हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

यह है कानून का राज? : आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/12/2014 10:24:00 AM


हाशिया पर आप जाने माने जनवादी अधिकार कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक आनंद तेलतुंबड़े के वे मासिक स्तंभ नियमित रूप से पढ़ते रहे हैं, जिन्हें वे इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में मार्जिनस्पीक नाम से लिखते हैं. इसके अलावा भी समय समय पर उनके लेख, व्याख्यान और टिप्पणियां हाशिया पर आते रहे हैं. अब हिंदी की प्रतिष्ठित वैचारिक पत्रिका समयांतर में यह स्तंभ नियमित रूप से हिंदी में प्रकाशित होगा. इसके अलावा आनंद की अन्य रचनाएं प्रमुखता से हाशिया पर पोस्ट की जाती रहेंगी. अनुवाद: रेयाज उल हक.

गोंदिया सत्र न्यायालय से 22 मई 2014 को सभी आरोपों से बरी होने के बाद सुधीर ढवले नागपुर केंद्रीय जेल से छूट गए. लेकिन पुलिस द्वारा माओवादियों के साथ तथाकथित संपर्क रखने के नाम पर गिरफ्तार किए गए इस जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता को बाहर आने में 40 महीने लगे. उनके साथ साथ आठ सह-आरोपितों को भी अदालत ने बरी कर दिया. 2005 में ढवले की ही तरह एक दलित कवि शांतनु कांबले को ठीक ऐसे ही आरोपों के साथ गिरफ्तार किया गया था, और किस्मत से जमानत पर छूटने से पहले उन्हें 100 से ज्यादा दिनों तक यातनाएं सहनी पड़ीं. अब अदालत से वे सभी आरोपों से बरी हैं. अरुण फरेरा चार बरसों से ज्यादा समय से जेल में रहे, यातनाएं झेलीं और पुराने आरोपों में बरी हो जाने के बाद बार बार नए आरोपों में गिरफ्तार करके उन्हें परेशान किया गया. तब कहीं जाकर वे अपने आखिरी मामले में जमानत पर छूट सके. इससे एक कम चर्चित मामला जनवरी 2012 में चंद्रपुर के एक सामाजिक संगठन देशभक्ति युवा मंच के 12 नौजवानों तथा नागपुर के बंधु मेश्राम की गिरफ्तारियों का है. इन सब पर वही आरोप लगाए गए और आगे चल कर ये सभी अदालत द्वारा छोड़ दिए गए. लेकिन छूटने से पहले उन्हें एक से तीन बरस तक पुलिस की यातनाएं, उत्पीड़न तथा जेल में अपमान झेलना पड़ा. इसी कड़ी में अनिल ममाने और दूसरे दो लोगों की गिरफ्तारियों का मामला भी है, जिन्हें अक्तूबर 2007 में तब गिरफ्तार किया था जब वे नागपुर के दीक्षाभूमि में किताबें बेच रहे थे.

हालांकि थोड़ी मुश्किल होती है, लेकिन ये मामले आखिरकार याद आ जाते हैं, क्योंकि ये ज्यादातर उन लोगों से जुड़े मामले हैं जो शहरी इलाकों से आते हैं. मीडिया में उन पर खबरें आती हैं और अदालतों में उनका बचाव हो पाता है. लेकिन दूर दराज के इलाकों के अनगिनत ऐसे मामले हैं जहां माओवादी होने के बहुत अस्पष्ट आरोपों के साथ गिरफ्तार नौजवान लड़के और लड़कियां जेलों में बंद हैं. उनमें से कई पर तो कई आरोप तक नहीं तय किया गया है और उनकी सुनवाई करने के लिए कोई संस्था नहीं है. लाचारी के साथ वे हर पल अपनी जिंदगी को तबाह होते देखते हैं.

नाइंसाफी की कार्यवाही

सुधीर ढवले को नागपुर में उनके कॉलेज के दिनों से ही एक कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता रहा है, जहां वे 1980 के दशक के एक जुझारू छात्र संगठन विद्यार्थी प्रगति संगठन (वीपीएस) का हिस्सा थे. उन्होंने अपने विचारधारात्मक रुझानों तथा उन जन संगठनों के साथ अपने जुड़ाव को कभी छुपाया नहीं, जो मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा का प्रचार करते हैं जिसे मोटे तौर पर नक्सलवाद और अब माओवाद के नाम से जाना जाता है. लेकिन ढवले माओवादी पार्टी के साथ और इसकी हिंसक कार्रवाइयों समेत उसकी गतिविधियों के साथ किसी भी तरह के संबंध से इन्कार करते रहे हैं. मुंबई आने के बाद वे सांस्कृतिक आदोलन में सक्रिय हुए और 1999 में एक वैकल्पिक विद्रोही साहित्य सम्मेलन का आयोजन करने में अग्रणी भूमिका निभाई. यह आयोजन राज्य द्वारा प्रायोजित मुख्यधारा के साहित्य के विरोध में था. इस पहलकदमी ने विद्रोही सांस्कृतिक चलवल की शक्ल अख्तियार की जिसका विद्रोही नाम से अपना द्विमासिक मुखपत्र था. धवले इसके संपादक बने. जल्दी ही विद्रोही महाराष्ट्र के जुझारू कार्यकर्याओं के लिए एक आधार बन गया. उन्होंने पर्चे और किताबें लिखने में अपनी साहित्यिक खूबी का इस्तेमाल किया. जाहिर है कि यह लेखन उन्होंने आदिवासियों और दलितों के मौजूदा संघर्षों के समर्थन में क्रांतिकारी विचारधारा का प्रचार करने के लिए किया. उन्होंने 6 दिसंबर 2007 को रिपब्लिकन पैंथर्स की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई, जो अपनी पहचान ‘जातियों के उन्मूलन के लिए एक आंदोलन’ के रूप में बताता है. वे खैरलांजी में खौफनाक जातीय उत्पीड़न के बाद राज्य भर में शुरू हुए विरोध आंदोलनों में सक्रिय रहे थे. तब महाराष्ट्र के गृह मंत्री ने यह गैर जिम्मेदार बयान दिया था कि इन आंदोलनों को नक्सलवादियों ने भड़काया है. तभी से धवले पुलिस की नजरों में थे. निजी स्तर पर, एक सादगी भरा जीवन जीते हुए उन्होंने अपना पूरा समय इन गतिविधियों को दिया. इसमें उनकी पत्नी भी उनके साथ रहीं, जो वीपीएस की एक पुरानी कॉमरेड थीं और जो मुंबई में बाइकुला के डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मेमोरियल हॉस्पिटल में काम करती हैं.

वर्धा में उनकी गिरफ्तारी के बाद, जहां वे किसी दलित साहित्यिक सम्मेलन में बोलने के लिए गए थे, पुलिस ने मुंबई में उनके घर पर ऐसे छापा मारा मानो वे कोई बहुत खतरनाक आतंकवादी हों. इसके बाद उनकी पत्नी और बच्चों को चिंताजनक तौर पर बहुत मुश्किलों और अपमान से गुजरना पड़ा. उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तो पूरी तरह तबाह हो गई, उनका 12वीं में पढ़ने वाला बेटा फेल हो गया. सम्मानित सामाजिक हस्तियों वाली डिफेंस कमेटी ने गृह मंत्री आरआर पाटील से तीन बार उनकी हिमायत में बातें रखीं, उनके निर्दोष होने की पुष्टि की. लेकिन कमेटी पाटील को डिगा पाने में नाकाम रही. ऐसा दिख रहा था कि पाटील ढवले को सताने का मन बना चुके थे. इस बीच जो कुछ भी हो रहा था वह पूरी तरह गैरकानूनी था. क्योंकि किसी आरोपित के किसी बयान के आधार पर या उनके घर से बरामद किए गए साहित्य के आधार पर पुलिस माओवादियों के साथ उनके संबंध को जिस तरह झूठे तरीके से स्थापित करना चाह रही थी, उसे सर्वोच्च न्यायालय बहुत पहले खारिज कर चुका था. लेकिन पुलिस का यह कहना था कि सबूतों के पुख्ता होने बारे में फैसला करना अदालत का काम है, और वह इस बहाने की ओट में पूरी गैरजिम्मेदारी के साथ अपने आरोपों पर अड़ी रही कि सुधीर ढवले गैर कानूनी गतिविधियों और माओवादी साजिशों के भागीदार थे. अदालत ने पुलिस के मामले को खारिज करते हुए उन्हें बरी कर दिया. लेकिन क्या इससे हुए नुकसानों की भरपाई मुमकिन हैॽ हां, इससे यह जरूर हुआ है कि ढवले को सजा दिलाने और उनके जैसे अनेक कार्यकर्ताओं को आतंकित करने की पुलिस की योजना बिखर गई है. आज ढवले अपनी निजी जिंदगी में पूरी तरह तबाह हो गए हैं, लेकिन अपने मकसद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनके चेहरे पर गहरी उदासी भरी मुस्कान को जरा भी कम नहीं कर पाई है.

एक मानवीय त्रासदी

ढवले की गिरफ्तारी से पहले और बाद में बेहिसाब गिरफ्तारियां हुई हैं: उनमें से अरुण फरेरा की गिरफ्तारी के बारे में मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा हुई. ढवले की ही तरह, जो लोग फरेरा को जानते थे वे पुलिस के आरोपों पर बहुत गुस्से में थे और वे फरेरा के बचाव में आगे आए. तब नक्सल विरोधी सेल के तत्कालीन मुखिया एसएसपी यादव ने यह बेहद गैरकानूनी धमकी दी कि उन्हें भी नक्सल समर्थकों के रूप में गिरफ्तार किया जा सकता है. फरेरा को हर तरह की यातनाएं दी गईं, उन्हें परेशान किया गया. इसी के तहत उन्हें नार्को टेस्ट से भी गुजरना पड़ा जिसके नतीजों ने तब एक छोटी मोटी खलबली पैदा कर दी थी, जब फरेरा ने टेस्ट के दौरान यह बयान दिया कि बाल ठाकरे महाराष्ट्र में नक्सली गतिविधियों के लिए पैसे देते हैं. जिस तर्क के आधार पर ढवले की गिरफ्तारी हुई थी, उसी के आधार पर पुलिस को कम से कम ठाकरे से पूछताछ करनी चाहिए थी. आखिर पूछताछ के दौरान पुलिस चाहती ही है कि आरोपित व्यक्ति किसी का नाम ले और इस तरह फरेरा ने नार्को टेस्ट के तहत जो तथ्य उजागर किया था वह पुलिस के अपने ही दावों की कसौटी पर कहीं ज्यादा प्रामाणिक था. अदालत में फरेरा के खिलाफ कोई आरोप टिक नहीं पाया लेकिन पुलिस उन्हें चार से ज्यादा बरसों तक जेल में रखने में कामयाब रही. अब फरेरा ने राज्य के खिलाफ 25 लाख रुपए के मुआवजे का एक मामला दाखिल किया है. उनके बारे में चाहे जो फैसला आए, बाकियों को तो बस अपने साथ हुई नाइंसाफी को जैसे तैसे कबूल करना होगा.

ढवले के साथ जो आठ दूसरे लोग बरी हुई वे सभी दलित थे और उन सबको झूठे मामलों में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें भी पुलिस के हाथों वैसी ही यातनाएं, उत्पीड़न, अपमान और कैद भुगतना पड़ा, जो बहुत साफ तौर पर गैर कानूनी है. उनके अलावा, खबरों के मुताबिक नागपुर जेल में 44 और लोग बंद हैं, जिन्हें पुलिस ने माओवादी बता कर गिरफ्तार किया है. उनमें से सात औरतें हैं. बेशक उनमें हाल में हुई हेम मिश्रा, प्रशांत राही और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा की गिरफ्तारियां भी शामिल हैं. इनकी खबरें मीडिया में आईं और इन गिरफ्तारियों की भारी निंदा भी हुई. लेकिन इनके अलावा दूसरे लोगों में गढ़चिरोली जिले के भीतरी इलाकों से गिरफ्तार किए गए वे आदिवासी नौजवान हैं जिनमें से ज्यादातर को आसपास की किसी नक्सल कार्रवाई के मामले में लपेट कर गिरफ्तार किया गया है. उनके चेहरे और नामों को लोग नहीं जानते. उनमें से दो आदिवासी नौजवान ऐसे हैं जो नागपुर सेंट्रल जेल के सबसे लंबे समय तक रहने वाले कैदी हैं. पहले, 26 साल के रमेश पंढरीराम नेताम हैं, जो एक छात्र संगठन के कार्यकर्ता हैं और पिछले छह सालों से जेल में हैं. उनके मां-बाप कथित तौर पर उन जन संगठनों में थे, जिनका संबंध माओवादियों के साथ जोड़ा जाता है. उनकी मां बयानबाई दंडकारण्य आदिवासी महिला संगठन में सक्रिय थीं और उन्हें गढ़चिरोली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. पुलिस द्वारा दी जा रही यातना के दौरान ही उनकी मौत हो गई. गांववालों ने इस हत्या का विरोध किया था, लेकिन उनकी आवाज मुख्यधारा के मीडिया तक कभी नहीं पहुंच पाई. उनके पिता के बारे में कहा जाता है कि दो साल पहले उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. जब भी वे छूटने को होते हैं, पुलिस उन पर नए आरोप लगा कर उन्हें जेल में बनाए रखती है. ऐसा एक बार नहीं बल्कि तीन तीन बार हो चुका है. दो महीने पहले अपने ऊपर सारे मामले खत्म होने के बाद उन्होंने जेल से जाने के लिए अपना सामान बांध लिया था, लेकिन पुलिस ने उन पर दो नए मामले लगा दिए और छूटने से रोक लिया. दूसरे का नाम बुद्धु कुल्ले टिम्मा (33 साल) है जो गढ़चिरोली के भीतरी इलाके के एक गांव से हैं. उन्हें तीन साल पहले सभी मामलों से बरी कर दिया गया था लेकिन वे अब भी जेल में हैं क्योंकि पुलिस ने उन पर छह नए मामले लगा दिए. सभी आदिवासी कैदियों के निरक्षर किसान होने के चलते उनकी लाचारी और मानवीय त्रासदी की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

कानून की परवाह किसे हैॽ

इन मामलों में कार्यवाही संबंधी एक और गैर कानूनी काम यह किया जा रहा है कि मामलों की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए होती है. यह सुनवाई गढ़चिरोली की अदालत में स्थानीय अधिवक्ताओं की मौजूदगी में होती है. लेकिन चूंकि आरोपितों को अदालत में नहीं ले जाया जाता, इसलिए उनके और अधिवक्ताओं के बीच कोई संवाद नहीं हो पाता है. अदालत में जो कुछ भी चल रहा होता है, उससे आरोपित को अंधेरे में रखा जाता है. वे यह नहीं जान पाते कि गवाहों ने ठीक-ठीक क्या कहा, कौन सी दलीलें दी गईं और जज ने क्या टिप्पणी की. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में उन्हें इन सारी वाजिब सूचनाओं से वंचित रखा जाता है, जिसके वे हकदार हैं. इसके नतीजे में जब उन्हें अपना आखिरी बयान देने की जरूरत पड़ती है तो उनके बयान में सुनवाई के संदर्भ नदारद रहते हैं. कम से कम एक मामला ऐसा है, जिसमें सुनाए गए आजीवन कारावास के फैसले के लिए मुख्य रूप से पुलिस द्वारा इस तकनीक के गलत इस्तेमाल को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

इनमें से हरेक इंसान बेहिसाब तकलीफ से गुजरता है, उसके परिवार वालों को बेहिसाब तनाव झेलना पड़ता है, समाज में भारी अपमान और टकराव से गुजरना पड़ता है. उनके पारिवारिक रिश्ते तबाह हो जाते हैं और वे औसतन अपने उत्पादक जीवन के 4 से 5 साल बिना किसी गलती के गंवा देते हैं. उनमें से हरेक को पुलिस रिमांड के दौरान कम या ज्यादा गैर कानूनी यातनाएं सहनी पड़ती हैं. इसके बाद जब वे न्यायिक हिरासत में जाते हैं तो उन्हें अपमानजनक हालात में रहना पड़ता है. हो सकता है कि लोगों को गिरफ्तार करने और अपने पास मौजूद सूचनाओं के आधार पर आरोप तय करने के पुलिस के पेशेवर विशेषाधिकार से किसी को कोई शिकायत नहीं हो. ये आरोप न्यायिक सुनवाई के विषय हैं और वे वहां साबित हो सकते हैं और खारिज भी हो सकते हैं. लेकिन तब क्या हो जब इस विशेषाधिकार का बेदर्दी से और भारी पैमाने पर गलत इस्तेमाल होने लगेॽ बदकिस्मती से सभी तथाकथित माओवादी मुकदमों के नतीजे साफ साफ पुलिस की इस बुरी मंशा को दिखाते हैं जिसके तहत वह कोशिश करती है कि कुछ चुने हुए लोगों को जितने लंबे समय तक हो सके जेल में रखा जाए और इस तरह दूसरों को उनके नक्शेकदम पर चलने से डराया जाए. कानून के मुताबिक दोषी व्यक्ति को सजा देने की बारी अदालत की होती है, लेकिन जैसा कि इन मामलों से यह जाहिर होता है, वह व्यक्ति अपना अपराध साबित होने से पहले ही पुलिस के हाथों सजा पा चुका होता है.

तब फिर कानून-व्यवस्था की रखवाली मानी जाने वाली पुलिस यहां के कानून से बेपरवाह कैसे हो सकती हैॽ सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पूरी गंभीरता से स्थापित किया है कि महज किसी संगठन से जुड़ाव या किसी विचारधारा को मानना या किसी तरह का साहित्य अपने पास रखना तब तक एक अपराध नहीं हो सकता है, जब तक यह साबित नहीं हो जाए कि उस व्यक्ति ने कोई हिंसक कार्रवाई न की हो या दूसरों के ऐसा करने की वजह नहीं बना हो. यहां तक कि अगर कोई किसी प्रतिबंधित संगठन तक का एक निष्क्रिय सदस्य बन जाए, तब भी यह अपराध के दायरे में नहीं आता. अगर यहां का कानून का राज चलता है तो क्या पुलिस को इसके बारे में पता नहीं होना चाहिएॽ हरेक मामले में अदालतों ने पुलिस के तौर-तरीकों पर उसकी निंदा की है, लेकिन पुलिस हर बार बेधड़क होकर पुरानी गलतियां दोहराती है. अगर ढवले बाहर आते हैं तो साईबाबा को भर्ती कर लिया जाता है ताकि पुलिस की यह गैर कानूनी दास्तान आगे बढ़ती रहे!
 

(समयांतर के जुलाई 2014 अंक में प्रकाशित.)

मैं अपने देश की बात कर रही हूं

Posted by चन्द्रिका on 7/11/2014 04:55:00 PM


सुष्मिता

पाॅप धुन में लिपटे राष्ट्रवादी नारों के उद्घोष के साथ भारतीय लोकतंत्र की शोभा यात्रा बढ़ते हुए अपने नये पड़ाव पर पहुंच चुकी है। यह पड़ाव विकास के नाम पर समर्पित है। एक ऐसा विकास जो आस्था और बाजार के मिश्रित बुनियाद पर टिका है। एक ऐसा विकास जिसको केवल संसदीय बहुमत के आइने से ही समझा जा सकता है। वित्तीय पूंजी और बड़ी पूंजी की चाकरी में निकली इस शोभा यात्रा का आनंद लेने के लिए दे की जनता को कमर कसकर तैयार रहने की मुनादी भी हो गयी है। शोभा यात्रा के आयोजकों का कहना है कि जब दे विकास करता है तो थोड़ी-बहुत दिक्कतें होती ही हैं। यात्रा के इस पड़ाव के साथ ही दे एक ऐसे युग में पहुंच चुका है जहां तमाम धारणायें उलट-पलट गयीं हैं। जहां कई पुराने मिथक टूट रहें हैं और कई नये मिथक गढ़े जा रहें हैं। जहां तमाम लोगों के नकाब उतरते जा रहें हैं।
पहले हमें बताया गया था कि हरेक समय अपने लिए पात्र गढ़ता है लेकिन आज हमें समझाया जा रहा है कि अब पात्र ही अपने लिए समय गढ़ रहा है। इस बहस के केन्द्र में हाल ही में पूर्ण बहुमत से चुनी गयी भाजपा की सरकार है। एक तरफ दे की नब्ज समझने का दावा करने वाले टीवी पैनलिस्ट हमें समझा रहे हैं कि दे की जनता एक मजबूत सत्ता चाहती है और प्रधानमंत्री उसके लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं। तो दूसरी तरफ पहली बार दे में वोट नहीं करने वाले इस संसदीय लोकतंत्र की चर्चाओं में अपनी जगह बनाने में सफल हुए हैं। इन आंकड़ों पर भी चर्चा शुरु हो गयी है कि इस सरकार को किस तरह व्यापक जनता ने नहीं चुना है। हर कोई खुद को सही ठहराने के लिए अपने तर्क गढ़ रहा है। हमें कहा जा रहा है कि सरकार को दे की बहुमत जनता ने चुना है इसलिए सबको उसमें आस्था जतानी ही होगी। हमें कहा जा रहा है कि आस्था नहीं जताने वाले लोगों के लिए अब यह दे नहीं रह गया है। अब सरकार के भक्त पूरे रौ में आ गए हैं और वे महिलाओं के बलात्कार में पुरुष की मजबूरियां गिना रहे हैं। नास्तिकों को फांसी पर लटका देने जैसी मांगें भी हवा में तैरने लगीं हैं। गांवों, जंगलों-पहाडों से रिसता हुआ खून अब सड़कों पर दिखने लगा है। हमें यह भी समझाया जा रहा है कि अब सत्ता ही दे है और सरकार ही जनता इसलिए सत्ता का पक्ष ही अब जनता का पक्ष है। अब चूंकि सत्ता का पक्ष ही दे का पक्ष है ऐसे में हमारे लिए अपने दे के बारे में बात करना अपराध है। लेकिन मैं संसदीय राजनीति के जोड़-घटाव की नहीं बल्कि अपने दे के बारे में ही बात कर रही हूं।
दे में हाल की परिघटनाओं को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। यह बहस दे की राजसत्ता को लेकर नहीं बल्कि सरकार को लेकर है। इसलिए कि दे के लगभग तमाम संसदीय धड़ों ने ही सरकार को सत्ता का पर्याय बना दिया है। ऐसे में भारतीय राजनीति में पहली बार गैर कांग्रसी सरकार के रुप में अकेले भाजपा के बहुमत में आने के बाद बहसों की दिशा अचानक बदल गयी है। लगभग सारे विपक्षी दल इसके लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को जिम्मेदार बता रहे हैं। सामाजिक जनवादी ताकतें इस पूरी परिघटना को फासीवाद के आहट के रूप में बता रही हैं। इस तरह तमाम विपक्षी दल एक तरह से इस परिघटना पर तो अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं लेकिन इसकी वजहों के बारे में बात करने पर चुप्पी साध ले रहे हैं। ऐसे में यह सवाल गंभीर बन जाता है कि इस पूरी परिघटना को समझा कैसे जाए। क्या यह परिणाम अप्रत्याषित है या फिर इसके आसार बहुत पहले से ही स्पष्ट हो रहे थे?

भारतीय लोकतंत्र का संकट और फासीवाद
भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को काफी मजबूत बताने और इसके गुणगाण से नहीं थकने वाले लोग भी अचानक इस जनमतसे असहज हो गए हैं। उन्होंने तो इसे जनमत मानने से ही इन्कार कर दिया है। इस मसले को ऐसे पे किया जा रहा है मानो कांग्रेस के आने से तो लोकतंत्र होता लेकिन समस्या भाजपा के सत्ता में आने की वजह से पैदा हुई है। यदि भाजपा का भारी बहुमत में आना जनमत नहीं है तब फिर कांग्रेस या फिर सीपीएम का चुनाव में जीतना जनमत कैसे हो जाता है? जो भी बहस दे में उठायी जा रही है वह मूल राजनीतिक सवालों से हटकर महज संसदीय जोड़-घटाव तक सिमट जा रही है। क्या कांग्रेस के सत्ता में आने से दे में उठ रहा फासीवादी उभार रुक जाता? सामाजिक जनवादियों का मानना है कि मीडिया के भारी इस्तेमाल और सांप्रदायिक उन्माद को भड़काकर भाजपा ने सत्ता ली। यदि सांप्रदायिक उन्माद का संबंध महज भाजपा से है तब उप्र में सपा के मजबूत सरकार के बावजूद मुजफफरनगर की हत्यायें कैसे रची गयीं? असम में तो कांग्रेस की सरकार थी इसके बावजूद वहां धार्मिक उन्माद कैसे फैलाया गया? महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार के बावजूद भारी पैमाने पर सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की साजि और हत्या कैसे आयोजित की गयी? क्या यह लोकतंत्र अपने 65 सालों में भी चंद लोगों की साजिषों का षिकार हो जाता है जबकि समूचा तंत्र और सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैैैैठी रह जाती है? कुछ लोग फासीवाद के स्त्रोत के रुप में केवल विचार की चर्चा कर रहे हैं लेकिन इस विचार के स्त्रोत पर बात करने से बचते हैं। यह सही है कि संघ के पास तो करीब आठ द पहले से ही फासीवादी विचार है लेकिन वह अभी ही एक भौतिक आकार क्यों ले पाया? यदि कुछ चंद लोग इस मजबूत धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में बड़े पैमाने पर धर्म के नाम पर साजि के जरिए नफरत फैला रहे हैं तो आखिर इसकी जड़ें कहां हैं और ये चंद लोग सफल क्यों हो जा रहे हैं? यदि राजनीति के वर्तमान दौर को समझना है तब इन सवालों को समझे बगैर हम भी एक सतही निष्कर्ष पर पहुंचेंगे जो संसद के चैखटों के इर्द-गिर्द ही घुमती रहती है।
इस बार सांप्रदायिकता को पहली बार दे में चुनाव का केन्द्रीय एजेंडा बनाया गया। इसका भरपूर फायदा भी भाजपा ने उठाया और एक पिछड़े दे में इसपर बहुत हैरत भी नहीं होनी चाहिए। सच तो यह है कि सांप्रदायिकता के बीज तो ब्राह्मणवाद से बंधी भारतीय राजनीतिक संरचना में ही अंतर्निहित है। इसमें खुद को हिन्दु परंपरा से जोड़ने वाले लोग बहुमत में हैं ऐसे में तमाम शासक वर्गीय पार्टियां इस बहुमत को हासिल करने के लिए इनके अंदर जोड़-तोड़ करती है या फिर अल्पसंख्यकों के अंदर असुरक्षा की भावना पैदा करती है। लेकिन इन दोनो कोशिषों का लक्ष्य महज और महज संसदीय राजनीति में अपना जगह बनाना ही होता है। भारत में धर्म और जाति का संसदीय राजनीति में इस्तेमाल न तो भाजपा के साथ शुरु हुआ है और न ही इसके साथ खत्म होगा।
भाजपा के भारी महुमत से आने को क्या हमें महज एक सामान्य परिघटना मान लेना चाहिए? नहीं! इसका कतई यह मतलब नहीं है। इन तमाम तथ्यों का बस यह मतलब है कि वर्तमान में दे के राजनीतिक परिघटनाओं को इन संसदीय जोड़-घटाव से आगे बढ़कर देखना चाहिए। भारतीय संसदीय व्यवस्था पर हमेशा ही ब्राह्मणवादी ताकतों का प्रभुत्व रहा है। इस व्यवस्था में जाते ही एक दलित और पिछड़े को भी यह व्यवस्था ब्राह्मणवादी ढांचे में ढाल लेती है। यह पूरी व्यवस्था अपने बढ़ते संकट के साथ अपने तमाम नकाब उतारती गयी है और धर्म और जाति जैसे तमाम सामंती संस्थाओं का इस्तेमाल कर जनता में और ज्यादा विभाजन पैदा किया है। इसकी वाहक महज भाजपा नहीं बल्कि तमाम शासक वर्गीय पार्टियां हैं। लेकिन वर्तमान परिदृष्य में एक गुणात्मक फर्क है। भारतीय राजव्यवस्था का संकट इस कदर गहरा गया है कि अब वह सामान्य तरीके से शासन चलाने में सफल नहीं हो रहा है।
पिछले कुछ वर्षों के संकेतों को पढ़ने की कोशि करें तब चुनाव के बाद की परिघटनाएं कतई अप्रत्याशित नहीं मालूम होतीं बल्कि इसकी प्रक्रिया तो बहुत पहले ही शुरू हो गयी थी। भारत सरकार अपने ही सेना प्रमुख पर पड़ोसी दे को अशांत करने और अपने ही दे की एक चुनी हुई राज्य सरकार को गिराने की साजि करने का आरोप लगाती है। यह भारी गोपनीय रिपोर्ट लीक होकर आम चर्चा में आती है। यह आम लोगों के लिए काफी चैंकाने वाला था कि आखिर सरकार अपनी ही सेना की कारगुजारियों को चर्चा में क्यों ला रही है। यही वह दौर भी है जब एक केंद्रीय संस्था ने दूसरी केंद्रीय खुफिया संस्थान पर आतंकवादियों के नाम पर आम नौजवानों को फर्जी मुठभेड़ में मारने का आरोप लगाया। केंर्द्रीय ऐजेंसियों द्वारा हत्या करना और साजि करना किसी के लिए आश्चर्यजनक नहीं है बल्कि यहां समझने की जरूरत यह है कि आखिर इन सारे मामलों को पब्लिक डोमेन में क्यों लाया जा रहा था। हालांकि सेनाधिकारियों द्वारा साजि का खुलासा उन तमाम लोगों के मुंह पर गहरा तमाचा था जो भारत में सेना द्वारा तख्तापलट की संभावनाओं को खारिज करते हुए लोकतंत्रकी जड़ों की मजबूती की बात करते नहीं थकते थे। यह पूरा दौर भारतीय राजव्यवस्था के एक नए दौर की तरफ संकेत कर रहा था। संसदीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च होती है और संसद ही दे के लिए नीति का निर्माण करती है। लेकिन हम देख सकते हैं कि दागी सांसदों से संबंधित कैबिनेट द्वारा प्रेषित अध्यादे को महज इसलिए वापस ले लिया गया क्योंकि सत्ताधारी पार्टी के एक सांसद ने सार्वजनिक रूप से इसकी मुखालिफत की। यहां मसला यह नहीं है कि अध्यादे सही था या गलत बल्कि मसला यह है कि प्राधिकार किसके पास हैः कैबिनेट के पास या फिर एक प्रभुत्वशाली सांसद के पास? भाजपा सरकार के जीतने के बाद एक तरफ टीवी पैनलिस्ट भारतीय लोकतंत्र की महानता की चर्चा कर रहे थे वहीं तुरंत बेर्मी से यह भी कह रहे थे कि भावी प्रधानमंत्री में निर्णय लेने की क्षमता है और वे सुनते सबकी है लेकिन करते वही हैं जो उन्हें अच्छा लगता है। तब क्या संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री वन मैन पावर बन गया है? क्या अब पूरी सत्ता का केंद्रीकरण संसद, कैबिनेट और स्थायी संसदीय समितियों से निकलकर एक आदमी के हाथ में हो गया है? इसका मतलब यह है कि पुरानी राजव्यवस्था अब नये दौर के लिए उपयुक्त नहीं रह गयी है इसलिए षासक वर्ग को एक नयी तरह की व्यवस्था की जरूरत है। हालांकि यह दौर दे में लंबे समय से जारी है और खासकर नवउदारवादी व्यवस्था के अपनाये जाने के बाद से ही। यह एक ऐसा दौर था जब गठबंधन की सरकारें इस दे के लिए मजबूरी बन गयी थीं। बहुत लोगों ने गठबंधन की सरकार को लोकतंत्र के लिए बेहतर बताया था लेकिन यह सर्वविदित है कि मोर्चे की सरकार साम्राज्यवादी लूट की राह में कोई रुकावट नहीं बनी बल्कि मोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी ने वह सबकुछ किया जो लुटेरे देशों और बड़ी पूंजी के लिए जरूरी था। न्यूक्लियर डील इसका बेहतरीन उदाहरण है। ये तमाम परिघटनाएं इस बात के पर्याप्त संकेत देती हैं कि शासक वर्ग इस कदर गहरे संकट से जूझ रहा था कि वह अपने अंदरूनी अंतर्विरोधों को भी मैनेज करने में सफल नहीं हो रहा था।
आखिर यह संकट इतने लंबे समय से क्यों जारी है? इसके जवाब के लिए हमें भारत की अर्थव्यवस्था को थोड़ा समझना चाहिए। 1947 के बाद भारत नें विकास का एक माॅडल अपनाया जो नेहरू-महालानोबिस माॅडल के नाम से जाना जाता है। दरअसल यह पूरा माॅडल कृषि में बगैर सांस्थानिक बदलाव के औद्योगिकीकरण पर निर्भर था। इस पूरे माॅडल को विदेशी पूंजी के बूते काम करना था। 1957 में जीडी बिड़ला के नेतृत्व में अमरीका, ब्रिटेन, पश्चिमी जर्मनी इत्यादि देशों की यात्रा पर गए भारतीय औद्योगिक प्रतिनिधिमंडल की रिपोर्ट का कहना है कि ‘...भारत बिना विदेशी पूंजी के विकसित नहीं हो सकता। इसकी जरूरत हमें कम से कम आनेवाले 25 वर्षों तक भारी मात्रा में रहेगी।’  इस तरह एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनने के बजाए साम्राज्यवादी देशों पर निर्भरता को बनाए रखा गया। इसके अलावा व्यापक जनता की क्रय क्षमता में वृद्धि के लिए जरूरी कृषि में बदलाव को भी छोड़ दिया गया। अंततः 1960 के दक के अंत तक यह पूरा विकास माॅडल ध्वस्त हो गया। दुनिया के स्तर पर भी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद आयी भारी उछाल जमीन पर औंधे मुंह आ गिरी थी। इन सबने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव डाला। 1960 के दशक के अंत तक कारखानों में बड़े पैमाने पर छंटनी और मजदूरों के संघर्ष की घटना आम हो गयी। मुद्रास्फीति में भी लगातार वृद्धि हो रही थी। तमाम उद्योग अपनी क्षमता से काफी कम उत्पादन कर रहे थे। इसके बावजूद उत्पादित माल को बेच पाना संभव नहीं हो रहा था। यह संकट लगातार गहराता गया। इसने मजदूरों और किसानों के व्यापक संघर्षों को जन्म दिया।
एक विशेष तरह की आर्थिक व्यवस्था को, जो उस दौर में मेहतकशों से अतिरेक की वसूली के स्वरूप पर निर्भर करती है, एक विषे तरह की राजनीतिक संरचना की जरूरत होती है। दोनों में एक तरह का संतुलन होता है। लेकिन उत्पादन का स्वरूप और इसके संबंध हमेशा स्थिर नहीं रहते बल्कि उसमें भी विकास की प्रक्रिया जारी रहती है। लेकिन राजनीतिक संरचना उस पूरे तंत्र को बचाये रखने की भरपूर कोशि करती है। इस तरह एक समय के बाद आर्थिक व्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था में एक असंतुलन पैदा होता है। जब नए दौर में पुरानी राजनीतिक संरचना अतिरेक की वसूली के लिए अपर्याप्त साबित होने लगती है तो शासक वर्ग को एक नयी तरह की राजनीतिक संरचना की जरूरत होती है। 1950 में अपनायी गयी संरचना को नेहरूवियन समाजवादकहा गया। यह एक तरह से नेहरू के आर्थिक माॅडल को चलाने के लिए एक राजनीतिक संरचना थी। इसे नेहरू के युग कीधर्मनिरपेक्षऔर लोकतांत्रिकस्वरूप वाली संरचना कहा गया भले ही अपने असली चरित्र में वह कुछ भी रही हो। 1970 के दक तक 1950 वाली पुरानी राजनीतिक संरचना अतिरेक की वसूली के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो रही थीं, जैसा कि जेआरडी टाटा ने बंबई में एक पत्रकार से बातचीत के दौरान बताया था। उनका कहना था, ‘चीजें काफी आगे निकल गयी हैं। हम यहां जिन हड़तालों, बहिष्कारों और प्रदर्शनों के दौर से गुजर रहे हैं आप उनका अंदाजा भी नहीं लगा सकते। इन वजहों से मैं उन दिनों अपने कार्यालय से बाहर गलियों में भी नहीं टहल सकता था। संसदीय व्यवस्था हमारी जरूरतों से मेल नहीं खाती है।’  इस राजनीतिक बदलाव के रूप में आपातकाल सामने आया।
सबसे पहले निर्यात आधारित 15 इंजीनियरिंग उद्योगों को अपनी लाइसेंस की क्षमता से 25 फीसदी अधिक क्षमता के स्वतः विस्तार की अनुमति दे दी गयी। 25 अक्तूबर, 1975 को मंझोले आकार के 21 उद्योगों को लाइसेंस से रियायत दी गयी। विदेशी कंपनियों और बड़े एकाधिकारी घरानों को 30 महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपने लाइसेंस से असीमित विस्तार की छूट मिली। सीमेंट, इस्पात और अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं पर नियंत्रण को काफी ढीला कर दिया गया। काॅरपोरेट कर और व्यक्तिगत आय पर कर में भारी छूट दी गयी। उच्च तकनीक और उच्च निर्यात उद्योगों में विदेशी कंपनियों को क्रमशः 51 फीसदी और 74 फीसदी मालिकाने की अनुमति दी गयी। वहीं दूसरी तरफ इसी दौरान दिल्ली में भारी पैमाने पर गरीबों की बस्तियां उजाड़ी गयीं। ‘‘25 जुन, 1975 को आपातकाल घोषित होने के पहले 30 महीनों में दिल्ली के मलिन बस्तियों में 1,800 घरों को उजाड़ा गया था वहीं आपातकाल के बाद के महज 21 महीनों में 25 जुन 1975 से 23 मार्च 1977 तक दिल्ली में अधिकारियों ने 150,105 घरों को ध्वस्त किया। आपातकाल के दो वर्षों में 374 धार्मिक दंगे दे में हुए। ’’ इन सबके परिणामस्वरुप एक तरफ श्रम के शोषण में काफी तेज वृद्धि हुयी वही आम जनता की आमदनी में काफी गिरावट हुयी। इन सबके प्रतिक्रिया में जनता आंदोलनों में गोलबंद होने लगी। इन आंदोलनों के भारी दमन और हत्या के जरिए प्रतिरोधों को कुचलकर मुनाफाखोर कंपनियों के लिए एक माकूल माहौल बनाया गया। इन रियायतों और मजदूर वर्ग पर भारी दमन की बदौलत फिर थोड़े समय के लिए संकट टल गया लेकिन तब भी 1981 में भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) के पास हाथ फैलाना पड़ा। इस कर्जे के एवज में भारत सरकार ने कई सार्वजनिक उपक्रमों में निजी कंपनियों को हिस्सेदारी बांटी। इस संकट ने 1990 के दक आते-आते काफी गहन स्वरुप ले लिया जिसके परिणामस्वरुप नवउदारवादी अर्थव्यव्स्था अपनायी गयी।
लेकिन इस अर्थव्यवस्था को लागू हुए दो दक बीत जाने के बाद भी संकट में कुछ खास बदलाव नहीं आया है। तमाम प्राकृतिक संसाधनों को बड़े घरानों के हाथ में बेच देने और तमाम सरकारी नियंत्रण के हटा लेने के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर आर्थिक बदहाली अपने चरम पर है। इस तरह लंबे समय से आर्थिक क्षेत्र में जारी संकट ने अब राजनीतिक क्षेत्र में अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। और यदि टाटा के ब्दों में कहें तो अब यह राजनीतिक तंत्र उनकी जरूरतों के अनुरूप साबित नहीं हो रहा है। ऐसे में शासक वर्ग को एक नए तरीके की जरूरत है। इस आर्थिक बदहाली के राजनीतिक परिणाम पर बात करें तब ‘‘अब अर्थव्यवस्था से और अधिक अतिरिक्त मुनाफा यानी सरप्लस वसूलने की तमाम सामान्य कोशिशें बेकार साबित हो चुकी हैं। कर्जों और विदेशी निवेशों के जरिए अर्थव्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश भी अब विफल हो गयी है। इस तरह अर्थव्यव्स्था का यह पूरा माॅडल ही खतरे में है। अब ऐसे में इस पूरे तंत्र को बचाए रखने के लिए देश के संसाधनों को बेचना ही एकमात्र रास्ता रह गया है। इसके लिए शासक वर्गों को एक मिलिटरी स्टेट या फिर फासीवादी स्टेट जैसे राजनीतिक तंत्र की जरूरत है।’’  इस तरह दे में शासक वर्ग अब पूरी तरह फासीवादी बनता जा रहा है।
फासीवाद और उसका वर्ग चरित्र
आमतौर पर संविधान द्वारा जनता को प्रदत्त मूलभूत लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले को ही फासीवाद मान लिया जाता है। लेकिन फासीवाद का फलक तो इससे कहीं ज्यादा व्यापक है। अगर वर्गीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए बात की जाए तब फासीवाद भी पूंजीवादी लोकतंत्र की तरह ही बुर्जुआ वर्ग का शासन है। पूंजीवादी लोकतंत्र जहां मुक्त व्यापार पूंजीवाद (लैसेज फेयर कैपिटलिज्म) के दौर का वर्गीय शासन था वहीं फासीवाद एकाधिकार पूंजीवाद (मोनोपली कैपिटलिज्म) यानी साम्राज्यवाद के दौर में षासक वर्गों के लिए एक जरूरत बन गया। इस तरह हम कह सकतें हैं कि फासीवाद संकटग्रस्त पूंजीवाद के दौर में इस्तेमाल किया जाने वाला एक राजनीतिक औजार है जो व्यापक जनता का दमन कर शासक वर्गों को संकट से बाहर निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह लोकतंत्र और फासीवाद एक ही वर्ग का षासन है। लोकतांत्रिक सरकार के फासीवादी बनने का निर्धारण राजनीतिक-आर्थिक संकट करते हैं। क्या फासीवाद का ¨ई खास सूत्रीकरण है? 1933 में मास्को में संपन्न कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की विस्तारित कार्यकारिणी की 13वीं बैठक के अनुसार फासीवाद वित्तिय पूंजी के सबसे अधिकतर साम्राज्यवादी, अंधवादी और प्रतिक्रियावादी तत्व की खुली आतंकवादी तानाशाही है।क्या यह कहने का यह मतलब है कि फासीवाद केवल साम्राज्यवादी और एक विकसित वित्तीय पूंजी वाले देषों में ही संभव है? नहीं! यह कहने का कतई मतलब नहीं कि फासीवाद पिछड़े देशों में नहीं आ सकता। कोमिंर्टन की यह परिभाषा सिर्फ विकसित देशों में फासीवाद के चरित्र पर रोनी डालती है। इसके अलावा यह भी समझने की जरूरत है कि उस दौर तक फासीवाद के उदय का केंद्र मूलतः नाज़ी जर्मनी और इटली था। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अधिकतर दे उपनिवे थे।
फासीवाद का वित्तिय पूंजी के साथ सीधा संबंध है। 1930 की महामंदी फासीवाद के उदय का सबसे बड़ा गवाह बना। कीन्सीय औजारों और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद औपनिवेशिक बंधन से मुक्त हुए देशों में स्थापित राजकीय एकाधिकार पूंजीवाद ने थोड़े समय के लिए वित्तीय पूंजी को संकट से निकाला। लेकिन यह पुनः 1970 के दशक से दीर्घकालिक संकट में फंसता गया। पिछड़े देशों की साम्राज्यवादी देशों पर निर्भरता की वजह से इस संकट के शिकार पिछड़े दे भी बने। ऐसे में 1970 के दक में इस संकट की वजह से पैदा हुए फासीवादी उभार के गवाह पिछड़े दे भी बने। फासीवाद के कारणों के बारे में बात करते हुए सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की 17 वीं कांग्रेस में स्तालिन ने कहा, ‘इसे मजदूर वर्ग की कमजोरी के लक्षण और सामाजिक जनवाद द्वारा मजदूर वर्ग के साथ की गयी गद्दारी के नतीजे के रुप में ही केवल नहीं देखा जाना चाहिए, जिसने फासिज्म का रास्ता साफ किया बल्कि उसे पूंजीपति वर्ग की कमजोरी के लक्षण, इस तथ्य के लक्षण के रूप में भी देखा जाना चाहिए कि पूंजीपति वर्ग पहले ही संसदवाद और पूंजीवादी जनवाद के पुराने तरीकों से शासन करने में असमर्थ हो चुका है, और फलतः वह अपनी घरेलू नीति में प्रषासन के आतंकवादी तरीकों का सहारा लेने को मजबूर हो गया है। इसे इस तथ्य के रूप में देखा जाना चाहिए कि वह शांतिपूर्ण विदे नीति के आधार पर मौजूदा स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता खोज पाने में असमर्थ हो गया है। इसके परिणामस्वरूप वह युद्ध की नीति का सहारा लेने को मजबूर हो गया है।
एक तर्क हमेशा दिया जाता है कि फासीवाद के लिए एक फासीवादी विचार वाली पार्टी का होना आवश्यक है। लेकिन इस मामले पर 1933 में कोमिंर्टन के नेता दिमित्र¨व की चेतावनी का हमें हमेशा ख्याल रखना चाहिए। उनका कहना है कि हमें हमेशा ही यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि आर्थिक एवं राजनीतिक दोनो संकट विद्यमान हो तो फासीवादी विचारधारा शासक वर्ग पैदा कर लेता है। अर्थात मूल सवाल राजनीतिक-आर्थिक संकट और वर्ग चरित्र का है। फासीवाद का विशे चरित्र यह है कि फासीवाद प्रतिगामी शक्तियों द्वारा समर्थित होता है एवं इसका उपयोग वह अपनी कार्रवाईयों की वैधता के लिए करता है। इनके द्वारा खड़े किये गये प्रतिगामी जनांदोलन सत्ता के साथ मिल कर खुली आतंकशाही औ जनसंघर्ष पर दमन चलाते हैं। त¨ग्लियाती के अनुसार फासीवाद शब्द का इस्तेमाल तब किया जाना चाहिए, जब मजदूर वर्ग के खिलाफ संघर्ष शुरू ह¨ वह किसी जनाधार के सहारे चलाया जाए, जैसे निम्न पूंजीवाद पर आधारित होकर। यह विशेषता हमें जर्मनी, इटली, फ्रांस, इंग्लैंड इत्यादि उन सभी जगह पर दिखाई देती है, जहां वास्तविक फासीवाद पाया जाता है।  इस तरह फासीवाद का संबंध शासक वर्ग के राजनीतिक-आर्थिक संकट से है।
तब क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि राजनीतिक-आर्थिक संकट के गहराने के बाद फासीवाद अपरिहार्य एवं एकमात्र विकल्प है? इसके जवाब के लिए हमें 1930 के दौर में फासीवाद के खिलाफ संघर्ष के अनुभवों पर गौर करना चाहिए। 1930 के दक में फासीवाद के विजय होने के कारणों के बारे में दिमित्रोव का कहना है, ‘फासिज्म इसलिए भी त्तारूढ़ हुआ, क्योंकि सर्वहारा ने खुद के स्वाभाविक मित्रों से अलग-थलग पाया। फासिज्म इसलिए भी सत्तारूढ़ हुआ क्योंकि किसान के विशाल समुदाय क¨ वह अपने पक्ष में लाने में सफल हुआ और इसका कारण यह था कि सामाजिक जनवादियों ने मजदूर वर्ग के नाम पर ऐसी नीति का अनुसरण किया, जो दरअसल किसान विरोधी थीं। किसानों की आंख के सामने कई सामाजिक जनवादी सरकारें सत्ता में आयीं, जो उनकी दृष्टि में मजदूर वर्ग की सत्ता का मूर्तिमान रूप थीं, पर उनमें से एक ने भी किसानों की गरीबी का खात्मा नहीं किया, एक ने भी किसानों को जमीन नहीं दी। जर्मनी में, सामाजिक जनवादियों ने जमींदारों को छुआ तक नहीं, उन्होंने खेत मजदूरों की हड़तालों को कुचला, जिसका नतीजा यह हुआ कि हिटलर के सत्ता में आने के बहुत पहले ही जर्मनी के खेत मजदूर सुधारवादी ट्रेड यूनियनों से दूर हटने लगे थे और उनमें से अधिकां स्टालहेल्म (हिटलर के पहले एक प्रति क्रांतिकारी अर्धसस्त्र संगठन) के पक्ष में तथा राष्ट्रीय समाजवादियों के पक्ष में जाने लगे थे। फासिज्म के सत्तारुढ़ होने का कारण यह भी था कि वह नौजवानों की पांतों में घुसने में सफल हो गया जबकि सामाजिक जनवादियों ने मजदूर वर्ग के नौजवानों को वर्ग संधर्ष से विमुख किया तथा क्रांतिकारी सर्वहारा नौजवानों के बीच आवश्यक शिक्षा कार्य विकसित नहीं किया।’  इस तरह जनता में बदलाव का दावा करने वाली सामाजिक जनवादी पार्टीं (वहां की कम्युनिस्ट पार्टी) की जनता के संघर्षों से गद्दारी ने फासीवाद के लिए रास्ता प्रस्त किया। सामाजिक जनवादियों के इसी रूख को देखकर बेर्तोल्त ब्रेष्त को अपनी कविता में लिखना पड़ा था, ‘वे हमारे लोगों की जब हत्या कर रहे हैं/क्या हम इंतजार करते रहेंगे/हमारे साथ मिल कर संघर्ष करो/इस फासिस्ट विरोधी मोर्चे में/हमें यही जवाब मिला/हम तो आपके साथ मिल कर लड़ते/पर हमारे नेता कहते हैं/इनके आतंक का जवाब लाल आतंक नहीं है।

भारत में फासीवाद और सामाजिक जनवाद
भारत में हिंदुत्व की फासीवादी विचारधारा लगभग आठ दशकों से अस्तित्व में रही है। लेकिन यह सीधे सत्ता को प्रभावित करने की हालत में नहीं रहा। यह केवल पिछले तीन दशकों में ही एक राजनीतिक ताकत के रूप में खडी हो सकी है। इसका सामाजिक आधार मूल रूप से ऊंची जातियों एवं हिंदू व्यापारी समुदायों के बीच था। 1980 के दशक में शासक वर्ग ने इसे फासीवादी विकल्प के रूप में विकसित करने का बीडा उठाया। आज इसने अपना आधार भी बढाया है एवं दलितों से लेकर पिछडी जातियों में अपनी पैठ बनायी है। इसने हिंदू राष्ट्रवाद का सवाल उठाया। तमाम शासकवर्गीय पार्टियों ने फासीवादी ताकतों के विकास में मजबूत भूमिका अदा की। संसदीय गठज¨ड़ों के लिए बनाये जानेवाले मोर्चों ने भी हिंदू फासीवाद को मजबूत किया है एवं उसे वैधता प्रदान की। कई क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मोर्चा बना कर इसने अपने नकाब को बरकरार रखा। भारतीय जनता पार्टी ने अपने शासनकाल में पहली बार बड़े व्यावसायिक घरानों एवं उसके संगठनों सीआईआई, फिक्की, एस¨चेम को लेकर विभिन्न मंत्रालयों के साथ कई कमेटियों का निर्माण किया। यहां तक कि इनके प्रधानमंत्री के कार्यालय के साथ भी संबंध स्थापित किये गये। हिंदू फासीवाद तो मूल रूप से एक राजनीतिक घटनाक्रम है, जो शासक वर्ग द्वारा लाया गया है, जिसके केंद्र में साम्राज्यवाद एवं देशी-विदेशी पूंजीपतियों एवं शासक वर्ग का बढता राजनीतिक-आर्थिक संकट है।
भारत में राजनितिक-आर्थिक संकट ने हमेषा फासीवादी उभार को जन्म दिया है। 1970 का दक इस बात का गवाह है। इसके अलावा सरकार की फासीवादी कार्रवाइयां तो काफी लंबे समय से जारी हैं। भारत में फासीवाद को हमेषा सांप्रदायिकता से जोड़ा जाता है। ऐसा यह बताने के लिए किया जाता है कि कांग्रेस फासीवादी पार्टी नहीं हो सकती बल्कि यह चरित्र तो केवल भाजपा में है। इस तरह फासीवाद को महज सांप्रदायिकता के इर्द-गिर्द समेट दिया जाता है। हालांकि तथ्य बताते हैं कि दे में जनता के संघर्षों के खिलाफ जनता के ही एक हिस्से को खड़ा करने में कांग्रेस सबसे आगे रही है। भाजपा अपने पिछले षासन काल में एक अध्यादे पोटो लाई थी जिसे पास कराने के लिए उसे संसद का संयुक्त महाधिवेन बुलाना पड़ा। इसके बावजूद वह कानून दे के आधे राज्यों में प्रतिरोधस्वरूप लागू नहीं किया गया। ठीक वहीं कांग्रेस पोटा की ही तरह एक कानून यूएपीए लायी जिसे आइपीसी का ही एक हिस्सा बना दिया गया। इस कानून का कोई विरोध नहीं हुआ बल्कि इसे तमाम राज्यांे ने लागू किया। पोटा की तरह इस कानून का भी इस्तेमाल सबसे अधिक माओवादियों और मुस्लिमों के खिलाफ किया गया लेकिन किसी ने इसे रद्द करने का सवाल नहीं उठाया बल्कि यह केवल माओवादियों और मुस्लिमों का सवाल बनकर रह गया। ये तमाम तथ्य भाजपा और कांग्रेस के बीच फर्क के ढोंग को उजागर करते हैं।
भारत में फासीवाद के वर्ग चरित्र को जानबूझकर सामाजिक जनवादियों और संसदीय वामपंथियों ने अनदेखा किया और सांप्रदायिकता को फासीवाद के एक मात्र स्वरूप के रुप में प्रचारित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस तमाम जनविरोधी और दमनकारी कार्य सांप्रदायिकता के खतरे के आड़ में करती रही। यह जरूरी नहीं कि भारत में भी फासीवाद का स्वरुप जर्मनी की तरह नस्लीय संहार से जुड़ा हो बल्कि यह सत्ता में रहने वाली पार्टी के चरित्र से भी निर्धारित होता है। जैसा कि दिमित्रोव नें फासीवाद के स्वरूप के बारे में कहा, ‘फासिज्म का विकास तथा स्वयं फासिस्ट तानाषाही हर दे विषे की ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों और राष्ट्रीय विलक्षणताओं तथा उसकी अंतरर्राष्ट्रीय स्थिति के अनुसार विभिन्न देषों में अलग-अलग रुप धारण करती है।’  यहां के सामाजिक जनवादियों ने भी सांप्रदायिक फासीवाद का खतरा दिखाकर षासक वर्ग के प्रमुख धड़े कांग्रेस का सहयोग किया। फासीवाद के खिलाफ तमाम संघर्ष को उन्हांेने जानबूझकर संसदीय तिकड़मों में उलझाये रखा। उन्होंने जानबूझकर इस तथ्य की अनदेखी की कि फासीवादियों द्वारा संसद को रद्द किए जाने की परिघटना विकसित देषों की परिघटना है। भारत जैसे देषों में यह जरूरी नहीं कि फासीवाद जनतांत्रिकसंस्थाओं को खत्म ही करे। बल्कि वह इन जनतांत्रिकसंस्थाओं के जरिए ही अपनी तमाम गतिविधियां चला सकता है। वर्तमान स्वरूप में भी भारतीय राजव्यवस्था फासीवादियों को अपने कामकाज के लिए भरपूर अवसर प्रदान कर सकती है। वैसे भी इन संस्थाओं को रद्द करने के नकारात्मक परिणाम का अनुभव उसे 1970 के दक में हो गया है। इसके अलावा हमें ध्यान रखना चाहिए कि इतिहास में कोई भी घटना ठीक उसी रूप में खुद को नहीं दोहराती लेकिन अपने सारतत्व में वह समान होती है। इसलिए यह जरूरी नहीं कि भारत जैसे पिछड़े देषों में भी फासीवाद का आगमन संसद को रद्द करके ही हो। बल्कि भारत जैसे देषों में फासीवाद संसद के जरिए ही आता है न कि संसद को रद्द करके।
इस तरह भाजपा को संसद से बाहर रखने के नाम पर षासक वर्ग के दूसरे धड़ों के साथ बनाए जाने वाले गठबंधन ने सामाजिक जनवादियों और शासकवर्गीय पार्टियों के बीच फर्क को काफी धुंधला कर दिया। ऐसे में हिंदू फासीवादियों के पक्ष में ध्रुवीकरण स्वाभाविक भी था। इसके अलावा 1980 के बाद भारतीय राजनीति में मध्यम जातियों और दलितों के नेतृत्व का दावा करने वाली पार्टियों के बेनकाब होने और इनके एक नये तरह के सामंत के रूप में उद्भव ने भी भारतीय राजनीति में इस नयी परिघटना को मजबूत किया। इसमें कुछ भी अप्रत्याषित नहीं था। सामाजिक जनवादियों ने भारी बुरी हार के बाद भी आत्मालोचना की जरूरत महसूस नहीं की। बल्कि तर्क गढ़ा कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ, जनता भाजपा के छलावे में आ गयी। इनके लिए माक्र्स का यह कथन काफी सटीक बैठता हैः सामाजिक जनवादी खुद को वर्ग विरोधों से ऊपर समझते हैं। वे यह स्वीकार करते हैं कि उनके सामने एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग खड़ा है लेकिन दूसरी तरफ वे ही जनता के साथ हैं। वे ही जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं और जनता का हित ही उनका मकसद है। इसलिए संघर्ष में ठहराव के बाद भी वे विभिन्न वर्गों के हित और स्थितियों के निरीक्षण की जरूरत महसूस नहीं करते। वे आत्मालोचनात्मक तरीके से समीक्षा की जरूरत महसूस नहीं करते। वे समझते हैं कि उन्हें इशारा भर करना है, और जनता अपने समस्त अक्षय साधनों के साथ उत्पीड़कों पर टूट पड़ेगी। इसके बाद यदि कार्य क्षेत्र में वे गलत साबित होते हैं, उनका बल नकारा साबित होता है, तो दो उन बुरे मिथ्या तर्कवादियों का है जिन्होंने जनता को अलग-अलग शिविरों में बांट दिया है। या सेना में इतनी अधिक पशुवृति आ गयी है और वह इतनी अंधी हो गयी है कि उसे यह समझ में नहीं आया कि जनवाद का पवित्र लक्ष्य उसके लिए भी सर्वोत्तम है। या फिर क्रियान्वयन के दौरान ब्यौरे में गड़बड़ी की वजह से सबकुछ गड़बड़ हो गया। अथवा किसी अप्रत्याषित दुर्घटना ने सारा खेल बिगाड़ दिया। र्मनाक से र्मनाक हार के बाद भी जब जनवादी संघर्ष से बाहर निकलता है तब वह उतना ही बेदाग होता है जितना वह इसमें प्रवे करते समय था।’  अक्सर फासीवाद क¨ ¨कने के नाम पर यहां के सामाजिक जनवादियों ने बड़े पूंजीपति एवं सामंती शासक वर्ग के दूसरे हिस्से के साथ गठजोड किया, जिनके फासीवाद के रूप में विकसित ह¨ने के पर्याप्त कारण मौजूद थे। इन्हीं सवालों पर दिमित्र¨व ने लिखाः क्या जर्मन सामाजिक जनवादी पार्टी सत्तारूढ़ नहीं थी? क्या स्पेनिश सोशलिस्ट उसी सरकार में नहीं थे, जिसमें पूंजीपति शामिल थे? क्या इन देशों में पूंजीवादी साझा सरकारों में सामाजिक जनवादी पार्टियों की शिरकत ने फासिज्म को सर्वहारा पर हमला करने से रोका? नहीं रोका। फलतः यह दिन की रोशनी की तरह साफ है कि पूंजीवादी सरकारों में सामाजिक जनवादी मंत्रियों की शिरकत फासिज्म के रास्ते में दीवार नहीं है।
जहां तक एक फासीवादी संरचना का सवाल है तो एक तरफ हिंदुत्व की फासीवादी ताकतों के पास उपर से नीचे तक अपनी एक फासीवादी संरचना है वहीं कांग्रेस को सरकारी मशीनरी के जरिए ही अपने संरचना का निर्माण करना होता है या फिर अन्य प्रतिगामी संगठनों के जरिए ही काम चलाना होता है। कांग्रेस और भाजपा में यही बुनियादी फर्क है। जहां तक हाल में बढ़े सांप्रदायिक हमलों का सवाल है तो इसे फासीवादी हमले के विस्तार के रूप में ही समझा जाना चाहिए। यह फासीवादी हमला दे में माओवादियों के संघर्ष वाले इलाकों में दलितों, आदिवासियों और महिलाओं पर निजी सेनाओं और सरकारी खुफिया गिरोहों द्वारा काफी पहले से जारी है। अब इन हमलों का विस्तार अल्पसंख्यकों तक हो गया है। इस तरह भारत में सत्ता की फासीवादी प्रवृतियां एक पूर्ण फासीवाद के रुप में हमारे दरवाजे पर दस्तक देने को तैयार है जिसका चरित्र ब्राह्मणवादी, हिंदूवादी, दलित विरोधी और महिला विरोधी है। यह साम्राज्यवाद, सामंतवाद और दलाल नौकरशाही पूंजी के हित के लिए किसी भी हदतक जा सकता हैं। क्योंकि यही तो इसके वजूद का वाहक है।
चुनाव से करीब साल भर पहले दे में वल्लभ भाई पटेल अचानक विमर्श के केंद्र में आ गए। भाजपा जहां उनको अपना नेता बता रही थी वहीं सामाजिक जनवादियों सहित तमाम विपक्षी पार्टियां उन्हें कांग्रेस का (सेकुलर’) नेता बताने में व्यस्त थीं। यदि इस परिघटना को थोड़ी गंभीरता से समझने की कोशि करें तो यह इस बात का संकेत था कि अभी दे को पटेल जैसे खूनी हाथ की जरूरत है। लेकिन सामाजिक जनवादी उस व्यक्तित्व की सच्चाइयों से जनता को अवगत कराने के बजाए एक तरह से दो शासक वर्गीय पार्टियों के बहस के बीच झूलते रहे। कुल मिलाकर ‘‘फासीवाद अपने अंतिम विश्लेषण में पूंजीपति वर्ग के साथ सामाजिक जनवादियों के वर्ग सहयोग की नीति का परिणाम है।’’
ये तमाम तथ्य पहले से ही एक फासीवादी सत्ता की संभावनाओं की तरफ इशारा कर रहे थे। बस मालूम नहीं था तो यह कि इसका वाहक कांग्रेस या भाजपा होगी। ये हो सकता था कि कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद हत्याओं का दायरा व्यापक स्तर पर आदिवासियों और दलितों तक ही सीमित रहता और अल्पसंख्यकों के खिलाफ अभी भी छिपे रुप में ही जारी रहता। लकिन हमें यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि यह दायरा हमेशा सीमित रहने वाला था। इसका देर-सबेर विस्तार होना ही था। यही तो इसके वजूद की गारंटी है।
लगभग तमाम क्षेत्रों में त-प्रतित विदेशी निवे की इजाजत तो पहले ही दी जा चुकी है। इस सरकार ने एकाध बचे हुए क्षेत्रों में भी इजाजत देने का संकेत दे दिया है। इसके अलावा तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर साम्राज्यवादियों और दलाल पूंजीपतियों के कब्जे के लिए इसने पर्यावरण नियमों को भी ढीला करने की घोषणा कर दी है। सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले गैर संसदीय जन संगठनों और मानवाधिकार संगठनों के खिलाफ एक साजि के तहत दुष्प्रचार अभियान की शुरुआत हो चुकी है। आने वाले दिनों में इस चुनौती में और इजाफा होना तय है। भाजपा सरकार के स्वरूप को उसके द्वारा घोषित लक्ष्य वाक्य यानी मोटो से भी समझा जा सकता है, ‘मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस। इसका मतलब है कि सरकार अब दे नहीं चलाएगी बल्कि केवल लुटेरी पूंजी की पहरेदारी करेगी। इस तरह औद्योगिक मजदूरों के शोषण और दमन में और तेजी होगी इसके अलावा जल-जंगल-जमीन पर वि्शालकाय मुनाफाखोरों के कब्जे के लिए एक भीषण हमला भी संगठित किया जाएगा। भारत में इसी फासीवादी संभावनाओं के बारे में बात करते हुए यान मिर्डल का कहना है, ‘भारत का आयरन हील दूसरे देशों के पूंजीपतियों, अमरीकी एवं यूरोपीय निवेकों के साथ-साथ भारत एवं अन्य देशों के ऐसे संगठनों, जिनके ऊपर वामपंथी होने का लेबल चिपका हुआ है, से मदद की मांग करेगा और यह समझाया जाएगा कि आदिवासी खनन एवं जल विद्युत र्जा के विकास में अवरोधक हैं इसलिए कुछ उग्र तरीका अपनाना होगा।

फासीवाद के खिलाफ प्रतिरोध
हिंदू फासीवादियों के सत्ता में आने के बाद से ही आतंक का एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे इतिहास का अंत हो गया हो। सामाजिक जनवादी ताकतें और अन्य उदारवादी ताकतें फासीवाद की ताकत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाकर फासीवाद की चाल को ही पूरा करते हैं। वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि तीव्र शोषण के खिलाफ प्रतिरोध और जनता द्वारा खड़े किए गए अन्य बाधाओं की वजह से ही शासक वर्ग फासीवाद का इस्तेमाल करता है और उत्पीडि़त जनता की एकता को तोड़ने के लिए जाति और धर्म के नाम पर झूठे अंतर्विरोध खड़े करके इसे अपने पक्ष में इस्तेमाल करता है। लेकिन दमन और तमाम संकटों के बावजूद जनता और ज्यादा संघर्षों में गोलबंद होती है यदि उन्हें लड़ाकू संघर्षों में गोलबंद किया जाए।
जो लोग डाइलेक्टिक्स के सिद्धांत पर लंबे-लंबे किताब लिख डालते है, लंबे-लंबे व्याख्यान देते हैं, उन्हें प्रतिरोध का डाइलेक्टिक्स समझ में नहीं आता या फिर जान-बूझ कर समझना नहीं चाहते। जब हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला किया उस समय सोवियत संघ अपने दे के निर्माण में जुटा था। लाल सेना लंबी लड़ाई के बाद थोड़े आराम की हालत में थी। दुनिया के नक्शे पर कब्जे और हथियार के नशे में चूर हिटलर की सेना आगे बढ़ती जा रही थी। अपेक्षाकृत कम और निम्नस्तर के हथियारों के बावजूद लाल सेना ने स्तालिनग्राद में उसका रास्ता रोका। स्तालिन ने इस एतिहासिक प्रतिरोध का नेतृत्व किया। उनको विश्वास था कि अंततः युद्ध का निर्णय हथियार नहीं बल्कि जनता ही करती है। जनता पर विश्वास और प्रतिरोध के इसी डाइलेक्टिक्स की समझ के जरिए सोवियत संघ की जनता ने फासीवादियों को धूल चटा दी। वहीं जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी को हथियारों की ताकत में ज्यादा भरोसा था। उसने हथियार के आतंक में फासीवादियों से जुझने से इंकार किया और उसके सामने न केवल घुटने टेके बल्कि उसके साथ गठजोड़ किया और नेस्तनाबूद हो गए। जर्मनी में यहूदियों के भारी जनसंहार के बावजूद उन्हें नेस्तनाबूद नहीं किया जा सका। प्रतिरोध ने उनकी हिफाजत की।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत 1930 के दक का जर्मनी नहीं है। शासक वर्ग इतने भारी पैमाने पर व्यापक जनता के लिए जहालत की जिंदगी लाया है कि वह कभी भी व्यापक जनता को अपने पक्ष में नहीं कर सकता। शासक वर्गो और ब्राह्मणवादी ताकतों ने दलितों और आदिवासियों पर इतने अत्याचार ढाये हैं कि वे कभी भी इन्हे अपने पक्ष में गोलबंद नहीं कर सकते। अल्पसंख्यकों पर हमलों के जरिए यह अपने दुश्मनों की फेहरिस्त और लंबी कर लेगा। इसके अलावा हमारे दे में प्रतिरोध की एक समृद्ध परंपरा है इसे हमेशा ध्यान में रखने की जरूरत है। जरूरत इस बात कि है कि उन गलतियों से बचा जाए जो जर्मनी के कम्युनिस्टों ने की थी जैसा कि दिमित्रोव ने कहा है, ‘सामाजिक जनवादी नेताओं ने फासिज्म के असली वर्ग स्वरूप के प्रति भ्रम पैदा किया और उसे आम जनता से छिपाया तथा पूंजीपति वर्ग के अधिकाधिक प्रतिक्रियावादी कदमों के खिलाफ संघर्ष करने के लिए उनका आह्वान नहीं किया।’  गांवों, जंगलों-पहाडों से रिसता हुआ खून सड़कों से होता हुआ चारो तरफ फैल जाए इससे पहले देभक्त और तमाम जनवादी-लोकतांत्रिक ताकतों को इसके मुकाबले के लिए एकजुट किए जाने की जरुरत है।
फासीवाद अपराजेय नहीं है। यह शासक वर्ग को और पतन की ओर ले जाएगा। हिटलर की सेनाओं द्वारा बुरी तरह  बर्बाद कर दिया गया स्तालिनग्राद अब भी गर्व से सिर उठाये खड़ा है। जापान द्वारा चीन के नानकिंग को ध्वस्त कर देने के बावजूद नानकिंग फिर से खड़ा होकर जापान की बर्बरता की कहानी बयान कर रहा हैं। स्पेन में फ्रैंको का तानाशाही कायम रखने का सपना कभी पूरा नहीं हुआ और उस जहरीले सपने को कुचलने के लिए क्रिस्टोफर काॅडवेल, लोर्का और रैल्फ फाॅक्स सरीखे महान लेखकों और बुद्धिजीवियों ने मोर्चे पर अपनी हादतें दीं। जनता की ताकत की बदौलत राइखस्टाग ध्वस्त हो गया और सोवियत बेटे-बेटियों के साथ फासीवाद के खिलाफ लड़ाई में कुर्बान हुए तमाम योद्धाओं को अविजित कर गया।
इतिहास कोई मुर्दागाड़ी नहीं है, बल्कि यह भविष्य का रास्ता दिखाने वाली रोनी की मीनार है। मैं फिर दुहरा रही हूं कि मैं अपने दे के बारे में बात कर रही हूं और यह दे हमारा है भले ही सत्ता उनकी हो।

नोटः इस आलेख में ज्यार्जी दिमित्रिेव के लंबे उद्धरणों के इस्तेमाल के लिए माफी चाहूंगी। लेकिन यहां उसकी  काफी जरूरत थी चूंकि दिमित्रोव ही उस समय कम्युनिस्ट इंटरनेनल के नेता थे जब वह पूरी दुनिया में फासीवाद के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व दे रही थी। इसलिए उस समय के उनके अनुभव आज के लिए मषाल की तरह हैं। जर्मनी में सामाजिक जनवादियों का चरित्र भारत के संसदीय वामपंथियों से मिलता-जुलता है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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