हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बिना जातियों का खात्मा किए स्वच्छ भारत नामुमकिन

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/20/2014 07:44:00 PM

आनंद तेलतुंबड़े

नरेंद्र मोदी की नाटकबाजी खत्म होती नहीं दिख रही है. पिछले छह महीनों के दौरान, जबसे वे भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, उन्होंने बहुत सारी नाटकबाजियां की हैं, लेकिन उस ‘अच्छे दिन’ के कोई दर्शन नहीं हुए हैं, जिसका वादा उन्होंने जनता से किया था. पिछले शिक्षक दिवस पर उन्होंने स्कूली बच्चों की छुट्टियां रद्द कर दीं और टीवी पर उन्हें सुनने के लिए बच्चों को स्कूल आने को कहा. इस गांधी जयंती पर भी उन्होंने श्रद्धांजली के बतौर दी जाने वाली राष्ट्रीय छुट्टी को रद्द कर दिया और लोगों को झाड़ू उठा कर स्वच्छ भारत अभियान शुरू करने को कहा. हालांकि उनकी दूसरी नाटकबाजियों से हल्के-फुल्के विवाद उठे थे, लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस आखिरी वाले को ज्यादातर लोगों ने अपना लिया है जबकि यह संभावित रूप से सबसे विवादास्पद और समस्याग्रस्त है. चूंकि मोदी यहां गांधी की भूमिका अदा कर रहे हैं, क्योंकि खुद उन्होंने गांधी पर सवाल खड़े किए थे और उन्हें खारिज किया था, क्योंकि एक ‘महान राष्ट्र’ के रूप में भारत की छवि के लिहाज से यह मुद्दा इतना अहम था कि इस पर विवाद खड़े होते, लेकिन इन सबसे अलग इस चुप्पी की मुख्य वजह यह थी कि सामूहिक रूप से इस बात को लेकर लोग अनजान है कि गंदे भारत की जड़ें जातीय संस्कृति में हैं और वे जातियों के उन्मूलन के लिए जरिए इसके खात्मे की जरूरत से और भी अनजान हैं.

गंदगी की वजह

इसमें बहुत कम संदेह है कि भारत दुनिया में अनोखे रूप से एक गंदा देश है. हालांकि देशों की तुलना करने के लिए गंदगी का कोई सूचकांक नहीं है, लेकिन बहुत कम लोगों ही इससे इन्कार करेंगे कि भारत में जिस तरह हर जगह गंदगी पाई जाती है, वह कहीं और मुश्किल से ही मिलती है. बिना सोचे-विचारे गंदगी को करीबी से जोड़ दिया जाता है. चाहे वह व्यक्ति के स्तर पर हो या देश के स्तर पर, गरीबी के नतीजे में तंदुरुस्ती के बुनियादी ढांचे तथा साफ-सफाई कायम रखने वाले बंदोबस्त का अभाव पैदा होता है. चूंकि भारत में व्यापक गरीबी है, इसलिए गंदगी को भी चुपचाप कबूल कर लिया जाता है. लेकिन यह रिश्ता टिकता नहीं है. दुनिया में भारत से भी गरीब देश मौजूद हैं लेकिन वे साफ-सफाई के मामले में भारत से बेहतर दिखते हैं. भारत में सार्वजनिक शौचालयों के, जहां कहीं वे मौजूद हैं, आसपास लोगों को शौच करते देखना एक आम नजारा है. साफ-सफाई गरीबी से बढ़ कर संस्कृति का मामला है. गरीबों को गंदगी की दशा में मेहनत करनी पड़ती है. भूमिहीन खेतिहर के रूप में वे कीचड़ से भरे खेतों में काम करते हैं, गैर-खेतिहर मजदूरों के रूप में वे कंस्ट्रक्शन या खुदाई या दूसरी तरह के उद्योगों में काम करते हैं, वे कहीं अधिक गंदे और धूल भरे परिवेश में काम करते हैं. लेकिन तब भी वे अपने आस पास काम लायक सफाई बरकरार रखते हैं. जाहिर है कि गरीब लोग वैसी साफ-सफाई नहीं रख सकते जो अमीरों से मेल खाती हो, लेकिन वे काम लायक तंदुरुस्ती और साफ-सफाई की अहमियत बहुत स्वाभाविक रूप से जानते हैं. इसे गांव के सबसे गरीब लोगों और आदिवासी बस्तियों में आसानी से देखा जा सकता है. यहां  तक कि शहरी झुग्गियों तक के लिए यह बात बहुत हद तक सही है; अनेक बाधाओं के बावजूद गरीब लोग अपनी झोंपड़ियों में काम लायक सफाई बनाए रखते हैं. इसकी वजह यह है कि वे तंदुरुस्ती और साफ-सफाई की कमी की वजह से बीमार पड़ने का जोखिम नहीं ले सकते. बुनियादी तौर पर गंदगी सार्वजनिक गतिविधियों से पैदा होती है और उसमें अमीरों का योगदान उनके अनुपात से ज्यादा है. इसकी तुलना अमीरों द्वारा वैश्विक पर्यावरण को अनुपात से अधिक पहुंचाए गए नुकसान से की जा सकती है.

तब फिर कौन सी बात भारत की गंदगी की व्याख्या कर सकती है? इसका जवाब भारतीय संस्कृति में निहित है, जो कि जातीय संस्कृति के अलावा और कुछ नहीं है. यह संस्कृति सफाई कायम रखने की जिम्मेदारी एक विशेष जाति पर थोपती है. यह काम को गंदा तथा कामगारों को अछूत बता कर उनकी तौहीन करती है. हालांकि ऐसा हो सकता है कि खुल्लमखुला छुआछूत को आज व्यवहार में भले न लाया जा रहा हो, लेकिन यह बहुत हद तक अब भी मौजूद है, जैसा कि कुछ सर्वेक्षणों में दिखाया गया है. ये सर्वेक्षण एक्शन एड द्वारा सन 2000 में 50 गांवों में, तथा अहमदाबाद स्थित ‘नवसर्जन ट्रस्ट’ और रॉबर्ट एफ. केनेडी सेंटर फॉर जस्टिस एंड ह्यूमन राइट्स द्वारा 2009 में मोदी के गुजरात में किए गए. छुआछूत से बढ़कर, भारतीयों के व्यवहार में व्यापक रूप से जातीय आचारों की झलक मिलती है. इन आचारों ने प्रभावी तरीके से विभिन्न कामों को जातीय और लैंगिक रूप दिया है, और यह शिक्षा, वैश्वीकरण और शहरीकरण के प्रसार के बावजूद बदलने से इन्कार कर रहा है. एक तरफ जहां पूरी दुनिया में लोग ‘सिविक सेंस’ और सफाई बनाए रखने की बुनियादी जिम्मेदारी को निभाते हैं, और उन्हें सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सफाई कर्मियों पर उनकी गौण निर्भरता ही होती है, भारत में लोग कचरा फैलाने में एक (ऊंची जातियों वाली) श्रेष्ठताबोध महसूस करते हैं, जिसे फिर बाद में निचली जाति के सफाईकर्मी द्वारा साफ किया जाएगा. अगर सफाई करने वालों के इस छोटे से समुदाय, जिसको गंदगी से भी बदतर समझा जाता है और उसका भरपूर शोषण किया जाता है, पर 1250 मिलियन लोगों द्वारा बेधड़क पैदा की गई गंदगी को साफ करने की जिम्मेदारी रहेगी तो इस देश को इसी तरह गंदा रहना तय है. यह इसी तरह का है कि क्षत्रियों के एक छोटे से समूह को दी गई सुरक्षा की जिम्मेजारियों ने भारत को गुलामी का इतिहास दिया या फिर ज्ञान पर एकाधिकार वाली ब्राह्मणों की एक छोटी सी जाति ने भारत को एक जाहिल और पिछड़ा देश बनाए रखा.

भीतर छुपा जातिवाद


इससे यह बात निकल कर आती है कि जब तक जातीय संस्कृति को खत्म नहीं किया जाता और लोग खुद साफ-सफाई की जिम्मेदारियों को जीवन में नहीं उतार लेते, तब तक कितने भी अभियान चलाए जाएं, वे कामयाब नहीं होंगे. हैरानी की बात है कि मोदी के इस अभियान में जाति के ज अक्षर का जिक्र भी शामिल नहीं है. इससे आम तौर पर अभिजातों द्वारा जाति के अस्तित्व को खारिज किए जाने या कम से कम उन्हें कोई मुद्दा ही न मानने के चलन की बू आती है. मोदी को यह बात कभी समझ में नहीं आएगी कि ऐसे किसी सफाई अभियान के वाल्मीकि बस्ती से शुरू करना असल में वाल्मीकियों और सफाई के बीच रिश्ते को मजबूत करना ही है. गांधी ने भी अपने सरपरस्ती भरे लहजे में यही किया था, बिना जातियों के खिलाफ बोले उन्होंने दिल्ली के भंगियों के बीच रह कर उन्होंने बस अपने महात्मापन का प्रदर्शन किया था. मोदी अपनी अक्ल का यह हिस्सा गांधी से ही हासिल करते हैं, जब वे वाल्मिकियों के बारे में ये लिखते हैं:
 

‘मैं नहीं मानता कि वे सिर्फ रोजी रोटी के लिए सिर पर मैला ढोते हैं...कभी किसी को जरूर यह प्रबोधन प्राप्त हुआ होगा कि पूरे समाज और ईश्वर की प्रसन्नता के लिए काम करना उनका कर्तव्य है. कि उन्हें द्वताओं से आशीर्वाद के रूप में प्राप्त हुआ यह काम करना ही होगा और सदियों से मैला ढोने का यह काम एक आंतरिक आध्यात्मिक अनुभूति के रूप में जारी रहना चाहिए.’ (पृ. 48-49, कर्मयोग, मोदी के भाषणों का संकलन) 

उम्मीद के मुताबिक, इन ‘आध्यात्मिक’ टिप्पणियों को तमिलनाडु के दलितों की तरफ से कड़ी निंदा का सामना करना पड़ा, जिन्होंने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में मोदी का पुतला दहन किया. लेकिन दो साल के बाद भी, उन्होंने यही टिप्पणी सफाई कर्मचारियों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए दोहराई, ‘एक पुजारी प्रतिदिन प्रार्थना के पहले मंदिर की सफाई करता है, आप भी शहर को मंदिर की तरह साफ करते हैं. आप और मंदिर के पुजारी एक ही जैसे हैं.’ गांधी की नकल करते हुए, मोदी ने आंबेडकर द्वारा गांधी पर किए गए हमले के प्रति अपनी भारी जहालत को ही उजागर किया है, जिसमें आंबेडकर ने गांधी द्वारा धार्मिक-आध्यात्मिक मक्कारियों की ओट में जाति के बदसूरत यथार्थ को छिपाने की तीखी आलोचना की थी. यह बात तो अब स्कूल के बच्चे भी जानते हैं. मोदी बड़े मजे में समकालीन सफाई कर्मचारी आंदोलन द्वारा सूखे शौचालयों को गिराने के संघर्ष के बारे में भी नहीं जानते, जिसमें नागरिकों के अलावा रेलवे सबसे बड़ा अपराधी है. और कर्नाटक के सवनौर जिले की उस भयानक घटना के बारे में नहीं जानते, जिसमें सफाई कर्मचारियों ने हताशा में अपने उत्पीड़न के खिलाफ विरोध जाहिर करते हुए अपने सिर पर सार्वजनिक रूप से मानव मल उंड़ेला था. जातियों की तरह, सरकार सूखे शौचालयों या सिर पर मैला ढोने वाले सफाई कर्मियों के दुख को भी नकारती रही है. मोदी जो कुछ कह रहे हैं, उसका एक ही मतलब है कि दलितों के ब्राह्मणवादीकरण की आरएसएस रणनीति को आगे बढ़ाया जाए, ताकि उनके ब्राह्मणवादविरोधी गुस्से को भोथरा बनाया जा सके और इसे हिंदुत्व के एजेंडे को साकार किया जा सके.

स्वच्छ भारत के पीछे असल में भाजपा की श्रेष्ठतावादी सनक है, जो उसे भरमा कर 2004 में ‘भारत उदय’ की घोषणा करने की तरफ ले गई थी, जबकि देश की 60 फीसदी आबादी खुले में शौच करती है. यह बात मोदी के खाते में जमा होनी चाहिए कि उन्होंने इस शर्मनाक स्थिति को चर्चा में लाते हुए, मौजूदा कार्यकाल में 1.96 लाख करोड़ रुपयों के अनुमानित लागत पर 12 करोड़ शौचालय बनवाने का फैसला किया है. लेकिन यहां भी उन्होंने हाथ की सफाई दिखाई है, क्योंकि वे मुख्यत: उस नवउदारवादी परोपकार पर भरोसा कर रहे हैं, जिसे कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी कहा जाता है. बड़ी कुशलता से उन्होंने सफाई के बुनियादी ढांचे के निर्माण में सरकारी जिम्मेदारियों से बच निकले हैं, वे गांधीवादी आध्यात्मिकता का इस्तेमाल करते हुए, कामचलाऊ नौकरियां पैदा करने तक से बच गए हैं और लोगों को हफ्ते में करम से कम दो घंटे का स्वैच्छिक श्रमदान करने को कहा है. अगर स्वच्छ भारत के लिए यही चाहिए तो अनुमानित स्वैच्छिक श्रमदान 40 मिलियन नौकरियों के बराबर होगा जबकि अभी पूरे सार्वजनिक क्षेत्र में कुल मिला कर 18 मिलियन से भी कम नौकरियां हैं. अगर कोई इस मंसूबे को व्यवहारिकता के नजरिए से देखे तो वह पाएगा कि यह हमेशा की तरह एक आम सरकारी ऐलान है, जिसमें बातें तो बड़ी बड़ी हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.

झूठ का ताना-बाना

 
बेशक नरेंद्र मोदी ने अतीत के किसी भी प्रधानमंत्री से ज्यादा, अलग अलग वर्गों, समूहों और तबकों के लोगों को प्रभावित किया है. इसमें खास तौर से उनके विदेशी श्रोता भी हैं. हालांकि उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले या उसके बाद, उन्होंने जो वादे किए या जिन वादों के पूरा होने का दावा किया, उनके बारे में बहुत भरोसेमंद सबूत नहीं हैं. पिछले लोक सभा चुनावों के दौरान चलाए गए अरबों रुपए के गोएबलीय अभियान में उनके नेतृत्व में गुजरात को विकास के मानक के रूप में पेश किया गया और उनके लिए प्रधानमंत्रित्व हासिल किया गया. लेकिन सच्चाई कुछ और ही है. विकास के ज्यादातर मानकों पर गुजरात साधारण या औसत दर्जे का ही राज्य है. उसके बारे में कुछ भी असाधारण नहीं था, सिवाए इसके मुख्यमंत्री के निरंकुश राजकाज के और कॉरपोरेट दिग्गजों के लिए बिछाई गई लाल कालीन के. गुजरात की जीवंतता के बारे में किए गए बढ़ा चढ़ा कर किए गए दावे इन्हीं दो कारकों तक सीमित थे. जनता के नजरिए से देखें, तो यह दूसरे राज्यों जितना ही अच्छा या बुरा था, और कुछ राज्यों के मुकाबले को यकीनन ही बदतर था. हालांकि महज छह महीनों के दौरान प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के प्रदर्शन पर कोई सार्थक राय गलत हो सकती है, सारी तड़क भड़क, उत्साह और मुग्ध कर देने वाली भाषणबाजी जिसके साथ देश में और बाहर लोगों को इस तरह वशीभूत कर लिया गया है कि वे उन्हें एक असाधारण नेता के रूप में देखें, हमें गुजरात में उनके कार्यकाल की याद दिलाते हैं, जिसमें बातें तो बड़ी बड़ी थीं लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहे.


गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने 2007 में इससे मिलता जुलता एक अभियान – ‘निर्मल गुजरात’ शुरू किया था और बड़े बड़े दावे किए थे. लेकिन गुजरात में कचरा प्रबंधन और प्रदूषण पर उनका रेकॉर्ड भयावह है. गुजरात स्थित एक पर्यावरण कार्यकर्ता रोहित प्रजापति ने भारत के योजना आयोग की 12 मई 2014 की रिपोर्ट ‘रिपोर्ट ऑफ द टास्क फोर्स ऑन वास्ट टू एनर्जी’ से तथ्यों का इस्तेमाल करते हुए सटीक ब्योरे मुहैया कराए हैं [http://sacw.net/article9679.html.]


इन सबके बावजूद, मोदी को शौचालयों और सफाई के मुद्दों को चर्चा में लाने का श्रेय दिया जाना चाहिए, जब पिछले 60 बरसों से शासक इस तथ्य से आंखें मूंदे हुए थे कि भारत खुले में शौच करता है. इसके लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए, भले ही उन्होंने इस अभियान की कामयाबी में बहुत कम भरोसे का निर्माण किया है. जैसा कि प्रस्तावित किया गया है, यह कॉरपोरेट जगत के लिए निवेश का एक और भव्य मौका बनने जा रहा है. मोदी के अभियान में अब तक की सबसे बड़ी खामी यह है कि अगर उन्हें कारोबार से मतलब है तो उनसे असली मुद्दा ही छूट गया है. उन्हें यह जरूर ही समझना होगा कि बिना जातीय स्वभावों को पूरी तरह खत्म किए बिना भारत कभी भी स्वच्छ नहीं हो सकता. 


अनुवाद: रेयाज उल हक

उलटबाँसियां: उल्टी दुनिया की पाठशाला

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/09/2014 03:17:00 PM

एदुआर्दो गालेआनो
अनुवाद: पी.के. मंगलम

अगर एलिस वापस आती

आज से एक सौ तीस साल पहले, आश्चर्यों भरी दुनिया घूमने के बाद एलिस उल्टी दुनिया की खोज में एक आईने के भीतर गई थी। अगर एलिस हमारे जमाने में वापस आती तो उसे किसी शीशे से होकर जाने की जरूरत नहीं होगी; बस खिड़की से बाहर देखना होगा।
इस सदी के खत्म होते होते उल्टी दुनिया हम सबके सामने है; वही दुनिया जिसमें हम रहते हैं  और जहां बायां दाईं तरफ, पेट पीठ में और सिर पैरों में है।
                                           मोंतेविदियो, 1998 के मध्य में

विषय-क्रम

आभार
भाईयों और बहनों, आगे बढ़ते रहिए!
पाठ का हिसाब
माता-पिता के नाम संदेश
अगर एलिस वापस आती
उल्टी दुनिया की पाठशाला
सीखाना उदाहरणों के साथ
विद्यार्थी
अन्याय का शुरुआती पाठ
रंगभेद और पुरुष वर्चस्ववाद के शुरुआती पाठ
पुरोहिती डर की
डर की पढ़ाई
डर का उद्योग
दुश्मनों को अपने हिसाब से कैसे बनाएं: कांट-छांट और दर्जीगिरी के सबक
मठ नीतिशास्त्र का
जमीनी काम: सफल जिंदगी और नए दोस्त कैसे बनाएं
सबक बेकार की आदतों से निबटने के
कुछ भी कर बच निकलने की महाविद्या
मिसालें पढ़ने के लिए
सीनाजोरी हत्यारों की
सीनाजोरी धरती के विनाशकों की
सीनाजोरी चंहुओर पुजाते मोटरइंजन की
सीख अकेलेपन की
सबक उपभोक्ता समाज के
अलग-थलग पड़ने की पूरी तैयारी
एक पाठशाला इन सबके खिलाफ़ भी
खत्म होती सहस्राब्दी के छल और उम्मीद
उन्मुक्त उड़ान का अधिकार
नामों की फेहरिस्त

विद्यार्थी

दिन-प्रतिदिन बच्चों को बचपन के अधिकार से दूर किया जा रहा है। इस अधिकार की हँसी उड़ाते सच अपनी सीखें हम तक रोज़ाना पहुँचाते हैं। हमारी दुनिया धनी बच्चों को यूँ देखती है मानो वे कोई चलती-फिरती तिजोरी हों! और फिर होता यह है कि ये बच्चे असल जिंदगी में भी खुद को रुपया-पैसा ही समझने लग जाते हैं। दूसरी ओर, यही दुनिया गरीब बच्चों को कूड़ा-कचरा समझते हुए उन्हें घूरे की चीज बना डालती है।  और मध्यवर्ग के बच्चे, जो न तो अमीर हैं न गरीब, यहाँ टी.वी से यूँ बांध दिए गए हैं कि बड़ी छोटी उमर से ही वो इस कैदी जीवन के ग़ुलाम हो जाते हैं। वे बच्चे जो  बच्चे  रह पाते हैं, फिर किस्मत के धनी और एक अजूबा ही माने जाएंगे।

ऊपर, नीचे और बीच वाले

चारों ओर फैले उपेक्षा के अथाह समंदर में सुख-सुविधाओं के टापू गढ़े जा रहें हैं। ये ऐशो-आराम के सामानों से भरपूर, किसी जेलखाने की निगरानी और चुप्पी लेती जगहे हैं। यहाँ  धन और बल के महारथी, जो अपनी ताकत के अहसास को एक पल भी छोड़ नहीं सकते हैं, सिर्फ़ अपने जैसे लोगों से घुलते-मिलते हैं। लातीनी अमरीका के कुछ बड़े शहरों में अपहरण बिल्कुल रोज की बात हो गई है।  ऐसे में यहाँ के अमीर बच्चे लगातार फैलते डर के साए में ही बड़े होते हैं। चारदीवारीयों वाली कोठियाँ और बिजली के बाड़ों से घिरे बंगले इनका ठिकाना होते हैं। यहाँ सुरक्षागार्ड और क्लोज सर्किट कैमरे धन के इन संतानों की रखवाली दिन-रात किया करते हैं। ये बाहर निकलते भी हैं तो रूपये-पैसों की तरह हथियारों से लैस गाड़ियों में बंद होते हैं।  सिवाय सिर्फ़ दूर से देखते रहने के, अपने शहर को ये ज्यादा नहीं जानते। पेरिस  या न्यूयार्क की भूमिगत सुविधाओं का तो इन्हें खूब पता रहता है, लेकिन साओं पाओलो [1] या मेक्सिको [2] की राजधानी की ऐसी ही चीजों का ये कभी इस्तेमाल नहीं करते।

देखा जाए तो ये बच्चे उस शहर में रहते ही नहीं, जहां के वो रहने वाले हैं। अपने छोटे-से जन्नत के चारों ओर पसरी भयावह सच्चाईयों से ये बिल्कुल दूर खड़े होते हैं।  आखिर इस जन्नत के बाहर ही वह भयानक दुनिया शुरू होती है, जहां लोग बहुत ज्यादा, बदसूरत, गंदे और उनकी खुशियों से जलने वाले हैं। जब पूरी दुनिया के एक गाँव बनते जाने की बात बड़े जोर-शोर से फैलाई जा रही है, बच्चे किसी एक जगह के नहीं रह गए हैं। लेकिन जिनकी अपनी दुनिया छोटी-से-छोटी होती गई है, उन्हीं की आलमारियाँ  सामान से भरी भी हुई हैं। ये वो बच्चे हैं, जो जड़ो से कटे और बिना किसी सांस्कृतिक पहचान के ही बड़े होते हैं। इनके लिए समाज का कुल मतलब यही यक़ीन होता है कि बाहरी दुनिया की सच्चाईयाँ  खतरनाक हैं। पूरी दुनिया पर छाए ब्रांड ही अब इन बच्चों का देश बन गए हैं, जहां ये अपने कपड़ों और बाकी चीजों को अलग-अलग दिखाने की जुगत में लगे रहते हैं। और भाषा के नाम पर इनके लिए अंतर्राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक संकेत ही सब कुछ हैं। एक-दुसरे से जुदा शहरों और मीलों दूर खड़ी जगहों में पलती-बढ़ती धन की ये संताने अपनी आदतों और रूझानों में एक जैसी दिखाई देने लगी हैं। ठीक अपने समय और स्थान के सरोकारों से बाहर खड़े, एक-दूसरे की नकल करते मॉलों और हवाईअड्डों की तरह। सिर्फ दिखने वाले सच का पाठ पढ़े ये बच्चे जमीनी हकीकत से बिल्कुल बेखबर होते हैं। वही हकीकत जो उनके लिये सिर्फ डराने वाली या फिर पैसे के बल पर जीत  ली जाने वाली चीज होती है।

बच्चों की दुनिया

‘सड़क बहुत देख-भाल कर पार करनी चाहिए’

कोलम्बिया  [3] के शिक्षक गुस्ताव विल्चेस बच्चों के एक समूह को समझा रहे थे:

‘चाहे बत्ती हरी ही क्यों न हो, कभी भी सड़क दोनों ओर देखे बगैर पार नहीं करनी चाहिए’।

विल्चेस ने उन्हें यह भी बताया कि कैसे एक बार वह एक कार से कुचले जाने के बाद बिल्कुल बीच सड़क पर गिरे पड़े थे। उन्हें अधमरा कर छोड़ देने वाली उस दुर्घटना को याद कर विल्चेस का चेहरा पीला पड़ गया था।

लेकिन बच्चों ने उनसे यह पूछा:
किस ब्रांड की कार थी वह?

क्या उस कार में एयर कंडीशनर की सुविधा थी?

वो कार क्या सौर ऊर्जा से चलने वाली थी?

बर्फ हटाने वाली मशीन थी न उसमें?

कितने सिलेंडरों वाली कार थी वह?

दुकान के शीशे

लड़कों के खिलौने; रैंबो, रोबोकौप, निंजा [4], बैटमैन, राक्षस, मशीनगन, पिस्तौल, टैंक, कार, मोटरसाईकिल, ट्रक, हवाई जहाज, अंतरिक्षयान

लड़कियों के खिलौने: बार्बी गुड़िया, हाइडी, इस्तरी करने की मेज, रसोई का सामान, सिल-बट्टा, कपड़े धोने की मशीन, टीवी, बच्चे, पालना, दूध की बोतल, लिपिस्टीक, बाल घुंघराले करने की मशीन, सुर्खी पाउडर, आईना

फास्ट फूड, तेज कारें, तेज जिंदगी: इस दुनिया में आते ही धनी बच्चों को यह सिखाया जाने लगता है कि सभी चीजें सिर्फ कुछ पलों की और इसीलिए खर्चने की होती हैं। इनका बचपन यही देखते-दिखाते बीतता है कि मशीने इंसानों से ज्यादा भरोसे लायक हैं। और  जब ये बड़े होंगे [5] तब बाहर की “खतरनाक” दुनिया से हिफाजत के लिए इन्हें पूरी धरती नापने को तैयार चारपहिया सौंपी जाएगी! जवानी की ओर कदम बढ़ाते-बढ़ाते ये बच्चे साइबर दुनिया की सरपट सड़कों पर फर्राटे भरने लग जाते हैं। अपने कुछ होने का अहसास ये तस्वीर और सामान निगलते, टी.वी. के चैनल बदलते और बड़ी-बड़ी खरीददारीयाँ करते हुए पाते हैं। साइबर दुनिया में घूमते इन साइबरी बच्चों का निपट अकेलापन शहरों की गलियों में भटकते बेसहारा बच्चों की तरह ही होता है।
 

धनी बच्चे जवान होकर अकेलापन खत्म करने और तमाम डर भुलाने के लिए नशीली दवाएं ढूँढें, इसके बहुत पहले से ही गरीब बच्चे पेट्रोल और गोंद में छुपा नशा ले रहे होते हैं। वहीं, जब धनी बच्चे लेज़र बंदूकों के साथ युद्ध का खेल खेलते हैं, गली के बच्चों को असली गोलियाँ निशाना बना रही होती हैं।

लातीनी अमरीका की आबादी का लगभग आधा हिस्सा बच्चों और जवान होते लड़कों-लड़कियों का है।  इस आधे हिस्से का आधा बहुत बुरे हाल में जी रहा है।  इस बुरे हाल से वही सौ बच्चे बच पाते हैं, जो हर घंटे यहाँ  भूख या ठीक होने वाली बीमारीयों से मर जाते हैं! फिर भी, गलियों और खेतों [6] में ग़रीब बच्चों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। यह दुनिया के उस हिस्से की बात है, जो दिन-रात ग़रीब पैदा करता है और ग़रीबी को गुनाह भी मानता है! यहाँ ज्यादातर ग़रीब बच्चे और ज्यादातर बच्चे ग़रीब हैं। और, व्यवस्था से बाँध दी गई जिंदगियों में ग़रीबी की सबसे ज्यादा मार इन्हीं बच्चों पर पड़ती है। इन्हें निचोड़ कर रख देने वाला समाज इनको हमेशा शक के दायरे में रखता है। इतना ही नहीं, यहाँ ग़रीबी के इनके ‘अपराध’ की सजा भी सुनाई जाती है, जो कभी-कभी मौत होती है। वे क्या सोचते और महसूस करते हैं, यह कोई नहीं सुनता, उन्हें समझने की बात तो फिर बहुत दूर  है।

ये बच्चे, जिनके माँ-बाप या तो काम की तलाश में भटकते रहते हैं या फिर बिना किसी काम और ठिकाने के ही रह जाते हैं, बड़ी छोटी उमर से ही कोई भी छोटा-मोटा काम कर जीने को मजबूर होते हैं। सिर्फ पेट भरने या उससे थोड़ा ज्यादा पा लेने के बदले ये पूरी दुनिया में कहीं भी कमरतोड़ खटते हुए मिल जाएंगे। चलना सीखने के बाद ये यही सीखते हैं कि अपना काम ‘ठीक’ से करने वाले ग़रीबों को क्या क्या ईनाम मिलते हैं। इन लड़के-लड़कियों की “बढ़िया” मजदूर बनने की शुरूआत गराजों, दुकानों और छोट-मोटे, घर से चलाए जाने वाले ढाबों से होती है, जहाँ इनसे मुफ्त काम लिया जाता है। या फिर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खेलकूद  के कपड़े बनाने वाले कारखानों से, जहाँ इनकी मजदूरी कौड़ियों के मोल खरीदी जाती है। खेतों या लोगों से ठसमठस शहरों या फिर घरों में काम करते हुए ये अपने मालिकों की मर्जी से बँधे रहते हैं। कुल मिलाकर इनकी हालत घरेलू या वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के ‘असंगठित’ कहे जाने वाले क्षेत्र के गुलामों की है। पूरी दुनिया में फैलते बाज़ार की चाकरी करते ये बच्चे उसके सबसे शोषित मजदूर भी हैं।

नोट्स

1. लातीनी अमरीकी देश ब्राजील का एक महानगर
2. लातीनी अमरीकी देश
3. लातीनी अमरीकी देश
4. एक जापानी मार्शल आर्ट के लड़ाके।
5. मूल शब्द हैं “la hora del ritual de iniciacion” जिसका शाब्दिक अर्थ होता है “प्रवेश के अनुष्ठान की घड़ी” ।
6. मूल शब्द “campo” है जिसके मायने गाँव या खेत दोनों ही होते हैं। 

अपने अंदर जरा झांक मेरे वतन: साहिर को याद करते हुए

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/25/2014 01:12:00 PM

 
साहिर लुधियानवी शायरी के उस दौर का प्रतिनिधित्व करते हैं, जब दूसरे अनेक देशों के संघर्षों के साथ-साथ रूस और चीन की क्रांतियों ने इंसानी समाज को एक नए भविष्य की उम्मीदों से भर दिया था. फनकार और शायर इन क्रांतियों से प्रेरणा लेकर शायरी को एक नई धार दे रहे थे. एक नया मुहावरा गढ़ रहे थे. हालांकि साहिर बाद में अपने फिल्मी गीतों की वजह से लोगों के बीच ज्यादा जाने गए, लेकिन उनके फिल्मी गीतों में भी विचार की एक अनोखी सघनता है. हमारे आज के दौर में साहिर एक ऐसी मिसाल के रूप में हमारे सामने हैं, जिसने अपार लोकप्रियता और कारोबारी जरूरतों के बावजूद अपनी प्रतिबद्धता को बाजार में खड़ा नहीं किया. पुरस्कारों और यात्राओं की जुगाड़ भिड़ाते लेखकों-कवियों की भीड़ में साहिर को उनकी बरसी पर याद करना महज एक रस्म नहीं है, बल्कि यह याद करना है कि एक शायर और लेखक की प्रतिबद्धता असल में क्या होती है. साहिर की कुछ नज्मों के साथ, उनका एक फिल्मी गीत भी, जो इस मामले में शायद हिंदी फिल्मों का अकेला गीत है, जो भारत में जातीय और नस्ली विभाजनों पर गौर करता है और कहता है कि अगर भारतीय समाज ने इन व्यवस्थाओं को नहीं तोड़ा तो वह फिर से गुलाम बन जाएगा. गीत सुनते हुए देखें कि यह बात कितनी सही निकली.


अपने अंदर जरा झांक मेरे वतन

फिल्म: नया रास्ता


खून फिर खून है

(एक मकतूल लुमुंबा एक लुमुंबा से कहीं ज्यादा ताकतवर होता है – जवाहरलाल नेहरू)

जुल्म फिर जुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
खून फिर खून है टपकेगा तो जम जाएगा

खाके-सहरा पे जमे या कफे-कातिल पे जमे
फर्के-इंसाफ पे या पाए-सलासिल पे जमे
तेग बेदार पे बा-लाशा-ए-बिस्मिल पे जमे
खून फिर खून है टपकेगा तो जम जाएगा

लाख बैठे कोई छुप-छुप के कमींगाहों में
खून खुद देता है जल्लादों के मसकन का सुराग
साजिशें लाख उढ़ाती रहें जुल्मत के नकाब
लेके हर बूंद निकलती है हथेली पे चराग

जुल्म की किस्मते-नाकारा-ओ-रुसवा से कहो
जब्र की हिकमते-परकार के ईमा से कहो
महमिले-मजलिसे-अकवाम की लैला से कहो
खून दीवाना है दामन पर लपक सकता है
शोला-ए-तुंद है खिरमन पे लपक सकता है

तुमने जिस खून को मकतल में दबाना चाहा
आज वो कूचा-ओ-बाजार में आ निकला है
कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर
खून चलता है तो रुकता नहीं संगीनों से
सर उठाता है तो दबता नहीं आईनों से

जुल्म की बात ही क्या जुल्म की औकात ही क्या
जुल्म बस जुल्म है आगाज से अंजाम तलक
खून फिर खून है सौ शक्ल बदल सकता है
ऐसी शक्लें कि मिटाओ तो मिटाए ना बने
ऐसे शोले कि बुझाओ तो बुझाए न बने
ऐसे नारे कि दबाओ तो दबाए न बने

आवाज-ए-आदम

दबेगी कब तलक आवाजे-आदम हम भी देखेंगे
रुकेंगे कब तलक जज्बाते-बरहम हम भी देखेंगे
चलो यूं भी सही ये जौरे-पैहम हम भी देखेंगे

दरे जिंदां से देखें या उरूजे-दार से देखें
तुम्हें रुस्वा सरे-बाजारे-आलम हम भी देखेंगे
जरा दम लो मआले-शौकते-जम हम भी देखेंगे

ये जोमे-कूवते-फौलादो-आहन देख लो तुम भी
ब-फैजे-जज्बा-ए-ईमान-मोहकम हम भी देखेंगे
जबीने-कज कुलाही खाक पर खम हम भी देखेंगे

मुकाफाते-अमल तारीखे-इंसां की रवायत है
करोगे कब तलक नावक फराहम हम भी देखेंगे
कहां तक है तुम्हारे जुल्म में दम हम भी देखेंगे

ये हंगामे-विदा-ए-शब है ऐ जुल्मत के फरजंदों
सहर के दोश पर गुलनार परचम हम भी देखेंगे
तुम्हें भी देखना होगा ये आलम हम भी देखेंगे

मेरे गीत तुम्हारे हैं

अब तक मेरे गीतों में उम्मीद भी थी पसपाई भी
मौत के कदमों की आहट भी जीवन की अंगड़ाई भी
मुस्तकबिल की किरनें भी थीं, हाल की बोझिल जुल्मत भी
तूफानों का शोर भी था और ख्बावों की शहनाई भी

आज से मैं अपने गीतों में आतिश-पारे भर दूंगा
मद्धम लचकीली तानों में जीवन धारे भर दूंगा
जीवन के अंधियारे पथ पर मशअल लेकर निकलूंगा
धरती के फैले आंचल में सुर्ख सितारे भर दूंगा

आज से ऐ मजदूर किसानो! मेरे गीत तुम्हारे हैं
फाकाकश इंसानो! मेरे जोग बिहाग तुम्हारे हैं
जब तक तुम भूके नंगे हो, ये नग्मे खामोश न होंगे
जब तक बेआराम हो तुम ये नग्मे राहतकोश न होंगे

मुझको इसका रंज नहीं है लोग मुझे फनकार न मानें
फिक्रो-फन के ताजिर मेरे शेरों को अश्आर न मानें
मेरा फन मेरी उम्मीदें आज से तुमको अरपन हैं
आज से मेरे गीत तुम्हारे सुख और दुख का दरपन हैं

तुमसे कूवत लेकर अब मैं तुमको राह दिखाऊंगा
तुम परचम लहराना साथी! मैं बरबत पर गाऊंगा
आज से मेरे फन का मकसद जंजीरें पिघलाना है
आज से मैं शबनम के बदले अंगारे बरसाऊंगा

एहसासे-कामरां

उफके-रूस से फूटी है नई सुब्ह की जौ
शब का तारीक जिगर चाक हुआ जाता है
तीरगी जितना संभलने के लिए रुकती है
सुर्ख सैल और भी बेबाक हुआ जाता है

सामराज अपने वसीलों पे भरोसा न करे
कुहना जंजीरों की झनकार नहीं रह सकती
जज्बए-नफरते-जम्हूर की बढ़ती रौ में
मुल्क और कौम की दीवार नहीं रह सकती

संगो-आहन की चटानें हैं अवामी जज्बे
मौत के रेंगते सायों से कहो कट जाएं
करवटें ले के मचलने को है सैले-अनवार
तीरा-ओ-तार घटाओं से कहो छंट जाएं

सालहा-साल के बेचैन शरारों का खरोश
एक नई जीस्त का दर बाज किया चाहता है
अज्मे-आजादि-ए-इंसां-ब-हजारां जबरूत
एक नए दौर का आगाज किया चाहता है

बरतर-अकवाम के माजूर खुदाओं से कहो
आखिरी बार जरा अपना तराना दुहराएं
और फिर अपनी सियासत पे पशेमां होकर
अपने नापाक इरादों का कफन ले आएं

सुर्ख तूफान की मौजों को जकड़ने के लिए
कोई जंजीरे-गिरां काम नहीं आ सकती
रक्स करती हुई किरनों के तलातुम की कसम
अर्सए-दहर पे अब शाम नहीं छा सकती

तुलू-ए-इश्तराकियत

जश्न बपा है कुटियाओं में, ऊंचे ऐवां कांप रहे हैं
मजदूरों के बिगड़े तेवर देख के सुल्तां कांप रहे हैं
जागे हैं अफलास के मारे उठ्ठे हैं बेबस दुखियारे
सीनों में तूफां का तलातुम आंखों में बिजली के शरारे
चौक-चौक पर गली गली में सुर्ख फरेरे लहराते हैं
मजलूमों के बागी लश्कर सैल-सिफत उमड़े आते हैं
शाही दरबारों के दर से फौजी पहरे खत्म हुए हैं
ज़ाती जागीरों के हक और मुहमिल दावे खत्म हुए हैं
शोर मचा है बाजारों में, टूट गए दर जिंदानों के
वापस मांग रही है दुनिया गस्बशुदा हक इंसानों के
रुस्वा बाजारू खातूनें हक-ए-निसाई मांग रही हैं
सदियों की खामोश जबानें सहर-नवाई मांग रही हैं
रौंदी कुचली आवाजों के शोर से धरती गूंज उठी है
दुनिया के अन्याय नगर में हक की पहली गूंज उठी है
जमा हुए हैं चौराहों पर आकर भूखे और गदागर
एक लपकती आंधी बन कर एक भभकता शोला होकर
कांधों पर संगीन कुदालें होंठों पर बेबाक तराने
दहकानों के दल निकले हैं अपनी बिगड़ी आप बनाने
आज पुरानी तदबीरों से आग के शोले थम न सकेंगे
उभरे जज्बे दब न सकेंगे, उखड़े परचम जम न सकेंगे
राजमहल के दरबानों से ये सरकश तूफां न रुकेगा
चंद किराए के तिनकों से सैले-बे-पायां न रुकेगा
कांप रहे हैं जालिम सुल्तां टूट गए दिल हब्बारों के
भाग रहे हैं जिल्ले-इलाही मुंह उतरे हैं गद्दारों के
एक नया सूरज चमका है, एक अनोखी जू बारी है
खत्म हुई अफराद की शाही, अब जम्हूर की सालारी है.

हिंदुत्व का कारोबार: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/12/2014 08:09:00 PM

 
हाशिए की आवाज स्तंभ के तहत समयांतर के अक्तूबर, 2014 अंक में प्रकाशित. अनुवाद: रेयाज उल हक

आनंद तेलतुंबड़े
 

नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के दिन लालकिले की प्राचीर से लोगों से जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयतावाद को दस साल तक स्थगित रखने के लिए बड़ी जोशीली अपील की, लेकिन इसके बावजूद उनके कुनबे की सांप्रदायिक हरकतें कम नहीं हो रही हैं. अपील के उलट, हाल में नौ राज्यों में उपचुनावों के प्रचार अभियान दौरान ये हरकतें इस घटिया स्तर तक पहुंच गईं, कि लोगों को लगने लगा कि भाजपा ने दोमुंहेपन और बेईमानी का अपना पुराना खेल फिर से शुरू कर दिया है. इसने विवादास्पद सांसद योगी आदित्यनाथ को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी और केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र के साथ उत्तर प्रदेश में 11 विधानसभा सीटों और एक लोकसभा सीट के उपचुनाव की कमान सौंप दी. गोरखपुर से पांचवीं बार सांसद बने, भगवा कपड़े में लिपटे इस नौजवान योगी ने बड़े कम वक्त में इतनी बदनामी हासिल कर ली है कि वह भाजपा का हिंदुत्व का चेहरा बन गया है. मोदी के भाषण के महज दो दिन पहले, उसने संसद के भीतर सांप्रदायिक जहर उगलते हुए इस बात पर जोर दिया कि हिंदुओं को अल्पसंख्यकों के खिलाफ एकजुट होने की जरूरत है. गृह मंत्री राजनाथ सिंह इस पर सहमति में सिर हिला रहे थे. भाजपा के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी के मुताबिक योगी को सोच-समझ कर उत्तर प्रदेश में भाजपा के अभियान के चेहरे के रूप में चुना गया था. यह बहुत साफ था कि भाजपा सांप्रदायिक रूप से लोगों को बांटना चाहती थी, मानो लोकसभा चुनावों के दौरान अमित शाह ने बड़ी महारत से जो किया था, वह कुछ कुछ उसे दोहराना चाहती थी.

मैंने पिछले स्तंभ में यह चेतावनी दी थी कि अगर हिंदुत्व ब्रिगेड की घटिया बदमाशियों को समय रहते काबू में नहीं किया गया तो वे भाजपा के लिए आत्मघाती साबित होंगी. उपचुनावों के नतीजों ने इसे सचमुच दिखा भी दिया. जिन नौ राज्यों की 32 सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें से 26 सीटें भाजपा के पास थीं जिसे महज चार महीने पहले राष्ट्रीय चुनावों में शानदार जीत भी हासिल हुई थी. लेकिन उपचुनावों में वह महज 12 सीटें बचा पाई. सबसे तगड़ा झटका यूपी में लगा जहां अपने चुने हुए प्रचारक आदित्यनाथ के नेतृत्व में इसने 11 में 7 सीटें खो दीं. इसके बाद राजस्थान और गुजरात की बारी थी, जहां इसे लोकसभा चुनावों में पूरी तरह एकतरफा जीत हासिल हुई थी, वहीं उपचुनावों में दोनों राज्यों में 3-3 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा. इस हार ने संघी शिविर की बेबुनियाद उन्माद की हवा तो निकाली ही, इसने यह संकेत भी दिए कि भाजपा की भारी जीत के बावजूद इसका मुख्य जनाधार पहले के चुनावों की तरह अब भी करीब 22 फीसदी के आसपास ठहरा हुआ है. आम चुनावों में निर्णायक अंतर पहली बार वोट डाल रहे 4 करोड़ मतदाताओं की वजह से आया था, जो भाजपा की विकास संबंधी लफ्फाजी और रणनीतिक रूप से छिपा कर रखे हुए हिंदुत्व की वजह से उसकी तरफ आकर्षित हुए थे. उपचुनावों ने साफ तौर से यह जाहिर किया कि उन्होंने भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति को नकारा है. अगर भाजपा इसे नजरअंदाज करेगी तो वह खुद अपनी कब्र खोदेगी, लेकिन जिस मुद्दे पर इसे जरूर ही आत्मविश्लेषण करना चाहिए, वह यह है कि इसका सांप्रदायिक मुद्दा भविष्य के लिए कितना व्यावहारिक है.

हिंदुत्ववादी हेराफेरी

दूसरे अनगिनत मुद्दों पर भाजपा के लफ्फाजी से भरे हुए दिखावे के बावजूद, अपने मातृ संगठन आरएसएस से विरासत में हासिल किया हुआ हिंदुत्व इसकी बुनियादी विचारधारा है. संघ परिवार इसके बारे में चाहे जितनी गोल-मोल बातें, हिंदुत्व और कुछ नहीं बल्कि ऊंची जाति के कुलीनों द्वारा अपने नस्ली प्रभुत्व को फिर से हासिल करने की योजना है. भारत अंतर्विरोधों की जमीन है, जहां सबसे जमीनी स्तर पर भाषा अपने अर्थ खो देती है, जहां आजादी का मतलब गुलामी हो सकता है, जहां साम्राज्यवाद का मतलब साम्राज्यवाद-विरोध हो सकता है, जहां स्वराज का मतलब बंधुआगिरी हो सकती है और राष्ट्रीय का मतलब राष्ट्र-विरोधी हो सकता है. इसमें और भी चीजें जुड़ सकती हैं, जो इस पर निर्भर करता है कि आप किस जातीय समूह से जुड़े हुए हैं. 1818 में पेशवाई के पतन ने पुणे के चितपावनों को भारी सदमा पहुंचाया, जिसने उनमें से अनेक को ब्रिटिशों के खिलाफ हथियार उठाने को प्रेरित किया. पारंपरिक रूप से इसे एक साम्राज्यवाद-विरोधी और क्रांतिकारी कदम माना जाता था, लेकिन असल में यह एक साम्राज्यवादी और प्रतिक्रियावादी कदम था, जिसे उन्होंने बुनियादी तौर पर अपना खोया हुआ राज हासिल करने के लिए उठाया था. क्योंकि अगर वे साम्राज्यवाद-विरोधी होते तो यकीनन उन्होंने अपनी दो तिहाई जनता के  हर कदम पर होने वाले जातीय उत्पीड़न पर गौर किया होता. ‘हिंदुत्व’ के जनक विनायक दामोदर सावरकर इन ‘वीर क्रांतिकारियों’ में आखिरी थे, जिन्होंने अपने लोगों को संगठित होने और उनके सपनों के लिए काम करने का विचारधारात्मक आधार मुहैया कराया. इसमें उनका ‘अन्य’ मुसलमानों और ईसाइयों को बनना था, जो मुख्यत: निचली जातियों से आते हैं. 1920 के दशक में महाराष्ट्र में दलितों के जो शुरुआती आंदोलन उभरे, उनसे पैदा हुए संभावित खतरे ने भी उनको संगठन के एक फासीवादी स्वरूप में संगठित होने की तरफ धकेला. इस तरह आरएसएस पैदा हुआ.

यूरोप का फासीवाद और नाजीवाद उनकी प्रेरणा रहे हैं. गोलवलकर के विचार-रत्नों की एक झलक देखने भर से पता चलता है कि वे कितने खतरनाक और छल-कपट से भरे हैं. यह महसूस करते हुए कि वे व्यापक जनता का ‘ब्राह्मणवादीकरण’ किए बिना आगे नहीं बढ़ सकते, इसलिए उन्होंने अनेक ऐसे संगठनों का एक फंदा बनाया, जो ज्यादातर सामाजिक समूहों की जरूरतों को लगातार पूरा करता रह सकता था. इस तरह समय बीतने के साथ, वे आदिवासियों, दलितों और पिछड़ी जातियों के बड़े तबकों का ब्राह्मणवादीकरण करने में कामयाब रहे. एक तरफ जबकि दूसरी छोटी दलित जातियां आसानी से ही इस फंदे में आ गईं, अब तक ब्राह्मणवाद के कटु आलोचक रहे आंबेडकर के अनुयायियों को सामाजिक समरसता मंच के जरिए इस जाल में फांसा गया. आज भाजपा की झोली में सबसे ज्यादा अनुसूचित जातियों/जनजातियों के सांसद और विधायक हैं. एक तरफ जबकि संघ परिवार को अपनी ऐसी चालबाजियों में कामयाबी इत्तेफाक से इसके लिए अनुकूल, नवउदारवादी दौर में हासिल हुई है, वहीं इसके भीतरी अंतर्विरोध भी इस तरह विकसित हुए हैं, कि वे उसके उभार और अस्तित्व को सीमित कर रहे हैं. इसे यह महसूस नहीं होता है कि ये अंतर्विरोध बुनियादी रूप से उसकी विचारधारात्मक उद्देश्य की अस्पष्टता से पैदा हुए हैं. हिंदू, हिंदूवाद, हिंदुत्व, हिंदुस्तान: इसकी यह पसंदीदा शब्दावली असली लग सकती है, लेकिन बुनियादी रूप में ये अवास्तविक और धुंधली है. उनका न तो इतिहास में कोई वजूद था और न ही कहीं और.

हिंदू, हिंदुत्व, हिंदुस्तान

संघ के मुखिया मोहन भागवत का तरीका दो अलग अलग चीजों को बेहद सरलीकृत तरीके से आपस में जोड़-तोड़ कर उनसे एक मनमाना नतीजा निकालने का है. इसके तहत वे कहते हैं कि भारत हिंदुस्तान था, हिंदुस्तान के लोग हिंदू हैं और इस तरह भारत हिंदू राष्ट्र है. उन्हें शायद ही यह बात समझ में आई हो कि उन्होंने न केवल एक बेवकूफी की बात कह दी है, बल्कि वे जिस डाल पर बैठे हैं उसी को काट रहे हैं. क्योंकि इसका सीधा मतलब यह है कि अगर भारत पहले से ही एक हिंदू राष्ट्र है, तो उनका अभियान तो पूरा हो चुका है और इसलिए अब उन्हें अपनी दुकान बंद कर देने की जरूरत है. कोई भी देख सकता है कि संघ परिवार के पूरे अभियान की जड़ें या तो अज्ञानता में धंसी हुई हैं या फिर झूठ-फरेब में. जिस पहचान पर वे इतराते फिरते हैं, वो अपने सबसे बेहतरीन रूप में विदेशियों द्वारा दिया हुआ नाम है और बदतरीन रूप में एक अपमानजनक संबोधन है. इनमें से पहली स्थिति के मुताबिक, हिंदू शब्द फारसी लोगों द्वारा स का गलत उच्चारण करते हुए उसे ह कहने से पैदा हुआ, जो सिंधु नदी के पार रहने वाले लोगों के बारे में बताना चाहते थे. हालांकि यह एक लोकप्रिय धारणा है, लेकिन इसमें आलोचनात्मक नजरिया नहीं है और इसकी पुष्टि मुमकिन नहीं, क्योंकि फारसी भाषा में अनगिनत ऐसे शब्द हैं जो स से शुरू होते हैं (मसलन शिया, सुन्नी, शरीअत, साहिर, सरदार) और उनको सही-सही बोला जाता है. फारसी और तुर्क लोगों ने जिन अर्थों में हिंदू शब्द का इस्तेमाल किया है, वे अर्थ उनके शब्दकोशों में मिलते हैं और वे भागवत और उनके संघ परिवार के लिए भारी शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं. उन शब्दकोशों में हिंदू का मतलब चोर, डकैत, रहजनी करने वाला, गुलाम, हुक्म मानने वाला नौकर और काली चमड़ी वाला भी होता है, जैसा कि हिंदू-ए-फलक का मतलब ‘आसमान और शनि का कालापन’ से जाहिर होता है. हिंदू शब्द के अपमानजनक होने का एक और पता ‘हिंदू कुश’ से चलता है, जो मध्य एशिया की सरहद पर स्थित पर्वतीय श्रृंखला है और जिसका मतलब हिंदुओं का हत्यारा है. इनमें से चाहे जो भी मामला हो, यह शब्द संस्कृत में या भारत की किसी भी स्थानीय बोली और भाषा में नहीं मिलता. 


हिंदू का कभी भी कोई धार्मिक मतलब नहीं था. प्राचीन फारसी कीलाक्षर शिलालेख और जेंद आवेस्ता, हिंदू शब्द का हवाला किसी धार्मिक नाम के बजाए एक भौगोलिक नाम के रूप में देते हैं. जब फारस के राजा डेरियस प्रथम ने 517 ईसा पूर्व में भारतीय उपमहाद्वीप की सरहद तक अपनी सल्तनत का विस्तार किया, तो प्राचीन फारसी लोगों ने भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों का जिक्र ’हिंदू’ कह कर किया था. प्राचीन यूनानी और आर्मेनियाई लोगों ने भी यही उच्चारण अपनाया और इस तरह यह नाम चल पड़ा. जब बात हिंदूवाद की आई तो तिलक और राधाकृष्णन जैसे नायकों ने जो परिभाषा पेश की वह कोई परिभाषा ही नहीं थी. उसमें उन्होंने असल में हर चीज शामिल कर दी थी. आखिर में यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के पास आया, जिसे फैसला करना था कि हिंदूवाद क्या है. उसने 1966 में और फिर 1955 में इस पर फैसला दिया भी. स्वामीनारायण (1780-1830) के अनुयायियों द्वारा दायर किए गए मामले में उन्होंने दावा किया था कि वे लोग हिंदू नहीं हैं. ऐसा उन्होंने 1948 बॉम्बे हरिजन (टेंपल एंट्री) एक्ट को चुनौती देने के लिए किया था, जो दलितों को सभी मंदिरों में दाखिल होने का अधिकार देता है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राधाकृष्ण और कुछ यूरोपीय लोगों द्वारा दी गई परिभाषाओं का हवाला देते हुए, हिंदूवाद को इसकी सहिष्णुता और सबको मिला कर चलने के आधार पर परिभाषित किया. यह दिलचस्प बात है कि इसके पीछे असल में कुछ हिंदुओं द्वारा दूसरे हिंदुओं (दलितों) को अपने मंदिरों से बाहर रखने की इच्छा थी. संघ परिवार के दावों के उलट भारत में हरेक के हिंदू होने (या उसे हिंदू होना चाहिए) की बात कभी भी सच नहीं थी. वह सदियों पहले सिंधु घाटी और वेदों के दौर में सच नहीं थी, वह उत्तर भारत में शुरुआती आबादियों के बसने के बाद भी भारत के ज्यादातर हिस्सों के लिए सही नहीं थी, और यह बौद्ध धर्म के उदय के बाद तो यकीनन ही कभी सही नहीं रही.

भारत का विचार

यही मौका है जब संघ परिवार अपनी खामखयाली से बाहर आए और इतिहास के कुछ कठोर तथ्यों को समझे. वे जिस देश पर गर्व करने का नाटक करते हैं, उसे इंडिया या भारत कहा जाता है, हिंदुस्तान नहीं. यह उपनिवेशवादियों की देन है, यह अपनी इस शक्ल और आकार में इससे पहले कभी भी वजूद में नहीं था. जिन मुसलमानों से नफरत करना उन्हें पसंद है, वे तब से इस जमीन का हिस्सा हैं, जब आठवीं सदी में 17 बरस के मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर कब्जा किया और इस्लाम के विस्तार की राह खोल दी. ऐसा तलवार के दम पर नहीं हुआ, जैसा कि वे (संघ परिवार) यकीन करते हैं, बल्कि इसकी वजह यह थी कि उनके (संघ परिवार के) सनातन धर्म से सताई हुई निचली जातियों पर इस्लाम के बराबरी के पैगाम का असर हुआ था. बेहद समृद्ध इस विशाल उपमहाद्वीप में गुलामी का एक इतिहास रहा है, जिसके पीछे उनमें (संघ परिवार में) पाई जानेवाली श्रेष्ठतावादी सनक है और जिसका नतीजा आखिरकार भयानक तबाही वाले बंटवारे के रूप में सामने आया. इसके बाद भी, भारत में मुसलमानों की आबादी भारत को दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देशों में से एक बनाती है. संघ परिवार जिस भारतीय संस्कृति पर बेकार ही गर्व करता है, उसमें मुसलमानों का योगदान उनकी आबादी के लिहाज से कहीं ज्यादा व्यापक है. असल में भारत की ज्यादातर पुरातात्विक धरोहर मुसलमानों की ही बदौलत है. जिस ‘मेहराब’ के बारे में प्राचीन या यहां तक कि मध्यकालीन भारत तक में कुछ पता नहीं था, वह उन्हीं की देन है, जिसने इन धरोहरों को इस लायक बनाया कि भारत अब भी उन पर गर्व करता है. कला और संगीत में उनका योगदान भी कहीं ज्यादा है. फिर भारत को आधुनिकता और बुनियादी ढांचा उपनिवेशवादियों ने मुहैया कराया, हालांकि ऐसा करने के पीछे उनके अपने हित काम कर रहे थे. लेकिन उनकी जगह लेने वाले देशी हुक्मरान इसकी आखिरी बूंद तक निचोड़ लेने को बेताब हैं.


अच्छा होगा, अगर संघ परिवार यह समझ ले कि उनका ‘हिंदू’ का धंधा कभी कारगर साबित नहीं होने वाला है. वे जितना इस प्रभुत्ववादी मंसूबे को आगे बढ़ाएंगे, उतना ही वे लोगों को अपने से दूर करते जाएंगे. यह बेहतर होगा कि वे बाबसाहेब आंबेडकर की इस सलाह को सुनें, जिनको वे ‘प्रात:स्मरणीय’ मानते हैं:

‘हिंदुओं में उस चेतना की निहायत ही कमी है, जिसे समाजशास्त्री ‘कॉन्शसनेस ऑफ काइंड’ (समग्र वर्ग की चेतना) कहते हैं. हिंदू वर्ग चेतना जैसी कोई चीज नहीं होती. हरेक हिंदू में जो चेतना पाई जाती है, वह उसकी अपनी जाति की चेतना होती है. यही वजह है कि हिंदूओं से एक समाज या राष्ट्र बनने को नहीं कहा जा सकता.’

भारत का विचार इसकी जनता की बहुलता और विविधता का विचार है. सिर्फ इन्हीं शर्तों पर यह बहु-राष्ट्रीय देश वजूद में बना रह सकता है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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