हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अलविदा गाबो

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/18/2014 02:15:00 PM



गाब्रिएल गार्सिया मार्केस और उनके युवावस्था के पत्रकार मित्र प्लीनीयो आपूलेयो मेन्दोज़ा के बीच हुई एक लम्बी बातचीत पुस्तक फ्रेगरेंस ऑफ गुआवा  की शक्ल में छपी थी. उसी किताब से एक अध्याय. उनके परिवार के बारे में जानिए. 

अलविदा उस्ताद.
–कबाड़खाना

मेरे भीतर सबसे स्पष्ट और निरंतर स्मृति लोगों की बनिस्बत उस मकान की है आराकाटाका में जिसके भीतर मैं अपने नाना-नानी के साथ रहा था. यह लगातार आने वाला एक स्वप्न है जिसे मैं आज भी देखता हूं. और अपने पूरे जीवन में हर दिन में जब भी जागता हूं मुझे अनुभूति होती है, चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक, कि मैंने सपने में देखा है कि मैं सपने में उस घर के भीतर था. ऐसा नहीं है कि मैं वापस वहां गया होऊं; किसी भी उम्र में, या बिना किसी विशेष वजह के - पर मैं तो वहीं हूं - जैसे मैंने उसे कभी छोड़ा ही नहीं था. आज भी मेरे सपनों में रात समय का वह निषेध बनी हुई है जिसने मेरे पूरे बचपन को घेरा हुआ था. यह एक बेकाबू झुरझुरी थी जो हर शाम जल्दी शुरू होकर मेरे नींद को कोंचती रही थी जब तक कि मैं दरवाजे़ की दरार से भोर का होना नहीं देख लेता था. मैं बहुत ठीक-ठाक इसके बारे में नहीं बता सकता पर मेरे ख़्याल से वह निषेध इस तथ्य में निहित था कि रात के समय मेरी नानी के सारे प्रेत और आत्माएं साकार हो जाया करते थे. कुछ उस तरह का हमारा सम्बंध था. एक तरह का अदृश्य धागा जो हमें परामानवीय संसार से बांधे रखता था. दिन के समय मेरी नानी का जादुई संसार मुझे सम्मोहित किये रखता था - मैं उसमें डूबा रहता था, वह मेरा संसार था. लेकिन रात को वह मुझे भयभीत करता था. आज भी, जब मैं दुनिया के किसी हिस्से के किसी अजनबी होटल में अकेला सोया होता हूं, मैं अक्सर डरा हुआ जागता हूं, अंधेरे में अकेला होने के भय से हिला हुआ, और शांत होकर वापस सो जाने में हमेशा मुझे कुछ मिनट लगते हैं. वहीं मेरे नानाजी, नानी के अनिश्चितता भरे संसार में संपूर्ण सुरक्षा का प्रतिनिधित्व किया करते थे. उनके होने पर मेरी सारी चिंताएं गायब हो जाती थीं. मुझे दोबारा वास्तविक संसार के ठोस धरातल पर खड़े होने का बोध होता था. अजीब बात यह थी कि मैं अपने नाना जैसा होना चाहता था - यथार्थवादी, बहादुर, सुरक्षित - लेकिन नानी के संसार में झांकने का निरंतर लालच मुझे वहीं ले जाया करता था.

अपने नाना के बारे में मुझे बतलाओ. कौन थे वो? उनके साथ तुम्हारा कैसा रिश्ता था?

कर्नल निकोलास रिकार्दो मारकेज़ मेहीया - यह उनका पूरा नाम था - एक ऐसे शख़्स थे जिनके साथ संभवतः मेरी सबसे बढि़या बनती थी और जिनके साथ मेरी आपसी समझदारी सबसे ज़्यादा थी. लेकिन करीब पचास साल बाद पलटकर देखता हूं तो लगता है कि उन्होंने संभवतः कभी भी इस बात का अहसास नहीं किया. पता नहीं क्यों पर इस अहसास ने, जो पहली बार मुझे किशोरावस्था में हुआ था, मुझे बहुत खिन्न किया है. यह बहुत कुंठित करने वाला होता है क्योंकि यह एक लगातार बनी रहने वाली कचोट के साथ जीने जैसा है जिसे साफ़-सपाट कर लिया जाना चाहिए था पर वह अब नहीं हो सकेगा क्योंकि मेरे नाना की मौत तब हो चुकी थी जब मैं आठ साल का था. मैंने उन्हें मरते हुए नहीं देखा क्योंकि उस वक्त मैं आराकाटाका से बहुत दूर था, और मुझे यह समाचार नहीं दिया गया हालांकि जहां मैं रह रहा था उस घर के लोगों को मैंने इस बाबत बात करते हुए सुना. जहां तक मुझे याद पड़ता है, मुझ पर इस समाचार का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, तो भी एक वयस्क के तौर पर जब भी मेरे साथ कुछ भी विशेषतः अच्छी घटना होती है तो मुझे अपनी प्रसन्नता सम्पूर्ण नहीं लगती क्योंकि मैं चाहता हूं कि मेरे नाना उसे जान पाते. इस तरह से एक वयस्क के तौर पर मेरी तमाम ख़ुशियों पर इस एक कुंठा का कीड़ा लगा रहता है, और ऐसा हमेशा होता रहेगा.

क्या तुम्हारी किसी किताब का कोई चरित्र उनके जैसा है?

‘लीफ़ स्टॉर्म’ का बेनाम कर्नल एकमात्र चरित्र है जो मेरे नानाजी से मिलता-जुलता है. असल में वह पात्र उनके व्यक्तित्व और आकृति की बारीक प्रतिलिपि है. हालांकि यह एक व्यक्तिगत सोच है क्योंकि उपन्यास में कर्नल का बहुत वर्णन नहीं है और संभवतः पाठकों के मन में बनने वाली छवि मेरी सोच से फ़र्क हो सकती है. मेरे नानाजी के एक आंख गंवाने की घटना किसी उपन्यास का हिस्सा बनने के लिहाज से अतिनाटकीय हैः वे अपने दफ्तर की खिड़की से एक सफेद घोड़े को देख रहे थे जब उन्हें अपनी बांई आंख में कुछ महसूस हुआ; उन्होंने अपना हाथ उस पर रखा और बिना किसी दर्द के उनकी बांई आंख की रोशनी चली गई. मुझे इस घटना की याद नहीं है पर बचपन में मैंने इसके बारे में बातें सुनी थीं और हर दफ़े आखिर में मेरी नानी कहा करती थीं, "उनके हाथ में आंसुओं के अलावा कुछ नहीं बचा." ‘लीफ़ स्टॉर्म’ के कर्नल में यह शारीरिक कमी बदल दी गई है - वह लंगड़ा है. मुझे पता नहीं मैंने उपन्यास में यह लिखा है या नहीं पर एक बात मेरे दिमाग़ में हमेशा थी कि उसका लंगड़ापन एक युद्ध की चोट का परिणाम था. इस शताब्दी के शुरूआती वर्षों में कोलंबिया में हुए ‘हज़ार दिनी युद्ध’ के दौरान क्रांतिकारी सेना में मेरे नाना ने कर्नल की पदवी हासिल की थी. उनकी सबसे स्पष्ट स्मृति मेरे लिए इसी तथ्य से सम्बंधित है. उनके मरने से ठीक पहले उनके बिस्तर पर उनका निरीक्षण करते हुए एक डॉक्टर ने (मुझे पता नहीं क्यों) उनके पेड़ू के पास एक घाव का निशान देखा था. "वो एक गोली थी" मेरे नाना बोले. उन्होंने मेरे साथ गृहयुद्ध के बारे में अक्सर बातचीत की थी और उन्हीं के कारण उस इतिहास-काल में मेरी दिलचस्पी पैदा हुई जो मेरी सारी किताबों में आता है लेकिन उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया था कि वह घाव एक गोली का परिणाम था. जब उन्होंने डॉक्टर को यह बात बताई, मेरे लिये वह एक महान गाथा के प्रकट होने जैसा था.

मैं हमेशा सोचता था कि कर्नल ऑरेलियानो बुएनदीया तुम्हारे नानाजी से मेल खाता होगा....

नहीं, कर्नल ऑरेलियानो बुएनदिया मेरे नाना की मेरी इमेज से बिल्कुल उलट है. मेरे नाना गठीले थे, उनकी रंगत दमकभरी थी और मेरी याददाश्त में वे सबसे बड़े भोजनभट्ट थे. इसके अलावा, जैसा मुझे बाद में ज्ञात हुआ, वे एक भीषण स्त्रीगामी थे. दूसरी तरफ़ कर्नल ऑरेलियानो बुएनदिया देखने में जनरल राफ़ाएल उरिबे उरिबे जैसा है और उन्हीं का जैसा सादगीपूर्ण जीवन का हिमायती भी. मैंने उरिबे उरिबे को कभी नहीं देखा पर नानी बताती थीं कि वे एक दफ़े आराकाटाका आये थे और उन्होंने अपने दफ्तर में मेरे नाना और अन्य पूर्व-सैनिकों के साथ कुछ बीयर की बोतलें पी थीं. उनकी जो छवि मेरी नानी की मन में थी वह ‘लीफ़ स्टॉर्म’ में उस फ्रांसीसी डाक्टर के वर्णन से मेल खाती है जो कर्नल की पत्नी आदेलाइदा के मन में हैः वह कहती है कि जब वह उसे पहली बार देखती है उसे वह एक सिपाही जैसा नजर आता है. गहरे भीतर मुझे पता है कि उसे वह जनरल उरिबे उरिबे जैसा नजर आता था.

अपनी मां के साथ अपने सम्बंधों को तुम किस तरह देखते हो?

मेरी मां के साथ मेरे संबंधों की सबसे बड़ी ख़ासियत बचपन से ही उसकी गंभीरता रही है. संभवतः वह मेरे जीवन का सबसे गंभीर संबंध है. मुझे यक़ीन है कि एक भी ऐसी बात नहीं है जो हम एक दूसरे को न बता पाएं और ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर हम बात न कर सकें लेकिन हमारे दरम्यान हमेशा एक पेशेवर औपचारिकता जैसी रही है न कि अंतरंगता. इस बारे में बता पाना मुश्किल है पर यह ऐसा ही है. शायद ऐसा इस कारण भी था कि जब मैं नाना जी की मृत्यु के बाद अपने माता-पिता के साथ रहने गया तो मैं अपने बारे में सोच सकने लायक बड़ा हो चुका था. उनके लिये मेरे आने का मतलब यह रहा होगा कि उनके अनेक बच्चों के साथ (बाकी सारी मुझसे छोटे थे) एक बच्चा और आ गया है जिससे वह असल में बात कर सकती थीं और जो घरेलू समस्याओं का समाधान करने में उनकी सहायता करता. उनका जीवन कठोर और पुरुस्कारहीन था - कई दफ़े वे भीषण गरीबी में रही थीं. इसके अलावा हम बहुत लंबे समय तक एक छत के नीचे नहीं रहे क्योंकि कुछ साल बाद जब मैं बारह का था, पढ़ने के लिये मैं पहले बारान्कीया और फिर जि़पाकीरा चला गया. तब से हमारी मुलाकातें बहुत संक्षिप्त रही हैं, शुरू में स्कूल की छुट्टियों के वक्त और बाद में जब भी मैं कार्तागेना जाता हूं - वह भी साल भर में एक बार से ज़्यादा कभी नहीं होता और कभी भी दो सप्ताह से ऊपर नहीं. इसके कारण हमारा संबंध दूरीभरा हो गया है. इसने एक विशेष औपचारिकता का निर्माण भी किया है जिसके कारण हम एक दूसरे के साथ तभी खुल पाते हैं जब गंभीर होते हैं. हालांकि, पिछले बारह-एक सालों से, जब से मेरे पास साधन हैं, हर इतवार को एक ही समय पर मैं उन्हें टेलीफोन करता हूं, चाहे संसार के किसी भी हिस्से में होऊं. बहुत कम दफ़े जब मैं ऐसा नहीं कर पाया हूं, वह तकनीकी दिक्कतों के कारण हुआ है. ऐसा नहीं है कि मैं ‘अच्छा बेटा’ हूं जैसा कहा जाता है. मैं औरों से बेहतर नहीं हूं पर मैं ऐसा इसलिये करता हूं कि मैंने हमेशा सोचा है कि इतवार को टेलीफ़ोन करना हमारे संबंधों की गंभीरता है हिस्सा है.

क्या यह सच है कि तुम्हारे उपन्यासों की चाभी उन्हें आसानी से मिल जाती है?

हां, मेरे तमाम पाठकों में सबसे अधिक ‘इंन्स्टिंक्ट’ और निश्चय ही सबसे अधिक सूचनाएं उन्हीं के पास होती हैं और वे मेरी किताबों के चरित्रों के पीछे के वास्तविक लोगों को पहचान लेती हैं. यह आसान नहीं है क्योंकि मेरे तकरीबन सारे पात्र कई अलग-अलग लोगों और थोड़ा बहुत ख़ुद मेरे हिस्से की बनी पहेलियों जैसे होते हैं. इस बाबत मेरी मां की विशेष प्रतिभा इस बात में वैसी ही है जैसे किसी पुराशास्त्री को उत्खनन के दौरान पाई गई चन्द हड्डियों की मदद से किसी प्रागैतिहासिक जीव का पुनर्निर्माण करना होता है. जब वे मेरी किताबें पढ़ती हैं तो स्वतः ही उन सारे हिस्सों को मिटा देती हैं जो मैंने जोड़े होते हैं और वे उस मुख्य हड्डी को, उस केंद्रबिंदु को पहचान लेती हैं, जिसके इर्द-गिर्द मैंने अपने पात्र का सृजन किया होता है. कभी-कभी जब वे पढ़ रही होती हैं आप उन्हें कहते हुए सुन सकते हैं, "ओह बेचारा मेरा कोम्पाद्रे , तुमने उसे एक वास्तविक पैंज़ी के फूल में बदल दिया है", मैं उन्हें कहता हूं कि वह पात्र उनके कोम्पाद्रे जैसा नहीं है, लेकिन ऐसा मैं यूं ही कहने के लिये कह देता हूं क्योंकि वे जानती हैं कि मैं जानता हूं कि वे जानती हैं.


तुम्हारा कौन सा स्त्री-पात्र उन जैसा है?

‘क्रोनिकल ऑफ़ अ डैथ फोरटोल्ड’ तक मेरा कोई भी पात्र उन पर आधारित नहीं था. ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिड्यूड’ की उर्सुला इगुआरान में उनके चरित्र के कुछ हिस्से हैं पर उर्सुला और भी कई स्त्रियों से बनी हैं जिन्हें मैंने जाना है. सच तो यह है कि उर्सुला मेरे लिये इस लिहाज़ से एक आदर्श स्त्री है कि उसमें वे सारी बातें हैं जो मेरे हिसाब से एक स्त्री में होनी चाहिये. आश्चर्य की बात यह है कि इसका बिल्कुल विपरीत सच है. जैसे-जैसे मेरी मां बूढ़ी होती जा रही हैं वे उर्सुला की उस विराट छवि जैसी बनती जा रही हैं और उनका व्यक्तित्व उसी दिशा में बढ़ रहा है. इस कारण ‘क्रोनिकल ऑफ़ अ डैथ फोरटोल्ड’ में उनका प्रकट होना उर्सुला के पात्र का दोहराव लग सकता है पर ऐसा नहीं है. यह पात्र मेरी मां की मेरी इमेज का ईमानदार चित्र है और इसीलिये उसका नाम भी वही है. उस पात्र के बारे में उन्होंने एक ही बात कही जब उन्होंने देखा कि मैंने उनका दूसरा नाम, सांटियागा, इस्तेमाल किया है. "हे ईश्वर" वे बोलीं "मैंने पूरी जि़न्दगी इस भयानक नाम को छिपाने की कोशिश में बिताई है और अब यह सारी दुनिया में तमाम भाषाओं में फैल जाएगा."

तुम कभी भी अपने पिता के बारे में बात नहीं करते. उनकी क्या स्मृतियां हैं तुम्हारे पास? अब तुम उन्हें कैसे देखते हो?

जब मैं तैंतीस साल का हुआ तो मुझे अचानक अहसास हुआ कि मेरे पिताजी भी इतने ही सालों के थे जब मैंने उन्हें अपने नाना-नानी के घर में पहली बार देखा था. मुझे यह बात अच्छी तरह याद है क्योंकि उस दिन उनका जन्मदिन था और किसी ने उनसे कहा, "अब तुम्हारे उम्र ईसामसीह जितनी हो गई है." सफ़ेद ड्रिल सूट और स्ट्रा बोटर पहने हुए वे छरहरे, गहरी रंगत वाले एक बुद्धिमान और दोस्ताना व्यक्ति थे. तीस के दशक के एक आदर्श कैरिबियाई ‘जैन्टलमैन’. मजे़ की बात यह है कि हालांकि अब वे अस्सी के हैं और काफी ठीकठाक हालत में हैं, मैं अब भी उन्हें वैसा नहीं देखता जैसे वे अब हैं बल्कि वे हमेशा मुझे वैसे ही दिखते हैं जैसा उन्हें मैंने पहली बार अपने नाना जी के घर में देखा था. हाल ही में उन्होंने अपने एक दोस्त से कहा था कि मैं सोचता था कि मैं शायद उन मुर्गियों में से था जो बिना किसी भी मुर्गे की मदद से पैदा हो जाती हैं. उन्होंने यह बात मज़ाक में कही थी. उनका परिष्कृत ‘ह्यूमर’ शायद थोड़ी सी उलाहना से भी भरा था क्योंकि मैं हमेशा अपनी मां के साथ अपने संबंधों के बारे में बात करता हूं - उनके साथ कभी-कभार ही. वे सही भी हैं. लेकिन मैं उनके बारे में बात इसलिये नहीं करता क्योंकि असल में मैं उन्हें जानता ही नहीं, कम से कम उतना तो नहीं जानता जितना मां को जानता हूं. ऐसा अब जाकर हुआ है जब हम दोनों करीब-करीब एक ही उम्र के हैं (जैसा मैं कभी-कभी उनसे कहता भी हूं) कि हमारे बीच शांत समझदारी का एक बिंदु आया है. मैं इसके बारे में बता सकता हूं शायद. जब आठ की उम्र में मैं अपने माता-पिता के साथ रहने गया था मेरे भीतर पहले ही से पिता की एक मजबूत छवि बन चुकी थी - मेरे नानाजी की, न सिर्फ़ मेरे पिता मेरे नानाजी जैसे नहीं थे वे उनके बिल्कुल उलटे थे. उनका व्यक्तित्व, अधिकार के बारे में उनके विचार और बच्चों के साथ उनका संबंध - सब कुछ बिल्कुल भिन्न था. यह बिल्कुल मुमकिन है कि उस उम्र में मैं अचानक आये उस परिवर्तन से प्रभावित हुआ होऊं और इसी कारण किशोरावस्था तक मुझे अपना संबंध उनके साथ बहुत मुश्किल लगने लगा हो. मुख्यतः ग़लती मेरी थी. उनके साथ कैसे व्यवहार किया जाये मुझे निश्चित कभी पता नहीं होता था. मुझे नहीं पता था उन्हें ख़ुश कैसे किया जाय और उनके कठोर स्वभाव को मैंने ग़लती से समझदारी की कमी समझ लिया था. इसके बावजूद मेरे विचार से हमने इस संबंध को ठीक-ठाक निभा लिया क्योंकि हमारे बीच कोई गंभीर झगड़ा कभी नहीं हुआ.

दूसरी तरफ़, साहित्य के प्रति मेरी रुचि के लिए मैं बहुत सीमा तक उनका आभारी हूं. अपनी युवावस्था में वे कविताएं लिखा करते थे, और हमेशा छुप कर नहीं; और जब आराकाटाका में टेलीग्राफ़ आपरेटर थे वे वायलिन बजाया करते थे. उन्हें साहित्य सदा पसंद आया है और वे बढि़या पाठक हैं. जब हम उनके घर जाते हैं हमें कभी नहीं पूछना होता कि वे कहां होंगे क्योंकि हमें पता होता है कि वे अपने शयनकक्ष में कोई किताब पढ़ रहे होंगे. उस पागल घर में वही इकलौती शांत जगह है. आपको कभी पक्का पता नहीं होता कि खाने पर कितने लोग होंगे क्योंकि वहां अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त असंख्य बच्चों, पोते-पोतियों, भतीजे-भतीजियों की बढ़ती-घटती जनसंख्या का आवागमन लगा रहता है. पिताजी को जो मिलता है, उसे पढ़ते हैं - श्रेष्ठ साहित्य, अख़बार-पत्रिकाएं, विज्ञापनों के हैण्डआउट, रेफ़्रीजरेटर की मैनुअल - कुछ भी. मुझे और कोई नहीं मिला जिसे साहित्य के कीड़े ने इस कदर काटा हो. बाक़ी की बातों के हिसाब से देखें तो उन्होंने अल्कोहल की एक बूंद नहीं पी, न सिगरेट पी लेकिन उनके सोलह वैध बच्चे हुए और भगवान जाने कितने और. आज भी वे मेरी जानकारी में सबसे फु़र्तीले और स्वस्थ अस्सी वर्षीय व्यक्ति हैं और ऐसा लगता नहीं कि उनका तौर-तरीक़ा बदलेगा - बल्कि ठीक उल्टा ही सच है.


तुम्हारे सारे दोस्तों को तुम्हारे जीवन में मेरसेदेज़ की भूमिका के बारे में पता है. मुझे बताओ तुम्हारी मुलाकात कहां हुई, तुम्हारी शादी कैसे हुई और ख़ास तौर पर यह कि तुम यह दुर्लभ काम - एक सफल विवाह कैसे कर सके?

मेरसेदेज़ से मेरी मुलाकात सुक्रे में हुई, जो कैरीबियाई तट के बस भीतरी इलाक़े का एक क़स्बा है जहां हम दोनों के परिवारों ने कई साल बिताये थे और जहां हम दोनों अपनी छुट्टियों में जाया करते थे. उसके पिता और मेरे पिता लड़कपन के दोस्त थे. एक दिन, ‘स्टूडेंट्स डांस’ के दौरान, जब वह केवल तेरह की थी, मैंने उससे शादी करने का प्रस्ताव किया. अब मुझे लगता है कि वह प्रस्ताव एक तरह से ऐसा था कि सारे पचड़े खत्म किये जाएं और उस संघर्ष से बचा जाये जो उन दिनों एक गर्लफ्रैंड ढूंढ़ने के लिये करना पड़ता था. उसने उसे ऐसा ही समझा होगा क्योंकि हमारी मुलाकातें कभी-कभार होती थीं और बेहद हल्की-फुल्की, लेकिन मेरे ख़्याल से हम दोनों में से किसी को भी इस बात का संदेह नहीं था कि सब कुछ एक दिन वास्तविकता बन जाएगा. वास्तव में यह कहानी, बिना किसी सगाई वगैरह के, दस वर्ष बाद असलियत बनी. बिना जल्दीबाज़ी और हड़बड़ी के हम सिर्फ दो लोग थे जो अंततः उस निश्चित घटना का इंतज़ार कर रहे थे. हमारे विवाह के पच्चीस साल होने को हैं और हमारा कोई भी गंभीर विवाद नहीं हुआ है. मैं समझता हूं कि इसका रहस्य यह है कि हम चीज़ों को अब भी उसी तरह देखते हैं जैसे शादी से पहले देखा करते थे. विवाह, जीवन की ही तरह अविश्वसनीय रूप से मुश्किल होता है क्योंकि आप को हर रोज़ नये सिरे से शुरूआत करनी होती है और ऐसा जि़न्दगी भर किये जाना होता होता है. यह एक सतत और अक्सर क्लांत कर देने वाला युद्ध होता है, पर अंततः उसके लायक भी. मेरे एक उपन्यास का एक पात्र इस बात को अधिक कच्चे शब्दों में यूं कहता हैः "प्यार एक ऐसी चीज़ है जिसे आप सीखते हैं."

क्या मेरसेदेज़ ने तुम्हारे किसी चरित्र की रचना को प्रेरित किया है?

मेरे किसी भी उपन्यास का कोई भी पात्र मेरसेदेज़ जैसा नहीं है. वह ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑ सॉलीट्यूड’ में अपने ही रूप में अपने ही नाम के साथ एक कैमिस्ट के बतौर दो बार आती है और उसी तरह वह दो दफ़े ‘क्रोनिकल ऑफ़ ए डैथ फ़ोरटोल्ड’ में भी आती है, मैं उसका बहुत अधिक साहित्यिक इस्तेमाल नहीं कर पाया हूं - इसके पीछे एक ऐसा कारण है जो बहुत काल्पनिक लग सकता है पर है नहीं - मैं अब उसे इतनी अच्छी तरह जानता हूं कि मुझे जरा भी गुमान नहीं कि वास्तव में वह कैसी है?

तुम्हारे सारे दोस्तों को तुम्हारे जीवन में मेरसेदेज़ की भूमिका के बारे में पता है. मुझे बताओ तुम्हारी मुलाकात कहां हुई, तुम्हारी शादी कैसे हुई और ख़ास तौर पर यह कि तुम यह दुर्लभ काम - एक सफल विवाह कैसे कर सके?

मेरसेदेज़ से मेरी मुलाकात सुक्रे में हुई, जो कैरीबियाई तट के बस भीतरी इलाक़े का एक क़स्बा है जहां हम दोनों के परिवारों ने कई साल बिताये थे और जहां हम दोनों अपनी छुट्टियों में जाया करते थे. उसके पिता और मेरे पिता लड़कपन के दोस्त थे. एक दिन, ‘स्टूडेंट्स डांस’ के दौरान, जब वह केवल तेरह की थी, मैंने उससे शादी करने का प्रस्ताव किया. अब मुझे लगता है कि वह प्रस्ताव एक तरह से ऐसा था कि सारे पचड़े खत्म किये जाएं और उस संघर्ष से बचा जाये जो उन दिनों एक गर्लफ्रैंड ढूंढ़ने के लिये करना पड़ता था. उसने उसे ऐसा ही समझा होगा क्योंकि हमारी मुलाकातें कभी-कभार होती थीं और बेहद हल्की-फुल्की, लेकिन मेरे ख़्याल से हम दोनों में से किसी को भी इस बात का संदेह नहीं था कि सब कुछ एक दिन वास्तविकता बन जाएगा. वास्तव में यह कहानी, बिना किसी सगाई वगैरह के, दस वर्ष बाद असलियत बनी. बिना जल्दीबाज़ी और हड़बड़ी के हम सिर्फ दो लोग थे जो अंततः उस निश्चित घटना का इंतज़ार कर रहे थे. हमारे विवाह के पच्चीस साल होने को हैं और हमारा कोई भी गंभीर विवाद नहीं हुआ है. मैं समझता हूं कि इसका रहस्य यह है कि हम चीज़ों को अब भी उसी तरह देखते हैं जैसे शादी से पहले देखा करते थे. विवाह, जीवन की ही तरह अविश्वसनीय रूप से मुश्किल होता है क्योंकि आप को हर रोज़ नये सिरे से शुरूआत करनी होती है और ऐसा जि़न्दगी भर किये जाना होता होता है. यह एक सतत और अक्सर क्लांत कर देने वाला युद्ध होता है, पर अंततः उसके लायक भी. मेरे एक उपन्यास का एक पात्र इस बात को अधिक कच्चे शब्दों में यूं कहता हैः "प्यार एक ऐसी चीज़ है जिसे आप सीखते हैं."

क्या मेरसेदेज़ ने तुम्हारे किसी चरित्र की रचना को प्रेरित किया है?

मेरे किसी भी उपन्यास का कोई भी पात्र मेरसेदेज़ जैसा नहीं है. वह ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑ सॉलीट्यूड’ में अपने ही रूप में अपने ही नाम के साथ एक कैमिस्ट के बतौर दो बार आती है और उसी तरह वह दो दफ़े ‘क्रोनिकल ऑफ़ ए डैथ फ़ोरटोल्ड’ में भी आती है, मैं उसका बहुत अधिक साहित्यिक इस्तेमाल नहीं कर पाया हूं - इसके पीछे एक ऐसा कारण है जो बहुत काल्पनिक लग सकता है पर है नहीं - मैं अब उसे इतनी अच्छी तरह जानता हूं कि मुझे जरा भी गुमान नहीं कि वास्तव में वह कैसी है?
(कबाड़खाना से साभार)

वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड कैसे लिखा गया

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/18/2014 12:55:00 PM



आज क्रांतिकारी जादुई यथार्थवाद के बेमिसाल किस्सागो गाब्रिएल गार्सिया मार्केस का निधन हो गया. उनको याद करते हुए प्रभात रंजन का यह लेख. इसे वाणी प्रकाशन से प्रकाशित मार्केज़: जादुई यथार्थ का जादूगर से लिया गया है. साभार.

उनके दिमाग में बरसों पुराना उपन्यास ‘द हाउस’ घूमने लगा था। लेकिन उसे लिखें कैसे यह सोचते-सोचते बरसों बीत चुके थे। दो उपन्यास, कहानियों का संकलन प्रकाशित हो चुका थे लेकिन वह उपन्यास... बीच-बीच में उसका नाम मार्केज़ के दिमाग में कौंधता रहता था- ‘द हाउस’। अंतरराष्ट्रीय लेखक बनने की सारी तैयारी हो चुकी थी। कमी थी तो बस उस उपन्यास की जो उनको उस स्तर पर स्थापित कर देता।

बड़े नाटकीय ढंग से एक दिन उनको उस उपन्यास को लिखने का तरीका भी सुझाई दे गया। 1965 की बात है। गेराल्ड मार्टिन ने लिखा है कि एक सप्ताहांत वे अपने परिवार को घुमाने के लिए आकपुल्को ले जा रहे थे। उस पहाड़ी कस्बे तक पहुंचने का रास्ता बड़ा घुमावदार था। गाड़ी चलाते-चलाते उनको उपन्यास की पहली पंक्ति कौंध गई। उनको समझ में आ गया था कि कैसे उस उपन्यास को लिखना है जिसके बारे में वे करीब 20 साल से सोच रहे थे। उन्होंने तत्काल गाड़ी मोड़ी और मेक्सिको सिटी की ओर वापस चल पड़े। वापस पहुंचते ही उन्होंने लिखना शुरु कर दिया। 18 महीने तक खुद को उन्होंने कमरे में बंद कर लिया। 18 महीने के बाद जब वे बाहर आए तो उनके हाथ में उस उपन्यास की पांडुलिपि थी जिसने उनको बाद में नोबेल पुरस्कार दिलवाया और उनकी पत्नी के हाथों में 18 महीने के भुगतान न किए गए तरह-तरह के बिल। अपनी एक भेंटवार्ता में मार्केज़ ने बाद में कहा, ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड’ को मैंने करीब दो साल में लिखा। लेकिन टाइपराइटर पर बैठने से पहले मैंने पंद्रह या सोलह सालों तक उसके बारे में सोचा था। उनके जीवनीकार ने लिखा है कि अठारह साल तक उसके बारे में सोचा था। 

उनकी पत्नी को याद आया बरसों पहले फटेहाली की अवस्था में मार्केज़ ने उनसे बड़ी गंभीरता से कहा था, जब मैं चालीस साल का हो जाउंगा तो कुछ ऐसा लिखूंगा जो यादगार होगा। 1967 में जब ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ नामक वह उपन्यास प्रकाशित हुआ तो मार्केज़ की उम्र संयोग से चालीस की हो चुकी थी। संघर्ष का दौर बीत चुका था। लेखकीय उपलब्धियों और समृद्धि का दौर शुरु हो चुका था जिसकी उन्होंने बरसों प्रतीक्षा की थी। ‘नो वन राइट्स टु कर्नल’ के कर्नल की तरह जो अपने कभी न आनेवाले पेंशन की प्रतीक्षा किया करता है। फर्क बस इतना था कि मार्केज़ नामक इस लेखक की प्रतीक्षा फलदायी साबित हुई। 

वे अठारह महीने मार्केज़ की पत्नी मरसेदेस के लिए शायद सबसे असुरक्षा भरे दिन थे। विज्ञापन लेखक और फिल्म पटकथा लेखक के रूप में मार्केज़ का कैरियर अच्छा चल रहा था कि अचानक उन्होंने फिर से सब कुछ छोड़ दिया। शुरुआती महीनों में तो पिछली जमा-पूंजी से घर का खर्च चलता रहा। फिर समस्या शुरु हुई। सबसे पहले मार्केज़ ने अपनी गाड़ी बेची। वह ओपेल कार जो उनको बहुत प्रिय थी और पहली बार जब उनको अपने उपन्यास के लिए पुरस्कार मिला था वह उसके पैसे से खरीदी गई थी। फिर टेलिफोन कटवाना पड़ा। एक तो घर का खर्च कम करने के लिए, दूसरे फोन रहने पर मित्रों से बात करने में उनका काफी समय बर्बाद हो जाता था। फोन नहीं रहने पर समय भी बचने लगा और बातचीन न करने पर खर्च भी। उसके बाद एक-एक करके फ्रिज, टेलिविजन, रेडियो का नंबर आया। उसके बाद बच्चों की नियमित फीस जमा हो सके इसको ध्यान में रखते हुए मरसेदेस ने अपने गहने बेचने शुरु कर दिए। दुकानदार ने दयानतदारी दिखाते हुए उनको लंबी उधारी पर सामान देना स्वीकार कर लिया जिससे घर का चूल्हा जलता रहा। मकान मालिक भी इसके लिए तैयार हो गया कि वह बिना किराया लिए उनको लंबे समय तक घर में रहने देगा। घर में उन अठारह महीनों में सामान के नाम पर मरसेदेस का हेयर ड्रायर, हीटर, बच्चों के कुछ सामान और एक टेप रेकार्डर रह गया लिखते समय जिस पर मार्केज़ गाने सुना करते थे। बीटल्स का गाना ‘हार्ड डेज़ नाइट’ उस दौरान उनका प्रिय गीत बना रहा।

पहली बार 39 साल की अवस्था में मार्केज़ कुछ ऐसा लिख रहे थे जिसकी सफलता को लेकर वे स्वयं मुतमइन थे। हालांकि कुछ ही दिनों पहले लुई हार्स्स ने प्रमुख लैटिन अमेरिकी लेखकों से बातचीत पर आधारित अपनी किताब जब अर्जेंटीना के एक प्रमुख प्रकाशक सुदामेरिकाना को दी तो उसने उनसे मार्केज़ के बारे में पूछा क्योंकि बाकी सारे लेखकों को तो वह जानता था बस एक गाब्रिएल गार्सिया मार्केज़ के बारे में उसने नहीं सुन रखा था। उसने आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने मशहूर लैटिन अमेरिकी लेखकों के बीच यह लगभग गुमनाम लेखक कौन है? हेस्स ने जवाब दिया कि आने वाले समय में देखिएगा यह बाकी सारे लेखकों से भी मशहूर हो जाएगा। खैर, और कोई आश्वस्त हो न हो मार्केज़ को लगने लगा था कि यही वह उपन्यास है जो उनको गुमनामी के अंधेरे से निकालेगा। प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचाएगा।

इसीलिए इसे लिखते हुए वे बीच-बीच में अपने मित्रों के संपर्क में भी आए। विशेषकर उन मित्रों के जिनके साथ संघर्ष के दिनों में उन्होंने लेखक-वेखक बनने का सपना देखा था। बीच में एक छोटी सी यात्रा उन्होंने अराकाटक की भी की लेकिन इस बार वहां वे अपनी मां के साथ नहीं गए बल्कि उन्हीं मित्रों के साथ। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने अपने मित्र मेंदोज़ा से कहा था, यह मेरे बाकी उपन्यासों से एकदम हटकर है। इसमें मैंने जान लगाई है। देखना या तो इस उपन्यास से या तो मैं अर्श पर होउंगा या फर्श पर गिर जाउंगा। या तो लोग इसके दीवाने हो जाएंगे या इसे पढ़ते हुए अपने बाल नोचेंगे। इन बातों से लगता है कि बहुत सोच-समझकर उन्होंने इसे लिखने का रिस्क लिया था।

इससे पहले तो यह हुआ था कि उनके उपन्यास ‘नो वन राइट्स टु कर्नल’ को कोलंबिया की एक लघुपत्रिका ने कृपापूर्वक प्रकाशित किया था लेकिन ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ का एक अध्याय उन्होंने स्वयं कोलंबिया के मशहूर अखबार ‘एल स्पेक्तादोर’ को प्रकाशन के लिए दिया जिसमें उनकी आरंभिक कहानियां छपी थीं। जिसके एक स्तंभकार ने उनकी आरंभिक कहानियों को पढ़कर यह घोषणा की थी कि एक नए सितारे का आगमन हो गया है। ‘एल स्पेक्तादोर’ ने उपन्यास का वह अंश 1 मई 1966 के अंक में बहुत प्रमुखता से छापा। जो पाठकों को पसंद भी आया। उनके मित्र और मेक्सिकन लेखक कार्लोस फुएन्तेस उन दिनों पेरिस में थे। मार्केज़ ने उपन्यास के पहले तीन अध्याय उनको पढ़ने के लिए भेजे। उन्होंने बाद में लिखा कि उसे पढ़कर वे चकित रह गए कि कोई लेखक इस तरह से भी लिख सकता है। उन्होंने तुरंत वह अंश लैटिन अमेरिका के एक अन्य कद्दावर लेखक जूलियो कोर्ताज़ार को पढ़ने के लिए भेज दिया। संयोग से उनकी प्रतिक्रिया भी वैसी ही थी। ध्यान रहे कि मार्केज़ के विपरीत इन दोनों लेखकों की लैटिन अमेरिकी लेखक के तौर पर तब तक अंग्रेजी में पहचान बन चुकी थी। इनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया से मार्केज़ का आत्मविश्वास निश्चित तौर पर और बढ़ा होगा।

कार्लोस फुएन्तेस तो उन अंशों को पढ़कर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनको छपने के लिए पेरिस से प्रकाशित होनेवाली एक साहित्यिक पत्रिका के प्रवेशांक के लिए दे दिया। उसी अंक में कार्लोस फुएन्तेस का एक इंटरव्यू भी प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कहा, उन्होंने ‘हाल ही में मार्केज़ के लिखे जा रहे उपन्यास के पहले 75 पेज पढ़े। निस्संदेह यह एक मास्टरपीस है। पूरा होने के बाद जब यह छपकर आएगा तो निश्चिय ही लैटिन अमेरिका के अब तक के सारे लेखन को पीछे छोड़ देगा’। उपन्यास के छपने से पहले यह बहुत बड़ी भविष्यवाणी थी। वह भी एक जाने-माने लेखक द्वारा की गई। लोग अचंभित रह गए क्योंकि इससे पहले ऐसा कभी हुआ नहीं था।

बहरहाल, इस सारे हो-हल्ले के बीच बिना उससे प्रभावित हुए उन्होंने अपना उपन्यास पूरा कर लिया। उपन्यास पूरा होने के बाद उन्होंने दोस्त मेंदोज़ा को सबसे पहले पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने लिखा कि उपन्यास 11 बजे के करीब पूरा हो गया लेकिन घर में मरसेदेस नहीं थी कि उसे बता पाते। फोन था नहीं कि दोस्तों को फोन करके बता पाते। तीन बजे तक उनको मन मसोसकर रहना था जब घर के बाकी सदस्य आते। इस बीच उनके घर के पास एक नीली कार आकर रुकी और थोड़ी देर में उनके दोनों लड़के आए। उनके कपड़ों पर जगह-जगह नीले रंग लग गए थे जो उन्होंने पेंटिंग करते हुए लगाए थे। मार्केज़ को लग गया कि यह किताब खूब बिकनेवाली है। क्योंकि नीले रंग को वे अपने लिए शुभ मानते थे और इस किताब को पूरा करने के बाद उनको सबसे पहले नीला रंग दिखा था। उनको इसमें शुभ संकेत लग रहा था। लेखक के रूप में बेहतर भविष्य का।

इससे पहले के मार्केज़ के किताब को प्रकाशक बड़ी मुश्किल से मिले थे लेकिन इस उपन्यास को छापने के लिए अर्जेंटीना का वही मशहूर प्रकाशक पहले से ही तैयार था जिसने प्रसिद्ध लैटिन अमेरिकी लेखकों की भेंटवार्ताओं की किताब में मार्केज़ का नाम देखकर यह जिज्ञासा प्रकट की थी कि यह लेखक कौन है। सुदामेरिकाना नामक उस प्रकाशक को भेजने से पहले उन्होंने उपन्यास की एक पांडुलिपि बोगोटा में अपने दोस्त जरमन वर्गास को भेजी और पूछा कि उसने अपना और बारांकीला के अपने दोस्तों के जो संदर्भ दिए हैं क्या वे उचित हैं? पहले वर्गास और फिर फुएनमेयर ने लिखा कि वे बुएंदिया घराने के आखिरी वारिस के दोस्त बनकर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। बाद में जरमन वर्गास ने बोगोटा के एक पत्र में उपन्यास पर लेख लिखा, एक किताब जिसकी धूम मचने वाली है। अप्रैल 1967 में प्रकाशित यह लेख एक तरह से कोलंबिया की धरती से उपन्यास की सफलता को लेकर की गई पहली घोषणा थी। बाद में जरमन वर्गास के इस लेख की भी खूब चर्चा हुई।

उसके बाद उन्होंने उपन्यास की पांडुलिपि अपने दोस्त प्लीनियो मेंदोज़ा को भिजवायी। उसने उपन्यास पढ़ने के लिए ऑफिस से छुट्टी ले ली। उपन्यास खत्म करने के बाद उसने अपनी पत्नी से कहा कि इस बार मार्केज़ ने बाज़ी मार ली है। देखना यह उपन्यास अपने जलवे बिखेरेगा। उसने कुछ और दोस्तों को भी पढ़ने के लिए उपन्यास दिया और सबकी यही राय थी कि ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ जैसा उपन्यास उन्होंने नहीं पढ़ा है। इसी बीच जुलाई 1966 में अखबार के लिए पांच साल बाद मार्केज़ ने कोई लेख लिखा। अखबार था वही ‘एल स्पेक्तादोर’। लेख का शीर्षक था- ‘पुस्तक के लेखक का दुर्भाग्य’। इसमें उन्होंने लिखा कि पुस्तक लिखना अपने आप में एक आत्मघाती व्यवसाय है। कोई और पेशा ऐसा नहीं है जो इतना अधिक श्रम, इतनी अधिक एकाग्रता की मांग करता हो। जबकि बदले में तात्कालिक तौर कोई लाभ नहीं होता। लेकिन सवाल उठता है कि जब लेखन के साथ इस कदर दुर्भाग्य जुड़ा है तो लेखक आखिर लिखता क्यों है। इसका जवाब है कि एक आदमी उसी तरह से लेखक होता है जिस तरह से कोई आदमी अश्वेत होता है या कोई यहूदी होता है। सफलता से प्रोत्साहन मिलता है, पाठकों के प्यार से तोष मिलता है, लेकिन ये एक तरह से अतिरिक्त लाभ हैं क्योंकि एक अच्छा लेखक तो वैसे भी लिखता रहेगा, चाहे उसके जूते मरम्मत की मांग कर रहे हों और उसकी किताबें बिक नहीं रही हों।

बहरहाल, पूरी तरह से आश्वस्त हो जाने के बाद उन्होंने पांडुलिपि अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में प्रकाशक सुदामेरिकाना को भेजने का निश्चय किया। पत्नी मरसेदेस के साथ वे पोस्ट ऑफिस गए पांडुलिपि को ब्यूनस आयर्स के प्रकाशक को भेजने के लिए। पैकेट में टाइप किए हुए 490 पृष्ठ थे। वजन करके काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा, कुल बयासी पेसो हुए। मरसेदेस ने अपने पर्स से पैसे निकाले तो केवल पचास पेसो निकले। आधी पांडुलिपि ही उतने पैसे में भेजी जा सकती थी। भेजकर घर आए और हेयर ड्रायर और हीटर भी बेच दिया। उससे जो पैसे आए बाकी पांडुलिपि उससे प्रकाशक के पास भेज दी। कुछ दिनों बाद जब उनके मित्र अलवारो मुतिस अर्जेंटीना जा रहे थे तो उनके हाथ से उपन्यास की एक और प्रति उन्होंने प्रकाशक के पास भिजवा दी। इस उपन्यास के चक्कर में घर सारा खाली हो गया था। उपन्यास के पक्ष में सकारात्मक बात अब तक केवल यही हुई थी कि इस बार पहली बार उनको प्रकाशक नहीं ढूंढना पड़ा था। खैर, जब अलवारो मुतिस ने अर्जेंटीना पहुंचकर सुदामेरिकाना के संपादक को फोन करके बताया कि वह मार्केज़ के उपन्यास की पांडुलिपि लेकर आए हैं तो उसने छूटते ही जवाब दिया कि मैंने पढ़ लिया है और वह सचमुच बेजोड़ है।     

आखिरकार उपन्यास प्रकाशित हुआ। कहते हैं कि ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ उपन्यास के प्रकाशन ने केवल मार्केज़ नामक उस लेखक की तस्वीर ही नहीं बदली उसने विश्व साहित्य का मानचित्र भी बदलकर रख दिया। इस उपन्यास ने इतनी बड़ी विभाजक रेखा खींची इससे पहले किसी गैर-यूरोपीय लेखक ने नहीं खींची थी। विलियम केनेडी ने इस उपन्यास के बारे में अपने आकलन में लिखा  कि ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ के बाद लिखी गई यह पहली साहित्यिक कृति है तथा समस्त मानवजाति को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए। कार्लोस फुएन्तेस ने इस उपन्यास को लैटिन अमेरिका का बाइबिल बताया। एक और प्रसिद्ध लैटिन अमेरिकी उपन्यासकार मारियो वर्गास ल्योसा ने इसके बारे में कहा कि यह लैटिन अमेरिकी वीरता का महान उपन्यास है। अपने एक लेख में उन्होंने इसे एक असाधारण उपन्यास बताया।

30 मई 1967 को उपन्यास प्रकाशित हुआ। स्पेनिश भाषा में करीब 352 पन्नों के इस उपन्यास की कीमत करीब दो अमेरिकी डॉलर रखी गई। पहले प्रकाशक ने तय किया कि 3000 प्रतियों का संस्करण छापा जाए। जो लैटिन अमेरिका के लिहाज से अपने आप में बड़ी बात थी। लेकिन जिस तरह से लैटिन अमेरिकी साहित्य के दिग्गजों ने इसके प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिक्रिया दिखाई थी उसके बाद प्रकाशक ने सोचा कि संस्करण को बढ़ाकर 5000 प्रतियों का कर दिया जाए। लेकिन पुस्तक विक्रेताओं ने जिस तरह से इस उपन्यास को लेकर उत्साह दिखाया उससे उत्साहित होकर प्रकाशक ने पुस्तक के प्रकाशन के दो सप्ताह पहले संस्करण को बढ़ाकर 8000 प्रतियों का कर दिया। पहले सप्ताह में पुस्तक की 1800 प्रतियां बिक गईं और बेस्टसेलर लिस्ट में उपन्यास तीसरे स्थान पर आ गया। दूसरे सप्ताह तक पहले संस्करण की सारी प्रतियां बिक गईं। अगले छह महीनों में पुस्तक के तीन संस्करण आए और उसकी 20000 प्रतियां और बिक गईं। करीब 20 साल पहले ‘एल स्पेक्तादोर’ अखबार के समीक्षक की भविष्यवाणी आखिरकार सही साबित हुई। एक नए सितारे का जन्म हो चुका था। उस समय लैटिन अमेरिकी लेखन के तीन सितारे माने जाते थे- कार्लोस फुएन्तेस, कोर्ताज़ार, मारियो वर्गास ल्योसा। यह चौथा नाम उन सब पर भारी पड़ रहा था। ऐसी असाधारण सफलता के बारे में लैटिन अमेरिका के किसी लेखक ने कभी सोचा भी नहीं था। एक आलोचक ने लिखा कि लोगों ने इसे उपन्यास की तरह से नहीं लिया बल्कि जीवन के रूप में देखा।

मार्केस के लेखक बनने का फैसला और जीवन संघर्ष

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/18/2014 12:50:00 PM



आज क्रांतिकारी जादुई यथार्थवाद के बेमिसाल किस्सागो गाब्रिएल गार्सिया मार्केस का निधन हो गया. उनको याद करते हुए प्रभात रंजन का यह लेख. इसे वाणी प्रकाशन से प्रकाशित मार्केज़: जादुई यथार्थ का जादूगर से लिया गया है. साभार.

जब 21 साल की उम्र में मार्केज़ ने यह तय किया कि अब पूर्णतः मसिजीवी बनकर जीना है तो एक कठिन संघर्ष का दौर शुरु हुआ। जिस दौर में मार्केज़ ने लेखक पूर्णतः मसिजीवी बनने का फैसला किया कोलंबिया में उस दौर में लेखक होना आजीविका के लिहाज से उसी तरह अच्छा नहीं समझा जाता था. जिस तरह से आज हिन्दी में लेखक की स्थिति है। मार्केज़ ने स्वयं लिखा है कि ‘एल स्पेक्तादोर’ में प्रकाशित उनकी कहानियों के एवज में किसी प्रकार का पारिश्रमिक नहीं मिला, लेकिन उस समय किसी को लिखने के एवज में पैसे देने का चलन भी नहीं था। पत्रकारिता शुरु की तो उसमें भी कुछ खास पैसे नहीं मिलते थे। इतने भी नहीं कि महीने भर का खर्च चल सके। जबकि घर पर यह कह दिया था कि वे अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने में सक्षम हो चुके हैं।

लेखक बनना तो एक सपना था। पत्रकारिता आजीविका की मजबूरी। हालांकि बाद में मार्केज़ ने पत्रकारिता को साहित्य के समान धरातल पर ही रखा। लेकिन उस दौर के युवाओं में आदर्शवाद इतना होता था कि किसी भी तरह के व्यावसायिक लेखन को मूल उद्देश्य से विचलन माना जाता था। कोलंबिया के छोटे से कस्बे कार्ताजेना में आरंभ में उनकी साहित्यिक खुराक पूरी नहीं हो पा रही थीं। ऐसे में उनकी पहचान गुस्तावो मेर्लानो नामक युवक से हुई जो अपनी पढ़ाई पूरी करके हाल में ही लौटा था। उससे उनकी अच्छी छनने लगी। उसके घर में इतनी अच्छी लाइब्रेरी थी जितनी बड़ी मार्केज़ ने उस समय तक एक साथ इतनी अच्छी पुस्तकें कम ही देखी थी। उसके पास ग्रीक, लैटिन और स्पेनिश क्लासिक के मूल संस्करण थे। वह केवल संग्राहक नहीं था उसने खुद बहुत कुछ पढ़ रखा था।

उसने एक तरह से मार्केज़ को कोलंबिया के बौद्धिक परिदृश्य से परिचित करवाया। अगर लेखक बनना है तो किन-किन लोगों के संपर्क में रहना चाहिए। उसी ने मार्केज़ को एक तरह से इस बात की आरंभिक दीक्षा दी कि लेखक बनने की आकांक्षा रखनेवाले को क्या-क्या पढ़ना चाहिए। उसने उनसे कहा कि तुम अच्छे लेखक तो बन सकते हो लेकिन अगर ग्रीक क्लासिक का अच्छी तरह ज्ञान न हो तो बहुत अच्छे लेखक नहीं बन सकते। मार्केज़ ने लिखा है कि गुस्तावो की तमाम कोशिशों के बावजूद ग्रीक क्लासिक में वे अभिरुचि विकसित नहीं कर सके। सिवाय ओडेसी के जिसको वे बार-बार पढ़ा करते थे। उसने उनको सोफोक्लीज का संपूर्ण साहित्य पढ़ने के लिए दिया। जिसने मार्केस को बेहद प्रभावित किया। यह 1947 की बात है।

1948 में मार्केज़ ने बारांकीला की यात्रा की। यह यात्रा साहित्यिक दृष्टि से यादगार थी। इस यात्रा में उनकी कुछ ऐसे लोगों से मुलाकात हुई जो उनकी साहित्य यात्रा के सहयात्री बने। एल नेशनल के ऑफिस में वे बारांकीला ग्रुप के लेखकों से मिले- जरमन वर्गास, अल्वारो केपेदा, अल्फांसो फूयनमेयर। फूयेनमेयर ‘एल हेराल्दो’ में काम करते थे। इन सबका साहित्यिक समूह था। इन लेखकों के समूह के बारे में बाद में मार्केस ने लिखा कि ये सब जेम्स ज्वायस और आर्थर कॉनन डॉयल को एकसमान रुचि से पढ़ने वाले लोग थे। वे लोकप्रिय संगीत और क्लासिकल कविता का आनंद एक साथ उठा सकते थे। उन्होंने आधुनिक साहित्य के प्रतिमानों से मार्केज़ का परिचय करवाया। वर्जीनिया वुल्फ का उपन्यास मिसेज डैलोवे, ओरलैंडो, विलियम फॉकनर, नैथेलियल हॉथोर्न का उपन्यास द हाउस ऑफ सेवेन गैबल्स, मेलेविल का मोबी डिक, विलियम सारोयां की कहानियां। समकालीन साहित्य से इतने बड़े स्तर पर उनका पहला परिचय था। साहित्य के इतने दीवानों से एक साथ मिलने का भी उनका पहला ही अवसर था।

उन्हीं दिनों वे बीमार पड़े और उनको अपने माता-पिता, भाई-बहनों के साथ करीब छह महीने रहने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने पहली बार उपन्यास लिखने के बारे में सोचा- द हाउस के नाम से। जिसकी कहानी उनके नाना कर्नल निकोलस मार्केज़ के युद्ध में जाने से शुरु होती और उसमें पूरे परिवार की कहानी होती, पारिवारिक महाकाव्य की तरह। बीमारी के उस दौर में उनके नए साहित्यिक मित्रों ने उनके लिए अनेक उपन्यास भिजवाए। उन उपन्यासों में फॉकनर का साउंड एंड द फ्यूरी, आल्डस हक्सले का प्वाइंट काउंटर प्वाइंट, हेमिंग्वे की कहानियों की किताब, बोर्खेज़ की कहानियां, उरुग्वे के लेखक फेलिस्बर्तो हेरनांदेज की कहानियां आदि, जो उस बीमारी के दौरान उन्होंने पढ़ीं। उन्होंने लिखा है कि उन दिनों फॉकनर को पढ़ने से उनके दिमाग में उपन्यास लिखने का विचार आया।

बीमारी के बाद जब वे कार्ताजेना लौटे तो उन्होंने अपने संपादक और बाकी साथियों के सामने घोषणा कर दी कि वे एक उपन्यास लिख रहे हैं द हाउस। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है जबकि सचाई यह थी कि उन्होंने उसका पहला अध्याय ही लिखना शुरु किया था। इस बीच उन्होंने दो और कहानियां लिखीं जो एल स्पेक्तादोर में प्रकाशित हुईं। पत्रकारिता से उनका ध्यान थोड़ा हटने लगा था। एक तरफ वे लॉ की परीक्षाओं में फेल हो रहे थे दूसरी ओर पत्रकारिता से उनको कोई खास आमदनी नहीं हो पा रही थी। घरवालों को वे यह समझा पाने में असफल रहे थे कि अपने जीने का कोई ठाक-ठाक जरिया जुटा पाएंगे। ऐसे में बेहतर संभावनाओं की तलाश में उन्होंने बारांकीला जाने का निश्चय किया। वह शहर जहां उनके नए बने साहित्यिक मित्र रहते थे। माँ ने घर से आते समय अपने बचाए गए पैसों में से कुछ दे दिए थे। उसी से टिकट कटवाया और 1949 के आखिरी महीने में बारांकीला की यात्रा पर निकल पड़े। आंखों में उम्मीदें थीं और नए लिखे जा रहे उपन्यास का खाका।

लेखक जरमन वर्गास ने उनके आने की खुशी में पार्टी आयोजित की। शहर के लेखकों, कवियों, पेंटरों, संगीतज्ञों, पत्रकारों का एक छोटा सा समूह जुटा और रात भर बातें होती रहीं। जब सवेरे वे नाश्ता करने निकले तो उन्होंने एल हेराल्दो खरीदा जिसमें नए लेखक मार्केज़ के शहर में आने की सूचना छपी थी जिसे बिना बाइलाइन के अल्फांसो फुएनमेयर ने लिखा था। बारांकीला में लेखकों, कलाकारों का अपेक्षाकृत अधिक बड़ा समूह था, वहां का अपना एक कल्चर था। जिसमें लेखकों, कलाकारों को भी पहचाना जाता था। इसीलिए वह शहर उनको अच्छा लगा क्योंकि उसने बिना उनकी सामाजिक हैसियत देखे एक लेखक के रूप में सम्मान दिया। वहीं अखबार में सेप्टाइमस नाम से वे एल हेराल्दो में ला जिर्राफ नामक कॉलम लिखने लगे।

लेखकों के उस समूह से यह मित्रता प्रोफेशनल स्तर पर भी थी। एक दूसरे के लिखे कॉलम को वे पढ़ते थे, उसके बारे में बिना किसी लाग-लपेट के चर्चा करते थे और एक दूसरे को सुझाव भी देते थे। मार्केज़ के शुरुआती कॉलम को जरमन वर्गास ने पढ़ा उसे मोड़कर आग जलाई और उससे सिगरेट सुलगाकर पीने लगा। इसके अलावा उसने एक शब्द नहीं कहा। इस तरह से बारांकीला समूह के लेखक एक दूसरे की आलोचना किया करते थे लेकिन मन में कोई मैल नहीं रखते थे। उन दिनों मार्केज़ एक सस्ते होटल में रहते थे। उनके पास पहनने को दो जोड़ी कपड़े थे एक ब्रीफकेस जिसे बोगोटा की लूटमार में उन्होंने वहां की सबसे महंगी दूकान से लूटा था। उसमें वे अपने लिखे जा रहे उपन्यास की पांडुलिपि रखते थे और ब्रीफकेस को हमेशा अपने पास रखते थे। उससे बेशकीमती उनके पास उन दिनों और कोई चीज नहीं थी। जब होटल का किराया देने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे तो उन्होंने उसे होटल वाले के पास गिरवी भी रख दिया था।

उन दिनों जरमन वर्गास से उनकी ऐसी मित्रता हुई कि उस संबंध में उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है, मुझे कब किस चीज की जरूरत है इसे वह पहले ही समझ लेता था। अगर मार्केज़ के पास होटल में सोने के लिए पैसे नहीं होते थे तो वे उनकी जेब में डेढ़ पेसो सरका दिया करते थे जिससे कि सस्ते होटल में रात बिताने का इंतजाम हो जाए। उन दिनों एक टैक्सी ड्राइवर से उनकी मित्रता हो गई थी जो खाली समय में उनको टैक्सी में बिठाकर शहर के रेड लाइट वाले इलाके में ले जाता था। संघर्ष के दिनों में वेश्याओं को देखना ही उनका सबसे बड़ा मनोरंजन हुआ करता था क्योंकि बाकी मनोरंजन के लिए पैसे खर्च करने पड़ते थे।

साहित्यकारों की संगत में आने के बाद से उनकी समकालीन साहित्य में गति बढ़ रही थी लेकिन उनके लिखे जा रहे उपन्यास की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हो रही थी। मार्केज़ ने लिखा है कि उसे शुरु करते समय जो उत्साह था वह लिखते समय बाकी नहीं रह गया था। शायद इसका एक कारण यह रहा हो कि जिस समय उन्होंने उपन्यास लिखने की योजना बनाई थी उस समय वे घर-परिवार के साथ बहुत दिनों बाद रहने गए थे। उस समय घर से जुड़ी स्मृतियां घनीभूत हो गई थीं। लेकिन घर से दूर होते ही उपन्यास का आइडिया भी दूर होता चला गया। उन्होंने स्वयं लिखा है कि उस उपन्यास को लेकर उन्होंने बातें अधिक की उसको लिखा कम। वैसे जब उनको लिखने के लिए कोई विषय नहीं सूझता था तो वे अपने इस लिखे जा रहे उपन्यास के अंश प्रकाशित कर दिया करते थे।

उन दिनों हालांकि उनका लिखना नियमित रूप से चल रहा था। अखबार के ऑफिस में एक कोने में बैठकर वे चुपचाप लिखते रहते। उस दौरान वे किसी से बात नहीं करते थे। लगातार सिगरेट पीते रहने के कारण उनके आसपास धुएं का घेरा सा छाया रहता था। उसके बीच वे अक्सर सुबह तक न्यूजप्रिंट के पन्नों पर लिख करते थे और उसी को दिन भर अपने लेदर ब्रीफकेस में लेकर घूमा करते थे। एक दिन वे उस ब्रीफकेस को एक टैक्सी में छोड़कर उतर गए। ब्रीफकेस के खो जाने से वे इतने निराश हुए कि उसे ढूंढने का अपनी ओर से उन्होंने कोई प्रयास भी नहीं किया। अल्फांसो फुएनमेयर को जब पता चला तो उन्होंने मार्केज़ के कॉलम जिर्राफ के नीचे एक नोट लगा दिया। उस नोट में लिखा कि एक ब्रीफकेस पिछले सप्ताह किसी टैक्सी में छूट गया। संयोग से उस ब्रीफकेस के मालिक और इस कॉलम के लेखक एक ही व्यक्ति हैं। हम उनके बहुत आभारी होंगे अगर वे दोनों में से किसी एक को इस संबंध में सूचित करेंगे। ब्रीफकेस में कोई मूल्यवान वस्तु नहीं है, बस जिर्राफ के अनछपे पन्ने हैं। दो दिनों बाद कोई वे पन्ने एल हेराल्दो के ऑफिस के गेट पर छोड़ गया। ब्रीफकेस उसने नहीं लौटाया। अलबत्ता पांडुलिपि में तीन स्थानों पर उसने हरे पेन से वर्तनी की अशुद्धियां बहुत अच्छी लिखावट में ठीक कर दी थीं।

जब कमरे का किराया देने के पैसे नहीं होते थे तो वे रात भर खुले रहने वाले कैफे में जाकर बैठते थे और सुबह तक पढ़ते रह जाते। सुबह ऑफिस में आकर सो जाते। उस दौरान जो किताब भी मिल जाती उसी को पढ़ते-पढ़ते रात काट लेते। उन्होंने लिखा है कि उन दिनों उनको लगने लगा था कि लड़की, पैसे आदि के मामले में वे भाग्यहीन ही रह जाने वाले हैं। लेकिन इन सब चीजों की वे परवाह नहीं करते थे क्योंकि एक बात अच्छी तरह समझते थे कि अच्छा लिखने के लिए अच्छे भाग्य की कोई आवश्यकता नहीं होती है। वे पैसे, शोहरत, बुढ़ापे आदि की चिंता भी नहीं करते थे क्योंकि उन दिनों रातों को अकेले अनजान शहर के कैफे में बैठ-बैठकर उनको लगने लगा था कि उनकी मौत भरी जवानी में ही हो जाएगी, वह भी इसी तरह किसी सड़क पर। एकदम तन्हा। सबसे दूर।

उपन्यास लिखना हो तो रहा था लेकिन कहानी की कोई दिशा नहीं बन पा रही थी न ही उसका कोई उद्देश्य बनता दिखाई दे रहा था। इसी दौरान माँ के साथ अराकाटक जाना पड़ा। घर में पैसे की तंगी हो गई थी और माँ ने सोचा विरासत में मिला अपने पिता का घर बेचकर कुछ तो तंगी दूर करुं। उनको इस बहाने उस घर को दुबारा देखने का मौका मिला जिसमें उनके बचपन की यादें थीं। जब इतने साल बाद उस घर को उन्होंने फिर देखा तो उनको सिनेमा के दृश्यों की तरह अपना बचपन याद आने लगा। वह शहर जो इस समय उजाड़ दिखाई दे रहा था उसकी रौनकें याद आने लगीं। अपना जीवन फ्लैशबैक में दिखाई देने लगा। उनके अंदर एक नई रचना आकार लेने लगी। विषय फिर उसी घर को केंद्र में रखकर था।

लेकिन इस बार उपन्यास की कथा के बारे में उन्होंने किसी को नहीं बताया सिवाय अल्फांसो फुएनमेयर के। मन में एक डर यह भी था कि लोगों का पता चल जाएगा कि वे द हाउस उपन्यास नहीं कोई और उपन्यास लिख रहे हैं। जिसके बारे में वे अपने दोस्तों से कहा करते थे कि लिखी जाने के बाद वह एक बहुत बड़ी रचना साबित होगी। जानने पर लोग उनका मजाक उड़ाएंगे। मन में उसकी कहानी स्पष्ट दिखाई देने लगी थी। कहानी एक ऐसे बच्चे की स्मृतियों को आधार बनाकर होगी जिसने 1928 में  केले-बागानों के क्षेत्र में हुए नरसंहार को देखा था और बच गया। लेकिन फिर इस तरह कहानी लिखना उनको क्योंकि इस तरह से कथा एक चरित्र के माध्यम से कही गई होकर रह जाती।

उन्होंने लिखा है कि इस दौरान उन्होंने कई उपन्यास पढ़े। फॉकनर और जेम्स ज्वायस को फिर पढ़ा। फिर यह सूझा कि कहानी के तीन वाचक हों, नाना, माँ और बच्चा। इससे कहानी के तीन दृष्टिकोण हो जाएंगे। कहानी के नाना मार्केज़ के अपने नाना की तरह एक आंख वाले नहीं थे बल्कि वे लंगड़े होनेवाले थे। इस कहानी की पृष्ठभूमि भी वही थी जो द हाउस की थी। मार्केज़ ने लिखा है कि वह पूरा शहर जो उपन्यास में उतरने वाला था उनको अपनी कल्पना में जीवंत दिखाई देने लगा था। उस शहर का नाम उन्होंने रखा मकोन्दो। स्पेनिश भाषा में मकोन्दो का मतलब होता है केला और उनके नाना के कस्बे अराकाटक के बगल में एक केला-बागान का नाम मकोन्दो था। जो बाद में वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड के माध्यम से उपन्यास साहित्य का सबसे लोकप्रिय कस्बा या शहर बन गया। पहली बार इसी उपन्यास में उस कस्बे ने अवतार लिया। हालांकि लीफ स्टॉर्म का मकोन्दो वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड के मकोन्दो से काफी अलग है। लीफ स्टॉर्म का मकोंदो एक ढहता हुआ उजाड़ कस्बा है, जहां आदमी कम भूत अधिक रहते हैं, आदमी की चहल-पहल नहीं पत्तों की खड़खड़ाहट सुनाई देती है। यह वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड के मकोन्दो से काफी अलग है।

उपन्यास का शीर्षक उनको बदल देना पड़ा जो उनके मित्रों के लिए इतना चिर-परिचित बन चुका था कि वे सब उस अनलिखे उपन्यास की कहानी जानते थे जिसका लिखा जाना अभी बाकी थी। उन्होंने अपने नए उपन्यास का नाम सोचना शुरु किया। उन्होंने लिखा है कि जैसे-जैसे नाम ध्यान में आते गए उन्होंने उसे स्कूल की कॉपी में लिखना शुरु कर दिया। जब नाम सोचना और लिखना उन्होंने छोड़ा तो कुल अस्सी नाम उस उपन्यास के वे सोच चुके थे। लेकिन कोई नाम ऐसा नहीं लगा जो उपन्यास की कथा के लिए मुफीद लगता हो। जब उपन्यास के काफी पन्ने वे लिख चुके तो अचानक उनको नाम सूझ गया- लीफ स्टॉर्म। युनाइटेड फ्रूट कंपनी के छोड़ने के बाद उजाड़ हो चुके शहर में बस पत्तों की आंधी का ही शोर रह गया था। यही वह उपन्यास था जिसे उन्होंने सबसे पहले पूरा किया। द हाउस में कहानी का केंद्र था तो लीफ स्टॉर्म में अराकाटक की तबाही की त्रासद कथा।

लीफ स्टॉर्म उपन्यास के केन्द्र में एक प्रसंग है। मकोन्दो शहर के प्रतिष्ठित व्यक्ति कर्नल यह शपथ लेता है कि वह अपने बेल्जियन डॉक्टर दोस्त का अंतिम संस्कार करेगा जबकि उसकी पत्नी, उसकी बेटी ऐसा नहीं चाहती है, शहर के लोग भी उसको बददुआएं देते थे क्योंकि एक राजनीतिक संघर्ष के बाद उसने शहर के घायलों का इलाज करने से मना कर दिया था। मरते-मरते तो उसने और बड़ा अपराध किया था। कैथोलिक इसाइयों के अनुसार भगवान के कानून के विरुद्ध। आत्महत्या का अपराध। लेकिन कर्नल फिर भी उसका अंतिम संस्कार करना चाहता है। यह कहानी अपने आपमें सम्मान, कर्तव्य और शर्म को लेकर कस्बे में प्रचलित अनेक तरह की मान्यताओं को सामने रखता है, लोक विश्वासों की बात करता है।

मार्केज़ के जीवनीकार ने कहा है कि तथ्य के स्तर पर यह मार्केज़ का अकेला ऐसा उपन्यास है जिसे आत्मकथात्मक कहा जा सकता है। यही बात मार्केज़ ने फ्रेगरेंस ऑफ ग्वावा में अपने दोस्त से बातचीत करते हुए कही है। उसके प्रमुख पात्र मार्केज़ के अपने घर के ही हैं। यही नहीं जिस बेल्जियन डॉक्टर की आत्महत्या की यह कहानी है उसको भी बचपन में मार्केज़ जानते थे और उसी ने उनको सिनेमा देखने की आदत डाली थी। इस कहानी में उनके पिता, नाना, नानी समेत उस समय परिवार में मौजूद सभी पात्र किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। कहानी में परिवार के साथ-साथ कस्बे के मानस का भी चित्रण किया गया है। लेखक के इस पहले पूर्ण उपन्यास की कथा शैली पर फॉकनर, वर्जीनिया वुल्फ की कथा-प्रविधि का प्रभाव स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है।

लिखने के बाद उन्होंने उसे अपने उन तीन दोस्तों को पढ़ने के लिए दिया बारांकीला में जिनकी संगत में आकर उनका उपन्यास लेखन शुरु हुआ था। तीनों को उपन्यास पसंद आया लेकिन उन्होंने कुछ सुझाव भी दिए। मार्केज़ ने उन सुझावों के अनुरूप उपन्यास में फिर-फिर संशोधन किए। फिर उनको एक मित्र ने सुझाव दिया कि इसको छपने के लिए अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स के सबसे प्रतिष्ठित स्पेनिश प्रकाशक को भेजना चाहिए। उनके एक मित्र अल्वारो मुतिस, जो स्वयं कोलंबिया के प्रसिद्ध लेखक बने, ने वह पांडुलिपि लेकर छपने के लिए उस मशहूर लोसादा प्रकाशन को भेज दिया। उसके बाद मार्केज़ करीब दो महीने तक जैसे खुमारी की हालत में प्रकाशक के जवाब का इंतजार करते रहे।

दो महीने बाद एक दिन जब वे एल हेराल्दो के अपने ऑफिस गए तो उनके हाथ में गेटकीपर ने एक चिट्ठी दी। चिट्ठी के ऊपर ब्यूनस आयर्स के उसी लोसादा प्रकाशन के संपादकीय विभाग की मुहर लगी थी। उनका दिल धक-धक करने लगा। उनको सबके सामने चिट्ठी खोलने में शर्म आ रही थी इसलिए वे अपने केबिन में गए। कांपते हाथों से उन्होंने चिट्ठी खोली। उसमें लिखा हुआ था कि उपन्यास उनको छापने लायक नहीं लगा। संपादकीय विभाग के अध्यक्ष गुलेर्मो द तेरो की चिट्ठी भी साथ थी। उनको स्पेन के सबसे बड़े साहित्यिक आलोचकों में शुमार किया जाता था और अर्जेंटीना में निर्वासन का जीवन बिता रहे थे। उनका एक और परिचय यह था कि वे अर्जेंटीना के मशहूर लेखक होर्खे लुई बोर्खेस के बहनोई थे जिनकी कविताओं, किस्सों को मार्केज़ बेहद पसंद भी करते थे।

आलोचक गुलेर्मो ने चिट्ठी में उस नए लेखक यानी मार्केज़ की काव्यात्मक प्रतिभा की तारीफ की थी लेकिन साथ ही अपना निर्णय भी सुनाया था कि इस लेखक में उपन्यासकार की प्रतिभा नहीं है और यह कभी भी उपन्यासकार तो नहीं बन सकता। बेहतर होगा कि यह लेखक किसी और काम में अपना मन लगाए। आप समझ सकते हैं उनको कैसा सदमा पहुंचा होगा। उनका पहला सपना ही टूट गया था। उनको अपने भाग्यहीन होने पर यकीन कुछ और बढ़ गया होगा। ऐसे में उनको अपने दोस्तों से बड़ा सहारा मिला। अलवारो केपेदा ने उनको सान्त्वना देते हुए कहा कि इसमें परेशान होने की कोई बात नहीं है। हर कोई जानता है कि स्पेन के लोग अहमक होते हैं। सबने एक-एक करके उस मशहूर संपादक के बारे में बुरा-भला कहा।

लेकिन लेखक के रूप में इस तरह से नकार दिए जाने के कारण उनको गहरा धक्का लगा होगा क्योंकि जबसे वे बड़े हुए थे उन्होंने लेखक के अलावा किसी और रूप में अपने कैरियर की कल्पना ही नहीं की थी। लेकिन पहले ही उपन्यास पर इस तरह की टिप्पणी। अंदर ही अंदर वे टूटने लगे थे। उनको पहली बार यह महसूस हुआ होगा कि इतने साल के लेखन ने उनको कहां पहुंचाया। वे एक बार फिर अपने आपको वहीं पा रहे थे जहां से उन्होंने बतौर लेखक अपनी यात्रा आरंभ की थी। इस घटना के कुछ दिनों बाद तक भी वे एल हेराल्दो अखबार में नियमित रूप से अपना कॉलम जिर्राफ लिखते रहे। लेकिन निश्चित रूप से उनको अपने लेखन पर संशय हुआ होगा। उस लेखन पर जिसके लिए उन्होंने अपने कैरियर का दांव खेला था। उन्हीं दिनों उन्होंने बिना कारण बताए एल हेराल्दो की नौकरी छोड़ दी। अपना कॉलम लिखना बंद कर दिया। वे अपने लेखन के भविष्य को लेकर चिंतन करना चाहते थे।

गाब्रिएल गार्सिया मार्केस से एक बातचीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/18/2014 12:43:00 PM



गाब्रिएल गार्सिया मार्केस के साथ पीटर एच. स्टोन की बातचीत का सम्पादित अंश. जानकीपुल से साभार

प्रश्न- टेपरिकार्डर के उपयोग के बारे में आप क्या सोचते हैं?

मुश्किल यह है कि जैसे ही आपको इस बात का पता चलता है कि इंटरव्यू को टेप किया जा रहा है, आपका रवैया बदल जाता है. जहाँ तक मेरा सवाल है मैं तो तुरंत रक्षात्मक रुख अख्तियार कर लेता हूँ. एक पत्रकार के रूप में मुझे लगता है कि हमने अभी यह नहीं सीखा है कि इंटरव्यू के दौरान टेपरिकार्डर किस तरह से उपयोग किया जाना चाहिए. सबसे अच्छा तरीका जो मुझे लगता है कि पत्रकार लंबी बातचीत करे जिसके दौरान वह किसी प्रकार का नोट नहीं ले. बाद में उस बातचीत के आधार पर उसे वह लिखना चाहिए जैसा उसने उस साक्षात्कार के दौरान महसूस किया, ज़रूरी नहीं है कि वह हुबहू वही लिखे जिस तरह से इंटरव्यू देने वाले ने बोला. टेपरिकार्डर से जो भान होता है वह यह कि वह उस व्यक्ति के प्रति ईमानदार नहीं होता जिसका इंटरव्यू लिया जा रहा हो क्योंकि यह उसको भी रिकॉर्ड करके दर्ज कर लेता है जब सामने वाला अपना मजाक उड़ा रहा होता है. इसीलिए जब सामने टेपरिकार्डर होता है तो मैं इसको लेकर सजग होता हूँ कि मेरा इंटरव्यू लिया जा रहा है; लेकिन जब टेपरिकार्डर नहीं होता है मैं सहज और स्वाभाविक रूप से बात करता हूँ.

प्रश्न- तो आपने इंटरव्यू के लिए कभी टेपरिकार्डर का इस्तेमाल नहीं किया?

पत्रकार के तौर पर तो मैंने कभी उसका उपयोग नहीं किया. मेरे पास एक बहुत बढ़िया टेपरिकार्डर है लेकिन मैं उसका उपयोग केवल संगीत सुनने के लिए करता हूँ. लेकिन यह भी है कि पत्रकार के रूप में मैंने कभी इंटरव्यू नहीं किया, मैंने रिपोर्ट किए लेकिन सवाल-जवाब वाला इंटरव्यू तो कभी नहीं किया.

प्रश्न- मैंने आपके एक मशहूर इंटरव्यू के बारे में सुना है, जो एक जहाजी से था जिसका जहाज़ टूट गया था...

वह सवाल-जवाब के रूप में नहीं था. उस जहाजी ने मुझे अपने अनुभव बताये थे, मैंने उसे लिखा और यह कोशिश की उसी के शब्दों में लिखूं. मैंने कोशिश कि कि प्रथम पुरुष में लिखूं, ताकि यह लगे कि वही लिख रहा है. बाद में वह एक समाचारपत्र में धारावाहिक छपा, दो सप्ताह तक रोज उसका एक-एक खंड प्रकाशित हुआ, तो वह उसके नाम से छपा था, मेरे नाम से नहीं. जब 20 सालों बाद जब वह पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ तब लोगों को इस बात की जानकारी हुई कि उसे मैंने लिखा था. किसी संपादक को तब तक ऐसा नहीं लगा था कि वह अच्छा है जब तक कि मैंने वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सालीटयूड नहीं लिखा था.

प्रश्न- हमने बातचीत की शुरुआत पत्रकारिता के बारे में बात करने से आरम्भ की थी, फिर से पत्रकारिता से जुड़ना कैसा लगता है, जबकि इतने दिन से आप उपन्यास लिख रहे हैं? क्या कुछ अलग तरह का महसूस होता है, क्या नजरिया कुछ बदल जाता है?

मुझे हमेशा से इस बात का भरोसा रहा है कि मेरा असली पेशा पत्रकारिता ही है. पहले इसके बारे में जो बात मुझे अच्छी नहीं लगती थी वह काम करने की स्थितियां थीं, साथ ही, मुझे अपने सोच-विचारों को अखबार के हितों के मुताबिक़ ढालना पड़ता था. अब उपन्यास लिखकर मैंने आर्थिक स्वतंत्रता अर्जित कर ली है. अब मैं अपनी रूचि और विचारों के मुताबिक़ लिख सकता हूँ. वैसे भी, पत्रकारिता के माध्यम से जब भी मुझे कुछ अच्छा लिखने अवसर मिलता है तो मुझे बहुत आनंद आता है.

प्रश्न- पत्रकारिता का अच्छा नमूना क्या है आपके लिए?

जॉन हर्सी का हिरोशिमा पत्रकारिता का असाधारण नमूना है.

प्रश्न- क्या आपको लगता है कि उपन्यास कुछ ऐसा कर सकता है जो पत्रकारिता नहीं कर सकती?

कुछ भी नहीं. मुझे नहीं लगता कि इनमें कोई अंतर है. इनके स्रोत एकसमान होते हैं, सामग्री समान होती है, संसाधन और भाषा भी समान ही होती है. डेनियल डेफो का जर्नल ऑफ द प्लेग इयर्स एक महान उपन्यास है जबकि हिरोशिमा पत्रकारिता का बेहतरीन नमूना.

प्रश्न- सत्य बनाम कल्पना के बीच संतुलन बनाने में पत्रकारों और उपन्यासकारों की अलग-अलग तरह की जिम्मेदारियां होती हैं?

पत्रकारिता में अगर एक तथ्य भी गलत हो तो वह पूरे लेख को संदिघ्ध बना देता है. इसके विपरीत अगर उपन्यास में अगर एक तथ्य भी सही हो तो वह पूरी कृति को वैध बना देता है. यही एक अंतर है और यह लेखक के कमिटमेंट पर निर्भर करता है. एक उपन्यासकार जो चाहे वह कर सकता है जब तक कि लोग उसमें विश्वास करें. 

वैसे अब उपन्यास और पत्रकारिता दोनों के लिए लिख पाना मुझे पहले से मुश्किल लगने लगा है. जब मैं अखबार में काम करता था तो मैं अपने लिखे प्रत्येक शब्द को लेकर उतना सजग नहीं रहता था, जबकि अब रहता हूँ. जब मैं बोगोटा में एल स्पेक्तादोर में काम कर रहा था तब मैं सप्ताह में कम से कम तीन ‘स्टोरी’ करता था, रोज तीन सम्पादकीय लिखता था, फिर मैं सिनेमा के रिव्यू लिखता था. फिर रात में जब सब चले जाते थे तब मैं वहीँ रुककर उपन्यास लिखता था. मुझे लिनोटाइप मशीनों की आवाजें अच्छी लगती थी, जो सुनने में बारिश की तरह लगती थी. अगर वे थम जाते तो मैं ख़ामोशी के साथ तनहा रह जाता था, फिर मैं लिख नहीं पाता था. अब उसके मुकाबले मैं कम लिखता हूँ. जिस दिन सुबह के 9 बजे से दोपहर के दो या तीन बजे तक अच्छी तरह काम कर लूं तो मैं मुश्किल से चार-पांच पंक्तियों का एक पैराग्राफ लिख पाता हूँ, जिसे अक्सर अगले दिन मैं फाड़ देता हूँ.

प्रश्न- क्या आपके लेखन में यह परिवर्तन इसलिए आया है क्योंकि आपकी कृतियों को काफी सराहना मिली है या किसी राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण?

ऐसा दोनों कारणों से हुआ है. मुझे लगता है कि यह विचार कि मैं उससे कहीं अधिक लोगों के लिए लिख रहा हूँ जितनी कि मैंने कभी कल्पना की थी, ने खास तरह की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर डाल दी है जो सहित्यिक भी और राजनीतिक भी.

प्रश्न- आपने लिखना कैसे शुरू किया?

रेखांकन बनाने से. कार्टून बनाने से. जब मैं पढ़ना-लिखना नहीं जानता था तो मैं घर और स्कूल में कॉमिक्स बनाया करता था. मजेदार बात यह है कि जब मैं हाईस्कूल में पढता था तो उस समय मेरी ख्याति एक लेखक के रूप में थी जबकि तब तक मैंने कुछ भी नहीं लिखा था. कोई परचा लिखना होता था या किसी तरह का पिटीशन तो मुझे याद किया जाता था क्योंकि मुझे लेखक के तौर पर जाना जाता था. जब मैं कॉलेज में गया तो सामान्य तौर पर मेरे दोस्तों के मुकाबले मेरी साहित्यिक पृष्ठभूमि अच्छी मानी जाती थी. बोगोटा में विश्वविद्यालय के दिनों में मेरी कुछ ऐसे लोगों से दोस्ती हुई जिन्होंने मेरा परिचय समकालीन लेखकों से करवाया. एक रात मेरे एक दोस्त ने मुझे फ्रांज़ काफ्का की कहानियों की  किताब पढ़ने को दी. उसमें उनकी कहानी मेटामॉर्फोसिस भी थी. उसकी पहली पंक्ति पढते ही मैं अपने बिस्तर से उछल पड़ा- ‘उस सुबह जब ग्रेगरी साम्सा असहज सपने से जगा तो उसने पाया कि वह बिस्तर पर एक बहुत बड़े कीड़े में बदल गया है.’ इस लाइन को पढकर मैंने यह सोचा कि यह तो मुझे पता ही नहीं था कि कोई इस तरह से भी लिख सकता था, किसी को इस तरह से लिखने की इजाज़त भी मिल सकती थी. अगर मुझे पता होता तो मैंने बहुत पहले ही लिखना शुरू कर दिया होता. फिर मैंने तत्काल कहानियां लिखनी शुरू कर दी. वे पूरी तरह से बौद्धिक कहानियां थी जो मेरे साहित्यिक अनुभवों पर आधारित थी और तब तक जीवन और साहित्य के बीच का सूत्र मुझे नहीं मिला था. वे कहानियां उस दौर में एल स्पेक्तादोर के साहित्यिक परिशिष्ट में छपी और उस दौर में उनको कुछ सफलता भी मिली- उसका कारण शायद यह था कि उस ज़माने में कोलंबिया में कोई बौद्धिक कहानियां नहीं लिख रहा था. मेरी आरंभिक कहानियों के बारे में कहा गया कि उनके ऊपर जेम्स जॉयस का प्रभाव है.

प्रश्न- आपने तब तक जॉयस को पढ़ा था?

मैंने तब तक उनको पढ़ा नहीं था, इसलिए मैंने यूलिसिस पढ़ना आरम्भ कर दिया. उनसे मैंने आतंरिक एकालाप की तकनीक सीखी. बाद में मैंने वह तकनीक वर्जीनिया वुल्फ में भी देखी और मुझे अच्छा लगा, वे उस तकनीक का जॉयस से भी अच्छी तरह उपयोग करती थी. हालाँकि मैंने बाद में पाया कि आंतरिक एकालाप की तकनीक को इजाद करनेवाला लेखक लाजरिलो दे तोर्म्स का गुमनाम लेखक था.

प्रश्न- उस समय आप किसके लिए लिख रहे थे? आपके पाठक कौन थे?

लीफ स्टोर्म उपन्यास मैंने मैंने अपने उन दोस्तों के लिए लिखा था जो मेरी मदद कर रहे थे, मुझे किताबें उधार देते थे और सामान्य तौर पर मेरे लेखन को लेकर प्रोत्साहित रहते थे. मुझे लगता है कि आप सामान्य तौर पर किसी न किसी के लिए लिखते हैं. जब मैं लिख रहा होता हूँ तो मुझे लिखते हुए इस बात का अहसास हो जाता है कि फलां को यह पसंद आएगा, अमुक दोस्त इस अनुच्छेद को पसंद करेगा, मैं उन अलग-अलग खास लोगों के बारे में सोचता रहता हूँ. आखिरकार सभी पुस्तकें अपने दोस्तों के लिए ही तो लिखी जाती हैं. वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड लिखने के बाद यह हुआ है कि लाखों-करोड़ों पाठकों में मैं किसके लिए लिख रहा हूँ इस बात का मुझे पता नहीं होता, इससे मैं असहज हो जाता हूँ. यह कुछ वैसे ही है लाखों आँखें आपको देख रही हों और आपको पता नहीं चले कि वे क्या सोच रहे हैं.

प्रश्न- आपके गल्प-लेखन पर पत्रकारिता के प्रभावों के बारे में आपका क्या कहना है?

मुझे यह दोतरफा लगता है. उपन्यासों ने मेरे पत्रकारिता-लेखन की इस दिशा में मदद की है उसके कारण उसमें साहित्यिक मूल्य पैदा हुआ. पत्रकारिता ने मेरे उपन्यासों की इस तरह मदद की है कि उसने मुझे हमेशा यथार्थ के करीब रखा है.

प्रश्न- लीफ स्टॉर्म से लेकर वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड शैली की जो तलाश आपकी रही, उसको आप किस तरह देखते हैं?

लीफ स्टॉर्म लिखने के बाद मुझे लगा कि गांव और अपने बचपन के बारे में लिखना असल में देश के राजनीतिक यथार्थ से पलायन है. मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं देश के राजनीतिक हालात से भागने के क्रम में एक प्रकार के नॉस्टेल्जिया के पीछे छिप रहा हूँ. वही समय था जब साहित्य और राजनीति के संबंधों को लेकर खूब चर्चा होती थी. मैं उन दोनों के बीच की दूरी को पाटने की कोशिश करता रहा. पहले मैं फौकनर से प्रभावित था, बाद में हेमिंग्वे का प्रभाव पड़ा. मैंने नो वन राइट्स टू कर्नल, इन एविल आवर, द फ्यूनरल ऑफ ग्रेट मैट्रियार्क लिखे, जो कमोबेश एक ही दौर में लिखे गए थे और उनमें काफी समानताएं थीं. लीफ स्टॉर्म और वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड के मुकाबले उनका परिवेश अलग था. वह एक ऐसा गांव था जहाँ कोई जादू नहीं था. वह पत्रकारीय साहित्य था. लेकिन जब मैंने ‘इन एविल आवर’ लिखा तो मैंने पाया कि मेरे सारे दृष्टिकोण गलत साबित हुए. मैंने पाया कि बचपन को लेकर लिखते हुए मैंने जो लिखा उसका सम्बन्ध राजनीति से अधिक और मेरे देश के यथार्थ से अधिक था जितना मैंने सोचा था. इन एविल आवर के बाद मैंने पांच सालों तक कुछ नहीं लिखा. मुझे इसकी कुछ समझ तो थी कि मैं क्या लिखना चाहता था, लेकिन कुछ था जो उनमें रह जाता था, नहीं आ पाता था. आखिरकार मैंने वह स्वर पा लिया, जिसका मैंने बाद में वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड में उपयोग किया. वह उस पर आधारित था जिस तरह कि मेरी नानी मुझे कहानियां सुनाती थीं. वे जो बातें बताती थी वे पराभौतिक और काल्पनिक प्रतीत होती थीं, लेकिन उनको पूरे स्वाभाविकता के साथ सुनाया करती थीं. जब मुझे वह स्वर मिल गया जिसमें मैं लिखना चाहता था तो उसके बाद मैं 18 महीनों तक बैठकर लिखता रहा, हर दिन.

प्रश्न- उस तकनीक में कुछ पत्रकारीय भंगिमा भी लगती है. आप कल्पनाजनित घटनाओं का भी इतनी गहराई से वर्णन करते हैं कि वह उनको एक तरह का यथार्थ प्रदान कर देता है. यह कुछ ऐसा है जो लगता है आपने पत्रकारिता से सीखा?

यह एक पत्रकारीय युक्ति है जिसको आप साहित्य में आजमा सकते हैं. उदाहरण के लिए, अगर आप कहें कि आकाश में हाथी उड़ रहे हैं तो कोई विश्वास नहीं करनेवाला. लेकिन अगर आप कहें कि आकाश में कुल 425 हाथी हैं तो शायद लोग आपका विश्वास कर लें. वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड इस तरह की चीज़ों से भरा हुआ है. यह ठीक वही तकनीक है जिसका मेरी नानी उपयोग किया करती थीं. मुझे वह कहानी खास तौर पर याद है जो एक ऐसे आदमी के बारे में है जो पीली तितलियों से घिरा रहता था. जब मैं बहुत छोटा था तो हमारे घर में एक बिजली का काम करनेवाला आता था. मुझे उसको लेकर बहुत उत्सुकता रहती थी क्योंकि वह अपने साथ एक बेल्ट लेकर आता था जिससे वह खुद को बिजली के खम्भे से बाँध लेता था. मेरी नानी कहतीं कि जब यह आदमी आता है घर तितलियों से भर जाता है. जब मैं इस बात को लिख रहा था तो मुझे लगा कि अगर मैंने नहीं कहा कि तितलियाँ पीली थीं तो लोग विश्वास नहीं करेंगे.

प्रश्न- वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड के ‘बनाना फीवर’ के बारे में आपका क्या कहना है? यूनाइटेड फ्रूट कंपनी के कारनामों से उसका कितना संबंध है?

‘बनाना फीवर’ का काफी कुछ सम्बन्ध यथार्थ से है. वास्तव में, मैंने कुछ ऐसी साहित्यिक युक्तियों का प्रयोग किया है जिनको ऐतिहासिक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता. उदाहरण के लिए, चौक में हुए जनसंहार की घटना बिलकुल सत्य है, मैंने उसे दस्तावेजों और बयानों के आधार पर लिखा है, लेकिन इस बात का कभी पता नहीं चल पाया कि कितने लोग उस घटना में मारे गए. मैंने मरनेवालों की संख्या 3000 लिखी, जो ज़ाहिर है अतिरंजना थी. लेकिन मेरी बचपन की स्मृतियों में उस ट्रेन को देखना भी है जो बहुत लंबी थी जो बागानों से केले भरकर लौटी थी. उसमें तीन हज़ार मृत हो सकते थे, जिनको समुद्र में फेंक दिया गया. लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि अब संसद और अखबारों में 3000 मृतकों की बात होने लगी है. मुझे लगता है कि हमारा आधा इतिहास इसी तरह से बना हुआ है. ऑटम ऑफ द पैट्रियार्क में तानाशाह कहता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह अभी सत्य नहीं है, लेकिन आनेवाले समय में यह बात सच साबित होगी. आनेवाले समय में जनता सरकार के बजाय लेखकों पर अधिक भरोसा करेगी.

प्रश्न- क्या आपको अंदाजा था कि वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड को ऐसी अप्रत्याशित सफलता मिलने वाली है?

मैं इतना तो जानता था कि यह किताब मेरे दोस्तों मेरी अन्य किताबों के मुकाबले अच्छी लगेगी. लेकिन जब मेरे स्पेनिश प्रकाशक ने कहा कि वह इसकी आठ हज़ार प्रतियाँ छापने जा रहा है तो मैं सन्न रह गया, क्योंकि मेरी अन्य किताबें 700 प्रतियों से ज्यादा नहीं बिकी थीं. मैंने उनसे कहा कि शुरुआत कम से करनी चाहिए, उसने जवाब दिया कि उसे पक्का विश्वास है कि यह एक अच्छी किताब है और मई से दिसंबर के दरम्यान सभी प्रतियाँ बिक जाएंगी. वास्तव में ब्यूनस आयर्स में वे सभी एक सप्ताह के अंदर बिक गईं.

प्रश्न- आपको क्या लगता है वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड इतनी पसंद क्यों की गई?

इसका मुझे बिलकुल अंदाज़ नहीं है क्योंकि मैं अपनी रचनाओं का बहुत बुरा आलोचक हूँ. इसकी एक व्याख्या जो मैंने अक्सर सुनी है वह यह है यह किताब लैटिन अमेरिका के लोगों की निजी जिंदगियों के बारे में है, तथा यह अंतरंगता से लिखी गई है. इस व्याख्या से मुझे आश्चर्य होता है क्योंकि जब मैंने इसे लिखने का पहला प्रयास किया था तब इसका नाम द हाउस होनेवाला था. मैं यह चाहता था कि इस उपन्यास की घटनाएँ घर के अंदर ही घटित हों तथा बाहरी संसार का इसमें वही कुछ आये जो इस बात को दिखाने के लिए हो कि उसका घर पर क्या प्रभाव पड़ा. इसकी एक और व्याख्या मैंने यह सुनी है कि प्रत्येक पाठक इसके पात्रों में से किसी न किसी के साथ अपनी छवि देख सकता है. मैं नहीं चाहता कि इसके ऊपर कोई फिल्म बने क्योंकि फिल्म देखने वाले एक चेहरा देखेंगे, जिसके बारे में हो सकता है कि उन्होंने कल्पना भी नहीं की हो.

प्रश्न- क्या इसके ऊपर फिल्म बनाने को लेकर आपकी कोई रूचि है?

मेरी एजेंट ने इसके फिल्म अधिकार के दस लाख डॉलर की दर तय की थी ताकि कोई इसके ऊपर फिल्म बनाने की न सोचे. लेकिन जब कुछ प्रस्ताव आये तो उसने इसे बढ़ाकर 30 लाख डॉलर कर दिया. मेरी कोई रुचि नहीं है कि इसके ऊपर किसी तरह की फिल्म बने और जब तक मैं रोक सकता हूँ तब तक इसके ऊपर फिल्म बनने से मैं रोकूँगा. मैं तो यही चाहूँगा कि पाठकों और इस किताब के बीच एक तरह का निजी रिश्ता बना रहे.

प्रश्न- क्या आपको लगता है कि किसी किताब का फिल्म में अच्छी तरह रूपांतरण हो सकता है?

मुझे किसी ऐसी फिल्म का ध्यान नहीं आता जो किसी अच्छे उपन्यास से अच्छी बनी हो लेकिन मुझे कई ऐसी अच्छी फिल्मों का ख्याल आता है जो बुरे उपन्यासों पर बनी हैं.

प्रश्न- क्या आपने कभी खुद फिल्म बनाने के बारे में सोचा?

एक समय में मैं फिल्म निर्देशक बनना चाहता था. मैंने रोम में फिल्म निर्देशन की पढ़ाई भी पढ़ी. मैं सोचता था कि सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसकी कोई सीमा नहीं है और जिसमें कुछ भी संभव है. मैं मेक्सिको इसीलिए रहने आया क्योंकि मैं फिल्मों में पटकथा लेखक के रूप में काम करना चाहता था. लेकिन सिनेमा की एक बड़ी सीमा यह है कि यह यह एक औद्योगिक कला है, उद्योग है. फिल्मों में जो आप कहना चाहते हैं उसकी अभिव्यक्ति बहुत मुश्किल है. मैं अभी भी इसके बारे में सोचता हूँ, लेकिन अब यह मुझे विलासिता लगती है, जिसे आप दोस्तों के साथ करना चाहें बिना इस बात कि उम्मीद किये कि मैं स्वयं को अभिव्यक्त कर पाउँगा. इसलिए मैं सिनेमा से दूर बहुत दूर होता चला गया. इसके साथ मेरा सम्बन्ध उस जोड़े की तरह है जो अलग-अलग नहीं रह सकते लेकिन वे साथ-साथ भी नहीं रह सकते. मुझे फिल्म कंपनी और जर्नल में से एक चुनने को कहा जाए तो मैं जर्नल को ही चुनूंगा.

प्रश्न- क्या आपको लगता है कि किसी लेखक के जीवन में सफलता या प्रसिद्धि का बहुत ज़ल्दी आ जाना अच्छा नहीं होता?

यह तो किसी भी उम्र में बुरा ही होता है. मैं तो यह चाहता कि मेरी किताबें मेरी मृत्यु के बाद प्रसिद्ध हुई होती, कम से कम पूंजीवादी देशों में, जहां आप एक तरह से माल में बदल दिए जाते हैं.

प्रश्न- अपनी प्रिय पुस्तकों के अलावा आप इन दिनों क्या पढ़ रहे हैं?

मैं अजीब-अजीब तरह की किताबें पढता हूँ. एक दिन मैं मोहम्मद अली के संस्मरण पढ़ रहा था. ब्रेम स्टोकर का ड्रैकुला बड़ी अच्छी किताब है, अगर मैंने उसे कुछ साल पहले नहीं पढ़ा होता तो हो सकता है कि मैं कहता कि उसे पढ़ना समय बर्बाद करना है. लेकिन मैं किसी किताब को तब तक नहीं पढता जब तक उसके बारे में मुझे कोई ऐसा आदमी नहीं बताता जिसके ऊपर मैं विश्वास करता हूँ. मैं अब उपन्यास नहीं पढ़ता. मैंने अनेक संस्मरण और दस्तावेज़ पढ़े हैं, चाहे वे जाली दस्तावेज़ ही क्यों न हों. और मैं अपनी पसंदीदा किताबों को फिर-फिर पढता हूँ. पुनर्पठन का एक फायदा यह होता है कि आप किसी भी पेज को खोलकर अपने मनपसंद हिस्से को पढ़ सकते हैं. अब मैं केवल ‘साहित्य’ पढ़ने के पवित्र विचार को खो चुका हूँ. मैं कुछ भी पढ़ लूँगा. मैं अपने आपको अपटुडेट रखने की कोशिश करता हूँ. मैं हर् सप्ताह दुनिया भर की सारी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं को पढ़ जाता हूँ. जब मैं दुनिया की सारी गंभीर और महत्वपूर्ण पत्रिकाओं को पढ़ जाता हूँ तो मेरी पत्नी आकर कोई ऐसा समाचार सुनती है जिसके बारे में मैंने नहीं सुना होता है. जब मैं उससे पूछता हूँ कि उसने कहाँ से पढ़ा तो वह कहती है कि उसने ब्यूटी पार्लर में एक मैगज़ीन में पढ़ा. इसलिए मैं फैशन मैगजीन्स तथा औरतों की हर तरह की पत्रिकाएं, गॉसिप की पत्रिकाएं, सारी पढता हूँ. और मैं बहुत कुछ सीखता हूँ जो केवल उनको पढ़ने से ही सीखा जा सकता है. इसके कारण मैं बहुत व्यस्त रहता हूँ.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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