हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कौए का जादू-1: न्गुगी वा थ्योंगो

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/10/2016 08:00:00 AM



मशहूर केन्याई उपन्यासकार न्गुगी वा थ्योंगो के उपन्यास विज़ार्ड ऑफ द क्रो के एक अंश का अनुवाद. अनुवाद: रेयाज़ उल हक़


आबुरीरिया के आज़ाद गणतंत्र के दूसरे सुल्तान की अजीबोगरीब बीमारी के बारे में कई सारे कयास लगाए जाते थे, लेकिन उनमें पांच कयास ऐसे थे जो अक्सर लोगों की ज़ुबान पर रहते थे.

पहले कयास के मुताबिक दावा किया जाता था कि उनकी बीमारी किसी वक्त उमड़ने वाले गुस्से का नतीजा है; और वो अपनी सेहत पर इसके खतरों से इस कदर वाकिफ थे कि वो इससे निजात पाने के लिए बस यही कर सकते थे कि वे हर खाने के बाद डकारें लें, कभी कभी एक से दस तक गिनती गिनें और कभी कभी ज़ोर ज़ोर से का के की को कू का जाप करें. कोई नहीं बता सकता था कि वो खास तौर से यही आवाज़ें क्यों निकालते थे. फिर भी उन्होंने मान लिया था कि सुल्तान की बात में दम था. जिस तरह कब्ज़ के शिकार इंसान के पेट में खलबली मचाने वाली हवा को निकालना ज़रूरी होता है ताकि पेट का बोझ हल्का हो जाए, एक इंसान के भीतर के गुस्से को भी निकालना ज़रूरी होता है ताकि दिल का बोझ हल्का हो सके. लेकिन इस सुल्तान का गुस्सा जाने का नाम नहीं लेता था और यह उसके भीतर खदबदाता रहा जब तक यह उनके दिल को खा नहीं गया. माना जाता है कि  आबुरीरिया की यह कहावत यहीं से पैदा हुई कि गुस्सा, आग से भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह एक सुल्तान की रूह की तक को खा गई.

लेकिन इस गुस्से अपना जाल कब बिछाया? जब राष्ट्रीय नज़ारे पर पहली बार सांप दिखाई दिए थे? जब धरती के कटोरे का पानी कड़वा हो गया था? या जब सुल्तान अमेरिका गए और ग्लोबल नेटवर्क न्यूज़ के मशहूर कार्यक्रम मीट द ग्लोबल माइटी में इंटरव्यू दे पाने में नाकाम रहे थे? कहा जाता है कि जब उन्हें बताया गया कि उन्हें एक मिनट के लिए भी टीवी पर नहीं दिखाया जा सकेगा, तो उन्हें अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ. वे यह तक नहीं समझ पाए कि वे लोग किस चीज़ के बारे में बात कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम था कि अपने मुल्क में वे हमेशा ही टीवी पर होते थे; उनका एक एक पल कैमरे में दर्ज होता था: चाहे वो खा रहे हों, पाखाना कर रहे हों, छींक रहे हों या अपनी नाक साफ कर रहे हों. यहां तक कि उनकी जम्हाइयां भी खबरें थीं, क्योंकि वे ऊब, थकान, भूख या प्यास, चाहे जिस भी वजह से आ रही हों, उनके बाद कोई न कोई राष्ट्रीय तमाशा अक्सर ही होता था: उनके दुश्मनों को सरेआम चौराहों पर चाबुक लगाया जाता, पूरे के पूरे गांव मिट्टी में मिला दिए जाते थे या तीर-धनुष वाले दस्ते लोगों को गोद-गोद कर मार डालते. उनकी लाशें सियारों और गिद्धों के लिए खुले में छोड़ दी जातीं.

ऐसा कहा जाता है कि वो आबुरीरिया के परिवारों में झगड़े पैदा करने और दुश्मनी सुलगाते रहने के माहिर थे, क्योंकि उन्हें दुख भरे नजारों से ही सुकून मिलता था और वे चैन की नींद सो पाते थे. लेकिन अब ऐसा लगता था कि कोई भी चीज उनके गुस्से को बुझा नहीं पाएगी.

चाहे उसकी आंच कितनी ही गहरी हो, क्या गुस्सा एक रहस्यमय बीमारी की वजह बन सकता है जिसके आगे तर्क और दवाओं के सभी उस्तादों ने हार मान ली हो? 

नोटबंदी: संदिग्ध फायदे, निश्चित नुकसान

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/09/2016 03:30:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि किस तरह नोटबंदी के फैसले ने लोगों के लिए अभूतपूर्व परेशानियां खड़ी की हैं और यह भाजपा के लिए वाटरलू साबित होनेवाली है. अनुवाद: रेयाज़ उल हक


प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 500 और 1000 रुपए के करेंसी नोटों को बंद करने के फैसले से होने वाली तबाही और मौतों की खबरें पूरे देश भर से आ रही हैं. एक ऐसे देश में जहां कुल लेनदेन का 97 फीसदी नकदी के ज़रिए किया जाता है, कुल करेंसी में से 86.4 फीसदी मूल्य के नोटों को अचानक बंद करने से अफरा-तफरी पैदा होना लाजिमी था. अभी तक 70 मौतों की खबरें आ चुकी हैं. पूरी की पूरी असंगठित अर्थव्यवस्था ठप पड़ी हुई है, जो भारत की कुल कार्यशक्ति के 94 फीसदी और सकल घरेलू उत्पाद का 46 फीसदी का हिस्सेदार है. पहले से बदहाली झेल रही ग्रामीण जनता इस बात से डरी हुई है कि उसके बचाए हुए पैसे रद्दी कागज में तब्दील हो रहे हैं. उनमें से कइयों ने तो कभी बैंक का मुंह भी नहीं देखा है. बैंकों के बाहर अपनी खून-पसीने की कमाई को पकड़े हुए लोगों की लंबी कतारें पूरे देश भर में देखी जा सकती हैं. मध्य वर्ग और मोदी भक्तों की शुरुआती खुशी हकीकत की कठोर जमीन पर चकनाचूर हो गई. लेकिन अब तक की सबसे कठोर टिप्पणी मनमोहन सिंह की ओर से आई है, जिनके पास रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर, पूर्व वित्त मंत्री और दो बार पूर्व प्रधानमंत्री रहने के नाते मोदी के इस तुगलकी फरमान का जायजा लेने के लिहाज से एक ऐसी साख है जो और किसी के पास नहीं है. उन्होंने नोटबंदी के इस कदम को “भारी कुप्रबंधन” कहा और इसे “व्यवस्थित लूट और कानूनी डाके” का मामला बताते हुए राज्य सभा उन्होंने कहा कि यह देश के जीडीपी को दो फीसदी नीचे ले जाएगा. ऐसा कहने वाले वे अकेले नहीं हैं. अर्थशास्त्रियों, जानकारों और चिंतकों की एक बड़ी संख्या ने भारत की वृद्धि में गिरावट की आशंका जताई है. उनमें से कुछ ने 31 मार्च 2017 को खत्म हो रही छमाही के लिए इसमें 0.5 फीसदी गिरावट आने का अनुमान लगाया है. लेकिन आत्ममुग्ध मोदी पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ेगा, उल्टे वह उन सभी लोगों को राष्ट्र-विरोधी बता देंगे जो इस तबाही लाने वाले कदम पर सवाल उठा रहे हैं. यह सब देख कर सैमुअल जॉनसन की वह मशहूर बात याद आती है कि देशभक्ति लुच्चे-लफंगों की आखिरी पनाहगाह होती है.

इस अजीबोगरीब दुस्साहस के असली मकसद के बारे में किसी को कोई संदेह नहीं है. यह उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा और मणिपुर में आनेवाले चुनावों के लिए उनकी छवि को मजबूत करने के लिए चली गई एक तिकड़म थी. चुनाव के पहले किए गए सभी वादे अधूरे हैं, तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक समेत उनके सभी कदम बुरी तरह नाकाम रहे हैं, जनता खाली जुमलेबाजियों और बड़बोलेपन से ऊब गई है. ऐसे में अब कुछ नाटकीय हरकत जरूरी थी. विपक्षी दल चुनावों के दौरान जनता को मोदी के इस चुनावी वादे की याद जरूर दिलाते कि उन्होंने 100 दिनों के भीतर स्विस बैंकों में जमा सारा गैरकानूनी धन लाकर हरेक के खाते में 15 लाख रुपए डालने की बात की थी. यह कार्रवाई यकीनन इस दलील की हवा निकालने के लिए और यह दिखाने के लिए ही की गई कि सरकार अर्थव्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए साहसिक कदम उठाने की ठान चुकी है. अफसोस कि इसने पलट कर उन्हीं को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया. इसने लोगों के लिए जैसी अभूतपूर्व परेशानियां खड़ी की हैं, उससे यह बात पक्की है कि इससे भाजपा को आने वाले चुनावों में भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. भले ही वह विपक्षी दलों की जमा नकदी को रद्दी बना देने और इस तरह उन्हें कमजोर करने में कामयाब रही है.

जाली अर्थव्यवस्था

मोदी ने गैरकानूनी धन और भ्रष्टाचार पर चोट करने, नकली नोटों के नाकाम करने और आतंक पर नकेल कसने का दावा किया है. अब तक अनेक अर्थशास्त्रियों ने इन दावों की बेईमानी को बखूबी उजागर किया है. जैसा कि छापेमारी के आंकड़े दिखाते हैं, आय से अधिक संपत्तियों में नकदी का हिस्सा महज 5 फीसदी है. इनमें जेवर भी शामिल हैं जिनका हिसाब नकदी के रूप में लगाया जाता है. अगर नोटबंदी का कोई असर पड़ा भी तो इससे गैरकानूनी धन का बहुत छोटा सा हिस्से प्रभावित होगा. यह थोड़ी सी नकदी अमीरों के हाथ में होती है, जो इसका इस्तेमाल गैर कानूनी धन को पैदा करने और चलाने वाली विशालकाय मशीन के कल-पुर्जों में चिकनाई के रूप में करते हैं. गैरकानूनी धन असल से कम या ज्यादा बिलों वाली विदेशी गतिविधियों (बिजनेसमेन), किराए, निवेश और बॉन्ड आदि गतिविधियों (राजनेता, पुलिस, नौकरशाह) और आमदनी छुपाने के अनेक तरीकों (रियल एस्टेट कारोबारी, निजी अस्पताल, शिक्षा के सेठ) के जरिए बनाया जाता है. इस धन को कानूनी बनाने के अनेक उपाय हैं, जिनका इस्तेमाल करते हुए छुटभैयों (कागजों पर चलने वाली अनेक खैराती संस्थाएं यही काम करती हैं) से लेकर बड़ी मछलियां तक करों की छूट वाले देशों के जरिए भारत में सीधे विदेशी निवेश के रूप में वापस ले आती हैं. गैर कानूनी धन पैदा करने और चलाने के इन उपायों पर नोटबंदी का कोई असर नहीं पड़ेगा.

नोटबंदी से नकली नोटों की समस्या पर काबू पाया जा सकता है, अगर यह उतनी बड़ी समस्या हो. लेकिन कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई) की रिपोर्ट के मुताबिक जितनी करेंसी चलन में है, उसका महज 0.002 फीसदी मूल्य के नोट यानी 400 करोड़ रुपए ही नकली नोटों में हैं, जो इतने ज्यादा नहीं है कि उनसे अर्थव्यवस्था की सेहत पर कोई असर पड़े. आईएसआई रिपोर्ट में कभी भी नकली नोटों से निजात पाने के लिए नोटबंदी का सुझाव नहीं दिया. अगर सरकार को नकली नोटों की चिंता थी, तो नोटबंदी के बाद आने वाले नए नोटों में सुरक्षा के बेहतर उपाय होते. लेकिन ऐसा भी नहीं किया गया. रिजर्व बैंक ने खुद कबूल किया है कि 2000 के नए नोटों को बिना किसी अतिरिक्त सुरक्षा विशेषता के ही जारी किया जा रहा है. आतंकवादियों के पैसों की दलील पूरी तरह खोखली है. अगर आतंकवादियों के पास नकदी हासिल करने का कोई ज़रिया है, तो वे नए नोटों से निबटने के रास्ते भी उनके पास होंगे. इस तरह नोटबंदी के पीछे मोदी के आर्थिक दावे पूरी तरह धोखेबाजी हैं. इसके अलावा नए नोटों को छापने पर अंदाजन 15,000-18,000 करोड़ रुपए का खर्च अलग से हुआ और फिर हंगामे से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान भी हुआ और यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब हालात स्थिर नहीं होते.

‘स्वच्छ भारत’

शगूफे छोड़ते हुए मोदी ने नोटबंदी के फैसले को अपने स्वच्छ भारत अभियान से जोड़ दिया, जबकि उन्हें अच्छी तरह पता है कि इस अभियान का भी कोई खास नतीजा नहीं निकल पाया है. अगर उन्होंने इस अभियान पर खर्च होने वाली कुल रकम का आधा भी भारत को रहने के लायक बनाने वाले दलितों को दे दिया होता तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता था. लेकिन जहां दलितों द्वारा मैला ढोने की प्रथा के खात्मे की मांग के लिए संघर्ष जारी है, मोदी अपने स्वच्छ भारत का ढोल पीट रहे हैं. वे भारत को भ्रष्टाचार और गंदे धन से मुक्त कराने का दावा करते हैं. उनके सत्ता में आने के लिए वोट मिलने की वजहों में से एक संप्रग दो सरकार के दौरान घोटालों की लहर भी थी, जिसका कारगर तरीके से इस्तेमाल करते हुए उन्होंने देश को पारदर्शी बनाने और ‘बहुत कम सरकारी दखल के साथ अधिकतम प्रशासन’ का वादा किया था. वे अपना आधा कार्यकाल बिता चुके हैं और उनके शासन में ऊंचे किस्म के भ्रष्टाचार की फसल भरपूर लहलहाती हुई दिख रही है. भ्रष्टाचार के मुहाने यानी राजनीतिक दल अभी भी अपारदर्शी हैं और सूचना का अधिकार के दायरे से बाहर हैं. ‘पनामा लिस्ट’ में दिए गए 648 गद्दारों के नाम अभी भी जारी नहीं किए गए हैं. उनकी सरकार ने बैंकों द्वारा दिए गए 1.14 लाख करोड़ रुपए के कॉरपोरेट कर्जों को नन परफॉर्मिंग असेट्स (एनपीए) कह कर माफ कर दिया है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए 11 लाख करोड़ है, लेकिन कॉरपोरेट लुटेरों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं की जा रही है. कॉरपोरेट अरबपतियों का सीधा कर बकाया 5 लाख करोड़ से ऊपर चला गया है, लेकिन मोदी ने कभी भी इसके खिलाफ ज़ुबान तक नहीं खोली. पिछले दशक के दौरान उनको करों से छूट 40 लाख करोड़ से ऊपर चली गई, जिसकी सालाना दर मोदी के कार्यकाल के दौरान 6 लाख करोड़ को पार कर चुकी है, जो संप्रग सरकार के दौरान 5 लाख करोड़ थी. मोदी अपने आप में कॉरपोरेट भ्रष्टाचार के भारी समर्थक रहे हैं, जो गैरकानूनी धन का असली जन्मदाता है.

यहां तक कि यह भी संदेह किया जा रहा है कि नोटबंदी में भी भारी भ्रष्टाचार हुआ है. इस फैसले को लेकर जो नाटकीय गोपनीयता बरती गई, वह असल में लोगों को दिखाने के लिए थी. इस फैसले के बारे में भाजपा के अंदरूनी दायरे को पहले से ही पता था, जिसमें राजनेता, नौकरशाह और बिजनेसमेन शामिल हैं. इसको 30 सितंबर को खत्म होने वाली तिमाही के दौरान बैंकों में पैसे जमा करने में आने वाली उछाल में साफ-साफ देखा जा सकता है. खबरों के मुताबिक भाजपा की पश्चिम बंगाल ईकाई ने घोषणा से कुछ घंटों पहले अपने बैंक खाते में कुल 3 करोड़ रुपए जमा किए. एक भाजपा नेता ने नोटबंदी के काफी पहले ही 2000 रु. के नोटों की गड्डियों की तस्वीरें पोस्ट कर दी थी और एक डिजिटल पेमेंट कंपनी ने 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे होने वाली घोषणा की अगली सुबह एक अखबार में नोटबंदी की तारीफ करते हुए पूरे पन्ने का विज्ञापन प्रकाशिक कराया. असल में, नोटबंदी ने बंद किए गए नोटों को कमीशन पर बदलने का एक नया धंधा ही शुरू कर दिया है. इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं है कि ट्रांस्पेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा भारत की रैंकिंग में मोदी के राज में कोई बदलाव नहीं आया है जो 168 देशों में 76वें स्थान पर बना हुआ है.

आत्ममुग्ध बेवकूफी

सिर्फ एक पक्का आत्ममुग्ध ही ऐसी बेवकूफी कर सकता है. इससे भारत के संस्थागत चरित्र का भी पता लगता है, जो सत्ता के आगे झुकने को तैयार रहता है. मोदी को छोड़ दीजिए, यह वित मंत्रालय के दिग्गजों और खास कर आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल की हैसियत को भी उजागर करता है, जो न सिर्फ अपने पद की प्रतिष्ठा को बनाए रखने में नाकाम रहे हैं, बल्कि जिन्होंने यह बदनामी भी हासिल की है कि वे पेशेवर रूप से अक्षमता हैं. ऐसा मुमकिन नहीं होगा कि आरबीआई के मुद्रा विशेषज्ञ इस फैसले के दोषपूर्ण हिसाब-किताब को नहीं देख पाए होंगे, लेकिन जाहिर है कि वे साहेब की मर्जी के आगे झुक गए. नोटबंदी भ्रष्टाचार का इलाज नहीं है, लेकिन इतिहास में कई शासक इसे आजमा चुके हैं. हालांकि उन्होंने जनता के पैसे के साथ इसे कभी नहीं आजमाया. आखिरी बार मोरारजी देसाई ने 1978 में 1000 रुपए के नोट को बंद किया था, जो आम जनता के बीच आम तौर पर चलन में नहीं था. अपनी क्रयशक्ति में यह आज के 15,000 रुपयों के बराबर था. यह तब प्रचलित धन का महज 0.6 फीसदी था, जबकि आज की नोटबंदी ने कुल प्रचलित धन के 86.4 फीसदी को प्रभावित किया है.

अपनी विदेश यात्राओं के दौरान मोदी हमेशा ही अपनी जन धन योजना की उपलब्धियों की शेखी बघारते रहे हैं, जो संप्रग सरकार की वित्तीय समावेश नीतियों का ही महज एक विस्तार है. उन्होंने सिर्फ गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स के लिए बैंकों को खाते खोलने पर मजबूर किया. जुलाई 2015 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 33 फीसदी ग्राहकों ने बताया कि जन धन योजना का खाता उनका पहला खाता नहीं था और विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 72 फीसदी खातों में एक भी पैसा नहीं था. विश्व बैंक-गैलप ग्लोबल फिनडेक्स सर्वे द्वारा किए गए एक और सर्वेक्षण में दिखाया गया कि कुल बैंक खातों का करीब 43 फीसदी निष्क्रिय खाते हैं. यहां तक कि रिजर्व बैंक भी कहता है कि सिर्फ 53 फीसदी भारतीयों के पास बैंक खाते हैं और उनका सचमुच उपयोग करने वालों की संख्या इससे भी कम है. ज्यादातर बैंक शाखाएं पहली और दूसरी श्रेणी के शहरों में स्थित हैं और व्यापक ग्रामीण इलाके में सेवाएं बहुत कम हैं. ऐसे हालात में सिर्फ एक आत्ममुग्ध इंसान ही होगा जो भारत में बिना नकदी वाली एक कैशलेस अर्थव्यवस्था के सपने पर फिदा होगा. यह सोचना भारी बेवकूफी होगी कि ऐसे फैसलों से भाजपा लोगों का प्यार पा सकेगी.

कहने की जरूरत नहीं है कि दलितों और आदिवासियों जैसे निचले तबकों के लोगों को इससे सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है और वे भाजपा को इसके लिए कभी माफ नहीं करेंगे. भाजपा ने अपने हनुमानों (अपने दलित नेताओं) के जरिए यह बात फैलाने की कोशिश की है कि नोटबंदी का फैसला असल में बाबासाहेब आंबेडकर की सलाह के मुताबिक लिया गया था. यह एक सफेद झूठ है. लेकिन अगर आंबेडकर ने किसी संदर्भ में ऐसी बात कही भी थी, तो क्या इससे जनता की वास्तविक मुश्किलें खत्म हो सकती हैं या क्या इससे हकीकत बदल जाएगी? बल्कि बेहतर होता कि भाजपा ने आंबेडकर की इस अहम सलाह पर गौर किया होता कि राजनीति में अपने कद से बड़े बना दिए गए नेता लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होते हैं.

उना की आग में रोशन भगवा उडुपी

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/22/2016 12:53:00 PM


 

आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि कैसे दलित समुदाय का एकजुट प्रतिरोध फासीवाद के खिलाफ संघर्ष की सबसे मजबूत उम्मीद है. अनुवाद: रेयाज उल हक

गुजरात में गौ रक्षकों द्वारा एक दलित परिवार को सरेआम पीटे जाने की घटना से दलितों का जो संघर्ष शुरू हुआ था, उसने देश भर के दलितों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है. किसी भी लिहाज से यह अपनी तरह की पहली घटना नहीं थी. जहां तक गाय की हत्या के शक में दलितों को सताने की बात है, तो 15 अक्तूबर 2002 को दशहरे के दिन हरियाणा के झज्झर के करीब कहीं ज्यादा खौफनाक घटना घटी थी. हिंदुत्ववादियों की एक भीड़ ने जानवरों की खाल ले जा रहे पांच दलितों को दुलीना पुलिस चौकी के करीब पीटा, उनकी आंखें निकाल लीं और उनके अंग-भंग किए और फिर उनमें आग लगा दी. अत्याचारों के रूप में पिछले साल दलितों पर हमलों के 47,000 से ज्यादा मामले आधिकारिक रूप से दर्ज किए गए, जिसका हिसाब लगाएं तो हम पाते हैं कि हर रोज दो दलित मारे जाते हैं और पांच दलित औरतों के साथ बलात्कार होता है.  उना प्रतिरोध से फर्क यह आया कि इसने जमीन के मुद्दे को उठाया, जो दलितों को मैला साफ करने और मरे हुए जानवरों को उठाने जैसे परंपरागत, अपमानजनक कामों से आजादी दिलाएगा. दूसरी अहम बात यह थी कि यह उस गुजरात में हुआ था जिसे कई बरसों से नरेंद्र मोदी द्वारा बनाए गए विकास मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा था. यही वह प्रचार था, जिसने उन्हें विकास पुरुष की छवि दी और प्रधानमंत्री के ऊंचे पद पर पहुंचाया. उना ने इस झूठ को सारी दुनिया के सामने उजागर कर दिया
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उना से प्रेरित पहला दलित आंदोलन करीब करीब उम्मीद के मुताबिक ही कर्नाटक में शुरू हुआ. यह सब सोशल मीडिया में उना पर चर्चा से शुरू हुआ, जिसके नतीजे में बेंगलुरु में बुलाई गई एक फौरी बैठक में 300 से ज्यादा नौजवान जमा हुए. उन्होंने बेंगलुरु से उडुपी तक “चलो उना” की तर्ज पर एक जुलूस निकालने का फैसला किया. उडुपी हिंदुत्व बलों का एक गढ़ है और जहां अगस्त 2016 में पिछड़ी जाति से आने वाले प्रवीण पुजारी को हिंदू जागरण वेदिके के बैनर तले विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के 18 लोगों ने पीट पीट कर मार डाला. उन्होने पुजारी को एक गाड़ी में दो गायें ले जाते हुए पाया था. दिलचस्प बात यह है कि 29 वर्षीय पुजारी खुद भाजपा सदस्य थे और उन्होंने उनसे फरियाद की थी कि वे बस अपने दोस्तों के लिए बछड़े ढोकर ले जा रहे हैं. बेशक इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, और वे संघ परिवार के घिनौने गोरक्षा अभियान के शिकार बन गए.

विंध्य के पार हिंदुत्व

कर्नाटक उस गुजरात से अच्छी तरह होड़ ले रहा है, जो पिछले दो दशकों से हिंदुत्व की जानीमानी प्रयोगशाला है. बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद हिंदुत्व बलों ने आक्रामक तरीके से विवादित मालिकाने वाली मुस्लिम संपत्तियों पर दावा जताना शुरू कर दिया. 15 अगस्त 1994 को उमा भारती ने इस तथ्य के बावजूद हुबली ईदगाह मैदान पर राष्ट्रीय झंडा फहराने की कोशिश की कि इसके मालिकाने का मुद्दा अदालत में लंबित था. 1998 में उन्होंने चिकमगलूर की पहाड़ियों में बाबा बुदन गिरी की दरगाह को चुना जो बहुत पुरानी सूफी दरगाह है. यह शैव, वैष्णव और सूफी मतों के मेल का नमूना है. सदियों से यह दरगाह एक मुस्लिम सज्जादा नशीं के परिवार के पास थी, जो दावा करते हैं कि वे सैयद शाह तनालुद्दीन आलमगरीबी के वंशज हैं, जिन्हें बीजापुर के आदिल शाह की हुकूमत के समय दरगाह का रखवाला नियुक्त किया गया था. इसके मालिकने का विवाद 1960 के दशक में शुरू हुआ, जब कर्नाटक वक्फ बोर्ड ने इसकी रखवाली को नोटिफाई किया. मुजराई विभाग ने इस पर आपत्ति जताई, जो राज्य में धार्मिक और दाय संपत्तियों व हिंदू मंदिर न्यास के प्रभारी आयुक्त हैं. अदालतों में कई दौर की सुनवाइयां भी दरगाह की रखवाली में कोई बदलाव नहीं कर पाईं. लेकिन 1990 से हिंदुओं ने एक ब्राह्मण के हाथों पूजा कराकर दत्तात्रेय जयंती मनाने की शुरुआत की, जो 1997 में तीन दिनों का एक उत्सव बन गया. अगले साल बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ने पांच रथ यात्राएं निकालीं, जो कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों का सफर करते हुए 1 दिसंबर 1998 को बाबा बुदन गिरी पर आकर जमा हुईं. वाम और दलित कार्यकर्ताओं वाली धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने कर्नाटक कोमु सौहार्द वेदिके के तहत इसका विरोध किया और इसके खिलाफ अभियान चलाया. रथयात्रियों ने दरगाह पर भगवा झंडे लगा दिए और दरगाह के भीतर गणेश की मूर्ति रखने की कोशिश भी की, लेकिन इसे पुलिस की दखल के बाद रोक दिया गया. इस विवाद से भाजपा को भारी राजनीतिक फायदा मिला, जो यहां मई 2008 में सत्ता में आई.

भाजपा सरकार बनने के कुछ ही महीनों के भीतर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने चर्चों पर हमले किए. दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा जबरन नैतिकता थोपने (मोरल पुलिसिंग) की घटनाएं भी हुईं, जिन्होंनें अपना ‘हिंदू’ संस्कार छोड़ने के लिए लड़कों-लड़कियों पर हमले किए. बदनाम प्रमोद मुतालिक के श्री राम सेने, हिंदू जागरण वेदिके, हिंदू जनजागृति समिति, सनातन संस्था वगैरह हिंदुत्व गिरोहों द्वारा की गई हिंसा की अनेक घटनाएं गिनाई जा सकती हैं. वे सांप्रदायिक तनाव पैदा करने और दंगे भड़काने के लिए बमों (मिसाल के लिए मई 2008 में हुबली कोर्ट में बम धमाके) और पटाखों का इस्तेमाल करते हैं. [रेंट अ रायट, तहलका, वॉल्युम 7, अंक 20, 22 मई 2010.] 2012 में उडुपी के करीब ब्रह्मावर के पास एक कार से विस्फोटक जब्त किए गए, जो एक हिंदुत्व संगठन के एक कार्यकर्ता के पास थे. वे जानबूझ कर भारत-विरोधी और हिंदू विरोधी काम करते हैं, जैसे उन्होंने सिंदागी में [द हिंदू, 11 जनवरी, 2012] और टीपू सुल्तान सर्किल में पाकिस्तानी झंडा फहराया; या विवेकानंद की प्रतिमा को बिगाड़ा या फिर एक मंदिर को गंदा किया, ताकि मुसलमानों के खिलाफ सांप्रदायिक गुस्से को हवा दी जा सके. इनमें राज्य की मिलीभगत बहुत खुली और साफ-साफ थी.

भगवा उडुपी में नीला परचम

4 अक्तूबर को चलो उडुपी रैली बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क से शुरू हुई और यह स्वत:स्फूर्त ढंग से दलितों, अल्पसंख्यकों और वाम कार्यकर्ताओं को एक साथ ले आई. अगले पांच दिनों तक यह उडुपी की तरफ बढ़ते हुए रास्ते में नीलमंगला, कुनीगल, चन्नारयपाटना, हासन, बेलुर और चिकमगलूर में हिंदुत्व बलों के फासीवादी हमलों के खिलाफ बैठकें और कार्यक्रम किए. 9 अक्तूबर को जब यह उडुपी पहुंची, वहां जोरदार बारिश ने इसका स्वागत किया. दोपहर तक बारिश रुक गई और अज्जारकड मैदान में तख्तियों और बैनरों के साथ लोग धीरे-धीरे जमा होने लगे. वहां तैयार किए गए छोटे से मंच को पोंछ कर साफ कर दिया गया, जिस पर लगा “चलो उडुपी” का गीला हो चुका बैनर चमक रहा था. मीटिंग शुरू होने तक नीले झंडे लिए हुए करीब 10,000 लोगों की भारी भीड़ भगवा उडुपी पर छा गई थी. रैली ने गुजराती दलितों के संघर्ष और दलित महिला स्वाभिमान यात्रा के साथ एकजुटता जाहिर की जिसे दलित महिलाओं ने 18-28 सितंबर के बीच राजस्थान में निकाला था. पूरे प्रतिरोध पर महिलाओं की दावेदारी की जबरदस्त छाप थी, हालांकि वे अल्पसंख्या में ही थीं और दस सदस्यों वाली कोर कमेटी  में उनकी संख्या सिर्फ तीन थी.

मीटिंग में उना संघर्ष का चेहरा बन चुके जिग्नेश मेवाणी ने भाग लिया, जिन्होंने बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित किए गए गुजरात मॉडल के खोखलेपन को उजागर किया और बताया कि कैसे 2002 दंगों के बाद, मुसलमानों के बाद दलित लोग ही पीड़ितों के अकेले सबसे बड़े समूह थे और गिरफ्तार होने वालों में भी वही थे. भाषण में उनके नारे की गूंज थी: “हमारी पसंद का खाना, जमीन हमारा अधिकार है”. जिग्नेश ने तीन सूत्रों वाले एजेंडे के साथ उडुपी लौटने का वादा किया: सभी गौरक्षकों पर पाबंदी लगाई जीए, कर्नाटक सरकार से पूछा जाए कि इसने 1969 के राजकीय भूमि अनुदान नियमों के मुताबिक इसने कितनी राजस्व भूमि दलितों और आदिवासियों की दी है और उडुपी के उन मठों में घुसा जाए जो दलितों के खिलाफ पंक्ति भेद का पालन करते हैं.

रैली के बाद हिंदुत्व ताकतों ने, जो सुधरने का नाम नहीं लेतीं, नमो युवा ब्रिगेड के बैनर तले 23 अक्तूबर को एक शुद्धिकरण का कार्यक्रम करने का फैसला किया. दिलचस्प रूप से उनके ब्रिगेड का नाम नरेंद्र मोदी के नाम पर रखा गया था, जो उना दलित आंदोलन के बाद यह मशहूर शगूफा छोड़ने को मजबूर हुए थे कि ‘अगर आप मारना चाहते हैं तो मुझे मारिए मेरे दलित भाइयों को नहीं.’ शुद्धिकरण में ब्रिगेड को पर्याय पेजावर मठ के विश्वेष तीर्थ स्वामी की मौन सहमति भी हासिल थी. विरोधाभास यह है कि एक शूद्र संत कनक के नाम पर, जिन्होंने कृष्ण को अपने लिए दीवार में एक खिड़की बनाने के लिए मजबूर किया था, रखे गए कनक नेडे में उन्होंने दावा किया कि जनता इस शुद्धिकरण समारोह को संपन्न करेगी, जिसमें दलित भी शामिल होंगे. अंतरविरोध तो बेशुमार थे: एक तरफ तो वे यह आरोप लगा रहे थे कि यह जुलूस एक वामपंथी चाल थी, तो दूसरी तरफ वे शुद्धि भी कर रहे थे! चलो उडुपी के आयोजक दलित दमनितारा स्वाभिमानी होराटा समिति ने इसका विरोध करने का फैसला किया और इसके नतीजे में पैदा हुए तनाव के मद्देनजर पुलिस ने इजाजत देने से इन्कार कर दिया और इस तरह एक टकराव को रोक दिया गया. लेकिन ऐसी खबरें हैं कि 9 अक्तूबर को ही नमो ब्रिगेड ने मठ के करीब  शुद्धिकरण कर दिया था, जिसके खिलाफ समिति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.

बदलती हुई दलित राजनीति

उना के साथ ही दलित आंदोलन में एक अच्छा बदलाव आया है. आखिरी बार दलितों ने अपनी रोज-रोटी से जुड़े किसी मुद्दे को 1953-1965 के दौरान उठाया था, जब तीन भूमि सत्याग्रह खुद बाबासाहेब आंबेडकर की प्रेरणा से हुए थे. अपने जीवन के आखिरी दौर में आंबेडकर ने महसूस किया था कि उन्होंने जो कुछ भी किया था, उससे पढ़े लिखे दलितों के बस एक छोटे से हिस्से को ही फायदा हुआ है और वे देहाती दलित जनता की व्यापक बहुसंख्या के लिए कुछ नहीं कर सके. जहां पहले दो सत्याग्रह महाराष्ट्र में 1953 और 1959 में हुए थे, वहीं आखिरी सत्याग्रह देश भर में अभूतपूर्व स्तर पर किया गया था, जिसमें एक महीने के दौरान महिलाओं और बच्चों समेत लाखों लोगों ने गिरफ्तारियां दी थीं और देहाती शासक समूहों में हलचल मचा दी थी. कांग्रेस ने इससे निबटने के लिए कोऑप्शन की मिला लेने वाली तरकीब आजमाई जिससे मौकापरस्त दलितों की चांदी हो गई और आखिरकार जिसने दलित आंदोलन का ही अंत कर दिया.


पतित हो चुके दलित नेतृत्व के खिलाफ अपने गुस्से को जाहिर करने के लिए और उसे अलग-थलग करने के लिए हाल के दशकों में दलित बार-बार अपने बूते पर सड़कों पर उतरते रहे हैं, जिसमें वे कभी नेताओं का साथ नहीं लेते. इसकी झलक 1997 में मिली जब वे मुंबई के रमाबाई नगर में 10 बेगुनाह लोगों की गोली मार कर हत्या कर देने की प्रतिक्रिया में सड़कों पर उतरे. इसके बाद यह अहम रूप से खैरलांजी में दिखा. लेकिन वे अपनी खातिर लंबे दौर के लिए एक दिशा नहीं तय कर सके. पहली बार उस अत्याचार से आगे बढ़ते हुए, जिसने उसे जन्म दिया, उना ने यह मुमकिन कर दिखाया है. यह उनके अपमान से उपजी कमजोरी को उनकी ताकत में तब्दील कर सकती है. उन्होंने सामूहिक रूप से यह फैसला किया कि वे जाति द्वारा तय किए गए धंधे जैसे मैले की सफाई, मरे हुए जानवरों को उठाने और मवेशियों की खाल उतारने जैसा काम नहीं करेंगे. उन्होंने इसके बदले में जमीन की मांग की है. यह मोदी के मठ को हिला चुका  है और इसने राज्य प्रशासन को मजबूर किया है कि यह जमीन के टुकड़ों की पैमाइश करके उन्हें सचमुच लोगों को सौंपने की शुरुआत करे. उना से प्रेरित उडुपी मार्च इसका विस्तार करके इसे ‘अपनी पसंद के खाने’ तक पर ले गया, जिसने फासीवादी सरकारों द्वारा गोमांस पर लगाई गई सनक भरी पाबंदी को चुनौती दी, जिससे बहुसंख्यक आबादी के लिए भोजन और रोजगार का संकट पैदा हो गया है. इन आंदोलनों में इसकी क्षमता है कि वे देश भर में एक व्यापक फासीवाद-विरोधी आंदोलन के रूप में फैल सकते हैं, इसके लिए देश भर के सभी प्रगतिशील लोगों को अपने खोल से बाहर आकर इनका समर्थन करना चाहिए.

राजद्रोह का राष्ट्र: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/08/2016 03:17:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि कैसे आलोचना और असहमति को कुचलने के लिए तथा बोलने की आजादी को खत्म करने के लिए राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है. अनुवाद:रेयाज उल हक
धारा 124 ए... भारतीय दंड विधान की राजनीतिक धाराओं का शायद सरताज है, जिसे नागरिकों की आजादी को कुचलने के लिए बनाया गया है.
-महात्मा गांधी

राजद्रोह (जिसे गलत तरीके से और शायद जानबूझ कर देशद्रोह कहा जा रहा है) फिर से सुर्खियों में है. इस बार इसका आरोप एक समूचे संगठन पर लगा है. दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले एक अग्रणी एनजीओ की शाखा एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने 13 अगस्त को ‘ब्रोकेन फेमिलीज़’ नाम का एक सेमिनार आयोजित किया था. यह जम्मू और कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन का इंसाफ मांगने के अभियान का हिस्सा था. कार्यक्रम के दौरान जब पीड़ित अपनी आपबीती सुना रहे थे तो दक्षिणपंथी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों ने विरोध करना शुरू किया. इसके बाद हुई कहासुनी में कुछ कश्मीरी छात्रों ने आजादी के पक्ष में नारे लगाए. एबीवीपी ने एक एफआईआर दर्ज कराया और बैंगलोर पुलिस को इसके लिए मजबूर किया कि वो एमनेस्टी इंडिया पर ‘दुश्मनी को बढ़ावा देने’ के आरोप में और धारा 124-ए के तहत मुकदमा दर्ज करे जिसमें अगर कसूर साबित हो गया तो आजीवन कैद की सजा हो सकती है. राज्य की कांग्रेस सरकार ने फजीहत से बचते हुए कहा कि वो जांच के बाद ही इस दिशा में कोई फैसला करेगी. इस बेमतलब के बयान के बावजूद, अगर नारे भारत-विरोधी और पाकिस्तान के पक्ष में थे, तब भी सरकार को यह पता होना चाहिए कि कानूनन यह राजद्रोह के दायरे में नहीं आता.

मौजूदा सत्ताधारी गिरोह द्वारा इस पुराने पड़ चुके कानून का जिस तरह गलत इस्तेमाल किया जा रहा है वो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की पूरी तरह अवमानना है. इसका मतलब हरेक असहमति को राजद्रोह बना देना है. इस गिरोह ने सरकार, राज्य, राष्ट्र और देश के बीच के फर्क को मिटा दिया है और वो खुद को राष्ट्रवाद और देशभक्ति का साकार रूप मानने लगा है, इसलिए जो कोई भी इसके सामने खड़ा होता है वो खुद ब खुद राजद्रोही बन जाता है. पिछले चुनावों में 69 फीसदी भारतीयों ने उनके पक्ष में वोट नहीं डाला था और उनके प्रति कुछ असहमति जाहिर की थी, और इस दलील के मुताबिक वे संभावित रूप से राजद्रोही हैं, और इस तरह यह दलील इस देश को राजद्रोही लोगों का एक राष्ट्र बना देती है.

औपनिवेशिक विरासत

 
धारा 124-ए का मसौदा मूल रूप से मैकाले के 1837-39 के ड्राफ्ट पीनल कोड (मसौदा दंड संहिता) में बनाया गया था, लेकिन 1860 में लागू हुई आईपीसी में से इसे हटा दिया गया था. इसको 1870 में भारतीय मीडिया, बुद्धिजीवियों और आजादी की लड़ाई लड़ने वालों की असहमत आवाजों को दबाने के लिए लागू किया गया. इसके सबसे शुरुआती मुकदमों में से एक 1891 में  बंगोबासी के संपादक जोगेंद्र चंद्र बोस का मुकदमा था, जो एज ऑफ कॉन्सेंट बिल की आलोचना करने और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के नकारात्मक आर्थिक प्रभावों पर टिप्पणी करने के लिए उन पर चला था. इसके बाद अनेक मुकदमे चले, सजाएं हुईं. लोकमान्य तिलक को इस अधिनियम के तहत 1897 में कसूरवार ठहराया गया लेकिन उन्हें 1898 में मैक्स वेबर जैसी अंतरराष्ट्रीय रूप से मशहूर शख्सियत के दखल के साथ इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि ऐसा कुछ नहीं करेंगे, न लिखेंगे और न बोलेंगे जिससे सरकार के प्रति नाखुशी को बढ़ावा मिलता हो. यह कानून ‘नाखुशी’ (disaffection) की अजीबोगरीब बात की ओट में सरकार के प्रति वफादारी की मांग करती है, जिसको तिलक के खिलाफ मुकदमे के दौरान परिभाषित करते हुए जज ने बताया था कि नाखुशी का मतलब मतलब सरकार के प्रति ‘प्यार की कमी’ है. आगे चल कर इसका शिकार बने गांधी ने इसकी साफ-साफ आलोचना करते हुए कहा था, ‘कानून के जरिए आप प्यार नहीं जगा सकते और न इसको अपनी मर्जी से चला सकते हैं. अगर किसी को किसी इंसान से प्यार नहीं है, तो उसे अपनी नाखुशी को जाहिर करने की इसकी पूरी आजादी होनी चाहिए, बशर्ते वो हिंसक तरीके नहीं अपनाता और इसके लिए लोगों को प्रोत्साहित करने और भड़काने नहीं लग जाता.’ आगे चल कर गांधी राष्ट्रपिता बने और भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना, लेकिन यह कठोर औपनिवेशिक कानून, बल्कि पूरा का पूरा आईपीसी ही अच्छे लगने वाले जुमलों और बातों के संवैधानिक मुलम्मे के साथ जस का तस अपना लिया गया.

संविधान सभा में राजद्रोह को हटाने के लिए एक संशोधन पेश किया गया था, लेकिन के.एम. मुंशी की दखल ने इसे बचा लिया, जिनकी दलील थी कि सरकार की आलोचना और सुरक्षा और व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले उकसावे के बीच में फर्क किया जा सकता है. पहले संविधान संशोधन के वक्त प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने साफ साफ कहा था कि राजद्रोह कानून बुनियादी तौर पर असंवैधानिक है. इसके बावजूद राजद्रोह कानून कानून की किताब में बना रहा और केंद्र और राज्य सरकारें बार-बार इसका इस्तेमाल राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए करती रहीं. इस कानून को पहली बड़ी संवैधानिक चुनौती पचास के दशक में मिली जब तारा सिंह गोपी चंद (1951), साबिर रजा (1955) और राम नंदन (1958) के तीन मामलों में इसे बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन करने के कारण रद्द कर दिया गया. पहले मामले में मुख्य न्यायाधीश एरिक वेस्टन ने लिखा, “भारत अब एक सार्वभौम लोकतांत्रिक राज्य है. ...विदेशी शासन के वक्त जरूरी माना गया राजद्रोह का कानून अब इस बदलाव की वजह से ही नामुनासिब हो गया है.” बाद में राम नंदन के मामले में, जिनको खेतिहरों और मजदूरों को अपनी सेना बना कर सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए प्रोत्साहित करने के भड़काऊ भाषण का कसूरवार ठहराया गया था, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में धारा 124-ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई. अदालत ने राम नंदन को कसूरवार माने जाने को खारिज कर दिया और धारा 124-ए को असंवैधानिक घोषित किया.

कानून की वापसी
 

लेकिन 1962 में सर्वोच्च न्यायालय ने केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में इस फैसले को पलट दिया. केदार नाथ सिंह बिहार में फॉरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के एक सदस्य थे, उन्होंने कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और तानाशाही का आरोप लगाया था और जमीन के फिर से बंटवारे की विनोबा भावे की कोशिशों को निशाना बनाया था. उन्होंने क्रांति की बात की थी, जो पूंजीपतियों, जमींदारों और कांग्रेस नेताओं को उखाड़ फेंकेगी. ट्रायल कोर्ट ने उन्हें आईपीसी की 124-ए और 505-बी के तहत कसूरवार ठहराया. उन्होंने इस फैसले के तहत अपील किया. पटना उच्च न्यायालय ने उनकी अपील को खारिज कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह कानून की संवैधानिकता को तो कायम रखा, लेकिन इसे सिर्फ उन्हीं कार्रवाइयों में लागू किए जाने लायक बताया जिनमें कानून-व्यवस्था भंग किए जाने का रुझान मिलता है  या फिर जिनमें फौरन हिंसा भड़काई गई हो. जजों ने साफ-साफ यह कहा कि अगर राजद्रोह कानून की व्याख्या व्यापक हुई तो यह संवैधानिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा. इसलिए अदालत ने अमेरिकी कानून की तर्ज पर राजद्रोह के मामलों को तय करने के लिए इस बात पर जोर दिया कि उस कार्रवाई का असर क्या था, न कि अपने आप में वह कार्रवाई क्या थी. इसने बहुत साफ-साफ कहा कि अगर ‘लिखे या बोले गए शब्द, जिनसे सरकार के खिलाफ सिर्फ नाराजगी या दुश्मनी पैदा होती हो’ के मामले में धारा 124-ए को लागू किया गया तो ऐसे में यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के अधीन होगी. यह अनुच्छेद अन्य बातों के अलावा सभी नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति के, शांति पूर्ण रूप से जमा होने और संगठित होने के अधिकार देता है.

कोई कार्रवाई सचमुच राजद्रोह है, या फिर इसके नाम पर किसी तरह से बोलने की आजादी को कुचलने की कोशिश हो रही है, इसकी पहचान के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने ‘फौरन हिंसा’ भड़काने की जो कसौटी रखी है, उस पर वो अपने फैसलों में बार-बार जोर देता रहा है जैसा कि एस. रंगराजन वगैरह बनाम पी. जगजीवन राम; इंद्र दास बनाम असम राज्य, और अरुप भुइंयां बनाम बनाम असम राज्य मामलों में देखा जा सकता है. इस संदर्भ में सबसे अहम फैसलों में से एक बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य है, जिसमें दो सिखों पर इंदिरा गांधी की हत्या के दिन खालिस्तान के पक्ष में और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप लगाया गया था. नारे साफ तौर पर भारतीय सार्वभौमिकता और सरकार को कमजोर करते हैं, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपितों को बरी कर दिया क्योंकि उन्होंने फौरी तौर पर कोई हिंसा नहीं भड़काई थी. सर्वोच्च न्यायालय ने इसे साफ किया कि देश से अलग होने या हिंसक तरीके से सरकारों को उखाड़ फेंकने की हिमायत करना भी राजद्रोह के दायरे में नहीं आता, जब तक कि यह फौरी तौर पर हिंसा को उकसावा न देता हो.

कानून का राज कहां है

कानून भले ही ऐसा हो, लेकिन सरकारें इसे राजनीतिक असहमति को कुचलने या फिर लोगों को काबू में करने की खातिर उन्हें आतंकित करने के लिए इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल करती रही हैं. बदकिस्मती ये है कि अरुंधति रॉय, एसएआर गीलानी, डॉ. बिनायक सेन और हाल ही में जेएनयू के छात्रों, तमिल लोक गायक कोवन, हार्दिक पटेल और असीम त्रिवेदी जैसे कुछ मशहूर मामले ही मीडिया में जगह बना पाते हैं. दिलचस्प बात ये है कि गीलानी और रॉय के मामले में राजद्रोह के मुकदमे पुलिस द्वारा नहीं बल्कि निचली अदालत द्वारा थोपे गए. कुछ कम जाने माने मामलों में शामिल है एक कश्मीरी स्कूली शिक्षक का मामला जिसको कश्मीर घाटी में अशांति से संबंधित सवाल वाला एक प्रश्न पत्र तैयार करने के लिए राजद्रोही बताया गया, दलित सामाजिक कार्यकर्ता और विद्रोही के संपादक सुधीर धवले को माओवादी संपर्कों के लिए गिरफ्तार किया गया, अहमदाबाद में द टाइम्स ऑफ इंडिया के स्थानीय संपादक भारत देसाई को अपने एक वरिष्ठ रिपोर्टर और फोटोग्राफर के साथ इस आरोप का सामना करना पड़ा, जिन्होंने पुलिस अधिकारियों की काबिलियत पर सवाल उठाए थे और उनके और माफिया के बीच रिश्तों का आरोप लगाया था; एक भारत-पाक क्रिकेट मैच के दौरान पाकिस्तान के लिए खुशी मनाने वाले कश्मीरी छात्रों पर इसका आरोप लगाया गया. लेकिन गरीब आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों के ऐसे बेशुमार मामले हैं, जिन पर किसी की भी निगाह नहीं जाती.

एक तरफ जहां अवाम के हक में खड़े कार्यकर्ता और बुद्धिजीवियों को राजद्रोह के आरोपों में परेशान किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ असली अपराधियों को महान देशभक्त बताया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजद्रोह की जो परिभाषा दी गई है, उसकी सबसे अच्छी मिसाल 1992-93 में बंबई दंगों के पहले और उसके दौरान बाल ठाकरे के भाषण हैं, जिन्होंने श्रीकृष्णा आयोग के मुताबिक मुसलमानों की हत्याओं के लिए सीधे-सीधे उकसाया. उसके पहले भाजपा नेताओं द्वारा रथ यात्रा के दौरान और अयोध्या में 1992 में दिए गए भाषण हैं, जिनका अंजाम ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद की तबाही और खौफनाक सांप्रदायिक दंगे रहे. ये राजद्रोह के सटीक मामले हैं. खुद नरेंद्र मोदी द्वारा 2002 में दिए गए सांकेतिक बयान भी राजद्रोह की मिसाल हो सकते हैं, जो गुजरात में 2000 मुसलमानों के कत्लेआम की वजह बने. और बेशक साधुओं और साध्वियों और प्रवीण तोगड़िया और प्रमोद मुतलिक जैसों द्वारा लगातार जहर उगलना तो पक्के तौर पर राजद्रोह है, जो सीधे-सीधे मुसलमानों के खिलाफ हिंसा भड़काते हैं.

राजद्रोह के मामलों के इतिहास को देखें तो उनमें से शायद ही कोई अदालत में टिक पाता है, लेकिन पुलिस बेधड़क इसका इस्तेमाल करती जा रही है, जैसा कि एमनेस्टी के मौजूदा मामले में देखा गया है. इस मामले में विडंबना ये है कि सेमिनार में एबीवीपी की हरकत को राजद्रोही कहा जा सकता है, क्योंकि इसने सीधे-सीधे एक भीड़ को एमनेस्टी के दफ्तर पर हमला करने के लिए उकसाया और सार्वजनिक व्यवस्था को भंग किया, जबकि कश्मीरी छात्रों द्वारा लगाए गए आजादी के नारों से कुछ भी नहीं हुआ था. अनुभव के आधार पर साबित तथ्य यह है कि सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा तभी होता है जब एक प्रभावशाली इंसान, जो हरेक मामले में एक ऐसा राजनेता होता है जिसे राज्य का समर्थन हासिल होता है, कोई विवादास्पद बयान देता है. कार्यकर्ता भले ही लोगों को विद्रोह में उठ खड़े होने को उकसाएं, उन्हें जनता की तरफ से ऐसी कोई प्रतिक्रिया मुश्किल से ही मिलती है.

लेकिन फिर यह अधिनियम कानून का हिस्सा अभी तक क्यों बना हुआ है, जो लोकतंत्र के इतने अयोग्य है? हमारे भलेमानस जजों ने इसकी व्याख्या की है, लेकिन जिस भाषा में यह व्याख्या की गई है वह अभी भी पुलिस को इसके लिए एक पर्याप्त ओट देती है कि वह लोगों को परेशान करती रहे. और शासकों का मकसद ही यही है. संविधान की संरक्षक अदालतों को इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर देना चाहिए, क्योंकि यह संविधान की आत्मा को पूरी तरह से नकारता है. अगर जनता सार्वभौम है और उसने ही सरकार बनाई है, तो फिर जनता को ही कैसे राजद्रोही कहा जा सकता है? जिन चुने हुए प्रतिनिधियों पर भरोसा करते हुए जनता ने उन्हें सत्ता सौंपी है, अगर वो गलत आचरण करते हैं और इस भरोसे का उल्लंघन करते हुए अपनी सत्ता का गलत इस्तेमाल करते हैं, तो असल में राजद्रोह तो इसे होना चाहिए.

वक्त आ गया है कि हमारा सर्वोच्च न्यायालय इस कानून को और ऐसे ही दूसरे कठोर कानूनों को खत्म करे और हमें इस मजाक से राहत दिलाए.

गुजरात आंदोलन के नेता जिग्नेश मेवाणी से एक बातचीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/14/2016 04:17:00 PM


गुजरात में चल रहे मौजूदा दलित आंदोलन को जिग्नेश मेवाणी ने एक शक्ल और एक दिशा दी है. भले ही वे इसके अकेले नेता नहीं हैं, लेकिन वे इस आंदोलन का चेहरा और दिमाग दोनों हैं. मौजूदा आंदोलन की रीढ़ उना दलित अत्याचार लड़त समिति उन्हीं की पहल पर बनी और वे इसके संयोजक हैं. 35 वर्षीय जिग्नेश एक वकील, आरटीआई कार्यकर्ता और दलित अधिकार कार्यकर्ता रहे हैं. राज्य में वे दलितों के जमीन पर अधिकार के मुद्दों पर अथक लड़ाई लड़ने वाले एक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं.
 

स्वतंत्र पत्रकार सुरभि वाया ने जिग्नेश मेवाणी से यह बातचीत 4 अगस्त को की थी और अंग्रेजी में यह कारवां पत्रिका में प्रकाशित हुआ. हालांकि यह बातचीत मूलत: हिंदी में ही हुई थी, लेकिन यहां पोस्ट करने के लिए हमें इसके अंग्रेजी अनुवाद से हिंदी अनुवाद करना पड़ा है. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

अब तक हाशिया की पोस्टों का, खास कर आनंद तेलतुंबड़े के लेखों का, हिंदी से गुजराती में अनुवाद करते आए जिग्नेश मेवाणी के इस साक्षात्कार को हाशिया पर पोस्ट करते हुए हमें खुशी हो रही है .
 
 

सुरभि वाया: उना की घटना में आपकी समझ से ऐसा क्या था जिसने इस विद्रोह की शुरुआत की? क्यों यह एक चिन्गारी बन गया?

जिग्नेश मेवाणी: जिस तरह उना की घटना का वीडियो वायरल हुआ, इसे व्हाट्सएप पर भेजा जा रहा था, जिसमें दिन दहाड़े सब देख सकते थे कि उना कस्बे में आप चार दलित नौजवानों को पीट रहे हैं, एक तरह से उनकी खाल उधेड़ रहे हैं...

इसके बाद पूरे दलित समाज का आत्म सम्मान और इज्जत भी छीन लिया गया. आपने एक इंसान और एक समुदाय के आत्म सम्मान को दिन दहाड़े सबकी आंखों के सामने कुचल कर रख दिया. जिस तरह इसे मीडिया ने उठाया और एक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया, उसने भी आंदोलन को मजबूती दी. लेकिन यह तो होना ही था.

सुरभि वाया: अब मोदी केंद्र में हैं, क्या इस वजह से गुजरात के हिंदू गिरोहों का चरित्र बदला है?
 

जिग्नेश मेवाणी: एक बड़ी सावधानी से सोची-समझी रणनीति के तहत संघ परिवार और भाजपा ने पूरे देश में दलितों के भगवाकरण की परियोजना शुरू की थी. उन्होंने गुजरात में भी इसको आजमाया. लेकिन मुख्यत: जन विरोधी, गरीब विरोधी गुजरात मॉडल में दलितों के लिए अपनी हार और अपने शोषण के अलावा और कुछ नहीं रखा था. एक ऐसा दौर था जब वे हिंदुत्व की विचारधारा के साथ चले गए थे, लेकिन वह दौर अब खत्म हो रहा है और वे अब इसको पहचान सकते हैं कि ये लोग असल में कैसे हैं. जब आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है और दूसरी तरफ वे “वाइब्रेंट” और “गोल्डेन गुजरात” जैसी बड़ी बड़ी बातों का जाप सुन रहे हैं. “सबका साथ सबका विकास” जैसी बातों के नारे लगाए जा रहे हैं, लेकिन इसमें लगता है कि दलित इससे बाहर हैं. इसलिए दलित भी इसको महसूस करने लगे हैं कि उनको इस गुजरात मॉडल में क्रूरता और हिंसा के अलावा और कुछ नहीं मिलने वाला है.

सुरभि वाया: आनंदीबेन पटेल और नरेंद्र मोदी सरकारों में आप क्या फर्क देख सकते हैं?

 
जिग्नेश मेवाणी: कोई फर्क नहीं है. मोदी हुकूमत के दौरान एससी, एसटी या ओबीसी के बीच जमीन बांटने के बजाए इसको अडाणी, अंबानी और एस्सार को दिया गया. आनंदीबेन ने भी यही मॉडल आगे बढ़ाया है. इसके अलावा, चूंकि मोदी दिल्ली पहुंच गए थे इसलिए आनंदीबेन की हुकूमत में एग्रीकल्चल लैंड सीलिंग एक्ट में भी फेर-बदल किया गया, जो भूमिहीनों को जमीन देने के प्रावधान वाला एक प्रगतिशील कानून था. इनमें से किसी भी हुकूमत ने जातीय हिंसा और दलित अधिकारों के मुद्दों पर कोई काम नहीं किया है.

सुरभि वाया: गुजरात में दलितों और दलित आंदोलनों के इतिहास पर कुछ कह सकेंगे?

 
जिग्नेश मेवाणी: 1980 के दशक में अनेक गैर दलित भी [दलित] आंदोलन का हिस्सा बने. दलित पैंथर्स का हमेशा ही एक बहुत रेडिकल, प्रगतिशील एजेंडा और घोषणापत्र था. दलित आंदोलन का यह एक पहलू है. इसकी वजह से एक जुझारू मानसिकता विकसित हुई – मतलब अगर रूढ़िवादी उनसे अच्छे से पेश नहीं आए तो फिर हिंसक प्रतिक्रिया होगी. संदेश साफ था, कि वे अपने अधिकारों के लिए अथक रूप से लड़ सकते हैं. [दलित पैंथर] के घोषणापत्र में दिए गए कार्यक्रम में मजदूर संघ बनाने, बुनियादी अधिकारों के लिए लड़ने, जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ लड़ने जैसी बातें शामिल थीं. लेकिन ये साकार नहीं हो सकीं. सिर्फ घोषणापत्र का नाम बदल दिया गया.

दूसरी तरफ गुजरात में बहुत थोड़ी प्रगतिशील ताकतें रही हैं जो दलितों की स्वाभाविक सहयोगी बन सकती थीं. इसके साथ साथ जब वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियां आईं तो पहचान की राजनीति भी एक बड़ा फैक्टर बनी. भारत भर में दलित आंदोलन इस राजनीति की गिरफ्त में आ गए. 1990 के दशक के बाद दलित आंदोलन जातिवाद से लड़ने, मनुवाद मुर्दाबाद की जुमलेबाजी में फंस गया और इसने इन मुद्दों को नहीं उठाया कि दलितों के पास रोटी, छत और घर जैसी बुनियादी चीजें हासिल हों. हमेशा ही ऐसे संगठन, लोग और संस्थान रहे हैं जिन्होंने दलितों के मुद्दों को उठाया, खास कर अत्याचारों और जमीन के संघर्ष को उठाया. लेकिन एक ऐसा मंच अभी बनना बाकी है जो इन सभी विचारों को एक साथ ला सके और मुद्दों के सामने रख सके.

गुजरात में जहां तक दलित आंदोलनों की बात है पिछले दो या तीन दशकों में मैं बस यही देख सकता हूं कि ऐसे लोग हैं जो काम करना चाहते हैं और अच्छा काम कर रहे हैं. ऐसा जज्बा है कि अन्याय को रोकने के लिए काम किया जाए, लेकिन इसके लिए मिलजुल कर एक वैचारिक नजरिया नहीं बनाया जा सका और जमीन पर काम करने वाले लोग दीर्घ कालिक बदलाव लाने के लिए दूसरों के साथ एकजुट नहीं हो सके. इसलिए एक बड़े दलित आंदोलन के खड़े होने की जो उम्मीद थी वो पूरी नहीं हो सकी.

दूसरी तरफ पहचान की राजनीति की वजह से, खास कर मोदी की हुकूमत के दौरान, एक तरफ तो उनका एजेंडा सांप्रदायिक फासीवाद का एडेंडा था और दूसरी तरफ यह वैश्वीकरण का एजेंडा है: भौतिक विरोधाभास बढ़े हैं, गरीबों और अमीरों के बीच गैरबराबरी बढ़ी है, निचली जातियों, निचले वर्गों को काफी भुगतना पड़ा है.

उना का मुद्दा इतना बड़ा क्यों बन गया? इसलिए क्योंकि इसके लिए अब इंतजार नहीं करना था कि पानी के सिर के ऊपर बहेगा. ऐसा होना ही था, क्योंकि गुजरात में ज्यादातर दलित भूमिहीन हैं. यहां गहरा खेतिहर संकट है. ग्रामीण इलाकों में दलित वर्ग का भारी शोषण होता रहा है. शहरों में रहने वाला दलित मुख्यत: औद्योगिक मजदूर है, निजी कंपनियों के लिए काम करता है...

सुरभि वाया: टेक्सटाइल मिल मजदूरों की तरह जिन्होंने 1980 के दशक में यूनियन बनाने की मांग की थी?

जिग्नेश मेवाणी: हां, लेकिन कारखाने के मजदूरों और खेतिहर मजदूरों में एक फर्क है. दलित कारखाना मजदूरों के वक्त उम्मीद थी, संघर्ष की बड़ी चाहत थी और वह खेतिहर मजदूरों में जिंदा थी. इसलिए तब एक बार्गेनिंग पावर थी. कारखानों के आसपास कारखाना मालिकों ने शेल्टर बनाए जहां मजदूरों को रहने के लिए घर दिए. इसलिए एक तरह की एकता थी. लेकिन जो लोग मॉलों में या निजी कॉरपोरेट घरानों में काम करने गए वो बिखरे हुए हैं. उनके बीच का संपर्क भी बहुत कमजोर है. अगर मोदी सरकार उन्हें 4000 रुपए माहवार की नौकरी देना जारी रखती है तो हम औद्योगिक मजदूरों के हालात का अंदाजा लगा सकते हैं. इस तरह एक शहर के औद्योगिक इलाकों में काम करने वाले दलित और भूमिहीन ग्रामीण दलित: इन दोनों ही समूहों का शोषण पिछले 12 से 15 बरसों में बहुत खराब हुआ है.

इनके अलावा अत्याचारों के मामले भी बढ़े हैं. मोदी सरकार के दौरान 2003 से 2014 तक 14,500 मामले दर्ज किए गए थे. 2004 में 34 अनुसूचित जाति की महिलाओं का बलात्कार हुआ था, जो 2014 में बढ़ 74 तक पहुंच गया. 2005 से 2015 के बीच 55 गांवों से दलितों को हिंसक तरीके से बाहर किया गया है – उन्हें वो गांव छोड़ने पड़े जहां वे रहते थे. 55,000 से ज्यादा सफाई कर्मी हैं जो मैला साफ करते हैं. करीब एक लाख सफाई कर्मी हैं जो नगर निगमों में बरसों से न्यूनतम मजदूरी पर काम करते आ रहे हैं और अभी भी स्थायी नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इसतरह एक ओर तो भारी आर्थिक शोषण है और दूसरी तरफ जाति के आधार पर उन्हें जीवन के हर पहलू में दबाया जाता है. 2012 में राज्य पुलिस ने 16, 17 और 21 साल के तीन दलित नौजवानों को इतने बुरे तरीके से पीटा कि एक तरह से उनकी खाल उधड़ गई थी, और बाद में उन्हें एके-47 से गोली मारी गई क्योंकि वे एक दिन पहले हुए अत्याचार के एक मामले में रिपोर्ट दर्ज कराने जा रहे थे. चार बरसों के बाद भी इस मामले में कोई इंसाफ नहीं हुआ है. दलित अत्याचारों के मामलों में गुजरात में कसूर साबित होने की दर महज तीन फीसदी है – 97 फीसदी लोग बस तोड़ दिए जा रहे हैं.

उनके लिए गुजरात में कोई इंसाफ नहीं है. यह बात अरसे से मन में जमा होती रही है.

सुरभि वाया: 2015 में आपने एक आरटीआई दायर किया था जिसमें आपने गुजरात में दलितों के बीच जमीन के बंटवारे के बारे में कुछ दिलचस्प संख्याएं शामिल की थीं.

जिग्नेश मेवाणी:
आरटीआई को लेकर मेरे काम का मुख्य सरोकार भूमिहीन खेतिहर मजदूरों और दलितों से रहा है, खास कर जमीन के अधिकार से. भारत ऊंची जातियों, ऊंचे वर्गों का एक जमावड़ा है, है न? अगर आप ऑब्जेक्टिवली देखें तो राज्य के सभी अंगों पर ऊंची जातियों और ऊंचे वर्ग की इस जोड़ी का कब्जा है. उत्पादन के सभी साधन उनके हाथों में हैं और खास कर उनका जमीन पर कब्जा है. देहाती इलाकों में ऊंची जातियों का दबदबा खास कर उनके द्वारा जमीन पर कब्जे की वजह से ही है. इसलिए भूमि सुधार बेहद जरूरी हैं.

गुजरात में, खास कर हरेक जिले में, दलितों को हजारों एकड़ जमीन दिया जाना एक मजाक है. यह सिर्फ कागज पर ही हुआ है. मिसाल के लिए, आप कल्पना करें कि मुझे जमीन का मालिकाना दिया गया है. मुझे कागज का एक पर्चा मिलेगा जिसमें लिखा होगा, मैं, जिग्नेश मेवाणी, मेरे पास सर्वे नंबर है जो इसका सबूत है कि मेरे पास एक निश्चित गांव में छह बीघे जमीन है. लेकिन जमीन पर असली कब्जा हमेशा ही ऊंची और प्रभुत्वशाली जातियों का बना रहेगा. इसका मतलब है कि उनको [दलितों को] 1000 एकड़ जमीन मिली है लेकिन सिर्फ कागज पर. असली, जमीनी कब्जे की गारंटी कभी नहीं दी गई.

सुरभि वाया: मेरे मां-बाप बताते हैं कि जब वे सबसे पहले अहमदाबाद रहने आए तो यहां घेट्टो नहीं थे और ये बस हाल की परिघटना है.

जिग्नेश मेवाणी: यह मोदी मैजिक है. [2002] दंगों में नरोदा पाटिया, नरोदा गाम, गुलबर्ग, सरदारपुरा और बेस्ट बेकरी में जिस तरह मुसलमानों को मारा गया...इसके बाद उनके पास कोई और विकल्प नहीं था. वे हिंदू इलाकों में किस तरह रहेंगे? वे अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहते और रहने का ठिकाना खोज रहे हैं. आनंदीबेन मेहसाना से आती हैं, प्रधानमंत्री मोदी भी वहीं से आते हैं और राज्य के गृह मंत्री भी वहीं से आते हैं. उसी मेहसाना जिसे में पिछले तीन महीनों में, चार गांवों में दलितों का सामाजिक बहिष्कार हुआ है और उन्हें उनके घरों से निकाल दिया गया है. दंगों के नतीजे में मुसलमान भारी तादाद में उन जगहों से उजड़ गए जहां वे पले-बढ़े थे और इन घेट्टो में चले आए. उसी तरह ये मनुवादी ताकतें दलितों को उनके गांवों से जबरन खदेड़ रही हैं.

सुरभि वाया: दलित-मुसलमान एकता के हालिया आह्वान पर आप क्या सोचते हैं?

जिग्नेश मेवाणी:
यह सचमुच, सचमुच एक अच्छी बात है. मैंने मुकुल सिन्हा और निर्झरी सिन्हा के साथ करीब 8 बरसों तक काम किया है. [मुकुल सिन्हा एक जाने माने एक्टिविस्ट और मानवाधिकार वकील थे. वो और उनकी पत्नी निर्झरी सिन्हा गुजरात में मोदी सरकार के मुखर विरोधी थे. निर्झरी अभी जन संघर्ष मंच चलाती हैं, जो उन्होंने शुरू किया था]. मैंने 2002 दंगों के बाद होने वाली घटनाओं पर नजर रखी है और मैंने राज्य में मुठभेड़ों में की जानेवाली हत्याओं में अमित शाह और नरेंद्र मोदी की भूमिका पर भी नजर रखी है. इन मुद्दों से मेरा सरोकार
ठीक उन्हीं वजहों से था और मैं उन मुद्दों में पड़ा, जिन वजहों से मैंने दलित अधिकारों के लिए काम शुरू किया. इसलिए मैं हमेशा ही चाहता रहा हूं कि एक दलित-मुसलमान एकता का आह्वान किया जाना चाहिए, कि उन्हें एक मंच पर लाया जाना चाहिए. आने वाले दिनों में इन दोनों समूहों को एकजुट करने के लिए ज्यादा ठोस कदम उठाए जाएंगे.

सुरभि वाया: तो बाकी के देश में हिंदू गिरोहों के सिलसिले में जो हो रहा है उसमें और गुजरात के हालात में आप संबंध और फर्क देखते हैं?

जिग्नेश मेवाणी: जबसे मोदी केंद्र में गए हैं, संघ परिवार के छुटभैए समूह ज्यादा सक्रिय हो गए हैं. भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट लूट और हिंदुत्व एजेंडा को आगे बढ़ाना उनकी [आनंदीबेन पटेल] सरकार का भी मुख्य मुद्दा रहा है. एक बड़ा फर्क यह रहा कि आनंदीबेन आतंक के उस राज को जारी नहीं रख सकीं.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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