अगर हम सच्चे तौर पर सहिष्णु हैं, तो हम आलोचना, मतभेद और असहमति को स्वीकार करेंगे, जिसके उदाहरण अतीत में भी मिलते हैं। अगर हम ब्राह्मण टेक्स्ट को देखें तो हम पाएंगे कि वे ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण का विरोध करने वालों के प्रति घृणायुक्त वक्तव्यों से भरे हैं, और उन्हें कभी नास्तिक, कभी पाषंडी तो कभी महामोह तक कहते हैं। पर यदि इन टिप्पणियों या घृणा से भरे वक्तव्यों से जैनियों और बौद्धों की भावनाएं आहत भी हुईं हों, तो भी उन लोगों ने कभी यह मांग नहीं कि विष्णु पुराण जैसे ग्रन्थों को जला देना चाहिए।

पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष से समृद्ध होती रही, भारत की तर्कवादी परंपरा को भी आज दरकिनार किया जा रहा है। तर्क की भारतीय परंपरा ऐसी कतई नहीं थी, जैसा आज इसे बनाया जा रहा है।

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो, जो लोग खुद को भारतीय परंपरा और भारतीय मूल्यों का मुखर प्रवक्ता बताते हैं, अक्सर ये लोग स्वयं ही भारतीय टेक्स्ट से अनभिज्ञ होते हैं। इन लोगों ने उन ग्रंथों को पढ़ा ही नहीं होता है, जिन्हें ये अपनी परंपरा का सूचक मानते हैं, न तो उनके अनुवादों को न ही मूल रूप में। वे इस बात से भी बेखबर होते हैं कि परंपरा में इन्हीं टेक्स्ट और विचारों को लेकर वाद-विवाद हुए हैं। प्राचीन टेक्स्ट पर आम पाठकों के लिए, एक सुविचारित पर अपारंपरिक टिप्पणी देना अब मुश्किल होता जा रहा है।

पर यह प्रवृत्ति हानिकारक है क्योंकि यह चिंतन की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर बुरा असर डालेगी। लोग सुरक्षित समझी जाने वाली हदों के भीतर रहकर ही सोचने लगेंगे। वे विवादित और ‘असुरक्षित’ समझे जाने वाले मुद्दों से बचना चाहेंगे।

स्वतंत्र चिंतन के बगैर आलोचनात्मक मूल्यांकन संभव ही नहीं हो सकता। इधर भारत में शिक्षा के विषय में, मैंने यह कहा है कि मैं भारतीय शिक्षा को “एलसीडी शिक्षा” मानती हूँ, मेरा तात्पर्य है कि हमने शिक्षा के मूल्यों को इस हद तक गिरा दिया है कि आज जो शिक्षा दी जा रही उसे ‘लघुत्तम’ (लोएस्ट कॉमन डिनोमिनेटर) शिक्षा ही कहा जा सकता है। इसका उद्देश्य यही है कि लोगों में सवाल पूछने की प्रवृत्ति को ही खत्म कर दिया जाए, या उनमें किताबों का ऐसा खौफ़ पैदा कर दिया जाए कि वे किताबों की विषयवस्तु पर चर्चा ही न करें, न ही उनमें विचारों का कोई आदान-प्रदान हो। नतीजतन, मीडिया ही लोगों के दिमाग में पैठ बना लेगा क्योंकि अधिकांश लोग मीडिया के जरिये ही सूचनाएँ हासिल कर रहे हैं। आज स्वतंत्र अध्ययन और स्वाध्याय का भी अभाव होता जा रहा है।

प्राचीन भारत में आलोचनाओं और स्वस्थ वाद-विवाद का जिक्र हम अक्सर पाते हैं। नाटकों आदि के जरिये प्राचीन साहित्यकार कई सामाजिक व्यवहारों और परम्पराओं की खिल्ली उड़ाते थे। कई बार उनके निशाने पर समाज का आभिजात्य वर्ग भी होता था। अगर यह भारतीय परंपरा है, तो वर्तमान में जो कुछ हम देख रहे हैं, वह निश्चय ही भारतीय परंपरा नहीं है।

आलोचना और स्वस्थ परिचर्चा या व्यंग्य अब भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं रह गए हैं। लोकवृत्त में इनकी जगह अब अपशब्दों और कटूक्तियों ने ले ली है। ऐसा होने की संभावना तब और अधिक होती है जब चर्चा का विषय धर्म, संस्कृति और इतिहास होते हैं। सामान्यतया, एक सभ्य समाज के नागरिकों को सार्वजनिक रूप से अपशब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए। एक सभ्य समाज में विवेकपूर्ण आलोचना और सवालों का हमेशा ही स्वागत किया जाना चाहिए।

आज हम अपनी संस्कृति को समरूपी और एकांगी बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं, भले ही इसका मतलब भारतीय संस्कृति को औपनिवेशिक चश्मे से देखना ही क्यों न हो! वे लोग जो विविधता की वकालत कर रहे हैं, उन्हें चुप करा दिया जा रहा है।

एक अन्य निराशाजनक प्रवृत्ति जो हाल में देखने को मिली है वह है हिंदू, मुस्लिम, सिख, और ईसाई समुदायों की एक एकल समरूपी छवि गढ़ने और उसे ही प्रचारित करने की कोशिश।

यह रोचक बात है कि अगर कोई भारत में धर्मों के इतिहास पर एक कोर्स पढ़ना चाहे और यह जानना चाहे कि कैसे धर्मों ने समाजों को प्रभावित किया तो इस कोर्स का सबसे चुनौतीपूर्ण पक्ष होगा, उन पंथों के बारे में पढ़ना, जो इन धर्मों से उत्पन्न हुए, और साथ ही, इन पंथों के परस्पर जटिल संबंधों का अध्ययन, जिसमें अक्सर इन पंथों के विश्वासों और व्यवहार की पूरी फेहरिस्त शामिल होती है।
धर्मों और उनसे निकले पंथों/संप्रदायों का अध्ययन करते हुए हमें उनके बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा और आदान-प्रदान को भी समझना होगा। और यह सब कुछ हमारे लिए अधिक स्पष्ट तभी होगा जब हम सिद्धांतों की बजाय जमीनी हकीकत को समझने का प्रयास करेंगे।          

अपनी पुस्तक अर्ली इंडिया में महाभारत युद्ध पर टिप्पणी करते हुए एक जगह आप ने लिखा है कि यदि अर्जुन के सारथी कृष्ण की जगह बुद्ध होते तो, अर्जुन को दिया जाने वाला उपदेश कुछ और ही होता। इस संबंध में बताएं।

मेरे कहने का तात्पर्य है कि भागवद गीता एक उत्तर-मौर्य कालीन टेक्स्ट है, और मेरे इस कथन से अधिकांश इतिहासकार सहमत होंगे। इस समय तक बौद्ध और जैन श्रमण परंपरा स्थापित हो चुकी थी, और यह पहले की ब्राह्मणवादी परम्पराओं और नए उभरते भागवत और शैव संप्रदायों के साथ सह-अस्तित्व में थी। धर्म की अवधारणा को पारिभाषित करने वाली दो प्रमुख धाराएँ थीं: ब्राह्मणवादी और श्रमण परंपरा। यह द्वैधता ईसा की पहली सहस्राब्दी में भी कायम रही। वैयाकरण पातंजलि ने इनके बीच के संबंधों की तुलना साँप और नेवले से की थी, यानि इन दोनों के संबंध संघर्षमय थे। कुछ विद्वानों का मत है कि भागवद गीता की शिक्षाएं अशोक की नीतियों और बुद्ध की शिक्षाओं के प्रतिक्रियास्वरूप लिखी गईं थीं।

तो आपका सवाल था कि यदि अर्जुन के सारथी कृष्ण की जगह बुद्ध होते तो, अर्जुन को दिया जाने वाले उपदेश का स्वरूप कैसा होता, यानि बुद्ध ने क्या कहा होता! उन्होंने अर्जुन से कहा होता: “क्या यह युद्ध सचमुच अनिवार्य है? तुम किसलिए युद्ध कर रहे हो? तुम राज्य के लिए युद्ध कर रहे हो, और इसके लिए तुम अपनी ही भाई-बंधुओं की हत्या करोगे”! शायद बुद्ध ने अर्जुन से पूछा होता कि क्या राज्य ही शासन करने का सर्वोत्तम रूप है। आखिरकार, उस समय तक कई गणसंघ अस्तित्व में थे, और बुद्ध ने भी उनकी कार्य-पद्धति की प्रशंसा की थी और बौद्ध धर्म के संघ के गठन में उनकी प्रणाली का अनुसरण भी बुद्ध ने किया था।

पाँचवीं सदी ईसापूर्व के दौरान भी बुद्ध उन गणसंघों के पक्ष में थे, जो अजातशत्रु से लोहा ले रहे थे।

शायद, बुद्ध यह भी पूछते कि क्या अहिंसा का सार्वभौम रूप से पालन नहीं किया जाना चाहिए। महाभारत के संदर्भ में कृष्ण ने यह संदेश दिया कि बुराई से युद्ध करना क्षत्रियों का कर्तव्य है। महाभारत के युद्ध में शामिल क्षत्रियों के दोनों समूह अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन कर रहे थे। ऐसी स्थिति में भी बुद्ध हिंसा को टालने के लिए बात-चीत पर ज़ोर देते। बात-चीत की इस प्रक्रिया के चलते शायद युद्ध ही टल जाता।
दूसरी बात यह कि गीता में कृष्ण यह कहते हैं कि जो उनमें आस्था रखते हैं, वे उनकी शरण में आएं, वे उनके दुखों का समाधान करेंगे। इसे भक्ति परंपरा और भागवत परंपरा से भी जोड़कर देखा जा सकता है। पर बुद्ध ईश्वर के अस्तित्व के प्रति द्वैधवृत्ति जताते। वे दुखों और उनके कारणों को समझने पर ज़ोर देते, और इस समझ के जरिये ही दुखों का समाधान पाया जा सकता था।

देखें तो, बुद्ध का नज़रिया बिलकुल एक चिकित्सक का नज़रिया था।

हाँ! बुद्ध का ज्यादा ज़ोर आत्म-निर्भरता और उनके द्वारा प्रतिपादित एथिकल कोड के अनुपालन पर था। बुद्ध और कृष्ण के दृष्टिकोण में जो अंतर है वह असल में, विवेकपूर्ण समझ और विशुद्ध आस्था के बीच का अंतर है।

युद्ध से पूर्व अर्जुन के मन में उपजे अंतर्द्वंद्व ने कृष्ण को भागवत गीता का उपदेश देने के लिए विवश किया। यही अशांति हमें युधिष्ठिर के मन में भी दिखाई देती है, जब वे भीष्म पितामह के पास यह अनुरोध लेकर जाते हैं कि वे युद्ध को बंद कराएं।

युद्ध के अंत में युधिष्ठिर ही ब्राह्मणों से कहते हैं कि वे राजा नहीं बनना चाहते। वे राजत्व त्यागकर वन में जाने की इच्छा जाहिर करते हैं। राजत्व की अवधारणा में रक्तरंजित अभियान भी निहित है। ब्राह्मण इस बात पर ज़ोर देते हैं कि राजत्व जरूरी है। मुझे यह रोचक लगता है कि महाभारत में युद्ध के आरंभ और अंत में दो ऐसे वृत्तांत आते हैं, जहां युद्ध की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगता है। हमें इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए। क्या गीता शांति और अहिंसा का संदेश देती है, या यह कुछ विशेष परिस्थितियों में हिंसा की अनदेखी करती है।         

मुझे एक सवाल परेशान करता है कि आखिर क्यों महात्मा गांधी ने, जो शांति और अहिंसा के पुजारी थे, गीता को अपने विचारों में इतनी प्रमुखता दी, वह गीता जो युद्ध और हिंसा को तरजीह देती है। 


गांधी के विचारों के बारे में मैं अधिक नहीं जानती और न ही मैंने इतना गांधी साहित्य पढ़ा है कि मैं इस पर अपनी राय दे सकूँ। मुझे लगता है कि हिंसा/अहिंसा, असल में, पूरी कहानी का एक पक्ष भर है। इसमें ऐसी अहिंसा की बात शामिल है, जिसका बचाव आप नैतिक आधार पर कर सकें; जब तक कि उसमें अन्य मुद्दे शामिल न हों। अशोक ने कहा है कि उसे आशा है कि उसके पुत्र और पौत्र अहिंसक रहेंगे, पर यदि उन्हें हिंसक होना ही पड़े तो वे अपने द्वारा दिये जाने वाले दंडों में वे दयाभाव रखेंगे। यह एक तरीके की ‘नियंत्रित अहिंसा’ (कंट्रोल्ड नॉन-वायलेंस) थी। यदि अहिंसा सत्ता और एथिक्स के सवाल से भी जुड़ी हुई है तो हमें इसे अधिक सतर्कता के साथ समझना होगा। भारतीय राष्ट्रवाद ब्रिटिश उपनिवेशवाद की बुराई से लड़ रहा था। गांधी ने हिंसा का समर्थन नहीं किया, पर क्या इसका इशारा भी मिलता है कि अगर परिस्थिति की मांग हो तो एक सीमा तक हिंसा को अनदेखा किया जा सकता है? मुझे अक्सर इस बात पर आश्चर्य होता है कि गांधी ने अशोक और उसके शिलालेखों में इतनी कम रुचि क्यों दिखाई। जबकि उनके उलट, नेहरू ने इन शिलालेखों के संदेशों की सराहना की थी।

गांधी के लिए गीता का एक और पक्ष था: वर्णाश्रम धर्म पर इसका ज़ोर। जब दुनिया इतनी अनिश्चितता से भरी हो और जब लोग नियमों की अवहेलना कर रहें हों तो क्या वर्णाश्रम धर्म जैसा एक निर्देश देना जरूरी रह जाता है?

यह भी सच है कि अपने जीवन के अंतिम चरण में ही गांधी ने पूर्ण रूप से वर्णाश्रम के विचार को त्यागा था।

मुझे यह भी लगता है कि ‘हरिजन’ शब्द का उनका चुनाव यथास्थिति को बनाए रखने और उसमें ही हल ढूँढने की ओर इशारा करता है। गांधी ने इन समुदायों के प्रति अतीत में हुए दमन और शोषण का स्पष्ट शब्दों में विरोध किया, पर सवाल था कि वर्तमान में इस शोषण का प्रतिरोध कैसे किया जाए।

हमें बताएं कि महाभारत की अपेक्षा रामायण के इतने लोकप्रिय होने के लिए कौन से कारक उत्तरदाई थे।

रामायण की लोकप्रियता के साक्ष्य हाल के समय के हैं। जब मैं ‘हाल का समय’ कह रही हूँ तो असल में मैं, समय को प्राचीन इतिहास से जुड़े कालक्रम के तौर पर देख रही हूँ। मैं उस समय की ओर इशारा कर रही हूँ, जब रामानंदी संप्रदाय ने रामायण और राम-भक्ति का विधिवत प्रचार शुरू किया और इसी समय के आस-पास ही, तमिल में कंब रामायण, बांग्ला में कृत्तिबास रामायण और अवधी में तुलसीदास कृत रामचरितमानस की रचना हुई। ये सभी मध्यकाल में लिखे गए, यानि ईसा की दूसरी सहस्राब्दी में। 


रामायण एक ऐसे समाज में आते हुए नए बदलावों को भी परिलक्षित करता है, जिसमें परिवार, संपत्ति, प्रशासन, राजत्व प्रमुख स्थान लेते जा रहे थे। रामायण तक आते-आते सवालों के जवाब बिलकुल सीधे और सपाट हो जाते हैं। इसकी कहानी भी सरल है और नैतिकता बिलकुल सुस्पष्ट। राम का व्यक्तित्व भी, अर्जुन और युधिष्ठिर से कहीं कम जटिल है। राम को राजत्व की अवधारणा के बारे में कोई संदेह या भ्रम नहीं है।

आपने तर्क और आस्था के विरोधाभास की ओर भी इशारा किया है। एक इतिहासकार का अपना धार्मिक मत बिलकुल हो सकता है, पर इतिहास के अध्ययन में उसके धार्मिक मत के लिए कोई जगह नहीं होगी।

मेरा तात्पर्य है कि इतिहासकार को अपने धार्मिक विश्वास छोड़ने की जरूरत नहीं है, पर इतिहासकार द्वारा की जाने वाली स्रोतों की व्याख्या को इन विश्वासों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। एक इतिहासकार में धार्मिक अस्मिता की उपस्थिति या उसका अभाव थोड़ी मात्रा में उसकी व्याख्याओं पर प्रभाव छोड़ सकता है, पर एक इतिहासकार को हमेशा इसके प्रति सजग होना चाहिए। हर इतिहासकार में कुछ अंश तक पूर्वाग्रह होते हैं, पर अच्छा इतिहासकार वही है जो इनके प्रति सचेत हो, और जो पक्षपातरहित होने की हरसंभव कोशिश करता है। लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि तर्क करने का एक ही तरीका नहीं होता। इसलिए हमें व्यापक संपूर्णता को भी ध्यान में रखना होगा।

तो आप मानती हैं कि नयी व्याख्याओं के लिए हमेशा पर्याप्त संभावना रहती है।

हाँ, बिलकुल। मेरे विचार में इतिहास विषय के बारे में सबसे रोचक बात यही है कि इतिहासकार के तौर पर आप लगातार कुछ-न-कुछ सीखते रहते हैं। आप जब भी, नए विश्लेषणों से युक्त कोई किताब उठाते हैं तो ज्ञान का जो परस्पर जुड़ाव है, वह हमेशा आपको प्रेरित करता है, अंतर्दृष्टियाँ देता है और सवाल पूछने को भी उकसाता है। असल में, ज्ञान निर्भर ही होता है सवाल पूछने पर।

आप जैसे व्यापक अनुभव और अकादमिक प्रतिष्ठा वाले विद्वान, युवाओं को इस बात की प्रेरणा देते हैं कि आज के समय में, प्रभुत्वशाली विचारों के बीच भी, वे खुलकर सोच सकें, चिंतन कर सकें।  

आज रूढ़िवादी लगातार अपना प्रभुत्त्व स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, और जब मैं या दूसरे अन्य लोग इनका विरोध करते हैं, तो इसके पीछे यही विचार है कि अगर मैं इतिहास से जुड़ी समस्याओं पर स्पष्टीकरण दे रही हूँ तो सिर्फ समकालीन समय के लिए नहीं बल्कि ऐसा मैं इसलिए भी कर रही हूँ क्योंकि यह बात आने वाली पीढ़ियों के हित में है। यह बहुत जरूरी है कि सवाल करने और वाद-विवाद-संवाद की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहे। इसी तरह वर्तमान को समझने के क्रम में अतीत का अध्ययन करना हमेशा ही प्रेरणादायक और शिक्षाप्रद रहेगा।

साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। आदिकालीन भारत का सामाजिक-आर्थिक इतिहास उनका अध्ययन क्षेत्र है। उनके द्वारा लिखित/संपादित प्रमुख पुस्तकें हैं: ‘वारफेयर फॉर वेल्थ: अर्ली इंडियन पर्सपेक्टिव’, ‘अ सोर्सबुक ऑव इंडियन सिविलाइज़ेशन’, ‘ट्रेड इन अर्ली इंडिया’, ‘ट्रेड एंड ट्रेडर्स इन अर्ली इंडियन सोसायटी’, ‘एक्सप्लोरिंग अर्ली इंडिया’।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

फीड पाएं

रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:
अपना ई मेल लिखें :

हाशिये में खोजें

Loading...