हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

‘मैं नहीं मानती कि जेंडर सिर्फ दो ही हैं’: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/22/2015 12:45:00 AM


अरुंधति रॉय ने मुल्क के मौजूदा हालात और इनमें एक लेखक के रूप में अपनी संवेदना और जिम्मेदारियों के बारे में यह इंटरव्यू आउटलुक की सबा नकवी को दिया है, जो पत्रिका के इंडिपेंडेंस डे स्पेशल में प्रकाशित हुआ है. इंटरव्यू की शुरुआत में पत्रिका की टिप्पणी है, ‘अरुंधति रॉय ज्यादातर लेखकों की तुलना में कहीं बड़े फलक को अपने आगोश में समेटे हुए हैं.’ अनुवाद: रेयाज उल हक. तस्वीरें: आउटलुक से साभार.



‘मैं नहीं मानती कि जेंडर सिर्फ दो ही हैं. मैं जेंडर को एक बहुरंगी पट्टी के रूप में देखती हूं, और मैं इसमें कहीं पर हूं’

आप एक लेखिका हैं, लेकिन आपने अधिकारों के मुद्दों और आंदोलनों पर कुछ बहुत ही मजबूत बहसें की हैं और हस्तक्षेप किया है. आप अपने विकास को लैंगिक (जेंडर के) नजरिए से कैसे देखती हैं?

सबसे पहले तो मुझे यह कहना चाहिए कि मैं नहीं मानती कि सिर्फ दो ही जेंडर हैं. मैं जेंडर को एक बहुरंगी पट्टी (स्पेक्ट्रम) की तरह देखती हूं और मैं इस पट्टी में कहीं पर हूं. एक क्वीर (समलैंगिक- अनु.) दोस्त के मुताबिक, लैंगिक रंगों की पट्टी पर मेरा विकास ‘स्ट्रेट’ (विपरीतलिंगी- अनु.) से शुरू करके ‘क्विक्ड’ (समलैंगिक चेतना- अनु.) पर पहुंचा है. दूसरी बात,  मैं खुद को एक ऐसी इन्सान के रूप में नहीं देखती, जो दुनिया को ‘अधिकारों’ और ‘मुद्दों’ के चश्मे से देखता हो. एक लेखक के लिए दुनिया को देखने की यह बेहद तंग और खोखली नजर है. अगर आप मुझसे पूछें कि मैं जो लिखती हूं, उसके केंद्र में क्या है, तो यह ‘अधिकारों’ के बारे में नहीं है, यह इंसाफ के बारे में है. इंसाफ एक महान, खूबसूरत और क्रांतिकारी विचार है. इंसाफ की शक्ल क्या हो? अगर हम चीजों को अलग अलग ‘मुद्दों’ में बांट दें, तब वे महज ‘मुद्दे’ ही बने रहेंगे, मानो एक कबूल करने के काबिल तस्वीर का वे महज एक तकलीफदेह कोना हों. बेशक, दुनिया में ऐसा कोई समाज नहीं है, जो इंसाफ पर आधारित हो या बिना किसी खामी के एक मुकम्मल समाज हो – लेकिन हम इंसाफ के लिए कोशिश करना छोड़ नहीं सकते. आज तो ऐसा लगता है कि हम उल्टी दिशा में दौड़ रहे हैं, नाइंसाफी की तरफ बढ़ रहे हैं, इसकी ऐसे तारीफ कर रहे हैं मानो यह एक कीमती सपना हो, एक मकसद हो, एक प्रेरणा हो. और भारत की खौफनाक त्रासदी यह है कि जाति व्यवस्था ने नाइंसाफी को संस्थागत बना दिया है, इसे एक पवित्र चीज बना दिया है. तो हमें इस तरह बना दिया गया है कि हम ऊंच-नीच को और नाइंसाफी को कबूल कर लें. ऐसा नहीं है कि दूसरे समाज इंसाफ पर आधारित हैं. दूसरे समाज जंगों और गैर यकीनी पैमाने के नस्ली सफाए से होकर गुजरे हैं. मैं बस अपने समाज की कल्पना के बारे में बात कर रही हूं. ऐसे हालात में कोई क्या कर सकता है, हम इसकी आलोचना कैसे करें? हममें से अनेक लोग यह जानते हुए भी अपने काम में लगे हुए हैं कि अगर कोई सुन नहीं रहा हो फिर भी, हम कभी नहीं जीत पाएं फिर भी - हालांकि हम जीतना चाहते हैं और बुरी तरह इसकी चाहत रखते हैं -  हम इस जीत के जुलूस का हिस्सा बनने के बजाए दूसरे पक्ष में रहना पसंद करेंगे, क्योंकि जीत का यह जुलूस असल में मौत का जुलूस है.

जब आप इस पर गौर करती हैं, तो क्या यह समझना मुमकिन है कि आज के दौर के इतने सारे संघर्षों में क्यों महिलाएं अगले मोर्चे पर हैं?

महिलाएं क्यों शामिल हैं? क्योंकि व्यापक रूप से कहें तो वे परंपरा और साथ ही बाजार द्वारा थोपी गई नई ‘आधुनिकता’, दोनों ही तरफ से हमले का निशाना हैं. मैं खुद केरल में ‘परंपरा से घिरे हुए’  जीवन से बच निकलने का सपना देखती हुई बड़ी हुई, लेकिन तब मेरा सामना आधुनिकता की एक किस्म से हुआ, मैं उससे भी भागना चाहती थी. तो आपको इनमें से चुन कर अपने लिए एक रास्ता चुनना होगा. इस मुल्क में ऐसे लोग हैं जो लड़कियों को बचपन में ही मार डालते हैं, गर्भ में ही लड़कियों की होने वाली हत्याओं में दसियों लाख लड़कियां मारी जाती हैं – और ऐसा सिर्फ परंपरागत ग्रामीण समुदायों में ही नहीं है – यहां जाति के आधार पर इज्जत के नाम पर हत्याएं होती हैं और इसी के साथ साथ यहां दुनिया की सबसे आजाद, सबसे मजबूत, सबसे जीवंत औरतें हैं, सबसे स्वतंत्र और सबसे जुझारू औरतें, मौलिक रूप से सोचने वाली औरतें जो संघर्षों के सबसे अगले मोर्चों पर हैं – भारत में हम एक ही साथ अनेक सदियां जीते हैं.

गुजर बसर के हरेक तरीके पर हमला, जमीन पर हमला, ये सब बुनियादी रूप से औरतों पर असर डालते हैं. इसलिए अगर आप नर्मदा आंदोलन को देखें, जहां हम एक पूरी नदी घाटी सभ्यता की बेदखली और तबाही के बारे में बातें कर रहे हैं, वहां लाखों लोग, औरतें जमीन पर काम करती थीं और जमीन की मालिक थीं. आदिवासी औरतें – और मैं ये नहीं कह रही कि आदिवासी समाज नारीवादी खूबियों से होड़ लेने वाला समाज है – लेकिन वहां एक ऐसी समझदारी थी जिसके तहत औरतें मिल्कियत में हिस्सेदार थीं, जमीन उनकी भी थी. लेकिन औरतों की पूरी आबादी को बेदखल करना और मर्दों को बस मुआवजे की रकम दे देना जो उसे शराब और मोटरसाइकिल पर कुछ ही हफ्तों में खर्च कर देंगे, औरतों को खौफनाक आधुनिकता के इस महासागर में डुबो देना है, जहां वे सब बाजार में बस एक असंगठित मजदूर बन जाती हैं या फिर दूसरे तरह से उनका शोषण होता है, जिसको हमेशा एक नारीवादी मुद्दे के बतौर नहीं देखा जाता है. हालांकि यह भी एक नारीवादी मुद्दा ही है. बस्तर में बेदखली के खिलाफ संघर्षरत, 90,000 सदस्यों वाले क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन को एक नारीवादी संगठन नहीं माना जाता. लेकिन वे लड़ रही हैं, और कैसे! नर्मदा घाटी में, ये औरतें ही हैं जो संघर्ष को अपने कंधों पर उठाए हुए हैं. और लड़ने की प्रक्रिया में वे बदलती हैं, वे खुद को मजबूत करती हैं. जब मैं बस्तर गई थी, जब मैंने 'वाकिंग विद द कॉमरेड्स' लिखा था (मार्च 29, 2010) तो मैं इस बात पर हैरान रह गई थी कि हथियारबंद गुरिल्ला लड़ाकों में से आधी औरते थीं. मैंने रात-रात भर और दिन-दिन भर उनसे इसके बारे में लंबी बात की कि उन्होंने ऐसा फैसला क्यों किया था. बेशक, उनमें से अनेकों ने सलवा जुडूम और अर्धसैनिक बलों के खौफनाक कारनामे अपनी आंखों से देखे थे – बलात्कार और गांवों को जलाना और ऐसे ही कारनामे. लेकिन उनमें से अनेक ने इसे अपने समाज के मर्दों के दबदबे और उनकी हिंसा से बचने के रूप में भी देखा था. और बेशक, वे ‘पार्टी’ में भी मर्दों के दबदबे और हिंसा के खिलाफ खड़ी हुईं. वहां के मेरे दिनों में एक ऐसा पल भी आया, जब मैं और महिला कॉमरेड्स हम सब नदी में नहाने गईं. उनमें से कुछ ने निगरानी का काम संभाला जबकि हममें से बाकी तैरते हुए नहाने लगीं. धारा की उल्टी तरफ कुछ महिला किसान भी नहा रही थीं. और मैंने सोचा, ‘जरा देखो, नदी में ये सब कौन हैं! इस बहते हुए पानी में इन औरतों को देखो.’ क्या बात थी वो. तो आपके सवाल का जवाब देते हुए, मैं सोचती हूं कि इस बात की एक तर्कसंगत व्याख्या है कि क्यों औरतें आंदोलनों के अगले मोर्चे पर हैं. और औरतों के बारे में एक खास बात है कि वे एक ऐसे समाज में यह कर सकती हैं, जो उनके खिलाफ हिंसा से इस कदर भरा हुआ है. और बात बस कुछेक गैरमामूली औरतों की ही नहीं है, जिनके नाम हम सब जानते हैं. बेशुमार औरतें हैं, सिर्फ नफीस शहरी औरतें ही नहीं – और वे वहां किसी की पत्नी या मां या विधवा या बहन के रूप में नहीं हैं. वे खुद हैं. वे बेमिसाल हैं.

आपके अपने जीवन में वे कौन से प्रभाव रहे, जिन्होंने आपको वो बनाया जो आप हैं?

मेरा अनुमान है कि सबसे पहले तो मेरी अद्भुत और असाधारण मां ने अनोखे और साथ ही साथ क्रूर तरीकों से असर डाला. वे पलक झपकते मेरा दम उखाड़ सकती हैं. शायद आपको मुझसे बात करने के बजाए उनसे बात करनी चाहिए. वे एक सीरियन ईसाई परिवार से आती हैं, जो किसी भी तरह से धनी परिवार नहीं था. फिर उन्होंने इसके बाहर जाकर एक बंगाली से शादी की, कुछेक बरसों में ही तलाक लिया और अपनी मां के साथ रहने के लिए केरल में एक गांव में आ गईं. वो...और हम...इस बेहद जातिवादी और रोब-दाब वाले, धनी और जमीन की मिल्कियत वाले समुदाय से पूरी तरह बचा कर रखे गए – अब बेशक मेरी मां की तारीफ होती है. लेकिन तब अक्सर वे मेरे भाई और मुझ पर अपना गुस्सा उतारती थीं. हम समझते थे लेकिन इससे यह सब और मुश्किल हो जाता था. मेरा अपनी मां के साथ बेहद जटिल रिश्ता है -  मैं जब 17 की थी तो मैंने घर छोड़ दिया और फिर कई बरसों के बाद ही घर लौटी. कुछ लोगों के लिए मेरे परिवार की तस्वीर एक समझ में आने लायक सुरक्षा में बसर करनेवाले परिवार की बनती है, लेकिन जिसने भी द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स पढ़ी है, वो जान जाएगा कि यह मेरे लिए एक खतरनाक जगह थी. मैं एक ऐसे गांव में बड़ी हुई जहां हर चीज मौजूद थी. यह एक ऐसी जगह थी, जहां महान धर्म एक साथ वजूद में थे – हिंदू धर्म, ईसाइयत, इस्लाम, मार्क्सवाद – हम यकीन करते थे कि क्रांति आ रही थी. सब तरफ लाल झंडे और इन्कलाब जिंदाबाद था! लेकिन फिर जाने कैसे यह इतने तंग दायरे वाला था और फिर जाति भी थी. मैंने पाया कि जब मैं छोटी ही थी, मैं इन सबको समझने की कोशिश करने लगी थी. मेरे लिए यह बेहद साफ था कि मैं एक ‘शुद्ध’ सीरियन ईसाई नहीं थी और कभी भी मैं उस महान समाज का हिस्सा नहीं बनने जा रही थी. और इस तरह मैं वहां से निकलने को बेकरार हो गई, मेरे मन में गांव के प्रति कोई बड़ा प्यार नहीं था, समुदाय या परिवार में शामिल होने की ऐसी कोई चाहत नहीं थी और न ही समुदाय और परिवार को ही मुझे अपने में शामिल करने की इच्छा थी. मैं अपने पिता को नहीं जानती थी, मैंने उनके कुछेक फोटोग्राफ देखे थे, बस. मैंने उन्हें बहुत बाद में देखा, जब मैं बीसेक साल की थी. तो मेरी जिंदगी में कभी कोई मर्द शख्सियत नहीं थी जो मेरी देखभाल करे या मेरी हिफाजत करे. भावनाओं के लिहाज से बड़े होने के लिए यह एक अजनबी सी और गैरमहफूज जगह थी. दुनिया के सारे दुखों को देखते हुए और बच्चे जिन तकलीफों से गुजरते हैं, मैं यह दावा नहीं कर सकती कि मेरा एक त्रासद बचपन था. लेकिन यह विचारों में डूबा हुआ बचपन तो था ही, जिसमें चीजों पर सोचना ज्यादा था और अकेले रहना कम. मैं नदी पर मछलियां मारते हुए काफी वक्त बिताती, एक लेखक के रूप में मैं अपनी आवाज को किसी उत्पीड़न की एक ‘शुद्ध’ शिकार की साफ और गुस्से से भरी हुई आवाज नहीं बना सकती – अगर असल में ऐसी कोई चीज हो तो. ऐसा है कि मैं कुछ कुछ बेचैन सी, खुरदरी निगाह से देखती हूं और लिखती हूं.

आपने इतनी सारी बातों पर लिखा है, नर्मदा आंदोलन, कश्मीर, माओवादी, पूंजीवाद. अभी अभी भारत में एक फांसी दी गई है और आपने कभी अफजल गुरु की बेगुनाही के बारे में दलील देते हुए एक बेहद ताकतवर लेख लिखा था.

जब द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स को बुकर पुरस्कार मिला, तो यह जाहिर करने के लिए विश्व सुंदरियों के साथ साथ मेरे नाम की रट लगाई जाने लगी कि यह एक विजेता, नए-नए वैश्वीकृत हुए, मुक्त-बाजार वाले भारत का चेहरा है जो दुनिया के रंगमंच पर आत्मविश्वास के साथ कदम रखनेवाला है. इस तरह मेरा इस्तेमाल हो रहा था, जो ठीक है. लेकिन इसके बाद जल्दी ही भाजपा सत्ता में आई और उसने फौरन परमाणु परीक्षण किए जिसको उन हलकों से भी भारी और अश्लील तारीफ हासिल हुई, जिनसे उम्मीद नहीं की जा सकती.

मैं खौफजदा थी. मैं तब एक ऐसी सार्वजनिक शख्सियत थी कि चुप रहना उन परीक्षणों को स्वीकृति देने जैसा था, बोलने की तरह ही चुप रहना भी एक राजनीतिक कदम था. और इस तरह मैंने द एंड ऑफ इमेजिनेशन लिखा (अगस्त 3, 1998). फौरन मुझे कुर्सी से लात मार कर नीचे फेंक दिया गया – परियों की रानी-मिस इंडिया-पुरस्कार विजेता की कुर्सी. नफरत और गाली-गलौज का एक बहरा कर देनेवाला डंका बजने लगा. मुझे यकीन है कि उन परीक्षणों ने सार्वजनिक विमर्श के सुर को बदल दिया था. यह बदसूरत हो गया था, यह पहले से ज्यादा कठोर राष्ट्रवादी सुर बन गया था, जो अब तक कायम है. लेकिन जब एक तरह के लोग मुझे खारिज कर रहे थे, तो दूसरी तरह के लोग मुझे अपना रहे थे. और इसने मुझे एक सफर पर रवाना किया, जो अब भी जारी है. परमाणु परीक्षणों के फौरन बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने सरदार सरोवर बांध के निर्माण पर लंबे समय से जारी रोक को हटा लिया. मैंने नर्मदा घाटी की यात्रा की और द ग्रेटर कॉमन गुड (मई 24, 1999) लिखा.

हरेक सफर ने, मेरे लिखे हरेक निबंध ने मेरी समझदारी को और गहरा बनाया. संसद पर हमला जब हुआ था तभी यह मुझे पूरी तरह अस्वाभाविक लगा था. वकील नंदिता हक्सर ने चीजों का पर्दाफाश करने का बेहतरीन काम किया. उसी वक्त मुझे अदालत की अवमानना के आरोप में जेल भेजा गया था. संसद हमले के मुल्जिमों में से एक शौकत गुरु की बीवी अफशां गुरु भी वहां थीं. वो गर्भवती थीं, बेचैन आंखों वाली, रोती हुईं और उन्हें पता नहीं था कि वे जेल में क्यों थीं. दूसरे कैदी उनसे एक बड़ी देशद्रोही के रूप में पेश आ रहे थे. मैंने उनसे बात करने की कोशिश की. मैंने कहा, ‘मैं जल्दी ही रिहा हो जाऊंगी. क्या ऐसा कुछ है जो मैं आपके लिए कर सकती हूं?’ वो खाली निगाहों से मुझे बस देखती रहीं और कहा, ‘क्या आप मुझे एक तौलिया दे सकती हैं? मेरे पास एक तौलिया नहीं है.’ कुछ बरस बाद उन्हें बरी कर दिया गया, लेकिन उनकी जिंदगी तबाह हो चुकी थी.

अब उनके बारे में कोई बात नहीं करता. उसके बाद मैंने मामले का सावधानी से अध्ययन किया. जब एस.ए.आर गिलानी को बरी किया गया और अफजल को फांसी की सजा सुनाई गई, तब मैंने मामले के सारे अदालती कागजात को जुटाया और कागजों के इस बस्ते के साथ अकेले गोवा चली गई. यह बारिश का मौसम था और वहां बहुत कम लोग थे और मैं बस एक छोटे से कमरे में बैठ कर पूरी सामग्री पढ़ गई. मैं हैरान थी. इसलिए मैंने ‘...एंड हिज लाइफ शुड बिकम एक्स्टिंक्ट’ (अक्तूबर 30, 2006) लिखा कि कैसे सबूत गढ़े गए थे, प्रक्रियाओं पर अमल नहीं किया गया था और कैसे अफजल के पास अपना पक्ष रखने के लिए कभी कोई वकील नहीं रहा. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पुलिस की हिरासत में निकाले गए कबूलनामे सबूत के बतौर कबूल नहीं किए जा सकते, लेकिन मीडिया ने दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा उनसे जबरन निकलवाए गए ‘कबूलनामों’ की विभिन्न कहानियों के वीडियो का इस्तेमाल किया. पुलिस ने ठीक यहां, लोदी एस्टेट में उनको वीडियो टेप किया था. एक कबूलनामे में उन्होंने गिलानी को कसूरवार ठहराया, एक दूसरे में किसी और को.

वे दिखाने के लिए अपनी पसंद के कबूलनामे चुन सकते थे. जो कबूलनामा उनके लिए ज्यादा अनुकूल था, उन्होंने उसे चुना. मीडिया ने उन्हें सात साल बाद तब दिखाया, जब वे अभी जिंदा थे और जब वीडियो को टीवी पर दिखाया गया तो दर्शकों के एसएमएस को स्क्रीन के नीचे चलती पट्टी पर प्रसारित किया जा रहा था: ‘हैंग हिम बाई द बॉल्स इन लाल चौक’ और इसी तरह की बातें. ऐसा वहशीपना था. अगर हम एक बनाना रिपब्लिक में रह रहे होते तो इसे कबूल भी किया जा सकता था, लेकिन हम तो किसी और ही चीज पर चलने का दिखावा कर रहे हैं. मुझे आउटलुक को भेजे गए वो खत याद हैं, जहां मेरा निबंध प्रकाशित हुआ था. उनमें इस तरह की बातें थीं, ‘अफजल गुरु को छोड़ दो लेकिन अरुंधति रॉय को फांसी दो’. हर चीज के बावजूद, सरकार ने – कांग्रेस सरकार ने – पूरी तरह यह जानते हुए कि वे बेगुनाह थे, उन्हें फांसी दे दी. यह एक सियासी कदम था, वे अफजल के खून की प्यासी भीड़ से फायदा हासिल करने की कोशिश कर रहे थे, वे वोट पाने की उम्मीद में थे. यह खौफनाक था, एक बुजदिली भरा काम था. उन्हें इतनी शर्म आनी चाहिए.... उन्होंने उनकी लाश को उनके घर वालों को दिया तक नहीं. उन्होंने घरवालों को खत लिखा, उसमें जानबूझ कर देर की गई ताकि वह खत उन्हें तब मिले जब अफजल को फांसी हो चुकी हो. देखिए, ऐसी चीजें ‘मुद्दे’ नहीं हैं. कश्मीर में भारतीय सरकार द्वारा की जा रही बर्बरता एक ‘मुद्दा’ नहीं है – यह अपने आप में जीवन है. और अगर एक समाज के रूप में हम इसको कबूल करते जाने को तैयार हों तो हम खुद को भीतर ही भीतर से खोखला बना रहे हैं. हम खुद के लिए आफत को दावत दे रहे हैं. 




मैंने दो घाटियों के बारे में लिखा है, नर्मदा घाटी और कश्मीर घाटी और कभी कभी मैं खुद से सवाल करती हूं कि क्यों एक वादी में इंसाफ की मजबूत पुकार ने दूसरी घाटी को समझा नहीं या उस पर अपनी कोई निशानी नहीं छोड़ी है. मतलब यह कि नर्मदा घाटी में पर्यावरणीय मुद्दों के बारे में, बांधों के असर के बारे में, स्थानीय अर्थव्यवस्था के बारे में, विश्व बैंक के बारे में और पीस डालने वाली गरीबी के बारे में इतनी सुलझी हुई बारीक समझदारी है, लेकिन कश्मीर की अवाम जो भुगत रही है, उसकी बहुत थोड़ी समझ है. और कश्मीर में इसकी बेहद सुलझी हुई बारीक समझ है कि एक फौजी कब्जे में जीने का मतलब क्या है, लेकिन इसकी बहुत कम समझ है कि बड़े बांध क्या हैं और उनका असर क्या होता है, नव उदारवादी नीतियां जिस तरह से लोगों को पीस कर तबाह कर रही हैं, उसके बारे में भी बहुत कम समझदारी है. मैं बस यह कह रही हूं कि मैंने इंसाफ की लीक पर नजर रखी है...हो सकता है यह हरेक की लीक नहीं हो, लेकिन यह यकीनन मेरी लीक जरूर है. यही सब मिला कर वह चीज बनती है जिसे जॉन बर्जर ‘अ वे ऑफ सीईंग’ (देखने का एक तरीका) कहते हैं. यही तो साहित्य है, यही तो कविता है. इसको यही तो होना है.

आज के भारत में, जहां हम खड़े हैं, आपको सबसे ज्यादा कौन सी बात तकलीफ देती है?

आज हम जिन चीजों से गुजर रहे हैं, वह आरएसएस के इतिहास को देखते हुए ऐसी चीज है, जिसे एक न एक दिन होना ही था. हम इनसे होकर कैसे गुजरेंगे, इससे यह बात तय होगी कि हम असल में किस मिट्टी के बने हैं. आज हरेक संस्थान, न्यायपालिका, शैक्षिक संस्थानों वगैरह पर एक क्रूर, सांप्रदायिक हमला चल रहा है. शिक्षा हासिल करने की जगह के रूप में विश्वविद्यालयों के पुर्जे-पुर्जे बिखेरे जा रहे हैं. सांप्रदायिक मूर्खों को शिक्षकों के रूप में नियुक्त किया जा रहा है, पाठ्यक्रमों को विद्वत्ता से खाली करके उसमें बेवकूफी के बीज डाले जा रहे हैं. हरेक चीज को इस फासीवादी नजरिए के हिसाब से गढ़ा जा रहा है. यह एक आसान रास्ता है. यह महज सियासी दलों और सत्ता की बात नहीं है. बनावट में ही एक भारी बदलाव जारी है. यह ठीक-ठीक आत्मा पर, इस मुल्क की कल्पना पर हमला है. यह गंभीर बात है. मुझे यह कहना होगा कि कुछ प्रतिक्रियाओं से मुझे हौसला मिला है. हर जगह लोग उठ खड़े हो रहे हैं – एफटीआईआई के छात्रों को देखिए – यह अद्भुत है. हम जिस हमले के खिलाफ हैं, वह बहुत ही व्यापक और गहरा और खतरनाक है, लेकिन मोदी सरकार को लेकर उन्माद खासी तेजी से काफूर हुआ है, उम्मीद से भी काफी पहले. मुझे डर है कि जब वे सचमुच में हताश होंगे, तब वे खतरनाक हो जाएंगे. याकूब मेमन को फांसी इसी दिशा में एक कदम है. शायद अगले चुनाव के पहले वे एक बड़े पैमाने का सांप्रदायिक दंगा भड़काएंगे. लोगों को झांसा देने के लिए झूठे ‘आतंकी’ हमलों और पाकिस्तान के साथ एक युद्ध, एक परमाणु युद्ध के बारे में मुझे फिक्र होती है. सरहद के दोनों तरफ की सरकारों और मीडिया के ऐसे कुछ सनकी लोगों में ऐसी आत्मघाती बेवकूफी की काबिलियत है.



आप अंतरराष्ट्रीय रूप से सम्मानित लेखिका हैं, लेकिन कभी भी लेखकीय बिरादरी का हिस्सा बनने की इच्छा आपमें नहीं दिखती, आप साहित्य उत्सवों में नहीं जातीं हालांकि आप लोगों की उस बिरादरी का हिस्सा हैं, जिसे कार्यकर्ता कहा जा सकता है.

मैं इसको लेकर निश्चित नहीं हूं कि लेखकों की कोई बिरादरी है. देखिए, मैं शुद्धतावादी नहीं हूं. मैं यही कर सकती हूं कि जो मैं सोचती हूं वो कहूं. लोगों को उत्सवों में जाना पड़ता है, अक्सर ये उत्सव खनन निगमों और फाउंडेशनों द्वारा प्रायोजित होते हैं जिनके खिलाफ मैंने लिखा है – लेकिन मेरा कहना यह नहीं है कि मैं उनमें शामिल होने वाले लेखकों से ज्यादा शुद्ध हूं. मैं नहीं हूं. बस मेरे लिए यह तकलीफदेह है, इसलिए मैं नहीं जाती. लेकिन जीने के लिए दुनिया एक मुश्किल जगह है, लोगों को वह करना पड़ता है जो वे नहीं करना चाहते. मेरे पास चुनने की सुविधा है. इसलिए मैं ऐसा करती हूं. लेकिन हरेक के पास यह सुविधा नहीं होती है.

जहां तक इस शब्द ‘कार्यकर्ता’ (एक्टिविस्ट) की बात है – मुझे पक्का पता नहीं इसका इस्तेमाल कैसे शुरू हुआ. मेरे जैसे किसी इंसान को लेखक-कार्यकर्ता कहना मानो यह संकेत करना है कि यह लेखकों का काम नहीं है कि वे जिस समाज में रहते हैं उसके बारे में लिखें. लेकिन यह तो हमारा काम हुआ करता था. यह एक अजीब बात है, जब तक बाजार ने लेखकों को गले नहीं लगाया था, लेखक यही तो करते थे – उन्होंने धारा के खिलाफ जाकर लिखा, उन्होंने सरहदों पर गश्त लगाई, उन्होंने उन बहसों को शक्ल दी कि समाज को कैसे सोचना चाहिए. वे खतरनाक लोग थे. अब हमें बताया जाता है कि हमें उत्सवों में हिस्सा लेना ही होगा और बेस्टसेलर की फेहरिश्त में शामिल होना होगा और अगर मुमकिन हो तो हमें अच्छा दिखने की कोशिश करनी होगी.

पूरी दुनिया एक आधा बना हुआ बांध है-4: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/15/2015 01:42:00 AM


आंबेडकर-गांधी बहस के संदर्भ में राजमोहन गांधी को अरुंधति रॉय के जवाब ‘ऑल द वर्ल्ड’ज अ हाफ-बिल्ट डैम’ के हिंदी अनुवाद की चौथी और आखिरी किस्त. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

[यहां पढ़ें पहली और दूसरी और तीसरी किस्तें]

आंबेडकर, कांग्रेस और संविधान सभा

राजमोहन गांधी इसके लिए मेरी आलोचना करते हैं कि मैंने गांधी, नेहरू और पटेल द्वारा आंबेडकर को संविधान मसौदा समिति (कॉन्स्टिट्यूशन ड्राफ्टिंग कमेटी) का अध्यक्ष बनने के लिए आमंत्रित करने और उन्हें आजादी के बाद भारत का पहला कानून मंत्री बनाने में दिखाई गई राजनीतिक सूझबूझ के बारे में कंजूसी बरती है.

वे कहते हैं,

1932 का पूना समझौता और 15 साल बाद आजादी के वक्त गांधी-आंबेडकर की साझेदारी भारत के समाज और शासन व्यवस्था के लिए और साथ ही साथ दोनों संबद्ध व्यक्तियों की जीतों की नुमाइंदगी भी करती है.

और
...उन्होंने [अरुंधति रॉय ने- अनु.] दो विरोधियों के उल्लेखनीय तरीके से एक साथ आने को, जिसके नतीजा अपने जीवन के आखिरी दौर में गांधी की आंबेडकर के साथ साझेदारी थी, महारत से दबा दिया है. संविधान बनाने में आंबेडकर को शामिल किए जाने के शानदार नतीजों के बारे में हर कोई जानता है.

क्या इस दोस्ती के बारे में उनके दावे के समर्थन में कोई सबूत है? गांधी या आंबेडकर दोनों की काफी लिखते थे और क्या उनमें से किसी ने इस ‘उल्लेखनीय तरीके से एक साथ आने’ के बारे में कुछ लिखा है? उन्होंने नहीं लिखा है. अपने निधन से एक साल पहले, 1955 में बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में आंबेडकर, गांधी के प्रति लगातार सख्त बने रहे. यह यूट्यूब पर मौजूद है.[4] जो दोस्ती आंबेडकर ने साफ-साफ कभी नहीं चाही, ऐसी ना-मौजूद दोस्ती को उन पर थोपना एक तरह का अपमान ही है.

आंबेडकर के संविधान मसौदा समिति में आने की कहानी उतनी सीधी भी नहीं है, जितनी शायद राजमोहन गांधी कबूल करने की चाहत रखते हैं. ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ से एक हिस्सा ये रहा:

पूना समझौता वाली शिकस्त के बावजूद आंबेडकर ने अलग निर्वाचक मंडलों के विचार को पूरी तरह नहीं छोड़ा था. बदकिस्मती से उनकी दूसरी पाटी, शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन प्रांतीय विधान सभा के 1946 के चुनावों में हार गई थी. हार का मतलब ये था कि आंबेडकर ने अगस्त 1946 में बने अंतरिम मंत्रालय के कार्यकारी परिषद में अपनी जगह खो दी. यह एक गंभीर झटका था, क्योंकि आंबेडकर बेकरारी से कार्यकारी परिषद में अपनी जगह का इस्तेमाल करना चाहते थे, ताकि वे उस समिति का हिस्सा बन सकें जो भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करनेवाली थी. इस बात से फिक्रमंद कि ऐसा मुमकिन नहीं होने जा रहा था, और मसौदा समिति पर बाहरी दबाव डालने के लिए आंबेडकर ने मार्च 1947 में एक दस्तावेज प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज - जो ‘संयुक्त राज्य भारत’ (एक ऐसा विचार, जिसका वक्त शायद आ पहुंचा है) के लिए उनका प्रस्तावित संविधान था. उनकी किस्मत थी कि मुस्लिम लीग ने आंबेडकर के एक सहयोगी और बंगाल से शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के नेता जोगेंद्रनाथ मंडल को कार्यकारी परिषद में अपने उम्मीदवारों में से एक के रूप में चुन लिया. मंडल ने इसे यकीनी बनाया कि आंबेडकर बंगाल प्रांत से संविधान सभा के लिए चुन लिए जाएं. लेकिन आफत ने फिर से दस्तक दी. बंटवारे के बाद, पूर्वी बंगाल पाकिस्तान के पास चला गया और आंबेडकर ने एक बार फिर अपनी जगह गंवा दी. नेकनीयती दिखाने के लिए और शायद इसलिए कि उस काम के लिए उनकी बराबरी का कोई भी नहीं था, कांग्रेस ने संविधान सभा में आंबेडकर को नियुक्त किया. अगस्त 1947 में आंबेडकर भारत के पहले कानून मंत्री और संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष बनाए गए. नई बनी सरहद के उस पार जोगेंद्रनाथ मंडल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री बने. उस सारी उथल-पुथल और बदगुमानियों के बीच यह गैरमामूली बात थी कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के पहले कानून मंत्री दलित थे. आखिर में मंडल का पाकिस्तान से मोहभंग हो गया और वे भारत लौट आए. मोहभंग आंबेडकर का भी हो गया था, लेकिन जाने के लिए उनके पास कोई जगह नहीं थी.

भारतीय संविधान का मसौदा एक समिति ने तैयार किया और इसमें आंबेडकर के नजरियों से ज्यादा इसके विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के सदस्यों के नजरियों की झलक मिलती थी. तब भी, अछूतों के लिए अनेक सुरक्षा प्रावधानों ने इसमें अपनी जगह बनाई, जिनकी रूपरेखा स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज में दी गई थी. आंबेडकर के रेडिकल सुझावों में से कुछ, जैसे कि खेती और मुख्य उद्योगों का राष्ट्रीयकरण को फौरन खारिज कर दिया गया. मसौदा बनाने की प्रक्रिया से आंबेडकर सिर्फ नाखुश ही नहीं थे. मार्च 1955 में उन्होंने राज्य सभा (भारतीय संसद का ऊपरी सदन) में उन्होंने कहा: ‘संविधान एक अद्भुत मंदिर है, जिसे हमने देवताओं के लिए बनाया था. लेकिन उनकी स्थापना इसमें हो पाती, इसके पहले ही शैतानों ने आकर उस पर दखल कर लिया.’ 1954 में आंबेडकर ने शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के उम्मीदवार के रूप में अपना आखिरी चुनाव लड़ा और हार गए (रॉय 2014: 137-39).

पूना समझौते की तारीफ करने के बाद राजमोहन गांधी कहते हैं

हालांकि 1945-46 के चुनौवों ने इसकी तस्दीक की कि आईएनसी [इंडियन नेशनल कांग्रेस, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस] ने भारतीय मतदाताओं की भारी तादाद को अपनी तरफ खींचा था, जिसमें दलित समर्थकों की भी अच्छी खासी संख्या थी...अनेक दलित उम्मीदवारों ने इस तथ्य पर नाराजगी जताई थी, जिसे समझा जा सकता है, कि गैर-दलित मतदाता उनकी हार की वजह बन सकते हैं. बदकिस्मती से 1952 के आम चुनावों में यह खुद आंबेडकर के साथ भी हुआ, जब वे हिंदू कोड बिल को पारित करने में कांग्रेस की सुस्ती पर निराश होकर कैबिनेट से इस्तीफा दे चुके थे. उनके साथ 1954 में फिर यह हुआ, जब उन्होंने उपचुनावों में हिस्सा लिया.

यह बुरी मंशा से, भीतर ही भीतर संतुष्ट होने की ओछी हरकत है. यह ऐसा है मानो एक अपाहिज को एक एथलीट के साथ दौड़ने पर मजबूर किया जाए और फिर फिनिश लाइन पर अपनी जीत का जश्न मनाया जाए (या जश्न न मनाने का दिखावा किया जाए).

आंबेडकर ने कानून मंत्री के रूप में जो कुछ भी करने की कोशिश की, उनका वक्त बहुत बोझ और मुश्किलों से भरा था. आजादी के बाद के भारत में कानून मंत्री के रूप में उन्होंने हिंदू कोड बिल के मसौदे पर उन्होंने महीनों काम किया. उन्हें यकीन था कि जाति व्यवस्था औरतों पर नियंत्रण रखते हुए अपने वजूद को कायम रखती है और उनकी बड़ी चिंता यह थी कि हिंदू निजी कानून को औरतों के लिए ज्यादा न्यायोचित बनाया जाए. उन्होंने जो विधेयक पेश किया, उसमें तलाक को मंजूरी दी गई थी और विधवाओं और बेटियो को जायदाद के अधिकार दिए गए थे. संविधान सभा चार बरसों तक (1947 से 1951 तक) इस पर कुछ करने से बचती रही और फिर आखिर में इसमें अड़ंगा ही लगा दिया. राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने धमकी दी कि वे इस विधेयक को कानून नहीं बनने देंगे. हिंदू साधुओं ने संसद को घेर लिया. उद्योगपतियों और जमींदारों ने चेतावनी दी कि वे आनेवाले चुनावों में अपना समर्थन वापस ले लेंगे. आखिरकार आंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया. इस्तीफे के वक्त अपने भाषण में उन्होंने कहा: ‘वर्ग और वर्ग के बीच, लिंग और लिंग के बीच गैर बराबरी को, जो हिंदू समाज की आत्मा है, ज्यों का त्यों बने रहने देना, और आर्थिक समस्याओं के बारे में कानूनों को पारित करते जाना हमारे संविधान को एक मखौल बना देना है और गोबर के ढेर पर महल खड़े करना है’ (रेगे 2013 से, रॉय 2014: 46-47 पर उद्धृत).

दक्षिण अफ्रीका में गांधी

अपने अध्ययन के दौरान जाति के बारे में गांधी के रवैए से परेशान मेरे मन में यह सवाल उठने लगा कि उन्हें कब और कैसे महात्मा कहा जाने लगा था. 1915 में, जिस साल वे दक्षिण अफ्रीका से लौटे, गुजरात के गोंडल में एक आम सभा में सार्वजनिक रूप से महात्मा कहा गया. (टिड्रिक 2006, रॉय 2014: 65 में उद्धृत). मुझे यह जानने की उत्सुकता हुई कि इस तारीफ के लायक उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में क्या किया था और नस्ल के प्रति उनका रवैया जाति के प्रति उनके रवैए से किस तरह अलग था. मैंने इससे जो नतीजे निकाले हैं, उनसे राजमोहन गांधी बेहद नाखुश हैं. देखिए:
उस वक्त तक गांधी के पूर्वाग्रह का (जो उनके लगभग सभी समकालीनों में मिलते हैं) खुले दिल से सामना करना चाहिए, लेकिन रॉय इस फेहरिश्त के सबसे अनुकूल पहलू को क्यों छुपा लेती हैं, जो अपने वक्त के लिहाज से दुर्लभ था?

असल में मैंने ‘फेहरिश्त के अनुकूल पहलू’ का जिक्र किया है. लेकिन इससे मामला और भी ज्यादा परेशान करने वाला बना जाता है. जो भी हो, हम यहां किस फेहरिश्त की बात कर रहे हैं? क्या ये बातें और काम घरेलू खर्च के हिसाब की तरह एक दूसरे में से जोड़े और घटाने वाली चीजें हैं? यही नहीं, अगर गांधी के पूर्वाग्रह अपने समकालीनों में भी ‘मिलते’ थे तो क्या हम पूछ सकते हैं कि उन्होंने अपने समकालीन के रूप में देखे जाने के लिए किस तरह के लोगों को चुना था?

बेशक यह ‘अपने वक्त का इंसान’ वाली दलील ही है. लेकिन यह किसी की भी दलील नहीं हो सकती कि उन वक्तों में (और उनसे पहले के वक्तों में भी) किसी ने भी बराबरी और इंसाफ के बारे में बात नहीं की थी? या उपनिवेशवाद के बारे में? फिर क्या एक ही साथ अपने वक्त का (एक बेहद पूर्वाग्रह से ग्रस्त) इंसान होना और सभी वक्तों के लिए एक महात्मा होना मुमकिन है?

मैंने ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ में दक्षिण अफ्रीका में गांधी के बरसों के बारे में जो कुछ लिखा है मुझे उसका एक व्यवस्थित खाका पेश करने दीजिए, हालांकि यह भी निहायत ही नाकाफी है (रॉय 2014: 66-88).

गांधी 1893 में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे जब वे 24 साल के थे. वे एक वकील थे. उनकी सियासी आंख तब खुली जब पीटरमारिट्जबर्ग में उन्हें ‘केवल गोरों के लिए’ रेलवे डिब्बे में से फेंक दिया गया. वे गोरों के डिब्बे में इसलिए बैठे थे, क्योंकि वे इस बात से अपमानित महसूस कर रहे थे कि भारतीय लोगों से उम्मीद की जाती थी कि वे देसी काले अफ्रीकियों के साथ रेलवे डिब्बों में सफर करेंगे. 1894 में उन्होंने नाटाल इंडियन कांग्रेस (एनआईसी) की शुरुआत की. एक विशिष्ट संघ (क्लब) था जिसका सदस्यता शुल्क तीन पाउंड था, जो सिर्फ दौलतमंद लोग ही अदा कर सकते थे. इसकी शुरुआती जीतों मे से एक डर्बन डाकघर की समस्या का ‘समाधान’ था. एनआईसी ने एक कामयाब अभियान चलाते हुए डाकघर में तीसरा दरवाजा खुलवाया था, ताकि भारतीयों को काले अफ्रीकियों के साथ एक दरवाजे का इस्तेमाल न करना पड़े. जल्दी ही गांधी डर्बन के भारतीय समुदाय के प्रवक्ता बन गए. उन्होंने जतन से ‘प्रवासी (पैसेंजर) भारतीयों’ और और बेहद गरीब ‘कुली’ लोगों के बीच फर्क किया - ‘पैसेंजर भारतीयों’ में धनी मुसलमान और विशेषाधिकार प्राप्त सवर्ण हिंदू व्यापारी आते थे, जबकि ‘कुली’ लोग मातहत जातियों से ताल्लुक रखनेवाले अनुबंधित (बंधुआ) मजदूर थे:

चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान उनमें नाम बराबर भी नैतिक और धार्मिक समझदारी नहीं है. वे इतना नहीं जानते कि दूसरों की मदद के बगैर खुद शिक्षा हासिल कर सकें. इस तरह देखा जाए तो वे झूठ बोलने की हल्की सी भी लालच के आगे झुक जाते हैं. कुछ समय बाद उनके लिए झूठ बोलना एक आदत और बीमारी बन जाता है. वे बिना किसी वजह के झूठ बोलते हैं, अपनी भौतिक स्थिति को बेहतर बनाने की किसी संभावना के बगैर, असल में यह जाने बिना कि वे क्या कर रहे हैं. वे जीवन में एक ऐसी अवस्था में पहुंच जाते हैं जब अनदेखी की वजह से उनकी नैतिक क्षमताएं पूरी तरह खत्म हो गई हैं.

1899 में देशी अफ्रीकियों और भारतीय मजदूरों, दोनों को ब्रिटिशों और बोअरों ने बोअर युद्ध में (आज इसे दक्षिण अफ्रीका में गोरों की जंग के नाम से जाना जाता है) लड़ने के लिए घसीट लिया गया था. गांधी ने ब्रिटिश फौज की सेवा करने के लिए खुद को पेश किया. उन्हें एंबुलेंस कोर में शामिल किया गया. यह एक क्रूर जंग थी, जिसमें हजारों लोग मारे गए और कई हजार यातना शिविरों में भूख से मर गए. (यही वो जंग थी, जिसमें ब्रिटिशों ने यातना शिविर की अवधारणा खोज निकाली थी.) 1906 में, गांधी ने एक बार फिर जुलू लोगों से लड़ने के लिए ब्रिटिश फौज में सक्रिय सेवा के लिए खुद को पेश किया. जुलू लोग ब्रिटिश सरकार द्वारा थोपे गए नए चुनाव कर के खिलाफ विद्रोह में उठ खड़े हुए थे. गांधी ने अपने अखबार इंडियन ओपीनियन में चिट्ठियों का एक सिलसिला प्रकाशित किया. इस चिट्ठी पर 14 अप्रैल 1906 की तारीख है:

उपनिवेश (कॉलोनी) में इस मुसीबत के वक्त में हमारा क्या फर्ज है? यह कहना हमारा काम नहीं है कि काफिरों [जुलू लोगों] का विद्रोह न्यायोचित है या नहीं. हम ब्रिटिश सत्ता की महिमा से नाटाल में हैं. यहां हमारी मौजूदगी ही इस पर निर्भर करती है. इसलिए हमारा फर्ज है कि जो हम जो भी मदद कर सकें, करें.

इस जंग में गांधी ने स्ट्रेचर ढोने वालों के रूप में काम किया. आखिरकार विद्रोह को कुचल दिया गया. जुलू सरदार बंबाटा को पकड़ लिया गया और उनका सिर कलम कर दिया गया. चार हजार जुलू मारे गए, हजारों को कोड़े लगाए गए और कैद किया गया.

सितंबर 1906 में ब्रिटिश शासन ने ट्रांसवाल एशियाटिक लॉ अमेंडमेंट एक्ट पारित किया, जिसमें नाटाल के भारतीय व्यापारियों को (जिन्हें गोरे कारोबारियों के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता था) ट्रांसवाल में दाखिल होने की इजाजत खत्म कर दी. गांधी ने इस अधिनियम के खिलाफ पैसेंजर भारतीयों के विरोध का नेतृत्व किया. उन्हें पीटा गया, गिरफ्तार किया गया और जेल में डाल दिया गया. उन्हें देशी अफ्रीकियों के साथ जेल की कोठरी में रहना पड़ा. उन्होंने 1908 के इंडियन ओपीनियन में इसके बारे में लिखा:

हम सभी मशक्कत के लिए तैयार थे, लेकिन इस तजुर्बे के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे. हम समझ सकते थे कि हमारा दर्जा गोरों के साथ नहीं रखा जाता, लेकिन देशी लोगों के बराबर के दर्जे पर रखा जाना बर्दाश्त से बाहर लगता था. तब मैंने महसूस किया कि भारतीय लोगों ने हमारे निष्क्रिय प्रतिरोध को वक्त पर शुरू नहीं किया. यह इस बात का एक और सबूत था कि इस घिनौने कानून का मकसद भारतीयों को शक्तिहीन करना था...चाहे इसका नतीजा पतन हो या नहीं, मुझे यह कहना ही चाहिए कि यह खतरनाक है. काफिर नियमत: असभ्य होते हैं – जिनके कसूर साबित हो चुके हैं वो तो और भी. वे तकलीफदेह होते हैं, बहुत गंदे और लगभग जानवरों सी जिंदगी जीते हैं.

और दक्षिण अफ्रीका में वे जो 20 वर्ष बिताने वाले थे, उसके 16वें वर्ष यानी 1909 में उन्होंने ‘माई सेकंड एक्सपीरियंस इन गाओल’ लिखा:

मुझे कोठरी में एक बिस्तर दिया गया, जहां ज्यादातर काफिर कैदी रहते थे जो बीमार पड़े थे. मैंने इस कोठरी में भारी मुसीबत और डर में रात गुजारी...मैंने भगवत गीता पढ़ी जिसे मैं अपने साथ ले गया था. मैंने वो श्लोक पढ़े, जिनमें मेरी स्थिति का वर्णन था और उन पर चिंतन करते हुए, मैंने खुद को दिलासा दिया. मेरे इस कदर बेचैन महसूस करने की वजह ये थी कि काफिर और चीनी कैदी जंगली, हत्यारे और अनैतिक तौर-तरीकों वाले दिखते थे...वह [चीनी] तो बदतर मालूम पड़ता था. वह मेरे बिस्तर के करीब आया और उसने मुझे करीब से देखा. मैं स्थिर बना रहा. फिर वो बिस्तर में पड़े एक काफिर के पास गया. दोनों ने आपस में अश्लील मजाक किए, एक दूसरे के यौनांगों को उघाड़ा...मैंने मन ही मन एक आंदोलन करने की प्रतिज्ञा की ताकि यह यकीनी बनाया जा सके कि किसी भी भारतीय कैदी को काफिरों या दूसरों के साथ न रखा जाए. हम इस तथ्य की अनदेखी नहीं कर सकते कि उनके और हमारे बीच कोई साझी जमीन नहीं है. इससे भी ज्यादा, जो लोग उन लोगों की कोठरियों में सोना चाहते थे, उनके ऐसा करने के लिए एक छुपी हुई मंशा है.

गांधी ने जेल के भीतर से ही भारतीय कैदियों को ‘काफिरों’ से अलग करने की मांग करते हुए आंदोलन का नेतृत्व किया. अफ्रीका में अपने सभी बरसों में उनका राजनीतिक संघर्ष करीब-करीब पूरी तरह सवारी भारतीयों की मांगों और आकांक्षाओं तक सीमित रहा. वे अपनी इस राय पर कायम रहे कि भारतीय देशी अफ्रीकियों के मुकाबले बेहतर रवैए के लायक हैं.

इन्हीं संघर्षों के दौरान गांधी ने सत्याग्रह के अपने विचार विकसित किए. वे भारतीयों और यूरोपीयों के एक आश्रम (कम्यून) में रहे, जो उनके जर्मन वास्तुशिल्पी हरमन कालेनबाख द्वारा तोहफे में दिए गए 1100 एकड़ के फलों के फार्म में चल रहा था. आश्रम के सदस्यों में काले अफ्रीकी शामिल नहीं थे. विडंबना यह थी कि दक्षिण अफ्रीका में गांधी के सत्याग्रह का मकसद पूंजी जमा करने पर या संपदा के गैरबराबर बंटवारे पर सवाल उठाना या अनुबंधित मजदूरों के लिए काम के बेहतर हालात के लिए प्रतिरोध करना नहीं था या जमीन को उन लोगों को लौटाना नहीं था, जिनलोगों से उसे चुराया गया था. गांधी ट्रांसवाल में भारतीय व्यापारियों के कारोबार को फैलाने और ब्रिटिश व्यापारियों के साथ मुकाबला करने के अधिकार के लिए लड़ रहे थे. 1913 में, दक्षिण अफ्रीका में अपने आखिरी साल में – दक्षिण अफ्रीका के ‘खूनी साल’ में - जाकर में वे अनुबंधित मजदूरों के उभार में शामिल हुए जिसमें उन्होंने बड़ी भूमिका अदा की. लेकिन फिर बड़ी जल्दी ही उन्होंने यान स्मट्स के साथ एक समझौते पर दस्तखत कर लिए और भारत लौट आए.

भारत आने के रास्ते में वे लंदन में रुके जहां उन्हें पेन्सहर्स्ट के लॉर्ड हार्डिंग के हाथों सार्वजनिक सेवा के लिए कैसर-ए-हिद का सोने का तमगा दिया गया. इसके बावजूद, जब वे भारत लौटे तो महात्मा कह कर उनकी तारीफ की गई जो इंसाफ की खातिर ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ खड़ा हुआ और जिसने अपने लोगों की रहनुमाई की.

राजमोहन गांधी मेरी बातों को पूर्वाग्रह से भरी हुई और पक्षपातपूर्ण कह कर खारिज करते हैं. वे इसे मेरी खामी बताते हैं कि मैं जॉन डुबे के साथ गांधी की ‘अच्छी तरह दर्ज’ दोस्ती का जिक्र करने में नाकाम रही, जो अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) के संस्थापकों में से एक थे. राजमोहन गांधी कहते हैं, ‘गांधी की तरह जॉन डुबे भी जुलू विद्रोह का समर्थन करने में हिचके थे.’ (गांधी जुलू विद्रोह का समर्थन करने में हिचके थे? इसके उलट, उन्होंने ब्रिटिशों को इसकी इजाजत देने के लिए सार्वजनिक याचिकाओं पर याचिकाएं लिखी थीं, कि वे भारतीयों को जुलू लोगों के खिलाफ हथियार उठाने की इजाजत दें.) ‘अफ्रीकी पत्रकार और शिक्षाविद तेंगो जाबावु की अफ्रीकियों के लिए एक कॉलेज की स्थापना करने की कोशिशों’ पर गांधी की तारीफ का जिक्र करने में नाकाम रहना भी मेरी खामी है. इसी में यह भी है: ‘रॉय, कालों के लिए गांधी की ‘हिकारत’ की बात करती हैं लेकिन इसका जिक्र करने में नाकाम रहती हैं कि उनकी टिप्पणियां उस भयानक व्यवहार से जन्मी थीं जो उन्होंने उन लोगों में देखा जिन्हें गंभीर अपराधों का कसूरवार पाया गया था और जिनके साथ वे जेल की कोठरी में रहे.’ क्या मेरी मलामत इसलिए की जा रही है कि मैं इसका जिक्र करने में नाकाम रही कि गांधी का ‘माई सेकंड एक्सपीरियंस इन गाओल’ शीर्षक वाला लेख गाओल (जेल) में उनके दूसरे तजुर्बे के बारे में था? और कि यह लेख गांधी के दक्षिण अफ्रीका में 16 वर्ष रह चुकने के बाद लिखा गया था? यही नहीं, क्या मुसलमानों, आदिवासियों, बनियों, ब्राह्मणों, कालों, गोरों, गुलाबियों, पोल्का डॉट वालों - किसी भी समुदाय के बारे में रूढ़ सामान्यीकरण (जेनेरलाइजेशन) करना उचित है और उनके बारे में अपमानजनक बातें करना उनके गुनहगार साबित हो चुके लोगों के ‘भयानक व्यवहार’ पर आधारित है? गांधी ने ऐसा किया था. और अब राजमोहन गांधी भी कर रहे हैं.

वे अपनी आलोचना के इस हिस्से का अंत करते हुए एक लंबे भाषण को पेश करते हैं (हिसाब को संतुलित करने के लिए) जिसमें गांधी अमेरिका में गुलामी की आलोचना करते हैं और अब्राहम लिंकन की तारीफ करते हैं. इसके बाद राजमोहन गांधी एक घटना को याद करते हैं जिसे पूना में 1922 से 1924 के बीच गांधी के जेल के साथी रहे इंदुलाल याग्निक ने अपनी किताब गांधी ऐज आई न्यू हिम में लिखा है. यह इस बात का ब्योरा है कि कैसे एक सोमालियाई जेल वार्डेन अदन को बिच्छू काट लेने पर गांधी ने उसके जहर को चूसकर थूकते हुए उसकी जान बचाई.


क्या यह उस इंसान की प्रतिक्रिया थी, जो कालों को हकीर समझता था? – राजमोहन गांधी पूछते हैं.

मेरा सवाल है, क्या गांधी के दक्षिण अफ्रीकी बरसों के बारे में आपको बस इतना ही कहना है?

बिरला और टाटा

राजमोहन गांधी ने शुरुआत में जो बाल की खाल निकाली है, मैं उससे अपनी बात खत्म करूंगी. इसका ताल्लुक बिरला और टाटा घरानों के साथ गांधी के रिश्ते से है. गांधी को जी.डी. बिरला का समर्थन हासिल था, यह बात तो मानी हुई है. लेकिन राजमोहन गांधी का नुक्ता यह है कि गांधी के दक्षिण अफ्रीका से लौटने पर युवा जी.डी. बिरला ने ही गांधी को अपने समर्थन की पेशकश की थी, न कि गांधी ने उनसे यह मांगा था. वे जी.डी. बिरला को उद्धृत करते हैं:
मैंने उन्हें सूचित किया कि मैं...एक माहवार चंदा भेज दिया करूंगा... ‘बढ़िया,’ उन्होंने जवाब दिया. देखिए मैंने क्या किया – मेरी बेवकूफी! मैंने कहा, ‘फिर बहुत अच्छा. मैं आपकी ओर से एक माहवार खत का इंतजार करूंगा,’ उन्होंने यह कहते हुए टोका कि ‘क्या इसका मतलब यह है कि हर महीने मुझे भीख का कटोरा लेकर आपके पास आना पड़ेगा?’ मुझे इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई.

‘हममें से हरेक यह फैसला कर सकता है कि किसके ब्योरे में सच्चाई की गूंज है – रॉय के या बिरला के,’ राजमोहन गांधी कहते हैं. मुझे कोई अंदाजा नहीं कि इससे उनका क्या मतलब है. मेरे लिए इसकी कोई अहमियत नहीं है कि किसने किससे पैसे की मांग की, न ही मैंने इसके बारे में कुछ कहा है. जिस बात की अहमियत है वो यह है कि गांधी को पूरे वक्त बिरला घराने की मदद हासिल थी, और यकीनन कोई भी इसमें यकीन नहीं करता कि यह रिश्ता एक जटिल और दिलचस्प तरीके से दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद नहीं था. (सबसे पहली बात तो यही कि वे एक ही जाति-बिरादरी के थे. जी.डी. बिरला पूना समझौते पर दस्तखत करने वालों में से भी एक थे.) लेकिन अब चूंकि मुद्दे को उठा ही दिया गया है तो पेश है जी.डी बिरला के नाम गांधी का खत, तारीख जनवरी 1927:

पैसे की मेरी प्यास बस बुझने वाली नहीं है. मुझे कम से कम 2,00,000 रुपए चाहिए – खादी, छुआछूत और शिक्षा के लिए. गोशाला के काम पर 50,000 और बनते हैं. फिर आश्रम का खर्च भी है. पैसे की तंगी से कोई भी काम अधूरा नहीं रहता, लेकिन ईश्वर कड़ी परीक्षा के बाद ही देता है. यह भी मुझे संतोष ही देता है. आपको जिस काम में भी आस्था हो उसमें अपनी पसंद से दे सकते हैं (बिरला 1953 से, रॉय 2014: 106 में उद्धृत).

बस पैमाने का अंतर समझने के लिए जरा इस पर गौर करें: यह खत महाड सत्याग्रह से एक महीना पहले लिखा गया था. अपने सत्याग्रह के लिए पैसे जुटाने की खातिर 40 गांवों के अछूतों ने हर गांव से 3 रुपए चंदा दिया था, और तुकाराम पर बंबई में मंचित एक नाटक से 23 रुपए आए थे, जिससे कुल चंदा 143 रुपए का बना (तेलतुंबड़े (मिमेओ), रॉय 2014: 106 में उद्धृत).

मेरा आखिरी नुक्ता राजमोहन गांधी के पहले नुक्ते से मुखातिब है. वे मेरे निबंध के इस बयान को मुद्दा बनाते हैं: ‘[गांधी की] दो नावों पर सवारी (डुअलिटी) ने उन्हें इस बात में सक्षम बनाया कि उन्हें बड़े उद्योगों और बड़े बांधों का समर्थन मिला और उन्होंने उनका समर्थन भी किया.’ इसकी मिसाल देने के लिए मैंने एक फुटनोट जोड़ा था जिसमें एक खत शांमिल किया गया था, जो गांधी ने अप्रैल 1924 में टाटा घराने द्वारा बनाए जा रहे मुलशी बांध से विस्थापित आंदोलनकारी गांववालों को सलाह देते हुए लिखा था कि वे अपना प्रतिरोध खत्म कर दें (सीडब्ल्यूएमजी 27: 168, रॉय 2014: 49 में उद्धृत). इस बार मेरे द्वारा छोड़ दी गई बात यह थी कि मैंने इस बात का जिक्र नहीं किया था कि दो साल पहले अपने अखबार यंग इंडिया में गांधी ने इसी बांध को लेकर टाटा घराने को चुनौती दी थी. यह एक लंबा लेख है. बेशक चुनिंदा तौर पर ही, मैंने उसका भी महज एक हिस्सा ही चुना है, जिसे राजमोहन गांधी ने उद्धृत करने के लिए चुना था:

मैं चाहता हूं कि टाटा जैसा बड़ा घराना अपने कानूनी अधिकारों पर अड़ने के बजाए खुद जनता के साथ बात करेगा और वह जो करना चाहता है उसे जनता के साथ मशविरे से करेंगे...उन सभी वरदानों का क्या मोल है जिन्हें टाटा की योजना भारत के लिए लाने का दावा करती है, अगर इसके लिए एक भी अनिच्छुक गरीब आदमी को कीमत चुकाना पड़े? (आरजी.कॉम: 7)

गांधी के दक्षिण अफ्रीकी दिनों से ही उनके साथ लंबे और गहरे रिश्ते रखने वाले टाटा घराने ने अपनी परियोजना जारी रखी (वे गांधी के अखबार में चंदा देते थे). इस बीच गांधी पहले असहयोग आंदोलन में अपनी भूमिका के लिए जेल भेज दिए गए. उनके छूटने के वक्त तक, बांध आधा बन चुका था. कुछ गांव वालों ने मुआवजा ले लिया था, जबकि दूसरे गांववाले अब भी प्रतिरोध कर रहे थे, क्योंकि प्रतिरोध करने के लिए उनके पास काफी वजहें थीं. (मुलशी बांध से विस्थापित होने वाले अनेक लोगों को कभी मुआवजा नहीं मिला.) यही वक्त था, जब गांधी ने उनसे संघर्ष छोड़ देने की सलाह दी. कोई भी इंसान जो बांधों के बारे में थोड़ा भर भी जानता है, वह बताएगा कि आधा बन जाने के बाद बांध के डूब के दायरे में आने वाले इलाके में नाटकीय बढ़ोतरी होती है. नर्मदा पर बननेवाले अनेक बांध आधे से ज्यादा बन चुके हैं. डूबे हुए इलाकों के अनेक गांववालों ने मुआवजा ले लिया है. तब भी नर्मदा बचाओ आंदोलन (एक आंदोलन जो खुद को गांधीवादी कहता है और जिसकी मैं सचमुच प्रशंसक हूं) प्रतिरोध जारी रखे हुए है. हरेक बांध की हरेक मीटर ऊंचाई में बढ़ोतरी को चुनौती दी जाती है. अपने प्रतिरोध की निशानी के तौर पर गांववाले आखिर में भरते हुए पानी के बीच खड़े रहते हैं. आप जाइए और उन्हें अपनी किस्मत को कबूल करने और अपना आंदोलन छोड़ देने को कहिए और फिर देखिए कि वे क्या कहते हैं – खास कर अगर आप पहले उनकी तरफ रह चुके हों. वे जो कहेंगे, उसमें दो नावों पर सवारी वाली बात (डुअलिटी) तो शायद सबसे नरम होगी.

प्यारे राजमोहन गांधी, पूरी दुनिया एक आधा बना हुआ बांध है. हममें से कुछ लोग मुआवजे ले लेंगे और महफूज जगहों की ओर खिसक लेंगे, हममें से कुछ लोग डूब जाएंगे और कुछ डटे रहेंगे और लड़ेंगे. इन लड़ते हुए लोगों के बीच में टांग क्यों अड़ाई जाए? क्यों नहीं इस बात पर भरोसा किया जाए कि वे जानते हैं कि उनके लिए बेहतर क्या है?

आप मुझसे पूछते हैं, ‘कौन है आपकी प्रेरणा, आपका सितारा, आपकी उम्मीद? कौन है जिसके बारे में आप चाहती हैं कि अपनी जमीन से नाखुश भारतीय और दुनिया उनके पीछे या उनके साथ चले?’

अगर आप मुझसे एक अकेले नेता, विचारधारा या राजनीतिक दल का नाम पूछ रहे हैं जो शिकायतों से परे हो, जिस पर श्रद्धा रखी जाए और जिसकी कभी आलोचना न की जाए – तो मुझे डर है कि मेरे पास आपके सवाल का कोई जवाब नहीं है. मैं कोई मेगास्टार, ब्लॉकबस्टर में यकीन करनेवाली औरत नहीं हूं, खास तौर से सियासी नाटक की विधा में. मैं समूह की कलाकारी में यकीन रखनेवालों में हूं. अगर आप मुझसे उन लोगों और संगठनों के नाम पूछ रहे हैं जिनकी मैं इज्जत करती हूं तो मैं उनके नामों से एक किताब भर सकती हूं. जिस मुद्दे पर हम बहस कर रहे हैं, उसे देखते हुए मेरे जेहन में फौरन ये नाम आ रहे हैं – जोतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, पंडिता रमाबाई, आंबेडकर, अय्यनकली...अगर आप किसी ज्यादा समकालीन की तलाश में हैं तो हम दलित पैंथर्स, शंकर गुहा नियोगी, विनायक सेन और शहीद अस्पताल चलानेवाले उनके साथी, नर्मदा बचाओ आंदोलन, मजदूर किसान शक्ति संगठन और वे कॉमरेड जिनके साथ चलते हुए मैंने बस्तर के जंगलों का सफर किया (और नहीं, मेरे ट्विटरपसंद दोस्तों, मैंने उन्हें गांधियन्स विद गन्स नहीं कहा था), क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन, शीतल साठे और कबीर कला मंच और मारूति वर्कर्स यूनियन से शुरू कर सकते हैं, जिसके अनेक सदस्य अभी भी जेल में हैं. मैं उन डॉक्टरों को भी शामिल करूंगी, जो (करीब-करीब तबाह कर दिए गए) सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में अब भी काम करे रहे हैं, हालांकि वे निजी क्षेत्र में अपनी तनख्वाह से दस हजार गुणा ज्यादा मेहनताना पा सकते हैं, और हमारे (आधे तबाह कर दिए गए) विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को भी, जो हमारे देश में सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को पूरी तरह तबाह कर दिए जाने के खिलाफ खड़े हो रहे हैं. अगर आप नौजवान लोगों के बारे में पूछ रहे हैं, तो ये जगदलपुर लीगल ऐड ग्रुप के वो वकील हैं जो देशद्रोह के आरोप में जिलों और छोटे शहरों में हमारी जेलों में कैद हजारों आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं, भगत सिंह के विचारों पर चलने वाले वे नौजवान जो मुजफ्फरनगर में गांव दर गांव घूमते हुए वहां के नफरत से भरी सांप्रदायिक राजनीति का सीधे सामना कर रहे हैं, जिसकी फसल हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा बोई जा रही है जो इन दिनों मुल्क को चला रहे हैं – क्या आप मेरे साथ चलना पसंद करेंगे?

बहरहाल, चूंकि आपने पूछा है, तो यही मेरे सितारे हैं. वे एक दूसरे से अलग दिख सकते हैं; और यकीनन उनमें आपस में मजबूत असहमतियां हैं. लेकिन वे सब मिल कर सितारों का एक जत्था बनाते हैं. और वे और उन्हीं जैसे दूसरे एक साथ मिल कर हमारे मुल्क में सचमुच के या अवधारणाओं के हर आधे बने बांध की हरेक इंच की उंचाई में होनेवाले इजाफे से लड़ रहे हैं (और लड़ते आए हैं).

जॉन फोर्ड की 1962 की मशहूर वेस्टर्न फिल्म [यह एक कला विधा है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका में मिसिसिपी नदी के पश्चिमी इलाके की कहानियां पेश की जाती है और जो ज्यादातर 19वीं सदी के उत्तरार्ध में घटती हैं - अनु.] द मैन हू शॉट लिबर्टी वैलेंस का एक यादगार पल है, जब एक संवाददाता, जिसने इस दंतकथा के पीछे की सच्चाई का पता लगा लिया है कि लिबर्टी वैलेंस को किसने गोली मारी थी, अपने नोट्स को नष्ट कर देता है और कहता है, ‘जब दंतकथा एक तथ्य बन जाती है तो दंतकथा पर यकीन करो [When the legend becomes fact, print the legend].’ मुझे यह विचार काफी पसंद आता है – लेकिन यह दंतकथा पर निर्भर करता है. जब एक दंतकथा एक ऐसे अवाम को नुकसान पहुंचाती रहे, जो पहले से ही इतिहास के हाथों गंभीर रूप से नुकसान उठाता आया है, तो शायद यह वो वक्त है जब साफ, गैरजज्बाती नजरों के साथ जिम्मेदारी उठाई जाए.

संदर्भ

4. https://www.youtube.com/watch?v=ZJs-BJoSzbo

तेलंगाना में करमचेडू की आशंका

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/10/2015 01:04:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े ने तेलंगाना के पटपल्ली पर यह रिपोर्ट लिखी है, जहां पिछले करीब तीन महीनों से दलित मादिगा लोग बोया लोगों द्वारा जातीय उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं. उन्होंने इस दौरान पाया कि राज्य और पुलिस-प्रशासन ने उन पर हो रहे उत्पीड़न को रोकने के लिए कोई कार्रवाई तो नहीं की, लेकिन जब वे विरोध पर उतरे तो उनके खिलाफ कार्रवाई करने में कोई कोताही नहीं की गई. राज्य सरकार की एजेंसियों और प्रभुत्वशाली जाति बोया द्वारा जो माहौल बना दिया गया है, उसमें अपने जनसंहार की आशंका वहां के दलितों को सता रही है. अगर जल्दी ही, उन्हें इंसाफ नहीं मिला और उन्हें सताने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की गई तो हालात और खराब ही होंगे. यह रिपोर्ट, इसी तकाजे के तहत पेश की जा रही है, कि पटपल्ली के दलितों के समर्थन में एक बड़ी एकजुटता बनाई जा सके और उनके उत्पीड़नकारियों के खिलाफ कार्रवाई को यकीनी बनाया जा सके. तेलतुंबड़े इस संघर्ष में भाग ले रहे हैं और आगे भी इस आंदोलन पर उनकी रिपोर्ट और लेख पेश किए जाएंगे. अनुवाद: रेयाज उल हक. तस्वीर: द हिंदू

 

भारतीय संघ का सबसे नया राज्य तेलंगाना एक लंबे चले जनसंघर्ष के जरिए बना था, जिसमें बताया जाता है कि 600 से ज्यादा नौजवानों ने अपनी कुर्बानियां दी थीं. लेकिन अपने बनने के एक साल से भी कम वक्त में इसके गरीब तबके और खास कर दलितों की गलतफहमियां दूर हो रही हैं, जो इसको बनाने के लिए चले संघर्ष में अगले मोर्चे पर थे. हालांकि इसका नेतृत्व परंपरागत राजनेता के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) कर रहे थे, लेकिन संघर्ष को भारी प्रगतिशील समर्थन हासिल था. यही वजह है कि केसीआर को भी एक गरीब-परस्त नजरिया अपनाने को मजबूर होना पड़ा था, जिसमें दलितों पर खास जोर दिया गया था. पिछले चुनाव के दरमियान उन्होंने बड़े-बड़े वादे किए जिनमें हरेक दलित परिवार को तीन एकड़ जमीन और दो बेडरूम वाले घर बिल्कुल मुफ्त देना शामिल था. जहां सीधे-सादे और सियासी तौर पर बिखरे हुए दलितों को लुभाने की कोशिशें गैरमामूली नहीं हैं, इसके बावजूद ये वादे गैरमामूली थे. लेकिन दलितों के योगदान को देखते हुए, यह मुमकिन लगा था, हालांकि राजनेताओं और जानकारों ने इसे अव्यावहारिक और लोगों को बेवकूफ बनाने वाला कह कर इसका मजाक उड़ाया. इसके बावजूद इसने कम से कम यह बात तो जाहिर कर दी कि केसीआर सरकार के तेलंगाना के दलितों को लेकर खास सरोकार रहेंगे. लेकिन पिछले दो महीनों में तेलंगाना की सबसे बड़ी दलित जाति पटपल्ली मादिगा के जारी संघर्ष ने इन उम्मीदों को पूरी तरह खत्म कर दिया है और बाकी दूसरों की तरह केसीआर सरकार के भी दलित-विरोधी चरित्र को उजागर किया है.

इस संघर्ष में दखल देने के लिए मुझे कुल निर्मूलना पोराता समिति (जाति उन्मूलन समिति) द्वारा बुलाया गया था, जो 1998 में अपनी स्थापना के समय से ही आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में जातीय उत्पीड़न के मुद्दों को उठाने में सक्रिय रहा है. इसने स्थानीय दलितों की रहनुमाई की और पटपल्ली दलित विक्टिम्स कमेटी फॉर स्ट्रगल फॉर जस्टिस की स्थापना के लिए प्रेरित किया और इस साझे बैनर के तहत संघर्ष शुरू किया. वे पटपल्ली दलितों के लिए इंसाफ की मांग करते हुए पेब्बेरु मंडल ऑफिस के सामने धरने पर बैठे रहे हैं, जिन्हें न सिर्फ प्रभुत्वशाली बोया समुदाय द्वारा बल्कि स्थानीय राज्य कर्मियों द्वारा भी उत्पीड़ित किया जाता है, जिन्होंने उनके ऊपर बदले में मुकदमे दर्ज करा रखे हैं. राज्यकर्मियों की मदद से मजबूत बने बोया लोगों ने दलितों को परेशान करना तेज कर दिया और इसकी खुलेआम धमकी दी कि अगर दलितों ने उनके हुक्म नहीं माने तो नतीजे गंभीर होंगे. पटपल्ली में तनाव इस कदर है कि दलितों को इसकी आशंका थी कि सरकार ने अगर कुछ नहीं किया और बोया लोगों को चुपचाप समर्थन देती रही तो कुछ खौफनाक घटना हो सकती है.

आदिमवाद का झरोखा

जो लोग यह पूछते हैं कि दलित ने क्यों दो हजार बरसों से उत्पीड़न को सहा है और विद्रोह नहीं किया उन्हें जवाब के लिए पटपल्ली जरूर आना चाहिए. इसकी एक वजह यकीनन यह है कि उन्होंने धर्म द्वारा तय की गई अपनी जगह को कबूल कर लिया है, लेकिन दूसरी वजह धर्म से खासी परे है और वो है ऊंची जातियों के प्रभुत्व की क्रूर ताकत. यह ताकत इस गांव में दिखाई देती है जो हैदराबाद-बंबई एक्सप्रेस वे से महज 15 किमी दूर है, जिसे देख कर आपको कैलिफोर्निया में होने का वहम हो सकता है. मौजूदा सिलसिला मई दिवस के दिन शुरू हुआ था. रघुराम एक मादिगा लड़का है जो तेलंगाना रोड ट्रांस्पोर्ट कॉरपोरेशन में एक बस कंडक्टर है और चालीसेक परिवारों में उन तीन खुशकिस्मत दलितों में से एक है जिनके पास कोई नियमित रोजगार है. रघुराम ने अपनी शादी के बाद, स्थानीय टीडीपी विधायक जी. जिन्ना रेड्डी के सामने अपने गांव के मंदिर में पूजा करने की इच्छा जताई, जो उसके मेहमानों में शामिल थे. विधायक ने उसे भरोसा दिलाया कि वो उसके साथ चलेंगे लेकिन जब वे लोग मंदिर तक पहुंचे, विधायक गायब हो गए. मादिगाओं ने यह सोचते हुए मंदिर में दाखिल होकर पूजा की कि उन्हें विधायक की सहमति हासिल है. अगले दिन जब रिवाज के मुताबिक रघुराम की मां बोया लोगों के बीच पान देने गईं तो उन्होंने उसे धमकी दी कि वे रघुराम को मार डालेंगे, जिसने मादिगा लोगों को मंदिर में ले जाने की जुर्रत की थी. मंदिर के पुजारी कृष्णामाचारी ने शुद्धि के लिए यज्ञ किया और बोया लोगों को फटकार लगाई कि उन्होंने मादिगा लोगों को देवताओं को दूषित करने दिया. रात में बोया लोगों ने एक बैठक की और मादिगाओं का सामाजिक बहिष्कार करने का फैसला किया. तब से पटपल्ली में उत्पीड़न की यह गाथा शुरू हुई. मादिगाओं ने निचले इलाके की अपनी बस्ती तक पहुंचने के लिए गांव में एक किलोमीटर तक बोया आबादी के बीच से गुजरना होता था. उन्हें छेड़ा गया, उनकी जाति का नाम लेकर गालियां दी गईं, उन पर पत्थर फेंके गए, छोटी-छोटी बातों पर उन पर हमले हुए और बाइक से टक्कर मारी गई.

4 मई को मादिगा के नौजवान पेब्बेरु गए और परजावाणी (लोगों की शिकायतें रखने का एक फोरम) में तहसीलदार को इस परेशान किए जाने के बारे में खबर दी. इसके जवाब में, तहसीलदार पांडु नायक ने पुलिस सब-इंस्पेक्टर (एसआई) प्रकाश यादव और अन्य पुलिसकर्मियों के साथ मादिगा टोले का दौरा किया, वहां एक पुलिस पिकेट बनाया और मंदिर के दरवाजे मादिगा लोगों के लिए खोल दिए. हालांकि जैसे ही तहसीलदार गांव से रवाना हुआ, 300-400 बोया नौजवानों का एक समूह आया और एसआई के सामने ही मादिगा लोगों पर हमले किया और उन्हें दलित बस्ती तक खदेड़ दिया. इसके बाद से, परेशान किए जाने और हमलों की घटनाओं में तेजी आ गई. इस तरह के रोजाना के कड़वे अनुभवों से बचने के लिए मादिगा लोगों ने 1 जून को अपने घरों को छोड़ कर पेब्बेरू-कोल्लापुर सड़क के करीब रिहाइशी प्लॉटों पर बसने का फैसला किया, जो उन्हें तब की आंध्र प्रदेश सरकार ने 2008 में सौंपा था. उन्होंने अपनी झोंपड़ियां खड़ी कीं, उन्हें पक्का बनाने के लिए इमारती सामान लेकर आए और वहां रहना शुरू कर दिया. हालांकि पुजारी और गांव के राजस्व अधिकारी (वीआरओ) ने बोया लोगों को भड़काया कि अगर मादिगा गांव के ऊपरी हिस्से में रहने लगे तो वे पूरे गांव को ही दूषित कर देंगे और बदशगुनी लाएंगे. उन्हें पुरानी बस्ती में वापस भेजने के लिए 3 जून को बोया सैकड़ों की तादाद में आए और मादिगा लोगों की झोंपड़ियों के बीच में चिन्ना स्वामी नाम के एक आदमी की लाश को गाड़ दिया, जिसकी मौत पिछले दिन हुई थी. मादिगा लोगों ने पुलिस से गुहार लगाई. डीएसपी वनपारथी के नेतृत्व में पुलिस, सर्किल इंस्पेक्टर, सब-इंस्पेक्टरों और साठेक पुलिसकर्मियों के साथ गांव में आई, लेकिन वह बोया लोगों को पुलिस की नजरों के सामने ही मादिगा लोगों की झोंपड़ियों के बीच में एक और आदमी गोडन्ना की लाश को गाड़ने से नहीं रोक पाई. लाचार होकर मादिगा लोग विरोध में पेब्बेरु-कोल्लापुर सड़क पर रास्ता रोको के लिए उतरे. जो पुलिस बोया लोगों को अपने लोगों की लाशें मादिगाओं की झोंपड़ियों के बीच में गाड़ते हुए बेचारगी से देखती रही थी, अब उसने गंभीर रूप से लाठी चार्ज किया. पेब्बेरू के एसआई जीतेंद्र रेड्डी ने रघुराम समेत 20 दलितों को हिरासत में लिया और उन्हें बहुत बुरी तरह पीटा. यहां तक कि मर्द पुलिसकर्मियों ने औरतों तक को नहीं बख्शा. जब मैं 19 जुलाई को उनसे मिला तो उनमें से अनेक अभी भी निजी तौर पर अपने जख्मों का इलाज करा रहे थे.

जाति का आतंक

संविधान द्वारा इसकी गारंटी दिए जाने के 65 साल के बाद, मंदिर में दाखिल होने की चाहत से शुरू हुआ यह सिलसिला नाइंसाफियों और आतंक के बरसों को उजागर करता है, जिन्हें दलित चुपचाप भुगतते रहे हैं. नए नए आवंटित रिहाइशी प्लॉटों के एकदम करीब नारायण मादिगा को 1 एकड़ 13 गुंठ का एक पट्टा आवंटित किया गया था. सारी औपचारिक कार्रवाइयों के पूरा हो जाने पर उन्होंने 2001 से उसमें खेती शुरू कर दी थी, लेकिन प्रभुत्वशाली बोया लोग इसे पचा नहीं पाए. उन्होंने अपने मरने वालों की लाशें उनके खेत में गाड़नी शुरू कर दीं और उन पर यादगारी स्मारक बनाने लगे. जबकि गांव के पार की उनकी परंपरागत श्मशान भूमि में कई पीढ़ियों के बाद महज 3-4 सीधे-सादे ढांचे खड़े हैं, इस नई श्मशान भूमि पर इस दरमियान दर्जन भर से ज्यादा स्मारक बन चुके हैं. नारायण ने तंग आकर आखिर में 2007 में खेती छोड़ दी. हम जब मादिगा बस्ती में गए, अनेक चीजों के बारे में पता लगा. गांव में पानी की एक टंकी थी, लेकिन उससे सिर्फ बोया घरों को ही आपूर्ति होती थी. दलितों के लिए अलग बोरवेल थे, जिसमें से खारा पानी भूमिगत पाइपों के जरिए दलित बस्ती में पहुंचता था. ये पाइप चार गड्ढों में खुलते थे, जिनमें कामचलाऊ टोंटियां लगी थीं जहां से दलित लोग पानी भर कर ले जाते थे. यह दृश्य इतना भयावह था कि हमें यकीन करने के लिए एक महिला से यह कहना पड़ा कि वे उसमें से पानी भर कर दिखाएं. दलित बस्ती के उस पार एक बड़ा पोखरा था, जिसके बारे में बताया गया कि उसने दलित जमीन को निगल लिया था. दलितों की कुल 54 एकड़ जमीन को डुबो दिया गया था, जिससे वे भूमिहीन मजदूर बन गए थे. बोया लोगों का आतंक इस कदर है कि मादिगा लोग असहमति का एक शब्द भी जुबान पर नहीं ला सके. खबर है कि उनकी जमीन पर बने पोखरे में मछलीपालन के लिए लगी बोली के जरिए पर 12 लाख रुपए आते हैं और उस पोखरे के पानी से बोया लोगों की जमीन की सिंचाई होती है. मादिगा लोगों को इससे यह हासिल होता है कि बरसात में उनके घरों में पानी भर आता है और उन्हें सांपों और दूसरे रेंगनेवाले जीवों के साथ गुजर करना पड़ता है. एक तरफ जहां बोया लोगों ने मादिगाओं को उनकी अपनी जमीन से बेदखल कर दिया है, उन्होंने गांव की साझी जमीन भी हड़प ली है और उस पर अर्ध-स्थायी गायघर और गोदामघर बना लिया है.

दिलचस्प बात यह है कि पटपल्ली की सरपंच एक मादिगा महिला सुभद्रा है, जो पहले गांव के विद्यालय में दोपहर का भोजन योजना के तहत खाना बनाती थी. बोया लोगों ने रसोइए के रूप में उसका विरोध किया, लेकिन ग्राम पंचायत की सरपंच के रूप में उसे कबूल कर लिया. बोया और मादिगा लोगों के बीच मौजूदा जातीय ध्रुवीकरण में उसका परिवार बोया लोगों की तरफ और आंदोलनकारी मादिगा लोगों के खिलाफ है. इसके उलट एक बोया पेद्दा वुसन्ना मादिगा लोगों की तरफ हैं, जिन्हें मादिगाओं के साथ साथ रिहाइशी प्लॉट आवंटित किया गया था. दिलचस्प बात यह है कि सुभद्रा भी मादिगा बोरवेल से पानी भरती हैं लेकिन प्रभुत्वशाली बोया लोगों के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलतीं और पेद्दा वुसन्ना को उनकी ही जाति के लोगों ने सजा देते हुए उनकी झोंपड़ी गिरा दी और उनकी बीवी, बेटे और बेटी की गंभीर पिटाई की. आंदोलन के तेज होने पर इसकी भारी संभावना है कि राजनेता मादिगा दंदोरा भाड़े के हत्यारों को आंदोलनकारी मादिगाओं के खिलाफ लगा देंगे और इसे जाति के भीतर का एक झगड़ा बना कर रख देंगे. पटपल्ली समकालीन जातीय गतिकी की एक झलक देता है.

करमचेडू की आशंका

जबकि 17 जुलाई को हैदराबाद में प्रगतिशील समूह करमचेडू जनसंहार की तीसवीं बरसी को याद कर रहे थे, उसी समय पटपल्ली के मादिगा, बोया लोगों की धमकियों के मुताबिक अपने गांव के करमचेडु बनने के खौफ में जी रहे थे. प्रकासम जिले के करमचेडू के कम्मा लोगों ने छह मादिगा लोगों को मार डाला था और अन्य 20 को गंभीर रूप से जख्मी कर दिया. हो सकता है कि पटपल्ली के बोया लोग 2015 में करमचेडू के कम्मा लोगों जितने धनी न हों और इसी तरह मादिगा लोग करमचेडू के अपने साथियों जितने राजनीतिक रूप से सचेत न हों. लेकिन मादिगा लोगों के खिलाफ नफरत के मामले में बोया लोगों ने काफी बराबरी दिखाई है, जो कि उस पैमाने के उत्पीड़न के लिए जरूरी शर्त है. इससे भी ज्यादा, वे रेड्डियों और कम्मा लोगों से ज्यादा आक्रामक के रूप में जाने जाते हैं. पिछले दो महीनों के हमलों, बेइज्जतियों और अपमानों के सिलसिले तथा शांति के साथ धरने और रिले भूख हड़ताल के बावजूद सरकार ने हालात की गंभीरता को महसूस नहीं किया है. मादिगा लोगों के आंदोलन के हरेक दिन के साथ बोया लोगों का गुस्सा नई बुलंदी को छू रहा है और किसी भी पल भड़क कर खून-खराबे से भरे एक अत्याचार में तब्दील हो सकता है.

रायलसीमा और तटीय आंध्र के उलट तेलंगाना में जातीय अत्याचारों का इतिहास नहीं रहा है. भ्रामक रूप से इसकी वजह को औपनिवेशिक दौर से ही इलाके के रेडिकल आंदोलनों से जोड़ा जाता रहा है. लेकिन जैसाकि पटपल्ली ने उजागर किया है, यह प्रभुत्वशाली जातियों और दलितों के बीच ताकत की खौफनाक गैर बराबरी है, जिसने शायद किसी बड़े जातीय टकराव को रोके रखा था. जबकि केसीआर अवाम से और खासकर दलितों से किए गए अपने चुनावी वादे को पूरा करने में नाकाम हुए हैं, तो शायद वे तेलंगाना में अपना एक करमचेडू बनाना चाहते हों ताकि लोगों का ध्यान बंटाया जा सके.

वर्तमान सांस्कृतिक चुनौतियां और हस्तक्षेप की जरूरत

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/02/2015 01:22:00 PM


जन संस्कृति मंच के सम्मेलन में डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माता संजय काक का संबोधन.
 

जन संस्कृति मंच के इस प्लेटफार्म से शायद यह बताने की जरूरत नहीं है कि हमारे मौजूदा दौर की सांस्कृतिक चुनौतियों का सामना करने की कितनी फौरी जरूरत है. आप सब जो भी लोग यहां आए हैं – आप यही करते हैं, इसी के बारे में सोचते हैं, यही आपकी कर्मभूमि है.

इसमें हमें कोई शक नहीं है कि करने के लिए बहुत कुछ हैं. बल्कि पिछले कुछ बरसों में सियासी बदलावों के साथ हमारी जिम्मेदारियों में सिर्फ बढ़ोतरी ही हुई है.

हम एक ऐसे दौर में दाखिल हो गए हैं जहां हर उस चीज को बदलने की कोशिश की जा रही है, जो इस मुल्क को रहने के लिहाज से एक असाधारण और चुनौतीपूर्ण जगह बनाती है. और हमारी जो भी कमियां रही हों, यह बात तो तय है कि हम अपने ऊपर एक ऐसी राज सत्ता ले आए हैं, जिसमें संस्कृति पर - और जिंदगी के हर दूसरे पहलू पर –  संकीर्ण, ओछे विचार हम पर थोपे जा रहे हैं.

आज एक बहुसंख्यकवादी विचार का इस्तेमाल कर के, अल्पसंख्यकों को जबरदस्ती अपनी अधीनता में लाने की कोशिश की जा रहा है – चाहे वो मुसलमान हों या ईसाई, आदिवासी हों या दलित. चाहे वो महिलाएं हों या वैकल्पिक यौन व्यवहार वाले लोग. फिर इस विराट राष्ट्र राज्य में उन लोगों के लिए क्या मौके हैं जो हाशिए पर रहते हैं? और जो वहां से इसमें अपनी जगह के बारे में सवाल उ ाते हैं, चाहे वो कश्मीर हो या नागालैंड या मणिपुर.

इन अनेक दबावों के साथ, हमें एक और भार पर भी गौर करना चाहिए. क्योंकि हर आने वाला दिन यह स्पष्ट कर रहा है कि हमारे सियासी जहाज की पतवार पर जिन लोगों की मजबूत पकड़ है, उनकी बढ़ती हुई फेहरिश्त में नए नए नाम जुड़ते चले जा रहे हैं – और यह जहाज हमें एक तबाह कर देने वाले भविष्य की ओर ले जा रहा है. श्रमिकों के शोषण के इतिहास में हमे जल्द ही होने वाली पर्यावरण की आत्मघाती तबाही को जोड़ना होगा – वह तबाही जो खनिजों के लिए, और उनको निकालने के लिए बिजली-पानी के लिए की जा रही है.

एक वक्त था जब मजदूर वर्ग टाटा-बिरला की बात किया करता था, फिर टाटा-बिरला-अंबानी हुए. अब यह टाटा-बिरला-अंबानी-अडानी हैं – और यह जपमाला लगातार लंबी होती जा रही है.

हम संस्कृति के क्षेत्र में काम करते हैं, इस लिहाज से हम जानते हैं कि हमारा काम हमारे लिए पहले से तय है.

मैंने अभी कहा कि करने के लिए बहुत कुछ हैं. मुद्दा यह है कि हम इसे कैसे करें. शायद सबसे पहली बात यह है कि इस संकट को एक अवसर के रूप में देखा जाए, क्योंकि अब हम बस कुछ खोई हुई रूहें ही नहीं हैं जो इस संकट को महसूस कर रही हैं, बल्कि बढ़ती हुई तादाद में लोग इसे महसूस करने लगे हैं. मेरा यकीन कीजिए, कि देश जिस दिशा में बढ़ रहा है उस पर तो स्वदेशी जागरण मंच भी बहुत चिंतित है!

मैं डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाता हूं और मैं यह कहूंगा कि भारतीय डॉक्यूमेंटरी फिल्मों ने एक अहम और जरूरी माध्यम की हैसियत सिर्फ तभी हासिल की, जब भारतीय लोकतंत्र सबसे बदतरीन दौर से गुजर रहा था. मैं 1975-77 के आपातकाल की बात कर रहा हूं. जब तक आपातकाल उन पर लागू नहीं हुआ, तब तक लेखकों और फिल्म निर्माताओं समेत बुद्धिजीवी तबके के लगभग सभी हिस्से काफी हद तक ‘राष्ट्र निर्माण’ (नेशन बिल्डिंग) के काम को लेकर उत्साहित थे और बिना आलोचनात्मक हुए खुद को इसके ओर प्रतिबद्ध बनाए रखा था. इसमें वाम भी शामिल था, क्योंकि गहराई से सवाल उठाने के दौर के बाद वे भी राष्ट्र निर्माण की नेहरुवादी परियोजना में खिंचे चले गए थे.

संस्कृति और राष्ट्र-राज्य (नेशन स्टेट) की परियोजना के बीच का रिश्ता हिंदुस्तानी सिनेमा में हमेशा ऐसा ही नहीं था. आजादी के ठीक पहले हमने भारतीय जन नाट्य मंच (इप्टा) को एक राजनीतिक कार्रवाई के रूप में के.ए. अब्बास की धरती के लाल (1946) जैसी फिल्म का निर्माण करते हुए देखा, जो फिल्म फंडिंग के परंपरागत लीक से हटकर चंदे से जुटाई गई रकम से बनी थी. चेतन आनंद की नीचा नगर (1946) और बिमल रॉय की दो बीघा जमीन (1953) जैसी दूसरी फिल्में भी वामपंथ की अहम हस्तियों द्वारा लिखी गई थीं और उनमें उन्होंने अभिनय किया था. ये यथार्थवादी लेकिन उम्मीद से भरी हुई फिल्में थीं, और उनमें एक मजबूत समाजवादी जज्बा दिखता था. लेकिन 1947 के बाद ‘राष्ट्र निर्माण’ की तरफ एक नया रेला आया जिसने इन दखलंदाजियों को गुजरे हुए जमाने की बात बना दिया.

मैंने इसके बारे में पहले भी लिखा है, लेकिन आपातकाल के नतीजों के फौरन बाद – और 1947 के कम से कम 30 बरस के बाद – आनंद पटवर्धन की जमीर के बंदी (1978) का आना ‘राष्ट्र निर्माण’ की सेवा में लगी सिनेमा संस्कृति की परंपरा से साफ साफ अलगाव था. इसी के साथ दूसरी अनेक फिल्मों ने भी जगह जमानी शुरू कर दी थीं – उत्पलेंदु चक्रव्रती की मुक्ति चाई (1978) सियासी बंदियों के मुद्दे पर बनी थी; गौतम घोष की हंगरी ऑटम (1978) देहाती भारत के सामने आए संकट के बारे में थी, और तपन बोस और सुहासिनी मुले की एन इंडियन स्टोरी (1981) भागलपुर अंखफोड़वा कांड पर थी. अगर आप इन स्वतंत्र और खुद जुटाई हुई रकम पर बनी फिल्मों की इस छोटी सी फेहरिश्त पर गौर करें, तो आप यह कह सकते हैं कि आपातकाल के झटके और उसके पहले के सामाजिक और राजनीतिक संकट ने एक नई, आत्मविश्वास रखने वाली डॉक्यमेंटरी की एक नई चलन पैदा की, जिसने बहुत थोड़े वक्त में ही अपने लिए एक अलग जगह का ऐलान कर दिया.

मैं यह भी कहूंगा कि आपातकाल के तुरतं बाद के दौर में इन फिल्मों को व्यापक रूप में देखे जाने और उन पर बहसों की वजह ये थी कि वे एक उत्तेजनाहीन, लेकिन बेहिचक आलोचनात्मक नजरिया पेश करती थीं. यह ऐसी बातें थीं, जिनहें डॉक्यूमेंटरी फिल्मों से, और उन दिनों जो कुछ भी मीडिया था उससे ज्यादातर एक सुरक्षित दूरी पर रखा जाता था.

इस आलोचनात्मक धार के साथ साथ इन फिल्मों ने अवाम को यह समझने में मदद की कि वे किस दौर से गुजरे थे, किस दौर से गुजर रहे थे, और शायद वे किस तरफ बढ़ रहे थे. बंबई हमारा शहर (1985) जैसी एक फिल्म अपने बनने के तीस बरस बाद भी प्रासंगिक बनी हुई है तो सिर्फ इसलिए नहीं कि यह हमें बताती है कि 1980 के दशक के शुरुआती दौर में बंबई महानगरी मे क्या हो रहा था, बल्कि यह उस रास्ते की निशानदेही भी करती है, जिस पर हमारे अनेक शहर जाने वाले थे.

आज इस मंच पे फिल्म निर्माता साथी नकुल सिंह साहनी भी हैं, जिनकी फिल्म इज्जतनगरी की असभ्य बेटियां (2012) हरियाणा में खाप पंचायतों के साथ महिलाओं के अनुभवों के बारे में है. नकुल एक ऐसे मुद्दे की तरफ आकर्षित हुए, जिसके बारे में लोग असली तरीके से बात करना चाहते थे. इज्जतनगरी खूब दिखाई गई और इसने अच्छी-खासी बहस पैदा की, इसकी वजह यह थी कि इसने एक महसूस की जा रही जरूरत को पूरा किया. और यह तार को भरसक आपस में जोड़ने में कामयाब रही. इसने खाप, पितृसत्ता और हरियाणा में जमीन के साथ जुड़े बेहिसाब मूल्य के बीच रिश्तों को देखा.

यहां एक सांस्कृतिक सक्रियता (एक्टिविज्म) काम कर रही थी, जिसने एक खास मौके पर एक मुद्दे में दखल दी. लेकिन यह एक ऐसे रूप में थी, जो लोगों को अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करने की इजाजत देती थी. (फिल्मों का आम प्रदर्शन यही करता है, यह एक ऐसी जगह बनाता है, जिसमें बातचीत हो सके...) 2007 में जब मैंने कश्मीर पर फिल्म जश्ने-आजादी पूरी की, तो हम काफी उग्र आलोचना और रोड़ेबाजियों के लिए तैयार थे. हमें हैरान करती हुई, इसकी जगह फिल्म ने मेरी बनाई हुई सभी फिल्मों के दर्शकों के मुकाबले, सबसे ज्यादा सचेत दर्शक हासिल किए. दो घंटे 19 मिनट की जश्ने-आजादी ऐसी फिल्म है, जिसे मैंने अपने कैरियर में सबसे ज्यादा दिखाया है. लोग भले फिल्म को पसंद न करें, लेकिन यकीनन उन्होंने इस फिल्म पर गौर किया और इसे सांस्कृतिक जमीन का हिस्सा बना दिया। और फिल्म ने जो जगह तैयार की थी, एक स्पेस जो बना दी थी, उसका इस्तेमाल अनेक किस्म की चर्चा के लिए हो पाया - जिसमें हमारे समाज के सैन्यीकरण का मुद्दा भी शामिल है.

जो नुक्ता मैं यहां रखने की कोशिश कर रहा हूं वह ये है कि एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता के बतौर हमें इस बात के लिए सतर्क रहने की जरूरत है कि वे कौन से मुद्दे हैं जिनको लेकर लोग चिंतित हैं. और इसका मतलब यह नहीं है कि जो सतह पर है इसी के लिए उत्तेजित दिख रहे हों. क्योंकि सांस्कृतिक सक्रियता को एक ही साथ दो विरोधात्मक तरीकों से काम करने की जरूरत है, जो बजाहिर आपस में विरोधी दिखते हैं: इसे रोजाना की जिंदगी में गहराई तक धंसना होगा, लेकिन इसे आगे की तरफ और वर्तमान के उस पार की उड़ान भी भरनी होगी. सिर्फ यही हमारे संस्कृतिक यत्न को एक लंबी उम्र और मजबूती दे सकती है.

जिस दूसरे नुक्ते की ओर मैं आपका ध्यान ले जाना चाहता हूं, वह यह है कि एक ‘आलोचनात्मक’ राजनीतिक डॉक्युमेंटरी का स्वरूप (फॉर्म) भी वक्त पर पैदा हुआ. जमीर के बंदी या इज्जतनगरी की असभ्य बेटियां ने जिन विचारों को उठाया था, वे पूरी तरह नए नहीं थे: उन्हें जिस बात ने ताकतवर बनाया था वह वो मुनासिब स्वरूप था, जिनमें उन दलीलों को पेश किया गया था. ‘नई पीढ़ी विजुअल मीडियम की ओर ज्यादा आकर्षित है’ कहने जैसी कोई सीधी-सादी बात नहीं है. यह सच हो सकता है, लेकिन नई पीढ़ी एक ऐसे स्वरूप की ओर भी आकर्षित हो सकती है जो उन्हें खुद अपनी राय बनाने की इजाजत देती हो. तस्वीरों और दर्शकों का मामला ऐसा ही है जैसा घोड़े को पानी के गड्ढे की ओर ले जाने का है. आप उन्हें वहां ले जा सकते हैं, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वो उसे पी ही लेंगे. एक ऐसा स्वरूप जो अवाम को अपनी हकीकत की जटिलता और अस्पष्टता का सामना करने की इजाजत देती है, उसके लोगों के जेहन में जगह बना लेने के मौके ज्यादा होते हैं.

आखिर में, तकनीक का मामला भी है. अगर हमें सांस्कृतिक जमीन में गंभीरता से दखल देना है तो इस बदलती हुई दुनिया में हमें अपनी आंख-कान खुले रखने पड़ेंगे. मैं जानता हूं कि टेक्नोलॉजी एक बिगड़ैल घोड़ा है, और आपको इससे गिरने से बचने के लिए दोनों हाथों से लगाम को थामना होगा, लेकिन लंबे दौर के लिए कुछ रुझान बहुत स्पष्ट हैं:

  • हम सबने देखा है कि डिजिटल तकनीक ने फिल्म निर्माण पर कितना असर डाला है. हम जो कर रहे हैं, उसे हममें से कोई भी करने के काबिल नहीं होता अगर डिजिटल दुनिया नहीं रही होती. सिर्फ फिल्में बनाने में ही नहीं, बल्कि उन्हें वितरित करने और फिर प्रोजेक्टर तक से उसके सफर में.
  • आज की दुनिया में इंटरनेट शायद सबसे ताकतवर सामाजिक प्रभाव के रूप में उभरा है. (देखिए ISIS किस तरह दुनिया को अपने प्रभाव में लेने में कामयाब हो रहा है!) हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते.
  • और अब मोबाइल फोन ज्यादातर नौजवानों के लिए पहले ‘कंप्यूटर’ के रूप में तेजी से उभर रहा है, खास कर हमारे छोटे शहरों और कस्बों में – यहीं पर लोग संगीत, वीडियो, खबरें, कहानियां और गपशप एक दूसरे के बीच बांटते हैं.

शायद हमें सबसे पहले यह करने की जरूरत है कि हम सांस्कृतिक व्यवहारों, सक्रियता (एक्टिविज्म) और तकनीक के बीच के आपसी रिश्तों पर बातें करें.

पूरी दुनिया एक आधा बना हुआ बांध है-3: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/30/2015 09:04:00 PM


आंबेडकर-गांधी बहस के संदर्भ में राजमोहन गांधी को अरुंधति रॉय के जवाब ‘ऑल द वर्ल्ड’ज अ हाफ-बिल्ट डैम’ के हिंदी अनुवाद की तीसरी किस्त. अनुवाद: रेयाज उल हक

[यहां पढ़ें पहली और दूसरी किस्तें]

जाति और छुआछूत के खिलाफ अभियान

मेरी कमजोरियों की राजमोहन गांधी की फेहरिश्त में सबसे ऊपर यह इल्जाम है कि मुझे ‘इसका सीमित ज्ञान’ भी नहीं है कि ‘जाति, नस्ल और धर्म के मामले में गांधी कहां खड़े थे.’ गांधी जिन लोगों को ‘हरिजन’ कहा करते थे उनके प्रति उनकी हमदर्दी और प्यार को दिखाने के लिए राजमोहन गांधी ने ‘द सिन ऑफ अनटचेबिलिटी’[3] के शीर्षक वाले एक लंबे हिस्से में अनेक मिसालों का हवाला दिया है. ऐसा लगता है कि इस नफरत किए जाने वाले और सरपरस्ती भरे शब्द के इस्तेमाल को लेकर बहसों से राजमोहन गांधी या तो नावाकिफ हैं या बेपरवाह हैं. वे कहते हैं: ‘चूंकि (गांधी ने कहा था) ईश्वर सबसे ऊपर है जो मजबूरों का संरक्षक है और चूंकि ‘अछूतों’ से ज्यादा मजबूर कोई नहीं है, इसलिए ‘हरिजन’ शब्द उन्हें मुनासिब लगा था.’ यह राजमोहन गांधी को भी मुनासिब लगता है.

अपने लेख के इस हिस्से में, वे हमें यह समझाते हैं कि कैसे गांधी ने छुआछूत के खिलाफ तब भी अभियान चलाया, जब उन्हें हिंदू कट्टरपंथ के गुस्साए हुए प्रतिनिधियों द्वारा धमकाया गया था. ‘ऊपर दिए गए पैराग्राफों में जो कुछ कहा गया है, रॉय उनमें से कुछ भी जानने की इजाजत अपने पढ़नेवालों को नहीं देतीं,’ वे कहते हैं. मिसाल के लिए ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ में से इसे देखिए:

पूना समझौते के बाद, गांधी ने अपनी सारी ऊर्जा और जोश को छुआछूत को खत्म करने की तरफ मोड़ दिया. शुरुआत के लिए, उन्होंने अछूतों का नाम बदलते हुए उन्हें एक सरपरस्ती भरा नाम दिया जो हिंदू आस्था से मजबूती से बंधा हुआ था: हरिजन. उन्होंने हरिजन नाम से एक नया अखबार शुरू किया. उन्होंने हरिजन सेवक संघ की शुरुआत की जिसके बारे में उन्होंने जोर दिया कि उसमें सिर्फ विशेषाधिकार प्राप्त सर्वण हिंदू ही काम करें जिन्हें अछूतों के खिलाफ पहले के पापों का प्रायश्चित करना हो. आंबेडकर ने इन सबको ‘दयालुता से अछूतों की हत्या’ करने की कांग्रेस की योजना के रूप में देखा.

गांधी ने छुआछूत के खिलाफ उपदेश देते हुए देश भर का दौरा किया. उन्हें अपने से भी ज्यादा रूढ़िवादी हिंदुओं द्वारा सवाल पूछ-पूछ कर तंग किया गया और उन पर हमले किए गए, लेकिन वे अपने मकसद से नहीं हटे. जो कुछ भी हुआ उसे छुआछूत को खत्म करने के मकसद के इस्तेमाल में लाया गया. जनवरी 1934 में बिहार में एक बड़ा भूकंप आया. तकरीबन बीस हजार लोगों ने अपनी जिंदगियां खो दीं. हरिजन में 24 फरवरी को लिखते हुए गांधी ने कांग्रेस के अपने सहकर्मियों तक को हिला दिया जब उन्होंने कहा कि यह छुआछूत के पाप पर चलने के लिए ईश्वर द्वारा लोगों को दी गई सजा है... (रॉय 2014: 129).

इन सबमें सबसे परेशान कर देने वाली बात यह है कि राजमोहन गांधी (गांधी के साथ साथ हिंदू महासभा और उनके पहले से कुछ हिंदू सुधारवादी संगठनों की तरह) छुआछूत के खिलाफ लड़ाई और जाति के खिलाफ लड़ाई को एक ही चीज बना कर रख देते हैं. ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ इस सियासत पर थोड़े विस्तार से चर्चा करती है (रॉय 2014: 53-58, 98-102). उसमें मैंने जो कुछ कहा है, उसे यहां थोड़े में पेश करने दीजिए:

विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के सुधारवादी संगठनों द्वारा छुआछूत की प्रथा के खिलाफ जोरदार प्रचार की शुरुआत 19वीं शताब्दी के आखिर में शुरू हुई थी. उसके पहले, मातहत जातियों में पैदा हुए करोड़ों लोगों ने जाति के अभिशाप से बचने के लिए इस्लाम, ईसाइयत और सिख धर्म अपना लिए थे. ऐसा नहीं लगता था कि किसी को कोई परवाह थी. हालांकि सदी बदलने के साथ जब साम्राज्य के पुराने विचार राष्ट्र राज्य के नए विचारों की शक्ल लेने लगे और प्रतिनिधित्व पर आधारित सरकार की अवधारणा चलन में आई तो एक नया और विस्फोटक सवाल पैदा हुआ: किसका प्रतिनिधित्व करने का अधिकार किसके पास है? अचानक मुसलमान, सिख, ईसाई, हिंदू ऐसे अलग अलग हिस्सों में बंटने लगे जिन्हें आज हम ‘वोट बैंक’ के नाम से जानते हैं. अचानक आबादी की बनावट (जनसांख्यिकी) अहम हो गई. अचानक ही विशेषाधिकार वाले सवर्ण हिंदुओं के लिए यह जरूरी हो गया कि वे 4.45 करोड़ की मजबूत अछूत आबादी को ‘हिंदू पाले’ में रखते हुए अपनी तादाद को बढ़ा लें (यह ऐसी अवधारणा थी, जो इस दौर के पहले वजूद में नहीं थी). धर्मपरिवर्तन की धारा को रोकने के लिए और अछूतों का दिल और दिमाग जीतने के लिए, विशेषाधिकार प्राप्त सवर्ण हिंदू सुधारवादी संगठनों का एक बेड़ा उभर आया. (उनमें से आर्य समाज से जन्मा जात-पांत-तोड़क मंडल एक था, जिसने आंबेडकर को बोलने के लिए बुलाया और फिर जैसा कि सबको पता है, उन्हें तब मना कर दिया जब उन्होंने उनके भाषण एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट को देखा, जिसमें आंबेडकर ने हिंदू ग्रंथों को खारिज किया था.) इन सुधारवादियों को, जिनमें से ज्यादातर जाति में यकीन रखते थे, एक ऐसा तरीका खोजना था, जिससे अछूत बड़ी हवेली में बने रहें, लेकिन उन्हें नौकरों की कोठरियों में रखा जाए. इस मकसद से 1875 में आर्य समाज की स्थापना हुई थी, जो ‘दूषित लोगों की शुद्धि’ करने की शुद्धि योजना चला रहा था और अछूतों की हिंदू धर्म में ‘घर’ लौटा कर ला रहा था. 1899 में स्वामी विवेकानंद ने कहा, ‘हिंदू बाड़े को छोड़ कर जाने वाला हरेक आदमी न सिर्फ एक कमतर आदमी है, बल्कि एक बड़ा दुश्मन है.’ आज नरेंद्र मोदी की निगरानी में शुद्धि को ‘घर वापसी’ के रूप में फिर से शुरू किया गया है.

बेशक ब्रिटिश सरकार बदमाशी के साथ और खतरनाक तरीके से समुदायों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करते हुए इन सब चिंताओं से खेल रही थी. उसने मनमुटाव की जो आग लगाई थी, उसका अंजाम आखिरकार बंटवारे के खूनखराबे में हुआ.

गांधी के दक्षिण अफ्रीका से (1915) और आंबेडकर के कोलंबिया में अपने अध्ययन के बाद (1917) भारत लौटने के वक्त तक, छुआछूत के खिलाफ सुधारकों का अभियान शिखर पर था. कांग्रेस ने छुआछूत के खिलाफ एक प्रस्ताव मंजूर किया था. गांधी और तिलक ने छुआछूत को एक ऐसी ‘बीमारी’ करार दिया था जो हिंदू धर्म के उसूलों के खिलाफ थी. पहली ऑल-इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कॉन्फ्रेंस (विशेषाधिकार प्राप्त जातियों द्वारा आयोजित) बंबई में रखी गई. ऑल-इंडिया एंटी अनटचेबिलिटी मेनिफेस्टो पर तिलक को छोड़ कर सबने दस्तखत किए. 


आंबेडकर इन सभाओं में नहीं गए. वे अछूतों के लिए सरपरस्ती के इस अस्वाभाविक प्रदर्शन को लेकर शंकित थे. उन्होंने देखा कि ये बदलते वक्त के वे तरीके हैं, जिनके जरिए विशेषाधिकार प्राप्त जातियां अछूत समुदाय पर अपने कब्जे को मजबूत करने की कवायद कर रही थीं. वे मानते थे कि सिर्फ कलंक और छुआछूत के इर्द-गिर्द शुद्धता-दूषण के मुद्दे को नहीं, बल्कि खुद जाति को ही खत्म करना होगा. छुआछूत का क्रूर व्यवहार - दूषित करने वाले कदमों के निशानों को बुहारने के लिए कमर से बंधी झाड़ू, दूषित करने वाले थूक को जमा करने के लिए गले में बंधा घड़ा – तो जाति प्रथा का एक प्रदर्शनकारी, कर्मकांडी सिरा था. वे जानते थे कि जाति की असली हिंसा तो हकदारियों को नकारे जाने से पैदा होती थी: जमीन से, धन से, ज्ञान से, बराबरी भरे मौके से.

हिंदू सुधारवादियों ने बड़ी चालाकी से जाति के सवाल को छुआछूत तक सीमित कर दिया था, जिसका मकसद जाति को ठीक-ठीक राजनीतिक अर्थव्यवस्था से और गुलामी के उन हालात से अलग करना था, जिनमें ज्यादातर अछूत रहने और काम करने के लिए मजबूर किए गए थे. जिसका मकसद ठीक ठीक हकदारी के सवाल को, भूमि सुधारों और धन के फिर से बंटवारे के सवालों को छुपा देना था. उन्होंने इसे एक गलत धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथा के रूप में पेश किया जिसमें सुधार की जरूरत थी. गांधी ने इसे और भी संकीर्ण बनाते हुए इसे ‘भंगियों’ का मुद्दा बना दिया – जो ज्यादातर एक शहरी और इसलिए कुछ हद तक राजनीति में दखल रखने वाला समुदाय है.

जब राजमोहन गांधी इन सबकी अनदेखी करते हैं और गांधी की परोपकारी हमदर्दी और छुआछूत के खिलाफ उनके जोरदार अभियान की एक के बाद एक मिसालें पेश करते हैं, तो मैं नहीं कह सकती कि उनकी नजरों का धुंधलापन असली है या चालाकी से अपनाया हुआ. चाहे जो भी हो, इसका अंजाम परेशान कर देने वाली सियासत है.

आंबेडकर और अलग निर्वाचक मंडल

आंबेडकर मानते थे कि जब तक अछूत अपने खुद के प्रतिनिधियों के साथ एक राजनीतिक जनाधार के रूप में में विकसित नहीं होते, तब तक जाति सिर्फ और ज्यादा गहरी ही होगी. उनका मानना था कि ‘हिंदू पाले’ में या कांग्रेस के भीतर अछूतों के लिए आरक्षित सीटें महज दब्बू उम्मीदवारों को ही पैदा करेंगी – ये ऐसे नौकर होंगे जो जानते हों कि मालिकों को कैसे खुश रखना है. लंदन में 1930 में गोलमेज सम्मेलन होने के बरसों पहले उन्होंने अलग निर्वाचक मंडलों के विचार को विकसित करना शुरू कर दिया था. 1919 में उन्होंने चुनावी सुधारों पर साउथबरो कमेटी को एक लिखित बयान सौंपा था:
प्रतिनिधित्व का अधिकार और राज्य के तहत पद रखने का अधिकार वे दो सबसे अहम अधिकार हैं जो नागरिकता को बनाते हैं. लेकिन अछूतों का अछूतपन इन अधिकारों को पहुंच से बाहर कर देता है. कुछ जगहों पर तो निजी आजादी और निजी सुरक्षा जैसे मामूली अधिकार भी उनके पास नहीं हैं और कानून के आगे बराबरी हमेशा उनको सुनिश्चित नहीं होती है. ये अछूतों के हित हैं. और जैसा कि आसानी से देखा जा सकता है, इनका प्रतिनिधित्व सिर्फ अछूतों द्वारा ही किया जा सकता है. ये खास तौर से उनके अपने हित हैं और कोई भी दूसरा उनकी सचमुच पैरवी नहीं कर सकता...(बीएडब्ल्यूएस 1:256, रॉय 2014: 103 में उद्धृत.)

दूसरी तरफ गांधी उल्टी बात में यकीन रखते थे. वे अछूतों और मजदूर वर्ग के लोगों को ऐसे लोगों के रूप में देखते थे, जिन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व की नहीं बल्कि परोपकारी देखरेख की जरूरत थी. चाहे वह (कारखाना मालिकों की तरफ से) गांधी के नेतृत्व वाले मिल मजदूर संघों की बात हो, या फिर 1924 वायकोम सत्याग्रह की बात हो या गोलमेज सम्मेलन या हरिजन सेवक संघ की, उन्होंने बड़ी सावधानी से इसे यकीनी बनाया कि मजदूरों और अछूतों का प्रतिनिधित्व और उनके बारे में बातचीत विशेषाधिकार प्राप्त जातियों द्वारा ही की जाए, जिसमें भी वे खुद को ही तरजीह देते थे.

1931 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधी ने जोर डाला कि आंबेडकर को नहीं बल्कि खुद गांधी को भारत के अछूतों का वाजिब प्रतिनिधित्व करना चाहिए. उन्होंने आंबेडकर पर (जो भारत में एक अछूत के रूप में पले-बढ़े थे और उन्हें अपमान और सामाजिक अलगाव को जानने के लिए दूर दक्षिण अफ्रीका का सफर करने की जरूरत नहीं थी) ‘अपने [गांधी के] भारत को नहीं जानने’ का इल्जाम लगाया. गांधी इस पर राजी थे कि मुसलमान और सिखों के अलग निर्वाचक मंडल हो सकते हैं लेकिन, हालांकि उन्होंने छुआछूत की प्रथा को नकार दिया था (‘छुआछूत बने रहने से अच्छा है कि हिंदू धर्म खत्म हो जाए’), वे अलग निर्वाचक मंडल के लिए आंबेडकर के प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेंगे (देखें रॉय 2014: 124). राजमोहन गांधी मुझ पर तोहमत लगाते हैं कि गांधी इस विचार के मुखालिफ क्यों थे इसकी घोषित वजह को मैंने छोड़ दिया है:

सिख इसी रूप में हमेशा बने रह सकते हैं, मुहम्मडन भी, इसी तरह यूरोपीय लोग भी. क्या अछूत हमेशा अछूत बने रहेंगे? (सीडब्ल्यूएमजी 48:298).

लेकिन आंबेडकर ने अछूतों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग हमेशा के लिए नहीं की थी. उनकी दलील यह थी: चूंकि अछूत आबादी देश भर में हिंदू गांवों के बाहर छोटी बस्तियों में बिखरी हुई थी (और अब भी है), उन्होंने महसूस किया कि एक राजनीतिक चुनाव क्षेत्र के भौगोलिक दायरे में वे हमेशा ही एक अल्पसंख्यक बने रहेंगे और कभी भी अपनी पसंद के एक उम्मीदवार को चुनने की हैसियत में नहीं होंगे. इस वजह से वे यकीन करते थे कि अकेले सभी वयस्कों का मत डालने का अधिकार (सबसे ज्यादा वोट पाने वाले को विजेता घोषित करने की व्यवस्था) अछूतों के लिए बराबर अधिकारों को यकीनी नहीं बना सकता. उन्होंने सुझाव दिया कि अनेक सदियों से जिन अछूतों के साथ नफरत और उनकी बेकद्री की जाती रही है, उन्हें एक अलग निर्वाचक मंडल दिया जाए, ताकि वे हिंदू रूढ़िवाद की किसी दखलंदाजी के बिना, अपने खुद के नेतृत्व के साथ एक राजनीतिक जनाधार के रूप में विकसित हो सकें. और वे मुख्यधारा की राजनीति से अपना रिश्ता बनाए रख सकें, इसलिए इसके साथ ही उन्होंने सुझाया कि उन्हें आम उम्मीदवारों के लिए वोट डालने का अधिकार भी दिया जाए. अलग निर्वाचक मंडल और दोहरे वोटों की व्यवस्था दोनों को सिर्फ दस बरसों की मुद्दत तक ही चलना था (देखें रॉय 2014: 122).

एक बरस बाद, जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडॉनल्ड ने उनके प्रस्ताव को मंजूर कर लिया और अछूतों को 20 बरसों की मुद्दत के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल सौंपते हुए कम्युनल अवार्ड की घोषणा की तो गांधी इस प्रावधान को वापस लेने की मांग करते हुए येरवदा जेल में अपने ऐतिहासिक आमरण अनशन पर बैठ गए. आंबेडकर पीछे हटने को मजबूर कर दिए गए और आखिरकार 24 सितंबर 1932 को उन्होंने पूना समझौते पर दस्तखत कर दिए.

पूना समझौता

यह राजमोहन गांधी की आलोचना का शायद सबसे कमजोर हिस्सा है. बेशक वे खुद इस समझौते को मंजूरी देते हैं:
एक साझे निर्वाचक मंडल में दलितों समेत सभी जातियों के अच्छे लोग कभी कभी अपनी जाति से बाहर के वोटों से हारेंगे और कभी ‘बाहरी’ वोटों की बदौलत जीतेंगे.

यह राय गोलमेज सम्मेलन में आंबेडकर के प्रस्ताव के बारे में नादानी को और चुनावों में जाति के काम करने के तरीकों के प्रति नासमझी को उजागर करती है. मामलों को और बदतर बनाते हुए राजमोहन गांधी यह इशारा करते हैं कि आंबेडकर समझौते से खुश भी थे. वे कहते हैं:
आंबेडकर ने 1945 की अपनी हंगामाखेज किताब में न केवल समझौते की शर्तों की आलोचना करने से परहेज किया, बल्कि जहां तक मैं जान पाया हूं, उन्होंने तब या बाद में कभी उस समझौते को खारिज करने या बदलने की कोई कोशिश नहीं की. समझौते को एक ‘शिकस्त’ मानने के बजाए, ऐसा लगता है कि वो इसे एक ऐसी सुलह के रूप में देखते थे, जिसने दलितों समेत हरेक को फायदा पहुंचाया.

यह है वह बात, जो आंबेडकर ने अपने 1945 की ‘हंगामाखेज’ (अगर आप खोज रहे हों तो मालूम हो कि, अब यह एक अच्छी खूबियों वाला, एक हल्का दाग है) किताब में कही थी:

उपवास में कुछ भी नेक नहीं था. यह एक गंदी और गलीज हरकत थी...यह बेसहारा लोगों को प्रधानमंत्री के अवार्ड से हासिल संवैधानिक सुरक्षाओं को छोड़ देने के लिए मजबूर करने और हिंदू लोगों के रहमोकरम पर जीने के लिए राजी कर लेने का घटिया तरीका था. यह एक घिनौनी और दुष्टता भरी हरकत थी. अछूत एक ऐसे आदमी को कैसे ईमानदार और सच्चा मान सकते हैं?

राजमोहन गांधी आंबेडकर की 1945 की मशहूर किताब व्हाट द कांग्रेस एंड गांधी हैव डन दू अनटचेबल्स को गंभीरता से काटना जारी रखते हैं:

आंबेडकर के 1945 की किताब की उग्र भाषा का संदर्भ क्या था, जिसे उन्होंने नई दिल्ली में पृथ्वीराज रोड के अपने आधिकारिक निवास में बैठ कर लिखा था? उस वक्त वे वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य थे...1945 की किताब लिख रहा प्रतिभाशाली चिंतक और सदस्य (असल में मंत्री) वह इंसान भी था जो किसी भी नई ब्रिटिश योजना को प्रभावित करने की चाहत रखता था. साथ ही, वे एक ऐसे सियासी नेता थे जो 1937 के चुनावी नतीजों को भूल पाने में नाकाबिल थे...उन्होंने 1945-46 में बेहतर नतीजों की उम्मीद की थी. 1937 के नतीजों से दुखी आंबेडकर ने 1945 की किताब के जरिए, अपना पक्ष ब्रिटेन के नेताओं और साथ साथ भारत के मतदाताओं के सामने पेश किया.

तो राजमोहन गांधी के मुताबिक आंबेडकर के लेख का जो सीधा मतलब है, उसे वैसा नहीं लिया जाना चाहिए, क्योंकि वो चुनावों में जाने को तैयार एक राजनेता थे और क्योंकि वे ब्रिटिश सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे. तो क्या गांधी एक राजनेता नहीं थे? क्या वे सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश नहीं कर रहे थे? या फिर यहां, पुराने चलन के मुताबिक उन्हें जलील किया जा रहा है? छुपा हुआ इशारा यह है कि गांधी तो आजादी के लिए लड़ रहे थे और आंबेडकर एक ब्रिटिश पिट्ठू थे. शायद, सिर्फ दलील के इस सिलसिले को खत्म करने के लिए, हमें आंबेडकर के इन शब्दों की याद दिलाए जाने की जरूरत है:


इस तथ्य से खुश होना बेवकूफी है कि चूंकि कांग्रेस भारत की आजादी के लिए लड़ रही है, इसीलिए यह भारत के अवाम और सबसे दबे-कुचले इंसान की आजादी के लिए भी लड़ रही है. कांग्रेस आजादी के लिए लड़ रही है कि नहीं, यह सवाल इस सवाल के मुकाबले कम अहमियत रखता है कि कांग्रेस किसकी आजादी के लिए लड़ रही है? (बीएडब्ल्यूएस 9: 202, रॉय 2014: 43 में उद्धृत)

राजमोहन गांधी बिल्कुल सही हैं. आंबेडकर ने पूना समझौते को खारिज करने की न कोशिश की न खारिज करवाया. उन्होंने कुछ ऐसा किया जो कहीं ज्यादा गहरा असर डालने वाला था. पूना समझौते को अंजाम देने वाली घटनाओं के प्रति उनकी नफरत ने उन्हें इस बात का कायल बना दिया था कि जब तक अछूत ‘हिंदू पाले’ में बने रहेंगे, तब तक वे अपनी गुलामी की बेड़ियों को फेंक पाने के काबिल नहीं हो पाएंगे. इसलिए उन्होंने अपने लोगों से हिंदू धर्म को छोड़ने का आह्वान किया. 13 अक्तूबर 1935 को बंबई प्रेसिडेंसी (अब महाराष्ट्र) में येवला के डिप्रेस्ड क्लासेड कॉन्फ्रेंस में 10,000 से ज्यादा लोगों से मुखातिब आंबेडकर ने कहा:

चूंकि बदकिस्मती से हम खुद को हिंदू कहते हैं, इसलिए हमारे साथ उसी तरह से पेश भी आया जाता है. अगर हम किसी और आस्था [धर्म- अनु.] के सदस्य होते तो कोई भी हमारे साथ इस तरह पेश नहीं आया होता. आप कोई ऐसा धर्म चुन लीजिए जो आपको बराबरी का दर्जा दे और बराबरी से पेश आए. अब हम अपनी गलतियों को सुधार लेंगे. मेरी बदकिस्मती थी कि मैं अछूत होने के दाग के साथ पैदा हुआ. हालांकि यह मेरी गलती नहीं है; लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा, क्योंकि यह मेरे बूते में है.

अगले साल 1936 में उन्होंने एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट लिखी.
 

79 बरसों के बाद यह शर्मनाक है कि हम इस बहस को थोड़ा भी आगे बढ़ा पाने के काबिल नहीं हो पाए हैं. असल में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने वाली चुनावी व्यवस्था सबके लिए, और खास कर दलित समुदायों के लिए, लोकतंत्र का मजाक बना रही है.
 

राजमोहन गांधी इतिहास की धंसान में गहरे गोते लगाते हैं और फिर आजादी के बाद के भारत में नमूदार होते हैं:
कांशीराम द्वारा आंबेडकर की विरासत पर बनाई गई बहुजन समाज पार्टी ने हमारे सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में एक बार से ज्यादा सरकार का नेतृत्व किया है, जिसके बारे में कोई कह सकता है कि इसका श्रेय कुछ तो पूना समझौते और साझे निर्वाचक मंडल को जाता है.

यह ‘कोई’ वे ‘कौन लोग’ हैं जो यह ‘कह सकते हैं’? यकीनन कांशीराम यह नहीं कह सकते, जो हमेशा ही पूना समझौते के बाद के दौर को ‘चमचा युग’ कहते थे. 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना करने से पहले उन्होंने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का गठन किया था. 24 सितंबर 1982 को पूना समझौते की 50वीं सालगिरह पर उन्होंने समझौते को खारिज करने के लिए पूना से लेकर जालंधर तक गांवों और शहरों में एक साथ 60 सभाएं बुलाईं. इस समझौते का भारी उत्सव मनाने की योजना बना चुकी इंदिरा गांधी मंसूबे को रद्द करने पर मजबूर हुई थीं. अनेक दलित संगठनों ने 1932 के कम्युनल अवार्ड की बहाली की मांग की थी और अब भी कर रहे हैं. राजमोहन गांधी ने पूना समझौते को लेकर आंबेडकर की जिस खुशी की खोज की है, उसके बारे में उन्हें बसपा से या फिर तकरीबन किसी भी दलित राजनेता, बुद्धिजीवी या कार्यकर्ता से चर्चा करने के पर विचार करना चाहिए. (देखिए एस. आनंद, ‘ए नोट ऑन द पूना पैक्ट’, बी. आर. आंबेडकर, एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट, पृ. 359-72 में, नवयाना 2014.)

(जारी)

संदर्भ

3. यह आरजी (ईपीडब्ल्यू) का शीर्षक है. आरजी.कॉम पर इस हिस्से का शीर्षक है 'गांधी, अनटचेबिलिटी एंड कास्ट.' 

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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