हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जो नजरों से ओझल है: अरुंधति रॉय से एक बातचीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/18/2014 11:13:00 PM


जुलाई में जानीमानी कार्यकर्ता और लेखिका अरुंधति रॉय की इस बात पर कई हलकों में गुस्से की लहर दौड़ गई थी कि गांधी की आम तौर पर स्वीकृत छवि एक झूठ है. तिरुअनंतपुरम स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ केरल में अय्यनकली मेमोरियल व्याख्यान देते हुए अरुंधति ने यह भी कहा था कि गांधी के नाम पर बने संस्थानों का नाम बदल दिया जाना चाहिए. केरल में उठे इस विवाद से, जिसमें जुलूस, गिरफ्तारी की धमकी और गुस्से से भरे बयानों का सिलसिला चला, हिंदी की वह वैचारिक दुनिया लगभग अनजान रही, जिसने इससे महज दो-तीन महीने पहले ही डॉ. बी.आर. आंबेडकर की किताब एन्नाइहिलेशन ऑफ कास्ट की अरुंधति द्वारा लिखी प्रस्तावना पर एक लंबा विवाद देखा था. मार्च-अप्रैल के दौरान किताब की प्रस्तावना पर और फिर केरल में व्याख्यान पर हुए विवाद के दौरान जो मुद्दे उभरे, उनपर अरुंधति ने इस बातचीत में चर्चा की है. मलयाला मनोरमा ऑनलाइन के लिए लीना चंद्रन द्वारा हाल में की गई इस लंबी बातचीत को दो किस्तों में हाशिया पर पोस्ट किया जाएगा. आज पहली पहली किस्त. अनुवाद: रेयाज उल हक

मुझे लगता है कि गांधी वाला विवाद थोड़ी देर से उठा. अगर लोगों ने डॉ. बी. आर. आंबेडकर की किताब एन्नाइहिलेशन ऑफ द कास्ट के लिए आपकी लिखी गई प्रस्तावना, द डॉक्टर एंड द सेंट को गहराई से पढ़ा होता तो इस साल की शुरुआत में इसके प्रकाशन के फौरन बाद ही यह विवाद पैदा होना चाहिए था. असल में, आपने द डॉक्टर एंड द सेंट में जो विचार जाहिर किए हैं, उनकी तुलना में आपने तिरुअनंतपुरम स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ केरल के इतिहास विभाग में अय्यनकाली मेमोरियल लेक्चर में जो कुछ कहा, वह उतना भड़काऊ भी नहीं था...

मैं यह नहीं कहूंगी कि द डॉक्टर एंड द सेंट भड़काऊ है, हालांकि बेशक इस पर अनेक हलकों से अच्छी-खासी मात्रा में विवाद पैदा हुआ है. उन हलकों से भी, जिनसे इसकी उम्मीद नहीं थी. लेकिन यह सब अपेक्षित ही था, क्योंकि यह एक विवादास्पद मुद्दा है. तब भी, उसमें सोचने के पारंपरिक तरीकों पर सवाल किए गए थे, और ऐसा करने के लिए ज्यादातर गांधी के कम जाने गए लेखों का हवाला दिया गया था. यह आंबेडकर के एन्नाइहिलेशन ऑफ कास्ट की प्रस्तावना के रूप में लिखा गया था. आंबेडकर का नजरिया स्थापित व्यवस्था को बहुत मजबूती से और गहराई में जाकर चुनौती देता है. गांधी का नस्ल और जाति को लेकर जो नजरिया था, उस पर विवाद मेरे द डॉक्टर एंड द सेंट लिखने से बहुत पहले शुरू हो गया था. आप कह सकते हैं कि यह आंबेडकर-गांधी बहस के साथ ही शुरू हो गया था. दलित राजनीति की दुनिया में बरसों से यह बहस चली आ रही है – लेकिन इसे बहुत सावधानी से और बड़ी कामयाबी के साथ सत्ता प्रतिष्ठान के विमर्शों से बाहर रखा गया. अय्यनकली मेमोरियल लेक्चर के बाद केरल के मीडिया में मची खलबली उन लोगों द्वारा किया गया शोर-शराबा है, जिन्होंने कभी आंबेडकर की एन्नाइहिलेशन ऑफ कास्ट, या द डॉक्टर एंड द सेंट या ऐसी ही कोई चीज पढ़ने की जहमत नहीं उठाई. यहां तक कि उन्होंने गांधी का लेखन भी नहीं पढ़ा है, जिसका बचाव करने को वे इतने उत्सुक हैं. इस बहस में अनेक निहित स्वार्थ काम कर रहे हैं. उनसे बदलने की उम्मीद रखना शायद कुछ ज्यादा ही होगा. लेकिन नौजवान लोग अपना नजरिया बदलेंगे. यह तय है.

आपके ज्यादातर आलोचक कहते हैं, ‘अरुंधति हमारे गांधी के बारे में क्या जानती हैं? उन्हें क्या अधिकार है?’ माना, आप जोरदार तरीके से गांधी के लेखन में से हवाला देती हैं, लेकिन आपने इस इंसान के पूरे लेखन का कितने विस्तार से और कितनी गहराई से पड़ताल की है? आपने किस तरह का शोध किया है? क्या आप इसके बारे में थोड़े विस्तार से बताएंगी कि आपने आंबेडकर को सीखने और गांधी को भुलाने की शुरुआत कैसे की?

‘हमारे गांधी?’ और यह अरुंधति कौन है? क्या इस धरती से बाहर का कोई जीव, जिसके पास वैसे अधिकार नहीं हैं, जैसे गांधी पर ‘मिल्कियत’ जतानेवालों के पास हैंॽ क्या यही लोग, ठीक यही लोग ‘हमारे आंबेडकर’ कह सकते हैं? बल्कि इसके उलट, मुझे कहने दीजिए: द डॉक्टर एंड द सेंट न तो समग्र गांधी और न ही समग्र आंबेडकर के बारे में. यह आंबेडकर और गांधी के बीच चली बहस के बारे में है. मैंने इसे लिखने से पहले आंबेडकर और गांधी के लेखन पर महीनों तक शोध और अध्ययन किया. मैंने शुरुआत गांधी द्वारा 1936 में एन्नाइहिलेशन ऑफ कास्ट को खारिज किए जाने से की. और फिर मैं जाति और नस्ल की उनकी हिमायत का सिरा पकड़ कर आगे बढ़ी, जो दक्षिण अफ्रीका तक जाता था. (मैंने दक्षिण अफ्रीका में कुछ समय बिताया) मैं जो पढ़ रही थी, उससे मुझे बहुत धक्का लगा था और मुझे इससे भी ज्यादा धक्का इस बात से लगा कि किस कामयाबी के साथ गांधी के ये बेहद परेशान कर देने वाले पहलू सार्वजनिक और ‘सत्ता प्रतिष्ठान’ के बुद्धिजीवियों की खोजी निगाहों से अनदेखे गुजर गए. मैंने यह महसूस किया कि मैं जो करना चाहती थी, उसे करने का अकेला उपाय यही था कि जितना ज्यादा मुमकिन हो सके, खुद गांधी के शब्दों का ही उपयोग किया जाए – अपनी टिप्पणियों और विश्लेषण को कम से कम रखा जाए. बेशक इसका नतीजा यह हुआ कि यह एक लंबी, करीब-करीब किताब जैसी एक प्रस्तावना बन गई. इसमें जो कुछ भी है, वह बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है. इसलिए हर तरह की प्रतिक्रियाएं आईं- खुले दिल से अपनाने और बेहद प्यार दिखाने से लेकर, गुस्से से भरी हुई प्रतिक्रियाएं, जो अंदाजे से परे थीं. कुछ ने इस बात के लिए आलोचना की कि मैंने आंबेडकर से ज्यादा गांधी के बारे में लिखा है. यह एक जायज मुद्दा है, लेकिन इसको लेकर मेरी दलील यह है कि जब तक हम उस पर्दे को तार-तार नहीं कर देंगे, जो आंबेडकर की स्पष्टता को धुंधला बनाने के लिए गांधी ने तान रखा था, तब तक हम अंधेरे में ही टटोलते रहेंगे. यही आंबेडकर की दलील भी थी, जब उन्होंने एन्नाइहिलेशन ऑफ कास्ट के बारे में आई सारी प्रतिक्रियाओं में से गांधी की प्रतिक्रिया को जवाब देने के लिए चुना. किताब के बारे में जो भी विवाद पैदा हुए – जिनसे बचा नहीं जा सकता था – उनमें से कुछ मेरे बारे में हैं, मेरे अपने बारे में, मेरी मंशा, मेरी प्रेरणा और राजनीतिक हमदर्दी, मेरी जाति, मेरे घर के पते के बारे में – न कि उस पर जो मैंने लिखा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है, हालांकि इसकी पूरी संभावना थी और मैं अब ऐसी चीजों की आदी हो गई हूं. मैं एक आसान निशाना हूं – मशहूर होना दोनों पक्षों पर असर डालता है. यह मुझे और मेरे आलोचकों दोनों को ही ताकत देता है. मेरी किताबों की रॉयल्टी मुझे धनी और आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाती है – इसलिए गैरबराबरी के बारे में लिखने की मैं जुर्रत कैसे करती हूं? मैं एक ‘अच्छी औरत’ नहीं हूं, मुझे देख कर नहीं लगता कि मैंने अच्छे से दुख झेला है. मैंने पहले से चली आ रही तयशुदा तरीके की जिंदगी को अपनी मर्जी से कबूल नहीं किया है – इसलिए मुझे उन चीजों पर लिखने का क्या हक है, जिन पर मैं लिखती हूं? किस्मत से, मुझे किसी से भी कोई नैतिक चरित्र प्रमाण पत्र नहीं चाहिए. बुनियादी बात यह है कि मैंने जो लिखा है, पाठक उसे पढ़ने और उसके साथ बौद्धिक रूप से जुड़ने का विकल्प चुन सकते हैं या उसे छोड़ सकते हैं. बाकी सब बेवजह का शोर-शराबा है.

नवयान द्वारा प्रकाशित आंबेडकर के एन्नाइहिलेशन ऑफ कास्ट के संपादक एस. आनंद ने दस साल पहले आपसे एक प्रस्तावना का अनुरोध किया था. आप राजी हो गई थीं और आपने शोध और अध्ययन शुरू कर दिया था. क्या तब आपने महात्मा के योगदान पर पुनर्विचार शुरू किया?

आंबेडकर ने बहुत मजबूत और गंभीर तरीके से मेरी समझदारी को और गहरा बनाया और मेरी सोच को समृद्ध किया. उन्होंने हमें वे औजार दिए हैं, जिनसे हम उस समाज को समझ सकते हैं और उसका विश्लेषण कर सकते हैं, जिसमें हम रहते हैं. वे एक रेडिकल चिंतक थे, और वे निडर थे. गांधी की शोहरत और भारी प्रभुत्व के दिनों में उन्होंने जिस तरह गांधी को आड़े हाथों लिया, वह एक परिघटना थी. उन्होंने गांधी और कांग्रेस के बारे में बहुत लिखा क्योंकि इन दोनों ने चालाक और जटिल तरीके से आंबेडकर की राह रोकने की कोशिश की थी. आंबेडकर को पढ़ते हुए मैं गांधी के बारे में उन बनी बनाई धारणाओं से आजाद हुई, जिनके साथ हममें से अनके लोग बड़े होते हैं. हालांकि अभी आंबेडकर की विरासत भारी खतरे में है. एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट, हिंदूवाद (हिंदुइज्म) का विद्वत्तापूर्वक खंडन करता है. आंबेडकर चाहते थे कि उनके लोग हिंदूवाद को नकारें. लेकिन आज, बड़ी तेजी से दलितों का ‘हिंदूकरण’ और ‘संस्कृतीकरण’ किया जा रहा है. यह नई सरकार आंबेडकर का दुस्वप्न रही होती. ‘अशुद्धों’ को हिंदू घेरे में लाने के लिए एक नए शुद्धि आंदोलन का ऐलान किया गया है. आरएसएस प्रमुख ने घोषणा की है कि सारे भारतीय हिंदू हैं. यह बहुत परेशान करने वाला है.

क्या गांधी पर ‘पुनर्विचार’ करने में आपकी मूर्तिभंजक मां मेरी रॉय का कोई असर रहा है? मैं यह बात खास तौर से पूछ रही हूं, क्योंकि हम जिन बातों को सीखते हुए बड़े होते हैं, उनको बदलना हमेशा ही खासा मुश्किल होता है.

मेरी मूर्तिभंजक मां हमेशा से ही गांधी की बड़ी प्रशंसक रही हैं. इसलिए द डॉक्टर एंड द सेंट लिखने में उनकी कोई भूमिका नहीं है. मैं अपनी कहूं तो अभी मैंने जो कुछ पढ़ा, उसके पहले मैं सोचती थी कि गांधी एक चालाक, लेकिन मंजे हुए और कल्पनाशील राजनेता थे. उनके बारे में दो बातों ने मुझे हमेशा गहराई से परेशान किया – उनमें से एक बात थी, औरतों और सेक्स को लेकर उनका रवैया, जिस पर अलग से एक पूरी किताब लिखी जाने लायक है और दूसरी बात थी दलितों को ‘हरिजन’ कहना, जो मुझे घिनौनी और सरपरस्ती से भरी बात लगती थी.

लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि गांधी ने आपको पूरी तरह निराश किया? क्या गांधी में ऐसी एक भी खूबी नहीं है जिसकी आप तारीफ करती हों?

गांधी एक आकर्षक किरदार थे, जिन्होंने अपने जीवनकाल में लोगों की कल्पना को अपने वश में कर लिया था और अभी भी जनता को सम्मोहित करते हुए लगते हैं. मैं नहीं सोचती कि जिन्होंने द डॉक्टर एंड द सेंट पढ़ा है वे यह नतीजा निकालेंगे कि यह आंबेडकर के बारे में एक गैर आलोचनात्मक और भक्ति-भाव से लिखी गई कोई जीवनी है और गांधी की कठोर आलोचना है. हैरानी की बात यह है कि कुछ हलकों में, गांधी की तारीफ करने के लिए मेरी आलोचना की गई – हालांकि ऐसा लगता है कि उन्होंने भी किताब नहीं पढ़ी है. वे कहते हैं कि मैंने गांधी को संत कहा है, वे इसमें छुपी हुई विडंबना को पकड़ नहीं पाए, जिसे इस बात के जरिए जाहिर करने की मेरी मंशा थी. उनसे यह बात भी पकड़ में नहीं आई कि आंबेडकर अक्सर गांधी को व्यंग्य से संत कहते थे. फिर कुछ ऐसे लोग भी हैं – और गौर कीजिए कि सिर्फ दलित ही नहीं, कुछ ब्राह्मण भी – जो यह मानते हैं कि आंबेडकर की किसी रचना की प्रस्तावना लिखने का अधिकार किसी भी गैर-दलित को नहीं है. वे इसे प्रभुत्वशाली जाति से आने वाले किसी इंसान द्वारा आंबेडकर को ‘हड़पे जाने’ के रूप में देखते हैं. लेकिन अगर व्यापक रूप से देखा जाए तो कुल मिलाकर, तो यह सारी बहस, सारे इल्जाम और इशारों-इशारों में कही गई बातें, यहां तक कि केरल में फूट पड़ा गुस्सा, गिरफ्तारी की धमकियां, जुलूस, यह आखिरकार एक अच्छी चीज है – हालांकि कभी कभी इससे दुख होता है. हम सभी में हजारों बरसों के संस्थागत पूर्वाग्रह भरे हुए हैं. उन्हें बाहर निकालना ही होगा, और यह प्रक्रिया खूबसूरत नहीं होगी. हममें से कोई भी शुद्ध नहीं है, हममें से कोई परिपूर्ण नहीं है, कोई भी पाठ (रचना) पूरी तरह सही या आलोचना से परे नहीं है. हमारे पास विकल्प यह है कि हम एक अपूर्ण राजनीतिक एकजुटता के लिए एक दूसरे के साथ मिलकर खड़े हों या फिर अपने को अपनी अपनी खंदकों में बंद करते हुए एक दूसरे से अलग-थलग कर लें, और खुद के श्रेष्ठ और सही होने की अपनी ही रची हुई धारणा में सिमट कर जाएं.

इस पर गौर करना दिलचस्प है कि आपने स्वामी विवेकानंद को भी नहीं छोड़ा. द डॉक्टर एंड द सेंट में आपने खुद उनकी बात का हवाला दिया है, जिसमें उन्होंने अछूतों के धर्मांतरण को हतोत्साहित किया था. लेकिन क्या यह हवाला संदर्भ से बाहर जाकर नहीं दिया गया थाॽ

नहीं. ऐसा नहीं था. स्वामी विवेकानद ने जो कहा था, वह आबादी की बनावट के बारे में प्रभुत्वशाली जाति की बेचैनी की राजनीति का हिस्सा था, जो तब बदलनी शुरू हुई थी. यह उस बात की पैदाइश थी, जिसे आज हम हिंदुत्व की शक्ल में जानते हैं.

लेकिन गांधी और केरल में अछूतों के नेता अय्यनकली के बीच उनके योगदानों के आधार पर तुलना कितनी व्यावहारिक हैॽ अय्यनकली का काम और उनका प्रभाव एक क्षेत्रीय परिघटना थी.

उनकी तुलना क्यों नहीं की जाएॽ यह इतना अपवित्र क्यों हैॽ अय्यनकली ने 1904 में पुलय बच्चों के स्कूल में पढ़ने के अधिकार की लड़ाई लड़ी थी. उन्होंने पहली खेतिहर हड़ताल की थी और वह कामयाब रही थी – यह बात रूसी क्रांति से भी पहले की बात है. उन्हीं दिनों गांधी दक्षिण अफ्रीका में काले अफ्रीकियों और दबा कर रखी गई जातियों के भारतीय मजदूरों के बारे में सबसे आपराधिक बयान दे रहे थे. त्रिवेंद्रम में मैंने यह कहा कि कैसे गांधी जाति व्यवस्था में यकीन रखते थे. मैंने 1936 के उनके एक असाधारण निबंध ‘द आयडियल भंगी’ में से हवाला दिया, जिसमें वे खानदानी और परंपरागत काम-धंधों की खूबी के बारे में अपने नजरिए पर रोशनी डालते हैं. निजी तौर पर, मैं सोचती हूं कि यह गंभीर किस्म की हिंसा है. मैंने इसके बारे में कहा कि हमें इस पर सोचना चाहिए कि हमें इन दो तरह के लोगों में से किसके नाम पर विश्वविद्यालयों के नाम रखने चाहिए. क्या यह गलत हैॽ

‘यथास्थिति का संत’, ‘सबसे मशहूर भारतीय’, ‘अब तक आधुनिक दुनिया द्वारा जाना गया सबसे मंजा हुआ राजनेता’...आपने महात्मापन पर सवाल खड़े किए. लेकिन अगर हम यह बारीकी से देखें कि कैसे कई दशकों के दौरान गांधी का विकास हुआ, तो क्या उनमें सुधार की प्रक्रिया नहीं दिखतीॽ क्या आप ये कहना चाहती हैं कि वह सब एक भव्य छलावा थाॽ आपके आलोचकों ने इस तरफ ध्यान दिलाया है कि गांधी की शुरुआती जिंदगी में कही गई बातों का हवाला देना एक भारी नाइंसाफी है, जब महात्मा कम महात्मा थे.

मेरे आलोचकों ने जो सवाल मेरे सामने रखे हैं, लिखने से पहले मैंने अपने सामने उन सवालों रखा था. क्या गांधी बदलेॽ क्या उनमें कोई विकास हुआॽ क्या उन्होंने जाति पर अपने नजरिए और अपने कामों को छोड़ाॽ इस मुद्दे के साथ इंसाफ करने के लिए ही मैंने उनकी पूरी वयस्क जिंदगी में शुरू से लेकर अंत तक के लेखों और भाषणों का हवाला दिया– 1890 के दशक की शुरुआत में दक्षिण अफ्रीका पहुंचने से लेकर 1946 तक जब वे एक बुजुर्ग इंसान थे. केरल यूनिवर्सिटी की अपनी बातचीत तक में मैंने 1894 में कही गई उनकी बात और फिर 40 साल के बाद 1936 में कही गई उनकी बात का हवाला दिया, जब उन्होंने ‘द आयडियल भंगी’ लिखी थी – तब वे करीब 70 साल के थे.

अगला इल्जाम ये है कि गलत संदर्भ में हवाले दिए गए हैं. मैं यह जानना चाहूंगी कि किस संदर्भ में काले अफ्रीकियों को गंदे ‘जंगली’ कहना और दबा कर रखी गई जातियों के भारतीय मजदूरों को, जिनका ‘नैतिक स्वभाव नष्ट हो गया है,’ जन्मजात झूठा कहना कबूल किए जाने लायक हैॽ किस संदर्भ में यह कहना कबूल किया जा सकता है कि मैला साफ करने वालों की आने वाली पीढ़ियों को भी मैला साफ करते रहना चाहिएॽ आप पूछती हैं कि क्या गांधी एक भव्य छलावा हैंॽ गांधी का सारा लेखन सार्वजनिक रूप से संकलित और उपलब्ध है. उनको संपादित नहीं किया गया या उनसे छेड़छाड़ नहीं की गई है. इसलिए उस मोर्चे पर कोई छलावा नहीं है. लेकिन हां, जिस तरह गांधी की विरासत को सार्वजनिक खपत के लिए तैयार करके परोसा गया है, उसमें भारी बेईमानी की गई है. जिन चीजों को निखार कर पेश किया गया है और जो चीजें छुपा दी गई हैं, वे विचलित करने वाली हैं और यह सोची-समझी बेईमानी भरी राजनीति है.

गांधी के बचाव में तीसरी बात यह कही जा रही है कि वे ‘अपने समय के इंसान’ थे और हम राजनीति और सामाजिक न्याय की अपनी समकालीन समझ को एक ऐसे इंसान पर नहीं थोप सकते जो एक सदी से भी ज्यादा पहले हुआ हो. मैंने द डॉक्टर एंड द सेंट में इसका भी जवाब दिया है और मैंने पाठकों का ध्यान पंडिता रमाबाई, जोतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे लोगों के कामों की तरफ दिलाया है, जो गांधी से भी पहले हुए थे. फिर पेरियार, अय्यनकली, श्री नारायण गुरु और दूसरे देशों में उनके समकालीनों का कहना ही क्या.

बेताल फिर उसी डाल पर

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/17/2014 07:57:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े

भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने मुंबई के जेवियर कॉलेज के छात्रों के खिलाफ एक लिखित चेतावनी जारी की, क्योंकि उन्होंने अपने वार्षिक आयोजन मल्हार में कबीर कला मंच की गायिका शीतल साठे को बुला लिया था. कबीर कला मंच पुणे के दलितों और मजदूर वर्गों के बीच काम करने वाला एक सांस्कृतिक संगठन है, जिसे राज्य ने नक्सलवादी संगठन के रूप में प्रचारित कर रखा है. महाराष्ट्र पुलिस ने ऐलान किया कि वे सुरक्षा मुहैया नहीं कराएंगे. इसके बाद शीतल को उस पैनल से अपना नाम वापस लेना पड़ा, जिसे 14 अगस्त को ‘इनविजबिलटी ऑफ कास्ट’ पर चर्चा करनी थी.

एक तरफ जबकि नरेंद्र मोदी, संप्रग दो के दौरान मनमोहन सिंह के नाकाम रहने के बाद, कांग्रस के नवउदारवादी विकास के एजेंडे को पूरा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ अपनी हैरान कर देने वाली जीत के नशे में मदहोश हजार सिरों वाले संघ परिवार ने इस तरह की बदमाशी भरी हरकतों के जरिए हिंदुत्व के अपने एजेंडे पर अमल शुरू कर दिया है. अगर इनमें से कुछ हरकतों को आने वाले विधान सभा चुनावों के लिए अपनाई गई एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा भी मान लिया जाए तब भी यह बात कही जा सकती है कि इनमें से ज्यादातर हरकते परिवार के घटकों के लिए बहुत ही स्वाभाविक हैं, जो मौजूदा राजनीतिक हालात में अपने सपने को पूरा होते हुए देख रहे हैं. यह उनके ‘हिंदू राष्ट्र’ को हासिल करने का मौका है, चाहे इसका जो भी मतलब हो. दिलचस्प बात यह है कि उनके सरसंघचालक मोहन भागवत के मुताबिक भारत पहले से ही एक हिंदू राष्ट्र है. उन्होंने यह तय कर दिया है कि यह देश हिंदुस्तान था और इस तरह यहां रहनेवाले सभी लोग हिंदू थे. अगर ऐसा है तब तो यह सवाल बनता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का अभियान तो पहले ही पूरा हो चुका है, या शायद यह शुरुआत से ही गलत समझ पर आधारित था. फिर इस संगठन के अस्तित्व के पीछे क्या तर्क है? क्या वे इसे भंग करके हमेशा के लिए रिटायर होने वाले हैं? भागवत को कम से कम यह तो करना ही चाहिए कि उन्हें संघ परिवार की बदमाशियों को आगे से बंद कर देना चाहिए कि कहीं वे मोदी की घातक कमजोरी और भाजपा के लिए आत्मघाती न बन जाएं.

हिंदुत्व और नवउदारवाद

हिंदुत्व और नवउदारवाद, इन दोनों एजेंडों का आपस में कोई विरोध नहीं है, बल्कि अगर उनको ठीक से साधा जाए तो वे एक दूसरे के पूरक हैं. एक दक्षिणपंथी कट्टरपंथी विचारधारा के रूप में हिंदुत्व वैश्विक रुझान का हिस्सा है, जिसका संबंध नवउदारवाद से है. दुनिया भर के अनेक विद्वानों ने नवउदारवाद और दक्षिणपंथी धार्मिक कट्टरतावाद के उभार के बीच रिश्तों को दर्ज किया है. हिंदुत्व की तरह नवउदारवाद के भी अनेक चेहरे हैं, जो इसकी बुनियादी अंतर्वस्तु को छुपाने का काम करते हैं. हिंदुत्व की बुनियादी अंतर्वस्तु को जिस तरह ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें बार बार आर्यवर्त के मिथकीय वैभव की दुहाई दी जाती है, नवउदारवाद को इसके अत्यंत व्यक्तिवादी और सामाजिक डार्विनवादी तौर तरीकों में देखा जा सकता है. इस तरह जनता की व्यापक बहुसंख्या के लिए नवउदारवाद ढांचागत और सांस्कृतिक संकट पैदा करता है. ऐसी स्थिति में यह व्यापक बहुसंख्या निजी स्तर पर किसी अदृश्य शक्ति में सुरक्षा खोजती है और सामूहिक रूप से किसी एक ‘अन्य’ की कल्पना करती है जो उसकी तकलीफों के लिए जिम्मेदार है. शासक वर्ग इस प्रक्रिया का फायदा उठाता है जिसे लोगों को बांटे रखने और उनका ध्यान भटकाए रखने की जरूरत होती है ताकि उसका खेल चलता रहे. मोटे तौर पर यही प्रक्रिया पिछले तीन दशकों के दौरान दुनिया के हर हिस्से में पुनरुत्थानवादी और कट्टरपंथी विचारधाराओं के उभार में निहित है.

हालांकि इस प्रक्रिया से सावधानी से निबटने की जरूरत होती है, वरना यह नागरिक उपद्रव भड़का सकती है और शांति को भंग कर सकती है, जबकि नवउदारवाद से फायदा उठा रहे तबके यानी कारोबारी समुदाय और मध्य वर्ग शांति चाहते हैं. मोदी ने जिस तरह गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला और नवउदारवादी सब्ज बाग में सफलतापूर्वक बदला है, इससे उन्होंने साबित कर दिया है कि वे इस प्रक्रिया के उस्ताद हैं. यह उनकी महारत की ही निशानी थी कि उन्होंने पूरे नवउदारवादी खेमे को इसके लिए तैयार किया कि वे उन्हें देश के सबसे बड़े पद के लिए अपनी पसंद के रूप में पेश करें. वे यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि जिन वर्गों ने उनमें निवेश किया है, उनके प्रति उनका क्या कर्तव्य है. इससे भी बड़ी बात है कि उनके सामने कोई विपक्ष नहीं है, जिसकी वजह से उन्हें जनता का और अधिक ध्रुवीकरण करने की जरूरत नहीं है. हालांकि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक की छोटी सी अवधि में जिस तरह की घटनाएं घटी हैं और संघ परिवार की तरफ से जिस तरह की बयानबाजी चल रही है, वह इसके संकेत देती हैं कि जरूरी नहीं कि संघ परिवार के 180 संगठन, मोदी के विचार से सहमत हों. ये वे संगठन हैं, जिनको जान बूझ कर अलग अलग सुरों में बोलने के लिए ही गढ़ा गया है. उनमें से अनेक पूरे उत्साह से अपना रंग ढंग दिखाएंगे, जिसमें वे माहिर हैं, और यह अनिवार्य रूप से मोदी की रणनीति के आड़े आएगा.

जनादेश की गलत समझ

संघ परिवार को समझना चाहिए कि जिन लोगों ने मोदी को भारी जीत दिलाई है, वे लोग इसके अपने भरोसेमंद जनाधार के बाहर के हैं. कुल वोटों में भाजपा की हिस्सेदारी 1998 से लेकर अब तक 22 फीसदी के आसपास स्थिर बनी रही थी. इस बार 9 फीसदी की बढ़ोतरी ने हालात बदल दिए. पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा के लिए 10.27 करोड़ लोगों ने वोट डाला था, जबकि इस बार के चुनाव में 17.15 करोड़ लोगों ने. इस बार बढ़े कुल 6.85 करोड़ वोटों में, पहली बार वोट डाल रहे लोगों के 4 करोड़ वोटों ने (कुल 10 करोड़ में से) इस भारी कामयाबी में बड़ी अहम भूमिका अदा की है. इन नौजवानों का वोट भाजपा के लिए उतना नहीं था, जितना मोदी के लिए था (पूरा चुनावी अभियान राष्ट्रपति प्रणाली की तर्ज पर किया गया) और उनका वोट हिंदुत्व के लिए भी नहीं था बल्कि मोदी द्वारा की जा रही विकास की बड़ी-बड़ी बातों के लिए था, जिसमें सांप्रदायिक सुर या तो नदारद था या फिर उसे हल्का रखा गया था. इन मतदाताओं को भरोसा था कि मोदी ने गुजरात में विकास किया है, बावजूद इसके कि यह उजागर हो गया था कि मोदी के अनेक दावों की तरह यह दावा भी झूठा था. ये नौजवान मतदाता और इस बार पाला बदलने वाले 2.85 करोड़ मतदाता भी जाहिर तौर पर हिंदुत्वपरस्त नहीं थे. उन्हें यकीन था कि मोदी तरक्की के लिए मौके निर्मित करेंगे, महंगाई को कम करेंगे, नौकरियां बढ़ाएंगे. बल्कि वे लोग भाजपा की सांप्रदायिकता को लेकर बहुत संदेह में भी थे. अगर मोदी अपने वादों को पूरा नहीं करते हैं तो वे अगले चुनाव में आसानी से उनकी लुटिया डुबो सकते हैं. इसी तरह कॉरपोरेट भारत ने मोदी की हिमायत में अपना खजाना खोल रखा था, और वह नहीं चाहेगा कि सांप्रदायिक टकरावों से निवेश का माहौल बिगड़े. उनकी नाखुशी भाजपा के लिए आखिरी झटका साबित हो सकती है, जिसका जोखिम उठाने की स्थिति में अभी वह नहीं है. इसलिए मोदी के लिए यह जरूरी होगा कि वे विकास पर ही ध्यान केंद्रित रखें, जिसे वे ज्यादा बढ़िया जानते हैं, जैसा कि उनके अब तक के व्यवहार ने साफ दिखाया भी है.

इससे जुड़ी हुई, भाजपा की भारी जीत की एक वजह असल में जान बूझ कर नरम रखा गया हिंदुत्व का सुर भी था. हालांकि किसी को यकीन नहीं था कि मोदी आरएसएस के एजेंडे को ताक पर रख सकेंगे. बल्कि सभी मौकों पर मोदी ने खुद ही इस एजेंडे के सुर में सुर मिलाया, लेकिन ऐसा उन्होंने इतनी सावधानी से किया कि यह विकास संबंधी उनकी बातों को नुकसान नहीं पहुंचा दे. लोगों ने इसे एक चुनावी खेल समझ कर इसकी अनदेखी की कर दी, जिसे सारे दल ही खेला करते हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि चुनावी नतीजों की उमंग में गलती से पूरे संघ परिवार ने इसे अपने हिंदुत्व के लिए दिया गया जनादेश समझ लिया है. इसने बड़ी आसानी से भुला दिया है कि भाजपा का वोट प्रतिशत अब भी महज 31 फीसद है जिसका मतलब है कि बाकी के 69 फीसदी मतदाता कम से कम इसके पक्ष में नहीं हैं. ऐसा नहीं लग रहा है कि हिंदुत्व का यह उभार पूरी तरह रणनीतिक है और थोड़े समय के लिए रहने वाला है, और जिसका मकसद महज आगामी विधानसभा चुनाव हैं. अगर यह रणनीतिक भी हो तब भी यह जोखिम भरा है, क्योंकि इसने कुछ ही महीनों पहले जोर-शोर से दिए जा रहे विकास के संदेश का खंडन कर दिया है. चुनाव के बाद भारत के हिंदू राष्ट्र होने का शोर शराबा कट्टरपंथी हिंदुत्ववादियों को भले खुश कर दे, लेकिन यह बाकियों को पूरी तरह अलग कर देगा जिन्हें यह महसूस होगा कि उन्हें पिछले चुनावों में धोखा दिया गया.

सांप्रदायिक झलकियां

मोदी की भाषणबाजी के केंद्र में विकास के बने रहने के बावजूद भाजपा ने चुनावों के पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को एक कला के रूप में विकसित किया जिसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में लाया गया. हालांकि मोदी विकास के अगुआ की बड़ी सावधानी से बनाई गई अपनी छवि से चिपके रहे, लेकिन मोदी को उत्तर प्रदेश में शानदार जीत दिलाने की सारी कलाकारी मोदी के विवेकहीन विश्वासपात्र अमित शाह की थी, जिनके ऊपर गुजरात में हत्या के अनेक मुकदमे चल रहे हैं. प्रवीण तोगड़िया ने चुनावों के ऐन बीच में अपने गुंडों से कहा कि वे भावनगर के हिंदू इलाकों से मुसलमानों को निकाल बाहर करें. हालांकि तोगड़िया की मोदी से अच्छी नहीं बनती, लेकिन वे विश्व हिंदू परिषद के मुखिया होने के नाते परिवार में अहमियत रखते हैं और अपनी तीखी जुबान और उजड्ड हरकतों के लिए बदनाम हैं. इसी तरह भाजपा के एक और नेता, बिहार के गिरिराज किशोर ने बेलाग-लपेट यह ऐलान किया कि मोदी का विरोध करने वालों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए. हालांकि कई बार भाजपा इस तरह की खुलेआम सांप्रदायिक और असमर्थनीय टिप्पणियों से खुद को अलग करते हुए बयान जारी करती रही है, लेकिन वो यह जानती है कि एक बार लोगों का ध्रुवीकरण करने का मकसद पूरा हो जाए तो फिर ऐसे बयानों की कोई अहमियत नहीं होती है.

चुनावी नतीजों के बाद, हिंदुत्व ब्रिगेड द्वारा सांप्रदायिक हमलों में एक तेजी आई है. खुद को हिंदू राष्ट्र सेना कहने वाले एक अनजान से संगठन ने, जिसका मुखिया एक पेशेवर अपराधी धनंजय देसाई है, पुणे में अपनी बाइक पर घर लौट रहे एक मुस्लिम नौजवान मोहसिन शेख की पीट-पीट कर हत्या कर दी. सहारनपुर, मुरादाबाद और मेरठ में सांप्रदायिक आग भड़काई गई. इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी चार किस्तों में छपी रिपोर्ट में खबर दी कि 16 मई को चुनावी नतीजे आने के बाद के 10 हफ्तों में उत्तर प्रदेश पुलिस ने छोटे-मोटे 605 सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की हैं. जाहिर है कि उत्तर प्रदेश अकेला राज्य नहीं है. जिन राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं, शायद उन सभी राज्यों में यही हो रहा है. इन खुलेआम सांप्रदायिक उपद्रवों के अलावा, माहौल को सांप्रदायिक रूप से गरमाए रखने के लिए भीतर ही भीतर विवादों को भी हवा दी जा रही है. मिसाल के लिए द्वारकापीठ शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने एक विवादास्पद बयान जारी किया कि शिरडी के साईबाबा भगवान नहीं बल्कि एक मुसलमान संत थे और हिंदुओं को उनकी पूजा नहीं करनी चाहिए. यह खुशकिस्मती की बात है कि इसपर उन्हें ही लेने के देने पड़ गए, लेकिन फिर भी इससे सांप्रदायिक उथल-पुथल तो मच ही गई.

भारत के हिंदुस्तान होने और सभी भारतीयों के हिंदू होने जैसी बातों को बचकाना कह कर खारिज किया जा सकता है और इसे फौरन हंस कर टाला जा सकता है, लेकिन एक राष्ट्र के रूप में भारत की बुनियादी अवधारणा के लिए यह बात एक संभावित खतरा है. यह 1990 के आसपास भाजपा के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के हास्यास्पद बयान का ही ताजा रूप है कि सभी भारतीय हिंदू थे; मुसलमान अहमदिया हिंदू थे, ईसाई क्रिस्टी हिंदू थे और जैन-सिख-बौद्ध तो वैसे भी हिंदू थे क्योंकि आरएसएस के मुताबिक उनके धर्म हिंदू धर्म के पंथ भर हैं. 16 अगस्त के द हिंदू ने यह मजेदार खबर दी है कि गोवा की सत्ताधारी पार्टी, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) के विधायक लावू मामलेदार ने कहा, ‘बिकिनी पहनना भारत के महाशक्ति बनने की आकांक्षाओं में बाधक है’ और उन्होंने राज्य के लिए ‘निजी और भुगताने करके इस्तेमाल में लाए जाने वाले बिकिनी बीचों (समुद्र तटों)’ के लिए एक बिजनेस मॉल भी पेश किया. इसके बाद एमजीपी से जुड़े कैबिनेट मंत्री सुदिन धवलीकर ने इसे दोहराते हुए बिकिनी और पबों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की. इसके बाद उनके भाई और प्रदेश के सहकारिता मंत्री दीपक धवलीकर ने कहा कि मोदी भारत को एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बना रहे हैं. राज्य के उप मुख्यमंत्री फ्रांसिस डिसूजा (भाजपा) तो उनसे भी आगे निकल गए, जिन्हें यह मतिभ्रम है कि भारत ‘हिंदू राष्ट्र’ पहले ही बन चुका है और वे एक ‘ईसाई हिंदू’ हैं. लगभग इन्हीं दिनों फेसबुक इस्तेमाल करने वाले दो व्यक्तियों ने खुद को एक मामले में आरोपित पाया. गोवा पुलिस ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने मोदी पर एक संभावित नस्ली सफाए का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया है और दीपक धवलीकर का एक फर्जी फोटो प्रसारित किया जिसमें वे गुलाबी बिकिनी पहने हुए हैं. हालांकि इसी पुलिस ने मुतालिक के खिलाफ नफरत से भरे बयान देने पर शिकायत दर्ज करने से इन्कार कर दिया, जिसने हिंदुओं को तलवार और भगवत गीता से खुद को हथियारबंद करने की मांग की थी.

हम इन्हें क्या मानेंॽ क्या ये महज बदमाशियां हैं या यह भाजपा की आत्मघाती सहज प्रवृत्ति हैॽ



अनुवाद: रेयाज उल हक

यूपीए के कार्यकाल में साम्प्रदायिक दिमाग के विस्तार की वजहें

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/15/2014 09:06:00 PM


अनिल चमड़िया

1953 के मुकाबले 2013 तक दंगों के अपराध में 251 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरों का यह विश्लेषण हैं। दंगे के कई कारण होते हैं लेकिन भारतीय गणराज्य में सबसे बड़ा कारण धर्म आधारित साम्प्रदायिकता है। यह कई मौके पर स्वीकार किया जा चुका है कि यदि सरकार और उसकी मशीनरी का समर्थन नहीं हो तो न तो साम्प्रदायिक दंगे भड़क सकते है और भड़क भी जाए तो फैल नहीं सकते हैं। लालू प्रसाद यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अपने कलक्टर और एस पी को यह चेतावनी दी थी कि जिन इलाकों में साम्प्रदायिक दंगे होंगे वहां के इन प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारियों को दंडित किया जाएगा।दंगे नहीं हुए। राजनाथ सिंह ने संसद में उत्तर प्रदेश के अपने मुख्यमंत्रित्व काल के अनुभव के आधार पर कहा कि सरकार चाहे तो आधे घंटे से ज्यादा साम्प्रदायिक दंगे नहीं हो सकते हैं। इनके अलावा गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश के कई आई पी एस और आई ए एस अधिकारियों ने भी अपने प्रशासनिक अनुभव के आधार पर यह कहा है कि साम्प्रदायिक दंगे सरकारी मशीनरी और सत्ता की राजनीति की मिलीभगत से होते हैं।लगभग हर साम्प्रदायिक हमलों में सरकारी मशीनरी और राजनीतिक मिलीभगत के आरोप भी लगते भी रहे हैं।

सवाल यह है कि क्या महज सरकारी मशीनरी ही साम्प्रदायिक दंगे को रोक सकती है? क्या साम्प्रदायिक दंगे और ज्यादातर घटनाओं में साम्प्रदायिक हमलों को रोकने का औजार महज प्रशासनिक कल पूर्जे हो सकते हैं? या फिर साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में आम जागरूक लोग, स्थानीय स्तर पर सक्रिय संगठन, लोकतांत्रिक और मानवाधिकार आंदोलन के कार्यकर्ताओं आदि की ही भूमिका होती है और प्रशासनिक ईकाई उसमें सहायक होती है। वह सहायक भी इस रूप में कि वह महज अपनी कानून एवं व्यवस्था को लागू करने की जिम्मेदारी से साम्प्रदायिक दंगों के दौरान समझौता नहीं करें।

2013 में देशभर के सबसे ज्यादा साम्प्रदायिक हमले वाले राज्य उत्तर प्रदेश की सरकार साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए अपने स्तर के सभी प्रशासनिक उपाय करने का दावा करती है।लेकिन वहां साम्प्रदायिक दंगों व हमलों की घटनाओं को रोकने में भी मदद नहीं मिली और उससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात है कि घटनाओं से कई गुना ज्यादा साम्प्रदायिक दिमाग तैयार होने से नहीं रोका जा सका। साम्प्रदायिक दंगों को रोकना तो तत्कालिक तौर पर प्रशासनिक ईकाई का काम हो सकता है लेकिन साम्प्रदायिक दिमाग के बनने और उस तरह के दिमाग को बनाने की प्रक्रिया को रोकना उसके वश से बाहर होता है। वह केवल दंगाईयों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज कर सकता है, उन्हें हिरासत में ले सकता है और उनके खिलाफ अपने आरोपों को लेकर  न्यायालय में सुनवाई के लिए भेज सकता हैं। साम्प्रदायिक दिमाग के बनने से रोकने और उसे बनाने की प्रक्रिया को रोकने के औजार किसके पास होते है? रिकॉर्ड ब्यूरों यह आंकड़ा तैयार नहीं कर सकता है कि 1953 के बाद कितने साम्प्रदायिक दिमाग तैयार किए गए और उसकी पूरी प्रक्रिया क्या रही है।

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली दस साल की पिछली सरकार को धर्म निरपेक्षता के आधार पर जनादेश मिला था। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि पिछले दस वर्षों में साम्प्रदायिक घटनाएं भले ज्यादा नहीं हुई हो लेकिन उसी कार्यकाल में साम्प्रदायिक दिमाग का विस्तार तेजी से हुआ। 2014 के लोकसभा के चुनाव में मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों के आधार पर मतों के विभाजन की अपेक्षा साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण की ही स्थिति निर्णायक साबित हुई। यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि धर्म निरपेक्षता की वकालत करने वाली सरकार के कार्यकाल में साम्प्रदायिकता के दिमाग का विस्तार क्यों हुआ ? आखिर कांग्रेस और कई सहयोगियों के साथ चलने वाली उसकी सरकार अपनी प्रशासनिक दक्षता के दावे के बावजूद विचारधारा के स्तर पर उसे नहीं रोक सकी। क्यों पार्टी की विचारधारा स्थगित होने की स्थिति में थी?

दरअसल यूपीए-दो यानी मनमोहन सिंह को दूसरे कार्यकाल के लिए जनादेश मिलने का कारण यह नहीं था कि वह जिन आर्थिक नीतियों को लेकर वह चल रही थी लोग उसके समर्थन में थे। बल्कि उनके पहले के कार्यकाल में जिस तरह से साम्प्रदायिक दिमाग का विस्तार देखा जा रहा था उसके खतरे को लेकर देश के बहुसंख्यक लोकतांत्रिक संगठन और लोग सक्रिय हो गए थे। उन्होने यूपीए-दो को एक मौका देने की अपील की बावजूद इसके कि मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों को लेकर उनके बीच एतराज गहरे हुए थे। लेकिन मनमोहन सिंह को ये लगा कि दूसरी बार जनादेश उनके आर्थिक नीतियों के अच्छे परिणाम के कारण मिला हैं। दरअसल एक राजनीतिक्ष और नौकरशाह में फर्क यह होता है कि नौकरशाह समग्रता में विचारों और सामाजिक जीवन को नहीं देखता है।अर्थशास्त्री की तो खासतौर से यह दिक्कत होती हैं।मनमोहन सिंह आखिकार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा मनोनीत किए गए थे।नौकरशाह जन मानस और उसके दर्शन को भी नहीं समझ पाता है। यहां जगजीवन राम के उस वक्तब्य को दोहराना अच्छा होगा जिसमें उन्होने एक सभा में कहा था कि इस देश की जनता पेट की मार तो सह सकती है लेकिन पीठ की मार नहीं बर्दाश्त कर सकती है। यह उन्होने इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू करने की नासमझी के मद्देनजर कहा था। मनमोहन सिंह ने भी साम्प्रदायिकता को भारतीय समाज की पीठ पर मार के रूप में समझा ही नहीं।

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में यह हुआ कि समाज के सभी उन लोगों को देश के लिए सबसे ज्यादा आतंरिक खतरे के रूप में घोषित कर दिया जो कि लोकतांत्रिक विचारों के समर्थक थे,जन विरोधी नीतियों के विरोधी थे और साथ ही साथ साम्प्रदायिकता के भी विरोधी थे। उनके कार्यकाल में गैर सरकारी संगठनों को राष्ट्रद्रोही करार दिया गया।आंतरिक खतरे के आधार पर साम्प्रदायिकता के विचारों पर पलने वाले संगठनों तक से सत्ताधारी पार्टी की वैचारिक एकता हो गई।एक तरह से देखें तो साम्प्रदायिक विचारों पर फलने फूलने वाले संगठनों को छोड़कर बाकी सभी तरह की वैचारिक शक्तियों पर जेल में डाले जाने का खतरा मंडराने लगा। मनमोहन सिंह की सरकार के जाने के बाद नई सरकार को उन शक्तियों से निपटने के लिए ज्यादा कुछ नहीं करना है जो कि नई आर्थिक नीतियों की विरोधी रही हैं।यानी जमीन छिनें जाने, मजदूर कानूनों के खत्म किए जाने , कमजोर वर्गों के हक महसूस करने वाले कार्यक्रमों को खत्म करने आदि का विरोध करते रहे हैं। नई सरकार को केवल संसदीय प्रक्रिया पूरी करनी है। नए मजूदर कानून बनाने है , जमीन की नई बंदोबस्ती के लिए कानून बनाना है, न्यायापालिका को अपने विचारों का आईना बनाने के लिए संविधान में संशोधन की जरूरतों को पूरा करना है।

दरअसल साम्प्रदायिक दिमाग बनने से रोकने और उसे बनाने की प्रक्रिया को रोकने का प्रश्न लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा और अपने हितों के लिए संघर्ष की प्रक्रिया को सतत बनाए रखने से ही जुड़ा है। यहां बिहार के एक उदाहरण को ध्यान में रखा जा सकता है। बिहार में जिन किसानों व मजदूरों ने डा. जगन्नाथ मिश्र के मीडिया विरोधी विधेयक का विरोध करने के लिए पटना की सड़कों पर लाखों की संख्या में आई पी एफ के बैनर तले मार्च किया था, उन्हीं किसानों व मजदूरों ने 1990 के आसपास साम्प्रदायिकता के विरोध में  पटना की सड़कों पर मार्च करते हुए यह नारा लगाया था जो दंगा करवाएगा वह हमसे नहीं बच पाएगा। लालू यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अपने अधिकारियों को चेतावनी देकर जो दंगे रूकवाए वास्तव में दंगों को वहां के किसान मजदूर और लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं और सामान्य लोगों की चेतना के कारण रूका था। इस तरह लोकतांत्रिक और बराबरी के लिए आंदोलन साम्प्रदायिक दिमाग बनने से रोकते है और आंदोलनों के विषय साम्प्रदायिकता की प्रक्रिया को रोकती है।इसीलिए साम्प्रदायिकता के आधार पर सिसायत करने वाले संगठन वैसे आंदोलनों को कमजोर करने की हर संभव कोशिश करती है।

इसके उलट एक दूसरे उदाहरण को भी हम देख सकते हैं कि अस्सी के दशक में अहमदाबाद में एक टेक्सटाईल मिल बंद हो गया और वहां चालीस हजार मजदूर बेकार हो गए। उनमें ज्यादातर मजदूर पिछड़े, दलित और मुस्लिम थे। उनमें से ज्यादातर मजदूर  साम्प्रदायिकता की विचारधारा की तरफ चले गए और वे गुजरात में साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा किए गए आरक्षण विरोधी आंदोलन को भी भूल गए।यह साम्प्रदायिकता की विचारधारा की एक प्रक्रिया होती है कि वह लोकतांत्रिक और बराबरी के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक आंदोलनों को भूलकर अपने साथ दमन और शोषण के शिकार होने वाले लोगों को आने के लिए बाध्य कर देती है।

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में साम्प्रदायिक दिमाग को बनने और उसे बनाने की प्रक्रियों को रोकने वाली तमाम तरह की प्रक्रियाओं को बाधित किया गया।आज भी देश के जेलों में हजारों की संख्या में राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता बंद है।केवल झारखंड जैसे राज्य में छह हजार से ज्यादा ऐसे कार्यकर्ता जेलों में बंद हैं। जो समाज में बदलाव की प्रक्रिया चला सकते थे उन्हें आतंकित किया गया है।उन पर सत्ता के साथ साथ साम्प्रदायिक शक्तियों के भी हमले हुए हैं।ताजा हालात सभी के सामने हैं।लोकतांत्रिक आंदोलनों पर दमन की स्थिति में साम्प्रदायिकता के विस्तार को नहीं रोका जा सकता है। इंदिरा गांधी ने भी जब जब दमन का रास्ता अपनाया है तब तब साम्प्रदायिकता के दिमाग का ही विस्तार देखा जा सकता है। 1970,1975 और 1980 के आसपास के उनके कार्यकालों को यदि गहराई में जाकर अध्ययन करें तो वहां साम्प्रदायिक विचारधारा के विस्तार के संकेत मिलते हैं। दमन और साम्प्रदायिकता दो अलग अलग चीजें नहीं हैं। एक विचार है तो दूसरा उसका रूप हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों यदि देश में इस हद तक दंगों का विस्तार देख रहा है तो यह लोकतंत्र के विस्तार का परिचायक नहीं हो सकता है बल्कि आंतरिक तौर पर लोकतंत्र के दमन के विस्तार का रूप हैं। साम्प्रदायिकता के खिलाफ कामयाब आंतरिक लोकतंत्र के कार्यकर्ता और संगठन ही हो सकते हैं। 

‘इस्राइल को सिर्फ ताकत की जुबान ही समझ में आती है’ -श्लोमो जैंड

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/13/2014 12:30:00 PM


तेल अवीव यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर, अग्रणी इस्राइली इतिहासकार श्लोमो जैंड से यह बातचीत फ्रांसीसी पत्रिका तेलेरामा ने 2009 में की थी. लेकिन यह बातचीत आज भी गाजा में जारी इस्राइली हमलों का एक बहुत ताकतवर जवाब है. साथ ही, यह इस बात की निशानदेही भी है कि कैसे गाजा में, और पूरे फलस्तीन में समय बीत कर भी नहीं बीतता है. साल दर साल, दमन और कब्जे की वही कहानी दोहराई जाती रही है. अच्छी बात यह है कि फलस्तीनी जनता की मुक्ति संघर्ष और उसके प्रति दुनिया भर की जनता के समर्थन के संदर्भ में भी यही बात कही जा सकती है: यह समर्थन न सिर्फ बरकरार है, बल्कि बढ़ता जा रहा है. इस साक्षात्कार में गौर करने वाली बात जैंड द्वारा प्रस्तावित समाधान तथा फलस्तीनी जनता के संघर्ष को उनके द्वारा दिया जाने वाला अविराम समर्थन है. यहां प्रस्तुत है इस बातचीत का संपादित अंश. अनुवाद: रेयाज उल हक

सवाल: इस्राइल का जनमत गाजा युद्ध (2008-2009) की हिमायत करता है. आप एक ऐसी आवाज हैं, जो इससे मेल नहीं खाती...

जवाब: मैंने अपना अकादमिक करियर पूरा कर लिया है, मेरे पास खोने के लिए अब कुछ नहीं और मैं नहीं डरता. हां, बेशक मैं बहुत अकेला महसूस करता हूं. लेकिन मत भूलिए कि करीब दस हजार नौजवानों ने 3 जनवरी (2009) को तेल अवीव में प्रदर्शन किया है. यहां तक कि 2006 में भी हिज्बुल्ला के साथ जंग की शुरुआत में इतनी बड़ी गोलबंदी नहीं हुई थी. यह एक बहुत ही राजनीतिक प्रदर्शन था, जिसमें क्रांतिकारी वाम से लेकर तेल अवीव और जाफा में रहने वाले इस्राइली अरब तक शामिल हुए थे.

सवाल: वाम और यहां तक कि आमोस ओज और अव्राहम बी. येहोशुआ जैसे लेखकों तक ने इन बमबारियों को सही ठहराया है...

जवाब: यहां यह सामान्य है. 1973 के बाद से हरेक जंग की शुरुआत में इस्राइल को सभी जायनिस्ट वामपंथी बुद्धिजीवियों का पूरा समर्थन मिलता आया है. उनकी राय कुछ समय बीतने के बाद ही बदलती है. आज हमें महान दार्शनिक प्रोफेसर येशायाहू लेइबोवित्ज कमी बेहद महसूस हो रही है, जिनका 1994 में निधन हो गया. वे हमेशा इस्राइल के गैर रक्षात्मक युद्धों के खिलाफ लड़ते रहे और उनके नहीं रहने से एक नैतिक खालीपन भर बच गया है.

सवाल: यानी इस्राइल कोई रक्षात्मक युद्ध नहीं कर रहा? इस्राइली शहरों पर रॉकेट गिर रहे थे...

जवाब: बेशक यह सामान्य बात नहीं है कि इस्राइली पर रॉकेट गिर रहे हैं. लेकिन क्या यह कोई सामान्य बात है कि इस्राइल ने अब तक यह फैसला नहीं किया है कि उसकी सरहदें क्या हैं? जो राज्य इन रॉकेटों को बरदाश्त नहीं कर सकता, वही एक ऐसा राज्य भी है जो 1967 में जीते गए इलाकों को छोड़ना भी नहीं चाहता. इसने 2002 के अरब लीग के प्रस्ताव को ठुकरा दिया जिसमें वह 1967 से पहले की सरहदों के साथ इस्राइल को पूरी तरह मान्यता देने वाला था.

सवाल: लेकिन हमास इस्राइल को मान्यता नहीं देता.

जवाब: हमास ने, जो एक क्रूर तथा गैर कूटनीतिक आंदोलन है, गाजा और पश्चिमी तट में एक दीर्घकालिक युद्ध विराम की पेशकश की थी. इस्राइल ने इसे खारिज कर दिया, क्योंकि यह पश्चिमी तट में हमास के लड़ाकों की हत्या जारी रखना चाहता था. असल में इसने कई महीनों की शांति के बाद अक्तूबर-नवंबर (2008) में पंद्रह लड़ाकों की हत्या की. इस तरह रॉकेट हमलों के फिर से शुरू होने की कुछ जिम्मेदारी इस्राइल पर आती है. हमास के उदार धड़े को मजबूत करने के बजाए, इस्राइल फलस्तीनियों को और हताशा की तरफ धकेल रहा है. हमने पिछले बयालीस सालों से एक पूरी आबादी की घेरेबंदी (घेट्टोकरण) कर रखी है और उसे संप्रभुता देने से इन्कार करते आए हैं. या अगर मैं इस्राइल के प्रति नरमी भी बरतूं तो कहें कि बीस सालों से, (1988 से) हम ऐसा करते आए हैं, जब अराफात और फलस्तीनी प्राधिकार ने इस्राइल राज्य को मान्यता दी और इसके बदले में उन्हें कुछ भी नहीं मिला. किसी तरह की गलतफहमी न रहे: मैं हमास के रुख से सहमत नहीं हूं और उसकी धार्मिक विचारधारा से तो और भी नहीं. मैं एक धर्मनिरपेक्षतावादी हूं, एक डेमोक्रेट बल्कि एक उदारवादी हूं. एक इस्राइली और एक इंसान होने के नाते मैं रॉकेटों को पसंद नहीं करता. लेकिन एक इस्राइली और एक इंसान होने के नाते मैं यह नहीं भूल सकता कि जो लोग (इस्राइल पर) रॉकेट दाग रहे हैं, वे उन लोगों के बच्चे और बच्चों के बच्चे हैं जिन्हें 1948 में जाफा और अश्केलोन से खदेड़ दिया गया था. मैं श्लोमो जैंड उन लोगों को उसी जमीन पर शरणार्थी के रूप में देखता हूं, जो कभी उनकी अपनी हुआ करती थी. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि मैं उन्हें उनकी जमीन वापस दे सकता हूं. लेकिन शांति के हर प्रस्ताव की शुरुआत इसको स्वीकार करने से ही होनी चाहिए. जो कोई भी इसे भूलता है, वह फलस्तीनियों को एक इंसाफ पर आधारित शांति पेश करने के काबिल नहीं होगा.

सवाल: लेकिन इस बमबारी के हिमायतियों का कहना है कि इस्राइल ने गाजा को छोड़ दिया और तब भी रॉकेट हमले दोगुने हो गए हैं.

जवाब: बकवास! कल्पना कीजिए कि जर्मनों ने दक्षिणी फ्रांस छोड़ कर उत्तरी फ्रांस पर फिर से कब्जा कर लिया है, जैसा कि उन्होंने 1940 में किया था. तब क्या आप कहेंगे कि वे फ्रांसीसी जनता के आत्म-निर्णय के अधिकार का सम्मान कर रहे थे? शेरोन एकतरफा तौर से गाजा से वापस हुए ताकि उन्हें अराफात के साथ शांति समझौता न करना पड़े और पश्चिमी तट नहीं छोड़ना पड़े. लेकिन फलस्तीनी लोग गाजा में भारत की आरक्षण व्यवस्था जैसी कोई चीज नहीं मांग रहे हैं. वे गाजा और पश्चिमी तट में एक स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य की मांग कर रहे हैं.

सवाल: यानी सारी गलती इस्राइली पक्ष की है?

जवाब: अफसोस की बात यह है कि इस्राइल को सिर्फ ताकत की जुबान ही समझ में आती है. इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में इंसाफ पर आधारित एक शांति समझौते पर पहुंचना नामुमकिन होने की वजह रॉकेट नहीं हैं, बल्कि फलस्तीनियों का कमजोर होना है. इस्राइल ने सिर्फ सादात से 1977 में शांति कायम की थी, क्योंकि मिस्र 1973 में जीत के करीब पहुंच गया था.

सवाल: फ्रांस के ग्रांड रब्बी गिलेस बर्नहाइम ने कहा है कि इस्राइल को ‘बेहतरीन भावनाओं के नाम पर खुदकुशी नहीं कर लेनी चाहिए.’

जवाब: लेकिन उनका मतलब क्या है? हमारे अस्तित्व को किससे खतरा है? हमारे पास सबसे बेहतरीन हथियार हैं और हमें दुनिया की महाशक्ति का समर्थन हासिल है. अरब दुनिया हमें 1967 की सरहदों के आधार पर पूरी शांति की पेशकश कर रही है. जिस आखिरी युद्ध ने इस्राइल के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा किया था, वह 35 साल पहले (1973 में) हुआ था! इसलिए हो सकता है कि यह बात ग्रांड रब्बी की समझ में नहीं आ रही हो.

सवाल: अकेले वही नहीं हैं. इस्राइल की बमबारी के बारे में लिखते हुए आंद्रे ग्लुक्समान ने दलील दी है कि ‘अपने को अस्तित्व में बनाए रखने की इच्छा में कुछ भी अतिरेक नहीं है.’

जवाब: बर्नार्ड-हेनरी लेवी की तरह आज आंद्रे ग्लुक्समान हमेशा सबसे ताकतवर के पक्ष में रहते हैं, इस बार वे येरुशेलम के पक्ष में हैं. वे बदले नहीं हैं.

सवाल: लेकिन बर्नार्ड-हेनरी लेवी ने ध्यान दिलाया है कि आईडीएफ (इस्राइली डिफेंस फोर्स) इमारतों पर बमबारी करने से पहले लोगों को फोन करके उन्हें खाली कर देने को कहती है और यह कि इस्राइल ने नागरिकों को नुकसान पहुंचने से बचने के लिए हर संभव काम किए हैं...

जवाब: ओह, इस्राइल ने फोन किया, इस्राइल ने सावधानी बरती? लेकिन फलस्तीनी परिवार (घर खाली करके) जाएंगे कहां? यह सही है कि इस्राइल अनेक सावधानियां बरतता है. लेकिन सिर्फ अपनी सेना के लिए! उस तरह की मौतें सचमुच चिंताजनक हैं क्योंकि हम एक व्यक्तिवादी और सुविधाभोगी समाज बन गए हैं और हमारे नेताओं को सिर्फ दोबारा चुन लिए जाने की बड़ी चिंता रहती है.

सवाल: बर्नार्ड-हेनरी लेवी का यह भी कहना है कि हमास द्वारा मानवों को ढाल के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति...

जवाब: क्या दोमुंहापन है! क्या वे माओ से सीखी हुई वह बात भूल गए हैं? एक प्रतिरोध आंदोलन को पानी की मछली की तरह जन समुदाय के बीच तैरने में सक्षम होना चाहिए. हमास एक सेना नहीं है. यह आतंक का सहारा लेने वाला प्रतिरोध आंदोलन है, जो एफएलएन से लेकर वियतकॉन्ग की तरह के सभी पूर्ववर्ती आंदोलनों की तरह काम करता है. ऐसा ठीक ठीक इसलिए है कि हमारे नेता जानते हैं कि उन्हें कूटनीति का विशेषाधिकार हासिल है और उन पर नागरिकों का जनसंहार करने से बचने की जिम्मेदारी है. हमने यह साबित किया है कि हममें कोई नैतिक संयम नहीं है, फ्रांस से ज्यादा नहीं, जिसने अल्जीरिया में 1957 में एक पूरे गांव को तबाह कर दिया था. जो बात मुझे पहले से ज्यादा अब आघात पहुंचाती है वह यह है कि जिस राज्य में मैंने दो युद्धों में सैनिक के रूप में सेवाएं दीं और जो 1948 के अपने डिक्लियरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस के जरिए खुद को सभी यहूदियों का राज्य कहता है वह अब मेरे विश्वविद्यालय के दोस्तों की तुलना में, जो यहां रहते हैं और कर चुकाते हैं लेकिन अरब मूल के हैं, बर्नार्ड-हेनरी लेवी का राज्य ज्यादा है. ऐसे में जायनिस्ट होने का क्या मतलब है, जब आप फ्रांस में रहते हैं और एक यहूदी सरकार के तहत नहीं रहना चाहते हैं और फिर भी इस्राइल के नेताओं की बदतरीन नीतियों के साथ खड़े होते हैं. इसका मतलब यहूदी विरोध को हवा देना है.

सवाल: वास्तव में जब पेरिस के प्रदर्शनों के दौरान इस्राइली झंडा जलाए जाते देख कर आपको धक्का नहीं लगा?

जवाब: बेशक इससे मैं परेशान हुआ था. यही वजह है कि मेरी तरह सोचने वाले दूसरे इस्राइलियों को सुना जाना महत्वपूर्ण है. चीजों को उस दिशा में जाने पर फौरन रोक लगाई जाए. हमारी बात इसे यकीनी बनाने के लिए भी सुनी जानी चाहिए कि हमारे नेताओं की नीतियों को सारे इस्राइलियों के साथ न जोड़ा जाए, और बेशक न ही सारे यहूदियों के साथ. क्योंकि मुझे यकीन है कि सत्ता प्रतिष्ठान से दूरी रखने वाले फ्रांसीसी यहूदी भी मेरे जैसी राय रखते होंगे.

सवाल: पश्चिमी तट में फलस्तीनियों में हलचल नहीं है...

जवाब: इस युद्ध ने उनकी हताशा को बढ़ाया है. नवंबर 2007 के एनापोलिस सम्मेलन के बाद महमूद अब्बास ने हर तरह के समझौते किए, जिससे उन्हें लगा कि शांति प्रक्रिया आगे बढ़ेगी. यहां तक कि उन्होंने हमास लड़ाकों को कैद भी किया. और इस्राइल ने उनका शुक्रिया इस तरह अदा किया कि उसने जांच चौकियों में कई गुना इजाफा कर दिया, और भी यहूदी बस्तियों का निर्माण बढ़ाता गया और भविष्य के फलस्तीनी राज्य के इलाके में एक दीवार का निर्माण करने लगा. फिर कौन स्वाभिमानी फलस्तीनी होगा जो अब अब्बास का समर्थन करेगा?

सवाल: और इस्राइली अरब लोगों के मन में क्या है?

जवाब: मैं अपने अरब छात्रों के लगातार संपर्क में हूं. उनकी हालत बड़ी अटपटी है. वे हिब्रू बोलते हैं, अक्सर तो मुझसे भी बढ़िया हिब्रू बोलते हैं. मैं देखता हूं कि वे सांस्कृतिक तौर पर वे दिन ब दिन ज्यादा से ज्यादा इस्राइली हो रहे हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर वे दिनोंदिन ज्यादा से ज्यादा इस्राइल-विरोधी हो रहे हैं. वे उस देश में कैसे रह सकते हैं जो उन्हें पूरे नागरिक के रूप में कबूल नहीं करता? मुझे डर है कि उनके अलगाव का नतीजा गैलिली में एक कोसोवो को पैदा करने के रूप में निकलेगा.

सवाल: आप इस्राइलियों से कुछ ऐसा देने को कह रहे हैं जो बहुत बड़ी चीज है, कि वे 1967 के बाद की सरहदों पर से अपना दावा छोड़ दें – वेलिंग वेल या पश्चिमी दीवार के पार के इलाके पर – बल्कि आप यह भी मांग करते हैं कि वे एक इस्राइली गणतंत्र का निर्माण करें जो सिर्फ यहूदियों का राज्य न हो. क्या यह यथार्थवादी है?

सवाल: इस्राइल में अनेक लोग मेरी बात का समर्थन करते हैं. उन्नीस हफ्तों तक मेरी किताब बेस्टसेलर रही थी और दर्जन भर बार टीवी पर उस पर चर्चा हुई. हम एक ऐसा समाज हो सकते हैं जो नस्लवादी हो और पूरी तरह लोकतांत्रिक समाज न हो. लेकिन हम एक गहन उदारवादी और बहुलतावादी समाज भी हो सकते हैं. मेरे जैसे लोग अगर यह मांग करते हैं कि इस्राइल को अपने खुद के नागरिकों का राज्य होना चाहिए, भले ही वे यहूदी हों, अरब हों या कोई और, तो इस पर क्या आपत्ति उठाई जा सकती है? मैं जोड़ूंगा कि खास कर हिटलर के बाद आप यहूदियों की एकता को नकार नहीं सकते और इस्राइली राज्य को सताए हुए यहूदियों की शरणस्थली के रूप में अस्तित्व में रहना चाहिए. लेकिन इसे खुद ब खुद बर्नार्ड-हेनरी लेवी और उन यहूदियों का राज्य नहीं बन जाना चाहिए, जो इस्राइल में रहना नहीं चाहते.

सवाल:और क्या आप जायनिस्ट-विरोधी हैं?

जवाब: नहीं, क्योंकि खुद को जायनिस्ट विरोधी कहने का मतलब इस्राइल-विरोधी हो सकता है. मैं इस्राइल राज्य के अस्तित्व को स्वीकार करता हूं, क्योंकि मैं जायनिज्म और इसके इतिहास की उपज इस्राइली समाज को स्वीकार करता हूं. लेकिन मैं जायनिस्ट नहीं हूं, चूंकि यहां मेरे अस्तित्व को जो चीज परिभाषित करती है, वो यह तथ्य है कि मैं लोकतंत्रवादी हूं. इसका मतलब यह है कि राज्य को अपनी सामाजिक संस्था की अभिव्यक्ति होना चाहिए, न कि दुनिया भर के यहूदियों का. आप कह सकते हैं कि मैं एक पोस्ट-जायनिस्ट हूं.

सवाल: लेकिन क्या इससे यह खतरा पैदा नहीं हो जाएगा कि यहूदी अपने ही बनाए राज्य में अल्संख्यक बन जाएं?

जवाब: मैं इस डर को समझता हूं. इसीलिए मैं एक ऐसे द्विराष्ट्रीय राज्य के खिलाफ हूं, जो एक अरब बहुसंख्या वाला राज्य हो. इसीलिए मैं जितनी जल्दी संभव हो, इस्राइल को 1967 की सीमाओं को स्वीकार करने की हिमायत करता हूं जिससे यहूदी-इस्राइली वर्चस्व कायम रहेगा. लेकिन यह एक विशिष्ट (एक्सक्लूसिव) वर्चस्व नहीं होगा. इस्राइली राज्य को अनिवार्य रूप से धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक होना होगा. मेरी कल्पना में, मेरे कल्पना जगत में द्विराष्ट्रीय राज्य सबसे न्यासंगत संभव नतीजा होगा...

सवाल: अगर उसमें यहूदी अल्पसंख्यक बन जाएं तब भी?

जवाब: सांस्कृतिक रूप से कहें तो मुझे मेरे बच्चों की औलादों से अलग करने वाली दूरी कम से कम उस दूरी जितनी ही महत्वपूर्ण होगी जो मुझे मेरे दादा-दादी से अलग करती है. इसका मतलब है कि पूर्वी इलाकों में जीवन में अरब संस्कृति घुली-मिली रहेगी. इससे भी अधिक मैं यह भी इच्छा करूंगा कि 1967 की सीमाओं से इस्राइल के पीछे हटते ही एक इस्राइली-फलस्तीनी फेडरेशन की स्थापना हो. आमोस ओज जैसे लोगों का यह कहना एक नस्लवादी बकवास है कि हमें अरब लोगों से खुद को काट लेना चाहिए. शांति स्थापित होने के बाद हम थोड़े ज्यादा अरब हो जाएंगे, जैसे कि आप फ्रांसीसी लोग थोड़े ज्यादा यूरोपीय हो गए हैं.

सवाल: लेकिन इस्राइली समाज के बरअक्स, जो कि ज्यादातर धर्मनिरपेक्ष है, फलस्तीनी समाज उससे भी ज्यादा इस्लामी हो गया है जितना या तीस या चालीस साल पहले हुआ करता था...

जवाब: इस्राइल में रहनेवाले अरब नौजवानों, खास कर औरतों, में धार्मिकता नहीं बढ़ रही है. कट्टरपंथ, पश्चिमी दुनिया के विरोध में मजबूत हुआ है. यह धर्म की जीत नहीं है, बल्कि धर्मनिरपेक्ष समाजवाद की नाकामी है. जिस तरह से आप यूरोपीय लोग प्रवासी मजदूरों के साथ सलूक करते हैं, जिस तरह से अमेरिका इराक में अपने युद्ध छेड़ता है, और जिस तरह इस्राइल फलस्तीनियों के साथ पेश आता है, इन सबसे कट्टरपंथ मजबूत होता है. यह विवादों की उपज है, एक स्वाभाविक ऐतिहासिक रुझान नहीं है. देखिए कि अल्जीरिया में क्या हुआ: एफएलएन की पतित हो चुकी राजनीति ने वहां इस्लामपरस्ती को पैदा किया. लेकिन इसकी जड़ें गहरी नहीं थीं और अल्जीरिया अब आधुनिकता की तरफ बढ़ रहा है. यहां पर हमास भले ही इस्लामी बाना पहने हुए हो, यह हमेशा ही एक आधुनिक राष्ट्रवादी आंदोलन रहा है.

सवाल: अपनी किताब में आपने इस्राइल की स्थापना से जुड़े मिथकों को ध्वस्त किया है- जैसे कि निर्वासित लोगों के अपनी धरती पर लौटने का मिथक. लेकिन इसकी जगह आप इस देश के अस्तित्व को न्यायोचित ठहराने के लिए क्या पेश करेंगे?

जवाब: मुझे हाल ही में, येरुशेलम में फलस्तीनी यूनिवर्सिटी में यह सवाल किया गया था. मैंने इसका जवाब एक नाटकीय लहजे में दिया. मैंने कहा कि एक बलात्कार के नतीजे में पैदा हुए बच्चे को भी जीने का अधिकार होता है. यहूदियों द्वारा, जिनमें से अनेक जनसंहार शिविरों से बच कर आए थे, इस्राइल का निर्माण एक बलात्कार ही था, जो फलस्तीन की अरब आबादी के साथ किया गया था. इसने एक इस्राइली समाज को पैदा किया जो अब सत्तर साल पुराना हो चला है और इसने अपनी एक संस्कृति विकसित कर ली है. आप एक त्रासदी को खत्म करने के लिए दूसरी पैदा न करें. इस बच्चे को बने रहने का हक है. लेकिन इसे ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए कि यह अपने पैदा करने वालों की गलतियों को न दोहराए. तीस साल पहले मैं यह सारी बातें कह तक नहीं सकता था. लेकिन अरब दुनिया ने इस्राइल को मान्यता दे दी है. पीएलओ ने भी इंतिफादा में आधी जीत हासिल करने के बाद इसे स्वीकार लिया. आइए, हमास को भी एक मौका देते हैं. हम उन्हें कोई बहाना नहीं दे रहे हैं, लेकिन मत भूलिए कि अश्केलोन पर गोलीबारी कर रहे लोग जानते हैं कि इसे एक अरब गांव अल मजदाल के ऊपर बसाया गया है, जहां से उनके बाप-दादों को 1950 में खदेड़ दिया गया था.

सवाल: हम इस्राइली नीति से बहुत दूर हैं, यहां...

जवाब: इस्राइल शांति को स्वीकार तभी करेगा, जब उस पर दबाव बनाया जाएगा. मैं चाहता हूं, मैं उम्मीद करता हूं, मैं भीख मांगता हूं कि ओबामा कार्टर की तरह होंगे, न कि क्लिंटन की तरह. कार्टर ने इस्राइल को मिस्र के साथ शांति संधि करने के लिए मजबूर किया था. क्लिंटन ने इस्राइल को फलस्तीनियों के साथ शांति संधि करने के लिए मजबूर नहीं किया. इसमें जोखिम भी बहुत साफ है कि हिलेरी क्लिंटन का, जो इस्राइल-परस्त लॉबी के करीब हैं, विदेशी नीतियों पर भारी प्रभाव रहेगा. लेकिन मैं भाग्यवादी नहीं बनना चाहता, मेरी उम्मीद कायम है.
 

(अंग्रेजी अनुवाद वर्सो बुक्स के ब्लॉग से साभार. समयांतर के सितंबर, 2014 अंक में प्रकाशित)

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गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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