हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कबहूं न छाड़े खेत!

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/25/2015 05:10:00 PM

ज़मीन हड़प अध्‍यादेश के खिलाफ संसद मार्ग पर विशाल रैली, 24 फरवरी 2015

अभिषेक श्रीवास्‍तव

करीब तीन हफ्ते पहले की बात है जब दिल्‍ली की चुनावी सरगर्मी के बीच एक स्‍टोरी के सिलसिले में हम कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों के सुनसान दफ्तरों के चक्‍कर लगा रहे थे। मतदान से ठीक एक दिन पहले 36, कैनिंग लेन में जाना हुआ जहां मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (माकपा) की किसान सभा का दफ्तर है। सत्‍तर बरस पार कर चुके किसान सभा के नेता सुनीत चोपड़ा से वहां मुलाकात तय थी। उनका आशावाद इतना जबरदस्‍त था कि कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों की बदहाली से जुड़ी किसी भी बात पर वे कान देने को तैयार नहीं थे। जब उन्‍होंने गिनवाया कि अखिल भारतीय कृषि मजदूर यूनियन के देश भर में करीब 56 लाख सदस्‍य हैं और बीते दो वर्षों में यह संख्‍या तेज़ी से बढ़ी है, तो सहज विश्‍वास नहीं हुआ। फिर उन्‍होंने एक बात कही, ''हम सब मुख्‍यधारा के परसेप्‍शन ट्रैप में फंसे हुए हैं।''


यह बात कितनी सच थी, इसका अहसास 24 फरवरी को लाल झण्‍डों से पूरी तरह पटे हुए संसद मार्ग पर हुआ जब चोपड़ा ने हज़ारों किसानों के सैलाब को मंच से गदरी बाबाओं के मुहावरे में ललकारा, ''सुरा सो पहचानिये, जो लड़े दीन के हेत / पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कबहूं न छाड़े खेत।'' और इतना कहते ही इंकलाब जिंदाबाद के नारों से लुटियन की दिल्‍ली गूंज उठी। यह एक ऐतिहासिक दिन था। ऐतिहासिक इसलिए क्‍योंकि मेरे जानने में शायद पहली बार ज़मीन और किसान के मसले पर तमिलनाडु से लेकर कश्‍मीर तक के तमाम जनांदोलन, भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी, माकपा, लिबरेशन सभी एक मंच पर समान अधिकार से मौजूद थे। और उस मंच पर वे अन्‍ना हज़ारे भी थे जो लगातार इस बात की रट लगाए थे कि वे राजनीतिक दलों के साथ मंच साझा नहीं करेंगे।

दिलचस्‍प यह था कि जंतर-मंतर पर जेडीयू के दफ्तर के सामने जहां अन्‍ना का मंच अलग से बना था, वहां दबी जुबान में युवा क्रान्ति नाम का संगठन चलाने वाले राकेश रफ़ीक नाम के एक शख्‍स को गालियां पड़ रही थीं कि उसने साजिश कर के अन्‍ना को कम्‍युनिस्‍टों के साथ बैठा दिया। इससे कहीं ज्‍यादा दिलचस्‍प यह था कि ऐसा कहने वाले पुराने कांग्रेसी और संघी दोनों थे जो अन्‍ना के मंच का अनिवार्य हिस्‍सा थे। इससे भी कहीं ज्‍यादा दिलचस्‍प बात यह थी कि संसद मार्ग के मंच पर भी राकेश रफ़ीक की मौजूदगी को लेकर औरों के मन में कुछ शंकाएं थीं। सबसे मज़ेदार घटना यह रही कि जनता के स्‍वयंभू पत्रकार रवीश कुमार ने एक दिन पहले जिस एकता परिषद और उसके नेता पीवी राजगोपाल पर केंद्रित अपनी रिपोर्ट एनडीटीवी पर दिखायी थी, उसकी ट्रेन से आई जनता संसद मार्ग पर इंतज़ार करती रह गई लेकिन राजगोपाल वहां देर शाम तक नहीं पहुंचे और ट्रैफिक खोल दिया गया।

दिल्‍ली में 24 फरवरी 2015 का दिन बहुत नाटकीय रहा। मीडिया में जो दिखाया गया, वह सड़क पर नहीं था। जो सड़क पर था, उसे कैमरे कैद नहीं कर पा रहे थे। इसकी दो वजहें थीं, जैसा मुझे समझ में आया। जैसा कि मीडिया में प्रचारित था कि यह आंदोलन अन्‍ना का है और जंतर-मंतर से चलाया जा रहा है, उसी हिसाब से दिन में बारह बजे के आसपास जब मैं जंतर-मंतर पहुंचा तो वहां अपने मंच पर अन्‍ना मौजूद नहीं थे। फिल्‍मी गीत बजाए जा रहे थे और एक बड़ा सा नगाड़ा रह-रह कर पीटा जा रहा था। करीब दो सौ लोग रहे होंगे और चैनलों की सारी ओबी वैन व क्रेन वाले कैमरे वहां मुस्‍तैद थे। साथ में यमुना शुद्धीकरण अभियान, गौरक्षा अभियान, आयुर्वेदिक दवाओं के परचे आदि अन्‍न के मंच के साथ गुत्‍थमगुत्‍था थे। मैंने कई लोगों से पूछा कि अन्‍ना कहां हैं। ज्‍यादातर लोगों ने यही बताया कि अन्‍ना आने वाले हैं। सिर्फ एक पुलिसवाले ने बताया कि अन्‍ना तो संसद मार्ग के मंच पर बैठे हैं। चूंकि संसद मार्ग तकरीबन पूरी तरह भरा हुआ था इसलिए क्रेन वाले कैमरे वहां नहीं जा सकते थे। मजबूरन, रिपोर्टरों को वहां कंधे वाले कैमरे लेकर पहुंचना पड़ा। बावजूद इसके, किसी ने भी यह बताने की ज़हमत नहीं उठाई कि अन्‍ना का मंच खाली है और अन्‍ना राजनीतिक दलों के साथ मंच साझा कर रहे हैं, जो कि उनका अपना मंच नहीं है।

दूसरी वजह गृह मंत्रालय के एक सूत्र से पता चली। उन्‍होंने बताया कि चैनलों को साफ तौर पर कहा गया था कि आंदोलन में उन्‍हीं चेहरों को दिखाना है जो ''निगोशिएबल'' हों। निगोशिएबल का मतलब जिनसे सौदा किया जा सके। आंदोलन के जिन चेहरों को हम टीवी पर देख रहे हैं, उनमें राजगोपाल सबसे ज्‍यादा सौदेबाज़ चेहरे के रूप में अपने अतीत की हरकतों से साबित होते रहे हैं। तीन साल पहले यही राजगोपाल कुछ आदिवासियों को लेकर दिल्‍ली निकले थे और आगरा में इन्‍होंने जयराम रमेश से सौदा कर के उन्‍हें गले लगा लिया था। इन्‍हीं राजगोपाल की पदयात्रा में 12 लोग गर्मी से मारे गए थे जिसकी खबर दि हिंदू के अलावा कहीं नहीं आई थी। ज़ाहिर है, रवीश कुमार ब्रांड की ''रिपोर्टिंग'' में जनवाद की आखिरी हद पीवी राजगोपाल तक ही जा सकती थी। चूंकि राजगोपाल से बड़ा चेहरा अन्‍ना हैं, इसलिए सारे मामले को अन्‍ना के आंदोलन के नाम से प्रचारित किया गया क्‍योंकि गृह मंत्रालय के मुताबिक ऐसा करने से आंदोलन की कामयाबी का सारा श्रेय भी अन्‍ना को ही जाएगा और इस तरह आंदोलन की रूपरेखा और योजना बनाने वाले सैकड़ों जनांदोलन, जन संगठन व कम्‍युनिस्‍ट पार्टिंया सिरे से साफ हो जाएंगी।

बहरहाल, संसद मार्ग पर जब मैं पहुंचा तब भाकपा के किसान नेता अतुल कुमार अनजान बोल रहे थे। एक बजे के आसपास आसानी से कहा जा सकता है कि संसद मार्ग पर दस हज़ार के आसपास लोग रहे होंगे। बड़े टीवी चैनलों में सिर्फ एनडीटीवी, न्‍यूज़ एक्‍स और न्‍यूज नेशन के गन माइक दिख रहे थे। अधिकतर अखबारों और एजेंसियों के फोटोग्राफर वहां मौजूद थे। मंच पर तमिलनाडु के फायरब्रांड नेता वाइको की मौजूदगी आश्‍चर्यजनक थी जो करीब एक हज़ार समर्थकों के साथ वहां आए थे। उनके अलावा माकपा के हनान मुल्‍ला और सुनीत चोपड़ा, लिबरेशन से कविता कृष्‍णन, मेधा पाटकर, डॉ. सुनीलम, भूपेंदर सिंह रावत आदि एनएपीएम के नेता वहां थे और मधुरेश व रोमा संचालन कर रहे थे। अन्‍ना इन सब के बीच में शांत बैठे थे। युवा क्रान्ति के राकेश रफ़ीक मंच पर सबसे ज्‍यादा चहलकदमी कर रहे थे। भाषणों के बीच रह-रह कर खबरें आ रही थीं कि पीवी राजगोपाल पांच हजार किसान नेताओं के साथ पहुंचने वाले हैं। एक खबर यह भी थी कि अरविंद केजरीवाल तीन बजे आएंगे। अन्‍ना चाहते थे कि वे अरविंद के आने से पहले इस मंच से अपने मंच की ओर चले जाएं लिहाजा उन्‍हें ढाई बजे ही बोलने का मौका दे दिया गया। इसके बावजूद वे जा नहीं पाए और अरविंद पहुंच ही गए।

अरविंद के पीछे-पीछे योगेंद्र यादव और सोमनाथ भारती भी आए। अरविंद के आने तक कम्‍युनिस्‍ट पार्अियों के अधिकतर नेता मंच से उतर चुके थे। सुनने में आया कि राकेश रफ़ीक मंच को अपने तरीके से मैनेज करने की कोशिश में थे और वे नहीं चाहते थे कि अरविंद मंच पर आएं। यह बात इससे पुष्‍ट होती है कि जब सारे नेता सीधे मंच पर पहुंच जा रहे थे, अरविंद को मंच के नीचे दरी पर कुछ देर के लिए बैठना पड़ा। उसके बाद भी दो बार वे मंच पर चढ़ने की कोशिश में नाकाम रहे लेकिन फिर ऊपर से उन्‍हें खींच लिया गया। अन्‍ना से अरविंद ने आंखें नहीं मिलाईं लेकिन वाइको से जमकर गले मिले। अरविंद जितनी देर बैठे रहे, अन्‍ना की तरफ़ उन्‍होंने नहीं देखा जबकि अन्‍ना लगातार मूर्ति की तरह सामने देखकर मुस्‍कराते ही रहे।

दूसरी बार दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री के बतौर किसी प्रदर्शन में पहली बार अरविंद का भाषण हुआ। उन्‍होंने बीजेपी सरकार को उद्योगपतियों का प्रॉपर्टी डीलर ठहराया और दिल्‍ली चुनाव में दिए सबक की याद दिलाते हुए एक बार खांसे। फिर उन्‍होंने कहा कि दिल्‍ली में ज़मीन का मसला केंद्र की जिम्‍मेदारी है, दिल्‍ली सरकार की नहीं। ऐसा कह कर वे दो बार खांसे। फिर उन्‍होंने कहा कि अगर आप जनता के लिए काम करते हैं तो जनता खुशी-खुशी अपनी ज़मीन आपको देगी लेकिन अगर आपने जनता पर बुलडोज़र चलवाया तो वह आप पर बुलडोज़र चला देगी, जैसा हमने दिल्‍ली में देखा। इसके बाद अरविंद चार बार खांसे। अंत में उन्‍होंने अन्‍ना को अपना गुरु और पिता समान बताते हुए उनसे अगले दिन सचिवालय में आकर उसे 'शुद्ध' करने का आग्रह किया जिस पर जनता ने तालियां बजाकर जोरदार प्रतिक्रिया दी।

चूंकि जंतर-मंतर और संसद मार्ग के मंच को बीच में से एक गली जोड़ती है, लिहाजा लोगों का एक मंच से दूसरे तक अहर्निश आना-जाना लगा हुआ था। शाम के साढ़े तीन बज चुके थे और कांग्रेस के एक कार्यकर्ता की मानें तो अन्‍ना के उस विशाल मंच पर ''बेवड़े'' विराजमान थे जहां ''शुद्ध आचार, शुद्ध विचार'' का नारा बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था। दरअसल, संसद मार्ग के मंच से मेधा ने खबर दी कि राजगोपाल की रैली को रास्‍ते में रोक लिया गया है और अगर पंद्रह मिनट में उन्‍हें नहीं छोड़ा गया तो मंचस्‍थ सारे नेता उन्‍हें लेने पैदल ही जाएंगे। फिर शायद सारे नेता मंच से इसी वजह से उतर भी गए। कुछ देर बाद मेधा फिर आईं और उन्‍होंने बताया कि वे उधर जाने ही वाले थे कि खबर आई है कि उन्‍हें छोड़ दिया गया है। इन दो घोषणाओं के बीच जंतर-मंतर वाले मंच के सामने कांग्रेस सेवा दल और जेडीयू के कुछ कार्यकर्ता एकत्रित होकर मंच पर बोल रहे एक युवक को गाली दे रहे थे। मैंने जानना चाहा तो एक युवक ने बताया, ''अन्‍ना के मंच पर सारे ग्रेटर नोएडा के बेवड़े बैठे हैं''। थोड़ी देर में फिर से फिल्‍मी गीत बजने शुरू हो गए।

उधर टक्‍कर में संसद मार्ग वाले मंच पर कमान संभाली अरविंद गौड़ की अस्मिता टीम ने, लेकिन वे जितनी तेजी से बिना सुर के चीखते जाते, भीड़ उतनी ही कम होती जाती थी। साढ़े चार बजे के आसपास यह समझ में आ चुका था कि संसद मार्ग वाली रैली को जबरन अस्मिता (टीम) के बहाने खींचा जा रहा है जबकि अन्‍ना समेत सारे नेता कहीं गायब हो चुके थे। अन्‍ना अपने मंच पर भी नहीं थे। पांच बजे के बाद संसद मार्ग को खोला जाना था। आरएएफ वाले लोगों को हटाने लगे। कई जगह कुछ औरतें और पुरुष गोला बनाकर बैठे थे और वे समझ नहीं पा रहे थे कि कहां जाना है। ये टीकमगढ़ और डिंडोरी से आए लोग थे। सारे एकता परिषद के थे और उन्‍हें कहा गया था कि उनका नेता राजगोपाल संसद मार्ग पर ही आएगा। ये लोग ट्रेन से दिल्‍ली आए थे। कुल दो हज़ार के आसपास रहे होंगे। इन्‍हें निर्देश देने वाला कोई नहीं था। ट्रैफिक खुलने के कारण ये लोग इधर-उधर बिखर गए, उधर जंतर-मंतर पर राजगोपाल अब तक नहीं पहुंचे थे। मंच से घोषणा हो रही थी कि अन्‍नाजी राजगोपाल को लेने गए हैं। छह बजे के आसपास कांग्रेस सेवा दल के कुछ पुराने चेहरे और संघ के कुछ परिचित युवा नज़र आए। उन्‍होंने बताया कि वे राजगोपाल के साथ पैदल चलकर पलवल से आए हैं। इनमें कांग्रेस की ''गांव, गांधी, गरीब यात्रा'' के संयोजक विनोद सिंह भी थे। उन्‍होंने बताया कि राजगोपाल आ चुके हैं। मंच पर हालांकि कोई नहीं था। फिल्‍मी गीत बज रहे थे।

इस दृष्‍टान्‍त के पीछे की दो बातें पाठकों को बतायी जानी जरूरी हैं। सबसे पहली बात यह कि केंद्र में नई सरकार बनने के बाद जमीन केंद्रित आंदोलन और आंदोलनों व संगठनों की एकता की पहल की बात सबसे पहले ओडिशा के ढिनकिया गांव में हुए दो दिवसीय एक सम्‍मेलन में उठायी गई थी जिसका मैं गवाह था। इस सम्‍मेलन में देश के डेढ़ सौ से ज्‍यादा जनसंगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्‍सा लिया था और ज़मीन के सवाल पर केंद्रित आंदोलनों को एकजुट करने का संकल्‍प पारित हुआ था। यह 24 फरवरी 2015 की पृष्‍ठभूमि है। इसके बाद जब जमीन लूटने वाला अध्‍यादेश आया, तो जनसंगठनों और कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों ने मिलकर सिलसिलेवार बैठकें कीं जिसका ठिकाना दिल्‍ली का भाकपा मुख्‍यालय अजय भवन रहा। यह अपने आप में दिलचस्‍प बात थी कि जब दिल्‍ली के चुनाव परिणाम आ रहे थे, तब अजय भवन में जनांदोलन 24 फरवरी के प्रदर्शन की तैयारी कर रहे थे। इसी वजह से ढिनकिया में हुए सम्‍मेलन का जो दूसरा संस्‍करण झारखण्‍ड के मधुपुर में 23 से 25 फरवरी के बीच होना था, उसे रद्द किया गया।

इस पूरी प्रक्रिया में अचानक तीन लोगों का प्रवेश अन्‍ना हज़ारे को पैराशूट से आंदोलन में उतारने का सबब बना। उनमें एक थे पीवी राजगोपाल (जिन्‍होंने आदिवासियों की यात्रा से विश्‍वासघात करते हुए तीन साल पहले जयराम रमेश से सौदा कर लिया था), दूसरे थे राकेश रफ़ीक (जो 'युवा भारत' संगठन को तोड़कर 'युवा क्रान्ति' बनाने के लिए कुख्‍यात हैं) और तीसरे थे अल्‍पज्ञात सुनील फौजी, जो ग्रेटर नोएडा के किसान नेता हैं। बताते हैं कि सुनील फौजी के कपिल सिब्‍बल से करीबी ताल्‍लुकात हैं और यही वजह है कि अन्‍ना के मंच पर कांग्रेसियों की अच्‍छी-खासी भरमार थी। इन तीन लोगों ने अन्‍ना हज़ारे को कथित तौर पर आंदोलन में लाने का प्रस्‍ताव रखा, जिसे मेधा पाटकर के नेतृत्‍व ने काफी सतर्कता से बरता और पूरी कोशिश की गई कि किसी भी तरह आंदोलन को ''सैबोटाज'' न होने दिया जा सके। संसद मार्ग के मंच पर अन्‍ना की खामोश उपस्थिति बाकी सारी कहानी बयां कर देती है।

ज़ाहिर है, मीडिया में न तो वाम दलों को आना था, न मेधा पाटकर को और न ही लाल झंडे से पटे संसद मार्ग को। सारी लड़ाई अन्‍ना बनाम मोदी की बना दी गई है, तो ऐसा सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ है। अगर किसानों को कुछ राहत मिलती है, तो ज़ाहिर है उसका श्रेय अन्‍ना और राजगोपाल ले जाएंगे। अगर नहीं, तो भी चेहरा इन दोनों का ही चमकेगा। कुल मिलाकर देखें तो सुनीत चोपड़ा की कही बात कि ''हम सब मुख्‍यधारा के परसेप्‍शन ट्रैप में फंसे हुए हैं'', बिलकुल सच साबित हो रही है। संतोष सिर्फ एक बात का है कि इन तमाम साजिशों को नाकाम करने के लिए आज सड़क पर हज़़ारों किसान उतर चुके हैं जो अपनी ज़मीनें बचाने के लिए ''पुर्जा-पुर्जा कट मरने'' को तैयार हैं। इन्‍हें इंतज़ार है 23 मार्च की भगत सिंह शहादत दिवस का, जब एक साथ इस देश के हज़ारों लोग भूमि लूट अध्‍यादेश के खिलाफ़ शहीद होने का सामूहिक संकल्‍प लेंगे। ज़ाहिर है, मीडिया तब भी सौदेबाज़ों को ही दिखाएगा। इसमें लप्रेककार रवीश कुमार की कोई गलती नहीं। सौदेबाज़ी के दौर में प्रेम कथा हो चाहे आंदोलन कथा, वह लघु होने को ही अभिशप्‍त है। 

मारे जाने के बाद भी जिंदा है लेखक

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/30/2015 05:20:00 PM


भाषा सिंह अपनी इस ताजा रिपोर्ट में बता रही हैं कि कैसे प्रभुत्वशाली विचारों, प्रथाओं और सामाजिक संरचनाओं को चुनौती देने वाले लेखकों की इस मुल्क में जीते जी 'हत्या' कर दी जाती है. यहां वे तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन से हुई अपनी हालिया मुलाकात को पेश कर रही हैं, और साथ ही वे उनके उपन्यास के बारे में हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा पैदा किए गए विवाद और इसकी पृष्ठभूमि की जानकारी दे रही हैं.

अब भी दिमाग मेरे दिमाग में 7-8 उपन्यास हैं। कई का तो पूरा नक्शा भी तैयार है, बस देर है उन्हें उतारने की। इन सभी उपन्यासों की विषयवस्तु एक से बढ़ कर है। मुझे लिखने में वैसे भी ज्यादा समय नहीं लगता। आपको पता है, अभी जनवरी में ही मेरे दो उपन्यास अलावायन और अर्द्धनारी चेन्नई पुस्तक मेले में आए और अच्छी प्रतिक्रिया मिली। ये दोनों उपन्यास मादोरुबागन की अगली कड़ी (सीक्वल) हैं।

यह बताते हुए जबर्दस्त उत्साह में आ जाते हैं 48 वर्षीय पेरुमल मुरुगन। उनके साथ बिताए करीब तीन घंटों में मुरुगन सिर्फ और सिर्फ अपनी लेखनी के बारे में बतियाते रहे। उसी में पूरी तरह से डूबते-उतराते रहे। उनसे कुछ भी और सवाल पूछती, उनका जवाब अपने किसी उपन्यास या कहानी के साथ समाप्त होता। वह धाराप्रवाह अपने रचना संसार के बारे में जिस तरह से बता रहे थे कि विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं तमिलनाडु के उसी चर्चित लेखक के सामने बैठी हूं जिन्होंने अपने लेखक की मृत्यु का ऐलान कर दिया है। उन्होंने किसी भी अपरिचित से मिलना बंद कर रखा है और खुद को अपने परिवार और परिचित दायरे में कैद कर रखा है। मुझसे और मेरे साथ गए कुछ मित्रों से वह सिर्फ इसलिए मिलने को तैयार हो गए क्योंकि हम दिल्ली से हजारों किलोमीटर का सफर तय करके सिर्फ उनसे मिलने पहुंचे थे। हालांकि फोन पर जब हमने उनसे मिलने की ख्वाहिश जताई थी तो उन्होंने कहा कि मिले बिना कोई रचनाकार जिंदा नहीं रह सकता, पर अभी स्थितियां अच्छी नहीं हैं। इस बात का अहसास नामाक्कल में पी. मुरुगन के छोटे से घर के बाहर पहुंचकर हो गया। पुलिस वहां तैनात थी। उनकी पत्नी और दोनों बच्चों के चेहरों पर जबर्दस्त तनाव था। उनकी पत्नी अलिरासी ने, जो खुद तमिल साहित्य की प्राध्यापक और कवि हैं, बस यह कहा कि हमारी जिंदगी में सब कुछ बदल गया। मुरुगन से जब उनकी अगली किताब के बारे में पूछा तो बहुत बोझिल स्वर में उन्होंने जवाब दिया, 'अब कागज नहीं मन पर लिखूंगा, यहां किसी का कोई दखल नहीं हो सकता।'

तमिलनाडु के कोयंबटूर शहर से करीब 200 किलोमीटर दूर है नामाक्कल। बेहद शांत दिखने वाला यह शहर इस समय खदबदाया हुआ है और इसकी खदबदाहट का असर तमिलनाडु की राजनीति से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक में महसूस हो रही है। पेरुमल मुरुगन के तमिल उपन्यास मादोरुबागन (2010) का 2014 में अंग्रेजी में तर्जुमा पेंगुइन प्रकाशन से वन पार्ट वुमन नाम से आया। रातों-रात इस पर आर्श्चयजनक ढंग से हिंदुत्वादी और जातिवादी राजनीति गरमा गई। निश्चित तौर पर इसका संबंध राज्य में भाजपा और उग्र हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा सांप्रदायिक-जातिवादी ध्रुवीकरण तेज करने की कवायदों से है। ये अभियान वॉट्स-अप पर शुरू हुआ। इसकी शुरुआत की, गाउंडर जाति (जिससे खुद लेखक पी.मुरुगन आते हैं) की पार्टी कोंगुनाडू मक्कलकच्छी ने, जिसका राज्य में भारतीय जनता पार्टी से चुनावी गठबंधन रहा है। इस पार्टी के साथ विवादित उग्र संगठन हिंदू मुन्नानी और भाजपा ने नामाक्कल से लेकर चेन्नई तक, लेखक तथा उनकी किताब को निशाने पर लेकर हल्ला बोल दिया। स्थानीय प्रशासन ने इन उग्र संगठनों का साथ देते हुए, लेखक पेरुमल मुरुगन को तीन बैठकों (जनवरी 7, 9 जनवरी और 12 जनवरी) में बुलाया और उन पर दबाव बनाया, किताब वापस लेने और धमकाने की लंबी प्रक्रिया चलाई, जिससे आहत होकर पेरुमल मुरुगन ने 14 जनवरी को फेसबुक पर लिखा, 'लेखक पेरुमल मुरुगन मर गया। वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनर्जीवित नहीं कर सकता। वह पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करता। आगे से, पेरुमल मुरुगन सिर्फ एक अध्यापक के बतौर जिंदा रहेगा, जो वह हरदम रहा है।'

लेखक ने इन शब्दों के माध्यम से जिस गहरी पीड़ा और प्रतिरोध का इजहार किया, उसने साहित्यिक जगत में एक जबर्दस्त बेचैनी का संचार किया। देश भर में पी. मुरुगन के पक्ष में लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी बोलने लगे। चेन्नई में प्रगतिशील लेखक संघ ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की, जिसमें इस असंवैधानिक बैठकों में मादोरुबागन और वन पार्ट वुमन किताब के बारे में लिए गए फैसलों को खारिज करने की अपील की, अभिव्यिक्त की स्वतंत्रता को बचाने की मांग की गई। चेन्नई, बंगलूर से लेकर दिल्ली, जयपुर, कोलकाता तक में मुरुगन की किताब मादोरुबागन का पाठ किया गया। तमाम भाषाओं के लेखक मुरुगन के पक्ष में खड़े हुए और मैं मुरुगन हूं-जैसे अभियान भी चले।

इस तरह से नामाक्कल शहर इस समय चर्चा के केंद्र में आ गया है। उनकी किताब मादोरुबागन और उसके अंग्रेजी संस्करण वन पार्ट वुमन को कोयंबटूर शहर में दो घंटे ढूंढ़ने में नाकाम रहने के बाद समझ आया कि किसी किताब पर अघोषित प्रतिबंध कैसे लगाया जाता है। हालांकि एक पुस्तक विक्रेता ने कहा, इस हंगामे की वजह से मुरुगन की यह किताब और नामक्कल शहर दुनिया भर में मशहूर हो गया। इन तमाम बातों से बेहद विनम्र स्वर में बात करने वाले पी. मुरुगन वाकिफ हैं और उन्हें लग रहा है कि लेखन पर गहराया संकट जल्द नहीं हटने वाला है। जाति के बारे में पूछने पर वह कहते हैं कि यह मेरे लिए तो बड़ा मुद्दा नहीं है लेकिन समाज में एक बड़ा मुद्दा है। कैसे हम इससे बाहर आ सकते हैं, यह कोई नहीं जान पाया। हालांकि यह पेरियार की जमीन है, जिन्होंने जातिवाद, ब्राह्मणवाद और अंधविश्वास के खिलाफ ऐतिहासिक सफल आंदोलन चलाया लेकिन फिर भी जाति लोगों को संगठित करने का सबसे बड़ा औजार बनी हुई है। मैंने 2013 में पूक्कली (अर्थी) उपन्यास अंतर्जातीय विवाह पर होने वाली राजनीति पर ही लिखा था और इस उपन्यास को तमिलनाडु में अंतर्जातीय विवाह करने के बाद मारे गए दलित युवक इलावरसन और—को समर्पित किया था। यह किताब भी अंग्रेजी में अनुवाद हो रही है।

मुरुगन ने बताया कि तिरुचेंगोड गांव के एक गरीब भूमिहीन परिवार में जन्मे और खानदान के पहले शिक्षित व्यक्ति थे। इसी गांव के अर्धनारीश्वर मंदिर की एक प्रथा का जिक्र पी. मुरुगन ने अपने उपन्यास मादोरुबागन में किया है, जिसमें निस्संतान महिलाओं के लिए सहमति से किसी देवता से शारीरिक संबंध बनाने की छूट होती है। उपन्यास के इसी हिस्से को तिरुचेंगोडु की महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला और उनके चरित्र पर सवाल उठाने वाला बताया गया और इसके खिलाफ आवाज उठाने का आहृवान सभी हिंदुओं से किया गया। इस विवाद के बारे में पी. मुरुगन सीधे कुछ भी बोलने के बजाय, यह कहते हैं, 'मेरे सारे उपन्यास जमीनी हकीकत पर आधारित हैं। कल्पना का पुट साहित्य में होता है, लेकिन मैं हकीकत से जुदा होकर लिखने में विश्वास नहीं करता।'

अब तक 35 किताबें लिख चुके मुरुगम पेरियार, मार्क्स और अंबेडकर की विचारधारा से गहरे रूप से प्रभावित हैं। हालांकि वह किसी वामपंथी पार्टी से नहीं जुड़े हैं लेकिन खुद को मार्क्सवादी मानते हैं। अपने उपन्यासों में उन्हें सबसे प्रिय है सीजन्स ऑफ पाम, जिसमें उन्होंने एक दलित-अरुधंतियार भूमिहीन बंधुआ मजदूर की कहानी लिखी है। उन्होंने अब तक नौ उपन्यास लिखे हैं जिसमें से पांच पिछले पांच साल में आए।

बातचीत के दौरान अनगिनत लोगों की आवाजाही बनी रही। पेरियार के अनुयायी द्रविड़ कयगम के वालिएंटरों का दस्ता काली कमीज में लेखक के साथ मुस्तैद था। मुरुगन अभी इस विवाद पर कुछ बोलना नहीं चाहते, वह संकट कटने का खामोशी के साथ इंतजार करना चाहते हैं। सरकार वहां अन्नाद्रमुक की है और वह इसमें हिंदुत्वादी संगठनों को संरक्षण दे रही है, द्रमुक पार्टी के नेता स्टालिन लेखक के पक्ष में बयान देने तक सीमित रहे, वाम दल समर्थन में हैं। लेकिन मुरुगन की खामोशी उनके कई साथियों को चुभ रही है। तमिल लेखिका वासंती का कहना है कि मुरुगन को इस तरह से हथियार नहीं डालना चाहिए। हालांकि चेन्नई की महिला कार्यकर्ता के. मंजुला का कहना है कि हम मुरुगन के शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने निस्संतान महिला के लिए विषम स्थितियों को उजागर किया। पी. मुरुगन के सहकर्मी प्रो. मुत्तूस्वामी का मानना है कि इस पूरे प्रसंग में जीत लेखक की हुई है। उनकी लेखनी विजयी हुई है। पूरे देश और दुनिया में लोगों का लेखक के पक्ष में आना इसका सबूत है।

तमिल साहित्य के जुझारू इतिहास में पहली बार किसी लेखक ने अपने लेखक की मौत की घोषणा की है। हालांकि इसे भी प्रतिरोध की उस अमर श्रृंखला के साथ ही जोड़ के देखा जा रहा है, जिसमें तमिल के प्रख्यात कवि भारतीयार ने कहा था, 'अगर एक व्यक्ति के पास खाने को अन्न नहीं है तो हम उस दुनिया को जला देंगे।'

मादोरुबागन पर क्यूं हंगामा

यह उपन्यास कोंगू अंचल में एक निस्संतान किसान दंपत्ति पोन्ना (पत्नी) और काली (पति) की दास्तां है, जिनमें बेहद प्रेम है। इस प्रेम पर बच्चा न होने की वजह से समाज और परिवार के ताने तथा दबाव कैसे कहर बरपाते हैं, इसका मार्मिक चित्रण है। इसमें तिरुचेंगोडु में स्थित शिव के अर्दनारीश्वर मंदिर में हर साल लगने वाले एक 14 दिन लंबे मेले का जिक्र है, जिसमें मान्यता है कि अंतिम दिन मेले में उपस्थित सभी पुरुष देवता हो जाते हैं और निस्संतान स्त्रियां किसी भी देवता के साथ समागम कर संतान प्राप्ति कर सकती हैं। मान्यता के अनुसार ऐसी संतानों को देवता का प्रसाद माना जाता है। इस ट्रैजिक उपन्यास में नायिका यहां जाती है। इसी हिस्से पर हिंदुत्वादी संगठनों ने सारा कहर बरपा किया।

हिंदी आउटलुक के 1-15 फरवरी 2015 अंक में प्रकाशित. साभार. 

गणतंत्र दिवस के अतिथि

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/25/2015 01:11:00 AM


अनुज लुगुन ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रतिनिधि, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत आने पर यह कविता लिखी है. ओबामा इसे यकीनी बनाने के लिए आए हैं कि भारतीय राज्य जनता के जल-जंगल-जमीन को छीन कर साम्राज्यवादी कंपनियों को सौंपना जारी रखे और इस तरह अमेरिकी साम्राज्य के वजूद को कायम रखे. साथ में, ब्राह्मणवादी-सामंती-फासीवादी परियोजनाएं भी चलती रहें.

सिर्फ इतना ही कर सकता हूँ
कि आज के तुम्हारे कार्यक्रम में
मैं शामिल नहीं होऊंगा
और कर भी क्या सकता हूँ
तुम्हारे अभेद्य सुरक्षा कवच के सामने.?
वैसे और क्या हो सकता है इससे बेहतर
तुम्हारा लोकतांत्रिक बहिष्कार
कि लोकतंत्र के कथित महाप्रभु को
उसी के जुमलों से जवाब दिया जाए?

जब सारी दुनिया
तुम्हारे ताकत के दंभ और शोहरत की
अंधभक्ति कर रही हो
तब मेरे ही भाई-बन्धु हसेंगे
मेरे इस निर्णय पर
और सीआईए अगर
इसकी भी सूचना दे दे
तो शायद तुम्हें भी
हिंदी के इस आदिवासी कवि पर हंसी आ जाए

आज कार्यक्रम में शामिल नहीं होऊंगा
तो इसका मतलब
तुम मुझसे बेहतर समझते हो कि
मैं तुम्हारे हर उस निर्णय में शामिल नहीं हूँ
जिसने दुनिया को ‘डॉलर’ की जंजीर पहनाई है
जिसने जने हैं दुनिया में
नाटो, खाड़ी, तालिबान, ईराक
लीबिया, उ.कोरिया, ईरान
और भी ऐसी अनगिनत अंधेरी खाइयां
जिनमें मानवता दफ़न की जा रही है

मेरे इस इनकार का मतलब
तुम भली भांति समझते हो
कि मैं तुमसे और तुम्हारे अधिकांश
पूर्वजों से असहमत हूँ
तुम यह भी जानते हो कि
आज तुम जिस जमीन पर खड़े होकर
आतंकवाद और विश्व शान्ति की बात कर रहे हो
उसी जमीन के खिलाफ
तुम्हारे पूर्वजों ने जहाजी बेड़ा भेजा था

मुझे पता है
तुम और तुम्हारा सीआईए
कहेगा कि मैं सोवियतों का पिछलग्गू रहा हूँ
कहोगे कि मैं चे, कास्त्रो या शावेज का गुप्तचर हूँ
कहोगे कि मैं तालिबानी हूँ
कहोगे कि मैं इस्लामिक स्टेट का हूँ
तुम कुछ भी कहोगे और उसे साबित भी कर दोगे
लेकिन तुम कभी नहीं कहोगे कि
मैं ब्लैक हिल्स या डकोटा प्रान्त का वंशज हूँ
नहीं कहोगे कि मैं रेड इंडियनों का वंशज हूँ
ऐसा कहकर तुम और सीआईए
कभी भी अपने इतिहास का
नकाब नोचने की हिमाकत नहीं करेगा

मुझे पता है
तुम कुछ भी ऐसा नहीं करोगे
जिससे साबित हो कि
तुम्हारे सिवाय और भी सभ्यता रही है
और भी मौजूद हैं दूसरे सहजीवी विकल्प

आज तुम बापू को धन्य धन्य कहोगे
मार्टिन लूथर किंग जूनियर की दास्तान कहोगे
और जब कल यहाँ से वापस लौट जाओगे
हथियारों के अंतराष्ट्रीय बाजार में
तुम्हारी रैंकिंग फिर से सबसे ऊपर होगी

फिर से होगी
तीसरी-अश्वेत-अफ़्रीकी-दुनिया में
तुम्हारे लड़ाकू युद्ध पोतों
और जहाजी बेड़ों के उतरने तक
हथियारों की काला बाजारी

आज मेरे देश की
बलिदानी धरती पर होने के बावजूद भी
तुमसे दूसरी छोर पर रहूँगा
मैं यहाँ अपने जंगलों और नदियों के साथ
यहीं अपने जनवादी गणतंत्र का गीत गाऊंगा |

हिंदुत्व का शिकंजा और दलित-जातिवादी राजनीति

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/24/2015 08:00:00 AM


प्रो. तुलसी राम का यह लेख हिंदुत्व के फासीवादी तीखे होते हमलों के दौर में दलित-जातिवादी राजनीति का एक आकलन पेश करता है. 

पिछले पचीस सालों में दलितों के साथ पिछड़े वर्ग की राजनीति में जातिवाद अपनी चरम सीमा पार कर गया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि विशुद्ध हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा ने अकेले बहुमत पाकर भारत की सत्ता प्राप्त कर ली। भारतीय जाति-व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसे धर्म और ईश्वर से जोड़ दिया गया। यही कारण था कि इसे ईश्वरीय देन मान लिया गया। गांधीजी जैसे व्यक्ति भी इसी अवधारणा में विश्वास करते थे। इस अवधारणा का प्रचार सारे हिंदू ग्रंथ करते हैं। इसलिए हिंदुत्व पूर्णरूपेण जाति-व्यवस्था पर आधारित दर्शन है।

विभिन्न जातियां हिंदुत्व की सबसे मजबूत स्तंभ हैं। इसलिए इन स्तंभों की रक्षा के लिए ही भारत के सभी देवी-देवताओं को हथियारबंद दिखाया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि दलितों पर आज भी वैदिक हथियारों से हमले जारी हैं। ऐसी स्थिति में जब जाति को मजबूत किया जाता है, तो हिंदुत्व स्वत: मजबूत होता चला जाता है। पिछले पचीस वर्षों में ऐसा ही हुआ है।

नब्बे के दशक में कांशीराम ने एक अत्यंत खतरनाक नारा दिया था- ‘अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो’। इसी नारे पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) खड़ी हुई। परिणामस्वरूप डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन की अवधारणा को मायावती ने शुद्ध जातिवादी अवधारणा में बदल दिया। इतना ही नहीं, गौतम बुद्ध द्वारा दी गई ‘बहुजन हिताय’ की अवधारणा को चकनाचूर करके उन्होंने ‘सर्वजन हिताय’ का नारा दिया, जिसका व्यावहारिक रूप सभी जातियों के गठबंधन के अलावा कुछ भी नहीं था। परिणामस्वरूप दलितों की विभिन्न जातियों के साथ-साथ ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के अलग-अलग सम्मेलनों की बसपा ने भरमार कर दी, जिससे हर जाति का दंभी गौरव खूब पनपने लगा।

ब्राह्मण सम्मेलनों के दौरान बसपा के मंचों पर हवन कुंड खोदे जाने लगे और वैदिक मंत्रों के बीच ब्राह्मणत्व का प्रतीक परशुराम का फरसा (वह भी चांदी का) मायावती को भेंट किया जाने लगा। इस दौरान दलित बड़े गर्व के साथ नारा लगाते थे- ‘हाथी नहीं, गणेश हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं’। मायावती हर मंच से दावा करने लगीं कि ब्राह्मण हाशिये पर चले गए हैं, इसलिए वे उनका खोया हुआ गौरव वापस दिलाएंगी। वे इस तथ्य को जरा भी समझ नहीं पार्इं कि ब्राह्मण कभी भी हाशिये पर नहीं जाते हैं। उनका सबसे बड़ा हथियार धर्म और ईश्वर है। इन्हीं हथियारों के बल पर ब्राह्मणों ने हमेशा समाज की बागडोर अपने हाथ में रखी।

इससे पहले मायावती तीन बार भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं और गठबंधन की सरकार चलाई। इतना ही नहीं, भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए मायावती विश्व हिंदू परिषद के त्रिशूल दीक्षा समारोह में भी शामिल हुर्इं। पर जब वे मोदी का प्रचार करने गुजरात गर्इं, तो उन्होंने धार्मिक उन्माद पर खुलेआम ठप्पा लगा दिया। दलित सत्ता के नारे के साथ मायावती ने जातीय सत्ता की प्रतिस्पर्द्धा को जन्म दिया। इस जातीय सत्ता की होड़ में मंडलवादियों ने शामिल होकर धर्म के स्तंभों को और मजबूत किया।

अगर राजनीति में धर्म का इस्तेमाल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध है, तो धर्म से उत्पन्न जाति का इस्तेमाल कैसे धर्म-निरपेक्ष हो सकता है? इसलिए धर्म का राजनीति में इस्तेमाल जितना खतरनाक है, जाति का इस्तेमाल उससे कम खतरनाक नहीं है। इस तथ्य को न कभी मायावती समझ पार्इं और न ही मंडलवादी। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव और नीतीश कुमार आदि सब ने जातिवादी राजनीति के माध्यम से धर्म की राजनीति को मजबूत किया।

आज नरेंद्र मोदी जो छप्पन इंच का सीना तान कर घूम रहे हैं, उसकी पृष्ठभूमि में जातिवादी राजनीति रही है। उक्त सारे नेताओं द्वारा जाति के साथ-साथ मुसलिम वोटों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने के प्रयास से आम हिंदू नाराज होकर पूरी तरह भाजपा की तरफ चला गया। इसलिए संघ परिवार जिसकी वकालत बरसों से कर रहा था, उसमें वह पूर्णत: सफल रहा। भाजपा ने धर्म और जाति, दोनों का इस्तेमाल बड़ी रणनीति के साथ किया, जिसके पीछे वह चालाकी से ‘विकास’ की बात करके जनता को भ्रमित करने में सफल रही, जबकि असली मुद्दा धार्मिक ध्रुवीकरण का ही था।

मायावती ने डॉ. आंबेडकर की मूर्तियों और पार्कों की आड़ में दलितों को उनके रास्ते से भटकाने का काम बड़ी सफलता से किया। डॉ. आंबेडकर ने दलितों को सामाजिक और धार्मिक भेदभाव से मुक्ति दिलाने के लिए एक दोहरी रणनीति अपनाई थी। एक तरफ उन्होंने जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन का सूत्रपात करके ‘मनुस्मृति’ को जलाया था और दूसरी तरफ जातिवाद को स्थापित करने वाले वैदिक ब्राह्मण धर्म के विकल्प के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाया था। मायावती डॉ. आंबेडकर की दोनों रणनीतियों को दरकिनार करके जातिवादी राजनीति के चंगुल में फंसती चली गर्इं।

एक बार कांशीराम ने घोषणा की थी कि वे डॉ. आंबेडकर से कहीं ज्यादा लोगों के साथ, यानी बीस लाख से अधिक लोगों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण करेंगे, पर स्वास्थ्य की समस्या के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए। बाद में मायावती ने कहा कि बौद्ध धर्म ग्रहण करने से सामाजिक सद्भावना के बिगड़ने की संभावना है, इसलिए जब वे प्रधानमंत्री बन जाएंगी, तो बौद्ध धर्म ग्रहण करेंगी। जाहिर है, जब उन्होंने उक्त बातें कहीं, उस समय मायावती भाजपा के साथ उत्तर प्रदेश की सरकार चला रही थीं।

डॉ. आंबेडकर के दर्शन के बारे में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे भारत के लिए द्वि-दलीय प्रणाली की वकालत करते थे, इसलिए वे दलित नाम से कोई पार्टी नहीं चलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी को प्रस्तावित किया। कांग्रेस का यही विकल्प उन्होंने प्रस्तुत किया था। पर एक बात उन्होंने जोर देकर कही थी कि दलितों को आरएसएस और हिंदू महासभा (वर्तमान विश्व हिंदू परिषद) जैसे संगठनों के साथ कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए।

संघ ने 1951 में जनसंघ की स्थापना की थी, पर आंबेडकर के समय में उसका प्रभाव नगण्य था। इसीलिए सीधे-सीधे उन्होंने संघ से किसी भी तरह का समझौता करने से दलितों को मना किया था। मायावती ने डॉ. आंबेडकर के हर कदम को नजरअंदाज करके संघ-परिवार का हाथ मजबूत किया। डॉ. आंबेडकर का जनतंत्र में अटूट विश्वास था, जिसकी झलक भारत के संविधान में साफ तौर पर मिलती है। उनका मानना था कि जाति-व्यवस्था एक तरह से तानाशाही वाली व्यवस्था थी, जिसके चलते दलित हर तरह के मानवीय अधिकारों से वंचित रहे। इसलिए जनतांत्रिक प्रणाली को वे दलितों के लिए सर्वोत्तम प्रणाली समझते थे।

पर सारी जातिवादी पार्टियां अपनी ही जाति के लोगों को हमेशा जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित करती रही हैं। ऐसी पार्टी के नेताओं में मायावती का नाम सबसे ऊपर आता है। यहां तक कि बैठकों के दौरान न सिर्फ मायावती कुर्सी पर बैठा करती थीं और बाकी नेता जमीन पर बैठते थे; विधानसभा हो या संसद, उनके डर से कोई पार्टी विधायक या सांसद कुछ भी बोलने से डरता था। उनका व्यवहार एकदम सामंती हो गया था। उन्हें आम सभाओं में चांदी-सोने के ताज पहनाए जाते थे और उनके हर जन्म दिवस पर लाखों रुपए की भारी-भरकम माला भी पहनाई जाती थी। 1951 में मुंबई के दलितों ने बड़ी मुश्किल से दो सौ चौवन रुपए की एक थैली डॉ. आंबेडकर को उनके जन्मदिन पर भेंट की थी, जिस पर नाराज होकर उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर कहीं भी ऐसा दोबारा किया तो वे ऐसे समारोहों का बहिष्कार करेंगे।

पिछली दफा राज्यसभा का परचा दाखिल करते हुए मायावती ने आमदनी वाले कॉलम में एक सौ तेईस करोड़ रुपए की संपत्ति दिखाई थी। हकीकत यह थी कि मायावती के गैर-जनतांत्रिक व्यवहार के चलते बसपा में भ्रष्ट और अपराधी तत्त्वों की भरमार हो गई थी, जिसके कारण पूरा दलित समाज न सिर्फ बदनाम हुआ, बल्कि इससे दलित विरोधी भावनाएं भी समाज में खूब विकसित हुर्इं। एक तरह से मायावती दलित वोटों का व्यापार करने लगी थीं। पिछले अनेक वर्षों में चमार और जाटव समाज के लोग उत्तर प्रदेश में भेड़ की तरह मायावती के पीछे चलने लगे थे। इसलिए वे भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को चुन कर विधानसभा और संसद में भेजने लगे थे।

बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधानसभा में बोलते हुए एक बार कहा था, ‘धर्म में नायक पूजा किसी को मुक्ति प्रदान कर सकती है, पर राजनीति में नायक पूजा निश्चित रूप से तानाशाही की ओर ले जाएगी।’ मायावती के संदर्भ में यह शत-प्रतिशत सही सिद्ध हुआ। राजा-रानियों की तरह मायावती ने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करते हुए प्रेस सम्मेलन में कहा था, ‘मेरा उत्तराधिकारी चमार जाति का ही होगा, जिसका नाम मैंने एक लिफाफे में बंद कर दिया है। यह लिफाफा मेरी मृत्यु के बाद खोला जाएगा।’ इससे एक बात साफ हो गई कि मायावती के रहते कोई अन्य दलित नेता नहीं बन सकता था।

उनके द्वारा बार-बार चमार जाति के उल्लेख से दलित की गैर-चमार जातियां बसपा से कटती चली गर्इं और उनमें से अधिकतर या तो भाजपा के साथ हो गर्इं या मुलायम सिंह यादव के साथ चली गर्इं। उत्तराधिकारी की घोषणा के बाद एक रोचक घटना हुई। मीडिया वालों ने अंदाजवश आजमगढ़ के राजाराम के रूप में उत्तराधिकारी की पहचान कर ली। परिणामस्वरूप मायावती ने अविलंब राजाराम को पार्टी से बर्खास्त कर दिया।

जब मायावती सामाजिक अभियांत्रिकी (सोशल इंजीनियरी) के नाम पर ब्राह्मणों को सतीश मिश्रा के माध्यम से अपनी तरफ खींचने का अभियान चला रही थीं तो दलितों के विरुद्ध उसका दूरगामी प्रभाव पड़ा। इससे पहले चुनावी राजनीति में ही सही, सारी पार्टियां दलितों को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करती थीं और उनके लिए तरह-तरह के वादे भी किया करती थीं, जिसका परिणाम अनेक अवसरों पर काफी सकारात्मक भी हुआ करता था। इसलिए दलित हमेशा एक दबाव समूह का काम करते थे। पर मायावती उस तथाकथित सामाजिक अभियांत्रिकी के चलते हर पार्टी के लिए ब्राह्मण खुद दबाव समूह के लिए दलितों को हाशिये पर डाल दिए। परिणामस्वरूप मायावती के चक्कर में दलित हर पार्टी के लिए दुश्मन बन गए। अब उनके कल्याण के लिए कोई भी पार्टी तत्पर नहीं दिखाई पड़ती। सच ही कहा गया है, ‘माया मिली न राम।’

मायावती के एक अन्य दलित-विरोधी फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ा। किसी गैर-दलित मुख्यमंत्री की कभी हिम्मत नहीं पड़ी कि वह ‘दलित अत्याचार विरोधी अधिनियम’ से छेड़छाड़ करे। पर मायावती जब भाजपा के साथ संयुक्त सरकार चला रही थीन, तो उन्होंने गैर-दलितों को खुश करने के लिए उपरोक्त अधिनियम में संशोधन करके यह प्रावधान कर दिया कि दलित महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे अपराधों को पुलिस तब तक दर्ज न करे, जब तक कि डॉक्टर प्रमाणित न कर दे कि सही मायने में बलात्कार हुआ है। मायावती के इस आदेश का परिणाम यह हुआ कि दलितों पर तरह-तरह के अत्याचार होते रहे, पर पुलिस अधिकतर मामलों में आज भी केस दर्ज नहीं करती है।

इस बार लोकसभा चुनावों में जब बसपा का सफाया हो गया, तो मायावती ने इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा दिया। हकीकत तो यह है कि मायावती अपनी व्यक्तिगत सत्ता के लिए लगातार जातिवादी नीतियां अपनाती रही हैं, जिससे दलित निरंतर सबसे कटते चले गए। पिछले पचीस सालों के अनुभव से पता चलता है कि अब देश को जातिवादी पार्टियों की जरूरत नहीं है, बल्कि सबके सहयोग से जाति-व्यवस्था विरोधी एक मोर्चे की आवश्यकता है, अन्यथा जातियां मजबूत होती रहेंगी, जिससे धर्म की राजनीति को ऑक्सीजन मिलता रहेगा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान डॉ. आंबेडकर ने गांधीजी से कहा था, ‘स्वतंत्रता आंदोलन में सारा देश एक तरफ है, पर जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन सारे देश के खिलाफ है, इसलिए यह काम बहुत मुश्किल है।’ उम्मीद है, दलित इतिहास से कुछ सीख अवश्य लेंगे।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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