हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

शैतानों का खुला खेल: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/14/2016 08:11:00 AM


मौजूदा फासीवादी राज्य, सत्ताधारी पार्टी और आरएसएस में बाबासाहेब आंबेडकर को अपना बताने और उन्हें अपनाने की सोची-समझी और एक शातिर बेचैनी दिख रही है. इसके लिए झूठ पर झूठ रचे जा रहे हैं. लेकिन आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि कैसे बाबासाहेब आंबेडकर इस राज्य, भाजपा और आरएसएस का प्रतिनिधित्व करने वाली हर चीज के खिलाफ खड़े होते हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक

खुद को संविधान का निर्माता कहे जाने के खिलाफ राज्य सभा में अपने गुस्से पर बाद में बोलते हुए बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था, ‘हमने भगवान के लिए एक मंदिर बनाया...लेकिन उसमें भगवान की स्थापना हो पाती, इसके पहले ही शैतान ने आकर उस पर कब्जा कर लिया.’ कांग्रेस पर इस बात का इल्जाम लगाते हुए कि उसने उन्हें किराए के लेखक के रूप में इस्तेमाल किया था, उन्होंने न सिर्फ संविधान से खुद को अलग कर लिया था बल्कि इसे बेकार बता कर खारिज भी कर दिया था. तब से लेकर अब तक शासकों की शैतानियत में इजाफा ही हुआ है. अगर पिछले कुछ महीनों की घटनाओं को देखने के लिए आंबेडकर जिंदा होते, तो या तो वे हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) के रोहिथ वेमुला बन गए होते और गुस्से में खुदकुशी कर ली होती, या फिर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कन्हैया कुमार, उमर खालिद या अनिर्बाण भट्टाचार्य हो गए होते और उन पर राजद्रोह और राष्ट्र-विरोधी होने का इल्जाम लग गया होता.

कहने का मतलब ये नहीं है कि कुछ महीने पहले तक चीजें बहुत अलग थीं. यह तथ्य कि आंबेडकर का भ्रम टूटने में तीन साल भी नहीं लगे, जिन्हें अपनी उपलब्धियों को लेकर इतनी उम्मीदें थीं कि उन्होंने अपने अनुयायियों से गुजारिश की थी वे विरोध के तरीके छोड़ दें और अपने खिलाफ नाइंसाफियों को खत्म करने के लिए सिर्फ संवैधानिक तरीके ही अपनाएं, दिखाता है कि चीजें तब से ही इस कदर खराब थीं जब से देशी लोगों ने सत्ता की लगाम अपने हाथ में ली थी. उन्होंने औपनिवेशिक शासन को एक शैतानी चेहरा दिया, जिसने पहली बार जातियों के नासूर वाली इस जमीन पर वह चीज स्थापित की थी, जिसे कानून का शासन कहते हैं और अवाम में अधिकारों को लेकर सजगता और लोकतंत्र के बीज बोए थे. नए शासकों ने औपनिवेशिक शासन के ऊपरी ढांचे को बुनियादी रूप से अपना लिया, जिसमें अच्छी लगने वाली संवैधानिक बातों की सजावट की गई थी, लेकिन उन्होंने इसके पश्चिमी उदारवादी मर्म की जगह अपनी ब्राह्मणवादी मक्कारी को लाकर बिठा दिया, जिसने कारगर तरीके से हर चीज का मतलब बदल दिया: लोकतंत्र मुट्ठी भर लोगों का शासन हो गया; पूंजीवाद, समाजवाद बन गई; आजादी गुलामी में तब्दील हो गई; धर्मनिरपेक्षता, हिंदुत्व में और इसी तरह दूसरी तमाम चीजें. उपनिवेशवाद के बाद के बरसों में यह सब कुछ जहां ढंके-छिपे तरीके से हो रहा था, केंद्र की सत्ता में भाजपा के उभार के साथ और इस बार साफ बहुमत के साथ आते ही, सारे मुखौटों को उतार फेंका गया है ताकि अवाम को सत्ता का नंगा चेहरा दिखाया जा सके.

झूठ बोलने की कला
 

11 से 13 मार्च तक चली स्वयंभू गुरु श्री श्री रवि शंकर के तीन दिनों की बेतुकी सांस्कृतिक तड़क-भड़क बिना किसी रुकावट के आखिरकार समापन को पहुंची और इसका समापन किसी और के नहीं बल्कि खुद धर्मनिरपेक्ष भारत के प्रधानमंत्री के हाथों हुआ, जिन्होंने यहां आकर इसे अपना समर्थन दिया और सरेआम उन आलोचकों को फटकारा जिन्होंने इस आयोजन से यमुना पुश्ता को होने वाले पर्यावरणीय नुकसानों और दूसरे अनुचित कामों के बारे में गंभीर सवाल उठाए थे. यह पर्यावरण को लेकर उत्साही कुछ लोगों द्वारा खड़ा किया गया कोई विवाद भर नहीं था बल्कि कानून का एक खुल्लमखुल्ला उल्लंघन था और यहां तक कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की संवैधानिक सत्ता की नाफरमानी भी थी जिसने सत्ता के करीब रहने के इस गंदे प्रदर्शन पर सवाल उठाए थे. जब विवाद खड़ा हुआ, अनेक तथ्य अवाम के सामने उजागर हुए: कि कैसे आयोजकों की हरेक मांग को सरकारी अधिकारियों द्वारा मान लिया गया था. शहरी विकास मंत्रालय के तहत दिल्ली विकास प्राधिकरण ने एक अधूरी दरख्वास्त के आधार पर आयोजन की मंजूरी दी थी, जिसमें तथ्यों को बड़े पैमाने पर छुपाया गया था. एनजीटी पारिस्थितिकी के लिहाज से नाजुक यमुना पुश्ता के इलाके में किसी भी आयोजन के खिलाफ रहा है. उसने आईआईटी दिल्ली के एके गोसाईं की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट के आधार पर आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन से मांग की कि वो नुकसानों की भरपाई के लिए 120 करोड़ रुपए जमा करे. आयोजकों ने इसकी अनदेखी कर दी. अगली दफे एनजीटी ने रकम को बेहद कम करते हुए महज 5 करोड़ कर दिया, लेकिन श्री श्री ने इसको देने से भी इन्कार कर दिया और धमकी दी कि वे एक पैसा भी चुकाने के बजाए वे जेल जाना पसंद करेंगे. हालांकि बाबा ने अपनी बात वापस ली और 25 लाख रुपए चुकाए जिसे एनजीटी ने अपना मान रखने के लिए कबूल कर लिया. एनजीटी के पास इस मामले में काफी ताकत हासिल थी और उसके द्वारा अपना रुख बदलते जाना यह दिखाता है कि शैतान से आपकी करीबी आपको किस तरह किसी भी तरह की परेशानी से बचा सकती है.

उतना ही गंभीर मुद्दा और शायद उससे ज्यादा बुरे संकेतों वाली बात इस आयोजन के लिए  पीपा पुल बनाने के लिए फौज को बुलाया जाना है, जो असल में एक निजी आयोजन था. सेवारत और रिटायर हो चुके फौजी जनरलों तथा नागरिकों ने इस तरह फौजी इंजीनियरों और जंगी साज-सामान के दुरूपयोग के खिलाफ विरोध किया, लेकिन शैतानों पर इसका कोई असर नहीं हुआ. रूलबुक (रेगुलेशंस फॉर द आर्मी, पैराग्राफ 301, पेज 100) उन्हें इस बात का अधिकार देती है कि वो नागरिक अधिकारियों की मदद के लिए सेना को बुला सकें, लेकिन उनमें उन हालात का साफ साफ ब्योरा दिया गया है, जिनमें ऐसा किया जा सकता है, जैसे कि कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए; बुनियादी सेवाओं को कायम रखने के लिए; भूकंप और बाढ़ जैसी कुदरती आपदाओं के दौरान; और किसी भी दूसरी तरह की मदद जिसकी जरूरत नागरिक पदाधिकारियों को पड़ सकती है. इसमें से कुछ भी श्री श्री के सांस्कृतिक तमाशे पर लागू नहीं होता था, बस आखिरी वाली स्थिति को छोड़ कर जिसमें लगभग हर तरह की आकस्मिक स्थिति शामिल है और जिसे बजाहिर तौर पर रक्षा मंत्री द्वारा इस्तेमाल किया गया. हालांकि रूलबुक की ओट में मुंह छुपाए जाने के बावजूद अवाम की निगाहों से यह बात छिपी नहीं रह सकी कि यह एक सियासी उपकार था. श्री श्री संघ परिवार के घरेलु गुरु के रूप में सामने आए हैं और उन्होंने पिछले चुनावों में मोदी के लिए अपने समर्थन को कोई राज नहीं रहने दिया था. हालांकि फौजी जनरल (मिसाल के लिए वी.के. सिंह) हिंदुत्व के समर्थक रहे हैं, लेकिन इसके पहले कभी किसी राजनीतिक सत्ता ने सेना को एक राजनीतिक औजार के रूप में इस तरह खुल्लमखुल्ला उसका दुरुपयोग नहीं किया था. यहां तक कि भारतीय लोकतंत्र का यह आखिरी हथियार भी अनछुआ नहीं रह गया!

शैतान के लंगोटिए यार
 

बेशक रवि शंकर हिंदुत्व गिरोह से ताल्लुक रखते हैं. उनका आर्ट ऑफ लिविंग एक कारोबारी संगठन है जो हिंदू धर्म से ली गई कच्ची सामग्री से बने आध्यात्मिक उत्पादों को दुनिया में बेचता है. यमुना का मेला हिंदू धर्म की ताकत को दिखाने का ऐसा ही एक बाजारी आयोजन था. ऐसे एक आयोजन को राज्य की मदद अगर और कुछ नहीं तो कम से कम संविधान का उल्लंघन तो थी ही. प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के दुराचारों को छुपाने के लिए इसकी तुलना कुंभ मेले से कर दी, मानो एक गलती को दूसरी गलती से ढंका जा सकता है. जहां तक कुंभ मेले को कानून-व्यवस्था से परे जाकर राज्य द्वारा मदद दिए जाने की बात है, वह भी संवैधानिक रूप से निंदनीय है, इस अहंकारी मेले की तो कुंभ मेले से किसी भी तरह तुलना नहीं हो सकती थी. कुंभ मेला भोली-भाली जनता की धार्मिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है जिसको सरकार संविधान में बताए गए तरीके से वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देकर कमजोर कर सकती थी. लेकिन इसके बजाए, इसने उसके लिए सुविधाओं में इजाफा करके उन्हें मजबूत ही किया है. शैतान लोग संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा की हत्या करने के गुनहगार रहे हैं और ये हत्या उन्होंने बाबाओं और गुरुओं, साध्वियों और संतों की फौज के जरिए रूढ़िवाद को बढ़ावा देते हुए की है.

शैतानों के लंगोटिए यारों के एक दूसरे किस्म के गिरोह के नुमाइंदे विजय माल्या हैं: जनता के पैसे पर सुख भोगने वाले परम सुखवादी. माल्या के कर्जे 2011 में नन परफॉर्मिंग असेट्स बन गए थे, उन्हें पहले कोलकाता स्थिति यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया द्वारा सितंबर 2014 में इरादतन दिवालिया घोषित किया गया लेकिन ये बहुत दिनों तक नहीं कायम रह सका क्योंकि कोलकाता उच्च न्यायालय ने बैंक की इस घोषणा को अवैध ठहरा दिया. यह साहसिक कदम उठाने वाले बैंक के उस ईमानदार कार्यकारी निदेशक पर विभिन्न कार्यालयों ने आरोपों की बौछार कर दी और उसे तंग किया जाता रहा और मार्च 2015 में उसके रिटायर होने पर उसकी पेंशन तक रोक दी गई. बाद में भारतीय स्टेट बैंक और पंजाब नेशनल बैंक ने भी माल्या को इरादतन दिवालिया घोषित कर दिया. रवि शंकर की ही तरह, माल्या पर भी न सिर्फ बैंक कर्जों और कर्मचारियों के वेतन के भुगतान का बकाया था, बल्कि आयकर, सेवा कर और भविष्य निधि की रकमों का वैधानिक बकाया भी था, जिनके लिए उसे आसानी से गिरफ्तार किया जा सकता था. लेकिन शैतानों ने न सिर्फ उसे आम राय का उल्लंघन करते हुए खुला छोड़ रखा था, बल्कि उसे राज्य सभा का सदस्य भी बन जाने दिया. उसके देश छोड़ कर चले जाने के बाद जो नाटक हुआ, वो अप्रासंगिक ब्योरे को लेकर था और इसने इस बुनियादी तथ्य को दबा दिया कि क्यों सरकार ने उसके द्वारा अंजाम दिए गए ठोस अपराधों के लिए उसे पहले ही गिरफ्तार नहीं कर लिया था. इत्तेफाक से माल्या न तो अकेला ऐसा दिवालिया था न ही वह उनमें से सबसे बड़ा है, और न ही सरकारों के साथ गलबंहिया करने वाले पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) की सड़ांध पहली बार उजागर हुई है. भारत में, पूंजीपति लोग उत्पादक पूंजी में निवेश नहीं करते; वे शैतान के साथ रिश्तों में पैसा लगाते हैं जिससे उन्हें जनता का पैसा बेधड़क लूटने की छूट मिल जाती है. आईसीआईसीआई सेक्योरिटीज की 16 मार्च 2015 की एक रिपोर्ट के मुताबिक बैंकों की कुल समस्याग्रस्त परिसंपत्ति 10.31 लाख करोड़ है और इनमें सबसे ज्यादा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की परिसंपत्तियां हैं. एसबीआई उनमें से सबसे बड़ी है, जिसकी कुल कीमत का 60 फीसदी और इंडियन ओवरसीज़ बैंक की कुल कीमत का 221 फीसदी समस्याग्रस्त परिसंपत्तियों में शामिल है.

शैतान बनाम अवाम
 

रवि शंकर और माल्य उस शैतानियत के महज चेहरे हैं, जिसके बारे में आंबेडकर ने आधी सदी पहले बात की थी. असली तकलीफें अवाम सहती है जिसके बारे में माना जाता है कि वो इस मुल्क की संप्रभु सत्ता है लेकिन जिसे एक ऐसा लाचार जीव बना कर छोड़ दिया गया है जो बस शैतान के रहमोकरम पर ही जिंदा रह सकती है. अवाम की मुसीबतों की सबसे सटीक झलक उन घटनाओं में देखी जा सकती है, जो अभी छत्तीसगढ़ में घट रही हैं. यहां राज्य और माओवादी करार दिए गए आदिवासियों के बीच एक तरह की जंग चल रही है.

शैतानों ने माओवादियों की इतनी बुरी सूरत पेश की है कि उन्हें आम अवाम के नुमाइंदे के बारे में कबूल करना तो दूर, उन्हें इंसानों के रूप में भी नहीं लिया जा सके. बस्तर की एक आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी की दास्तान ऐसी ही एक दास्तान है जो एक माओवादी समर्थक नहीं बल्कि पिछले चुनावों में आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार थीं. उनका अकेला अपराध ये था कि उन्होंने अपने जैसी आदिवासी जनता पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई. पहले उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें यौन यातनाएं दी गईं. अब वे एक जानी-मानी शख्सियत हैं और हाल ही में उनके चेहरे पर कोई केमिकल फेंक कर उनके चेहरे को बिगाड़ दिया गया. उनके बुजुर्ग पिता, उनकी बहन और उनके पूरे परिवार को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें इस कदर परेशान किया गया है कि उनके पत्रकार भतीजे को सरेआम खुदकुशी करने की धमकी देनी पड़ी.

महिला वकीलों के एक संगठन जगदलपुर लीगल एड ग्रुप का मामला भी शैतानियत की इस हुकूमत की एक निशानी है, जो जुलाई 2013 से लगातार आदिवासों को मुफ्त में कानूनी मदद मुहैया कराता आ रहा है. प्रशासन ने इसके बारे में प्रचार किया कि यह एक ‘नक्सली संगठन’ है. इसकी वकीलों को पुलिस के एक हत्यारे समूह सामाजिक एकता मंच द्वारा ‘खून के प्यासे नक्सलियों’ को बचानेवाली वकीलों के रूप में सरेआम पीटा गया. यह मंच बदनाम सलवा जुडूम का एक और भी खतरनाक रूप है. उनके खिलाफ बेनाम शिकायतें करके उन्हें परेशान किया गया. स्थानीय बार असोसिएशन ने उन्हें बाहरी बता कर प्रैक्टिस करने पर पाबंदी लगा दी. वे प्रैक्टिस करने के लिए राज्य बार काउंसिल से एक अंतरिम आदेश हासिल करने में कामयाब रहीं. लेकिन इस साल फरवरी से पुलिस ने उनके मकान मालिकों पर दबाव डालने और उनकी मदद करने वाले लोगों को तंग करने की एक नई तरकीब अपनाई है जिसकी वजह से उन्हें जगदलपुर छोड़ देने पर मजबूर होना पड़ा. संविधान (अनुच्छे 39ए) राज्य को इसकी जिम्मेदारी देता है कि वो अपने नागरिकों के लिए कानूनी मदद को यकीनी बनाए, लेकिन शैतान इसकी इजाजत नहीं देगा. एक और बाहरी, स्क्रॉल डॉट इन के एक पत्रकार को भी इसी तरह परेशान किया गया और उसे बस्तर छोड़ने पर मजबूर किया गया, जिसने आदिवासियों के मुद्दों, पुलिस की बेरहमी, हाल में इलाके में सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी औरतों के खिलाफ की गई यौन हिंसा की व्यापक रूप से खबरें दी थीं.

और यह सब आंबेडकर के संविधान के नाम पर हो रहा है!

दो माह बाद: जेएनयू के मामले पर एक बारीक नजर

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/10/2016 05:27:00 PM


दो महीने के बाद हाशिया लौट आया है. इस मुद्दत में जेएनयू और देश में काफी कुछ हुआ है और इन सब पर काफी कुछ लिखा और पढ़ा गया. हाशिया में उन पर गौर करने की कोशिश की जाएगी. इसी सिलसिले में यह पहली पोस्ट, जिसमें सौम्यब्रत चौधरी बता रहे हैं कि दो महीने पहले 9 फरवरी को जेएनयू में हुए आयोजन में कथित रूप से बोले गए शब्दों के मायने क्या हैं और उनका हमारी राष्ट्रीय समझदारी पर क्या असर पड़ा है. वे फिलहाल स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड ऐस्थेटिक्स, जेएनयू में पढ़ा रहे हैं. उन्होंने इसके पहले सीएसएसएससी, कोलकाता में पढ़ाया है और वे सीएसडीएस, दिल्ली और आईआईएएस, शिमला में फेलो रहे हैं. 2013 में आई उनकी किताब थिएटर, नंबर, इवेंट: थ्री स्टडीज ऑन द रिलेशनशिप ऑफ सॉवरेंटी, पावर एंड ट्रुथ राष्ट्रों की संप्रभुता और रंगमंच के साथ इसके रिश्ते पर गौर करती है. उनका हालिया काम बाबासाहेब आंबेडकर और जाति के प्रश्न पर है. मूल लेख: काफिला. अनुवाद: रेयाज उल हक.

पोलोनियस: ‘आप क्या पढ़ रहे हैं जहांपनाह?’
हैमलेट (नई दिल्ली, 2016): ‘भारत, पाकिस्तान, सुरक्षा, संप्रभुता, राष्ट्र, राष्ट्र-विरोधी...शब्द, शब्द, शब्द.’


सिगमंड फ्रायड के मुताबिक, जब हम सपनों में होते हैं और जब हम दिमागी बीमारी की वजह से होने वाले वहम से गुजर रहे होते हैं तो हम शब्दों को तस्वीरों और चीजों के रूप में लेने लगते हैं. इन हालात में एक शब्द का जो मतलब होता है, वह उस शब्द की शक्ल ले लेता है और हमें ऐसा लगने लगता है कि हम उसके भौतिक प्रभाव को, उससे लगने वाली चोट को महसूस कर रहे हों. तब यह बात हमारी समझ से परे चली जाती है कि एक शब्द बाहरी दुनिया की किसी चीज या किसी विचार का एक संदर्भ है या एक उपमा के रूप में या एक छुपी हुई तुलना या बिंब के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. हम शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहने के एक खास अंदाज (रेटरिक) में कही जा रही बात को भी कबूल नहीं कर पाते, जिसका मकसद हमें अपनी बात मनवाना, समझाना, किसी बात को खारिज करके नई बात कहना या अपमानित करना है. अगर कोई भी इंसान ऐसी बातचीत करना चाहता है तो उसकी ऐसी हरेक बात में हम महसूस करते हैं कि हम उसके शब्दों से शारीरिक, भावनात्मक और इसके नतीजे में मानसिक रूप से आहत हैं मानों वे शब्द कोई धक्का या हमला हों.

इसलिए, इसके जवाब में हम पलट कर बोलने वाले को अपनी बात मनवाने की कोशिश नहीं करते, उसे समझाते नहीं, उसकी बात को खारिज नहीं करते और न ही उसका अपमान करते हैं, बल्कि हम उसे शाप देते हैं (इस मुकाम पर यह किसी मानीखेज बातचीत की सबसे ऊपरी सीमा है), पीटते हैं, बोलने वाले का गला पकड़ लेते हैं, अगर हमारे पास छुरी या बंदूक में से कोई चीज हुई तो उसे उठा लेते हैं – या फिर हम घबरा जाते हैं, रोते हैं, अपना सिर अपने हाथ में ले लेते हैं और हाय-तौबा मचाने लगते हैं. अब सचमुच की दिमागी बीमारी से होने वाले वहम की हालत में इसकी कम ही संभावना है कि हम इस बात के काबिल हो पाएंगे कि एक खास कानून या कानून के एक खास प्रावधान का अपने पक्ष में इस्तेमाल करें और जाकर पुलिस में शिकायत कर दें. ऐसी हालत में हम अपनी हरकतों को वाजिब ठहराने के लिए एक जोरदार किस्म की भाषाई तस्वीर का इस्तेमाल कर पाने के काबिल नहीं होते. ‘हमने जो किया, उसके सिवाय हमारे पास कोई और रास्ता नहीं था, क्योंकि उन्होंने हमारी भारत माता का अपमान किया है.’ सचमुच की दिमागी बीमारी की हालत में, इसकी संभावना ही ज्यादा है कि हमें ही कानून की गिरफ्त में ले लिया जाए.

इसलिए सरकार, स्मृति ईरानी और राजनाथ सिंह, दूसरे भाजपा मंत्री, आरएसएस के विचारक, पटियाला हाउस में वकीलों के लबादे में आए गुंडे और मीडिया एंकर असल में दिमागी रूप से बीमार नहीं हैं, भले ही वे दिखते जैसे भी हों. हालांकि जो दिख रहा है, वो खासा साफ है और उस पर थोड़ा गौर किया जाना जरूरी है. उसे मोटे तौर पर घटनाओं और दलीलों की यह तरतीब दी जा सकती है: जेएनयू में छात्रों का एक समूह अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का ऐलान करता है जिसमें गीत, कविताएं और भाषण शामिल थे. पोस्टर में वे अपने नामों के पहले संक्षिप्त हिस्से का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वे कौन लोग हैं यह अभी बहुत कम अहमियत रखता है. पहचानों में दिलचस्पी सिर्फ तभी जाकर पैदा है जब उन्हें बहुत साफ साफ तरीके से छुपाया जाए या फिर उन्हें नाटकीय तौर पर उभारा जाए. छात्रों ने इनमें से कोई तरीका नहीं अपनाया था, वे ‘सामान्य’ हैं. फिर कार्यक्रम होता है और बहुत जोखिम न लेते हुए यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी मौके पर या कुछ मौकों पर कुछ नारे लगाए और सुने गए. क्या अभी इस मौके पर नारे लगाने वालों की पहचानें अहमियत रखती हैं? असल में नहीं, क्योंकि जिन्होंने भी नारे लगाए, उन्होंने न तो अपनी पहचान को छुपाने की कोशिश की और न ही उन्होंने उन्हें खास तौर से उभार कर पेश किया. उन्होंने जो कुछ भी किया, खुले तौर पर किया, और ऐसा करते हुए उन्होंने वहां मौजूद बाकी लोगों से खुद को अलग नहीं किया. इसलिए बाद में जब एक खास मंशा रखने वाली ताकतें व्यक्तियों और समूहों की पहचान करना चाहेंगी, तो यह दावा करते हुए कि कौन से नारे किन लोगों ने लगाए थे, उन्हें नारे लगाती हुई आवाजों की ऊंचाई और निचाई के साथ सबूतों की कमी का सामना करना होगा.

हालांकि उन नारों में जो बात कही गई थी, उसमें थोड़ी देर के लिए कुछ दम है और उसकी अहमियत है. इसी के साथ यह देखते हुए कि मामला कानूनी और फोरेंसिक मसले में तब्दील हो गया है, यह बात कहनी भी जरूरी है कि शब्द अभी भी ‘कथित तौर पर’ ही कहे गए हैं. कोई भी एकदम यकीन के साथ बोले गए नारों के बारे में दावा नहीं कर सकता. हालांकि कुछ देर के लिए अभी मान लेते हैं इन नारों में आने वाले कुछ मुख्य शब्द (जिसमें कुछ नाम भी शामिल हैं) इस तरह थे – अफजल गुरु, शहीद, कश्मीर, आजादी, भारत, पाकिस्तान, जिंदाबाद, मुर्दाबाद... इनमें से कुछ शब्द और नाम साफ तौर पर एक राजनीतिक सभा में रस्मी तौर पर इस्तेमाल किए जाने के लिए बने हैं ताकि भविष्य की राजनीति के लिए एक इंसानी तस्वीर पेश की जाए – अफजल गुरु को शहीद बना दिया गया. यह बात दूसरे शब्दों और नामों के साथ मिला कर वहां मौजूद लोगों से कही जा रही थी, ताकि उन्हें एक शहादत का यकीन दिलाया जाए. या फिर इसके लिए उनका हौसला बढ़ाया जाए कि वे इसमें यकीन करने लगें. इसी सिलसिले में, नारों की व्यापक होती हुई दहलीज “भारत” के टुकड़े कर देने की पुकार के साथ सामने आई. फिर क्या पाकिस्तान की तारीफ जले पर नमक छिड़कने के लिए की गई?

अजीब तौर पर, ऐसा लगता है कि जहां तक कश्मीर के साथ भारतीय राज्य के राजनीतिक इतिहास का मामला है, नारे बात को मनवाने, समझाने या पहले से कही गई बातों को खारिज करने तक जाते हैं...लेकिन “पाकिस्तान” का मामला आते ही, वे एक खरी-खरी कल्पना रच देते हैं. असल में अगर कोई भारतीय राज्य की संप्रभुता की हिंसा की आलोचना करता है तो इसका मतलब ये नहीं निकलता कि पाकिस्तान एक बेहतर वैकल्पिक संप्रभुता है. पाकिस्तान एक सचमुच के राष्ट्र का नाम है, जिसकी संप्रभु हिंसा का एक इतिहास है. यह इतिहास कश्मीरियों के लिए तसल्ली या भरोसा दिलाने वाला कोई भी वादा नहीं करता, सिवाय इसके कि अपने सबसे अच्छे रूप में यह एक संदिग्ध इस्लामी माहौल का वादा करता है और अपने सबसे खराब रूप में एक बहुसंख्यकपरस्त मुस्लिम पहचान का, यह वादा भी तब कोई मायने रखता है जब वे कश्मीरी लोग मुसलमान हों. पाकिस्तान, कश्मीरी अवाम के आत्म-निर्णय की मांग की मांग से भी नहीं आता, ठीक ठीक इसलिए क्योंकि वे अपना फैसला भारतीय और पाकिस्तानी दोनों राष्ट्रों में से किसी भी एक राष्ट्र के बतौर नहीं करना चाहते. लेकिन यह मुमकिन है कि अपने बारे में अपना फैसला आप करने की कश्मीरी ख्वाहिश अब तक पाकिस्तान की कल्पना से जुड़ने की ख्वाहिश रही हो क्योंकि पाकिस्तान अपने आप में ही कश्मीर का एक नया नाम है, पाकिस्तान की जो सचमुच की ऐतिहासिक अवधारणा रही है उसके रूप में नहीं बल्कि कश्मीरियों के सपनों की आजाद हैसियत के रूप में. इस तर्क के हिसाब से, पाकिस्तान सचमुच के कश्मीरी अवाम की अपनी ख्वाहिशों की संप्रभुता का एक काल्पनिक नाम बन जाता है और जेएनयू में - और दूसरी जगहों पर – नारे इसी मानीखेज लेकिन भड़काने वाली कल्पना को पेश करते हैं. पाकिस्तान एक ऐसे वक्त में सपनों के भावी कश्मीर का काल्पनिक नाम है, जब मौजूदा दौर में “आजाद कश्मीर” का नाम लेने पर पाबंदी है. तब इस दलील के मुताबिक, पाकिस्तान का नाम भारत का अपमान करने के लिए नहीं बल्कि उससे छुटकारे के लिए पुकारा जाता है.

इस मामले में ऊपर से जो कुछ भी दिखाई दे रहा है और जिसको हमने एक तरतीब दी है, उसमें पक्के तौर पर ऐसी नई कुछ बातें या कार्रवाइयां हो सकती हैं जो सामूहिक राजनीतिक दावेदारियों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती हों और उनमें से कुछ बातों के कानूनी पेंच हो सकते हैं, या शायद न भी हों. इसके बावजूद, यह देखने के लिए किसी तीसरी आंख की जरूरत नहीं है, कि घटनाओं और बातों का यह सिलसिला पूरी तरह एक विद्रोही शैली में राजनीतिक बेबाकी के साथ भाषा के दायरे में ही सामने आता है, उसमें रत्ती भर भी भौतिक हिंसा नहीं है. हम यहां विद्रोही उसूलों को देखते हैं, जिसके लिए आत्म निर्णय भारतीय राज्य या राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ एकजुट होने या फिर काम करने की साजिश करने की खातिर एक कदम है, लेकिन कोई राजद्रोही योजना इसका हिस्सा नहीं है. हम देखते हैं कि जेएनयू में तार्किक तरीके से सोचने वाली जनता जमा हुई और जिसने एक सभा की, जिसने कुछ कायदों – और कानूनों को भी? – लांघ दिया. लेकिन यह किसी विद्रोही आपराधिक इरादे वाले खुफिया संगठन (सीक्रेट सोसायटी) की बैठक नहीं थी. यह एक ऐसी जनता है जो तर्कों के आधार पर सोचती है और ऐसा दिख रहा है कि उसने एक विद्रोही कायदे और लोगों को भड़काने वाली काल्पनिक बातों की मदद लेते हुए, बेबाकी से बोलते हुए कुछ निश्चित दावेदारियों को खतरे में डाल दिया. इस मुकाम तक इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि उन लोगों की खास पहचान क्या है जिन्होंने बोलने के इस काम को अंजाम दिया चूंकि उन्होंने न तो अपनी पहचान को छुपाया था और न ही उसका ढिंढोरा पीटा था.

और फिर अब तक जो कुछ भी दिख रहा था, उन सब पर पागलपन सवार हो गया. एक टेलिविजन एंकर को दौरा पड़ गया जिसके बारे में ऐसा लगने लगा है कि वो खत्म ही नहीं होगा. और दूसरे अनेक एंकरों ने उसके साथ सुर में सुर मिलाते हुए मीडिया की घेरेबंदी का एक भयावह नजारा पेश किया. गृह मंत्री, शिक्षा मंत्री, पार्टी सरगना, वकील-गुंडे-भारतीय संस्कृति के भाषाओं के जानकार ठेकेदारों लोगों ने जेएनयू में लगे नारों में सुने गए शब्दों पर एक सुर में हंगामा खड़ा कर दिया. पगलाए हुए, भाषाओं के जानकार कहते हैं कि भारत माता को इन शब्दों से चोट लगी है और उन शब्दों में भारत की मौत छुपी हुई है. यह एक दिलचस्प बात है क्योंकि बजाहिर पगलाए हुए इन जानकारों की समझ के उलट, इन नारों - जो यकीनन ही जेएनयू, भारत और दुनिया में पहली बार नहीं सुने गए हैं - और वे जिन शब्दों से बने हैं उनकी ठोस राजनीतिक व्याख्या हमें बताएगी कि इस संदर्भ में “मुर्दाबाद” भौतिक और शारीरिक रूप से बर्बाद करने की नहीं बल्कि ढांचे का अंत करने की इच्छा को जाहिर करती है. मिसाल के लिए जब “वाइस चांसलर मुर्दाबाद” का नारा लगाया जाता है तो कोई भी उस व्यक्ति का जैविक खात्मा नहीं चाहता और न ही इसका इरादा रखता है, बल्कि वह सत्ता की एक निश्चित व्यवस्था के अंत के लिए आवाज उठाता है, वाइस चांसलर जिसका प्रतिनिधित्व करता है. राष्ट्रीय पैमाने पर इस दलील के विस्तार का एक विद्रोही सैद्धांतिक मतलब है कि संप्रभु सत्ता का, अपने वास्तविक ऐतिहासिक अर्थ में और सचमुच की जनता द्वारा किए गए अनुभव के रूप में, अपनी समग्रता में विरोध किया जा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई महज एक विद्रोही उसूल के इस ऐलान के जरिए ही संप्रभु क्षेत्र के भीतर और इस संप्रभु क्षेत्र की भौतिक नुकसान, तबाही और मौत की योजना बना रहा है. इसी के साथ, इसका यह मतलब भी नहीं है कि उसूलन एक इलाके में फैला हुआ हर कोई सत्ता के अपने अलग अलग ऐतिहासिक अनुभवों के साथ संप्रभुता और इलाके को, कानून और विरासत के बेदाग मेलजोल को जस का तस कबूल कर लेता है.

दूसरी तरफ भाषा के पगलाए हुए जानकार इन शब्दों को तस्वीरों के रूप में देखते हैं, उन्हें सचमुच के धक्कों के जरिए किए जाने वाले हमलों के रूप में महसूस करते हैं. कायदे से कहें तो ये दिमागी बीमारी के आसार हैं और ऐसा लग सकता है कि भारत माता के अपमान से पागल हुए भाषा शास्त्री असल में पागल हो गए हैं, क्योंकि यह बातचीत और विचार-विमर्श के स्तर पर भी अपमान को सुन या पढ़ नहीं सकते हैं. बहरहाल अपमानित करने की एक लंबी और खासी प्रतिष्ठित बौद्धिक परंपरा रही है, और इस देश में भी रही है. न तो मार्क्स ने और न ही आंबेडकर ने अपने विरोधियों को अपने तीखी आलोचनाओं से बख्शा; उन्हें ऊंचे राजनीतिक जोखिम वाली एक वाद-विवाद की संस्कृति पसंद थी, जिसमें विषय को लेकर कोई पाबंदी नहीं थी. आंबेडकर अपने वक्त में देश के पूरे अवाम के सामने मुस्लिम बहुसंख्यक इलाकों में आत्म निर्णय के सवाल को उठाने के लिए भारत में विजय, संघर्षों और उन पर किए जाने वाले हमलों के बदसूरत इतिहास पर गौर करने में नहीं हिचके. उन्होंने 1940 और 1945 में हरेक से इस सवाल पर फैसला करने को कहा: पाकिस्तान बने या न बने?

आत्म निर्णय आम तौर पर, उसूल के बतौर और खास तौर पर कोई ऐसा प्रस्ताव नहीं था, जो समझ से परे हो. यहां तक कि इसके खिलाफ फैसला करने के लिए भी हमें इसके बारे में सोचना पड़ेगा. जोतिबा फुले ने आधुनिक भारतीय ऐतिहासिक साहित्य की महानतम और सबसे ज्यादा मुक्तिकारी, अपमानित करने वाली रचना गुलामगीरी की रचना हिंदू जड़सूत्रों, मिथक और कानून, की व्यवस्था को तहस-नहस करने के लिए की, जिन्हें एक मनुस्मृति में पिरोया हुआ है. उन्होंने भाषाई बिंबों के खेल को इस महारत के साथ खेला कि उन्होंने ब्रह्मा के शरीर से पैदा हुए चार वर्णों के हिंदू किस्से को शब्दश: पेश करते हुए ‘अपने आप में हंसी का पात्र’ बना दिया. अगर ब्रह्मा ने सचमुच में इन सभी वर्गों को अपनी देह से पैदा किया था, तो उनकी देह किस किस्म की थी? मर्द या औरत की? यौन संबंधों में सक्षम थी या दैवीय थी? जैविक देह थी या परम देह थी? आज जब भाषा की व्यवस्था शब्दश: बिंबों में बदल गई है और बिंब ही बुनियादी अर्थ बन गए हैं, यानी दूसरे शब्दों में जो विमर्शों का तंत्र हुआ करता है वह सनक के तंत्र में, बेवकूफी के तंत्र में तब्दील हो गया है, तब फुले की तर्क पर आधारित और एक मुक्तिकारी अपमान की परंपरा को उलट देना एक गहन प्रतिक्रांतिकारी कोशिश लगती है.

सभी प्रतिक्रांतियों की तरह, यह भी इस तथ्य से नफरत करती है कि यह अपने वजूद के लिए मूल क्रांति की एहसानमंद है – और इस तथ्य को भूलने के लिए यह एक विचार के रूप में क्रांति को एक गैर प्रतिक्रांतिकारी तरीके से खारिज करना पसंद नहीं करेगी, बल्कि यह उन सब लोगों के सफाए को पसंद करेगी जिनको यह “क्रांतिकारी” मानती है. मौजूदा हुकूमत के मुताबिक ‘जेएनयू टाइप’ से उसे उस तरह का खतरा नहीं है जैसे एक आतंकवादी से होता है, जो अपने सबसे भयानक रूप में भी बस एक स्थानीय और बाहरी खतरा है; यह कथित टाइप (‘जेएनयू टाइप’) सत्ता को अधिक व्यवस्थित रूप से और बुनियादी तौर पर खतरे में डालता है, जैसे कि क्रांतिकारी करते हैं. और इसलिए, अजीब तरह से दिमागी बीमारी के आसारों के सिलसिले में एक प्रति-क्रांतिकारी रणनीति उजागर हो गई है – वो वजह जो बेवकूफियों के एक तंत्र की बुनियाद में है जिसका मकसद राष्ट्र को बेवकूफों की एक हुकूमत के तौर तरीकों से हांकना है, और वह वजह है एक कुरूप और विकृत संप्रभुता.

अब संप्रभु सत्ता की कुरूपता के दो पहलू हैं: इसमें (1) कानून से परे जाकर समाज से अपने लिए वैधता हासिल की जाती है (जिसके लिए लगातार कानून के अक्षरों को, प्रावधानों को, शब्दों को बेवकूफी के साथ सूत्रों और मंत्रों की तरह जपा जाता है); (2) समाज को कुसूरों के समाज में ढाला जाता है ताकि कानून से परे जाकर इस वैधता को हासिल किया जाए. दूसरे पहलू पर पहले बात करते हैं: सत्ता इस गहरे संदेह के आधार पर बनी होने की वजह से कि संप्रभु सत्ता को अपने शासन के प्रति किसी न किसी तरह की नाफरमानी का सामना करना पड़ता है, वो इस संदेह को समाज के दायरे में ले आती है. इस तरह सत्ता के प्रति हर नाफरमानी सामाजिक मूल्य के रूप में सत्ता के मूल्य की नाफरमानी के रूप में ली जाने लगती है. एक सीमित संभावना के रूप में, हालांकि यह संभावना भी खत्म होती जा रही है, ऐसे मूल्य सामुदायिक और धार्मिक स्थानीयताओं में निहित होते हैं. इसलिए समाज अपनी धार्मिक, रस्मी और पारिवारिक भावनाओं के आहत होने या उनकी आलोचना होने पर गुस्से में तिलमिला उठता रहा है और यह अब भी जारी है. हर बार आहत होने पर, समाज को इस तरह पेश किया जाता है कि एक बुनियादी संस्था के रूप में समाज पर एक दुश्मन से खतरा है, यह संस्था जख्मी है, कि समाज की सरहदों पर दुश्मन की फौज खड़ी है. जब संभावनाओं का विस्तार कर दिया जाता है और खतरों को बढ़ी हुई एक शक्ल दी जाती है, तब समाज की सरहदें राष्ट्र की सरहदें बन जाती हैं, जिसमें इसकी सरहदों से लगे दुश्मन राष्ट्र की कल्पना बुनियादी तौर पर दुश्मन समाज के रूप में की जाने लगती है. राज्य की संप्रभुता और समाज की संस्था के इस मेल के साथ, राष्ट्र को गुमराही में राष्ट्रीय समाज के रूप में देखा जाने लगता है जिसको राष्ट्रीय (विरोधी) समाज (विरोधी) से खतरा है. फरेब के इस रंगमंच पर भारत और पाकिस्तान ने लंबे, बहुत लंबे अरसे से एक किस्म का दुश्मन-दुश्मन का खेल खेलना अब तक जारी रखा है.

हालांकि फौरी हालात में कुसूरों के समाज की रचना में देश के भीतर ही हर कहीं उस दुश्मन की खोज की जाती है जिसके साथ दुश्मन-दुश्मन खेला जा सके - और जेएनयू जैसी निश्चित स्थानीयताओं के बारे में यह भ्रम फैलाया जाता है कि वहीं संप्रभु फरमान के प्रति सारा परायापन, सारी पराई गवाहियां, सारी नाफरमानी पैदा होती है. इसलिए समाज को सबसे पहले तो परायों की पहचान करना और उन्हें कसूरवार ठहराना जरूरी है ताकि यह अपने उन दुश्मनों से छुटकारा पा सके, जिनके साथ दुश्मन-दुश्मन खेला करता है – वे समाज विरोधी, राष्ट्र विरोधी, आजादी परस्त, पाकिस्तान परस्त, भारत विरोधी लोग (जो भारतीय हैं, हमेशा भारतीय!). उनकी पहचान करने और उनको कसूरवार ठहराने का काम समाज के सामूहिक मतिभ्रम यानी मीडिया के जरिए किया जाता है– और इसके बाद पुलिस को बुलाया जाता है. जेएनयू के छात्रों के साथ जो हुआ, उसे आजाद भारत में अपने नागरिकों को झूठे तरीके से फंसाने की सबसे बड़ी घटना कहा जा सकता है, जिसमें कानून ने सिर्फ संप्रभु फैसलों का पालन किया है. लेकिन संप्रभु फैसला अपने आप में समाज से वैधता हासिल करता है, ऐसे समाज से जो खुद अपने सदस्यों की पहचान करने और उन्हें कसूरवार ठहराने में मसरूफ है. राजनाथ सिंह बड़ी खुशी खुशी और बेवकूफी भरे तरीके से जेएनयू के छात्रों के साथ हाफिज सईद के रिश्ते की बात करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी कुरूप संप्रभु हुकूमत समाज द्वारा ‘राष्ट्र-विरोधियों’ को कसूरवार ठहराने की कोशिशों के साथ लगातार मेल खाती हुई चल रही है. इससे क्या फर्क पड़ता है कि हाफिज सईद वाली यह पूरी बात तथ्यात्मक रूप से सच नहीं है, क्योंकि अगर कोई एक “राष्ट्र विरोधी है”, उसका हाफिज सईद में यकीन करना तो लाजिमी ही है. और यह काल्पनिक नाम ‘हाफिज सईज’ दिल्ली पुलिस को धूमधाम से काम पर लगाने के लिए पर्याप्त रूप से एक वाजिब वजह है. जब नारे “पाकिस्तान” की मनगढ़ंत की बेबाक तरीके से और सरेआम तारीफ करते हैं जिसमें उन्हें इस खतरनाक मनगढ़ंत के अलावा और किसी की मदद हासिल नहीं है, एक ऐसा इंसान जो असल में इन नारों से भले ही किसी भी तरह जुड़ा हो या नहीं, उसकी पहचान की जाती है, उसको कसूरवार ठहराया जाता है और गिरफ्तार कर लिया जाता है. लेकिन सरसरी तौर पर इन कार्रवाइयों का आधार सरकार द्वारा साजिशन गढ़ी गई एक कहानी है, जिसका नाम “हाफिज सईद” है. एक मनगढ़ंत बात का सिर्फ डंका ही पीटा जा सकता है, इसका जितना शोर मचाया जाएगा, उतना ही यह सार्वजनिक तफ्तीश के दायरे में आएगा. दूसरी मनगढ़ंत को लागू किया जा सकता है और लागू किया गया है, और इसे जितना ही लागू किया जाता है, उतना ही यह सच्चाई का ढोंग करती है, जिसको संप्रभुता की गोपनीयता की सुरक्षा हासिल होती है (“आप खुफिया रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं कर सकते”).

यह सारा तामझाम संप्रभु हुकूमत के कुरूप चेहरे की हिफाजत करने के लिए किया जाता है, जिसका तरीका है: संप्रभु सत्ता जितनी ही बदसूरत दिखेगी, जितनी ही नफरत के काबिल लगेगी, जितने ही क्रूर तरीके से काम करेगी और जितनी बेवकूफी भरी बातें करेगी, वह अपने अख्तियार पर उतने ही कारगर तरीके से पकड़ बनाए रखेगी, उसको बढ़ाएगी और उसे और धारदार बना सकेगी. किसी ने भी नहीं सोचा था कि ज़ॉर्ज डब्ल्यू. बुश खास तौर से होनहार थे, लेकिन उनकी कम अक्ली की शोहरत का सीधे सीधे रिश्ता उनके खौफनाक लेकिन कारगर मंसूबों से था, जिनके तहत वे जिस देश पर चाहते थे, हमले कर देते थे. इस तरीके की संप्रभुता, अपनी संप्रभु सत्ता पर अमल करने वाली सभी सरकारों का सपना है, जिसमें उन्हें वैधता दिलाने वाली परंपरागत रणनीतियों की जरूरत नहीं होती और तब भी उन्हें महज कानून की हद से परे जाकर समाज द्वारा क्रूर तरीके से वैधता हासिल होती है. आज भाजपा हिंसक तरीके से इस सपने को साकार कर रही है और जिस अवाम ने उसे चुना है, उससे यह कहती हुई दिख रही है कि “हम तुम्हें बेवकूफ और पागल दिख रहे हैं, खैर, वो तो हम हैं ही और बेहतर होगा तुम इसको पसंद करना सीख जाओ!” यह कहने का मतलब यह है कि इस पागलपन के वक्त पागल बनने का फैसला करने में समझदारी है. और अगर सुनने में यह बहुत बेरहम बात लग रही है तो यह शायद ऐसी है ही. और अगर यह ऐसी ही है तो इसे तर्क के आधार सोच-समझ कर ही तैयार किया गया होगा, यह बिना तर्क के नहीं किया जा सकता! यह किसका तर्क है, इस दिमागी बीमारी की रणनीति और बेवकूफी की व्यवस्था से सबसे ज्यादा फायदा किसको हो रहा है इस पर अगले लेख में गौर किया जाएगा.

लेकिन एक ऐसे समय में ये रूखी-सूखी बातें, जब जेएनयू के छात्र जो कुछ रच रहे हैं, वह इस कदर बेपनाह खूबसूरत है कि दिल ने कभी भी इतना भरापूरा महसूस नहीं किया था.

एक सुसाइड नोट को कैसे पढ़ें

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/09/2016 03:50:00 PM



रेयाज उल हक

‘उम्मीद बहुत ज्यादा है, बेशुमार उम्मीद है – लेकिन हमारे लिए नहीं.’ काफ्का पर लिखते हुए वाल्टर बिनयामिन ने काफ्का की ये पंक्तियां उद्धृत की थीं. इसके 6 साल बाद, स्पेन के पोर्ट बोऊ शहर में नाजी हुकूमत से बचकर भाग निकलने की आखिरी कोशिश में नाकाम होता दिखने और वापस जर्मन गेस्टापो के हाथों सौंप दिए जाने की आशंका के बीच मॉर्फीन की ज्यादा गोलियां लेते हुए बिनयामिन ने जो सुसाइड नोट लिखा उसमें उम्मीद से महरूम कर दिए जाने की यह पीड़ा बहुत साफ है: ‘ऐसी हालत में जिसमें बच निकलने की कोई राह नहीं है, इसको खत्म कर देने के अलावा मेरे पास कोई रास्ता नहीं है.’

हम नहीं जानते कि बिनयामिन ने अपनी आखिरी चिट्ठी में क्या लिखा था, क्योंकि वह नष्ट कर दिया गया. लेकिन हम जितना जानते हैं, वह उन हालात के बारे में बिनयामिन के पक्के अंदाजे के बारे में बताता है, जिसमें वे पिछले कुछ सालों से फंसे हुए थे. एक साल पहले वे अपने कुछ दोस्तों की मदद से नाजी यातना शिविर की कैद से छूटे थे और फ्रांस और पूरे यूरोप में नाजी जर्मनी की बढ़ती धमक के साए में बॉदलेयर और आर्केड्स प्रोजेक्ट पर अपने काम को पूरा करना चाहते थे. यह उनका सपना था. लेकिन फ्रांस पर जर्मनी के कब्जे के बाद फ्रांस में रहना मुश्किल होता जा रहा था और वे स्पेन के रास्ते अमेरिका चले जाने की कोशिश कर रहे थे. इसी क्रम में वे पोर्ट बोऊ पहुंचे थे जहां अधिकारियों ने उन्हें सूचित किया कि गैरकानूनी रूप से स्पेन में घुसने की वजह से उन्हें अगली सुबह वापस जर्मन अधिकारियों को सौंप दिया जाएगा.

बिनयामिन स्पेनी अधिकारियों और नाजियों को नहीं रोक सकते थे. लेकिन अपने लिए उस सुबह को आने से रोक सकते थे.

रोहिथ वेमुला ने भी यही किया, लेकिन वे चाहते थे कि हम उनके बाद की सुबहों के गवाह बनें: ‘गुड मॉर्निंग’. उनके आखिरी खत की शुरुआत एक ही साथ कई फैसलों और उन फैसलों में पक्के यकीन को बहुत साथ साफ सामने रखती है. ‘आप जब इस खत को पढ़ रहे होंगे, मैं आपके आसपास नहीं होऊंगा.’

यह बताता है कि रोहिथ ने किसी गुस्से या जल्दबाजी में यह फैसला नहीं लिया. न ही यह हताशा में लिया गया एक फैसला है, जिसमें फैसला लेने वाले इंसान को आगे की कोई राह नहीं दिखाई देती. बल्कि यह दिखाता है कि उनको इस फैसले की तरफ धकेल दिया गया. भारत के जातीय समाज में धकेले जाने की यह कार्रवाई ऊपर से दिखाई नहीं देती. यह जीने और मरने के बीच की पूरी मुद्दत के दौरान, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचों के भीतर चुपचाप काम करती है. नजरों से ओझल होकर. असल में ये ढांचे इसीलिए काम करते हैं कि नाइंसाफी और शोषण को छुपा कर उन्हें जिंदगी के लिए एक जरूरत के रूप में पेश किया जाए और इस तरह सवाल करनेवाली, चुनौती देने वाली और असहमत आवाजों की सारी गुंजाइश खत्म कर दी जाए. और फिर भी अगर कहीं से ऐसी आवाज उठे तो उसे इस कदर अकेला कर दिया जाए कि उसके सवाल और असहमति अपनी ताकत खो दे.

लेकिन रोहिथ को आत्महत्या की तरफ धकेले जाने की कार्रवाई एक तमाशे की तरह हम सबकी नजरों से सामने हुई. एक अनुष्ठान की तरह, सारी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए रोहिथ को यहां तक पहुंचाया गया कि वे हमारे बीच से चले जाएं. और इस अनुष्ठान में ब्राह्मणवादी फासीवादी राज्य के सारे पुर्जों ने अपनी भूमिका निभाई: केंद्रीय मंत्रियों स्मृति ईरानी और बंडारू दत्तात्रेय से लेकर विश्वविद्याल प्रशासन तक ने. इस कार्रवाई को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की उस पुलिसिया शिकायत में देख सकते हैं, जिसमें रोहिथ और उनके संगठन आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन (एएसए) के दूसरे कार्यकर्ताओं पर एबीवीपी के हैदराबाद विश्वविद्यालय ईकाई के अध्यक्ष एन. सुशील कुमार के साथ मारपीट करने का झूठा आरोप लगाया गया था. इसे केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के उस पत्र में देख सकते हैं कि जिसमें उन्होंने एएसए पर ‘राष्ट्रविरोधी’ गतिविधियां चलाने का आरोप लगाया था. इसे केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की उन चिट्ठियों में देखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन को एएसए के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा.

कार्रवाई हुई. रोहिथ और उनके चार साथियों को प्रशासन ने होस्टल से निकाल दिया गया और विवि के भीतर उन पर अनेक पाबंदियां लगा दी गईं. ये पाबंदियां असल में उनका सामाजिक बहिष्कार थीं, जिसके तहत होस्टल और प्रशासनिक भवन में दाखिल होने और सार्वजनिक जगहों पर उनके एक साथ जाने पर रोक लगा दी गई थी. उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी गई. ये सारी सजाएं बिना किसी जांच और सुनवाई के उन पर थोप दी गई थीं. रोहिथ की स्कॉलरशिप भी रोक दी गई, जिसने उन्हें और उनके परिवार को आर्थिक मुश्किलों में डाल दिया. दिसंबर से एएसए और दूसरे जनवादी प्रगतिशील छात्र संगठन प्रशासन के फैसले और सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे.

आत्महत्या करते वक्त रोहिथ को अहसास था कि वे अपने संघर्षरत साथियों को बीच में छोड़ कर जा रहे हैं. और इसके लिए वे बस एक आग्रह करते हैं: ‘मुझ पर गुस्सा मत होना. मैं जानता हूं आपमें से कइयों ने सचमुच मेरी देखभाल की है, मुझे प्यार किया है, और मुझसे अच्छे से पेश आए हैं.’ उन्हें इसका भी अहसास था कि वे कैसी लड़ाई लड़ रहे हैं. रोहिथ इस पूरे दौरान शायद एक कहीं बड़ी समस्या को महसूस कर रहे थे. इंसानों को एक दूसरे बांट कर, गैरबराबर और नाइंसाफी भरे रिश्तों में बांध कर रखने वाली व्यवस्था इंसान को भीतर से भी किस तरह बांट देती है और उसके अपने हिस्सों में किस तरह गैरबराबरी को भर देती है, रोहिथ इसको लेकर फिक्रमंद थे: ‘मैं अपनी आत्मा और अपनी देह के बीच बढ़ती हुई खाई को महसूस करता हूं. और मैं एक राक्षस बन गया हूं.’

लेकिन यह अलगाव रोहिथ की अपनी निजी समस्या नहीं थी. वे प्रकृति से प्यार करते थे, वे इंसानों से प्यार करते थे और उन्होंने पाया कि इंसान प्रकृति से कितने दूर कर दिए गए हैं. ‘हमारी भावनाएं भी इस्तेमाल की हुई हैं. हमारा प्यार बनावटी है. हमारा भरोसा रंगा हुआ है. हमारी मौलिकता की तस्दीक बनावटी कला के जरिए होती है. खुद को चोट पहुंचाए बिना किसी को प्यार करना सचमुच मुश्किल हो गया है.’ वे एक लेखक बनना चाहते थे, लेकिन उनका शरीर एक निश्चित सामाजिक संदर्भ में स्थित था, जहां जाति, वर्ग, पहचान के पुर्जे उनके आस-पास सीमाओं का एक बेअंत जाल बुन रही थीं. उन्हें सिर्फ शरीर समझने वाली व्यवस्था के पास उनके लिए एक बनी बनाई भूमिका थी. वे उससे पार नहीं जा सकते थे. उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे उस पर सवाल न करें, उसको चुनौती न दें.

नवउदारवादी कायदा लोगों से यह उम्मीद करता है कि वे किसी भी हाल में कामयाबी हासिल करें, वरना जिंदगी अप्रासंगिक मान ली जाती है. अगर कोई नाकाम रहता है तो इसका मतलब है कि कमी खुद उसमें है. उसकी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को दरकिनार कर दिया जाता है, जहां हरेक जन्म ‘एक जानलेना दुर्घटना’ होता है, जिसका विकास ऐसी बेघर और बेजमीन जिंदगियों में होता है, जहां बंधुआ मजदूरी है, छुआछूत है, बहिष्कार है और वंचित रखने की हजार तरकीबें हैं, जो किसी इंसान की क्षमताओं और संभावनाओं को बड़े पैमाने पर सीमित कर देती हैं. उनका जीना और सपने देखना, उनकी भावनाएं, उनका प्यार, उनकी नफरत, उनकी उम्मीदें: सब कुछ इस विकृत कर देने वाली नाइंसाफी की मशीन से गुजर कर वही नहीं रह जाते, जो होने की उम्मीद उनसे की जाती है.

इतिहास और इंसाफ से बेदखल कर दिए गए समाज में इंसान सिर्फ एक गिनती भर बन कर रह जाते हैं: ‘बस एक वोट. बस एक संख्या.’ रोहिथ महसूस करते हैं कि अपनी फौरी पहचान और सबसे करीब दिखती संभावनाओं में सीमित कर दिए जाने के बाद इंसान भी वह नहीं रह जाता जो वह असल में हो सकता था. जो असल में उसे होना चाहिए था: ‘सितारों से बनी हुई चमकदार चीज.’ एक दिमाग. रचना के काबिल, सोचने वाला, सवाल करने और जवाब देने वाला दिमाग.

इन सबके लिए फिक्र किसको है? व्यवस्था इसको बनाए हुए है. समाज की बहुसंख्या इससे बेपरवाह है. प्रतिरोध की ताकतें बंटी हुई हैं. ‘कोई जल्दी नहीं थी. लेकिन मैं हमेशा भाग रहा था. एक जिंदगी शुरू करने के लिए बेकरार.’
 

एक जिंदगी, जिसका जन्म ही ‘एक जानलेना दुर्घटना’ थी और जिसको एक ‘खालीपन’ से भर दिया गया.

अपने अंतिम दिनों में रोहिथ को ऐसा खालीपन क्यों महसूस होने लगा था? एक जहीन शोधार्थी और एक सक्रिय आंबेडकरी कार्यकर्ता के रूप में रोहिथ जो कर रहे थे, वह असल में सारी ‘बढ़ती हुई खाइयों’ और खालीपन को भरने की कोशिश थी. वे गैरबराबरी और वंचित करने वाले ढांचे के खिलाफ संघर्ष का हिस्सा था. एएसए के कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने एक ऐसे समाज की समझ हासिल की थी, जिसमें इंसान को इंसान से, शरीर को आत्मा से अलग करना नामुमकिन हो. ऐसा एक समाज उत्पीड़ित और अलग-थलग कर दी गई जनता को एकजुट करके ही बनाया जा सकता था: दलित, मुसलमान, आदिवासी और महिलाएं जो अपनी रचनात्मकता और अपनी मेहनत से इस मुल्क को गढ़ते हैं और फिर यह मुल्क उन्हें मलबे में तब्दील कर देता है. उस दूसरे समाज के लिए संघर्ष में उनकी एकजुटता जरूरी है.

एएसए ने फासीवादी भारतीय राज्य द्वारा मुसलमानों पर किए जाने वाले हमलों के खिलाफ आवाज उठाई. पिछले साल जब याकूब मेमन को अन्यायपूर्ण फांसी दी गई तो इसका विरोध करनेवालों में एएसए भी शामिल था. उसने उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में मुसलमानों पर व्यापक सांप्रदायिक हमलों पर बनी फिल्म मुजफ्फरनगर बाकी है के दिल्ली विवि में होने वाले प्रदर्शन पर एबीवीपी के हमले का भी विरोध किया. ऐसी एक राजनीति जो उत्पीड़ित अवाम को, उसकी चिंताओं और उसके संघर्षों को एकसाथ लाए, भारतीय राज्य के लिए यह खतरे की घंटी थी. जब यह राज्य और इसकी फासीवादी विचारधारा दलितों को बार बार हिंदू पहचान में बांधने की कोशिश कर रही है, एएसए दलितों की गैर हिंदू पहचान को रेखांकित कर रहा था और मुसलमानों के साथ एकता की जरूरत पर जोर दे रहा था. राज्य ऐसी एक एकजुटता को कभी भी कबूल नहीं करेगा, विश्वविद्याल जैसे एक सीमित जगह में भी नहीं, क्योंकि यह इसके फासीवादी ताकत को खोखला कर देगी. इसलिए एएसए पर हमला जरूरी बन गया था.

एएसए और ऐसे ही सैकड़ों दूसरे संघर्षरत साथियों की तरह रोहिथ भी एक विचार थे. लेकिन उनसे एक देह की तरह निबटा जाता है. उनके पास एक समझदारी है, जो इस व्यवस्था की आलोचना करती है, लेकिन इस समझदारी पर गौर करने के बजाए उन्हें अपराधी बना कर उनके शरीर को सजा दी जाती है.

रोहिथ एक दिमाग थे: उन्होंने इस दुनिया को, ‘प्यार, दर्द, जीवन, मौत’ को समझने की कोशिश की. इस दुनिया के बरअक्स एक वैकल्पिक दुनिया का उनके पास एक खाका था: सितारों से भरी हुई दुनिया. उन्हें यकीन था कि वे सितारों में सफर कर सकते हैं.

क्योंकि यह दुनिया तो परछाइयों और अंधेरे की दुनिया है.

इसको समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों रोहिथ ने उन सबको माफ कर दिया, जिन्होंने उन्हें इस स्थिति तक पहुंचाया और उनकी हत्या कर दी. सिर्फ उनकी हत्या के जिम्मेदार लोगों को मिलने वाली कोई भी सजा रोहिथ को इंसाफ नहीं दिला सकती. वह इंसाफ जिसे बराबरी और आजादी के जरिए हासिल किया जाना है. जिसको हासिल करने के लिए इस अंधेरी दुनिया को सितारों की एक दुनिया में तब्दील करना जरूरी है.

इसलिए, वे अपने आखिरी खत को महज कुछ ‘शरीरों’ के खिलाफ आरोप पत्र बनाने के बजाए वे कोशिश करते हैं कि उस बंदोबस्त पर बात की जाए, जो उन्हें पैदा कर रही है.

अपने आखिरी सफर में बिनयामिन के पास उनकी वह पांडुलिपि थी, जिसको पूरा करना उनका सपना था. उनकी मौत के बाद वह पांडुलिपि खो गई और कभी नहीं मिल पाई.

रोहिथ का सपना कार्ल सेगान की तरह एक विज्ञान लेखक बनने का था. सेगान वह वैज्ञानिक और लेखक थे, जिन्होंने अंतरिक्ष में भेजा जानेवाले पहले भौतिक संदेश लिखा था, ताकि अंतरिक्ष की अनजान और नामालूम जगहों में अगर कोई हो तो उसे सुन और समझ सके. हम नहीं जानते कि उन्हें किसने सुना और उसका क्या जबाव दिया.

लेकिन सेगान जैसा लेखक नहीं बन पाने वाले रोहिथ ने भी एक संदेश लिखा ‘पहली बार आखिरी खत.’ अपनी इसी दुनिया के जाने-पहचाने लोगों के लिए. दोस्तों के लिए. अंधेरे से सितारों तक के सफर का संदेश.
 

उसे सुना जा रहा है. हैदराबाद से लेकर दिल्ली, मुंबई, पटना, लखनऊ और दर्जनों छोटे-बड़े शहरों कस्बों से उस आखिरी संदेश पर हामी भरते हुए बेशुमार जवाब आ रहे हैं.

सितारों की दुनिया के लिए जंग जारी है. 


(समयांतर, फरवरी 2016 में प्रकाशित) 

रोहिथ वेमुला की मौत: भाजपा के गले का फंदा

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/08/2016 02:09:00 PM




हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित छात्र और आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन के कार्यकर्ता रोहिथ वेमुला की आत्महत्या पर आनंद तेलतुंबड़े का स्तंभ. अनुवाद: रेयाज उल हक 

रोहिथ वेमुला विज्ञान पर लिखने के लिए कार्ल सेगान बनना चाहते थे, मगर उनका यह सपना जाति की भेंट चढ़ गया. लेकिन अपनी मौत में ही यह जनता के उस सपने में तब्दील हो गया कि उन हालात का अंत कर दिया जाए, जो इस सपने के अंत की वजह बने थे. जातिवादी सत्ता प्रतिष्ठान ने रोहिथ को एक भावी डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (पीएच.डी) बनने की प्रक्रिया से बाहर कर दिया, लेकिन वे अपने सुसाइड नोट के रूप में जो मर्मस्पर्शी पंक्तियां अपने पीछे छोड़ गए हैं, वे इस बदनसीब धरती में दलित अस्तित्व के दर्शन की एक बानगी है जो बरसों तक जिंदा रहेगी. भले ही एक बेजमीन दलित मां के इस 26 साल के बेटे ने अपने दोस्तो-दुश्मनों में से किसी को भी दोषी नहीं ठहराया हो, जिसकी बुनियाद पर पर उनकी जिंदगी को निगल लेने वाले जातिवादी गिद्ध अपनी बेगुनाही का दावा पेश करेंगे, लेकिन रोहिथ की मौत ने उनके जातिवादी सोच से पैदा होने वाली आपराधिकता को उजागर कर दिया है.

उनकी मौत ने जिस तरह उनके साथी छात्रों के विरोध को जन्म दिया, जिस तरह इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल हुआ और जिस तरह की प्रतिबद्धता के साथ उनके शिक्षक उनके साथ खड़े हुए, इसने अहंकारी प्रशासन को रोहिथ के बाकी चार कॉमरेडों के निलंबन को वापस लेने पर मजबूर कर दिया है. लेकिन विद्रोह के जज्बे के साथ रोहिथ के लिए एक सच्ची नैतिक श्रद्धांजली पेश करते हुए, छात्रों ने प्रशासन के इस अटपटे प्रस्ताव को फौरन नकार दिया और अपने संघर्ष को जारी रखने के अपने संकल्प का ऐलान किया, जो आज जब मैं लिख रहा हूं 18वें दिन में दाखिल हो चुका है, और जो भूख हड़ताल का चौथा दिन भी है. उन्होंने यह संघर्ष तब तक जारी रखने का ऐलान किया है जब तक स्मृति ईरानी समेत इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सजा नहीं दी जाती. यह सवाल अहम नहीं है कि वे सचमुच में फासीवादी हुकूमत की ताकत के आगे सचमुच टिके रह पाएंगे कि नहीं, बल्कि असल में तो इस हुकूमत के खात्मे के ही आसार दिखने लगे हैं. जिन छात्रों ने अपनी मासूमियत में पिछले चुनावों में भाजपा को जिताने में भारी योगदान दिया था, वे एकजुट होकर इसके जातिवादी और सांप्रदायिक एजेंडे को मजबूती से खारिज कर रहे हैं. देश भर के कैंपसों में भाजपा के छात्र धड़े अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाने में दिखाई दे रही है. इसके संकेत भी हैं कि यह विरोध एक मजबूत संगठनात्मक शक्ल भी अख्तियार कर सकता है. रोहिथ की मौत ने वह हासिल कर लिया है, जिसे वे अपनी जिंदगी में हासिल करने में कामयाब नहीं रहे होते.

अपराध उजागर

दलितों के खिलाफ अपराधों की दास्तान हालांकि बहुत पुरानी है, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) में मौजूदा घटना की जड़ें पुलिस में दर्ज कराई गई उस झूठी शिकायत में हैं, जिसमें एबीवीपी के एचसीयू इकाई के अध्यक्ष और इसकी राज्य समिति के सदस्य एन. सुशील कुमार ने आरोप लगाया था कि फेसबुक पर उनके द्वारा आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन (एएसए) को ‘गुंडे’ कहने पर एएसए के तीस सदस्यों की एक भीड़ ने उनकी पिटाई करके एक माफीनामे पर उनसे दस्तखत कराया है. यह फेसबुक पोस्ट एएसए द्वारा किए गए एक प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया थी, जिसमें संगठन ने दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में मुजफ्फरनगर बाकी है फिल्म के प्रदर्शन पर एबीवीपी के हमले की निंदा की थी. उस पोस्ट में ‘मैं हिंदू हूं, मैं तुझे थप्पड़ मारूंगा’ जैसा उद्दंडता भरा बयान भी था. इस पर नाराजगी जताते हुए एएसए ने सुशील कुमार को घेर कर उससे एक लिखित माफीनामे की मांग की, जिसे उसने एक सुरक्षाकर्मी की मौजूदगी में लिख कर दे दिया. लेकिन अगली सुबह वह एक निजी अस्पताल में भर्ती हुआ, फोटो खिंचवाया और एक पुलिस शिकायत दर्ज करा दी. एचसीयू के प्रॉक्टोरियल बोर्ड ने अपनी जांच में पिटाई का कोई ‘ठोस सबूत’ नहीं पाया; डॉक्टर और उस सुरक्षाकर्मी ने भी नकारात्मक बयान दिए. लेकिन फिर भी, कुछ अदृश्य गवाहों के आधार पर, बोर्ड ने एक सेमेस्टर के लिए पांच छात्रों के निलंबन की सिफारिश कर दी. खबरों के मुताबिक इसके पीछे भाजपा विधायक रामचंद्र राव और केंद्रीय श्रम राज्य मंत्री बंडारू दत्तात्रेय का दबाव था. राव ने तब के कुलपति प्रो. आर.पी. शर्मा से मुलाकात की थी और दत्तात्रेय ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को चिट्ठी लिखी थी.

शैक्षिक संस्थानों में हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए बदनाम हो चुकीं स्मृति ईरानी को लिखी गई दत्तात्रेय की चिट्ठी आखिरकार उस मनहूस सजा की वजह बनी, जिसके नतीजे में रोहिथ की मौत हुई. 50 बरसों से आरएसएस के सदस्य, दो दशकों से प्रचारक, एक बुजुर्ग भाजपा नेता और अटल बिहारी वाजपेयी और मौजूदा मोदी सरकार में राज्य मंत्री दत्तात्रेय ने चिट्ठी में गैर जिम्मेदार तरीके से एचसीयू के खिलाफ शिकायत की थी कि यह एएसए की ‘जातिवादी, चरमपंथी और राष्ट्र विरोधी’ गतिविधियों का मूक तमाशबीन बन गया है. इस बात के समर्थन में उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि एएसए ने याकूब मेमन की फांसी के खिलाफ विरोध जताया था. और स्मृति ईरानी ने कुलपति को इस पर कार्रवाई करने के संकेत देते हुए चिट्ठी लिखी, जैसा वे पहले भी आईआईटी, मद्रास में आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल के खिलाफ एक गुमनाम शिकायत के मामले में कर चुकी थीं. इन सिफारिशों के आधार पर, एएसए के पांच सदस्य एक सेमेस्टर के लिए निलंबित कर दिए गए. इसके बाद व्यापक विरोध भड़क उठा, जिसने कुलपति को इस फैसले को वापस लेने और एक नई समिति को जांच सौंपने पर मजबूर किया. इसके बाद प्रो. अप्पा राव नए कुलपति बने जिनका दलित छात्रों को निकालने का दो दशक पुराना इतिहास रहा है और जिनको उनका अपना ही स्टाफ खुलेआम जातिवादी कहने लगा है (द न्यूज मिनट, 22 जनवरी 2016). राव ने फौरन इन पांच छात्रों को होस्टल से निलंबित कर दिया और पुस्तकालय, होस्टल और प्रशासनिक भवन में समूह में दाखिल होने पर पाबंदी लगा दी. मनुस्मृति में अवर्णों (यानी दलितों) के लिए जो सजाएं तय की गई हैं, वे सभी प्रतीकात्मक रूप में इस सजा में निहित थीं.

घिनौनी तिकड़म

यह किसी जातिवादी पदाधिकारी के पूर्वाग्रहों का कोई छिटपुट  मामला नहीं है, न ही एचसीयू में एक दलित छात्र की आत्महत्या का यह पहला मामला है और न ही एचसीयू देश का अकेला विश्वविद्यालय है जहां ऐसी घटनाएं होती हैं. इस देश में जाति का जहर अब भी कायम है, इसको 1950 के दशक से लेकर अभी हाल के 2015 तक में हुए (एनसीएईआर द्वारा किया गया द इंडिया ह्यूमन डेवेलपमेंट सर्वे (आईएचडीएस-2)) अनेक सर्वेक्षणों ने इसे साबित किया है और पिछले कुछ वर्षों में इसकी घटनाओं में शायद इजाफा ही हुआ है, जिसकी क्रूर झलक अत्याचारों के रूप में दिखाई देती है. (राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो के मुताबिक अत्याचार 2001 के 33507 से बढ़ कर 2014 में 47,064 हो गए हैं). इसकी वजह नवउदारवाद के सामाजिक डार्विनवादी कायदे में देखी जा सकती है, जिसने कीन्सीय अर्थशास्त्र द्वारा बनाए गए कल्याणकारी आदर्श को बेदखल कर दिया है. ऊपर से भले यह जाहिर न हो, लेकिन इसी का सामाजिक नतीजा यह है कि देश में हिंदुत्व ताकतों का उभार हुआ है, जिसका सबूत 1980 के दशक में हाशिए पर पड़ी भाजपा का केंद्र में राजनीतिक ताकत का दावेदार बन जाना है. पहले जहां जाति व्यवस्था के बारे में ढंके-छुपे सुर में बातें होती थी, वहीं अब खुलेआम उन पर अकड़ के साथ बातें की जाती हैं और उन्हें जायज ठहराया जाता है. हिंदू धार्मिकता को पिछड़ेपन की निशानी माना जाता था, अब उसे अध्ययन-अध्यापन से जुड़े तबके द्वारा भी कलाई में बंधे सिंदूरी धागों और ललाट पर कुमकुम के चिह्न के साथ गर्व से दिखाया जाता है.

यह वो ब्राह्मणवादी उभार है, जो दलित अध्येताओं को आत्महत्या करने की तरफ धकेल रहा है. एचसीयू की ही बात करें तो 1970 में इसकी स्थापना से लेकर अब तक 12 दलित अध्येताओं की आत्महत्या की खबरें हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर (8) पिछले एक दशक में हुई हैं; रोहित की आत्महत्या नौवीं है. भौतिकी में पीएच.डी. कर रहे सेंथिल कुमार (2008), तेलुगु साहित्य में पीएच.डी. कर रहे आर. बलराज (2010), हाई एनर्जी मटेरियल्स में पीएच.डी. कर रहे मादरी वेंकटेश (2013) और अप्लाइड भाषाविज्ञान में स्नातकोत्तर छात्र पुल्यला राजु उनमें से कुछ नाम हैं, जो आसानी से याद आते हैं क्योंकि उनके मामलों की समितियों ने जांच की थी जिन्होंने इसकी तरफ ध्यान दिलाया था कि व्यापक जातीय भेदभाव इन आत्महत्याओं की वजह हो सकता है. लेकिन वे जातिवादी प्रशासन को संवेदनशील बना पाने में नाकाम रहे. इसके उलट, प्रशासन को इन भेदभावों को कायम रखने के लिए और बढ़ावा ही दिया गया, जाहिर है कि उन्हें इसके लिए सत्ताधारी दक्षिणपंथी ताकतों से हौसला मिलता है.

तब सवाल उठता है कि दक्षिणपंथी सरकार दलितों के प्रतीक बाबासाहेब आंबेडकर के प्रति कुछ ज्यादा ही प्यार जताते हुए दलितों को लुभाने की जो बेतहाशा कोशिशें कर रही है, उसके साथ कैसे इन सबका तालमेल बैठ सकता है? इसे समझना मुश्किल नहीं है. वह अपने हिंदुत्व के एजेंडे को पूरा करने के लिए दलितों को चाहती है लेकिन उसे रेडिकल दलित नहीं चाहिए, जो उसके खेल को बिगाड़ सकते हैं. आंबेडकर के स्मारक बना कर या फिर उनकी 125वीं जन्मशती को जोर-शोर से मना कर वह उम्मीद करती है कि यह सीधी-सादी दलित जनता को अपने लिए वोट डालने के लिए बेवकूफ बना सकती है. लेकिन रेडिकल बन चुके कुछेक रोहिथ इसके सपनों को चूर चूर कर सकते हैं. यह बदकिस्मती है; दलित यह नहीं समझते कि आंबेडकर चाहते थे कि उनके अनुयायी प्रबुद्ध दलित बनें न कि भजन गाने वाले भक्त. इसीलिए आंबेडकर ने प्राथमिक शिक्षा से ज्यादा उच्च शिक्षा पर जोर देने का जोखिम उठाया, क्योंकि उन्होंने देखा कि सिर्फ यही लोगों में आलोचनात्मक सोच को विकसित कर सकती है और प्रभुत्वशाली तत्वों के जातीय पूर्वाग्रहों के खुले खेल के खिलाफ खड़े होने की नैतिक ताकत मुहैया करा सकती है. सरकार आंबेडकर के जयकारे लगा रही है और दूसरी ओर आंबेडकर की मशाल को संभावित रूप से आगे बढ़ाने वालों को कुचल रही है. हिंदुत्व खेमे की रणनीति दलितों में से आम लोगों का ब्राह्मणवादीकरण करना और रेडिकल दलितों को बुराई की जड़ के रूप में पेश करना है. जिस तरह असहमत मुसलमान नौजवानों को आतंकवादी के रूप में पेश किया जा रहा है, दलित-आदिवासी नौजवानों पर चरमपंथी, जातिवादी और राष्ट्र-द्रोही का ठप्पा लगाया जा रहा है. भारतीय जेलें ऐसे बेगुनाह नौजवानों से भरी हुई हैं, जो देशद्रोह और गैरकानूनी गतिविधियों के संदिग्ध आरोपों में बरसों से कैद हैं. समरसता के लबादे में जाति की पट्टी आंखों पर बांधे हिंदुत्व ताकतें दलितों पर बेधड़क जुल्म करती रह सकती हैं. मौत इस जुल्म से छुटकारा पाने का प्रतीक है और जिंदगी इसको सहते जाने का.

राजनीतिक चेतावनियां

रोहिथ की मौत ने भगवा सत्ता प्रतिष्ठान की अनेक परतों वाली नाइंसाफी को उजागर किया है. पूरा छात्र समुदाय, बेशक एबीवीपी को छोड़ कर, फौरन हिंदुत्व की गुंडागर्दी की आलोचना करने के लिए सड़कों पर उतर आया. इसने दलित नेताओं के चेहरे भी उजागर किए, जो ऐसी भारी नाइंसाफी के सामने, अपने राजनीतिक आकाओं के खिलाफ मुंह खोलने तक में नाकाम रहे. उनके हाथों बेवकूफ बन कर हिंदुत्व ताकतों को वोट देने वाले दलितों की आंखें खुल रही हैं और वे धीरे धीरे अपनी गलती को देख रहे हैं. जाति भारत की प्राचीन संस्कृति है, जो हिंदुत्व ताकतों की चाहत है. दलित जिसे भेदभाव कहते हैं, वह हिंदुत्व के लिए स्वाभाविक बात है. अपनी राजनीतिक रणनीति के लिए एक तिकड़म के रूप में उन्होंने भले ही इसको छुपा कर रखा हो, लेकिन यह हर रोज अनेक तरीकों से उजागर होता रहता है. लखनऊ विश्वविद्यालय में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने रोहित की मौत को बस एक मां का नुकसान बताया और फिल्मी अंदाज में मगरमच्छ के आंसू बहाए. भारी राजनीतिक विरोध के बावजूद, उन्होंने अपने खुद के मंत्रियों की करतूतों पर चुप्पी साधे रखी, जिन्होंने रोहिथ को मौत की कगार पर पहुंचा दिया. स्मृति ईरानी ने अपनी खास नाकाबिलियत के तहत यह झूठ बोलते हुए पूरे एचसीयू की घटनाओं के लिए दलितों को ही कसूरवार ठहराने की कोशिश की कि एक दलित प्रोफेसर उस उपसमिति के अध्यक्ष थे, जिसने सजा की सिफारिश की थी. इससे उत्तेजित एचसीयू के सभी दलित शिक्षकों ने सामूहिक रूप से अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों से सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया. एक दिन पहले, एचसीयू के शिक्षकों की संस्था ने सजा को वापस लिए जाने तक कुलपति के इस आग्रह को मुखरता से ठुकरा दिया कि क्लासों को बहाल किया जाए. कुलपति को मुंह की खानी पड़ी और निलंबन को वापस लेना पड़ा. प्रधानमंत्री ने अपने कुनबे के गुनाहों को रफा-दफा करने की एक और कोशिश करते हुए पूरे मामले की जांच के लिए न्यायिक आयोग के गठन का ऐलान किया. जनता की निगाहों से ये सब चीजें छुपी हुई नहीं रहेंगी. अपनी उद्दंडता के ब्राह्मणवादी गर्व में अंधी भाजपा नहीं देख पा रही है कि रोहिथ का फंदा उसके गले में भी कसता जा रहा है.

मालदा की हिंसा सांप्रदायिक हिंसा नहीं थी: एक रिपोर्ट

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/20/2016 01:00:00 PM


मालदा के कालियाचक के दौरे के बाद जेजेएसएस की टीम की शुरुआती रिपोर्ट बताती है कि वहां हुई हिंसा,  हिन्‍दू-मुसलमानों के बीच हिंसा नहीं थी.

मालदा के कालियाचक में 3 जनवरी को हुई हिंसा, साम्‍प्रदायिक हिंसा नहीं दिखती है। इसे मुसलमानों का हिन्‍दुओं पर आक्रमण भी नहीं कहा जा सकता है। यह जुलूस में शामिल होने आए हजारों लोगों में से कुछ सौ अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का पुलिस प्रशासन पर हमला था। इसकी जद में कुछ हिन्‍दुओं के घर और दुकान भी आ गए। गोली लगने से एक युवक जख्‍मी भी हुआ। ये पूरी घटना शर्मनाक और निंदनीय है। ऐसी घटनाओं का फायदा उठाकर दो समुदायों के बीच नफरत और गलतफहमी पैदा की जा सकती है। यह राय मालदा के कालियाचक गई जन जागरण शक्ति संगठन (जेजेएसएस) की पड़ताल टीम की है। 

हिन्‍दू महासभा के कथित नेता कमलेश तिवारी के पैगम्‍बर हजरत मोहम्‍मद के बारे में दिए गए विवादास्‍पद बयान का विरोध देश के कई कोने में हो रहा है। इसी सिलसिले में मालदा के कालियाचक में 3 जनवरी को कई इस्‍लामी संगठनों ने मिलकर एक विरोध सभा का आयोजन किया। इसी सभा के दौरान कालियाचक में हिंसा हुई। इस हिंसा को मीडिया खासकर इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने जिस रूप में पेश किया,  वह काफी चिंताजनक दिख रहा है। इस पर जिस तरह की बातें हो रही हैं, वह भी काफी चिंताजनक हैं।

10 दिन बाद भी जब कालियाचक की घटना की व्‍याख्‍या साम्‍प्रदायिक शब्‍दावली में हो रही थी तब जन आंदोलनों का राष्‍ट्रीय समन्‍वय (एनएपीएम) से सम्‍बद्ध जन जागरण शक्ति संगठन (जेजेएसएस) ने तय किया कि वहां जाकर देखा जाए कि आखिर क्‍या हुआ है? जेजेएसएस ने तीन लोगों की एक टीम वहां भेजी। इसमें पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता नासिरूद्दीन, जेजेएसएस के आशीष रंजन और शोहनी लाहिरी शामिल थे। मालदा में एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्‍शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एपीडीआर) के जिशनू राय चौधरी ने इस टीम की मदद की। ये टीम 16 जनवरी को मालदा पहुंची और 17 को वापस आई। इन्‍होंने जो देखा और पाया उसका संक्षेप में शुरुआती ब्‍योरा यहां पेश किया जा रहा है। टीम ने खासकर उन लोगों से ज्‍यादा बात की जो नाम से हिन्‍दू लगते हैं या जो अपने को हिन्‍दू मानते है।

टीम की शुरुआती संक्षिप्‍त बिंदुवार राय-   

  • कालियाचक में हिंसा की शुरुआत कैसे हुई- इस बारे में कई राय या कहानी सुनाई देती है। जुलूस में शामिल लोगों की संख्‍या के बारे में भी लोगों की अलग-अलग राय है।  
  • बातचीत में हमें पता चला कि जुलूस में शामिल होने आए लोगों ने थाने पर हमला किया। थाने में आग लगाई। थाने में तोड़फोड़ की। कई दस्‍तावेज जलाए गए। वहां खड़ी जब्‍त और पुलिस की गाडि़यों को जलाया गया। हमें एक गाड़ी जली दिखाई दी। थाने में मौजूद सिपाही भी जख्‍मी हुए। वहां जब्‍त कई सामान और हथियार भी लूटे जाने की खबर है।
  • जब यह टीम थाने पहुंची तो वहां मरम्‍मत का काम चलता दिखा। रंगाई-पुताई होती दिखी। हालांकि इस टीम ने पुलिस अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन यह मुमकिन नहीं हो पाया। थाने में भी इस घटना के बारे में लोग जल्‍दी खुलकर बात नहीं करते हैं।
  • थाने परिसर में ही एक लड़कियों का नया हॉस्‍टल दिखा। हालांकि उसमें अभी लड़कियां नहीं है। उसमें किसी तरह की तोड़फोड़ नहीं दिखती है। इसी परिसर में दूसरे विभागों कें कुछ और दफ्तर भी हैं। उनमें भी तोड़फोड़ या आगजनी जैसी चीज नहीं दिखाई देती है।  
  • थाने के ठीक पीछे एक मोहल्‍ला है जिसे बालियाडांगा हिन्‍दू पाड़ा कहा जाता है। इस मोहल्‍ले का एक रास्‍ता थाने से होकर भी गुजरता है। इस मोहल्‍ले की शुरुआत में एक पान गुमटी जली दिखी। चार-पांच दुकानों की होर्डिंग, बोर्ड, टिन शेड टूटे या फटे दिखे। एक मकान के कांच के शीशे टूटे दिखाई दिए। एक दुकानदार का दावा है कि उसकी दुकान का शटर तोड़ने की भी कोशिश हुई। एक चाय दुकानदार का भी कहना है कि उसकी दुकान में रखा दूध गिरा दिया गया।  
  • यहां एक मोटरसाइकिल जलाए जाने की भी बात सुनने को मिली।
  • इसी मोहल्‍ले में थाने के ठीक पीछे एक मंदिर है। उस मंदिर के बाहर जाली की बैरिकेडिंग टूटी दिखाई दी। पड़ोसियों का कहना है कि इसे उपद्रवियों ने ही तोड़ा है। मंदिर का भवन और मूर्ति पूरी तरह सुरक्षित दिखी।
  • इसी तरह थाने के सामने के एक बड़े मकान के कांच के शीशे टूटे दिखाई दिए।
  • थाने के बगल में एक लाइब्रेरी है, उसमें भी तोड़फोड़ हुई।
  • थाने के अंदर एक बड़ा मंदिर है। हमें उस मंदिर में कुछ भी टूटा या गायब नहीं दिखा। मंदिर में लोहे का ग्रिल है, वह भी पूरी तरह सुरक्षित है। मूर्तियां अपनी जगह पर थीं। हमने पुजारी को काफी तलाशने की कोशिश की पर वह नहीं मिले।
  • इस हिंसा के दौरान एक युवक को गोली भी लगी है। वह अस्‍पताल से अपने घर लौट चुका है। हम उससे मिलने और बात करने उसके घर गए। हालांकि उसने और उसके परिवारीजनों ने बात करने से मना कर दिया।
  • इस युवक के अलावा हमें किसी और को गोली लगने या किसी और के जख्‍मी होने की बात पता नहीं चली।
  • हिन्‍दूपाड़ा लगभग एक किलोमीटर में दोनों ओर बसा है। हालांकि थाने के पीछे हिन्‍दूपाड़ा में हिंसा के निशान सिर्फ 50 मीटर के दायरे में ही कुछ जगहों पर दिखते हैं। हम एक छोर से दूसरी छोर तक गए। लोगों से बात की। इस 50 मीटर के दायरे के बाहर किसी ने अपने यहां पथराव, तोड़फोड़ की बात नहीं बताई।
  • हालांकि कुछ लोगों ने यह जरूर बताया कि जुलूस में शामिल कुछ लोग आपत्तिजनक नारे लगा रहे थे।
  • हमने कई हिन्‍दू महिलाओं से भी बात की। इनमें से किसी ने अपने साथ अभद्रता या गाली गलौज की बात नहीं बताई। हालांकि पूछने पर वे बताती हैं कि ऐसा सुनने में आया है।  
  • थाने के ठीक सामने के बाजार में ज्‍यादातर दुकानें हिन्‍दुओं की हैं। हमने अनेक दुकानदारों से बात की। इनके दुकानों में भी तोड़फोड़ नहीं हुई है।
  • हिन्‍दूपाड़ा के कुछ लोगों का कहना है कि जब थाने में हिंसा हुई और कुछ उपद्रवी मोहल्‍ले की तरफ आए और मंदिर की तरफ बढ़े तो इधर से भी प्रतिवाद हुआ। इसके बाद मोहल्‍ले में पथराव या आगजनी हुई।
  • यानी, हिंसा का दायरा काफी सीमित था। उसका लक्ष्‍य थाना ही था।
  • रथबाड़ी, देशबंधु पाड़ा, कलेक्‍ट्रेट का इलाका, झलझलिया, स्‍टेशन सहित मालदा के कई इलाकों में गए। हमने खासकर हिन्‍दुओं से बात की। मालदा शहर में हमें एक भी ऐसा शख्‍स नहीं मिला जो इसे साम्‍प्रदायिक गंडगोल या मुसलमानों का हिन्‍दुओं पर हमला मानता हो।
  • यही हाल कालियाचक का भी दिखा। कालियाचक में भी ज्‍यादातर लोग इसे अपराधियों की हरकत बताते हैं। सबकी वजहें अलग-अलग हैं। हमें सिर्फ एक शख्‍स मिले, जिन्‍होंने बातचीत के दौरान खुलकर कहा कि यह हिन्‍दुओं पर जानबूझ किया गया हमला था। हिन्‍दूपाड़ा में कुछ लोग पूछने पर जरूर इसे कुछ कुछ साम्‍प्रदायिक कह रहे थे। कुछ घटनास्‍थलों को दिखाने को उत्‍साहित भी दिख रहे थे।
  • मालदा शहर में हिंसा का कोई असर नहीं दिखता है।
  • मालदा से कालियाचक के बीच लगभग 28-30 किलोमीटर के सफर में, रास्‍ते में कई गांव पड़ते हैं। कहीं भी कुछ भी असमान्‍य नहीं दिखता है। बाजार पूरी तरह खुले दिखे। खूब चहल-पहल दिखी। महिलाएं भी सड़क पर बदस्‍तूर काम करती दिखाई दीं।
  • यही हाल कालियाचक का है। कालियाचक में बाजार ऐसे गुलजार दिेखे, जैसे यहां कभी कुछ हुआ ही न हो। थाने के ठीक सामने के बाजारों की सभी दुकानें खुली थीं। लोगों का हुजूम सड़कों पर था। स्‍त्री-पुरुष, बच्‍चे-बूढे़ सभी आते जाते दिखाई दिए। इनमें से कोई थाने की टूटी बाउंड्री को पलट कर या ठहरकर देखता भी नहीं मिला।
  • थाने के अंदर भी सबकुछ सामान्‍य लग रहा था। फरियादी दिख रहे थे। कई महिलाएं या नौजवान अपनी शिकायतें लेकर आए हुए थे। थाना परिसर में ही वेटनरी विभाग का दफ्तर है, उसमें महिलाएं अपनी बकरियों के साथ आती-जाती दिखीं।  
  • हिन्‍दू पाड़ा के ठीक सटे मुस्लिम पाड़ा है। हम यहां भी गए। हम उन लोगों से बात करना चाह रहे थे, जो जुलूस में गए हों। हमें कोई ऐसा नौजवान या शख्‍स नहीं मिला, जो यह कहे कि वह जुलूस में शामिल था। हर नौजवान या अधेड़ हमें यही कहता मिला कि वह जुलूस में नहीं गया था। वह कहीं और था। लोगों की बातें उनके मन के डर को साफ जाहिर कर रही थीं। यह डर उस वक्‍त खुलकर सामने आ गया जब हमारी साथी ने महिलाओं से बातें कीं।
  • इस मुस्लिम पाड़ा से दो लोग गिरफ्तार हुए हैं। हम इनके परिवारीजनों से मिले। दोनों परिवारों का कहना है कि उनके लोग बेकसूर हैं। पुलिस उन्‍हें गलत तरीके से ले गई है। एक घर में पुलिस के जबरन घुसने और गिरफ्तार करने की भी बात पता चली।
  • मुस्लिम पाड़ा के लोगों का कहना है कि पुलिस के पास सीसीटीवी फुटेज है। वह देखें और हमें दिखाएं। अगर हमारे लोग तोड़फोड़ में शामिल हैं तो हम उन्‍हें गिरफ्तार करवाएंगे। लेकिन हमारे साथ ज्‍यादती न की जाए।
  • हमने वाम मोर्चा, भारत की कम्‍युनिस्‍ट पाटीं- मार्क्‍सवादी (माकपा), तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), शोधकर्ताओं, पत्रकारों से भी बात की। कमोबेश सबका यह मानना है कि यह साम्‍प्रदायिक घटना नहीं है। यह मुसलमानों का हिन्‍दुओं पर हमला नहीं था। भारतीय जनता पार्टी के नेता भी इस घटना को खुलकर साम्‍प्रदायिक नहीं कहते हैं।
  • बातचीत में लोगों का यह भी कहना है कि पुलिस को जिस तरह तैयारी करनी चाहिए थी, उसने नहीं की। साथ ही इलाके में चलने वाली गैर कानूनी गतिविधियों पर भी पुलिस का रवैया ढीला रहता है। हालांकि पिछले कुछ म‍हीनों में बंगाल में पुलिस और थानों पर हमले बढ़े हैं। इस नजरिए से भी इस घटना को देखा जाना चाहिए।  

हमें पता चला कि इस इलाके में तस्‍करी, अफीम की खेती, जाली नोट का धंधा, बम और कट्टा बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता है। इन धंधों में शामिल लोग या वे लोग जिनका हित इस धंधे से जुड़ा है, उन्‍हीं का इस हिंसा से रिश्‍ता दिखता है। हमारा मानना है कि अगर यह साम्‍प्रदायिक घटना होती या हिंसा का मकसद हिन्‍दुओं पर हमला करना होता तो हिन्‍दूपाड़ा या आसपास के इलाके की शक्‍ल आज अलग होती। इसे साम्‍प्रदायिक बनाने की कोशिश वस्‍तुत: अगले साल होने वाले चुनाव के परिप्रेक्ष्‍य में देखी जा सकती है।

2011 की जनगणना के मुताबिक, कालियाचक की कुल आबादी 392517 यानी तीन लाख 92 हजार 517 है। इसमें महज 10.6 फीसदी हिन्‍दू (41456) है और 89.3 फीसदी मुसलमान (350475) हैं। आबादी की इस बनावट से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस तरह की बात हो रही है, अगर वह सच होता तो आज हालात क्‍या होते।

इस टीम की कोशिश है कि इसकी विस्‍तृत रिपोर्ट जल्‍द ही बनाई जाए।

आशीष रंजन,  शोहिनी लाहिरी, नासिरूद्दीन
सम्‍पर्क- 09973363664 / ashish.ranjanjha@gmail.com

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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