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बीच सफ़हे की लड़ाई

फुले-आंबेडकर का महाराष्ट्र? - आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/21/2014 09:58:00 AM

आनंद तेलतुंबड़े

महाराष्ट्र फिर से अपने असली रंग में है. हाल के कुछ महीनों में जातीय उत्पीड़नों की एक लहर रही है, जिसने इसके अंधेरे अंतरतम को और फुले तथा आंबेडकर की विरासत के झूठे दावों को फिर से उजागर किया है. इस महान देश में दलितों पर अत्याचार वैसे कोई नई परिघटना नहीं है. इन सांख्यिकीय आंकड़ों का जाप भी अब उत्पीड़नों की बढ़ती घटनाओं को दर्शाने में नाकाफी साबित हो रहा है कि हर रोज दो दलितों की हत्या होती है और तीन दलित औरतों के साथ बलात्कार की घटना होती है. मिसाल के लिए, बलात्कार की दर का जब 2000 में हिसाब लगाया गया था, तब से यह करीब दोगुनी हो गई है. राष्ट्रीय अपराध रिसर्च ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2013 के ताजा आंकड़े दलितों के अपराधों की खिलाफ वास्तविक दर 1.85 हत्या प्रतिदिन और 5.68 बलात्कार प्रतिदिन है. उत्पीड़न की कुल संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है और अब यह 39,408 पर पहुंच गई है, जिसका मतलब है 108 जातीय अपराध रोज या 4.5 जातीय अपराध हर घंटे होते हैं. और ये पुलिस के आंकड़े हैं, वास्तविक आंकड़ों का अंदाजा कोई भी लगा सकता है.

इस रुझान में महाराष्ट्र का कोई छोटा मोटा योगदान नहीं रहा है जो अपने जोर-जबरदस्ती वाले और आंख मूंद लेने वाले चरित्र के साथ बेहतरीन भारत का प्रतिनिधि है. एक प्रगतिशील राज्य की अपनी छवि के उलट यह समझ में आनेवाले हर तरह के जातिवाद, सांप्रदायिकता, धार्मिक रूढ़िवाद और धर्मांधता के मामलों में लगभग अगली कतार में रहा है. इसका शासक कुलीन तबका अपनी इन सारी करतूतों को जोतिबा फुले और बाबासाहेब आंबेडकर की प्रगतिशील विरासत के आवरण में जनता से छुपाता आया है. लेकिन वक्त आ गया है कि इस आवरण को फाड़ दिया जाए और उस गौरवशाली विरासत को बर्बाद करनेवालों को बेनकाब और शर्मिंदा किया जाए.

खैरलांजी से खरडा तक

खैरलांजी में सितंबर 2006 में एक दलित परिवार के चार लोगों की क्रूर हत्या के खिलाफ राज्य भर में फूटे पड़े गुस्से से भी महाराष्ट्र में हालात नहीं बदले, जबकि इन हत्याओं ने राज्य को अंतर्रराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी की वजह बने थे. सिविल सोसायटी को छोड़ भी दें, तो न तो राज्य और कुछ अपवादों को छोड़ कर न ही मीडिया जातीय उत्पीड़नों पर अपने रवैए को लेकर किसी तरह के अफसोस की भावना को जाहिर किया है. मीडिया ने खैरलांजी के घिनौने जातीय अपराध को यह कह कर रफा-दफा करने की कोशिश की कि यह एक महिला द्वारा पड़ोस के एक व्यक्ति के साथ विवाहेतर संबंध को खत्म करने के बारे में गांववालों की बात सुनने से मना कर देने के बाद नैतिक रूप से विचलित गांववालों के गुस्से से उपजी दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी. लेकिन जब फिर भी सच्चाई छन कर बाहर आ गई और फौरी विरोध प्रदर्शनों की चिन्गारी फूट पड़ी तो राज्य अपने तत्कालीन गृह मंत्री की शक्ल में सामने आया, जिन्होंने इन प्रदर्शनों को नक्लसवादियों द्वारा समर्थित बता दिया और इस तरह पुलिस को अपना आतंक फैलाने की खुली छूट दे दी. हरेक जातीय उत्पीड़न को नकारने और इसके खिलाफ दलितों के विरोध को बदनाम करने के लिए राज्य और मीडिया दोनों ने ही मिल कर ‘प्रेम प्रसंग’ और ‘नक्सलवादी’ शब्दों का कुशलता से इस्तेमाल किया. यह तो राज्य के दलित नौजवान थे, जिन्होंने राज्य के इस पूर्वाग्रह और मीडिया के पक्षपात को चुनौती दी और अपनी जानकारी में आए हरेक उत्पीड़न के खिलाफ अपने संघर्ष को जारी रखा.

पिछले साल की शुरुआत कुख्यात सोनाई हत्याओं से हुई थी, जिनमें एक मराठा लड़की के साथ प्रेम करने के आरोप में तीन दलित नौजवानों की पीट पीट कर दी गई. पुलिस और मीडिया द्वारा इश मामले को सफलता ते साथ महीने भर से ज्यादा दबा कर रखा गया, जब तक कि दलित कार्यकर्ताओं ने उन्हें कार्रवाई करने पर मजबूर नहीं कर दिया. यह मामला अदालत में बिना किसी खास प्रगति के घिसट रहा है. इस साल लोकसभा चुनावों के ठीक बाद 16 मई 2014 को, भाजपा के समर्थन से गोंदिया जिले के कवलेवाड़ा गांव के पवारों ने मोदी लहर के अवतरित होने के जश्न में एक 48 वर्षीय दलित कार्यकर्ता संजय खोबरागढ़े को आग के हवाले कर दिया, जो बुद्ध विहार की जमीन को हड़पने की उनकी साजियों का विरोध कर रहे थे. 94 फीसदी जल चुके खोबरागढ़े ने छह व्यक्तियों को नामजद किया, जिनमें सभी पवार थे. उन्होंने अपना बयान दो बार अधिकारियों के सामने और साथ साथ पत्रकारों के सामने दोहराया, जो उनकी मृत्यु के बाद पुलिस के लिए नामजद व्यक्तियों पर आरोप लगाने के लिए मृत्यु ठीक पहले दिया गया बयान होना चाहिए था. हालांकि, पुलिस इंस्पेक्टर अनिल पाटिल ने फौरन ‘प्रेम प्रसंग’ वाली तरकीब अपनाई और उनकी अधेड़ पत्नी देवकीबाई और उनके पड़ोसी राजू गडपायले को गिरफ्तार कर लिया. इसके लिए उन्होंने एक कहानी गढ़ ली कि उन्होंने खोबरागढ़े को हटाने के लिए साजिश रची थी, जिन्होंने उन दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देखा था. पवारों पर उत्पीड़न अधिनियम और भारतीय दंड विधान (आईपीसी) की धारा 310 और 307 लगाई गई और उन्हें जल्दी ही छोड़ दिया गया. पूरा गांव और दलित कार्यकर्ता पुलिस की इस मनगढ़ंत कहानी से हक्का बक्का थे, लेकिन वे देवकीबाई और गडपायले को पुलिस की यातना और बदनामी से बचा नहीं पाए – संजय की मौत से उन्हें पहुंचे सदमे की तो बात ही अलग है.

कुछ दिन पहले 28 अप्रैल को अहमदनगर जिले के जमखेड तालुका के खरडा गांव के एक गरीब दलित मजदूर दंपती के 17 साल के इकलौते बच्चे नितिन आगे को गांव के कुछ मराठे उसे उसके स्कूल से घसीट कर ले आए  और दिन दहाड़े बुरी तरह यातना देकर उसकी हत्या कर दी. नितिन का गुनाह बस उनके परिवार की एक लड़की से बात करना था. इस हत्या ने दलित नौजवानों के एक फौरी विरोध प्रदर्शन को जन्म दिया, लेकिन तब भी वे अपराधियों को जेल में नहीं रख सके.

क्रूरता के कीर्तिमान

20 अक्तूबर को अहमदनगर जिले में ही जवखेडे (खालसा) गांव में सोनाई से लगभग मिलती जुलती घटना दोहराई गई. खैरलांजी की तरह ही इस गांव को भी महाराष्ट्र सरकार का ‘टंटा मुक्त गांव’ (विवादमुक्त गांव) का पुरस्कार मिला हुआ है, जो दलितों के जले पर नमक छिड़कने जैसा है, क्योंकि इसमें खदबदाते जातीय तनाव को नजरअंदाज कर दिया गया है और दलितों को यह संकेत देता है कि बेहतर होगा कि वे जातीय व्यवस्था को चुपचाप कबूल कर लें. एक दलित परिवार के तीन सदस्यों, संजय जगन्नाथ जाधव (42), उनकी पत्नी जयश्री (38) और उनके इकलौते बेटे सुनील (19) को उनके खेत में हत्या कर दी गई, जहां फसल की कटाई के लिए वे अस्थाई रूप से डेरा डाल कर रह रहे थे. पुरुषों की लाश को टुकड़ों में काट कर पास के एक बेकार पड़े कुएं में फेंक दिया गया था, और बाकियों को बोरवेल के गड्ढे में फेंक दिया गया था. जयश्री की साबुत लाश को कुएं से बरामद किया गया, जिनके सिर में गहरी चोट थी. सुनील मुंबई के गोरेगांव स्थित डेयरी साइंस इंस्टीट्यूट में दूसरे साल का छात्र था और दीवाली की छुट्टियों में घर आया था. दलित अत्याचार क्रुति समिति के मुताबिक, जिसने अपनी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट प्रकाशित की है, संजय के भाई ने फौरन पुलिस के यहां मराठा वाघ परिवार के कुछ सदस्यों को नामजद किया था, लेकिन दलितों द्वारा अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन के बावजूद पुलिस जानबूझ कर अनजान बनी रही और तफ्तीश के नाम पर उल्टे गांव वालों और संजय के दोस्तों को ही परेशान करती रही. पुलिस के इस रवैए के विरोध में गांव वालों को गैर मामूली तौर पर बंद बुलाना पड़ा. वाघ परिवार हाल ही में भाजपा की विधायक चुनी गईं मोनिका राजाले के तथा दूसरे ताकतवर नेताओं के रिश्तेदार हैं इसलिए पुलिस दिग्भ्रमित होने का दिखावा कर रही है. यहां भी इस पूरे मामले को इस रंग में रंगा जा रहा है कि यह सुनील के वाघ परिवार की एक महिला से संबंध होने के नतीजे में हुई घटना है और विरोध में चलाए जा रहे प्रदर्शन नक्सलियों द्वारा समर्थित हैं. वजह चाहे जो भी हो, इसकी जड़ में सुनील के आत्मविश्वास से भरा कदम था, जिसे गांव के लोगों ने बड़ी आसानी से जातीय आचारों को चुनौती दिए जाने के रूप में लिया.

‘प्रेम प्रसंग’ का यह टैग पुलिस के बड़े काम की चीज साबित होती है, जिसकी मदद से वह दलितों को एक ऐसे दुस्साहसी तबके के रूप में पेश करती है, जो ऊंची जातियों की औरतों का पीछा करते हैं और ऐसा करते हुए पुलिस बहुसंख्यक समुदाय में जातीय उत्पीड़न के अपराधियों के लिए हमदर्दी जुटा देती है. पुलिस और साथ साथ समाज इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते हैं कि प्रेम करना अपराध नहीं है और अगर कोई इसके लिए किसी को सजा देता है तो प्रेम का मामला होने के कारण अपराधी के अपराध की गंभीरता कम नहीं हो जाती. दिलचस्प बात ये है कि पुलिस ने उत्पीड़न अधिनियम के तहत गुमनाम लोगों पर अपराध का मामला दर्ज किया है, यह नादानी की एक और मिसाल है क्योंकि उत्पीड़न अधिनियम गुमनाम लोगों पर इसलिए लागू नहीं होता कि खुद ब खुद यह नहीं मान लिया जा सकता है कि वे गैर एससी/एसटी होंगे. जिस दिन जवखेड़े के जाधवों की लाशें कुएं में पाई गईं, उसी दिन यानी 21 अक्तूबर को इसी अहमदनगर जिले के परनेर तालुका के अलकोटी गांव में ग्राम पंचायत के दफ्तर में गांववालों द्वारा चार पारधी आदिवासियों को पत्थरों से बुरी तरह पीटा गया. उन पर चोरी का संदेह था. दो भाई राहुल पुंज्य चवन और पिकेश पुंज्य चवन जख्मों के कारण दम तोड़ दिया और दो गंभीर हालात में अस्पताल में हैं. पिछले साल ऐसी 113 घटनाएं इस अकेले जिले में दर्ज की गई हैं. इस साल अक्तूबर तक उत्पीड़न के 74 मामले दर्ज किए गए हैं. इनमें से बस कुछ ही रोशनी में आ सकीं, जैसे कि पूर्व मंत्री बबनराव पाचपुते के रिश्तेदारों द्वारा प्रेम प्रसंग के आरोप में एक मूक और बधिर भूमिहीन परिवार के एक दलित नौजवान आबा काले की पिटाई किए जाने की घटना; दो दलितों बबन मिसाल और जनाबाई बोरगे को जिंदा जलाए जाने की घटना; करजट तालुका में दीपक कांबले की भारी पिटाई की घटना; एक खानाबदोश कबीले की एक युवती सुमन काले के क्रूर बलात्कार और हत्या की घटना; और शेवगांव तालुका के पैथन गांव में एक दलित नौजवान के टुकड़े टुकड़े कर दिए जाने की घटना. इनमें से किसी भी मामले में अपराधियों को सजा देना तो दूर, उन्हें गिरफ्तार तक नहीं किया गया. इसने जातीय तत्वों को मजबूत ही किया है, कि वे दलितों की सांस्कृतिक दावेदारी को क्रूर ताकत के साथ कुचल दें.

ब्राह्मणवाद की लानत

जब भी कोई उत्पीड़न की घटना होती है, हर बार महाराष्ट्र के कुलीन लोग बेशर्मी से फुले-आंबेडकर की विरासत का मातम मनाने लगते हैं. असल में, जैसा कि नीचे दी गई तालिका से जाहिर होता है, हाल के वर्षों में हत्या और बलात्कार की घटनाओं के मामले में राज्य लगातार भारत के 28 राज्यों में ऊपर के पांच या छह राज्यों में से एक रहा है. दलितों के खिलाफ अपराधों में इसका खासा मजबूत योगदान रहा है और हाल के बरसों में यह बढ़ता गया है.

महाराष्ट्र इस मायने में सबसे अलग था कि यहां आधुनिक समय में पेशवाओं का प्रतिक्रियावादी ब्राह्मण शासन था. जब इसे महार फौजियों की बहुसंख्या वाली ब्रिटिश फौज ने 1818 में हरा दिया, तो पुणे के ब्राह्मणों ने उपनिवेश-विरोधी देशभक्त होने का दिखावा करते हुए ब्रिटिशों के खिलाफ हथियार उठा लिए लेकिन वे असल में अपना खोया हुआ राज वापस पाना चाहते थे. हिंदू आंदोलन जहां भी पैदा हुआ हो, लेकिन यह महाराष्ट्र ही था, जहां उसे नेतृत्व हासिल हुआ. यहीं पर हिंदुत्व की विचारधारा और इसका फासीवादी झंडावाहक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने जन्म लिया. यहां तक कि कम्युनिस्ट और समाजवादी समेत दूसरे आंदोलन भी ब्राह्मणवादी वर्चस्व से बच नहीं सके; उनके अगुवा नेताओं ने वेदों में कम्युनिज्म की खोज कर डाली. महाराष्ट्र नाथूराम गोडसे, भारी प्रतिक्रियावादी बाल ठाकरे, अभिनव भारत के खुफिया आतंकवादियों और शाहिद आजमी तथा नरेंद्र दाभोलकर के हत्यारों की जमीन रहा है. आज ब्राह्मणवाद की मशाल नव धनाढ्य लेकिन असभ्य शूद्रों के हाथ में है. उभरता हुआ हिंदुत्व राज्य में दलितों के बुरे दिनों के साफ संकेत दे रहा है.

अगर आप कुछ और नहीं कर सकते तो कम से इस खदबदाती हुई जातीय कहाड़ी से फुले और आंडेबकर को तो बख्श ही दीजिए.


(अनुवाद- रेयाज उल हक. समयांतर के दिसंबर 2014 अंक में प्रकाशित.)

कश्मीर में चुनाव: बुलेट, बैलेट और पत्थर

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/25/2014 05:50:00 PM


कश्मीर में 'चुनाव' हो रहे हैं. कश्मीर के लिए और भारत के लिए, कश्मीर में होने वाले चुनावों की विडंबना के बारे में बता रहे हैं जानेमाने फिल्मकार संजय काक. अनु.: जितेंद्र कुमार. यह लेख पहले कारवां पत्रिका में अंग्रेजी में और फिर हिंदी में समयांतर के नवंबर अंक में प्रकाशित हुआ है.

अप्रैल की वह सुबह

वसंत के समय में धुंध बेमौसम थी और श्रीनगर के दक्षिण से जाने वाले राजमार्ग में साफ नजर नहीं आ रहा था। आवाजाही बहुत कम थी और सिर्फ वर्दीधारियों के लिए ही सुबह-सुबह की धुंध में चलना-फिरना संभव हो पा रहा था। खाकी, जैतूनी हरे और कैमोफ्लाज्ड सलेटी रंग की विचित्र वर्दी में, हथियारों से लैस पुलिस, अर्धसैनिक बल और सैन्यकर्मियों के समूह हर जगह मौजूद थे। कश्मीर घाटी में इनकी उपस्थिति सामान्य बात है, जहां पांच लाख से भी ज्यादा भारतीय सैनिकों की तैनाती के कारण यह दुनिया का सबसे सघन सैन्यीकृत क्षेत्र बन गया है।

लेकिन अप्रैल की वह सुबह कोई सामान्य नहीं थी। वह अनंतनाग में, जिसमें कश्मीर के दक्षिण का ग्रामीण क्षेत्र आता है, मतदान का दिन था। घाटी की तीन सीटों में से यह पहली थी जिसमें हाल में ही संम्पन्न हुए भारतीय लोकसभा के चुनावों के लिए वोट देने जा रहे थे। अन्य क्षेत्रों का नंबर हफ्ते भर के अंतराल के बाद आने वाला था। संभवत: हर संसदीय क्षेत्र में सुरक्षा कवच फिर से चाक चौबंद करने के लिए इतना समय लगता है अन्यथा जिसके बिना चुनाव संपन्न कराना असंभव था। (जिस दिन 13 लाख पंजीकृत वोटरों वाले अनंतनाग में चुनाव हुए उसी एक दिन तमिलनाडु के 39 संसदीय क्षेत्र में 5 करोड़ 54 लाख मतदाताओं ने अपने वोट डाले थे।)

कश्मीरी जानते हैं कि संसद के जिन सदस्यों को उन्हें वोट डालने के लिए कहा गया है उनका मसला-ए-कश्मीर से कोई संबंध नहीं है। आत्मनिर्णय का यह केंद्रीय सवाल सबसे प्रमुख राजनीतिक मुद्दा है, जो पिछले साठ साल से भी ज्यादा समय से इस क्षेत्र को मथता रहा है। ना ही उनके सांसद सड़क, स्कूल, अस्पताल, यहां तक कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण पड़ोस के बिजली के ट्रासंफार्मर तक की सुविधा उपलब्ध करवाने में कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ये सब राज्य सरकार के अधीन आते हैं और विधानसभा का चुनाव इसी महीने नवंबर के अंत में ही है। शायद यही कारण था कि कहीं भी पोस्टर, बैनर, झंडे या पताके नहीं लगे थे जो आप को बता सकें कि आज चुनाव है। जो समझाना ज्यादा मुश्किल था वह था खाली सड़कें, रास्ते की बंद पड़ी दुकानें और हवा में तैरती एक अस्पष्ट-सी अनिश्चितता।

जिन रिपोर्टरों के साथ मैं घूम रहा था, वे अवंतिपुरा कस्बे में रुककर एक पोलिंग बूथ के बाहर कुछ फोटोग्राफरों से, जो वहां मतदाताओं के फोटो खींचने का इंतजार कर रहे थे, जानकारियों का आदान-प्रदान करने लगे। सवेरे-सवेरे वहां मतदाताओं से अधिक फोटोग्राफर नजर आ रहे थे। इस लोकसभा क्षेत्र में मतदाताओं में उत्साह की सतत कमी का रिकार्ड रहा है: 2009 में हुए पिछले आम चुनावों में अनंतनाग में 27 फीसदी मतदान हुआ था, इसका मतलब यह हुआ कि 73 फीसदी मतदाताओं ने मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया। यह प्रतिशत 2004 से बेहतर था जब 84 फीसदी मतदाता वोट डालने नहीं आए थे और इससे भी पहले 1999 के चुनाव में दस में से केवल एक व्यक्ति ने ही वोट डाला था। सवाल था आज कितने लोग वोट डालने आएंगे?

अवंतिपुरा में मतदाताओं से पहले अफवाहें पहुंच गई थीं। सुरक्षा बलों की तत्परता के बावजूद कहा जा रहा था कि नजदीक के ही त्राल के बस अड्डे के नजदीक हथियार से लैस मिलिटेंटों ने मतदान के बहिष्कार के पोस्टर लगा दिए हैं। मुंढ़ासा बांधे मिलिटेंटों ने संक्षिप्त भाषण सा दिया और लोगों को मतदान प्रक्रिया में सहयोग करने पर धमकी भी दी थी। अपना काम करने के बाद, हथियारों को छिपाए मिलिटेंट तिरोहित होकर भीड़ में गायब हो गए थे।

एक दूसरी अफवाह यह भी थी कि किसी सरपंच की, गला रेतकर हत्या कर दी गई है, जो गलत निकली। लेकिन उस हफ्ते काफी कुछ ऐसा घटा था जिसने लोगों को हिलाए रखा। तीन दिन पहले 21 अप्रैल की रात को बटागुंड गांव के सरपंच और उसके बेटे, जब वे रात के खाने के इंतजार में थे, दोनों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उसी रात, पड़ोस के गांव-अमलार में ग्रामीण स्तर के एक दूसरे कार्यकर्ता को, जब वह अंधेरे में मस्जिद से अंतिम नमाज पढ़कर वापस अपने घर आ रहा था, गोली मार दी गई थी। इसी तरह 17 अप्रैल को देर रात गुलजारपुरा के सरपंच को उसके घर से खींचकर नजदीक से गोली मार दी गई थी। किसी संगठन ने इन हत्याओं की जिम्मेदारी नहीं ली थी इसलिए ये हत्यारे सरकारी रिकार्ड में 'अज्ञात बंदूकधारियों’ के नाम से दर्ज हो गए थे।

देर से निकले सूर्य ने जब कोहरे को भेदा हम त्राल के लिए निकल पड़े थे, इस उम्मीद में कि वहां जमकर तनाव होगा। हमें अफगान बाजार की गलियां और वहां से आगे त्राल के मुस्लिम तालीम-उल इस्लाम हाईस्कूल तक, जहां त्राल 56-सी नाम का मतदान केंद्र था, असामान्य रूप से सुनसान नजर आया। वहां संभावित 1066 मतदाताओं में से एक ने भी सुबह से अब तक वोट नहीं डाला था। दरवाजे पर खड़े सुरक्षा कवचों से लैस केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक जवान ने बताया कि अभी तक इस बूथ पर किसी राजनीतिक दल का एक भी पोलिंग एजेंट नहीं आया है। पिछले पांच घंटे में एक भी वोटर वोट डालने नहीं आया था, वोट डालने की तो छोडि़ए कोई व्यक्ति उत्सुकतावस भी यहां झांकने नहीं आया। नलके से अपनी पानी की बोतल को भरते हुए एक मूछों वाले सार्जेन्ट ने बताया, 'वैसे हमने कई चुनाव करवाए हैं, लेकिन यहां का माहौल तो...’ कहते-कहते वह रूका और बोला, 'अगर यहां के बाशिंदों की चले तो वे इन नलों का पानी आना भी बंद कर दें।’
 

बदहाल बिजली कार्यालय के बगल के बूथ त्राल 57-डी का हाल भी कुछ बेहतर नहीं था: 1108 मतदाताओं में से एक वोटर ने वहां अपना वोट डाला था। गवर्मेंट गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल में स्थित त्राल के बूथ 51-ए में एक वोट पड़ा था और वह भी एक पूर्व विधायक का था। इस बूथ से भी पोलिंग एजेंट गायब थे। चूंकि चुनाव आयोग ने बूथों पर वेबकैम और हाई स्पीड इंटरनेट डोंगल लगवा रखे थे इसलिए शायद वहां से काफी दूर और सुरक्षित किसी व्यक्ति ने उन दो मतदाताओं पर नजर रखी हुई थी जो अब तक त्राल 53-सी के बूथ पर पहुंचे, त्राल 54-ए में एक व्यक्ति (वे भी एक पूर्व मंत्री थे) ने वोट डाला था, जबकि त्राल 55-बी पर कोई वोट ही नहीं पड़ा था।
 

मैं ज्योंही सरकारी मिडिल स्कूल में बने त्राल 58-ई के आंगन में खड़ा हुआ, मेरे पैर के नजदीक एक पत्थर आ गिरा और इसके बाद तो एक के बाद एक कई पत्थर गिरे। यह धुंआधार पत्थरबाजी का शुरुआती नमूना था जिसे कश्मीर की गलियों में 'कनी-जंग’ कहा जाता है। स्कूल के बरामदे में आड़ लिए सीआरपीएफ के जवान ने मुझे अंदर आने का इशारा किया। अंदर बुलाना नियमों के खिलाफ था: प्रवेश के लिए चुनाव आयोग की सहमति जरूरी थी। चूंकि हर पत्थर नुकीला और मुठ्ठी के बराबर था संभवत: जवान नहीं चाहता था कि उसकी निगरानी के दौरान कुछ अवांछित घटे।

स्कूल के गलियारे की दीवार पर लिखा है, 'कानून से ज्यादा जरूरी शिष्टाचार है’ और उस सूत्र वाक्य के नीचे हाथ से स्पष्ट बड़े अक्षरों में लिखा था—'एडमंड बर्क।’

स्कूल के भीतर मौजूद चुनाव अधिकारी अब्दुल रशीद शाह ने हमलोगों को बताया कि सारी रात यही होता रहा। वह अपने चुनावी कर्मचारियों—जो ज्यादातर शिक्षक और निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी थे—को सुरक्षित रखने की चिंता में पीला पड़ गये थे। वह विशेषकर अपनी साथी दो महिला कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर ज्यादा चिंतित थे, जो खिड़कियों से दूर लाल प्लास्टिक की कुर्सी पर उकड़ु बैठी हुई थीं। उनमें से एक महिला पूरा हिजाब पहनी हुई थी। उन काली सलवटों में सिर्फ उसके हाथ दिखाई पड़ रहे थे। जो उसकी गोद में तनाव से जकड़े हुए पड़े थे।

बाहर सूरज की रौशनी से चमकती पतली गली में नजारा कुछ और ही था। युवाओं का एक झुंड कहीं से जमा हो गया था और यह जानने के लिए उतावला था कि अब तक क्या हुआ है। हम उन्हें बता सके कि 58-ई बूथ में अब तक 1078 मतदाताओं में से एक ने भी वोट नहीं डाला है। खुशी की एक लहर दौड़ी और एक ऐसा नारा गूंजा जिसका स्वर उस सप्ताह लगातार बढ़ता गया: 'बायकाट, बॉयकाट, चुनाव बॉयकाट! नो इलेक्शन, नो सेलेक्शन—बॉयकाट, बॉयकाट।’ कटी गरदनों का पैगाम—चुनावों का बॉयकाट। लूटी अस्मतों का पैगाम, उजड़ी बस्तियों का पैगाम—चुनाव बॉयकाट।

एक नवयुवक ने मेरी बाजू पकड़ कर कहा, 'वहां हम आपको पत्थर नहीं मार रहे थे। वह तो सिर्फ मीडिया के सामने एक बानगी थी सबको बताने के लिए की यहां वास्तव में तनाव है। यहां किसी का भी वोट डालने का इरादा नहीं है।’ कुछ लोग हमारी कार की तरफ आ आए और विनम्रता से लेकिन दृढ़ता से उन्होंने प्रेस की सतत असफलता के लिए हमें लताड़ा। उनमें से कइयों ने मोबाइल फोन पर हमारी तस्वीरें भी खींची। सनद के लिए और इस बात का स्मरण कराने के लिए कि हम अपना कर्तव्य न भूलें और सच बताएं कि: त्राल के लोगों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।

अगले हफ्ते श्रीनगर में होने वाले चुनाव के लिए यह शुभ संकेत नहीं था। दक्षिणी कश्मीर के इलाकों में युवाओं ने प्रदर्शन करके मतदान की प्रक्रिया को पूरी तरह पंगु बना दिया था और चुनाव कराने के लिए आने वाले अधिकारियों की सैकड़ों बसों में से कई पर हमले किए गए थे। हर दौर में होने वाले लगभग हजार मतदान बूथों पर अधिकारियों की लगभग फौज तैनात थी, जिसके निरीक्षण के लिए विस्तृत नौकरशाही तैनात थी जो ज्यादा निकट से चीजों पर नजर रखे थी। इनमें क्षेत्रीय मजिस्ट्रेट, ड्यूटी मजिस्ट्रेट, निर्वाचन अधिकारी और प्रिसाइडिंग ऑफिसर थे। हर बूथ पर पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध था—दो हथियारबंद पुलिसवाले और साथ में सीआरपीएफ के छह जवान—लेकिन विशेषकर घर से कर्मचारियों को लाना मुश्किल भरा काम था।

शाम होते-होते यह खबर मिली कि एक बस जिस में चुनाव अधिकारी आ रहे थे उस पर संभावित मिलिटेंटों ने गोलीबारी की है। पांच अधिकारी इस हमले में घायल हुए हैं और चुनाव ड्यूटी पर लगे शिक्षक जिया-उल हक मारे गए हैं। देर रात खबर मिली कि कुल 28 फीसदी मतदान हुआ है। राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी ने प्रेस को बताया, 'यह 2009 के 27 फीसदी की तुलना में थोड़ा ज्यादा है।’ कुछ जगहों में लोग अड़े रहे थे: पुलवामा में 6.3 फीसदी मतदान हुआ था। सुबह जो नौजवान मिले थे वह सही थे। त्राल में मतदान नहीं हुआ। वहां सिर्फ 1.3 फीसदी ही मत पड़े थे।

एक अनाम देश की अनाम राजधानी में मतदान के दिन भयावह वर्षा हुई। जब मतपत्रों की गिनती हुई तो इनमें तीन चौथाई कोरे थे। फिर से एक हफ्ते के भीतर पुन: चुनावों की घोषणा हुई। इस बार मौसम शानदार था, लेकिन परिणाम पिछली बार से और बुरा : 83 फीसदी लोगों ने मतदान पत्र को खाली छोड़ दिया था। किसी तरह का कोई विरोध नहीं था—बस मतपत्रों में स्पष्टता थी। इस चुप्पी से भड़क कर सत्तारूढ़ पार्टी ने आपातकाल लागू कर दिया। गुप्तचरों को जनता के पीछे लगा दिया गया, पूछताछ के आदेश दे दिए गए और एक घेराबंदी शुरू हो गई। जब इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला, तो प्रधानमंत्री ने लोगों को खुद अपने भाग्य पर छोड़ दिया। रीढ़हीन मीडिया अराजकता और विनाश की भविष्यवाणी कर रहा है, लेकिन उसकी बातें गलत साबित हो रही हैं। जीवन अभी भी शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से चल रहा है। पुर्तगाल के उपन्यासकार जोसे सारामागो का 'एनसायो सोबरे ए लुसिडेस’ (स्पष्टता पर एक निबंध) शीर्षक उपन्यास की यह कथा है।

घाटी के अपने ही किस्से-कहानियां हैं। 1950 के दशक के जम्मू-कश्मीर रियासत के प्रधानमंत्री गुलाम मोहम्मद के बारे में एक सुपरिचित किस्सा इस तरह शुरू होता है, कि किसी ने पूछा कि 'कश्मीर में कितने लोग आपके साथ हैं, बक्शी साहिब?’ बक्शी साहिब ने बिना किसी झिझक के जवाब दिया—'चालीस लाख।’ उस समय की कश्मीर घाटी की पूरी आबादी। 'फिर शेख साहिब के साथ कितने लोग हैं?’ 'चालीस लाख’, त्वरित उत्तर था। यह शेख साहिब के बारे में था, जिन्हें चुनाव जीतने के बाद 1951 में राज्य का प्रधान मंत्री बनने के लगभग एक साल बाद बक्शी गुलाम मोहम्मद की मदद से भारत सरकार ने सत्ता से बेदखल कर जेल में डाल दिया था। 'तब सादिक साहब के साथ कितने कश्मीरी हैं?’ जी.एम. सादिक भारत सरकार के स्नेहाकांक्षियों में बक्शी के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी थे। बक्शी ने बड़ी सहजता से जवाब दिया- 'चालीस लाख।’

जब यह कहानी कश्मीर पहुंचने वाले किसी आगतुंक को सुनाई जाती है तो इसका अंत सामान्यत: एक मुस्कराहट से होता है जो कश्मीरी जनता की ढुलमुल वफादारी पर एक अमूर्त-सी अभिव्यक्ति कही जा सकती है। इसका अर्थ यह होता है कि यहां सभी लोग सब के साथ हो लेते हैं, जो सबसे शक्तिशाली लगता है उसको सलाम करते हैं। जी-हजूरी के मौन स्वीकार का यह परिहासजनक चित्रण कश्मीर में पिछले साठ साल के राजनीतिक संघर्ष के साथ तालमेल नहीं खाता है—और खासकर पिछली एक चौथाई सदी में, जिसने एक सशस्त्र विरोध और लगभग 75 हजार कश्मीरियों की हत्या देखी है।

भारत में राजनेताओं ने चुनावों का इस हद तक महिमा मंडन किया हुआ है कि उसे लोकतंत्र की मात्र एक प्रक्रिया न मानकर इसे उसका मर्म, उसका सिद्धांत और अक्सर मानदंड ही मान लिया है। दावा किया जाता है कि ये दुनिया के सबसे विविध और रंगारंग चुनाव हैं, इसलिए यह अनिवार्य रूप से सफल लोकतंत्र है। कश्मीर में यह दावा पूरी तरह खोखला साबित हो जाता है। पिछले 25 वर्षों में कश्मीरियों ने लोकतंत्र के हर आधारभूत लक्षण पर हमला होते देखा है: हिंसा, उत्पीड़न और गैरकानूनी हिरासत से रक्षा, अभिव्यक्ति की आजादी, इकट्ठा होने और आने-जाने की आजादी; और सबसे खतरनाक रूप से सार्वजनिक 'जगहों’, जल और जमीन पर नियंत्रण। कानून का शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, नागरिक नेतृत्व की सर्वोच्चता—जैसे-जैसे हर सुरक्षा गायब होती गई है, चुनावों को हर चीज का विकल्प बना दिया गया है।

कश्मीर के पिछले विधानसभा चुनाव दिसंबर 2008 में हुए थे (जम्मू और कश्मीर की विधानसभा का चुनाव छह साल के चक्र में होता है)। वह एक ऐसे निर्णायक साल के अंत में हुए जिसने एक जबर्दस्त जन उभार देखा। यह ज्यादातर श्रीनगर में केंद्रित था, जहां विशाल प्रदर्शन हुए जिनमें कई बार हजारों लोग शामिल होकर मार्च करते थे। ऐसे ही सामान्य विरोधों से शुरू होकर ये प्रदर्शन कश्मीर के समकालीन इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण क्षण बन गए। लेकिन दिसबंर 2008 में जब मतपत्रों की गिनती हुई तो घाटी में अप्रत्याशित रूप से 45.68 फीसदी लोगों ने वोट दिया था। उस अकेली संख्या ऐसा महत्वपूर्ण मानक बनी कि भारतीय टेलीविजन नेटवर्कों ने अतिशयोक्तिपूर्ण घोषणाएं शुरू कर दीं। एक एंकर ने इसे 'लोकतंत्र की जीत बताया।’ दूसरे ने विरोधाभासी तरीके से इसे 'भारतीय जनता की जीत बता दिया।’ तीसरे ने कहा, अंधकार भरे युग का अंत हो गया है, 'यह अलगाववाद का खात्मा है।’

आने वाले नवबंर-दिसंबर के महीने में ही कश्मीर में चुनाव होने हैं जिसमें नए विधायकों को चुन कर विधान सभा में भेजा जाएगा। कुछ कश्मीरी अपनी इच्छा से वोट डालेंगे तो कुछ इसलिए वोट डालेंगे क्योंकि उन्हें इसके लिए फुसलाया जाएगा या फिर चुपचाप दबाव से काम लिया जाएगा। कुछ लोग इस आशा में भी ऐसा करेंगे कि उनके प्रतिनिधि उन्हें सरकारी सहायता दिलाने में मदद करेंगे और दुर्लभ संसाधनों तक उनकी पहुंच करवाएंगे। इनसे भी कहीं ज्यादा लोग चुनाव का बहिष्कार करेंगे या डर के कारण इस प्रक्रिया से दूर रहेंगे। और कई हजार, जिनमें अधिकतर युवा होंगे, सुरक्षित चुनाव के लिए बड़े पैमाने पर तैनात किए गए अर्धसैनिक बलों से टकराएंगे। यह भी तय है कि कुछ लोग मारे भी जाएंगे। बहुत सारे घायल होंगे, कुछ अपंग होंगे या अपनी आंखें गवाएंगे। लेकिन जिसे सबसे ज्यादा तवज्जो दी जाएगी, जिसे सजाया जाएगा और जिसका प्रचार-प्रसार होगा- वह यह होगा कि कितने लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया। क्योंकि यही लोकतांत्रिक उपलब्धि का सबसे बड़ा पैमाना जो है।

एक चुनाव मीटिंग की दास्तान

अनंतनाग में वोटिंग के अगले दिन हम श्रीनगर के बाहरी क्षेत्र में स्थित बडगाम गए, एक चुनाव प्रचार मीटिंग के लिए। यह जिला श्रीनगर संसदीय क्षेत्र में ही है, लेकिन इसका ज्यादातर इलाका महानगर से काफी दूर है लेकिन ग्रामीण है। जिन गांवों और बस्तियों से हम गुजरे उनमें चुनाव प्रचार का किसी तरह का कोई निशान नहीं था। केवल तब जब हमने सैनिकों की तैनाती वाले कई सुरक्षा नाकों को पार किया हम जान पाए कि हम वतरहल गांव की राह पर सही जा रहे हैं जहां नेशनल कांफ्रेंस की रैली होने वाली थी। श्रीनगर सीट से फारुक अब्दुल्ला पार्टी के उम्मीदवार थे। फारुक शेख अब्दुल्ला के पुत्र और अपने पिता की तरह ही राज्य के मुखिया भी रह चुके हैं। फारुक अब्दुल्ला अपने बेटे और राजनीतिक वारिस उमर अब्दुल्ला के साथ रैली को संबोधित करने वाले थे। उमर अब्दुल्ला भी अपने पिता और दादा की तरह पिछले छह साल से जम्मू- कश्मीर के मुख्यमंत्री हैं।

जब हम पहुंचे तो वतरहल के जीर्ण-शीर्ण रास्ते हथियारबंद पुलिसवालों, पैरामिलिट्री के जवानों, सादे कपड़ों में सुरक्षाकर्मियों और दर्जनों एसयूवी गाड़ियों से अटे पड़े थे। दोनों अब्दुल्ला साहेबान को सबसे आला दर्जे की 'जेड प्लस’ की सुरक्षा हासिल है। बाप-बेटे की हिफाजत में तैनात स्पेशल सिक्योरिटी ग्रुप ने रैली के लिए जिस स्थान को मंजूरी दी थी वह सूफी संत सैयद हुसैन बुखारी के मजार और भव्य जामिया मस्जिद इफरान-उल-हक की इमारत के ठीक बीच में था। जुमे का दिन था, लिहाजा दोपहर की नमाज के बाद मस्जिद से निकलते हुए लोगों को आसानी से सुरक्षाकर्मियों की तय की गई जगह पर घेर लिया गया। नमाज के तुरंत बाद मंच से कुरान का पाठ विशिष्ट कश्मीरी शैली में किए जा रहे नाते शरीफ इबादत से राजनीति की ओर के संक्रमण को आसान कर रहा था।

पिता-पुत्र अब्दुल्ला जैसे ही मंत्रियों, समर्थकों और सुरक्षाकर्मियों के ताम-झाम के साथ स्टेज पर पहुंचे, कंधों पर नेशनल क्रांफ्रेंस का लाल झंडा ओढ़े एक नौजवान ने अगली कतार से चिल्लाना शुरू कर दिया—'देखो-देखो ! कौन आया?’ जवाब भीड़ की ओर से मिला 'शेर आया,शेर आया!’ खुशामदी का ये नारा पहली दफा तकरीबन सत्तर साल पहले शेख अब्दुल्ला के लिए लगाया गया था, और 'शेर-ए-कश्मीर’ का साया आज भी पार्टी के लिए मददगार है। एक औसत होर्डिंग से उनकी नजरें भीड़ की ओर थीं, जिस पर लिखा था: 'मरहूम बाबा-ए-कौम’, यानी स्वर्गीय राष्ट्र-पिता।

नारे जारी थे—'जिस कश्मीर को खून से सींचा है वह कश्मीर हमारा है।’ यह भी 1947 के उसी वक्त का है जब जम्मू-कश्मीर के डोगरा हिंदू शासकों की कमजोर होती पकड़ को विभाजन की आकस्मिक कटार ने चीर दिया था। कश्मीरी जनता दशकों से डोगरा शासकों की सामंती हुकूमत के विरुद्ध संघर्ष कर रही थी। (मुख्यरूप से मुस्लिम कांफ्रेंस के नेतृत्व में, जो बाद नेशनल कांफ्रेस के नाम से पुनर्गठित हुई।) 1947 में सीमा पार से पाकिस्तान समर्थित कबाइलियों ने नई सीमा को पार कर मुस्लिम बहुलता वाले क्षेत्र को कब्जाने की कोशिश की और भारतीय सेनाएं श्रीनगर में उतरीं, कश्मीर लड़ाई का मैदान बन गया। अचानक कश्मीरी मजबूर कर दिए गए कि वे या तो भारत का पक्ष लें या पाकिस्तान का। या फिर उस वक्त की निहित आजादी का।

कश्मीर के लिए लोकतंत्र का वास्तविक अनुभव शुरुआत से ही निराशाजनक रहा। 1951 में पहले चुनाव के दौरान शेख अब्दुल्ला की प्रभावशाली अगुवाई में नेशनल कांफ्रेंस कश्मीर को भारत में बनाए रखने की मदद में उतर पड़ी। राज्य विधानसभा की कुल 75 सीटों में से महज दो सीटों पर ही वास्तव में चुनाव लड़े गए। बाकी सीटों पर विपक्षी दलों को नामांकन ही नहीं करने दिया गया। यह सब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सहमति से हुआ, चूंकि दुनिया उन पर नजर रखे हुए थी, और नेहरू कश्मीर पर भारत के नियंत्रण को वैध सिद्ध करने के लिए हताश थे। उस दौरान नेहरू के निजी मित्र शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बने।

बिना संकोच के नेहरू ने इन घटनाओं को सही ठहराया क्योंकि उनका कहना था कि कश्मीर की राजनीति शख्सियतों के इर्द-गिर्द घूमती है। उन्होंने कहा—'वहां लोकतंत्र के तत्व ही नहीं हैं।’ उनके विचार स्वार्थ से भरे थे। एक साल से भी कम समय में वह शेख अब्दुल्ला के सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्त विचारों से घबरा गए, कि कश्मीर के लिए पूरी आजादी भी एक विकल्प हो सकता है। शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार होते देर नहीं लगी और अगले बीस साल अधिकांशत: उन्हें जेल में रहना पड़ा। कहा जाता है कि 1957 के चुनावों में तो नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के उत्तराधिकारी बक्शी गुलाम मोहम्मद को लिखकर सुझाया कि वह उदारता के साथ कुछ सीटों पर हार जाएं ताकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की छवि पर दाग न लगे। लेकिन इन सहृदयताओं का नेशनल कांफ्रेंस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। नेशनल कांफ्रेंस की लहर को रोका नहीं जा सका था और उसने 68 सीटें जीतीं। इनमें से आधी निर्विरोध थीं। इसी रणनीति को नेशनल कांफ्रेंस ने 1962 में भी दुहराया और इस बार उसे 70 सीटें मिलीं। इस बार भी आधी सीटें निर्विरोध थीं। जब तक 1967 के चुनाव आए नेहरू का देहांत हो चुका था और अब उनकी बेटी इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। हालात में थोड़ा बदलाव आया था, लेकिन खास नहीं। इस बार बक्शी कृपापात्र नहीं रहे थे और अचानक उन्हें जेल जाना पड़ा। दिल्ली के प्रति अपनी भक्ति सिद्ध करने को आतुर उनके उत्तराधिकारी जीएम सादिक ने एक राजनीतिक दल के रूप में नेशनल कांफ्रेंस को दफन करने का निर्णय लिया और उसकी सदस्यता को कांग्रेस में मिला दिया। विपक्ष के प्रति सहिष्णुता एक औपचारिकता बनी रही। 1967 के चुनावों में कांग्रेस को 61 सीटें मिली। इनमें से 22 निर्विरोध थीं।

आज संवेदनशील मानी जाने वाली अनंतनाग, गंदरबल, कंगन, करनाह, लोलाब और पुलवामा जैसी बहुत सी सीटों के मतदाताओं को 1967 तक वास्तव में वोट डालने का मौका ही नहीं मिला था। कुछ को वोट देने के लिए 1977 तक इंतजार करना पड़ा। इन 25 सालों तक मतदान का फीसद कभी 25 से ऊपर नहीं रहा। उत्साह की कमी कोई आश्चर्यजनक नहीं थी। आप वोट दें या न दें, नतीजे सामान्यत: सुनिश्चित थे। यह पूरे चालीस लाख कश्मीरियों के लिए था।

आज नेशनल कांफ्रेस कश्मीरियत की पहचान का अपने आप को संरक्षक तथा कश्मीर और भारत के जटिल रिश्तों की अकेली निर्णायक बताती है। ये लबादा अब उघड़ता नजर आ रहा है और इन चुनावों में उसकी डेढ़ दशक पुरानी प्रतिद्वंद्वी और पूर्व कांग्रेसी दिग्गज मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्ववाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) उसके ऐन पीछे है।

रैली के सर्वेसर्वा वतरहाल मस्जिद के इमाम शेख अब्दुल गनी बट्ट थे। उन्होंने 'नारा ए तकबीर, अल्लाह-ओ-अकबर’ की गर्जना से अपनी बात की शुरुआत की। भाषण का अगला हिस्सा रोजमर्रा की मांगों की सूची जैसा था। उन्होंने वतरहाल को तहसील मुख्यालय बनाने और अलग विधानसभा सीट का दर्जा देने की मांग की। यहां एक डिग्री कॉलेज, कंपाउडर के साथ एक दवाखाने और एक अस्पताल की जरूरत है। यहां सड़क, बिजली और स्वच्छ पानी की जरूरत है।

मस्जिद और मजार के बीच रस्सी पर ऊपर पार्टी की झंडियां लगी हुई थीं। हर 'नेशनली’ झंडे के बीच सफेद घेरे में पार्टी के सामंतवाद विरोधी प्रतीक के रूप में विशिष्ट कश्मीरी हल था। झंडे की लाल रंग की पृष्ठभूमि पार्टी के 1940 के दशक के संक्षिप्त समाजवादी झुकाव की याद दिला रही थी जब उसने यकीनी तौर पर इस उपमहाद्वीप की सबसे सफल भूमि सुधार योजना तैयार की थी। जमीन, जोतने वाले को और भूमिहीन को दी जाए—जैसा उस वक्त क्रांतिकारी विचार था, वैसा ही आज भी है। शेख अब्दुल्ला की अगुवाई वाली सरकार के दौरान 1950 के दशक की शुरुआत में भूमि सुधार लागू किए गए थे। खेती में किए गए उन परिवर्तनों के कारण जबर्दस्त उत्पादक क्षमता पैदा हुई थी। वह पुरानी पीढ़ी के बहुत से लोगों को आज भी पार्टी से जोड़ती है।

ये तात्विक बातें उस दिन के भाषणों में नहीं थीं। पार्टी के ताकतवर वित्त मंत्री रहीम राथर ने श्रोताओं से कहा कि हमारे सामने आज मूल मुद्दा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के जीतने का है। उनकी जीत से भारतीय उपमहाद्वीप में जम्मू-कश्मीर को दिए गए खास दर्जे को कमजोर किया जाएगा और सबके लिए एक ही सिविल कोड के जरिए मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखलंदाजी की जाएगी। उन्होंने भीड़ से कहा: 'यह हमारे ऊपर हमला है।’ जब उमर अब्दुल्ला बोले तो उन्होंने भी यही दिशा पकड़ी। उन्होंने जनता से कहा कि लोगों को नेशनल कांफ्रेंस को ही वोट देना चाहिए, नहीं तो पीडीपी जीत जाएगी। उन्होंने इशारे से कहा कि अगर ऐसा हुआ तो पीडीपी भाजपा से हाथ मिला लेगी और तब आपका वोट मोदी को चला जाएगा और इसका मतलब होगा—'हम मुसलमानों का वजूद मिटाने के लिए।’

सतत बाजे की तरह बजाई जाने वाली मुस्लिम पहचान का रैली पर बहुत सीमित असर हुआ। यह नेशनल काफ्रेंस के मंच का 1930 के दशक से ही एक अहम हिस्सा रहा है। शेख अब्दुल्ला अपनी हर जनसभा की शुरुआत कुरान की आयात से करते थे और पार्टी ने अपने को हमेशा श्रीनगर की मस्जिदों से जोड़े रखा। 1960 के दशक के मध्य में जब पार्टी का सामंतवाद विरोधी संघर्ष शांत पड़ गया था और भूमि सुधार भी लोगों की याद्दाश्त से धुंधलाने लगे थे, तब पार्टी ने अपना जो सबसे सफल आंदोलन किया वह हजरतबल मस्जिद के पुनर्निर्माण पर केंद्रित था। हजरत पैगम्बर मोहम्मद साहिब के पवित्र बालों के अवशेष 'मोई-ए-मुक्कदस’ को संरक्षित करने के लिए एक भव्य संगमरमर का गुंबद बनाने के लिए बड़े ही सोच-समझ के साथ हर कश्मीरी से एक रुपए का चंदा मांगा गया था। इसके जरिए शेख अब्दुल्ला कश्मीर की गहरी आध्यात्मिक भावनाओं को खासी राजनीतिक पूंजी में बदलने में सफल रहे। पार्टी आज भी उसी घटती हुई पूंजी को भुना रही है।

77 साल की उम्र में भी फारुक अब्दुल्ला अपनी अप्रत्याशितता की ख्याति के चलते भीड़ जमा कर लेने की क्षमता रखते हैं। चुनाव शुरू होने के कुछ ही सप्ताह पहले ख्रुउ गांव में नेशनल कांफ्रेस के कार्यकर्ताओं पर हथियारबंद हमला हुआ। इसमें हमले के लिए कथित तौर पर जिम्मेदार दो आतंकवादियों समेत चार लोग मार दिए गए थे। फारुक अब्दुल्ला ने पत्रकारों से कहा था कि उनके विरोधी पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद सईद का पिछला रिकॉर्ड 'बम, बुलेट और बंदूकों’ का इस्तेमाल करने वाला रहा है। उन्होंने कहा था कि मुफ्ती सईद की पार्टी ने ही यह हमला कराया क्योंकि 'उन्हें महसूस हो गया है कि वे श्रीनगर-बडगाम सीट का चुनाव हार चुके हैं।’ लेकिन उस दिन वतरहाल की सभा में आम तौर पर जोश में रहने वाले फारुक थके दिखे और असामान्य तौर पर उन्होंने सोफे पर बैठे-बैठे ही भाषण दिया। उन्होंने भीड़ को संबोधित किया कि यहां तूफानी गति से विकास कार्य होंगे- 'लेकिन अभी नहीं, बाद में, इन चुनावों के बाद। इस वक्त वतन को हर हालत में बचाना है।’ उन्होंने वतन शब्द का इस्तेमाल किया। लिहाजा यह साफ नहीं है कि उनका आशय भारत से था या कश्मीर से। उन्होंने कहा कि मिस्र, सीरिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मुसलमानों की स्थिति खराब है, लेकिन 'अल्लाह हमारे साथ है।’

कश्मीर में 'भारत समर्थक’ राजनीतिक दल अक्सर रेतीली जमीन पर खड़े दिखते हैं। इन चुनावों के दौरान यह बात बिल्कुल साफ नजर आने लगा था जब अति भावनात्मकता से भरे फारुक अब्दुल्ला ने यह भी घोषणा कर दी कि अगर भाजपा जीत जाती है तो भारत सांप्रदायिक हो जाएगा और तब कश्मीर इस देश का हिस्सा नहीं रह सकेगा। ये लगभग थोथे शब्द थे। नेशनल कांफ्रेंस 1998 में भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार का पूरी तौर पर हिस्सा थी। महज 29 साल के अनुभव हीन उमर अब्दुल्ला, सरकार के लिए पोस्टर बॉय बन गए थे। उनके पास शुरू में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के राज्यमंत्री का जिम्मा था और बाद में उन्हें विदेश राज्यमंत्री बनाया गया था। एक मुसलमान और ऊपर से कश्मीरी होने के कारण वह भाजपा के लिए एक सुंदर आड़ की तरह थे, जो पूर्वाग्रही होने के आरोप से पिंड नहीं छुड़ा पा रही थी। फरवरी 2002 में जब गुजरात में मुलसमान विरोधी सुनियोजित दंगे हुए और एक हजार से ज्यादा मुसलमान मारे गए, तब गुजरात और केंद्र दोनों ही जगह भाजपा की सरकार थी। फिर भी उमर अब्दुल्ला, हत्याकांड पर जानबूझकर मौन रहे और मंत्री बने रहे। उन्होंने साल के ऐन अंत में इस्तीफा दिया, सिर्फ यह कहते हुए कि वह पार्टी के लिए काम करना चाहते हैं।

वतरहाल में अपने भाषण में उमर अब्दुल्ला ने विकास और सरकार से जुड़े मुद्दों को चलताऊ तरीके से उठाया- 'हमसे जो हो सकेगा हम करेंगे। लेकिन हर गाड़ी को तेल की जरूरत पड़ती है और इस वक्त नेशनल कांफ्रेंस आपसे चाहती है कि आप हमारा टैंक भरें। हल के निशान वाले बटन को दबाएं। हमें जिताएं।’ लेकिन कश्मीर के मुद्दे पर, जो कि हर ओर धधक रहा था, एक शब्द नहीं कहा। उन्होंने आतंकवाद का भी जिक्र नहीं किया, जिसके चलते हर हफ्ते बहुत से नौजवानों इसका शिकार हो रहे थे। किसी ने घाटी के सैन्यीकरण या इसके स्थानीय लोगों के जीवन को पंगु बना देने की चर्चा नहीं की। यहां तक कि किसी ने चुनाव के बहिष्कार के व्यापक आह्वान के मुद्दे को नहीं उठाया—एक के बाद एक वक्ता गंभीर विषयों से बचता गया। श्रोता तभी उनसे जुड़ते दिखे जब पैगम्बर का नाम लिया गया या फिर किसी अन्य धार्मिक संदर्भ पर बात हुई। तभी आंत से आती सी आवाज सुनाई दी, एक समानांतर चैन की सांस।

अंतत: शायद लोगों की प्रतिक्रिया को भांप कर फारुक अब्दुल्ला ने अचानक रैली खत्म होने का संकेत किया। 'मतदान के दिन जल्दी उठ आना’, खड़े होते सब लोगों को उन्होंने याद दिलाया। 'सुबह की नमाज पढ़ो और फिर हमें वोट देने पहुंच जाओ।’

भीड़ उस मैदान से बाहर हो गई और कुछ सौ लोगों के शोरगुल में स्पेशल सिक्योरिटी ग्रुप के असामान्य रूप से लंबे एंटेना और काली खिड़कियों वाली एसयूवी गाडीयों की एक कतार हमारे सामने से निकली। इन कारों में रखे जैमर ने सेलफोन सेवाओं को बाधित कर रखा था। सिगनल न होने के कारण इम्प्रूवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (सेलफोन सिग्नलों के माध्यम से नियंत्रित बम) का विस्फोट नहीं किया जा सकता है। काम नहीं कर रहे सेलफोन को थामे, हम शहर को वापस ले जाने वाली कार को ढूंढते हुए भटकने के दौरान एक सुनसान-सी गली में पहुंच गए, जो एक और सूफी स्थान को जाती थी। जहां वतरहाल की 'मजार-ए-शोहादा’—शहीदों का कब्रिस्तान, भी स्थित थी, जो पिछले 25 सालों के खून-खराबे के दौरान कश्मीर के हर गांव में नजर आती हैं।

उस उर्मिल जमीन के टुकड़े के बीच में जहां जगह-जगह बैगनी आइरिस फूल के गुच्छे नजर आ रहे थे, कब्र के एक पत्थर ने मेरा ध्यान खींचा। रस्मी लिखावट में 'हुव-वल-बकी’ सिर्फ वह अमर है—खुदा था। उसके नीचे उर्दू का एक शेर था: 'यह जग जाहिर है, हम ही फूल हैं और हम ही तलवार भी। या तो हम जिंदगी के गुलशन में खुशबू बिखेरेंगे या फिर कब्र में जाने से पहले खून में नहाएंगे।’ फिर दिवंगत का जिक्र था—'अब्दुल लतीफ डार ऊर्फ राशिद, निवासी वतरहाल, बडगाम। 22/09/03’। यह याद दिलाता था कि कोई भी—चाहे आतंकी हो या सत्ता का साथी, क्रांतिकारी हो या अनिर्णय में बैठा आदमी, कश्मीर में तमाशबीन तो कोई रह ही नहीं गया है। चाहे आप जेल में रहे हों, यंत्रणा से गुजरे हों, अपंग हो गए हों, घायल हो गए हों, गायब हो गए हों, मानसिक रूप से टूट गए हों, प्रवासी होने को मजबूर कर दिए गए हों या बेघर हो गए हों या फिर अपने परिवार के सदस्य को खो चुके हों—आप चाहे जहां खड़े हों और आप के साथ जो भी हुआ हो—हर एक को तहरीक—आंदोलन—ने बदल दिया है।

दफ्न आदमी के नाम के नीचे एक दूसरा शेर भी था : 'सोचा है कफील, अब कुछ भी हो, हर हाल में अपना हक लेंगे; इज्जत से जीये तो जी लेंगे, या जाम-ए-शहादत पी लेंगे।’

इज्जत, अधिकार, प्रतिरोध-मंच पर उस दिन बैठी थकी राजनीति के पास इस सब का कोई जवाब नहीं था।

विरोध की शुरूआत

अगले महीने जब कश्मीर में फिर से चुनाव होंगे, तो चुनाव का विरोध करने वाले फिर से उभर कर आएंगे। हो सकता है कि लोगों को 1950 और 1960 के दशक जैसे एकतरफा चयनों, या फिर 1970 और 1990 के दशक में जिस तरह से ठगी या बोगस वोटिंग ने चुनावों को बर्बाद कर दिया था, वैसी स्थिति का सामना न करना पड़े। इसकी बजाय हाल के चुनावों में सुनियोजित तरीके से वोटरों को लुभाने की कोशिशें नजर आई हैं। 2002 में पूरी तरह से जोर-जबरदस्ती हुई थी। 2008 में चुनाव भयावह राजनीतिक दमन के बाद हुए थे जबकि नेता इस बात पर जोर दे रहे थे कि वोट देना प्रशासन चलाने के लिए जनता की जरूरत है।

सामानों की जांच करते हुए एक युवा कश्मीरी पुलिसवाले ने अप्रत्याशित रूप से पूछा, 'आप क्या सोचते हैं?’ मेरे जवाब का इंतजार किए बगैर उसने कहा, 'कश्मीरी अवाम आजादी के काबिल नहीं है?’ मैं 2008 के विधानसभा चुनावों के अगले दिन श्रीनगर एयरपोर्ट पर था। पहले कभी भी इस युवा इंस्पेक्टर ने औपचारिक सौजन्य के साथ गर्दन हिलाने से अधिक कुछ नहीं कहा था, लेकिन उस सुबह वह रुक नहीं पाया। उसने कहा: 'देखिये ना, इस साल भी वही सब हुआ। हर तरह से विरोध और साठ लोग शहीद हुए—फिर किस तरह से लोग निकले और वोट डाला।’ उसकी आवाज धीमी, सधी और गुस्से भरी थी। उसने उस साल के टकरावों में मारे गये लोगों के लिए 'शहीद’, और जिन्होंने वोट दिए थे, उनके लिए 'वे’ शब्द का इस्तेमाल किया। उसका गुस्सा जारी रहा जिसमें शर्म शब्द का रह-रह कर प्रयोग हुआ। निर्गमन लाउंज में टेलीविजन सेट के टिकर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शब्द सरक रहे थे, 'बड़े पैमाने पर लोगों का आना लोकतंत्र के पक्ष में वोट है, यह राष्ट्रीय एकता के लिए वोट है।’ एक विपक्षी नेता भी उनके बयान से सहमत थे, 'यह भारतीय लोकतंत्र की जीत है।’

चुनाव के आखिरी दिनों में कश्मीर की सड़कों पर 'शर्म’ अजीब तरीके से बार-बार उभर जाया करती थी, जिसका गुजरे महीनों से कोई तालमेल नहीं दिख रहा था। 2008 की गर्मियों में जबर्दस्त विरोध प्रदर्शनों ने भारतीय सुरक्षा बलों से सार्वजनिक मैदानों को करीब-करीब छीन लिया था। सड़कों पर दिखनेवाली लोगों की संख्या से लगता था कि वर्षों की थकान के बाद आजादी की इच्छा लोगों के जेहन में फिर से धर कर लेने के निकट है।

विरोध की शुरुआत बहुत सामान्य थी। दक्षिण पश्चिम कश्मीर के पहाड़ों पर काफी ऊंचाई पर स्थित एक प्राकृतिक गुफा है जिसे हिंदू अमरनाथ का तीर्थ मानते हैं। स्थानीय स्तर पर यात्रा का प्रबंध करने वाले एक सरकारी विभाग को सौ एकड़ जमीन दिए जाने के विरोध में शुरू हुई। आमतौर पर जुलाई के महीने में हर साल कुछ हफ्तों के लिए गुफा में बर्फ जमने से एक लिंग बन जाता है। आस्तिक मानते हैं कि वह शिव का अवतार होता है। विवादित जमीन बुग्याल है जिस पहले से ही तीर्थयात्री तीर्थ स्थल की यात्रा के दौरान पड़ाव के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे।

कश्मीर में पहले से ही दसियों हजार एकड़ खेती, बगीचे और जंगलात की जमीन सेना और अर्धसैनिक बलों ने छावनियां, विशाल शस्त्रागार और भयावह हिरासती कैंपों के लिए अधिग्रहित की हुई है। (हाल के एक अनुमान के अनुसार 650 से ज्यादा सुरक्षा बल संस्थानों (इन्स्टलेशंस) के पास 1,25,000 एकड़ जमीन है।) कुछ और सार्वजनिक भूमि के औपचारिक अधिग्रहण ने आग में घी का काम किया। जब विवाद की शुरुआत हुई, श्रीअमरनाथ यात्रा श्राइन बोर्ड सीधे तौर पर जम्मू-कश्मीर के 83 वर्षीय लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायरड) एस के सिन्हा के सीधे नियंत्रण में था। सिन्हा राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के ज्यादातर हिस्से के दौरान तीर्थ यात्रा का इस्तेमाल कश्मीर को 'राष्ट्रीय मुख्यधारा’ में मिलाने के लिए करते रहे हैं। हर साल कुछ महीनों के लिए यात्रा के रास्ते में पडऩे वाले जिले पूरी तरह ठप हो जाते हैं, क्योंकि सरकार का हर व्यक्ति तीर्थयात्रा के लिए जरूरी प्रबंधन में लगा दिया जाता है। इसमें डॉक्टर, पशुचिकित्सक, अध्यापक, पुलिसवाले और सर्वोपरी सेना होती है। यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि कश्मीर में हथियारबंद संघर्ष के वर्षों के दौरान तीर्थ यात्रियों की संख्या में अपार वृद्धि हुई है। सन 1990 में तीर्थ यात्रियों की जो संख्या तकरीबन 30 हजार थी वह 2008 में साढ़े पांच लाख से ज्यादा हो चुकी थी। इन आकंड़ों को बारीकी से देखा जाता है और जमकर उसका प्रचार होता है। घाटी में सक्रिय आतंकवादियों की गिरती संख्या और तीर्थ यात्रियों की बढ़ती हुई संख्या को जोडऩे से ये आंकड़े हालात की सरकारी रिपोर्ट का जरूरी हिस्सा बन गए हैं और उस मानचित्र को पूरा करता है जिसके चलते दुनिया को कश्मीर के 'सामान्य’ होने को बतलाया जा सके।

2008 के मई और जून में अमरनाथ भूमि को लेकर विरोध चरम पर था। जल्द ही ऐसा संघर्ष उभरा जो कई गुना ज्यादा भूमि के लिए था और ज्यादा अमूर्त था। यह कश्मीर की सड़कों, और सार्वजनिक मैदानों के लिए था। 1990 के दशक के मध्य से वहां जनसभाओं के लिए अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ती थी। इसमें भी भारतीय संविधान की शपथ लेने वाले राजनीतिक दलों को ही विशेषाधिकार दिया हुआ था। भारतीय सुरक्षा बलों के हद दर्जे का नियंत्रण ही यहां के जीवन को परिभाषित करता था। अब अचानक ऐसे दिन भी आए जब बिना हथियार दो लाख लोग सड़कों पर निडर होकर आ गए। सुरक्षा बल संकुचित से दिखने लगे। एक जाना पहचाना पुराना नारा यह सवाल पूछने लौट आया, 'हम क्या चाहते?’ चीखते हुए गले इसका सीधा सपाट जबाव देते 'आजादी, आजादी!’

इससे पहले कश्मीर में इस तरह से ऊर्जा से भरी लामबंदी 1987 में दिखी थी। उस साल के विधानसभा चुनाव में फारुक अब्दुल्ला की अगुवाई में सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस को कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व समझौते के लिए मजबूर होना पड़ा। उसी कांग्रेस के साथ जिससे पहले के चालीस सालों तक शेख अब्दुल्ला घोर संघर्ष करते रहे। कश्मीरियत की पहचान का प्रतिनिधित्व करने वाली जगह एक बार फिर  खाली हुई और नई राजनीतिक ताकतों ने उसे तत्काल भर दिया। मुस्लिम युनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ) के हरे झंडे तले बहुत सारे संगठन एकजुट हो गए, जिसमें जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर प्रमुख था।

एमयूएफ ने जब चुनाव चिह्न कलम-दवात के साथ चुनाव लडने का फैसला किया तो उसे अप्रत्याशित समर्थन मिला। मार्च माह में श्रीनगर के इकबाल पार्क में मौजूद कश्मीरी लेखक पी जी रसूल ने उस भव्य रैली के बारे में मुझे बताया। उस समय जबर्दस्त उत्तेजना फैल गई जब भीड़ में से एक चरमपंथी युवक ने भारतीय झंडे को आग लगा दी। तब भी, एमयूएफ आखिरी विरोधी दल रहा, जिसने भारत का संवैधानिक विरोध किया—आने वाले दशक में भारत को तो सशस्त्र संघर्ष का ही सामना करना पड़ा। रसूल ने कहा, 'भाषणों का जोर यह था कि आपको वोट देना है। आपको नेशनल कांफ्रेंस को हराना है। ये आजादी के लिए उतना नहीं था जितना नेशनल कांफ्रेंस के विरोध में था।’

नेशनल कांफ्रेंस सरकार की प्रतिक्रिया घिसी-पिटी ही थी। एमयूएफ का प्रचार करने वाले सैकड़ों कार्यकर्ताओं को आधारहीन आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया। बर्बर तरीके से पीटा गया और जेलों में बेइज्जत किया गया। वहां तीन नाराज चुनावी कार्यकर्ताओं—हामिद शेख, अशफाक माजिद वानी और यासीन मलिक—की जावेद मीर से मुलाकात हुई। रिहाई के बाद, अब तक अपने नामों के पहले अक्षर एच-ए-जे-वाई 'हाजी ग्रुप’ से जाना जाने वाला, यह समूह हथियारों की ट्रेनिंग लेने सीमा पार पाकिस्तान चला गया। वहां से लौटकर ये घोषित रूप से कशमीरी राष्ट्रवादी 'जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ का पहला हथियारबंद गुरिल्ला दस्ता बने। जिसका गठन दस साल पहले करिश्माई नेता मकबूल बट्ट ने किया था।   

उस चुनाव की सबसे रोचक कहानी श्रीनगर के उपनगर अमीरा कदल से एमयूएफ के उम्मीदवार मोहम्मद यूसुफ शाह की है। जब चुनावी नतीजे आने लगे तो शाह को बेशर्मी के साथ मतगणना के हॉल से ही गिरफ्तार कर लिया गया, संभवत: इसलिए कि वह नेशनल कांफ्रेंस के प्रभावशाली उम्मीदवार गुलाम मोहीउद्दीन शाह से आगे निकल रहे थे। यूसुफ शाह अंतत: हार गए और उन्हें नौ महीने जेल में काटने पड़े। उसके बाद वह भी सीमापार पाकिस्तान चले गए और हिज्बुल मुजाहिद्दीन के संस्थापक सदस्य बन गए। अब वह उस समूह के अमीर—यानी सैन्य कमांडर—हैं और हम उन्हें 'सैयद सलाहुद्दीन’ उपनाम से जानते हैं।

अगर 1987 के चुनावी फर्जीवाड़े और गड़बडियों की वजह से भारत के प्रति कश्मीर में निराशा गहराई है और वर्षों तक सशस्त्र संघर्ष का फौरी कारण बने हैं, तो 2008 के प्रदर्शनों ने हथियार उठाने वालों को एक बहुत अलग संकेत भी दिया। दो दशकों से भी ज्यादा समय बाद पहली दफा ऐसा महसूस हुआ है कि विरोध करने की पहल फिर से सड़कों पर उतरने वालों के हाथों में आ गई है।

उथल-पुथल भरी उन गर्मियों के उस मौसम में पीडीपी और कांग्रेस के नाजुक गठबंधन गठजोड़ वाली राज्य सरकार लगभग अंतर्ध्यान हो गई। 2002 में सत्तारुढ़ होने वाला यह गठजोड़ बना ही एक असहज तरतीब से था। पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद सईद को पहले तीन साल के लिए मुख्यमंत्री रहना था और उसके बाद उतने ही समय के लिए कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद को। 2008 के मध्य में जब गठबंधन के आखिरी छह महीने रह गए तो पीडीपी ने अवसरवादी तरीके से अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिरा दी। इस तरह से खुद को अमरनाथ भूमि के विवाद से भी अलग कर लिया।

पीडीपी की ओर से ये फूर्ति से किया गया अवसरवादी नाच था जिसकी वजह से इस पार्टी को जबरदस्त उछाल मिली। पीडीपी की स्थापना 1999 के उस दौर में की गई थी जब यह लग रहा था कि नेशनल कांफ्रेंस अपने जनाधार को पूरी तरह खो चुकी है। पीडीपी आसानी से भारत के साथ लंबे टकराव में कश्मीरियों के प्रतिनिधि के चोगे में आ गई। यद्यपि मुफ्ती मोहम्मद सईद केंद्र में गृह मंत्री रहे थे और पक्के 'भारत समर्थक’ राजनेता थे इस पर भी वह अपने दाग मिटाने में सफल रहे और उन्होंने समय की नब्ज के अनुकूल नए नारे 'हीलिंग टच’ (घावों पर मरहम) के साथ अपनी नई पार्टी की शुरुआत कर दी।

दस साल के खून खराबे से परेशान कई कश्मीरी हर हालात में सुधार की संभावना पर शिद्दत से यकीन करना चाहते थे। बीते दशक में कश्मीरी समाज को जिसने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था वह था 'इखवान’। यह सुरक्षा संगठनों द्वारा गठित अर्धसैनिक बल था जिसकी स्थापना 1990 के मध्य में की गई थी। इखवानी अपहरण, उत्पीडन और डकैतियां करने के लिए चर्चित थे। उन्होंने धड़ल्ले से नियोजित व अन्य तरह की हत्याएं और बलात्कार किए। लेकिन 2002 के आस-पास जब सुरक्षा बल अपनी पकड़ पर आश्वस्त हो गए तो सरकार ने अपने को इखवान वालों की लूटमार से अलग कर लिया। जैसा कि पीडीपी उस साल होने वाले राज्य के चुनावों की तैयारी करने लगी, मुफ्ती मोहम्मद सईद ने यह इशारा करने में देर नहीं लगाई कि इखवान नेशनल कांफ्रेंस का कुकृत्य है और उसके द्वारा की जाने वाली हिंसा का खात्मा करने को चुनावी वायदा बनाया।

उनकी नई पार्टी ने चुनाव चिन्ह के तौर पर कलम-दवात, और एक हरे झंडे को चुना। यह ठीक वैसा ही था जिसके तहत 1987 में एमयूएफ ने चुनाव प्रचार किया था। पीडीपी अध्यक्ष मेहबूबा मुफ्ती ने बेखौफ होकर दक्षिण कश्मीर की यात्रा शुरू की, वह उन इलाकों में भी गईं जहां उग्रवादियों का जबर्दस्त असर था और जहां नेशनल कान्फ्रेंस के प्रतिद्वंद्वी प्रचार करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते थे। एक चश्मदीद, जो उस वक्त युवा पुलिस अफसर था, ने हाल में ही मुझे बताया, 'सेना भी उन इलाकों में शाम के बाद गश्त लगाने से बचती थी। पर मेहबूबा मुफ्ती सिर पर हरे रंग का रुमाल बांधतीं या हरी चादर ओढ़े रहतीं और अपने श्रोताओं को बताती थीं कि उनकी पार्टी को कलम और दवात सैयद सलाहुद्दीन भाई ने दिया है।’ 2002 के चुनाव के आसपास अचानक शुरू हुए उग्रवादी हमलों के जबर्दस्त सिलसिले में लगभग अस्सी राजनीतिक कार्यकर्ता मारे गए। सबसे ज्यादा नुकसान नेशनल कान्फ्रेंस को हुआ जिसने 32 कार्यकर्ताओं को खोया। वहीं इसकी तुलना में पीडीपी को लगभग कुछ भी नहीं हुआ। अंतत: पीडीपी ने 16 सीटें जीतीं, इनमें से ज्यादातर दक्षिण कश्मीर की थीं जहां आंतकवाद सबसे ज्यादा मजबूत था।

जून 2008 के अंत में जब एस के सिन्हा ने राज्यपाल के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा किया, अमरनाथ यात्रा को लेकर उनका सपना गड़बड़ा चुका था। उनके बाद, केंद्र सरकार ने पूर्व नौकरशाह एन एन वोहरा को राज्यपाल बनाया, जो लंबे समय से कश्मीर में उनके वार्ताकार थे। कुछ ही सप्ताह बाद, जैसे ही पीडीपी ने सरकार गिराई और कश्मीर में फिर से राष्ट्रपति शासन लागू हुआ, वर्षों से लोगों में भरा आक्रोश, श्रीनगर की सड़कों पर नजर आने लगा। अच्छबल, गांदरबल, सोपोर और शोपियां जैसे छोटे शहरों में भी लोग सड़कों पर उतर आए। यहां तक कि बारामूला और त्रेहगाम जैसे छावनी नुमां शहरों में भी, जहां सेना पचास साल से भी ज्यादा समय से आम जिंदगी पर हावी रही थी, वहां भी सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की संख्या और उनकी अप्रत्याशित अहिंसा ने फौजियों को हक्का-बक्का कर दिया। स्कूल यूनिफॉर्म में, सिर को कायदे से ढकी लड़कियां जब सेना की चौकियों के पास से गुजरते हुए गातीं निकलीं- 'ए जलिमो, ए कातिलो, कश्मीर हमारा छोड़ दो’, सेना के पास मुंह ताकने और इंतजार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। दो दशकों में यह पहला मौका था जब लोगों का सामना करने में सुरक्षा प्रतिष्ठान को झुकना पड़ा था और इसे सबने अनुभव भी किया।

तब तक सरकार हर तरह के आजदी-समर्थक विरोध को दबाने में कामयाब रही थी, और सैयद अली शाह गिलानी का 'कट्टरपंथ’, मीरवाइज उमर फारुक और शब्बीर शाह की 'नरमपंथी’ आवाज, और जे के एल एफ के यासीन मलिक गिरफतार हो चुके थे। लेकिन एक अनौपचारिक सी 'समन्वय समिति’ अस्तित्व में आ चुकी थी। कई हफ्तों की हड़तालों के बाद, इस समिति ने अचानक 'मुजफ्फ़राबाद चलो’ का आह्वान किया।

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'मुजफ्फराबाद चलो’ उस शहर तक मार्च करना था जो भारत और पाकिस्तान के बदनाम लाइन ऑफ कंट्रोल के पाकिस्तान नियंत्रित हिस्से के कश्मीर की अनधिकृत सीमा है। यह हिंदूवादी संगठनों द्वारा बदले में किए गए प्रदर्शनों के तहत जम्मू-कश्मीर से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को बाधित किए जाने पर प्रतिक्रिया के तौर पर था। इस प्रतिकात्मकता का अर्थ साफ था—अगर भारत में कुछ लोग घाटी को सामान की सप्लाई रोककर उसका मनोबेल तोडऩे की कोशिश करेंगे तो कश्मीरी अपनी आखिरी सांस का इस्तेमाल एलओसी को लांघ कर उस पार जाने के लिए करेंगे। यह मार्च 11 अगस्त की सुबह शुरू हुआ, हजारों लोग श्रीनगर से बसों, कारों और मोटर साइकिलों में सवार होकर जुलूस के रूप में निकल पड़े। पटन, सोपोर और बारामूला में और लोग जुड़ते गए और ये संख्या लाखों तक पहुंच गई।

हो सकता है कि मार्च सिर्फ सांकेतिक रहा हो, लेकिन उरी छावनी के निकट बोनियार में भारी पुलिस बल ने बैरिकेड लगा रखा था जिसकी सहायता के लिए सेना तैयार थी। उग्रवादी से नरमपंथी नेता बने शेख अब्दुल अजीज की अगुवाई में प्रदर्शनकारी पहुंचे। आंसू गैसे के गोले छोड़े गए और चेतावनी की गोलियां चलाई गईं। तभी एक गोली ने अजीज को ढेर कर दिया। उनकी नृशंस हत्या साफ संकेत थी कि सड़कों पर दिख रहे नए आत्मविश्वास से भारत सरकार बेचैन हो चुकी है। अगले दिन उनके अंतिम संस्कार पर, समन्वय समिति ने 'पांपोर चलो’ का आह्वान किया। पांपोर श्रीनगर के बाहरी हिस्से में बसा उनका पैतृक शहर है। 16 अगस्त को हुई जनाजे की नमाज के लिए लाखों लोग इकठ्ठे हुए। उत्साहित होकर समिति ने तुरंत 'ईदगाह चलो’ का आह्वान कर दिया। यह श्रीनगर के बीचों बीच नमाज पढऩे का बड़ा मैदान है। हजारों की संख्या में कश्मीरी वहां जमा हो गए।

जल्द ही मुज्जफराबाद स्थित 13 उग्रवादी समूहों के संगठन, 'यूनाइटेड जेहाद काउंसिल’ के मुखिया सैयद सलाहुद्दीन की ओर से एक औपचारिक बयान अवतरित हुआ। सलाहुद्दीन ने घोषणा की, 'हमने फैसला किया है कि कोई उग्रवादी सार्वजनिक तौर पर हथियारों का प्रदर्शन नहीं करेगा। हमने उग्रवादियों को कहा है कि जहां-जहां आजादी के लिए मार्च और प्रदर्शन होंगे, वहां किसी तरह की सैनिक कार्रवाई न की जाए।’ उसने यह भी कहा कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि भारत की सेना को निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का बहाना न मिल पाए।

24 अगस्त को 'लाल चौक चलो’ का आह्वान किया गया था। यह श्रीनगर का व्यापारिक केंद्र और कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन करने का पारंपरिक मंच है। 1947 में इसी जगह पर जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला समानधर्मा के तौर पर एक साथ खड़े हुए थे जब भारत ने कश्मीरियों को मुक्ति देने का वादा किया था। नेहरू वहां तब भी खड़े हुए थे जब उन्होंने राज्य के भविष्य को लेकर जनमत संग्रह-प्लेबिसाइट-कराने का वायदा किया था। 1975 में पागल भीड़ ने दो दशकों की कैद के बाद छूटे शेख अब्दुल्ला का स्वागत यहीं पर किया था। जनवरी 1991 में जब कश्मीर सशस्त्र विद्रोह की चपेट में था, भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने गणतंत्र दिवस के दिन अपने समर्थकों के साथ लाल चौक पर देशभक्ति से प्रेरित हो भारतीय झंडा फहराने के लिए यात्रा करने का फैसला किया। लेकिन जब उग्रवादियों ने उनके भारी सुरक्षा घेरे पर रॉकेटों से हमला किया तो इस मार्च को उन्हें बीच में ही छोडऩा पड़ा। अंतत: बॉर्डर सिक्यूरिटी फोर्स ने वहां झंडा फहराया, जो तब से चल रहा है। एक बंकर की निगरानी में वहां लगातार सुरक्षा घेरा रहता है। पर 2008 की गर्मियों में, लाखों प्रदर्शनकारियों के दवाब में सुरक्षा बलों को वहां से हटना पड़ा और अपनी आंखों के सामने कुछ युवाओं को लाल के चौक टावर पर चढ़ कर हरा झंडा फहराते हुए देखने का अपमान भी झेलना पड़ा।

बीस साल के भीषण संघर्ष के बाद जब यह लगने लगा था कि भारत सरकार कश्मीरी अलगाववाद पर विजय की घोषणा करने के लिए तैयार है, कुछ ही महीनों में भारत की स्थिति डगमगाने लगी थी। जब समन्वय समिति ने 'लाल चौक चलो’ का आह्वान किया तो प्रशासन घबरा गया। उसने पूरे श्रीनगर में कर्फ्यू लागू कर दिया और चौक में बैरीकेड लगाने शुरू कर दिए। नौ दिन तक शहर पूरी तरह बंद रहा और चौक जाने वाली हर गली को कंटीले तारों से पाट दिया गया। दस फुट लंबी लोहे की चादरों से बंद किया गया घंटा घर, अपने उदास तिरंगे के साथ वीरान खड़ा था। यह कश्मीर में भारत की विश्वसनीयता के संकट की चौंकाने वाली तस्वीर थी। ऐसे वक्त में, चुनाव की घोषणा से ज्यादा असंगत और कुछ नहीं हो सकता था।   

चुनाव का जोखिम

जम्मू कश्मीर में मतदान से महज चार सप्ताह पहले भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी ने अक्टूबर 2008 के मध्य में स्वीकार किया, 'हमने जोखिम लिया है’। उससे पूर्व के महीने में प्रेस को लीक की गई सूचनाओं के संकेत भी यह बता रहे था कि सरकार के लिए ये फैसला लेना आसान नहीं रहा था।

चुनाव कराने का तत्काल दबाव एक संवैधानिक पेंच की वजह से आया था। सरकार के गिर जाने की वजह से, जम्मू-कश्मीर राष्ट्रपति शासन के विस्तार की ओर बढ़ रहा था। इससे उस आरोप को बल मिलता कि कश्मीर में लोकतंत्र की स्थिति ठीक नहीं और बहुत ही नाजुकता से निर्मित भारत की इस आधिकारिक छवि की भी पोल खुल जाती कि घाटी में सब कुछ ठीक ठाक है और 'हालात सामान्य’ करने की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है। ये उस दलील को भी कमजोर करता कि बीते सालों में अलगाववादी अपना समर्थन खो चुके हैं।

कश्मीर में चुनाव कराने का ये समय ठीक नहीं था क्योंकि घाटी में जल्दी ही चिल्ला-ए-कलां यानी साल के सबसे सर्द दिनों की शुरुआत होने वाली थी। पर सर्दियों से ज्यादा एक सामान्य आशंका यह थी कि गर्मियों में हुए विरोध-प्रदर्शन के बाद नाराज लोग शायद वोट ही ना डालें। पीडीपी अध्यक्ष मेहबूबा मुफ्ती ने कहा 'सबसे पहले हमें लोगों का भरोसा फिर से बहाल करना चाहिए’। दूसरी ओर प्रचार शुरू करने के लिए मजबूर नेशनल कांफ्रेंस ने रक्षात्मक होते हुए, एक अलग शिगूफा छोड़ा। वह लगातार दोहराती रही कि यह चुनाव मसला-ए-कश्मीर का नहीं है। मतदाताओं से कहा गया कि वे बिजली, सड़क, पानी जैसी रोजमर्रा की जरूरतों और कश्मीर के मुद्दे को अलग रखें।

लेकिन लोग इतनी आसानी से कहां मानने वाले थे। जब उमर अब्दुल्ला अपनी पारंपरिक सीट गंदरबल, जिसे वे तीन पीढिय़ों से पोस रहे थे, में नामांकन दाखिल करने गए तो पूरा शहर बंद रहा। उमर को शब्दश: इस इलाके में, जो उनकी जेबी सीट मानी जाती थी कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ा। भारी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बलों के होने के बावजूद लोग आजादी-समर्थक नारे लगाते हुए इकट्ठा हो गए और सुरक्षा बलों को उन्हें खदेडऩे के लिए आंसू गैसे के गोल छोडऩे पड़े। पुलवामा में चुनाव-विरोधी नारे लगा रही भीड़ ने, वाची विधानसभा सीट से अपना नामांकन भरने आ रही पीडीपी उम्मीदवार मेहबूबा मुफ्ती के काफिले को रोक दिया।

चुनावों के औपचारिक ऐलान से काफी पहले ही यह साफ हो गया था कि कश्मीर में मतदाताओं को चुनाव के लिए तैयार करने का काम सिर्फ राजनीतिक दलों पर ही नहीं छोड़ा जाएगा। कश्मीर के निर्मम सुरक्षा तंत्र ने दबाव बनाने के कई पुराने तरीके अपनाने शुरू कर दिए। पहला कदम चुनाव के विरोध को काबू करना था। कश्मीर के प्रमुख राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संगठन, जो कि राजनीतिक आत्म निर्णय के लिए प्रतिबद्ध है, हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं को पहले ही जेल में डाल दिया गया था। जैसे-जैसे गर्मी का मौसम दूर होता गया, हाल में हुए प्रदर्शनों की वीडियो रिकॉर्डिंग को अगल-अलग पुलिस स्टेशनों के हिसाब से विश्लेषित किया गया। स्थानीय खुफिया इकाइयों और स्पेशल ब्रांच को उन चेहरों की पहचान करने का काम सौंपा गया जो बहुत नारे लगा रहे थे, पत्थरबाजी करते नजर आ रहे थे और विशेषकर ऐसा कोई भी आदमी जो भीड़ को उकसाने में समर्थ नजर आता हो या उनके उत्साह को बनाए रख सकता हो। पहले दस, फिर पचास और अंतत: सैंकड़ों की संख्या में लोगों को उठा लिया गया। कम उम्र के बच्चों को उनके माता-पिता के साथ बुलाया गया और उत्पात करने वालों को भविष्य के अंजाम भुगतने की चेतावनी देकर धमकाया गया। जो ज्यादा अडियल थे, उन्हें मार-पीट कर वापस भेजा गया। ऐसा लगने लगा मानो जो भी युवा चुनाव विरोध की सोच रहा होगा, उसकी पीठ पर चोट के निशान होंगे और सिर पर गिरफ्तारी की धमकी।

किसी को भी गिरफ्तार किए जाने के लिए वजह ढूढने की जरूरत नहीं थी। कश्मीर में पुलिस आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून), डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट (अशांत क्षेत्र कानून) और बहुप्रयोजनीय पब्लिक सेफ्टी एक्ट (जन सुरक्षा कानून, पीएसए) जैसे कई कठोर कानूनों में से कुछ भी चुन सकती थी। किसी अलगाववादी गुट से, फिर चाहे वह 'भूमिगत न भी हो’ (ओवरग्राउंड), सिर्फ जुड़े होने पर भी पुलिस को आप को सीधे छह महीने से ऊपर तक जेल में डाले रखने के लिए काफी था। मकसद उदार था: लोगों को 'ऐसी किसी भी हरकत करने से रोकना जिसका राज्य की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था पर बुरा असर पड़े’। पीएसए के तहत होने वाली गिरफ्तारी को वाजिब ठहराने के लिए पुलिस को सिर्फ एक जिला जज से एक पृष्ठ के आदेश पर हस्ताक्षर करवाने होते थे। इस के चलते लोगों को दो साल तक जेल में रखा जा सकता था और उसके खिलाफ किसी अदालत में नहीं जाया जा सकता है (2008 से लेकर 2010 तक, करीब एक हजार कश्मीरियों को पीएसए के तहत हिरासत में रखा गया)। उन लोगों से ज्यादा कोई बदनसीब नहीं है जिनके नाम, चेहरे और निजी जानकारियां कश्मीर की खुफिया एजेंसियों के रिकॉर्ड में दर्ज हो गई हैं। वे जानते हैं कि यह अपने आप में किसी उम्र कैद से कम नहीं क्योंकि इस चक्र से कभी कोई निकल नहीं पाता।

सितंबर के मध्य तक, आसन्न सर्दी के मौसम की ठंडक सड़कों में उतरने लगी थी। दक्षिण कश्मीर से खबरें आईं कि इखवानी फिर से प्रकट हो गए हैं। इस्लामाबाद नाम के कस्बे में, उन्हें 24 अगस्त को हफ्ते भर के लिए लगाए गए कर्फ्यू के दौरान मदद के लिए बुलाया गया था। लेकिन महीने भर बाद जब चुनाव की घोषणा हुई, तो वे अपने कैंपों के चक्कर काटते, सफेद रंग की आतंककारी बुलेट प्रूफ जिप्सियों में पेट्रोलिंग करते हुए और अपने हथियार झुलाते नजर आ रहे थे। इनके एक कैंप की तस्वीर दिल्ली के अखबार में छपी जो इखवानियों को सौंपे काम के बारे में स्पष्ट याद दिला देता था—'उनके अंडकोषों को दबोच लो, दिलो-दिमाग अपने आप कब्जे में आ जाएगा’, यह एक इमारत पर हरे अक्षरों से लिखा था। और खुदानख्वास्ता उनके दीर्घकालिक लक्ष्य को लेकर भ्रम हो भी तो, बाकी का नारा केसरिया रंग में लिखा था—'हमें भारतीय होने पर गर्व है’। कुछ अहम विधानसभा क्षेत्रों में तो इखवानियों ने घोषणा कर दी थी कि वे चुनाव लड़ेंगे।

इखवानियों की मौजूदगी का फायदा पीडीपी को मिला। दबी जुबान में कहा जाने लगा कि नेशनल कांफ्रेंस को वोट देने का मतलब होगा, 1990 के दशक के अंधकारमय इखवानी दौर के दिनों की वापसी। इसने लोगों को उस वक्त की याद दिला दी जब खतरनाक स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप को, शायद संयोग से, 1996 में फारुख अब्दुल्ला के सत्ता में आने से ठीक पहले, खुला छोड़ा गया था। अफवाह खास तौर पर दक्षिण कश्मीर में कारगर साबित हुई जहां जमात-ए-इस्लामी का कैडर इससे हिल गया। हालांकि औपचारिक तौर पर जमात ने चुनाव पर कोई पक्ष नहीं लिया, लेकिन उसके अति अनुशासित और प्रभावशाली सदस्यों ने मतदाताओं को नेशनल कांफ्रेंस को रोकने के लिए प्रेरित किया। 


ऐसे हर तत्व से, जो चुनावों का बहिष्कार करने के लिए लोगों को संगठित कर पाते, सड़कों को साफ कर देने के बाद 2008 के चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया गया। अभूतपूर्व रूप से चुनाव सात चरणों और पांच सप्ताह में कराए जाने की घोषणा हुई। सबसे कम प्रतिरोध वाले इलाकों से शुरुआत करना, चुनाव आयोग की परंपरा सी बन गई थी। सुदूर ग्रामीण इलाकों में जहां लोग ज्यादा कटे हुए और कमजोर हैं, इसलिए वोट न डालने का चुनाव करने की आशंका कम होती है। उदाहरण के लिए, दुर्गम गुरेज घाटी में पहले चरण में मतदान हुआ। गुरेज सेना के किसी शिविर सा था जहां 60 हजार सैनिक थे और तीस हजार नागरिक आबादी दूर-दूर तक फैली थी। सिर्फ आधी आबादी वोट डालने के योग्य थी इस हिसाब से एक वोटर पर सेना के चार जवान नजर रखे हुए थे।

कश्मीर घाटी के चप्पे-चप्पे पर सेना फैल गई थी। स्थायी सुरक्षा ग्रिड के तहत तैनात पांच लाख से ज्यादा जवानों के अलावा देश भर से अतिरिक्त सशस्त्र बलों को विमानों से पहुंचाया गया। प्रति कंपनी 100 जवानों के हिसाब से 452 कंपनियां भेजी गईं। हर चरण में लगभग एक हजार पोलिंग स्टेशन थे और एक-एक पोलिंग बूथ पर करीब 50 जवान नजर रख रहे थे। मानो वोटरों पर यह दबाव पर्याप्त न हो, रही-सही कसर पूरी करने के लिए वोट डालने के हर चरण से पहले एक सप्ताह का अभूतपूर्व कर्फ्यू लगा कर सब कुछ बंद कर दिया जाता था।

जब मतदान संपन्न हुआ, शुरुआती आंकड़ों से किसी को हैरानी नहीं हुई। भारी संख्या में सेना की मौजूदगी वाले बांदीपोरा में 64 फीसदी मतदान हुआ। गुरेज में तो 10 फीसदी और भी ज्यादा हुआ। एक सप्ताह बाद, उमर अब्दुल्ला के चुनाव क्षेत्र गंदरबल में 52 फीसदी वोट पड़े। कुपवाड़ा का प्रतिशत 62 रहा।

जैसे-जैसे ज्यादा अस्थिर विधान सभा चुनाव क्षेत्रों में मतदान होता गया, सभी की निगाहें आंकड़ों पर टिक गईं। बारामूला में वोटिंग से कुछ दिन पहले, शहर में हिंसक प्रदर्शन हुए और दो युवकों को गोली मार दी गई। फिर भी मतदान फीसदी 33 रहा, पिछले चुनाव से 10 फीसदी ज्यादा। यह शहरी क्षेत्र में मतदान में अप्रत्याशित उछाल का मात्र एक उदाहरण था। सोपोर का आंकड़ा 8 से बढ़कर 20 हो गया, तराल में 12 से बढ़कर 49 और बिजबेहरा में 17 से जबर्दस्त उछाल के साथ 61 फीसदी हो गया। 2002 में, श्रीनगर के सभी 8 चुनाव क्षेत्रों में कुल मिलाकर सिर्फ 30 हजार वोट डाले गए थे यानी महज पांच फीसदी। पर इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 22 फीसदी पर पहुंच गया था। अचानक जैसे कश्मीरियों की वोट डालने की जरूरत को कोई चीज रोक नहीं पा रही थी यहां तक कि उनके विरोध भी।

लेकिन इन फुटनोटों में कई सवाल दफ्न थे। जैसे ही विस्तृत आंकड़े जारी हुए, साफ हो गया कि पिछले चुनाव के मुकाबले उम्मीदवारों की संख्या दोगुनी हो गई है। 87 चुनाव क्षेत्रों के लिए 1,354 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था। कुछ सीटों पर तो 20 उम्मीदवार तक मैदान में थे जो कि पहले कभी सुना तक नहीं गया था। पांच सौ से ज्यादा निर्दलीय थे जिनमें पहली बार चुनाव लडऩे वाले या ऐसे लोग थे जिन्हें राजनीतिक रूप से कोई नहीं जानता था। उम्मीदवारों की इस बढ़ोतरी में भारतीय राजनीतिक दलों का भी योगदान रहा जिनके रिकार्ड 43 उम्मीदवार मैदान में उतरे।

लगभग सभी 'निर्दलीय और अन्य’ की जमानत जब्त हो गई। यहां तक कि सात सीटों पर मतदान इतना खंडित हुआ कि हारने वाले सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। फिर भी, सभी को कुछ न कुछ वोट तो मिले ही—परिवार के लोगों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों, सहयोगियों, नौकरों या जिन से वे जुड़े थे। कुल मिलाकर इससे हुआ यह कि लोग वोट डालने के लिए बूथों तक आए और वोट प्रतिशत बढ़ाने में कामयाब हुए। मतदान का विरोध करने के लिए बदनाम रही कुछ सीटों पर प्रत्याशियों की भीड़ का सामूहिक असर चौंकाने वाला रहा। तराल में मतदान का प्रतिशत 37 बढ़ा, इस वृद्धि में आधे से ज्यादा का योगदान निर्दलीयों का रहा। इसी तरह पंपोर और पुलवामा में यह एक चौथाई के करीब बढ़ा। दोनों में क्रमश: 65 और 80 फीसदी वोट निर्दलीयों ने उपलब्ध करवाए।

गर्मियों में हुए उग्र प्रदर्शनों के बावजूद, अधिकांश कश्मीर में मतदान के प्रतिशत के बढऩे का कारण समझ से परे था। यह वोटिंग स्तब्धकारी तो थी ही, संभवत: शर्म का कारण भी थी। लोगों ने वोट दिया था क्योंकि वे अनिश्चित दौर में खुद को बचाए रखना चाहते थे।

लोकतंत्र का त्योहार

श्रीनगर के एक व्यापारी ने व्यंग्यात्मक लहजे में इसे अर्फ-ए-जम्हूरियत कहा। अर्फ यानी ईद के त्योहार से पहले पड़ने वाला पवित्र दिन। यह अगले दिन पड़ने वाला था, जब श्रीनगर में वोट पडऩे थे, ईद-ए-जम्हूरियत, लोकतंत्र का त्योहार। उसकी मसाले की दुकान शहर के पुराने हिस्से में थी, जहां किसी भी दिन लोगों की भीड़-भाड़ से गुजरना आमतौर पर असंभव सा हो जाता था। लेकिन इस अप्रैल में आम चुनावों में श्रीनगर संसदीय क्षेत्र जैसे-जैसे अपने मतदान के दिन की ओर बढ़ रहा था, सड़कें धीरे-धीरे वीरान हो रही थीं, बहुत कम ही लोग वहां नजर आते थे। अनंतनाग संसदीय क्षेत्र में बहुत कम मतदान होने और श्रीनगर में युवाओं के संभावित विरोध की आशंका के चलते, प्रशासन कोई भी कसर नहीं छोड़ना था। एहतियातन गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ती जा रही थी; गैर अधिकारिक आकलन के मुताबिक यह संख्या पांच सौ से ज्यादा हो गई थी। पिछले हफ्ते हुए मतदान से पहले जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था वे अब भी बंद थे। श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित हमहमा जेल में लोगों को ठूंस दिया गया था। जो कोई भी चुनावों के बहिष्कार की बात सार्वजनिक तौर पर कर रहा था उसे जेल में बंद कर दिया गया था। इनमें वह प्रत्येक व्यक्ति शामिल था जो प्रतिरोध में नेतृत्व की भूमिका में था—जैसे सैयद अली शाह गिलानी, शब्बीर शाह और यासीन मलिक—जिन्हें 2008 की पूरी गर्मी भर जेल में बंद कर दिया गया था।

मतदान के दिन, लोगों की जो भी ठोस संख्या घर से निकली वो लगता था कि क्रिकेट खेलने के लिए निकली है, ऐसा लगता था कि मानो जिसने हर युवा पुरुष और किशोर को श्रीनगर की गलियों में खींच लिया है। अन्यथा विरान पड़े शहर में हमें अक्सर कामचलाऊ स्टंप ही गली के बीचों-बीच घेंटे हुए मिलते थे। ऐसे एनकाउंटर्स की एक लय थी : जैसे-जैसे हम हर पिच के करीब आते थे हमें सड़क पर फैले हुए पत्थरों से समझौता करने के लिए अपनी गति धीमी करनी पड़ती थी। तब फील्डर बड़ी लापरवाही से हाथ हिलाते हुए आपकी कार के करीब से गुजर जाते थे, सही रास्ते का इशारा करते हुए।

उस दिन जम्मू-कश्मीर पुलिस के दंगा रोधी दस्ते ने भी क्रिकेट के पैड पहने थे मानो कि वे भी क्रीज पर बुलाए जाने का इंतजार कर रहे हों। उनके पैड का रंग भी उनकी यूनिफॉर्म की तरह खाकी था, जो कि उनकी पैडेड (गद्देदार) बनियान से मेल खाता था। एड़ी से लेकर ठोड़ी तक गद्देदार बने हुए और सिर पर हेलमेट के साथ पुलिस पत्थर फेंकने वालों के लिए तैयार थी।

देर दोपहर के बाद जब मतदान खत्म हुआ तब स्टंपों को हटा लिया गया। उस वक्त तक सड़कों के किनारे मेहनत से पत्थरों के ढेर लगाए गए थे और यह साफ हो चला था कि क्रिकेट तो महज एक शुरुआत थी। गोधूली की बेला में, वोटिंग मशीनों और निर्वाचन अधिकारियों को सुरक्षा घेरे के साथ पोलिंग बूथों से सुरक्षित बाहर निकाला जाना था और उसके बाद ही सघन सुरक्षा घेरे को हटाया जा सकता था। वो वक्त काफी तनावपूर्ण और संवेदनशील था, और, जब हम पुराने शहर के भीतर उसके केंद्र की ओर बढ़ रहे थे, त्वरित कार्रवाई (रिएक्शन) टीमें लगातार पहुंच रही थीं। जामिया मस्जिद के नजदीक केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के सैकड़ों जवान जमा थे। यहां पर कोई खाकी क्रिकेट पैड का आकर्षण नहीं था—सिर्फ डरावने काले रंग के रॉयट गियर (हिंसा की स्थिति के समय पुलिस द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए पहने जाने वाले कपड़े और उपकरण) थे। एक युवा दोस्त ने उन्हें, 'सस्ते काले प्लास्टिक में डार्थ वादेर’ कहा था। यहां तक कि सांझ के धुंधलके में, संकेत साफ नजर आ रहे थे। दिन भले ही सुरक्षा बलों के नाम रहा हो, लेकिन संध्याकाल में दोनों पक्ष समान रूप से अधिक मजबूत नजर आ रहे थे। प्रेस सहित हर कोई जो बीच में फंसा था, उसके लिए वहां से निकल जाना ही बेहतर था।

हम भीतरी श्रीनगर के प्रेशर कुकर की भांति वाले दबाव क्षेत्र से बचकर थोड़ा ही आगे निकले थे जब हम तक ये खबरें पहुंची कि एक निर्वाचन अधिकारी का सिर पत्थर से फोड़ दिया गया है। वैसे यह महज एक अफवाह साबित हुई—किंतु कश्मीर में ऐसे विपथन (डाइवर्शन) जिन्हें आप छिपाकर रखना चाहोगे, वे अक्सर सूचना से ठीक पहले पहुंच जाते हैं। हालांकि बाद में एक के बाद एक बुरी खबरें आने लगीं। बशीर अहमद भट्ट नाम का 24 साल का कारीगर दिन भर की मजदूरी के बाद नहाकर घर से गली में यह देखने निकला था कि वहां क्या हो रहा है कि तभी उस क्षेत्र से बड़ी सावधानी के साथ पीछे हट रहे अति तनावपूर्ण अर्धसैनिक बल ने फाइरिंग शुरू कर दी और भट्ट ने कैज्युअलटी वार्ड में ले जाए जाने से पहले ही दम तोड़ दिया। स्थानीय अस्पतालों से ऐसी और खबरें मिल रही थीं। हलीमा नाम की एक युवती और नजीर अहमद कालू नाम के एक किशोर को गोली लगी थी।

इस बीच, श्रीनगर चुनाव क्षेत्र से अति महत्वपूर्ण मतदान के आंकड़े आने लगे थे। इस बार यहां 26.64 फीसदी मतदान हुआ था जो 2009 के आम चुनाव के मुकाबले एक फीसदी ज्यादा था। लेकिन इस पुराने शहर के पड़ोस में मतदान के बहिष्कार की परंपरा जारी रही। अमीराकदल में 7.7, बटमालू में 13, ईदगाह में 10.8, हब्बाकदल में 4.3, हजरतबल में 17.9, खानयर में 10.2 और जादीबल में 5.6 फीसदी मतदान हुआ।

अगली सुबह, मैंने अखबारों में हलीमा और नजीर अहमद की खबरें ढूढ़ीं पर उनके नाम किसी अखबार में नहीं थे। ऐसा लग रहा था कि नजीर अहमद अस्पताल के अपने बिस्तर से आराम से उठा और चला गया। इसके बाद, इससे अधिक कुछ नहीं पता चला। शायद वह जानता था कि कश्मीर में विरोध प्रदर्शन के बाद केवल मृत व्यक्ति ही जांच—पड़ताल को सहन कर सकता है। जिंदा लोगों के लिए, घायल हों या न हों, रिकॉर्ड पुस्तिकाओं से दूर रहने में ही भलाई है।

एक हफ्ते बाद, मैं उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के त्रेहगाम कस्बे में था। सुबह के 7.45 बजे, सरकारी बालिका माध्यमिक स्कूल, बोनपोरा, के बहुत ज्यादा सुरक्षित और बड़े परिसर में पहले से ही चहल-पहल थी। बारामूला संसदीय क्षेत्र, जो पूरे उत्तरी कश्मीर को कवर करता है, को चुनाव के इस आखिरी चरण में संसद का अपना सदस्य चुनना था। हाथों में मतदाता पहचान पत्र लिए महिलाओं और पुरुषों की लंबी कतारें लगी थीं। एक पोलिंग एजेंट ने मुझे बताया कि 'यहां 4,761 मतदाता हैं, सर’। इतनी सुबह प्रेस को देखकर वह हैरान लग रहा था। मैं पोलिंग एजेंट को देखकर आश्चर्यचकित था। 'इंशाअल्लाह, आज बहुत बड़े पैमाने पर मतदान (टर्नआउट) होगा’, कश्मीर में तो हमेशा ही मतदान (टर्नआउट) है।

इस इलाके में सर्वत्र 'सर’ शब्द का इस्तेमाल यह बता रहा था कि यहां कितनी भारी संख्या में सेना मौजूद है। युवा लड़कों से लेकर झुर्रीदार बुजुर्गों तक, हर एक बाहर से आने वाले फौजियों या नागरिकों को यही कह कर संबोधित करते हैं, चाहे उनका रुतबा और उम्र कुछ भी हो। पाकिस्तान की सीमा के नजदीक बसे त्रेहगाम में 1947 से ही सेना की ब्रिगेड मौजूद है। क्षेत्र में हजारों की संख्या में तैनात जवानों को देखकर कुपवाड़ा सेना का गढ़ लगता है। 1990 में कश्मीर में उग्रवाद से लडऩे के लिए बनी सेना की राष्ट्रीय राइफल्स—विशिष्ट काउंटर इन्सर्जन्सी फोर्स, इस जमीन की हर महत्वपूर्ण जगह पर काबिज है। शहरों में ऐसे बोर्ड लगे हैं जिन पर 'टाउन कमांडर’, जो अक्सर सेना का एक मेजर होता है, का नाम और सेल फोन नंबर लिखा हुआ है, ताकि वहां के बाशिंदे उससे संपर्क स्थापित कर सकें। कुपवाड़ा की दो अहम घाटियों, लोलाब और राजवर में सुरक्षा के तगड़े इंतजाम हैं। एक बार शाम को गेट बंद हो जाए तो कुछ भी फौजियों को उन्हें दोबारा खोलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता- एक डॉक्टर की आवश्यकता या प्रसव पीड़ा से पीड़ित किसी भी महिला की मदद के लिए अति आवश्यकता।

एक शाम मास्टर जी के नाम से जाने जाने वाले एक स्थानीय स्कूल टीचर ने मुझसे बातचीत में कुछ अहम सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कड़ाके की ठंड में, हर चार फौजियों को एक बुखारी यानी कोयले से चलने वाला हीटर मिलता है। उन्होंने बताया, '300,000 फौजियों के हिसाब से पूरी सर्दियों के दरम्यान 75,000 बुखारियां जलाई जाती हैं। इसके लिए उतनी ही मात्रा में कोयला चाहिए जिसे लेकर हजारों ट्रक कुपवाड़ा की सड़कों पर रोजाना दौड़ते हैं। वाहनों की अनगिनत आवाजाही के चलते सेब की फसल को तो भारी नुकसान हुआ ही है, साथ ही इनके रास्ते में पड़ने वाले बागों की पैदावार में भी गिरावट आई है।’ साथ ही ज्यादा भू-भाग पर सेना के कब्जे की वजह से गांव के लोग अपने जानवरों के लिए चारा भी नहीं ले जा पाते और न ही जलाने के लिए लकड़ियां। यहां तक कि स्थानीय सुविधाएं भी पहले सेना के शिविरों को ही मिलती हैं जो हमेशा से ऊपरी हिस्से में रहे हैं। कुछ विशिष्ट जिद्दी गांवों में तो सुरक्षा बल अपनी इच्छा से पानी रोक सकते हैं—यह एक ऐसी धमकी है जिसे कोई भी किसान नहीं सह सकता।

मास्टर जी ने कहा, 'जब कोई सैनिक हमें गाली नहीं देता, सिर्फ आदेश देता है तो हमें खुशी होती है, बहुत खुशी होती है, सर।’ मास्टर जी का आगे कहना था, 'और जब कोई सैनिक यहां की किसी महिला को छेड़ता है तो हमें उतना असामान्य नहीं लगता। हमने गालियों पर ध्यान देना ही छोड़ दिया है, सर। अब तो हम इस पर सामान्य (नार्मल) रहते हैं।’

'आप जानते हैं, कुनन-पोशपोरा यहां से ज्यादा दूर नहीं हैं’, वह उन दो गांव का जिक्र कर रहे थे जहां 1991 में सेना के जवानों ने सामूहिक बलात्कार किया था। 'विधवाओं का गांव दर्दपोरा भी पास में ही है’, जहां के सैकड़ों पुरुष सशस्त्र उग्रवाद में मारे गए थे। 'और हमारे हीरो मकबूल बट्ट की मां अब भी इसी शहर में रहती हैं, सर। फिर भी हमारे यहां 85 प्रतिशत मतदान हुआ है। और यही आपको समझने की जरूरत है।’

कुपवाड़ा से दूर जाना ऐसा था जैसे नरक में झांक कर लौटना। पिछले 25 सालों में इस जिले में हजारों लोग मारे गए थे। पहाड़ों पर उनकी कब्र अंकित है। गुजर-बसर के लिए, जो स्वायत्तता बचती है उस पर हर रोज कई-कई बार की जाने वाली जांच और तलाशी के निर्मम डंडे का अनुशासन है। इस शासन में बस जिंदा रहने के लिए, किसी न किसी तरह की पहचान होना जरूरी है। 18 साल के ऊपर के हर व्यक्ति के लिए सरकार की ओर से जारी मतदाता पहचान पत्र ही सेना को स्वीकार्य है। मतदाता बनने के लिए पंजीकरण करवाइये और फिर वही आपकी पहचान बन जाती है। 'जिसे चाहे उसे वोट दीजिए’, सेना के एक ब्रिगेडियर ने त्रेहगाम में एक बार मेरे दोस्त को कहा, 'पर वोट जरूर दीजिए, वही तो आपकी पहचान है।’ आपकी इकलौती पहचान।

कश्मीर के इस दूरस्थ कोने में 'मतदान’ का मतलब यह नहीं था कि आपके घर के नलों में अब पानी आने लग जाएगा, जले ट्रांसफॉर्मर ठीक कर दिए जाएंगे या खराब सड़कों को दुरुस्त कर दिया जाएगा। इस जिले में लोग सिर्फ जिंदगी और स्वायत्तता से जुड़े सवालों को दूर रखने के लिए वोट डालते हैं। शायद अनजाने में मैंने मास्टर जी से पूछा, 'क्या इस डर से लड़ने का कोई तरीका नहीं था।’ मेरे सवाल के जवाब में उन्होंने नामों के एक पूरी लिस्ट गिना दी—हबीबुल्लाह वानी, त्रेहगाम के एक टीचर; सैफुद्दीन शेख, अलूसा के एक लेक्चरर; अली मोहम्मद मीर,दर्दपुरा पायीन के एक टीचर; अल्ताफ हुसैन खान, हैहामा के टीचर। ये सभी दानिशमंद तबके के लोग थे। ये सब मर चुके हैं, इन्हें अलग-अलग अस्पष्टीकृत मुठभेड़ों में मारा गया है।

फिर भी बारामूला संसदीय क्षेत्र के शहरी इलाकों में लोगों ने चुनाव के आखिरी दिन विरोध किया था। उस दिन सुबह, सोपोर में इतनी ज्यादा पत्थरबाजी हुई कि अधिकारियों को आनन फानन में 18 पोलिंग स्टेशनों की जगह बदलनी पड़ी। उनके उपकरणों और स्टाफ को सरकारी डिग्री कॉलेज के सुरक्षित परिसर में ले जाया गया। दोपहर से पहले, इन 18 पोलिंग बूथों पर सिर्फ छह वोट डाले गए थे। पलहालन में तो दिन की शुरुआत ही पोलिंग बूथ के बाहर आईईडी विस्फोट से हुई थी। इसमें कोई घायल नहीं हुआ था। सुबह से शाम हो गई, लेकिन छह हजार की आबादी वाले इस गांव ने अपनी पुरानी छवि बरकरार रखी : एक भी वोट नहीं डाला गया।

बारामूला शहर के बाहरी इलाके में, हमारी गति राष्ट्रीय राइफल्स कैंप के बाहर वाली सड़क पर क्रिकेट खेल रहे कुछ लड़कों के कारण धीमी हो गई। इस बटालियन के सिख सैनिकों की बहुत क्रूर छवि थी और इस बात की संभावना कम थी कि यह खेल, पथराव में तब्दील होगा। कुछ किलोमीटर आगे जाने पर हमें कैंप के कुछ फौजियों ने रोका। ऐसा लगा कि उन्हें किसी का इंतजार है, उनकी निगाहें आस-पास की सड़कों पर थीं। उनकी पीठ पर ऑटोमैटिक हथियार टंगे हुए थे और हाथ में साफ ऐक्रेलिक शील्ड थी—जो याद दिला रही थी कि सशस्त्र उग्रवादी गुटों से करीब दो दशक से लडऩे वाले राष्ट्रीय राइफल्स को अब कश्मीर में युवा संग-बाजन,पत्थर फेंकने वाले, की फौजों, और लंबे समय से टलते आ रहे लोगों के संभावित विरोध का सामना करना है।

समय-समय पर सतर्क फौजियों की ओर कुछ पत्थर फेंके जाते रहे। एक समय पर, उनमें से एक अधिकारी अपने ग्रुप से बाहर निकला और हमें पीछे हटने का आदेश दिया। वह जवान था, शायद 25 साल का रहा होगा, जिन लड़कों को वह खोज रहा था उनसे अधिक उम्र का नहीं था। वह अचानक सड़क पर पड़े पत्थरों के ढेर की तरफ तेजी से भागा और उनमें से कुछ पत्थर उठाकर अपनी शील्ड को ठीक से संभालते हुए पथराव कर रहे लोगों की दिशा में दौड़ पड़ा। 'आ रहा हूं बहनचोद, आ रहा हूं बहनचोद’, वह दौड़ते हुए बार-बार यह चिल्लाता रहा। उसके मातहत, जिनमें कुछ पुराने वरिष्ठ सैनिक भी शामिल थे, थोड़ा हैरान दिखे पर सिर्फ एक पल के लिए। इसके बाद उन्होंने भी ठीक वही किया जो उनके साहिब ने किया। उन सब ने पत्थर उठाए और उसके पीछे-पीछे दौड़ पड़े।

हमने जब कार को पीछे किया, तो उस गली की हल्की सी झलक देखने को मिली जिसमें पथराव करने वाले लोग छिपे हुए थे। गली के आखिर में खड़े वे मुठ्ठीभर लोग बिल्कुल वैसे ही कपड़े पहने हुए थे जैसे बाजार में घूमते या क्रिकेट खेलते लड़के पहने रहते हैं। उनमें से ज्यादातर को अपना चेहरा छिपाने की परवाह नहीं थी। वे लगातार वहीं खड़े फौजियों को इशारों से उकसाते रहे जब तक कि सैनिक बहुत करीब नहीं आ गए। फिर उनके पीछे से भी पत्थर बरसने लगे और शील्ड से टकराते हुए पत्थरों के चटकने की आवाज आने लगी। यह आक्रमण इतना भयानक था कि फौजी अपनी जगह पर ही स्तब्ध रह गए। एक हल्के से विराम के बाद लड़कों का एक नया दल उभरा, जिनके हाथ पत्थरों से भरे हुए थे। जैसे ही फौजी उस ताजे पथराव में पीछे हटने लगे, हमारे ड्राइवर ने कहा कि अब यहां से निकलने का वक्त आ गया है। 'एक अपमानित फौजी से ज्यादा खतरनाक कुछ नहीं होता’, कार को तेजी से पीछे करता हुआ वह बोला। 'मैं नहीं चाहता कि मेरी विंडशील्ड बिना वजह तोड़ दी जाए।’

''हर कोई विरोध नहीं करता, सर’’, मास्टर जी ने कुपवाड़ा में कहा था। झुक जाने के अपने फायदे हैं। जब आप ग्रामीण इलाकों में गए, तो क्या आपने हर गांव में उजागर होती नई चमकदार लाल छतें नहीं देखीं? वे लोग कौन हैं? ये वे लोग हैं जो इस सहभागिता (कलैबरैटिंग) से लाभान्वित हो रहे हैं। वे कुपवाड़ा में कोयला और लकड़ी के ठेकेदार हैं। वे हाल ही में बनाए गए सरपंच हैं।

''पर हमारे गांव में वोटिंग को लेकर सिर्फ एक बात कही जाती है’’, उसने अपनी बात खत्म करते हुए कहा। ''यह पाप है, सर। बहिष्कार के सिवाय कोई चारा नहीं।’’

बलपूर्वक शासन और प्रलोभन के अपने मिश्रण में सरकार द्वारा डाले जा रहे नए तत्व को मास्टर जी ने चुना था। 2011 में हुए पंचायत चुनावों ने इसके लिए कुछ जमीन तैयार कर दी थी, इसमें तीस हजार से ज्यादा लोग स्थानीय सरकार में चुने गए थे। इनमें से कई पढ़े लिखे थे, अच्छे परिवारों से थे, सम्मानीय थे, इनमें गांव स्तर के प्रभावशाली पुरुष और महिलाएं भी शामिल थीं। ये सब सीधे दिल्ली से आने वाले फंड के वादे से आकर्षित हुए थे। पूरे कश्मीर में, उन पंचायत चुनावों में 82 फीसदी मतदान हुआ था। इसके अलावा, बॉर्डर एरिया डेवलेपमेंट प्रोग्राम, नेशनल एग्रीकल्चर डेवलपमेंट स्कीम, नेशनल सैफ्रन (केसर) मिशन और मनरेगा जैसी योजनाओं—जिनकी सूची बढ़ती ही जा रही है, के तहत भी लगातार चुपचाप पैसा आ रहा था। इस बड़ी राशि में छोटी सी हिस्सेदारी भी घाटी के गांवों और शहरों में रह रहे ये तीस हजार लोग इन चुनावीं उपकरणों के लिए बहुमूल्य हुजूम हैं।

आम चुनाव के चंद महीनों बाद, मैं सैयद अली शाह गिलानी के घर गया, वो शख्स जो चुनाव बहिष्कार की सबसे ज्यादा वकालत करता है। वह तहरीक-ए-हुर्रियत के प्रमुख हैं, जिसे हुर्रियत कॉन्फ्रेन्स का कट्टरपंथी धड़ा माना जाता है। उस समय, गिलानी श्रीनगर में तीन महीने से ज्यादा वक्त तक घर में नजरबंद थे। 86 साल के कमजोर गिलानी को सेहत से जुड़ी कई परेशानियां हैं। वह लगातार पुलिस की निगरानी में रहते हैं और उनसे मिलने के लिए आने वाले लोगों पर नजर और निगरानी रखी जाती है। मैंने गिलानी से पूछा कि क्या प्रतिरोध की राजनीति, व्यक्तिगत, भौतिक इच्छाओं का सामना कर सकती है। एक पल के लिए लगा कि इस सवाल ने उन्हें अचंभे में डाल दिया है। जब उन्होंने जवाब दिया तो शायर इकबाल के शब्द दोहरा रहे थे, जैसा की वह अक्सर करते हैं : 'मौत है ए सख्त तर, जिसका गुलामी है नाम, मकर-ओ-फन-ए-खवाजगी काश समझता गुलाम।’ गुलामी मौत से ज्यादा बदतर है, काश मालिक की ये चालें गुलाम समझ पाता। 'गुलामी, लोगों की आत्मा, आचरण, चरित्र और यहां तक कि उनके भरोसे को भी बदल देती है’, गिलानी ने मुझे धीरे से कहा और हमारी मुलाकात वहीं खत्म हो गई।

'मोट’ का अर्थ

शोपियां में मेरे एक दोस्त ने एक और दृष्टांत सुनाया : चुनाव की सुबह गांव का 'मोट’ बहुत तड़के उठकर खुशी-खुशी सरकारी माध्यमिक स्कूल में मतदान करने जाता है।

सरलीकृत ढंग से कहा जाए तो 'मोट’ का मतलब परपंरागत रूप से मूर्ख होता है। लेकिन इसका कश्मीरी मतलब और बहुत कुछ कहता है। इसलिए पागल और साथ में वे सभी लोग जो सीखने की विकलांगता या यहां तक कि जिनका व्यवहार सनकी/झक्की हो वे सभी शामिल हैं। इनके साथ कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में लोग हमेशा बहुत ही दया और स्नेह के साथ व्यवहार करते हैं। उनके बारे में लोग सोचते हैं कि उनमें यह फर्क आध्यात्मिक संबंधों के उच्च स्तर की वजह से है, यहां तक कि यह दिव्यता को देखने वाली एक खिड़की है।

वापस गांव लौटते समय उसकी तर्जनी उंगुली पर नहीं मिटने वाला वोट डालने का बैंगनी रंग का निशान उसका एक मतदाता के रूप में ओहदा निश्चित करता है। मोट वहां खड़े कुछ युवाओं की तरफ जाता है और एक सिगरेट सुलगाता है। युवाओं का यह समूह आज जल्दी उठ गया था और एक दुकान के बाहर बैंच पर बैठकर यह सुनिश्चित करने वाला था कि अधिकांश लोग वोट न डालें। थोड़ी देर में क्रोध से भरी चिल्लाहट सुनाई देती है जब वे देखते हैं कि वो मोट जिसे वे चोट नहीं पहुंचा सकते उसने उन्हें धोखा दिया है। मोट के होठों से सिगरेट खींचते हुए एक युवक कहता है अब तुम्हें सिगरेट नहीं मिलेगी। और वे सभी इस बात पर सहमत होते हैं कि अब इसे कोई खाना नहीं खिलाएगा। और खासतौर से क्रोधित एक युवक कहता है कि हम तुम्हारे जूते चुरा लेगें और तुम्हें पूरी सर्दी नंगे पैर गुजारनी पड़ेगी। और कब्रिस्तानों में जो शहीद अपनी कब्रों में लेटे हैं—तुम्हें क्या लगता है वे तुम्हें कभी सोने देंगे?

इतना मोट के लिए पर्याप्त था और वह पलटकर सीधा पोलिंग बूथ की तरफ जाता है। गेट पर सुरक्षाबलों को पार करता है, वोटर लिस्ट चेक कर रहे लोगों के पास से गुजरता हुआ सीधा पोलिंग ऑफिसर को पास पहुंचता है। मुझे मेरा वोट वापस चाहिए, वह कहता है। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वोटिंग मशीन से उसे अपना वोट वापस मिलना असंभव है। और वह उनसे घंटों बहस करता है। अंतत: उत्तेजित अफसर उसे पुलिस के हवाले कर देता है। इसके बाद मोट कई घंटों तक अपने वोट को वापस करने की मांग को लेकर सब इंस्पेक्टर को परेशान कर देता है। पहले प्यार से, बाद में घुड़क कर और अंत में गुस्से में उसे कहा जाता है कि यह संभव नहीं है। इसके बाद भी वह चुप नहीं होता। पुलिसवाले दुकान की तरफ बैठे युवकों की तरफ देखकर कहते हैं कि इस आदमी से उलझने के बजाय कानी-जंग से निपटना बेहतर है और अंतत: सब इंस्पेक्टर उसे नजदीक के किसी सेना पेट्रोलिंग पार्टी के सुपुर्द कर देता है।

अब मोट सेना के एक युवा कैप्टन को एक उग्र भाषण देता है और मांग करता है कि उसका वोट वापस लौटा दिया जाए। कैप्टन इस अनुरोध से सकपका जाता है और उसे बताता है कि इसे पूरा करना असंभव है। मोट के लिए यह कोई उत्तर नहीं है। अंतत: क्योंकि कैप्टन को मोट को दिए जाने वाले सम्मान के विषय में कुछ पता नहीं होता, तो वह एक सैनिक को आदेश देता है कि मोट को ले जाकर सेना के शिविर की बाढ़बंदी के परे छोड़ दिया जाए। मोट वहां बैठ जाता है किंतु उसका इरादा अभी भी हल्का नहीं पड़ता।

दिन के अंत में, पोलिंग ऑफिसर सारी वोटिंग मशीनों को ले जाकर एक वैन में डाल देता है। वोटिंग मशीनों के अगल-बगल में पुलिस एक साये की तरह लगी रहती है, और जिन पर दूर से सेना के गश्तीदल नजर बनाए रखते हैं। गोधूलि वेला में सभी चले जाते हैं। हवा में फडफ़ड़ाते फिरन के साथ मोट इस छोटे से कारवां के पीछे-पीछे दौड़ पड़ता है। दुकान के बाहर बैठे युवा उसे बारम्बार यह चिल्लाते हुए सुन सकते हैं।
 

मुझे मेरा वोट वापस चाहिए। 

बिना जातियों का खात्मा किए स्वच्छ भारत नामुमकिन

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/20/2014 07:44:00 PM

आनंद तेलतुंबड़े

नरेंद्र मोदी की नाटकबाजी खत्म होती नहीं दिख रही है. पिछले छह महीनों के दौरान, जबसे वे भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, उन्होंने बहुत सारी नाटकबाजियां की हैं, लेकिन उस ‘अच्छे दिन’ के कोई दर्शन नहीं हुए हैं, जिसका वादा उन्होंने जनता से किया था. पिछले शिक्षक दिवस पर उन्होंने स्कूली बच्चों की छुट्टियां रद्द कर दीं और टीवी पर उन्हें सुनने के लिए बच्चों को स्कूल आने को कहा. इस गांधी जयंती पर भी उन्होंने श्रद्धांजली के बतौर दी जाने वाली राष्ट्रीय छुट्टी को रद्द कर दिया और लोगों को झाड़ू उठा कर स्वच्छ भारत अभियान शुरू करने को कहा. हालांकि उनकी दूसरी नाटकबाजियों से हल्के-फुल्के विवाद उठे थे, लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस आखिरी वाले को ज्यादातर लोगों ने अपना लिया है जबकि यह संभावित रूप से सबसे विवादास्पद और समस्याग्रस्त है. चूंकि मोदी यहां गांधी की भूमिका अदा कर रहे हैं, क्योंकि खुद उन्होंने गांधी पर सवाल खड़े किए थे और उन्हें खारिज किया था, क्योंकि एक ‘महान राष्ट्र’ के रूप में भारत की छवि के लिहाज से यह मुद्दा इतना अहम था कि इस पर विवाद खड़े होते, लेकिन इन सबसे अलग इस चुप्पी की मुख्य वजह यह थी कि सामूहिक रूप से इस बात को लेकर लोग अनजान है कि गंदे भारत की जड़ें जातीय संस्कृति में हैं और वे जातियों के उन्मूलन के लिए जरिए इसके खात्मे की जरूरत से और भी अनजान हैं.

गंदगी की वजह

इसमें बहुत कम संदेह है कि भारत दुनिया में अनोखे रूप से एक गंदा देश है. हालांकि देशों की तुलना करने के लिए गंदगी का कोई सूचकांक नहीं है, लेकिन बहुत कम लोगों ही इससे इन्कार करेंगे कि भारत में जिस तरह हर जगह गंदगी पाई जाती है, वह कहीं और मुश्किल से ही मिलती है. बिना सोचे-विचारे गंदगी को करीबी से जोड़ दिया जाता है. चाहे वह व्यक्ति के स्तर पर हो या देश के स्तर पर, गरीबी के नतीजे में तंदुरुस्ती के बुनियादी ढांचे तथा साफ-सफाई कायम रखने वाले बंदोबस्त का अभाव पैदा होता है. चूंकि भारत में व्यापक गरीबी है, इसलिए गंदगी को भी चुपचाप कबूल कर लिया जाता है. लेकिन यह रिश्ता टिकता नहीं है. दुनिया में भारत से भी गरीब देश मौजूद हैं लेकिन वे साफ-सफाई के मामले में भारत से बेहतर दिखते हैं. भारत में सार्वजनिक शौचालयों के, जहां कहीं वे मौजूद हैं, आसपास लोगों को शौच करते देखना एक आम नजारा है. साफ-सफाई गरीबी से बढ़ कर संस्कृति का मामला है. गरीबों को गंदगी की दशा में मेहनत करनी पड़ती है. भूमिहीन खेतिहर के रूप में वे कीचड़ से भरे खेतों में काम करते हैं, गैर-खेतिहर मजदूरों के रूप में वे कंस्ट्रक्शन या खुदाई या दूसरी तरह के उद्योगों में काम करते हैं, वे कहीं अधिक गंदे और धूल भरे परिवेश में काम करते हैं. लेकिन तब भी वे अपने आस पास काम लायक सफाई बरकरार रखते हैं. जाहिर है कि गरीब लोग वैसी साफ-सफाई नहीं रख सकते जो अमीरों से मेल खाती हो, लेकिन वे काम लायक तंदुरुस्ती और साफ-सफाई की अहमियत बहुत स्वाभाविक रूप से जानते हैं. इसे गांव के सबसे गरीब लोगों और आदिवासी बस्तियों में आसानी से देखा जा सकता है. यहां  तक कि शहरी झुग्गियों तक के लिए यह बात बहुत हद तक सही है; अनेक बाधाओं के बावजूद गरीब लोग अपनी झोंपड़ियों में काम लायक सफाई बनाए रखते हैं. इसकी वजह यह है कि वे तंदुरुस्ती और साफ-सफाई की कमी की वजह से बीमार पड़ने का जोखिम नहीं ले सकते. बुनियादी तौर पर गंदगी सार्वजनिक गतिविधियों से पैदा होती है और उसमें अमीरों का योगदान उनके अनुपात से ज्यादा है. इसकी तुलना अमीरों द्वारा वैश्विक पर्यावरण को अनुपात से अधिक पहुंचाए गए नुकसान से की जा सकती है.

तब फिर कौन सी बात भारत की गंदगी की व्याख्या कर सकती है? इसका जवाब भारतीय संस्कृति में निहित है, जो कि जातीय संस्कृति के अलावा और कुछ नहीं है. यह संस्कृति सफाई कायम रखने की जिम्मेदारी एक विशेष जाति पर थोपती है. यह काम को गंदा तथा कामगारों को अछूत बता कर उनकी तौहीन करती है. हालांकि ऐसा हो सकता है कि खुल्लमखुला छुआछूत को आज व्यवहार में भले न लाया जा रहा हो, लेकिन यह बहुत हद तक अब भी मौजूद है, जैसा कि कुछ सर्वेक्षणों में दिखाया गया है. ये सर्वेक्षण एक्शन एड द्वारा सन 2000 में 50 गांवों में, तथा अहमदाबाद स्थित ‘नवसर्जन ट्रस्ट’ और रॉबर्ट एफ. केनेडी सेंटर फॉर जस्टिस एंड ह्यूमन राइट्स द्वारा 2009 में मोदी के गुजरात में किए गए. छुआछूत से बढ़कर, भारतीयों के व्यवहार में व्यापक रूप से जातीय आचारों की झलक मिलती है. इन आचारों ने प्रभावी तरीके से विभिन्न कामों को जातीय और लैंगिक रूप दिया है, और यह शिक्षा, वैश्वीकरण और शहरीकरण के प्रसार के बावजूद बदलने से इन्कार कर रहा है. एक तरफ जहां पूरी दुनिया में लोग ‘सिविक सेंस’ और सफाई बनाए रखने की बुनियादी जिम्मेदारी को निभाते हैं, और उन्हें सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सफाई कर्मियों पर उनकी गौण निर्भरता ही होती है, भारत में लोग कचरा फैलाने में एक (ऊंची जातियों वाली) श्रेष्ठताबोध महसूस करते हैं, जिसे फिर बाद में निचली जाति के सफाईकर्मी द्वारा साफ किया जाएगा. अगर सफाई करने वालों के इस छोटे से समुदाय, जिसको गंदगी से भी बदतर समझा जाता है और उसका भरपूर शोषण किया जाता है, पर 1250 मिलियन लोगों द्वारा बेधड़क पैदा की गई गंदगी को साफ करने की जिम्मेदारी रहेगी तो इस देश को इसी तरह गंदा रहना तय है. यह इसी तरह का है कि क्षत्रियों के एक छोटे से समूह को दी गई सुरक्षा की जिम्मेजारियों ने भारत को गुलामी का इतिहास दिया या फिर ज्ञान पर एकाधिकार वाली ब्राह्मणों की एक छोटी सी जाति ने भारत को एक जाहिल और पिछड़ा देश बनाए रखा.

भीतर छुपा जातिवाद


इससे यह बात निकल कर आती है कि जब तक जातीय संस्कृति को खत्म नहीं किया जाता और लोग खुद साफ-सफाई की जिम्मेदारियों को जीवन में नहीं उतार लेते, तब तक कितने भी अभियान चलाए जाएं, वे कामयाब नहीं होंगे. हैरानी की बात है कि मोदी के इस अभियान में जाति के ज अक्षर का जिक्र भी शामिल नहीं है. इससे आम तौर पर अभिजातों द्वारा जाति के अस्तित्व को खारिज किए जाने या कम से कम उन्हें कोई मुद्दा ही न मानने के चलन की बू आती है. मोदी को यह बात कभी समझ में नहीं आएगी कि ऐसे किसी सफाई अभियान के वाल्मीकि बस्ती से शुरू करना असल में वाल्मीकियों और सफाई के बीच रिश्ते को मजबूत करना ही है. गांधी ने भी अपने सरपरस्ती भरे लहजे में यही किया था, बिना जातियों के खिलाफ बोले उन्होंने दिल्ली के भंगियों के बीच रह कर उन्होंने बस अपने महात्मापन का प्रदर्शन किया था. मोदी अपनी अक्ल का यह हिस्सा गांधी से ही हासिल करते हैं, जब वे वाल्मिकियों के बारे में ये लिखते हैं:
 

‘मैं नहीं मानता कि वे सिर्फ रोजी रोटी के लिए सिर पर मैला ढोते हैं...कभी किसी को जरूर यह प्रबोधन प्राप्त हुआ होगा कि पूरे समाज और ईश्वर की प्रसन्नता के लिए काम करना उनका कर्तव्य है. कि उन्हें द्वताओं से आशीर्वाद के रूप में प्राप्त हुआ यह काम करना ही होगा और सदियों से मैला ढोने का यह काम एक आंतरिक आध्यात्मिक अनुभूति के रूप में जारी रहना चाहिए.’ (पृ. 48-49, कर्मयोग, मोदी के भाषणों का संकलन) 

उम्मीद के मुताबिक, इन ‘आध्यात्मिक’ टिप्पणियों को तमिलनाडु के दलितों की तरफ से कड़ी निंदा का सामना करना पड़ा, जिन्होंने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में मोदी का पुतला दहन किया. लेकिन दो साल के बाद भी, उन्होंने यही टिप्पणी सफाई कर्मचारियों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए दोहराई, ‘एक पुजारी प्रतिदिन प्रार्थना के पहले मंदिर की सफाई करता है, आप भी शहर को मंदिर की तरह साफ करते हैं. आप और मंदिर के पुजारी एक ही जैसे हैं.’ गांधी की नकल करते हुए, मोदी ने आंबेडकर द्वारा गांधी पर किए गए हमले के प्रति अपनी भारी जहालत को ही उजागर किया है, जिसमें आंबेडकर ने गांधी द्वारा धार्मिक-आध्यात्मिक मक्कारियों की ओट में जाति के बदसूरत यथार्थ को छिपाने की तीखी आलोचना की थी. यह बात तो अब स्कूल के बच्चे भी जानते हैं. मोदी बड़े मजे में समकालीन सफाई कर्मचारी आंदोलन द्वारा सूखे शौचालयों को गिराने के संघर्ष के बारे में भी नहीं जानते, जिसमें नागरिकों के अलावा रेलवे सबसे बड़ा अपराधी है. और कर्नाटक के सवनौर जिले की उस भयानक घटना के बारे में नहीं जानते, जिसमें सफाई कर्मचारियों ने हताशा में अपने उत्पीड़न के खिलाफ विरोध जाहिर करते हुए अपने सिर पर सार्वजनिक रूप से मानव मल उंड़ेला था. जातियों की तरह, सरकार सूखे शौचालयों या सिर पर मैला ढोने वाले सफाई कर्मियों के दुख को भी नकारती रही है. मोदी जो कुछ कह रहे हैं, उसका एक ही मतलब है कि दलितों के ब्राह्मणवादीकरण की आरएसएस रणनीति को आगे बढ़ाया जाए, ताकि उनके ब्राह्मणवादविरोधी गुस्से को भोथरा बनाया जा सके और इसे हिंदुत्व के एजेंडे को साकार किया जा सके.

स्वच्छ भारत के पीछे असल में भाजपा की श्रेष्ठतावादी सनक है, जो उसे भरमा कर 2004 में ‘भारत उदय’ की घोषणा करने की तरफ ले गई थी, जबकि देश की 60 फीसदी आबादी खुले में शौच करती है. यह बात मोदी के खाते में जमा होनी चाहिए कि उन्होंने इस शर्मनाक स्थिति को चर्चा में लाते हुए, मौजूदा कार्यकाल में 1.96 लाख करोड़ रुपयों के अनुमानित लागत पर 12 करोड़ शौचालय बनवाने का फैसला किया है. लेकिन यहां भी उन्होंने हाथ की सफाई दिखाई है, क्योंकि वे मुख्यत: उस नवउदारवादी परोपकार पर भरोसा कर रहे हैं, जिसे कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी कहा जाता है. बड़ी कुशलता से उन्होंने सफाई के बुनियादी ढांचे के निर्माण में सरकारी जिम्मेदारियों से बच निकले हैं, वे गांधीवादी आध्यात्मिकता का इस्तेमाल करते हुए, कामचलाऊ नौकरियां पैदा करने तक से बच गए हैं और लोगों को हफ्ते में करम से कम दो घंटे का स्वैच्छिक श्रमदान करने को कहा है. अगर स्वच्छ भारत के लिए यही चाहिए तो अनुमानित स्वैच्छिक श्रमदान 40 मिलियन नौकरियों के बराबर होगा जबकि अभी पूरे सार्वजनिक क्षेत्र में कुल मिला कर 18 मिलियन से भी कम नौकरियां हैं. अगर कोई इस मंसूबे को व्यवहारिकता के नजरिए से देखे तो वह पाएगा कि यह हमेशा की तरह एक आम सरकारी ऐलान है, जिसमें बातें तो बड़ी बड़ी हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.

झूठ का ताना-बाना

 
बेशक नरेंद्र मोदी ने अतीत के किसी भी प्रधानमंत्री से ज्यादा, अलग अलग वर्गों, समूहों और तबकों के लोगों को प्रभावित किया है. इसमें खास तौर से उनके विदेशी श्रोता भी हैं. हालांकि उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले या उसके बाद, उन्होंने जो वादे किए या जिन वादों के पूरा होने का दावा किया, उनके बारे में बहुत भरोसेमंद सबूत नहीं हैं. पिछले लोक सभा चुनावों के दौरान चलाए गए अरबों रुपए के गोएबलीय अभियान में उनके नेतृत्व में गुजरात को विकास के मानक के रूप में पेश किया गया और उनके लिए प्रधानमंत्रित्व हासिल किया गया. लेकिन सच्चाई कुछ और ही है. विकास के ज्यादातर मानकों पर गुजरात साधारण या औसत दर्जे का ही राज्य है. उसके बारे में कुछ भी असाधारण नहीं था, सिवाए इसके मुख्यमंत्री के निरंकुश राजकाज के और कॉरपोरेट दिग्गजों के लिए बिछाई गई लाल कालीन के. गुजरात की जीवंतता के बारे में किए गए बढ़ा चढ़ा कर किए गए दावे इन्हीं दो कारकों तक सीमित थे. जनता के नजरिए से देखें, तो यह दूसरे राज्यों जितना ही अच्छा या बुरा था, और कुछ राज्यों के मुकाबले को यकीनन ही बदतर था. हालांकि महज छह महीनों के दौरान प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के प्रदर्शन पर कोई सार्थक राय गलत हो सकती है, सारी तड़क भड़क, उत्साह और मुग्ध कर देने वाली भाषणबाजी जिसके साथ देश में और बाहर लोगों को इस तरह वशीभूत कर लिया गया है कि वे उन्हें एक असाधारण नेता के रूप में देखें, हमें गुजरात में उनके कार्यकाल की याद दिलाते हैं, जिसमें बातें तो बड़ी बड़ी थीं लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहे.


गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने 2007 में इससे मिलता जुलता एक अभियान – ‘निर्मल गुजरात’ शुरू किया था और बड़े बड़े दावे किए थे. लेकिन गुजरात में कचरा प्रबंधन और प्रदूषण पर उनका रेकॉर्ड भयावह है. गुजरात स्थित एक पर्यावरण कार्यकर्ता रोहित प्रजापति ने भारत के योजना आयोग की 12 मई 2014 की रिपोर्ट ‘रिपोर्ट ऑफ द टास्क फोर्स ऑन वास्ट टू एनर्जी’ से तथ्यों का इस्तेमाल करते हुए सटीक ब्योरे मुहैया कराए हैं [http://sacw.net/article9679.html.]


इन सबके बावजूद, मोदी को शौचालयों और सफाई के मुद्दों को चर्चा में लाने का श्रेय दिया जाना चाहिए, जब पिछले 60 बरसों से शासक इस तथ्य से आंखें मूंदे हुए थे कि भारत खुले में शौच करता है. इसके लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए, भले ही उन्होंने इस अभियान की कामयाबी में बहुत कम भरोसे का निर्माण किया है. जैसा कि प्रस्तावित किया गया है, यह कॉरपोरेट जगत के लिए निवेश का एक और भव्य मौका बनने जा रहा है. मोदी के अभियान में अब तक की सबसे बड़ी खामी यह है कि अगर उन्हें कारोबार से मतलब है तो उनसे असली मुद्दा ही छूट गया है. उन्हें यह जरूर ही समझना होगा कि बिना जातीय स्वभावों को पूरी तरह खत्म किए बिना भारत कभी भी स्वच्छ नहीं हो सकता. 


अनुवाद: रेयाज उल हक

उलटबाँसियां: उल्टी दुनिया की पाठशाला

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/09/2014 03:17:00 PM

एदुआर्दो गालेआनो
अनुवाद: पी.के. मंगलम

अगर एलिस वापस आती

आज से एक सौ तीस साल पहले, आश्चर्यों भरी दुनिया घूमने के बाद एलिस उल्टी दुनिया की खोज में एक आईने के भीतर गई थी। अगर एलिस हमारे जमाने में वापस आती तो उसे किसी शीशे से होकर जाने की जरूरत नहीं होगी; बस खिड़की से बाहर देखना होगा।
इस सदी के खत्म होते होते उल्टी दुनिया हम सबके सामने है; वही दुनिया जिसमें हम रहते हैं  और जहां बायां दाईं तरफ, पेट पीठ में और सिर पैरों में है।
                                           मोंतेविदियो, 1998 के मध्य में

विषय-क्रम

आभार
भाईयों और बहनों, आगे बढ़ते रहिए!
पाठ का हिसाब
माता-पिता के नाम संदेश
अगर एलिस वापस आती
उल्टी दुनिया की पाठशाला
सीखाना उदाहरणों के साथ
विद्यार्थी
अन्याय का शुरुआती पाठ
रंगभेद और पुरुष वर्चस्ववाद के शुरुआती पाठ
पुरोहिती डर की
डर की पढ़ाई
डर का उद्योग
दुश्मनों को अपने हिसाब से कैसे बनाएं: कांट-छांट और दर्जीगिरी के सबक
मठ नीतिशास्त्र का
जमीनी काम: सफल जिंदगी और नए दोस्त कैसे बनाएं
सबक बेकार की आदतों से निबटने के
कुछ भी कर बच निकलने की महाविद्या
मिसालें पढ़ने के लिए
सीनाजोरी हत्यारों की
सीनाजोरी धरती के विनाशकों की
सीनाजोरी चंहुओर पुजाते मोटरइंजन की
सीख अकेलेपन की
सबक उपभोक्ता समाज के
अलग-थलग पड़ने की पूरी तैयारी
एक पाठशाला इन सबके खिलाफ़ भी
खत्म होती सहस्राब्दी के छल और उम्मीद
उन्मुक्त उड़ान का अधिकार
नामों की फेहरिस्त

विद्यार्थी

दिन-प्रतिदिन बच्चों को बचपन के अधिकार से दूर किया जा रहा है। इस अधिकार की हँसी उड़ाते सच अपनी सीखें हम तक रोज़ाना पहुँचाते हैं। हमारी दुनिया धनी बच्चों को यूँ देखती है मानो वे कोई चलती-फिरती तिजोरी हों! और फिर होता यह है कि ये बच्चे असल जिंदगी में भी खुद को रुपया-पैसा ही समझने लग जाते हैं। दूसरी ओर, यही दुनिया गरीब बच्चों को कूड़ा-कचरा समझते हुए उन्हें घूरे की चीज बना डालती है।  और मध्यवर्ग के बच्चे, जो न तो अमीर हैं न गरीब, यहाँ टी.वी से यूँ बांध दिए गए हैं कि बड़ी छोटी उमर से ही वो इस कैदी जीवन के ग़ुलाम हो जाते हैं। वे बच्चे जो  बच्चे  रह पाते हैं, फिर किस्मत के धनी और एक अजूबा ही माने जाएंगे।

ऊपर, नीचे और बीच वाले

चारों ओर फैले उपेक्षा के अथाह समंदर में सुख-सुविधाओं के टापू गढ़े जा रहें हैं। ये ऐशो-आराम के सामानों से भरपूर, किसी जेलखाने की निगरानी और चुप्पी लेती जगहे हैं। यहाँ  धन और बल के महारथी, जो अपनी ताकत के अहसास को एक पल भी छोड़ नहीं सकते हैं, सिर्फ़ अपने जैसे लोगों से घुलते-मिलते हैं। लातीनी अमरीका के कुछ बड़े शहरों में अपहरण बिल्कुल रोज की बात हो गई है।  ऐसे में यहाँ के अमीर बच्चे लगातार फैलते डर के साए में ही बड़े होते हैं। चारदीवारीयों वाली कोठियाँ और बिजली के बाड़ों से घिरे बंगले इनका ठिकाना होते हैं। यहाँ सुरक्षागार्ड और क्लोज सर्किट कैमरे धन के इन संतानों की रखवाली दिन-रात किया करते हैं। ये बाहर निकलते भी हैं तो रूपये-पैसों की तरह हथियारों से लैस गाड़ियों में बंद होते हैं।  सिवाय सिर्फ़ दूर से देखते रहने के, अपने शहर को ये ज्यादा नहीं जानते। पेरिस  या न्यूयार्क की भूमिगत सुविधाओं का तो इन्हें खूब पता रहता है, लेकिन साओं पाओलो [1] या मेक्सिको [2] की राजधानी की ऐसी ही चीजों का ये कभी इस्तेमाल नहीं करते।

देखा जाए तो ये बच्चे उस शहर में रहते ही नहीं, जहां के वो रहने वाले हैं। अपने छोटे-से जन्नत के चारों ओर पसरी भयावह सच्चाईयों से ये बिल्कुल दूर खड़े होते हैं।  आखिर इस जन्नत के बाहर ही वह भयानक दुनिया शुरू होती है, जहां लोग बहुत ज्यादा, बदसूरत, गंदे और उनकी खुशियों से जलने वाले हैं। जब पूरी दुनिया के एक गाँव बनते जाने की बात बड़े जोर-शोर से फैलाई जा रही है, बच्चे किसी एक जगह के नहीं रह गए हैं। लेकिन जिनकी अपनी दुनिया छोटी-से-छोटी होती गई है, उन्हीं की आलमारियाँ  सामान से भरी भी हुई हैं। ये वो बच्चे हैं, जो जड़ो से कटे और बिना किसी सांस्कृतिक पहचान के ही बड़े होते हैं। इनके लिए समाज का कुल मतलब यही यक़ीन होता है कि बाहरी दुनिया की सच्चाईयाँ  खतरनाक हैं। पूरी दुनिया पर छाए ब्रांड ही अब इन बच्चों का देश बन गए हैं, जहां ये अपने कपड़ों और बाकी चीजों को अलग-अलग दिखाने की जुगत में लगे रहते हैं। और भाषा के नाम पर इनके लिए अंतर्राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक संकेत ही सब कुछ हैं। एक-दुसरे से जुदा शहरों और मीलों दूर खड़ी जगहों में पलती-बढ़ती धन की ये संताने अपनी आदतों और रूझानों में एक जैसी दिखाई देने लगी हैं। ठीक अपने समय और स्थान के सरोकारों से बाहर खड़े, एक-दूसरे की नकल करते मॉलों और हवाईअड्डों की तरह। सिर्फ दिखने वाले सच का पाठ पढ़े ये बच्चे जमीनी हकीकत से बिल्कुल बेखबर होते हैं। वही हकीकत जो उनके लिये सिर्फ डराने वाली या फिर पैसे के बल पर जीत  ली जाने वाली चीज होती है।

बच्चों की दुनिया

‘सड़क बहुत देख-भाल कर पार करनी चाहिए’

कोलम्बिया  [3] के शिक्षक गुस्ताव विल्चेस बच्चों के एक समूह को समझा रहे थे:

‘चाहे बत्ती हरी ही क्यों न हो, कभी भी सड़क दोनों ओर देखे बगैर पार नहीं करनी चाहिए’।

विल्चेस ने उन्हें यह भी बताया कि कैसे एक बार वह एक कार से कुचले जाने के बाद बिल्कुल बीच सड़क पर गिरे पड़े थे। उन्हें अधमरा कर छोड़ देने वाली उस दुर्घटना को याद कर विल्चेस का चेहरा पीला पड़ गया था।

लेकिन बच्चों ने उनसे यह पूछा:
किस ब्रांड की कार थी वह?

क्या उस कार में एयर कंडीशनर की सुविधा थी?

वो कार क्या सौर ऊर्जा से चलने वाली थी?

बर्फ हटाने वाली मशीन थी न उसमें?

कितने सिलेंडरों वाली कार थी वह?

दुकान के शीशे

लड़कों के खिलौने; रैंबो, रोबोकौप, निंजा [4], बैटमैन, राक्षस, मशीनगन, पिस्तौल, टैंक, कार, मोटरसाईकिल, ट्रक, हवाई जहाज, अंतरिक्षयान

लड़कियों के खिलौने: बार्बी गुड़िया, हाइडी, इस्तरी करने की मेज, रसोई का सामान, सिल-बट्टा, कपड़े धोने की मशीन, टीवी, बच्चे, पालना, दूध की बोतल, लिपिस्टीक, बाल घुंघराले करने की मशीन, सुर्खी पाउडर, आईना

फास्ट फूड, तेज कारें, तेज जिंदगी: इस दुनिया में आते ही धनी बच्चों को यह सिखाया जाने लगता है कि सभी चीजें सिर्फ कुछ पलों की और इसीलिए खर्चने की होती हैं। इनका बचपन यही देखते-दिखाते बीतता है कि मशीने इंसानों से ज्यादा भरोसे लायक हैं। और  जब ये बड़े होंगे [5] तब बाहर की “खतरनाक” दुनिया से हिफाजत के लिए इन्हें पूरी धरती नापने को तैयार चारपहिया सौंपी जाएगी! जवानी की ओर कदम बढ़ाते-बढ़ाते ये बच्चे साइबर दुनिया की सरपट सड़कों पर फर्राटे भरने लग जाते हैं। अपने कुछ होने का अहसास ये तस्वीर और सामान निगलते, टी.वी. के चैनल बदलते और बड़ी-बड़ी खरीददारीयाँ करते हुए पाते हैं। साइबर दुनिया में घूमते इन साइबरी बच्चों का निपट अकेलापन शहरों की गलियों में भटकते बेसहारा बच्चों की तरह ही होता है।
 

धनी बच्चे जवान होकर अकेलापन खत्म करने और तमाम डर भुलाने के लिए नशीली दवाएं ढूँढें, इसके बहुत पहले से ही गरीब बच्चे पेट्रोल और गोंद में छुपा नशा ले रहे होते हैं। वहीं, जब धनी बच्चे लेज़र बंदूकों के साथ युद्ध का खेल खेलते हैं, गली के बच्चों को असली गोलियाँ निशाना बना रही होती हैं।

लातीनी अमरीका की आबादी का लगभग आधा हिस्सा बच्चों और जवान होते लड़कों-लड़कियों का है।  इस आधे हिस्से का आधा बहुत बुरे हाल में जी रहा है।  इस बुरे हाल से वही सौ बच्चे बच पाते हैं, जो हर घंटे यहाँ  भूख या ठीक होने वाली बीमारीयों से मर जाते हैं! फिर भी, गलियों और खेतों [6] में ग़रीब बच्चों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। यह दुनिया के उस हिस्से की बात है, जो दिन-रात ग़रीब पैदा करता है और ग़रीबी को गुनाह भी मानता है! यहाँ ज्यादातर ग़रीब बच्चे और ज्यादातर बच्चे ग़रीब हैं। और, व्यवस्था से बाँध दी गई जिंदगियों में ग़रीबी की सबसे ज्यादा मार इन्हीं बच्चों पर पड़ती है। इन्हें निचोड़ कर रख देने वाला समाज इनको हमेशा शक के दायरे में रखता है। इतना ही नहीं, यहाँ ग़रीबी के इनके ‘अपराध’ की सजा भी सुनाई जाती है, जो कभी-कभी मौत होती है। वे क्या सोचते और महसूस करते हैं, यह कोई नहीं सुनता, उन्हें समझने की बात तो फिर बहुत दूर  है।

ये बच्चे, जिनके माँ-बाप या तो काम की तलाश में भटकते रहते हैं या फिर बिना किसी काम और ठिकाने के ही रह जाते हैं, बड़ी छोटी उमर से ही कोई भी छोटा-मोटा काम कर जीने को मजबूर होते हैं। सिर्फ पेट भरने या उससे थोड़ा ज्यादा पा लेने के बदले ये पूरी दुनिया में कहीं भी कमरतोड़ खटते हुए मिल जाएंगे। चलना सीखने के बाद ये यही सीखते हैं कि अपना काम ‘ठीक’ से करने वाले ग़रीबों को क्या क्या ईनाम मिलते हैं। इन लड़के-लड़कियों की “बढ़िया” मजदूर बनने की शुरूआत गराजों, दुकानों और छोट-मोटे, घर से चलाए जाने वाले ढाबों से होती है, जहाँ इनसे मुफ्त काम लिया जाता है। या फिर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खेलकूद  के कपड़े बनाने वाले कारखानों से, जहाँ इनकी मजदूरी कौड़ियों के मोल खरीदी जाती है। खेतों या लोगों से ठसमठस शहरों या फिर घरों में काम करते हुए ये अपने मालिकों की मर्जी से बँधे रहते हैं। कुल मिलाकर इनकी हालत घरेलू या वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के ‘असंगठित’ कहे जाने वाले क्षेत्र के गुलामों की है। पूरी दुनिया में फैलते बाज़ार की चाकरी करते ये बच्चे उसके सबसे शोषित मजदूर भी हैं।

नोट्स

1. लातीनी अमरीकी देश ब्राजील का एक महानगर
2. लातीनी अमरीकी देश
3. लातीनी अमरीकी देश
4. एक जापानी मार्शल आर्ट के लड़ाके।
5. मूल शब्द हैं “la hora del ritual de iniciacion” जिसका शाब्दिक अर्थ होता है “प्रवेश के अनुष्ठान की घड़ी” ।
6. मूल शब्द “campo” है जिसके मायने गाँव या खेत दोनों ही होते हैं। 

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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