हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मोदी का भगवा नवउदारवाद

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/28/2014 12:15:00 AM

आनंद तेलतुंबड़े

नरेंद्र दामोदरदास मोदी 26 मई 2014 को तब भारतीय लोकतंत्र की असाधारण क्षमता के प्रतीक बने, जब उन्होंने यह दिखाया कि कैसे एक मामूली पृष्ठभूमि से आने वाला एक साधारण आदमी ऊंचे उठते हुए देश का प्रधानमंत्री बन सकता है. हालांकि उन्हें इस ऊंचाई पर उठाने की पूरी कवायद दुनिया की ऐसी ही सबसे महंगी कवायदों में से एक थी (इस पर अंदाजन 10,000 करोड़ रुपए खर्च हुए), लेकिन इस तथ्य के बावजूद उनके हिमायतियों ने इसे भारतीय लोकतंत्र के चमत्कार के रूप में पेश किया. इस पूरी प्रक्रिया में मोदी ने अंधाधुंध रफ्तार से 300,000 लाख किमी दूरी तय की और 5,800 जगहों पर रैलियों को संबोधित किया. इसमें वो 1350 जगहें भी शामिल हैं, जहां 3डी तकनीक से मोदी की 10 फुट ऊंची होलोग्राफिक छवि का इस्तेमाल करते हुए एक ही वक्त में 100 रैलियों को संबोधित किया गया. सभी संभव माध्यमों के जरिए विज्ञापनों का ऐसा तूफानी हमला किया गया कि बच्चे भी ‘अबकी बार मोदी सरकार’ और ‘अच्छे दिन आनेवाले हैं’ गाते फिर रहे थे. बेशक इसमें आरएसएस के लाखों कार्यकर्ताओं की फौज का भी समर्थन था, जिसने यह दिखाया कि अगर जरूरत पड़ी तो उनकी राह को आसान बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, असम के कोकराझार और ऐसी ही जगहों की धरती खून से लाल की जा सकती है. मतदाताओं को लुभाने की ऐसी गहन प्रक्रिया का जोड़ विकसित लोकतंत्रों तक में मिलना मुश्किल है.


यह सब बहुत बड़े पैमाने पर किया गया, और अगर इसके पैमाने को छोड़ दें तो अपने आप में इसमें कुछ भी नया नहीं था. लेकिन यह पैमाना ही था, जिसने सबसे ज्यादा असर डाला. असल में ये चुनाव अनेक तरह से अलग थे. चुनाव के दौरान की प्रक्रिया को अलग कर दें तब भी इसके जो नतीजे आए, उनका पैमाना ही स्तब्ध कर देने वाला था. सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करनेवाले हमारी अनोखी चुनावी व्यवस्था के कारण, जो अपने बुनियादी सैद्धांतिक स्तर पर भी जनता के प्रतिनिधित्व का मखौल उड़ाती है, भाजपा को 282 वोट मिले. यह 31 फीसदी वोटों के साथ कुल सीटों का 53 फीसदी है, जो कि बहुमत से खासा ऊपर है. इसने गठबंधन के दौर को विदाई दे दी, जिसके बारे में कइयों का मानना था कि यह बना रहेगा. सहयोगी दलों को मिला कर राजग का आंकड़ा 334 तक चला गया, और असल में लोकसभा में वामपंथी दलों को छोड़कर भाजपा का कोई विपक्षी नहीं बचा है. नीतिगत मामलों में कांग्रेस असल में इसकी एक घटिया प्रतिलिपि ही रही है. राज्य सभा में भाजपा का बहुमत नहीं है, लेकिन वहां ऐसे रीढ़विहीन दल हैं, जो भाजपा को बचाने के लिए बड़ी आसानी से तैयार हो जाएंगे, जैसा कि हाल में एक ट्राई अध्यादेश के मामले में हुआ. इस तरह भाजपा एक ऐसी स्थिति में है, जिसमें वह जो चाहे वह कर सकती है. फासीवाद के जिस भूत की आशंका बहुतों द्वारा जताई जा रही थी, वह एक सच्ची संभावना बन कर सामने आ गई है. सवाल है कि क्या भारत एक फासीवादी राज्य में तब्दील हो जाएगा? क्या यह एक हिंदू राज्य बन जाएगा? क्या यह धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए एक कैदखाना बन जाएगा?

पूंजी का तर्क

मोदी ने अपना चुनावी अभियान अध्यक्षीय प्रणाली वाली शैली में चलाया था, जिसमें वे अकेले अपने बारे में शेखी बघारते हुए अहंकार से भरी बातें करते फिर रहे थे. लेकिन चुनावों के बाद उन्होंने खुद को एक बदले हुए व्यक्ति के रूप में पेश किया.  पार्टी के संसदीय दल के नेता के रूप में अपनी पुष्टि के बाद जब वे संसद भवन में दाखिल हो रहे थे, तो इसे लोकतंत्र का मंदिर बताते हुए इसकी सीढ़ियों पर माथा टेक कर प्रणाम किया. फिर पवित्र दस्तावेज के रूप में संविधान की शपथ लेने के बाद उन्होंने ऐलान किया कि उनकी सरकार गरीबों, नौजवानों और महिलाओं के लिए समर्पित होगी. उन्होंने सभी पड़ोसी देशों के प्रमुखों को निमंत्रण देते हुए और भी वाहवाही हासिल की. अपनी पहली विदेश यात्रा पर भूटान जाकर उन्होंने संकेत दिए कि वे पड़ोसियों के साथ दोस्ताना रिश्तों को अहम मानते हैं. ब्राजील के फोर्तालेसा में आयोजित छठे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 100 अरब डॉलर की जमा पूंजी वाले विकास बैंक की स्थापना में उनका भी योगदान था. यह बैंक ब्रिक्स के भीतर व्यापार और विकास को बढ़ावा देगा. देश के भीतर उन्होंने नौकरशाही को अनुशासन में रखने के लिए अनेक कदम उठाए हैं लेकिन साथ ही उन्होंने नौकरशाहों से कहा है कि वे मंत्रियों और सांसदों की राजनीतिक दखलंदाजी का विरोध करें. कल का फेकू अब अब चुपचाप, पूरी गंभीरता से अपना काम कर रहा है. उन्होंने एक महीना बीतने के बाद अपना मुंह और दावा किया कि उनकी सरकार की उपलब्धियां कांग्रेस के 67 बरसों के शासनकाल से बेहतर थीं. हालांकि उनके पक्ष में ऐसी अनेक बातें कही जा सकती हैं, जिन्होंने लोगों को प्रभावित किया है और वे सोचने लगे हैं कि मोदी आरएसएस या भाजपा से स्वतंत्र होकर काम कर सकते हैं और इस तरह वे जनता के लिए अच्छा काम भी कर सकते हैं.

असल में ये और दूसरे अनेक कदम पूंजीपतियों के लिए व्यापार और निवेश के मौके पैदा करने के मकसद से उठाए गए थे, जिन्होंने मोदी में काफी निवेश किया है और उनसे उम्मीदें लगा रखी हैं. सुधारों को हमेशा ही जनता के नाम पर लागू किया जाता है और उसे जायज ठहराने के लिए ‘रिस कर नीचे आने’ की संदिग्ध दलील पेश की जाती है. लेकिन असल में उनका मकसद पूंजी के हितों को पूरा करना होता है जिसे वे मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था के जरिए आगे बढ़ाते हैं. इसलिए ये सुधार मेहनतकश विरोधी होते हैं. सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का निजीकरण, सार्वजनिक सेवाओं का व्यावसायीकरण, प्राकृतिक संसाधनों को निजी व्यक्तियों के हवाले करना, कीमतें तय करने के लिए बाजार के तंत्र पर भरोसा करना, करों तथा शुल्कों की बाधाएं हटा कर व्यापार को प्रोत्साहित करना, नियामक नियंत्रण को वापस ले लेना, राज्य को आर्थिक गतिविधियां संचालित करने में अक्षम बनाने के लिए राजकोषीय कदम उठाना और इस तरह निजी हितों को बढ़ावा देना, निजी क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए कर तथा श्रम सुधार अपनाना और विनियमन को लागू करना नवउदारवाद के लक्षण हैं. लोगों की ‘अच्छे दिनों’ की खुमारी तब झटके से टूटी जब कुछ ही दिनों के भीतर रेलवे बजट आया, जिसमें रेलवे के यात्रा किराए तथा माल भाड़े में क्रमश: 14.2 तथा 6.5 फीसदी की भारी बढ़ोतरी की गई, जिससे पहले से ही महंगाई के बोझ से दबे लोगों पर और ज्यादा बोझ बढ़ेगा. नरेंद्र मोदी इस साल सितंबर में अपनी अमेरिका यात्रा पहले भारत-अमेरिका परमाणु करार को लागू करना चाहते हैं, जिसके संकेत देते हुए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) को भारत के असैनिक परमाणु कार्यक्रम की निगरानी के लिए और अधिक पहुंच मुहैया कराई गई है. यह कदम हो या फिर तीन महीनों में खाद्य सुरक्षा विधेयक को स्थगित करने की बात हो या रेलवे में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे खोलना हो या फिर विदेशी निवेश को लुभाने के लिए पेट्रोलियम सेक्टर में भारी नीतिगत बदलाव हो, ये सारी बातें ठेठ नवउदारवाद को ही साबित करती हैं. हालांकि इन दक्षिणपंथी नीतियों की शुरुआत कांग्रेस ने की थी और उसी ने इन्हें लागू भी किया था, लेकिन इस मामले में भाजपा के साथ उसकी स्वाभाविक संगत है. यह इन नीतियों को लागू करने में भाजपा द्वारा दिखाई जा रही तेजी से साफ जाहिर है.

फिर हिंदुत्व किधर हैॽ

मोदी ने विकास के अपने इरादे पर जोर देने के लिए सोचसमझ कर ही हिंदुत्व पर चुप्पी साधे रखी है. लेकिन एक पक्के संघी के बतौर, जिसका प्रमाण खुद संघ के मुखिया मोहन भागवत ने दिया है, वे भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने के अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को कभी भूल नहीं सकते. हालांकि यह एजेंडा कई तरीकों से अमल में लाया जा सकता है. जैसे कि रामजन्म भूमि आंदोलन या गोधरा के बाद मुसलमानों का कत्लेआम सीधे चुनावी फायदों के लिए लोगों को बांटने के घिनौने तरीके थे, वहीं इनसे कुछ नरम तरीके भी हो सकते हैं जिनके जरिए भीतर ही भीतर संस्थानों को हिंदुत्व के अड्डों में बदला जा सकता है. हिंदुत्व का पहला या सख्त रास्ता शांति को भंग करता है और पूंजी ऐसा पसंद नहीं करेगी. फिर इतना भारी जनाधार हासिल होने की वजह से वह सचमुच जरूरी भी नहीं है. इसलिए मोदी ऐसे सांप्रदायिक झगड़ों के पक्ष में नहीं होंगे, जिनसे निवेश का माहौल बिगड़ जाए. हालांकि सौ सिरों वाला संघ परिवार अपनी जीत से अंधा हो चुका है और वह जमीनी स्तर पर ऐसी समस्याएं खड़ी कर सकता है, जैसा कि पुणे में मुस्लिम नौजवान मोहसिन शेख की हत्या के मामले में दिखा है. इसके अलावा हिंदुत्ववादी गुटों द्वारा अनेक जगहों पर सांप्रदायिक गुंडागर्दी दिखाई गई है. ऐसी हरकतों को काबू में करना मोदी के लिए मुश्किल हो सकता है. लेकिन वे निश्चित रूप से हिंदुत्व का नरम तरीका अपनाएंगे जिसमें वे व्यवस्थित रूप से संस्थानों का भगवाकरण करेंगे. गुजरात में उन्होंने ऐसा ही किया है. इसकी एक बहुत साफ मिसाल येल्लाप्रगदा सुदर्शन राव की चुपचाप की गई नियुक्ति है, जो काकतिया विश्वविद्यालय में इतिहास तथा पर्यटन प्रबंधन के एक अनजान से प्रोफेसर हैं. उन्हें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का नया अध्यक्ष बनाया गया है. मानव संसाधन विकास मंत्री शायद यह नहीं सोचतीं कि इस पद के लिए योग्यता मायने रखती है, खुद उनकी योग्यता तथा झूठे शपथ पत्र पर भी आपत्ति उठाई गई है. नए नए अध्यक्ष बने ये माननीय इतना मूर्खता पूर्ण दुस्साहस रखते हैं कि उन्होंने ‘भारतीय जाति व्यवस्था’ की अच्छाइयों को खोज लिया और और यह घोषणा भी कर डाली कि उनका एजेंडा महाभारत की घटनाओं की तारीख निश्चित करने के लिए  शोध कराने का है.

आम अवधारणा के उलट, असल में नवउदारवाद और विचाराधारात्मक हिंदुत्व में कोई आपसी विरोध नहीं है. व्यक्तिवाद और सामाजिक डार्विनवादी रवैए के बारे में इन दोनों के विचार मेल खाते हैं. इसी तरह हिंदुत्व और फासीवाद के बीच समानता भी इतनी जगजाहिर है कि उसके विस्तार में जाने की जरूरत नहीं. फासीवाद मूलत: राजकीय तानाशाही, कानून से परे रूढ़िवादी समूहों की धौंस, राष्ट्रीय अंधभक्ति, एक बड़े कद के नेता के सामने व्यक्तियों और समूहों के समर्पण और सामाजिक जीवन को डार्विनवादी नजरिए से देखने की हिमायत करता है. हिंदुत्व के झंडाबरदारों का भी यही चरित्र है. इसे समझने के लिए आपको बस गोलवलकर को देखने की जरूरत है, जो हिंदुत्व विचारधारा के पूज्य सिद्धांतकार हैं. इस तरह अपने सारतत्व में हिंदुत्व, नवउदारवाद और फासीवाद एक दूसरे के पूरक हैं. और यह पूरकता अपने भव्य रूप में नरेंद्र मोदी में अभिव्यक्त होती है. उल्लेखनीय समाजशास्त्री आशीष नंदी ने उन्हें तब ‘एक फासिस्ट का श्रेष्ठ और ठेठ नमूना’ कहा था जब मोदी की कोई हैसियत नहीं थी. चाहे वह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करते हुए केरल, गुजरात, पश्चिम बंगाल, राजस्था, महाराष्ट्र, त्रिपुरा और उत्तर प्रदेश के राज्यपालों से इस्तीफा देने को कहना हो या फिर जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के संबंध में अनुच्छे 370 को खत्म करने का संकेत देना हो, या समान नागरिक संहिता अपनाए जाने की बात हो या फिर भारत के दूरसंचार नियमन प्राधिकार अधिनियम 1997 को बदलने के लिए अध्यादेश की घोषणा हो, जिसमें नियामक संस्था के प्रमुख की ‘भविष्य में किसी केंद्र या राज्य सरकार में नियुक्ति’ पर पाबंदी थी, ताकि नृपेंद्र मिश्र को प्रधान मंत्री के प्रधान सचिव के बतौर नियुक्त की जा सके, इन सबमें नरेंद्र मोदी की फासीवादी निशानियों को देखना मुश्किल नहीं है. उन्होंने दल के भीतर किसी संभावित विरोध को खत्म करने के लिए अपने आदमी अमित शाह को दल के अध्यक्ष के रूप में बैठा दिया है और राजनीतिक वर्ग को दरकिनार करने के लिए नौकरशाही के साथ सीधा संपर्क बना रहे हैं.

भगवा नवउदारवाद

भगवा नवउदारवाद नवउदारवादी आर्थिक सुधारों की दिशा में एक आक्रामक अभियान है. इसमें साथ ही साथ सामाजिक-सांस्कृतिक तरीकों से वर्चस्ववादी हिंदुत्व का प्रसार करते हुए अपने राजनीतिक जनाधार को और एकजुट तथा मजबूत बनाए रखा जाता है. इसमें निजीकरण, उदारीकरण, विनियमन तथा पूंजी को सारी सुविधाएं मुहैया करना शामिल है, जिसमें पड़ोसी देशों के साथ बेहतर रिश्ते बनाया जाना भी शामिल है ताकि व्यावसायिक माहौल बनाया सके और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विस्तार हो सके. इन सबको देखते हुए भाजपा का कट्टर राष्ट्रवाद भी बहुत सोच-समझ कर चलाया जा रहा है. विवादास्पद वैदिक प्रकरण को भी इसी रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए. वेद प्रताप वैदिक चाहे तकनीकी रूप से आरएसएस से जुड़े हों या नहीं, उन्हें भाजपा ने हाफिज सईद से अनधिकारिक-अनौपचारिक बातचीत के लिए नियुक्त किया था, जिसे छुपाने के लिए वह कश्मीर पर बयानबाजी कर रही थी. भगवा नवउदारवाद का मतलब यह भी होगा कि श्रम कानूनों को फिर से लिखा जाएगा, दूसरे कानूनों का सरलीकरण किया जाएगा (जो शुरू भी हो चुका है) तथा संविधान का इस तरह संशोधन किया जाएगा कि यह भारत को व्यवसाय के और अधिक अनुकूल बना सके. इसका मतलब है कि भूमि अधिग्रहण को और आसान बना दिया जाएगा, देश के प्राकृतिक संसाधनों को पूंजी की लूट के लिए खोल दिया जाएगा. इसका मतलब होगा कि नौकरशाही की सभी महत्वपूर्ण जगहों पर हिंदुत्ववादी लोगों को बैठाया जाएगा और शैक्षिक तथा दूसरे शोध संस्थानों का भगवाकरण किया जाएगा. किसी असहमति को पनपने से पहले ही उसे कुचलने के लिए आंतरिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत किया जाएगा और किसी भी प्रतिरोध को रत्ती भर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. यह सब अकेले सर्वोच्च नेता नरेंद्र मोदी की कमान में होना है.

अगर यह योजना नाकाम रही, तो फिर उग्र हिंदुत्व की राह अपनाई जाएगी.


(अनुवाद: रेयाज उल हक. समयांतर के अगस्त, 2014 अंक में प्रकाशित)

मेरी कल्पना का भारत: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/22/2014 06:09:00 PM

आनंद तेलतुंबड़े

‘…मेरा आदर्श समाज एक ऐसा समाज है जो आजादी, बराबरी और भाईचारे पर आधारित हो।’–बाबासाहेब आंबेडकर
यह एक अजीब विडंबना है कि अपने प्राकृतिक संसाधनों के मामले में भारत दुनिया का सबसे समृद्ध देश है लेकिन वही दुनिया के सबसे गरीब लोगों का घर है. एंगस मेडिसन के मुताबिक, सन 1600 के आसपास पूरी दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भारत की हिस्सेदारी करीब एक चौथाई थी लेकिन इसके बाद उसमें गिरावट आने लगी. 1870 आते आते यह फिसल कर 12.2 फीसदी पर आ गई और आज दुनिया के जीडीपी में भारत की हिस्सेदारी महज 6 फीसदी पर आ पहुंची है. मेडिसन ने भारत के इस पतन के लिए, यहां औद्योगिक क्रांति के न होने को जिम्मेदार ठहराया. यह सही है, लेकिन अर्थव्यवस्था के सबसे बेहतर दिनों में भी, भारतीयों की बहुसंख्यक आबादी के हालात दूसरों के मुकाबले किसी भी तरह बेहतर नहीं रहे होते. क्योंकि उसे जाति व्यवस्था ने अनेक तरह से बहिष्कृत कर रखा था. अगर मेडिसन के अनुमान सही थे तो इससे सिर्फ इसी बात की पुष्टि होती है कि जीडीपी किसी देश के विकास का एक घटिया पैमाना है.

जाति व्यवस्था भारत की सबसे नुकसानदेह बीमारी है, जो उसे संयोग से लगी लेकिन जिसे उसके कुलीन तबके ने पूरी तरह सोच-समझ कर बढ़ावा दिया. पुराने दिनों में देशों की फौजी ताकत सीधे-सीधे अपनी आबादी पर निर्भर करती थी, जिसे एक संभावित सेना के रूप में देखा जाता था. लेकिन भारत में जाति व्यवस्था ने सिर्फ क्षत्रियों की एक छोटी सी आबादी को ही सेना के रूप में संगठित होने की इजाजत दी, भले ही उनमें लड़ने की क्षमता या प्रेरणा हो या न हो. दूसरी तरफ इसने बाकी सारे लोगों के हथियार रखने पर पाबंदी लगा दी. इस तरह भारत बाहरी लोगों के लिए एक आसान शिकार बना रहा कि कोई भी यहां आए, और इसे गुलाम बना दे. शुक्रिया जाति व्यवस्था का कि भारत का दर्ज इतिहास पराजय और गुलामी का इतिहास रहा है. जाति व्यवस्था ने सिर्फ अपनी और अपनी जरूरतों की परवाह करने वाली उच्च जातियों के कुलीनों के स्वार्थी चरित्र को और मजबूत बनाया. समकालीन समय में पूंजीवादी तौर-तरीकों ने इसे और भी उभार दिया है. इस आत्म-केंद्रिकता ने लोकतांत्रिक राज व्यवस्था के तहत एक स्टेट्समैन की भूमिका निभाने की उनकी काबिलियत को पूरी तरह नष्ट किया. ब्रिटिशों से सत्ता हस्तांतरण के बाद, यही कुलीन तबका शासक वर्ग बनकर जनता के खिलाफ साजिश करने लगा और इसने ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने का मौका गंवा दिया.

उन्होंने संविधान के बुनियादी औपनिवेशिक चरित्र को छुपाने के लिए उसे लोगों को अच्छी लगने वाली बातों से सजाया. संविधान की अगर कुछ अपनी पहचान है तो वह है उसका भाग चार, जिसमें राज्य के नीति निर्देशक तत्व दिए गए हैं. लेकिन उनको लागू करना अदालतों के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता. इसी वजह से ये अब तक अनुपयोगी बने हुए हैं. औपनिवेशिक शासन के आइपीसी जैसे सब संगठनों और क्रियागत ढांचे को बरकरार रखा गया. जातियों के मामले में संविधान ने अस्पृश्यता को गैरकानूनी करार दिया लेकिन औपनिवेशिक समय से ही चली आ रही अनुसूचित जातियों के पक्ष में सकारात्मक भेदभाव की नीतियों के बहाने उसने जातियों को कानूनी शक्ल दे दी. असल में शासक वर्ग ने जाति के कीड़ों का एक पिटारा बनाया, ताकि जब वो चाहे, उसे खोला जा सके. हम देखते हैं कि यह पिटारा उन्होंने 1990 में खोल दिया. नए शासकों ने बड़े ही व्यवस्थित रूप में बुर्जुआ के हितों में नीतियां बनाईं और उन्हें बड़ी कुशलता से क्रांतिकारी लफ्फाजी में लपेट कर पेश किया. मिसाल के लिए, एक तरफ तो प्रधानमंत्री नेहरू ने सार्वजनिक रूप से भारत के अग्रणी पूंजीपतियों द्वारा तैयार किए गए बॉम्बे प्लान से अपने को अलग कर लिया था, लेकिन असल में जब उन्होंने पंचवर्षीय योजना का ऐलान किया, तो पहली तीन योजनाओं में इसी बॉम्बे प्लान के आंकड़ों को अपनाया. याद रहे यह योजना 15 वर्षीय निवेश की रूपरेखा थी. दुनिया को यह दर्शाया गया कि भारत समाजवादी रास्ते पर जा रहा है लेकिन असल में उसे पूंजीवाद के पक्ष में धकेला जा रहा था. इसी तरह जनता ने सबसे लंबे समय से जिस भूमि सुधार की उम्मीद लगा रखी थी, उसे बहुत सफाई से इस तरह लागू किया गया कि उससे केवल बड़ी आबादी वाली शूद्र जातियों के तबके से धनी किसानों का एक वर्ग तैयार हो सके. हरित क्रांति को अनाज की समस्या के समाधान के रूप अपनाया गया, लेकिन अनाज के अलावा उसने अमीर किसानों के इस वर्ग को मालामाल बनाया, पूंजीवादी रिश्तों का ग्रामीण भारत में प्रसार किया और दलितों को ग्रामीण सर्वहारा के स्तर पर गिरा दिया. बदकिस्मती से शासक अभिजात तबके की साजिशें बिना किसी रुकावट के अब भी जारी हैं.

पिछले दो दशकों से सरकार नवउदारवादी आर्थिक नीतियों पर चल रही है, जिसने बुनियादी तौर पर राज्य के कल्याणकारी मुखौटे को उतार फेंका है और सारी प्रचलित सामाजिक सेवाओं को बाजार की निजी पूंजी के हवाले कर दिया है. आबादी के बहुसंख्यक हिस्से को नुकसान पहुंचाते हुए स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा जैसी बुनियादी सेवाओं का भारी पैमाने पर व्यावसायीकरण हुआ है. पूरा का पूरा ग्रामीण भारत, जहां हमारी 70 फीसदी आबादी रहती है, गुणवत्तापरक शिक्षा से पूरी तरह कट गया है. तथाकथित विकास केवल थोड़े से ऊपरी वर्ग को फायदा पहुंचा रहा है और इसे देख कर तेजी से बढ़ रहा मध्य वर्ग उत्तेजित हो रहा है. निम्न वर्ग तक नवउदारवाद के फर्जी सिद्धांतों के मुहावरे के मुताबिक बस कुछ बूंदें ‘रिसते हुए’ पहुंच रही हैं. जबकि सरकार हर साल अमीरों को हजारों करोड़ रुपए बांट देती है, वहीं वह जनता को महज ‘कल्याणकारी’ योजनाओं और नए अधिकारों के नाम पर बहलाए रखती है, जो असल में उनको अधिकारहीन और अधिक निर्धन बनाए रखता है. ऊपर से जाति और संप्रदाय की पहचान को भी बढ़ावा दिया जाता है, ताकि उन्हें और भी कमजोर किया जा सके.

एक ओर जबकि शहरी कुलीन तबके का इंडिया तेजी से अमेरिका बनता जा रहा है, जनता की व्यापक बहुसंख्या वाले भारत के हालात रसातल को छू रहे हैं.

पूरी की पूरी नवउदारवादी व्यवस्था अपनी कल्पना के भारत के लिए काम करती है, जिसको मीडिया में काफी जोर शोर से पेश किया जाता है. व्यापक जनता की नजर से भारत की कल्पना शायद ही कोई करे. व्यापक जनता के लिए, भारत की कल्पना को महज एक दिवास्वप्न या खयाली पुलाव नहीं होना चाहिए, वरना वे यह भरोसा खो देंगे कि इसको व्यवहार में लाया जा सकता है. इस कल्पना को ठोस और व्यापक जनता की जरूरतों के मुताबिक जमीनी होना होगा. आज भारत की कल्पना बाबासाहेब आंबेडकर के आदर्श समाज के रूप में करने का कोई फायदा नहीं है. उनकी बात राह दिखाने वाली रोशनी हो सकती है, एक आदर्श जो हकीकत से इतना दूर है कि उसकी कल्पना भी करना मुश्किल हो.

मेरी कल्पना के भारत को अपने नजरिए में कुछ बदलाव करना होगा, जो वास्तव में आर्थिक वृद्धि और समृद्धि के मौजूदा लक्ष्यों का विरोधी नहीं है. मेरी कल्पना का भारत इस बात को समझेगा कि कंगाली और निर्धनता के दूर दूर तक फैले हुए समुद्र में इन लक्ष्यों पर बने रहना एक बिंदु के बाद नामुमकिन हो सकता है. इसलिए उस बिंदु तक पहुंचने से पहले इन बाधाओं को हटाना बेहद जरूरी है. इसलिए मेरी कल्पना का भारत लोगों को इस तरह बुनियादी रूप से सशक्त बनाने के लिए कदम उठाता कि वे नवउदारवाद की गाड़ी को उलट न दें, बल्कि वे इसे आगे धकेल सकें. इस बुनियादी सशक्तीकरण में निजी सशक्तीकरण, सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण, सामाजिक-राजनीतिक सशक्तीकरण और सामाजिक-सांस्कृतिक सशक्तीकरण शामिल हैं. इनको क्रमश: साध्य के लिए जरूरी कदम ये हैं: स्वास्थ्य तथा शिक्षा; भूमि सुधार और रोजगार; न्यूनतम लोकतंत्र की बहाली; तथा रूढ़िवाद पर अंकुश लगाने और आधुनिकता को बढ़ावा देने की नीतियां. अगर भारत इन चार में से पहले दो पर भी ध्यान दे तो भी उसकी पूरी कायापलट हो जाएगी.

स्वास्थ्य के मामले में मेरा भारत सार्वजनिक साफ सफाई रखेगा, सबको पीने का पानी प्राथमिकता के आधार पर मुहैया कराएगा और यह एक सार्वभौमिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली स्थापित करेगा ताकि नियंत्रित मूल्यों पर अनाज तथा दूसरी खाद्य सामग्री की जरूरतें पूरी की जा सकें. इससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में अपने आप में भारी कमी आएगी. स्वास्थ्य बुनियादी देखभाल सभी भारतीयों के लिए मुफ्त होगी, जिसे सभी इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों की एक श्रृंखला के जरिए मुहैया कराया जाएगा. इन केंद्रों के पास आपातकालीन एंबुलेंस भी होगी. जटिल बीमारियों के इलाज के लिए समुचित दूरी पर स्थापित अस्पताल होंगे जिनके पास जरूरी उपकरण होंगे. ये सभी का मुफ्त इलाज करेंगे, जिसे आसान किस्तों वाली एक स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत मुहैया कराया जाएगा. राज्य यह सचेत रूप से यकीनी बनाएगा कि किसी भी बच्चे पर अपने मां-बाप की अक्षमताओं का ठप्पा न रहे. यह सभी गर्भवती महिलाओं को पूरा पोषण और जन्म से पहले जरूरी सारी देखरेख मुहैया कराएगा, जिन्हें इसकी जरूरत है. यह सुनिश्चित करेगा कि सभी बच्चे स्वस्थ पैदा हों. वे अपने जन्म के बाद अठारह साल तक पड़ोस के स्कूलों में एक अनिवार्य, मानक शिक्षा की व्यवस्था के जरिए शिक्षा हासिल करेंगे, जिसे पूरी तरह राज्य चलाएगा. कथित ‘शिक्षा का अधिकार’ के तहत केजी से लेकर पीजी तक खड़े हुए, अनेक स्तरों वाले शिक्षा के बाजार को पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा. उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को कायम रखा जाएगा और यह मुफ्त में दी जाएगी या फिर राज्य भारी रियायतों के साथ उचित मूल्य पर इसे उपलब्ध कराएगा.

लोगों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण के लिए सारी भूमि का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाएगा. एक तरफ जहां खेती योग्य जमीन को किसानों की सहकारी समितियों को दे दिया जाएगा जो वैज्ञानिक खेती के लिए जरूरी उपकरणों से लैस होंगी. दूसरी तरफ बाकी की जमीन को गैर खेतिहर आधारभूत संरचना तथा उद्योगों के विकास के काम में लाया जाएगा. स्थानीय लोगों की बुनियादी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए देश भर में सौर तथा पवन ऊर्जा जैसी कभी खत्म न होनेवाली ऊर्जा की व्यापक परियोजनाएं शुरू की जाएंगी. ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था के जरिए किसानों की सहकारी समितियों को उचित कर्जे मुहैया कराए जाएंगे. अपनी उपज से उपयोगी वस्तुएं बनाने के लिए इन समितियों को साथ मिल कर कृषि-आधारित और अन्य उद्योगों की स्थापना करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जिनमें खेती की पैदावार के हर हिस्से से तरह तरह की उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन किया सके. इसमें गैर खेतिहर आबादी को रोजगार दिया जाएगा. निर्माण उद्योग को इस तरह विकसित किया जाएगा कि इसमें शिक्षा व्यवस्था से निकले नौजवानों को लाभकारी तरीके से रोजगार दिया जा सके. सेवा क्षेत्र जनता के जीवन स्तर के भीतर से ही, उससे जुड़ कर विकसित होना चाहिए.

एक बार जनता का बुनियादी सशक्तीकरण हो जाए और उसे अपनी लाभकारी गतिविधियों के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा हासिल हो जाए तो जाति, वंश, धर्म, लिंग वगैरह के आधार पर होने वाले भेदभावों की ज्यादातर गुंजाइश खत्म हो जाएगी. इसी के साथ सकारात्मक भेदभाव की उस व्यवस्था का आधार भी खत्म हो जाएगा, जिसने केवल शासक वर्गों के हितों की ही सेवा की है और जनता को कमजोर किया है. खास तौर से जातियों को बनाए रखने वाले ढांचों और संस्थानों की व्यवस्थित रूप से पहचान करके उनको नष्ट करते हुए जातियों का पूरी तरह उन्मूलन किया जाएगा और जनता में प्रबोधन के लिए व्यापक शैक्षिक कार्यक्रम चलाए जाएंगे. जातियों को बरकरार रखने वाले मुख्य अपराधियों में से एक हमारी मौजूदा चुनावी व्यवस्था भी है, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित किया जाता है. यह व्यवस्था इन जातीय पहचानों पर बड़े पैमाने पर निर्भर करती है. जनता का प्रतिनिधित्व यकीनी बनाने के लिहाज से यह पूरी तरह बेकार साबित हुई है और इसलिए इसको हटा कर यहां की जरूरतों के मुताबिक बनाई गई आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को स्थापित किया जाएगा.

जनता का यह बुनियादी सशक्तीकरण भारत को विकास की एक दूसरी ही दुनिया में ले जाएगा जिसके बारे में हमारा अंधा शासक वर्ग कल्पना तक नहीं कर सकता. संसाधनों की कमी का हमेशा बनाया जानेवाला बहाना एक झूठ है. इसका इस्तेमाल करते हुए, हमारे शासक वर्ग ने साम्राज्यवादी हितों को पालने-पोसने वाली एक दलाल संस्कृति को बनाए रखा है. सरकार ने पिछले महज नौ सालों में 36 ट्रिलियन (36000000000000) रुपए कॉरपोरेट कंपनियों को बांटे हैं और उससे भी ज्यादा काला धन देश के बाहर जाने दिया है. भारत के पास सभी संसाधन हैं; कमी बस राजनीतिक इच्छा की है. उन्हें यह समझना चाहिए कि ये कदम कतई क्रांतिकारी नहीं है, बल्कि वे सब बुर्जुआ दायरे में ही आते हैं.

यह हमारी बदकिस्मती ही है कि भारत की यह साधारण सी कल्पना भी आज क्रांतिकारी लगती है जो किसी को भी माओवादी कह कर जेल भिजवा देने के लिए काफी हो.

(हिंदी अनुवाद आउटलुक साप्ताहिक में प्रकाशित. अनुवाद: रेयाज उल हक)

एक दीक्षांत संबोधन: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/03/2014 11:17:00 PM

कर्नाटक स्टेट ओपेन यूनिवर्सिटी, मैसूर में 14वें दीक्षांत समारोह में दिया गया दीक्षांत संबोधन

आनंद तेलतुंबड़े
10 मई 2014

कर्नाटक के महामहिम राज्यपाल और कर्नाटक स्टेट ओपेन यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति डॉ. हंसराज भारद्वाज, बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट एंड एकेडमिक काउंसिल के सदस्यो, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ए.जी. रामकृष्णन, और प्रतिष्ठित शिक्षाविदो, सामाजिक हस्तियो, फैकल्टी के सदस्य और प्यारे छात्रो

मेरे लिए यह बेहद सम्मान की बात है कि इत्तेफाक से मुझे कर्नाटक स्टेट ओपेन यूनिवर्सिटी के 14वें दीक्षांत में दीक्षांत संबोधन देने की जिम्मेदारी मिली है. शायद यह इतिहास में एक अनोखा मौका होगा जब कोई डिग्री हासिल करने वाला व्यक्ति ही दीक्षांत भाषण भी देगा.

दोस्तो, आईआईटी प्रोफेसर की मेरी नई पहचान एक संयोग है, क्योंकि मैंने अपनी ज्यादातर जिंदगी कॉरपोरेट दुनिया में बिताई है, जो विश्वविद्यालयों से निकलनेवाले छात्रों का मुख्य उपभोक्ता है. और हम एक ऐसे दौर में रह रहे हैं, जिसे नवउदारवादी दौर कहा जाता है. यह महज कॉरपोरेट केंद्रित दुनिया को दिया गया एक अच्छा सा नाम भर है. यहां होने वाली हर चीज के पीछे पूंजी का तर्क काम करता है, और यह पूंजी पुराने जमाने की पूंजी नहीं है, बल्कि यह इसका सबसे घिनौना रूप है – वैश्विक पूंजी. शिक्षा के सिलसिले में पूंजी का तर्क ये है कि यह लोगों में लगने वाली वह लागत है, जिसकी मदद से वे खुद को ‘मानव संसाधन’ में बदलते हैं, ताकि उन्हें वैश्विक पूंजीवाद की सबकुछ को हड़प लेने वाली बड़ी चक्की उन्हें निगल सके. ऐसे में, शायद मैं अनोखे रूप से इससे संबंधित आपूर्ति शृंखला का प्रतिनिधित्व करता हूं, जिसमें आज मैं शिक्षा उद्योग में आपूर्तिकर्ता की भूमिका निभा रहा हूं और पहले के अपने कॉरपोरेट अवतार में एक ग्राहक की भूमिका निभा चुका हूं.

बीते हुए दौर में शिक्षा एक सम्मानजनक चीज हुआ करती थी. हमारी एशियाई संस्कृति में यह ईश्वर की पूजा के बराबर थी. लेकिन पश्विमी दुनिया में भी यह बहुत अलग नहीं थी. बीसवी सदी के सबसे प्रभावशाली दार्शनिकों में से एक जॉन डुई का एक मशहूर कथन है, ‘शिक्षा जीवन के लिए तैयारी नहीं नहीं है, शिक्षा अपने आप में जीवन है.’ जॉन डुई कोलंबिया यूनिवर्सिटी में बाबासाहेब आंबेडकर के प्रोफेसरों में से एक थे और बाबासाहेब उनसे इतने प्रभावित थे कि 1953 में उन्होंने कहा कि वे अपने पूरे बौद्धिक जीवन के लिए जॉन डुई के एहसानमंद हैं. यह बात बाबासाहेब ने तब कही थी, जब वे खुद सदी के महानतम व्यक्तियों में से एक के रूप में स्थापित हो चुके थे. बाबासाहेब आंबेडकर ने डुई के दर्शन को विरासत में हासिल किया जिसमें शिक्षा को एक मुख्य साधन माना गया है और इसे दलितों के लिए मुक्ति के मुख्य साधन के रूप में देखा. मशहूर व्यक्तियों में वे शायद अकेले थे, जिन्होंने उच्च शिक्षा पर खास तौर से जोर दिया. वरना शिक्षा को लेकर सारी बयानबाजियां साक्षरता पर ही जोर देती थीं, लेकिन जैसा कि हम जानते हैं, साक्षरता इंसान का कोई भला नहीं करती सिवाए इसके कि वह उसे बाजार की गतिविधियों के दायरे में ले आती है. साक्षर होकर वह विज्ञापनों को पढ़ सकता है और बाजार में आने वाले उत्पादों का उपभोक्ता बन सकता है. लेकिन हकीकत में जो बदलाव आता है, वह उच्च शिक्षा के जरिए आता है, जो आपको सोचने में सक्षम बनाती है, आपकी जिंदगी पर असर डालने वाली प्रक्रियों को सोचने के लायक बनाती है और इसके बारे में कुछ करने के लिए प्रेरित करती है. सोच का यह पूरा ढांचा ही एकदम बदल गया है और शिक्षा आज एक ऐसा उत्पाद हो गई है, जो शैक्षिक बाजार में छात्रों द्वारा खरीदी जाती है ताकि वे कॉरपोरेट दुनिया की जरूरतों के हिसाब से खुद को तैयार कर सकें. अफसोस की बात यह है कि उत्पादन प्रक्रिया से श्रम को बेदखल करने की तकनीकी चमत्कारों के चलते आज यह दुनिया उन सबका उपयोग कर पाने के काबिल नहीं है और इसके बजाए वह हमारे विश्वविद्यालयों के स्नातकों की ज्यादातर तादाद को रोजगार के नाकाबिल बता कर बेरोजगारों की एक फौज खड़ी कर रही है, जिसे मुहावरे की भाषा में बेरोजगारों की ‘आरक्षित फौज’ कहा जाता है.

यह वैश्विक पूंजी का एक निर्मम तर्क है, जिससे बच पाने की स्थिति में शायद कोई भी देश नहीं है. इसलिए देशों की सीधी-सादी रणनीति यह है कि इसकी अपनी ताकत और कमजोरियों के हिसाब से उसका इस्तेमाल किया जाए. मैं जो कह रहा हूं, उसका मतलब वे लोग बेहतर समझ सकते हैं, जिन्होंने प्रबंधन विज्ञान में स्नातक किया है. प्राचीन समय से ही एशिया में चीन हमारा एक जोड़ीदार रहा है. इस संदर्भ में यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि कैसे चीन इस उदारवादी विचार का इस्तेमाल करते हुए एक वैश्विक औद्योगिक ताकत के रूप में उभरा है और कैसे हम लड़खड़ाते हुए अपनी उस वृद्धि दर को फिर से हासिल करने की कोशिश करते रहे हैं, जिस पर कुछ समय पहले हम इतराते फिर रहे थे. 1989 में चीन विकास के अनेक मानकों पर भारत से पीछे था. इसके पास एक बहुत बड़ी आबादी थी, जिसका इसे पेट भरना था और बेहतर जीवन की उनकी उम्मीदों को भी पूरा करना था, जो 1949 की सर्वहारा क्रांति के जरिए काफी बढ़ गई थीं. हम बस शर्मिंदगी में खुद को तसल्ली देने के लिए चीन की तरक्की को खारिज करते रहे और कहते रहे कि चीन एक तानाशाही वाला देश है और हम लोकतंत्र हैं. लेकिन हमारी इस बात ने असल में इस तथ्य को ही उजागर किया है कि लोकतंत्र और तानाशाही की हमारी समझ कितनी सतही है. हमें इस बात की तारीफ करनी होगी कि चीन एक ऐसी धरती है, जिसने एक अकेली सदी में तीन तीन महान क्रांतियां देखीं और हम ऐसे लोग हैं जिन्होंने पिछले तीन हजार सालों के लंबे अतीत में बदलने से इन्कार कर दिया है. ऐसी राज व्यवस्था के चलते चीनी लोगों को महज डंडे के जोर पर हांका जाना मुश्किल है. इसलिए चीनी शासकों ने इसकी रणनीति बनाई कि कैसे चीनी लोगों को फायदेमंद तरीके से रोजगार दिया जा सके और इसके लिए उन्होंने निर्माण उद्योग के विकास पर जोर दिया. आज उन्होंने इसकी एक ऐसी मजबूत बुनियाद बनाई है, कि इसे दुनिया की कार्यशाला के रूप में जाना जाता है. इस बुनियाद पर आज वे सेवाओं का विकास करने में सक्षम हैं. दूसरी तरफ हमने जो किया वह ठीक इसका उल्टा है. हम घोड़े को गाड़ी के पीछे जोतते हुए उन पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की अंधी नकल कर रहे हैं जिनकी आबादी हमारे सबसे छोटे राज्यों से भी कम है. ऐसा करते हुए हमने खेती के ऊपर सेवा क्षेत्र को अहमियत दी, जबकि खेती पर हमारे लोगों का 60 फीसदी हिस्सा गुजर बसर करता है. और हमने निर्माण क्षेत्र को तो पूरी तरह नजरअंदाज ही कर दिया है. यह सकल घरेलू उत्पाद की हमारी बुनावट में भी दिखता है, जिसमें खेती की महज 17 फीसदी हिस्सेदारी है जबकि इस पर 60 फीसदी के करीब लोग गुजर बसर करते हैं और सेवा क्षेत्र पर महज 25 फीसदी लोगों का गुजारा चलता है, लेकिन यह सकल घरेलू उत्पाद में 66 फीसदी योगदान देता है. जीडीपी में उद्योग महज 17 फीसदी के योगदान पर अंटका हुआ है, जिस पर लगभग इतने ही यानी 15 फीसदी लोगों का गुजारा चलता है. चीन में यह बुनावट एकदम इसके उलट है. हमारे जीडीपी से चार गुना बड़ी उनकी जीडीपी में पिछले साल के मुताबिक खेती, उद्योगों और सेवा क्षेत्र का योगदान क्रमश: 10, 45, 45 फीसदी है. इसमें से सेवा क्षेत्र का उभार पिछले दो दशकों में लोगों के जीवन स्तर में बेहतरी आने के बाद एक जरूरी पूरक के रूप में हुआ है. चीन की सफलता का आधार यह बुनियादी रणनीति है. अगर कोई याद करना चाहे तो यह याद कर सकता है कि बाबासाहेब आंबेडकर ने बहुत पहले, 1918 में छोटी जोतों की समस्या के संदर्भ में भारत के लिए यह रणनीति प्रस्तावित की थी.

मैं चीन में रहा हूं और मैंने उनकी विभिन्न चीजों को बारीकी से देखा है, जिसमें उनके शैक्षणिक संस्थान भी शामिल हैं. एक तरह से, हमारे कुछ आईआईएम और आईआईटी को छोड़ दिया जाए तो हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसकी तुलना उनके संस्थानों से की जा सके. यही वजह है कि विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग में वे हमसे कहीं आगे हैं. यह बात मैं बेहद विनम्रता से कह रहा हूं कि हमारे और उनके बीच फर्क ये है कि चीन के शासक वर्ग को अपनी जनता के प्रति आलोचनात्मक रूप से संवेदनशील होना पड़ा; जबकि अजीब सी विडंबना है कि भारत के लोकप्रियतावादी नीतियों वाले शासक वर्ग ने लोकतंत्र के नाम पर लोगों को धोखा देने में महारत हासिल की है. ऐसा नहीं है कि हमारे संस्थापक नेताओं ने एक ईमानदार और जन-केंद्रित नीतियों का नजरिया (विजन) नहीं दिया था. यह नजरिया संविधान के भाग चार में शामिल है, जिसे ‘राज्य के नीति निर्देशक तत्व’ कहा जाता है. हालांकि वे न्यायिक दायरे से परे हैं यानी किसी भी अदालत में उनकी दुहाई नहीं दी जा सकती, लेकिन उनके बारे में यह अपेक्षा की गई थी कि वे नीतियां बनाते वक्त हमारे नेताओं के ऊपर नैतिक रूप बाध्यकारी होंगे. लेकिन अब तक के पूरे दौर में हम उनकी अनदेखी करते आए हैं और इसके नतीजे के रूप में हम खुद को और भी बढ़ती हुई मात्रा में उलझी हुई परेशानियों से घिरा पा रहे हैं.

मिसाल के लिए, संविधान बनाने वालों ने देश के शासकों को यह जिम्मेदारी दी कि वे संविधान को अपनाए जाने के 10 साल के भीतर 14 साल तक के सभी बच्चों को सार्वभौमिक और मुफ्त शिक्षा मुहैया कराएं. इस मामले के महत्व को इस तथ्य के जरिए देखा जा सकता है कि यह अकेला अनुच्छेद है, जिसमें इसे लागू किए जाने के लिए एक निश्चित समय सीमा तय की गई. लेकिन चार दशकों तक किसी के कानों पर जूं तक न रेंगी. हमारे शासकों की नींद तब टूटी जब 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने मोहिनी जैन और उन्नीकृष्णन के मामले में – जिसका इस विषय से कोई संबंध नहीं था – यह टिप्पणी की कि शिक्षा का अधिकार जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है. लेकिन अब भी शासक वर्ग ने चालबाजी से काम लिया और संविधान में संशोधन करते हुए अन्य बातों के साथ साथ 0-6 आयु वर्ग को इससे बाहर कर दिया तथा राज्य के बजाए इसे अभिभावकों की बुनियादी जिम्मेदारी बना दिया. यह प्रक्रिया आखिरकार 2009 में तथाकथित शिक्षा का अधिकार के साथ अपने अंजाम को पहुंची. इस अधिनियम ने किया यह कि इसने बड़े ही कारगर तरीके से देश में विकसित अनेक परतों वाली शिक्षा व्यवस्था को कानूनी जामा पहना दिया. इसने यह बंदोबस्त की कि बच्चों को अपने अभिभावकों की जाति और वर्ग के मुताबिक शिक्षा हासिल हो, इस बात में और मनु के घिनौने आदेशों में बहुत फर्क नहीं है. उन्होंने लोगों को फिर से धोखा देने के लिए गरीबों के लिए 25 फीसदी आरक्षण का प्रावधान रख दिया, जिसके तहत वे अपने चुने हुए किसी भी स्कूल में नामांकन ले सकते हैं. संविधान ने जो जिम्मेदारी कायम की थी, उसकी मंशा को आसानी से देखा जा सकता है. हालांकि उसे बहुत विस्तार से नहीं लिखा गया है, लेकिन वह इसे यकीनी बनाता है कि अपने अभिभावक के आधार पर कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा. सार्वभौमिक रूप से इस व्यवस्था को मुहल्ले या पड़ोस में स्थित स्कूलों के जरिए मुफ्त, अनिवार्य और सार्वभौम शिक्षा के रूप में जाना जाता रहा है. इसका मतलब यह है कि सभी बच्चे अपने मुहल्ले या पड़ोस के सार्वजनिक रूप से चलाए जाने वाले स्कूलों में समान शिक्षा हासिल करेंगे, चाहे उनका वर्ग या जाति कोई भी हो. मैं इससे भी आगे जाऊंगा और इस प्रावधान की मंशा को देखते हुए मैं कहूंगा कि यह सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि हरेक बच्चा जब दुनिया में अपने कदम रखे तो उस पर अपने अभिभावकों की गरीबी का ठप्पा न हो और वह कुदरती तौर पर सबके बराबर हो. इसका मतलब ये है कि जब एक मां गर्भधारण करे तो एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने से पहले की मां की सारी देख रेख और पोषण की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी राज्य की होनी चाहिए. अगर एक स्वस्थ बच्चे को समान शिक्षा मिले तो जाति तथा वर्ग के जुड़ी तकलीफदेह गैरबराबरी का भार कम हो जाएगा.

इस ठोस आधार पर शिक्षा, माध्यमिक और उच्च शिक्षा, का पूरी ऊपरी ढांचा खड़ा किया जाना चाहिए. हम इन मामलों में इतने संवेदनहीन हैं कि तादाद में तेजी से बढ़ती हुई हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था पर असुविधाजनक सवाल खड़े हो रहे हैं. हमने शिक्षा की इस पवित्र मिट्टी में शैक्षणिक जागीरदारों की एक जहरीली फसल उगने दी है. हम अपने आंकड़ों को बेहतर बनाने के लिए बस संस्थानों की तादाद बढ़ाते गए हैं. आज 500 से ज्यादा विश्वविद्यालय हैं तथा और भी अभी बन रहे हैं. आईआईटी और आईआईएम की तादाद भी कई गुणा बढ़ी है, लेकिन लंबे समय से निर्मित हुई उनकी पहचान धूमिल पड़ी है. संख्याओं में इजाफा करते हुए हमने गुणवत्ता की तरफ से पूरी तरह से आंखें मूंद लीं.

आज शिक्षा व्यवस्था कई तरह की समस्याओं का सामना कर रही है. इसमें से सबसे बड़ी और सबसे आपराधिक समस्या यह है कि पूरे के पूरे ग्रामीण इलाके को गुणवत्तापरक शिक्षा से काट दिया गया है. हमारी आजादी के शुरुआती दशकों में गांवों ने इस राष्ट्र को प्रतिभाशाली लोग दिए. ज्यादातर राजनेता और ऊंचे पद हासिल करने वाले लोग गांवों से आए थे जिसकी वजह गुणवत्ता परक शिक्षा और मेहनत पर आधारित ग्रामीण जीवन की विशेषताएं थीं. मेरे सहित इस मंच पर मौजूद लोगों में से अनेक इसी ग्रामीण शिक्षा की उपज हैं. लेकिन आज, गांव से आने वाले किसी लड़के या लड़की के लिए सैद्धांतिक रूप से यह असंभव है कि वह गांव से उच्च शिक्षा के किसी प्रतिष्ठित संस्थान तक पहुंच सके. और यह याद रखिए कि इन गांवों में अभी भी करीब 70 फीसदी लोग रहते हैं. आरक्षण की सारी बातें अब बेमतलब हो गई हैं क्योंकि उन पर शहरों में रह रहे और अब तक उनका लाभ उठाते आए वर्ग ने कब्जा कर लिया है और देहाती इलाकों के असली जरूरतमंदों के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा है.

इस स्थिति को सुधारने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है. उम्मीद की जा सकती है कि हमारे शासकों की आंखें खुलेंगी और हालात को उस बिंदू पर पहुंचने से पहले ही सुधार लेंगे, जिसके बाद इसे सुधारना मुमकिन नहीं रह जाएगा. पिछले दो दशकों के दौरान उच्च शिक्षा में निजीकरण और व्यावसायीकरण का एक साफ रुझान रहा है. बड़े जोर शोर से लोगों को यह बताया जा रहा है कि निजी संस्थान बेहतर तरीके से चलते हैं, वे गुणवत्तापरक शिक्षा मुहैया कराते हैं. यह सौ फीसदी झूठ है. निजी संस्थान बरसों से चल रहे हैं लेकिन उनमें से एक भी कोई आईआईएम अहमदाबाद या एक आईआईटी या एक जेएनयू नहीं पैदा कर सका है. शिक्षा व्यवस्था में नवउदारवादी तौर-तरीके बड़े पैमाने पर हावी हो गए हैं जो समाज के निचले तबके से आने वाले गरीबों के हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं. भारत में उच्च शिक्षा को 50 अरब डॉलर का उद्योग बताया जा रहा है और स्वाभाविक रूप से वैश्विक पूंजी की नजर इस पर है. सरकार ने हमेशा की तरह संसाधनों की कमी का बहाना बनाते हुए शिक्षा के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे खोल दिए हैं. इसे जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए संसद में अनेक विधेयक लंबित हैं, जो हमारी उच्च शिक्षा को और भी नुकसान पहुंचाएंगे. इससे संकेत मिल रहे हैं कि चीजें और बदतर होंगी. ऐसे में सिर्फ यह उम्मीद ही की जा सकती है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को एक समय जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के बारे में अंदाजा होगा और वे हालात को सुधारने के लिए कदम उठाएंगे.

मैं आपके सामने इन कड़वे तथ्यों को रखने से बच नहीं सकता था. वे सुनने में नकारात्मक लग सकते हैं लेकिन यह असल में खतरे की घंटी है. इसमें सुधार के लिए उम्मीद हम सिर्फ तभी कर सकते हैं जब एक व्यापक जन जागरुकता पैदा की जाए.

जहां तक केएसओयू की बात है, मैंने पाया कि यहां अच्छा काम किया जा रहा है. यहां एक खूबसूरत कैंपस आकार ले रहा है. यह विश्वविद्यालय खास तौर से समाज के गरीब तबकों को लेकर चलती है, जो नियमित विश्वविद्यालयी शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते. दूरस्थ शिक्षा देने के लिए वर्चुअल क्लास रूम तैयार करने के अनेक तकनीकी साधन हैं. अगर विश्वविद्यालय चाहे तो मैं इस सिलसिले में कुछ तकनीकी विचारों से मदद कर सकता हूं. मैं उम्मीद करता हूं कि समय बीतने के साथ साथ यह विश्वविद्यालय दूसरे विश्वविद्यालयों जैसी अच्छी शिक्षा देने के लिए रचनात्मक तरीके अपनाएगा. बाजार के साथ तालमेल बैठाते हुए रचनात्मक रूप से पाठ्यक्रम तैयार करने की काफी गुंजाइश है. आखिरकार, हमें रणनीतिक होना होगा. इन छात्रों को नौकरियां चाहिए. विश्वविद्यालय की शिक्षा वह अकेली चीज है, जिसमें एक बेहतर जीवन की उम्मीद के लिए उनके पास जो भी थोड़ा बहुत संसाधन है, उसका निवेश कर सकते हैं. अगर समय के साथ केएसओयू इस दिशा में एक योजना लेकर आ सके जो देश की ऐसे अनेक खुले विश्वविद्यालयों (ओपन यूनिवर्सिटीज) के लिए एक मॉडल का काम करेगा.

आखिर में, मैं आज अपनी योग्यतम डिग्रियां हासिल करने वाले सब लोगों को बधाई देता हूं, और यह कामना करता हूं कि वे जीवन में खूब तरक्की करें. शुक्रिया

अनुवाद: रेयाज उल हक


यह है कानून का राज? : आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/12/2014 10:24:00 AM


हाशिया पर आप जाने माने जनवादी अधिकार कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक आनंद तेलतुंबड़े के वे मासिक स्तंभ नियमित रूप से पढ़ते रहे हैं, जिन्हें वे इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में मार्जिनस्पीक नाम से लिखते हैं. इसके अलावा भी समय समय पर उनके लेख, व्याख्यान और टिप्पणियां हाशिया पर आते रहे हैं. अब हिंदी की प्रतिष्ठित वैचारिक पत्रिका समयांतर में यह स्तंभ नियमित रूप से हिंदी में प्रकाशित होगा. इसके अलावा आनंद की अन्य रचनाएं प्रमुखता से हाशिया पर पोस्ट की जाती रहेंगी. अनुवाद: रेयाज उल हक.

गोंदिया सत्र न्यायालय से 22 मई 2014 को सभी आरोपों से बरी होने के बाद सुधीर ढवले नागपुर केंद्रीय जेल से छूट गए. लेकिन पुलिस द्वारा माओवादियों के साथ तथाकथित संपर्क रखने के नाम पर गिरफ्तार किए गए इस जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता को बाहर आने में 40 महीने लगे. उनके साथ साथ आठ सह-आरोपितों को भी अदालत ने बरी कर दिया. 2005 में ढवले की ही तरह एक दलित कवि शांतनु कांबले को ठीक ऐसे ही आरोपों के साथ गिरफ्तार किया गया था, और किस्मत से जमानत पर छूटने से पहले उन्हें 100 से ज्यादा दिनों तक यातनाएं सहनी पड़ीं. अब अदालत से वे सभी आरोपों से बरी हैं. अरुण फरेरा चार बरसों से ज्यादा समय से जेल में रहे, यातनाएं झेलीं और पुराने आरोपों में बरी हो जाने के बाद बार बार नए आरोपों में गिरफ्तार करके उन्हें परेशान किया गया. तब कहीं जाकर वे अपने आखिरी मामले में जमानत पर छूट सके. इससे एक कम चर्चित मामला जनवरी 2012 में चंद्रपुर के एक सामाजिक संगठन देशभक्ति युवा मंच के 12 नौजवानों तथा नागपुर के बंधु मेश्राम की गिरफ्तारियों का है. इन सब पर वही आरोप लगाए गए और आगे चल कर ये सभी अदालत द्वारा छोड़ दिए गए. लेकिन छूटने से पहले उन्हें एक से तीन बरस तक पुलिस की यातनाएं, उत्पीड़न तथा जेल में अपमान झेलना पड़ा. इसी कड़ी में अनिल ममाने और दूसरे दो लोगों की गिरफ्तारियों का मामला भी है, जिन्हें अक्तूबर 2007 में तब गिरफ्तार किया था जब वे नागपुर के दीक्षाभूमि में किताबें बेच रहे थे.

हालांकि थोड़ी मुश्किल होती है, लेकिन ये मामले आखिरकार याद आ जाते हैं, क्योंकि ये ज्यादातर उन लोगों से जुड़े मामले हैं जो शहरी इलाकों से आते हैं. मीडिया में उन पर खबरें आती हैं और अदालतों में उनका बचाव हो पाता है. लेकिन दूर दराज के इलाकों के अनगिनत ऐसे मामले हैं जहां माओवादी होने के बहुत अस्पष्ट आरोपों के साथ गिरफ्तार नौजवान लड़के और लड़कियां जेलों में बंद हैं. उनमें से कई पर तो कई आरोप तक नहीं तय किया गया है और उनकी सुनवाई करने के लिए कोई संस्था नहीं है. लाचारी के साथ वे हर पल अपनी जिंदगी को तबाह होते देखते हैं.

नाइंसाफी की कार्यवाही

सुधीर ढवले को नागपुर में उनके कॉलेज के दिनों से ही एक कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता रहा है, जहां वे 1980 के दशक के एक जुझारू छात्र संगठन विद्यार्थी प्रगति संगठन (वीपीएस) का हिस्सा थे. उन्होंने अपने विचारधारात्मक रुझानों तथा उन जन संगठनों के साथ अपने जुड़ाव को कभी छुपाया नहीं, जो मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा का प्रचार करते हैं जिसे मोटे तौर पर नक्सलवाद और अब माओवाद के नाम से जाना जाता है. लेकिन ढवले माओवादी पार्टी के साथ और इसकी हिंसक कार्रवाइयों समेत उसकी गतिविधियों के साथ किसी भी तरह के संबंध से इन्कार करते रहे हैं. मुंबई आने के बाद वे सांस्कृतिक आदोलन में सक्रिय हुए और 1999 में एक वैकल्पिक विद्रोही साहित्य सम्मेलन का आयोजन करने में अग्रणी भूमिका निभाई. यह आयोजन राज्य द्वारा प्रायोजित मुख्यधारा के साहित्य के विरोध में था. इस पहलकदमी ने विद्रोही सांस्कृतिक चलवल की शक्ल अख्तियार की जिसका विद्रोही नाम से अपना द्विमासिक मुखपत्र था. धवले इसके संपादक बने. जल्दी ही विद्रोही महाराष्ट्र के जुझारू कार्यकर्याओं के लिए एक आधार बन गया. उन्होंने पर्चे और किताबें लिखने में अपनी साहित्यिक खूबी का इस्तेमाल किया. जाहिर है कि यह लेखन उन्होंने आदिवासियों और दलितों के मौजूदा संघर्षों के समर्थन में क्रांतिकारी विचारधारा का प्रचार करने के लिए किया. उन्होंने 6 दिसंबर 2007 को रिपब्लिकन पैंथर्स की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई, जो अपनी पहचान ‘जातियों के उन्मूलन के लिए एक आंदोलन’ के रूप में बताता है. वे खैरलांजी में खौफनाक जातीय उत्पीड़न के बाद राज्य भर में शुरू हुए विरोध आंदोलनों में सक्रिय रहे थे. तब महाराष्ट्र के गृह मंत्री ने यह गैर जिम्मेदार बयान दिया था कि इन आंदोलनों को नक्सलवादियों ने भड़काया है. तभी से धवले पुलिस की नजरों में थे. निजी स्तर पर, एक सादगी भरा जीवन जीते हुए उन्होंने अपना पूरा समय इन गतिविधियों को दिया. इसमें उनकी पत्नी भी उनके साथ रहीं, जो वीपीएस की एक पुरानी कॉमरेड थीं और जो मुंबई में बाइकुला के डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मेमोरियल हॉस्पिटल में काम करती हैं.

वर्धा में उनकी गिरफ्तारी के बाद, जहां वे किसी दलित साहित्यिक सम्मेलन में बोलने के लिए गए थे, पुलिस ने मुंबई में उनके घर पर ऐसे छापा मारा मानो वे कोई बहुत खतरनाक आतंकवादी हों. इसके बाद उनकी पत्नी और बच्चों को चिंताजनक तौर पर बहुत मुश्किलों और अपमान से गुजरना पड़ा. उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तो पूरी तरह तबाह हो गई, उनका 12वीं में पढ़ने वाला बेटा फेल हो गया. सम्मानित सामाजिक हस्तियों वाली डिफेंस कमेटी ने गृह मंत्री आरआर पाटील से तीन बार उनकी हिमायत में बातें रखीं, उनके निर्दोष होने की पुष्टि की. लेकिन कमेटी पाटील को डिगा पाने में नाकाम रही. ऐसा दिख रहा था कि पाटील ढवले को सताने का मन बना चुके थे. इस बीच जो कुछ भी हो रहा था वह पूरी तरह गैरकानूनी था. क्योंकि किसी आरोपित के किसी बयान के आधार पर या उनके घर से बरामद किए गए साहित्य के आधार पर पुलिस माओवादियों के साथ उनके संबंध को जिस तरह झूठे तरीके से स्थापित करना चाह रही थी, उसे सर्वोच्च न्यायालय बहुत पहले खारिज कर चुका था. लेकिन पुलिस का यह कहना था कि सबूतों के पुख्ता होने बारे में फैसला करना अदालत का काम है, और वह इस बहाने की ओट में पूरी गैरजिम्मेदारी के साथ अपने आरोपों पर अड़ी रही कि सुधीर ढवले गैर कानूनी गतिविधियों और माओवादी साजिशों के भागीदार थे. अदालत ने पुलिस के मामले को खारिज करते हुए उन्हें बरी कर दिया. लेकिन क्या इससे हुए नुकसानों की भरपाई मुमकिन हैॽ हां, इससे यह जरूर हुआ है कि ढवले को सजा दिलाने और उनके जैसे अनेक कार्यकर्ताओं को आतंकित करने की पुलिस की योजना बिखर गई है. आज ढवले अपनी निजी जिंदगी में पूरी तरह तबाह हो गए हैं, लेकिन अपने मकसद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनके चेहरे पर गहरी उदासी भरी मुस्कान को जरा भी कम नहीं कर पाई है.

एक मानवीय त्रासदी

ढवले की गिरफ्तारी से पहले और बाद में बेहिसाब गिरफ्तारियां हुई हैं: उनमें से अरुण फरेरा की गिरफ्तारी के बारे में मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा हुई. ढवले की ही तरह, जो लोग फरेरा को जानते थे वे पुलिस के आरोपों पर बहुत गुस्से में थे और वे फरेरा के बचाव में आगे आए. तब नक्सल विरोधी सेल के तत्कालीन मुखिया एसएसपी यादव ने यह बेहद गैरकानूनी धमकी दी कि उन्हें भी नक्सल समर्थकों के रूप में गिरफ्तार किया जा सकता है. फरेरा को हर तरह की यातनाएं दी गईं, उन्हें परेशान किया गया. इसी के तहत उन्हें नार्को टेस्ट से भी गुजरना पड़ा जिसके नतीजों ने तब एक छोटी मोटी खलबली पैदा कर दी थी, जब फरेरा ने टेस्ट के दौरान यह बयान दिया कि बाल ठाकरे महाराष्ट्र में नक्सली गतिविधियों के लिए पैसे देते हैं. जिस तर्क के आधार पर ढवले की गिरफ्तारी हुई थी, उसी के आधार पर पुलिस को कम से कम ठाकरे से पूछताछ करनी चाहिए थी. आखिर पूछताछ के दौरान पुलिस चाहती ही है कि आरोपित व्यक्ति किसी का नाम ले और इस तरह फरेरा ने नार्को टेस्ट के तहत जो तथ्य उजागर किया था वह पुलिस के अपने ही दावों की कसौटी पर कहीं ज्यादा प्रामाणिक था. अदालत में फरेरा के खिलाफ कोई आरोप टिक नहीं पाया लेकिन पुलिस उन्हें चार से ज्यादा बरसों तक जेल में रखने में कामयाब रही. अब फरेरा ने राज्य के खिलाफ 25 लाख रुपए के मुआवजे का एक मामला दाखिल किया है. उनके बारे में चाहे जो फैसला आए, बाकियों को तो बस अपने साथ हुई नाइंसाफी को जैसे तैसे कबूल करना होगा.

ढवले के साथ जो आठ दूसरे लोग बरी हुई वे सभी दलित थे और उन सबको झूठे मामलों में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें भी पुलिस के हाथों वैसी ही यातनाएं, उत्पीड़न, अपमान और कैद भुगतना पड़ा, जो बहुत साफ तौर पर गैर कानूनी है. उनके अलावा, खबरों के मुताबिक नागपुर जेल में 44 और लोग बंद हैं, जिन्हें पुलिस ने माओवादी बता कर गिरफ्तार किया है. उनमें से सात औरतें हैं. बेशक उनमें हाल में हुई हेम मिश्रा, प्रशांत राही और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा की गिरफ्तारियां भी शामिल हैं. इनकी खबरें मीडिया में आईं और इन गिरफ्तारियों की भारी निंदा भी हुई. लेकिन इनके अलावा दूसरे लोगों में गढ़चिरोली जिले के भीतरी इलाकों से गिरफ्तार किए गए वे आदिवासी नौजवान हैं जिनमें से ज्यादातर को आसपास की किसी नक्सल कार्रवाई के मामले में लपेट कर गिरफ्तार किया गया है. उनके चेहरे और नामों को लोग नहीं जानते. उनमें से दो आदिवासी नौजवान ऐसे हैं जो नागपुर सेंट्रल जेल के सबसे लंबे समय तक रहने वाले कैदी हैं. पहले, 26 साल के रमेश पंढरीराम नेताम हैं, जो एक छात्र संगठन के कार्यकर्ता हैं और पिछले छह सालों से जेल में हैं. उनके मां-बाप कथित तौर पर उन जन संगठनों में थे, जिनका संबंध माओवादियों के साथ जोड़ा जाता है. उनकी मां बयानबाई दंडकारण्य आदिवासी महिला संगठन में सक्रिय थीं और उन्हें गढ़चिरोली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. पुलिस द्वारा दी जा रही यातना के दौरान ही उनकी मौत हो गई. गांववालों ने इस हत्या का विरोध किया था, लेकिन उनकी आवाज मुख्यधारा के मीडिया तक कभी नहीं पहुंच पाई. उनके पिता के बारे में कहा जाता है कि दो साल पहले उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. जब भी वे छूटने को होते हैं, पुलिस उन पर नए आरोप लगा कर उन्हें जेल में बनाए रखती है. ऐसा एक बार नहीं बल्कि तीन तीन बार हो चुका है. दो महीने पहले अपने ऊपर सारे मामले खत्म होने के बाद उन्होंने जेल से जाने के लिए अपना सामान बांध लिया था, लेकिन पुलिस ने उन पर दो नए मामले लगा दिए और छूटने से रोक लिया. दूसरे का नाम बुद्धु कुल्ले टिम्मा (33 साल) है जो गढ़चिरोली के भीतरी इलाके के एक गांव से हैं. उन्हें तीन साल पहले सभी मामलों से बरी कर दिया गया था लेकिन वे अब भी जेल में हैं क्योंकि पुलिस ने उन पर छह नए मामले लगा दिए. सभी आदिवासी कैदियों के निरक्षर किसान होने के चलते उनकी लाचारी और मानवीय त्रासदी की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

कानून की परवाह किसे हैॽ

इन मामलों में कार्यवाही संबंधी एक और गैर कानूनी काम यह किया जा रहा है कि मामलों की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए होती है. यह सुनवाई गढ़चिरोली की अदालत में स्थानीय अधिवक्ताओं की मौजूदगी में होती है. लेकिन चूंकि आरोपितों को अदालत में नहीं ले जाया जाता, इसलिए उनके और अधिवक्ताओं के बीच कोई संवाद नहीं हो पाता है. अदालत में जो कुछ भी चल रहा होता है, उससे आरोपित को अंधेरे में रखा जाता है. वे यह नहीं जान पाते कि गवाहों ने ठीक-ठीक क्या कहा, कौन सी दलीलें दी गईं और जज ने क्या टिप्पणी की. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में उन्हें इन सारी वाजिब सूचनाओं से वंचित रखा जाता है, जिसके वे हकदार हैं. इसके नतीजे में जब उन्हें अपना आखिरी बयान देने की जरूरत पड़ती है तो उनके बयान में सुनवाई के संदर्भ नदारद रहते हैं. कम से कम एक मामला ऐसा है, जिसमें सुनाए गए आजीवन कारावास के फैसले के लिए मुख्य रूप से पुलिस द्वारा इस तकनीक के गलत इस्तेमाल को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

इनमें से हरेक इंसान बेहिसाब तकलीफ से गुजरता है, उसके परिवार वालों को बेहिसाब तनाव झेलना पड़ता है, समाज में भारी अपमान और टकराव से गुजरना पड़ता है. उनके पारिवारिक रिश्ते तबाह हो जाते हैं और वे औसतन अपने उत्पादक जीवन के 4 से 5 साल बिना किसी गलती के गंवा देते हैं. उनमें से हरेक को पुलिस रिमांड के दौरान कम या ज्यादा गैर कानूनी यातनाएं सहनी पड़ती हैं. इसके बाद जब वे न्यायिक हिरासत में जाते हैं तो उन्हें अपमानजनक हालात में रहना पड़ता है. हो सकता है कि लोगों को गिरफ्तार करने और अपने पास मौजूद सूचनाओं के आधार पर आरोप तय करने के पुलिस के पेशेवर विशेषाधिकार से किसी को कोई शिकायत नहीं हो. ये आरोप न्यायिक सुनवाई के विषय हैं और वे वहां साबित हो सकते हैं और खारिज भी हो सकते हैं. लेकिन तब क्या हो जब इस विशेषाधिकार का बेदर्दी से और भारी पैमाने पर गलत इस्तेमाल होने लगेॽ बदकिस्मती से सभी तथाकथित माओवादी मुकदमों के नतीजे साफ साफ पुलिस की इस बुरी मंशा को दिखाते हैं जिसके तहत वह कोशिश करती है कि कुछ चुने हुए लोगों को जितने लंबे समय तक हो सके जेल में रखा जाए और इस तरह दूसरों को उनके नक्शेकदम पर चलने से डराया जाए. कानून के मुताबिक दोषी व्यक्ति को सजा देने की बारी अदालत की होती है, लेकिन जैसा कि इन मामलों से यह जाहिर होता है, वह व्यक्ति अपना अपराध साबित होने से पहले ही पुलिस के हाथों सजा पा चुका होता है.

तब फिर कानून-व्यवस्था की रखवाली मानी जाने वाली पुलिस यहां के कानून से बेपरवाह कैसे हो सकती हैॽ सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पूरी गंभीरता से स्थापित किया है कि महज किसी संगठन से जुड़ाव या किसी विचारधारा को मानना या किसी तरह का साहित्य अपने पास रखना तब तक एक अपराध नहीं हो सकता है, जब तक यह साबित नहीं हो जाए कि उस व्यक्ति ने कोई हिंसक कार्रवाई न की हो या दूसरों के ऐसा करने की वजह नहीं बना हो. यहां तक कि अगर कोई किसी प्रतिबंधित संगठन तक का एक निष्क्रिय सदस्य बन जाए, तब भी यह अपराध के दायरे में नहीं आता. अगर यहां का कानून का राज चलता है तो क्या पुलिस को इसके बारे में पता नहीं होना चाहिएॽ हरेक मामले में अदालतों ने पुलिस के तौर-तरीकों पर उसकी निंदा की है, लेकिन पुलिस हर बार बेधड़क होकर पुरानी गलतियां दोहराती है. अगर ढवले बाहर आते हैं तो साईबाबा को भर्ती कर लिया जाता है ताकि पुलिस की यह गैर कानूनी दास्तान आगे बढ़ती रहे!
 

(समयांतर के जुलाई 2014 अंक में प्रकाशित.)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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