हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आंबेडकर के जश्न के मौके पर दलितों के आंसू

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/21/2016 12:49:00 PM



भीम यात्रा में एक भी ‘आंबेडकरी’ इसके आसपास नहीं देखा गया जबकि इसके एक प्रेरक प्रतीक के रूप में अंबेडकर की प्रभावशाली मौजूदगी वहां थी. सभी उल्लेखनीय प्रगतिशील व्यक्तियों ने गरीब सफाईकर्मियों के संघर्ष के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, लेकिन स्वयंभू अंबेडकरी ही वो खास लोग थे जो वहां से नदारद थे. आनंद तेलतुंबड़े का स्तंभ. अनुवाद: रेयाज उल हक

जिस वक्त दुनिया बाबासाहेब आंबेडकर की 125वीं जयंती के धूम-धड़ाके से भरे उत्सव के लिए तैयार हो रही थी, उन्हीं दिनों सफाईकर्मी कहे जाने वाले दलितों का एक तबका राजधानी में जमा हुआ ताकि वो भारत में आजादी के सात दशकों के बाद भी और आंबेडकर के गुजरने के छह दशकों के बाद भी दलितों की बेचैन कर देने वाली हकीकत दिखा सके. भीम यात्रा कहे जाने वाले उनके जुलूस ने 125 दिनों में 35,000 किमी का सफर तय किया था जो असम में डिब्रूगढ़ से शुरू हुआ और करीब 500 जिलों और 30 राज्यों से होते हुए 13 अप्रैल, 2016 को नई दिल्ली में जंतर मंतर पर खत्म हुआ. उन्हें इस अमानवीय काम से मुक्ति दिलाने के संघर्ष की रहनुमाई कर रहे सफाई कर्मचारी आंदोलन (एसकेए) के बैनर तले निकाले गए जुलूस में दर्द भरे तरीके से वे पुकार रहे थे ‘हमारी जान मत लो’. ऐसा कहते हुए वे हर साल होने वाली 22000 सफाईकर्मियों की गुमनाम मौतों का हवाला दे रहे थे (आखिरकार भाजपा के सांसद तरुण विजय ने राज्य सभा में अभी पिछले महीने ही इसे कबूल किया है). यह तादाद 1990 से लेकर 17 वर्षों में जम्मू-कश्मीर में हथियारबंद संघर्ष से लड़ते हुए मारे जाने वाले सभी सैनिकों, पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों की सुर्खियों में होने वाली मौतों से 4.5 गुना ज्यादा है! अपने गालों पर बहते हुए आंसुओं के साथ, रुंधे हुए गले से अनेक बच्चों ने इसकी खौफनाक कहानियां सुनाईं कि कैसे उनके परिवारवाले इस नुकसानदेह प्रथा के शिकार होते हैं.

इसने विरोधाभासों की इस धरती पर एक निहायत ही बड़ा विरोधाभास पेश किया कि जब आंबेडकर को एक महा प्रतीक की हैसियत में उठाया जा रहा था, अवाम के उस हिस्से को अपनी बुनियादी जिंदगी के लिए फरियाद करनी पड़ रही थी, जिसके लिए आंबेडकर जिए और लड़ाई लड़ी.

बेपनाह दोमुंहापन

भारत के संविधान ने छुआछूत का अंत कर दिया, लेकिन उन स्थितियों के लिए उसने कुछ नहीं किया जो छुआछूत को पैदा करती थीं. यहां ऐसे लोग थे जो न सिर्फ सवर्ण हिंदुओं के लिए, बल्कि दूसरी दलित जातियों के लिए भी अछूत होने की वजह से छूने से परहेज किया जाता था. इस मामले पर अपने रूढ़िवादी विचारों के बावजूद गांधी ने वाजिब ही भंगी (सफाई के काम से पहचानी जाने वाली जाति) को दलितों के प्रतिनिधि के रूप में पहचाना और इस मुद्दे को उठाने के लिए खुद को एक भंगी के रूप में पेश किया. वे उनके लिए अपने प्यार को जाहिर करने के लिए भंगी कॉलोनी में रहे. इसलिए गांधी के नाम की कसमें खाने वाले राज्य के लिए जरूरी था कि वो इस अमानवीय काम को गैरकानूनी करार दे और इसमें लगे लोगों की बहाली को अपनी प्राथमिकताओं में ऊपर रखे. लेकिन इसकी जगह इसने इस मुद्दे को टाल देना पसंद किया, जिसके लिए इसने समितियों और आयोगों के गठन की अपनी आजमाई हुई तरकीब की मदद ली. इससे पता लगता है इस मुद्दे को लेकर राज्य के सरोकार क्या हैं और इसी के साथ साथ किस तरह ये पूरे 46 बरस इससे निबटने से बचती रही.

खेल 1949 में ही शुरू हो गया था और अब भी जारी है. तब की बंबई सरकार ने 1949 में वी.एन. बर्वे की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जिसको स्कैवेंजर्स लिविंग कंडिशन्स इन्क्वायरी कमेटी के नाम से जाना जाता था. इसे सफाईकर्मियों की जीवन स्थितियों का अध्ययन और पड़ताल करना था और उनके काम की मौजूदा स्थितियों को बेहतर करने के रास्ते और साधनों के सुझाव देने थे. समिति ने 1952 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी. 1955 में गृह मंत्रालय ने इस समिति की मुख्य सिफारिशों की एक प्रति सभी राज्य सरकारों को यह गुजारिश करते हुए भेजी कि वे इन सिफारिशों को अपनाएं. लेकिन कुछ नहीं हुआ. 1957 में, गृह मंत्रालय ने खुद एन. आर. मल्कानी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की ताकि मैला साफ करने की प्रथा को खत्म करने के लिए एक योजना तैयार की जा सके. समिति ने 1960 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. इसकी सिफारिशों में से एक में यह सुझाव दिया गया था कि विभिन्न सिफारिशों को लागू करने के लिए राज्य और केंद्र सरकार को मिल कर चरणबद्ध योजना बनानी होगी ताकि इस प्रथा को तीसरी पंचवर्षीय योजना के अंदर ही खत्म किया जा सके. यह सुझाव अपनी मौत मर गया और 1965 में सरकार ने सफाईकर्मियों की जजमानी के खात्मे के सवाल की जांच-पड़ताल करने के लिए एक और समिति नियुक्त की. अपनी रिपोर्ट में समिति ने अपनी सिफारिशों में जजमानी के उस ढांचे को खत्म करने को कहा जिसमें नगर निगम से अलग निजी शौचालयों की सफाई सफाईकर्मियों की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को विरासत में मिलती रहती थी. यह सिफारिश भी ठंडे बस्ते में डाल दी गई. 1968-69 में राष्ट्रीय श्रम आयोग ने सफाईकर्मियों के कामकाज, सेवाओं और जीवन स्थितियों के नियमन के लिए व्यापक कानून बनाने की सिफारिश की. गांधी जन्मशती वर्ष (1969) के दौरान सूखे शौचालयों को फ्लश वाले शौचालयों में बदलने की एक विशेष योजना शुरू की गई लेकिन यह पांचवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान अपने पायलट स्टेज में ही नाकाम रही और इसलिए छठी योजना के दौरान इसे छोड़ दिया गया. 1980 में गृह मंत्रालय ने सूखे शौचालयों को बंद गड्ढों वाले सेनिटरी शौचालयों में बदलने और काम से छुटकारा पाए सफाईकर्मियों और उनके आश्रितों की चुने हुए शहरों में सम्मानजनक पेशों में बहाली की एक योजना शुरू की. 1985 में योजना को गृह मंत्रालय से कल्याण मंत्रालय के हाथों में दे दिया गया. 1991 में योजना आयोगन ने इसे दो हिस्सों में बांट दिया; शहरी विकास और ग्रामीण विकास के मंत्रालयों को सूखे शौचालयों को बदलने का जिम्मा दिया गया और कल्याण मंत्रालय (मई 1999 में इस मंत्रालय का नाम बदल कर सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय कर दिया गया) को सफाईकर्मियों की बहाली का जिम्मेदार बनाया गया. 1992 में कल्याण मंत्रालय ने सफाईकर्मियों और उनके आश्रितों के लिए मुक्ति और पुनर्वास की राष्ट्रीय योजना की शुरुआत की लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ. यह थोड़ा सा ब्योरा ही मैला साफ करने के इस घिनौने मुद्दे पर राज्य के दोमुंहेपन को उजागर करने के लिए काफी है.

आपराधिक अनदेखी

जैसा कि देखा जा सकता है, भारत के संविधान के अनुच्छेदों 14, 17, 21 और 23 को मैला साफ करने की प्रथा को रोकने के संदर्भ में लिया जा सकता है. मिसाल के लिए अनुच्छेद 17 को अमल में लाने के लिए लागू की गई नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (पहले इसे अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 के रूप में जाना जाता था) की धाराएं 7 ए और 15 ए सफाईकर्मियों को मुक्ति के प्रावधान मुहैया कराती हैं और जो लोग मैला साफ करने प्रथा को जारी रखे हुए हों, उनके लिए सजा का भी प्रावधान था. इस तरह यह दलील दी जा सकती है कि इम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राई लैट्रिन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट, 1993 की जरूरत नहीं थी. इस अधिनियम पर 5 जून, 1993 को राष्ट्रपति की मुहर लगी लेकिन यह भारत के राजपत्र (गजट) में 1997 तक प्रकाशित नहीं हो पाया और 2000 तक किसी भी राज्य ने इसकी घोषणा नहीं की थी. सरकार के लगातार बने हुए नाकारेपन से आक्रोशित एसकेए ने, जिसे सफाईकर्मियों के बच्चों ने 1994 में शुरू किया था, नागरिक समाज के छह दूसरे संगठनों और सफाईकर्मियों के समुदाय के सात व्यक्तियों के साथ मिल कर दिसंबर 2003 में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करनी पड़ी, जिसमें दिशानिर्देशों और सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की मांग की गई. एसकेए तो विभिन्न राज्य सरकारों के नकारने वाले रुख का मुकाबला 12 बरसों की लड़ाई के दौरान भारी मात्रा में आंकड़ों के साथ करना पड़ा, जिसके बाद आखिर में उसे 27 मार्च 2014 को सर्वोच्च न्यायालय से एक सहानुभूति से भरा फैसला हासिल हुआ.

अदालत ने बाकी बातों के अलावा सरकार को इस बात के निर्देश दिए कि 1993 से सफाई (सीवर की सफाई समेत) के दौरान हुई हरेक मौत पर 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाए. भीम यात्रा के दौरान 1268 ऐसी मौतें दर्ज की गई थीं, जिसमें से सिर्फ 18 को ही मुआवजा मिला था. एक साल पहले सरकार ने एक और अधिनियम में इजाफा किया, हाथ से मैला ढोने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 [प्रोहिबिशन ऑफ इम्प्लॉयमेंट एज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देअर रिहैबिलिटेशन एक्ट, 2013]. लेकिन जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया. जहां राज्य सरकारें 1993 अधिनियम की घोषणा के बाद इस प्रथा के वजूद से ही इन्कार करती रही हैं, 2011 की जनगणना में भारत भर में 794,000 मामले पाए गए हैं. इस कानून के सबसे बड़े उल्लंघनकर्ता सरकार के अपने ही विभाग हैं. मिसाल के लिए भारतीय रेल में ऐसे डिब्बे हैं जिनके शौचालयों से मल इसकी पटरियों पर गिरता है, जिसको अनगिनत सफाईकर्मियों द्वारा साफ किया जाता है. प्रधानमंत्री ने आडंबरपूर्ण तरीके से अपने स्वच्छ भारत अभियान के तहत भारत को 2019 तक मैला ढोने वालों से मुक्त करन देने की घोषणा तो की है, और वे भारत में बुलेट ट्रेन नेटवर्क लाने की बातें भी कर रहे हैं, लेकिन वे इसका कोई समय नहीं बता पाए हैं कि रेलवे कब तक अपने मौजूदा शौचालयों को बदल कर उनकी जगह जैव-शौचालय लाएगा.

यह बेपरवाही क्यों?

केंद्र सरकार के बयान में उनकी राजनीतिक इच्छा की कमी को साफ देखा जा सकता है, जो उन्होंने 19 अप्रैल को बजाहिर एसकेए की भीम यात्रा के जवाब में जारी किया है कि चूंकि वे राज्यों से आंकड़े नहीं जुटा पाए हैं, इसलिए वे किसी एजेंसी के जरिए देश भर में मैला साफ किए जाने की घटनाओं का सीधा सर्वेक्षण कराएंगे. इसका अंदाजा लगाने के लिए समझदार होना भी जरूरी नहीं है कि यह सर्वेक्षण संघर्षरत सफाई कर्मचारियों को थका देने के लिए सरकार को एक और दशक की तोहफे में दे देगा. लेकिन आखिर एक ऐसी सरकार अपने इस हमेशा से चले आ रहे शर्म के साथ जीना क्यों चाहती है, जो दुनिया भर के मामलों में एक नेतृत्वकारी भूमिका हासिल करने के सपने देख रही है? जवाब बहुत मुश्किल नहीं है. भारत में राजनीतिक इच्छा की बुनियाद में चुनावी गुणा-भाग होता है. सफाईकर्मियों का छोटा सा समुदाय निराशाजनक रूप से बिखरा हुआ है, वे हरेक जगह घेरे में बंद हैं. वे सिर्फ व्यापक समाज से ही नहीं बल्कि दलित समुदाय से भी अलग थलग हैं. अपने आप में यह समुदाय किसी भी राजनीतिक दल के चुनावी हिसाब-किताब के लिहाज से गैर अहम है. शासक वर्गों के लिए मुश्किल सिर्फ एक ही है और वो ये है कि यह एक राष्ट्रीय शर्म की बात है, जैसे कि शुरुआती सुधारकों के लिए छुआछूत हुआ करती थी. छुआछूत की तरह, मैला साफ करने की प्रथा सामंती संस्कृति से बंधी हुई है, जिसको छेड़ने का मतलब बहुसंख्यक समुदाय की नाराजगी को मोल लेना है. चूंकि ये छुआछूत के खात्मे के साथ हो चुका है, यह मैला साफ करने की प्रथा के खात्मे के साथ भी हो सकता है, जो असल में छुआछूत का ही सबसे गंभीर चेहरा है! बेहतर यही है कि उन्हें वक्त के भरोसे रख कर थका दिया जाए और साथ में एक चुनावी झुनझुना भी दे दिया जाए ताकि इस मुद्दे के साथ खेलना मुमकिन रहे.

इस तरह जहां इस समस्या पर शासक वर्ग के रुख को समझना आसान है, वहीं मैला साफ करने वाले कर्मचारियों के प्रति दलित आंदोलन की बेपरवाही कहीं ज्यादा उलझन में डालने वाली है. मुख्यधारा के दलित आंदोलन ने कभी भी उतनी गंभीरता से मैला साफ करने के मुद्दे को नहीं उठाया, जितनी गंभीरता की मांग यह करता है. दलित आंदोलन की बुनियादी रणनीति प्रतिनिधित्व की रही है. इसलिए बाबासाहेब आंबेडकर ने राजनीति में आरक्षण को हासिल किया और इसके बाद इसे सार्वजनिक रोजगार में भी लागू किया (क्योंकि रोजगार के लिए शिक्षा पूर्वशर्त है). उन्होंने उम्मीद की थी कि दलित राजनेता दलित जनता के राजनीतिक हितों की हिफाजत करेंगे और नौकरशाही में दाखिल होनेवाले ऊंची शिक्षा पाए दलित उनके लिए एक बचाव की ढाल का काम करेंगे. इस तरह, दलित जनता की भौतिक समस्याओं से सीधे तौर पर नहीं निबटा गया. इसलिए आरक्षण दलित आंदोलन की अकेली चिंता बन गई जिसने मेहनत करनेवाले दलितों से जुड़े मुद्दों से दूरी बना ली. पिछले सात दशकों में दलितों में मध्य वर्ग की जो एक पतली सी परत वजूद में आई है, उसने सचमुच में खुद को दलित जनता से अलग कर लिया है और इसे अपनी एक सनक में तब्दील कर दिया है.

यह बात आंखें खोल देने वाली थी कि भीम यात्रा में एक भी ‘आंबेडकरी’ इसके आसपास नहीं देखा गया जबकि इसके एक प्रेरक प्रतीक के रूप में अंबेडकर की प्रभावशाली मौजूदगी वहां थी. सभी उल्लेखनीय प्रगतिशील व्यक्तियों ने गरीब सफाईकर्मियों के संघर्ष के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, लेकिन स्वयंभू अंबेडकरी ही वो खास लोग थे जो वहां से नदारद थे.

An Interview with Anand Teltumbde on Current Student Struggles

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/13/2016 04:25:00 PM


A Malayalam Weekly Madhyamam, asked Anand Teltumbde, a writer, scholar of peoples’ movements, civil rights activists with CPDR (Mumbai), inter alia two questions relating to the student movements. Here are his answers:

Question: The article by you in EPW in October 2015 has succinctly captured the perils of raising memorials of Dr BR Ambedkar while forgetting the principle aim of his life – the annihilation of caste. The Rohit Vemula incident in the University of Hyderabad and the subsequent incidents across the country have proved beyond doubt that the annihilation of caste, the kernel of Ambedkar’s thought, remains an unfulfilled dream. What is your view on this?  

Answer: Indeed. While Ambedkar had clearly seen annihilation of castes as the goal; his tactic relied on representation. I am deliberately calling it as a tactic to dampen the intensity of contradiction between the two. Right from the beginning he saw, perhaps encouraged by his own example, that if a few Dalits are sent to legislature, they would take care of the interests of the dalit masses. With this view, he struggled to get Dalits their political representation. It is a different matter that his victory was annulled by Gandhi’s blackmailing strategy that compelled him to sign the Poona Pact. But the very Poona Pact opened up avenue for other reservations, viz., in educational institutions and public employment. Initially they remained as preferment policies as it was thought that there were not enough Dalits to institute reservation for them. But when Ambedkar became a member of the Viceroy’s executive council, he wrote an innocuous note, which was approved by the Viceroy thereby instituting a quota system in 1943. I may argue that there was no contradiction between the two as the castes were delinked from their Hindu parentage and had become an administrative category ‘Scheduled Castes’. Unfortunately, there was no articulation to that effect. In the post-colonial India, the native elites who took over the reins of power, with their Brahmanic cunning overlain on the learning from the colonial masters, could easily ensure the castes and religion (the other factor), were consecrated in the constitution, as weapons to divide people. Reservations based on castes became the contradiction with the annihilation of castes, inasmuch as they developed vested interests in a section of upwardly looking Dalits, that role-modelled for the masses. The other supplementing factor was the First-Past-the-Post type of election system, arguably the most unsuitable system for a country like India which was hopelessly fragmented into castes, communities, languages, ethnicities, etc., that was adopted as an instrument for democratic governance. The combination of these two became a deadly fortification against the annihilation of castes.

The HU episode and the unfortunate suicide of Rohith highlight rather the attitude of the ruling classes which are desperate as never before to woo dalits on their side. While they are pursuing it, staking everything in promoting Ambedkar as the icon, they would not tolerate the radical Dalit opinion to emerge. Rohit symbolized the latter. They would label them as extremist, anti-national, etc. which are enough even for the Dalits to discard them. The Dalit masses under the influence of their middle class subtly supported by the state have simplified Ambedkar. One of the notions of this simplified Ambedkar was that he was against any type of extremism or radicalism. With this notion, they would also easily disown the dalit youth who raise radical voices. Rohith’s death actually stirred up emotions but still not awakened Dalits to its radical content that points towards annihilation of castes. Notwithstanding the massive support it received from all student organizations, which at one point, completely isolated the ABVP, it is being steered along the identity sans radical possibilities.        

Question: The Rohit Vemula incident and the struggle in JNU have brought the possibility of alliance between Left and Ambedkarite movements at least in the campuses. Do you think that the new found bonhomie between the two streams can be consolidated to make an effective challenge and counter to the communalism of BJP and Sangh Parivar.   

Answer: I, for one, think that the youth in our campuses can be the only force who can clear the ideological mess in the politics of the oppressed masses. The signs emerging from our campuses are quite encouraging. HU episode was part of the BJP strategy to polarize students raising the bogey of anti-nationalism, extremism, etc. They chose the HU because it had become center for radical voices of Dalit students. If they succeeded there, it would be a cake walk for their student wing to capture other campuses and particularly make inroads into Dalit students. But to their misfortune, the whole thing turned topsy-turvy with Rohith’s unfortunate death. Taking caution, they chose JNU and engineered similar thing but without Dalit factor. There it was pure anti-nationalism, patriotism, etc. But it created Kanhaiya there. The best thing the JNU students did is to claim continuity with the Rohith’s struggle. It overwhelmed the ideological divisions (I call mess) and oriented it to the burning questions faced by the masses today. I will give full marks to Kanhaiya for doing so as I think that should be the approach of the peoples’ struggle today. Neither Marx nor Ambedkar, least anyone else, can provide you complete wherewithal to fight the ruling classes, who are unprecedentedly powerful with their states laced with learning and modern technology. The world that we live in would not be recognized by either Marx or Ambedkar and hence we will have to configure strategies for our struggles ourselves. Marx, Ambedkar, and many such greats may guide us, inspire us but cannot provide us readymade tools and tackles for our battles.

There may be hiccups in this process. For instance, when all student organizations had come together in HU, I had suggested some leading elements of students there to give it an organizational shape to it isolating ABVP. It could have been a Front against Hindutva or Communalism or any such name. It could have been easily done when things were hot in HU, to be replicated elsewhere eaily, but unfortunately it did not happen. I kept following it in my own way but to no avail. Instead, the Joint Action Committees (JACs) formed for ‘Justice to Rohith’ began subtly deflecting along the old identity lines providing impetus to the reactionary elements who would identify Kanhaiya as Bhumihar. Nothing could be more unfortunate in the current context. But still I am confident that the students will overcome these hiccups. There will be many more hurdles in the way. For instance, the ruling classes have awarded harsh punishments to JNU students against which they are currently on hunger strike. They will realize what best to do tomorrow. I am confident they will defeat the evil designs of BJP/ABVP combine. With regard to striking unity between Ambedkar and Marx, the JNU students are on absolutely right path to do that. The approach they adopted would render irrelevant the casteist arguments of Mayawatis and her chelas. I am quite hopeful that these boys and girls will do what has not been done so far. For if they fail there, the hope itself would die for India!

मौजूदा छात्र संघर्षों पर आनंद तेलतुंबड़े से एक बातचीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/08/2016 03:50:00 PM




जनवादी अधिकार कार्यकर्ता और चिंतक आनंद तेलतुंबड़े ने यह इंटरव्यू हाल ही में मलयालम साप्ताहिक माध्यमम को दिया था.  अनुवाद: रेयाज उल हक
 

सवाल: आपने अक्तूबर 2015 के ईपीडब्ल्यू में अपने लेख में इसे सटीक तरीके से दर्ज किया है कि डॉ. बीआर आंबेडकर की जिंदगी के मुख्य मकसद जाति के खात्मे को भुला कर उनके स्मारक खड़े करने के क्या खतरे हैं. हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहिथ वेमुला का हादसा और फिर देश भर में उसके बाद हुई घटनाओं ने बिना किसी संदेह के इसे साबित कर दिया कि जाति का जो खात्मा आंबेडकर के विचारों का मर्म था, वो अभी भी अधूरा सपना बना हुआ है.

जवाब: सचमुच ऐसा ही है. जबकि आंबेडकर ने साफ साफ जातियों के उन्मूलन को लक्ष्य के रूप में देखा था; उनकी कार्यनीति (टैक्टिक्स) प्रतिनिधित्व पर निर्भर थी. इन दोनों के बीच जो तीखा विरोधाभास है उसे नरम करने के लिए मैं जानबूझ कर इसे
कार्यनीति कह रहा हूं. शुरू से ही उन्होंने देखा और शायद उन्हें अपने खुद के अनुभवों से हौसला भी मिला था कि अगर कुछ दलितों को कानून बनानेवाली संस्थाओं (विधायिका) में भेजा गया तो वे दलित जनता के हितों का खयाल रखेंगे. इस नजरिए के साथ, उन्होंने दलितों के लिए उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए संघर्ष किया. यह अलग बात है कि इस जीत को गांधी की ब्लैकमेलिंग की रणनीति ने नाकाम कर दिया, जिसने उन्हें पूना समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर कर दिया. लेकिन इसी पूना समझौते ने जैसे शैक्षणिक संस्थाओं और सार्वजनिक रोजगारों जैसे दूसरे आरक्षणों की राह खोल दी. शुरू शुरू में वे तरजीही नीतियां बने रहे (जिसमें कुछ लोगों को आगे बढ़ाने में तरजीह दी जाती थी) क्योंकि ऐसा माना गया कि आरक्षण को संस्थागत बनाने के लिहाज से उतने दलित नहीं थे. लेकिन जब आंबेडकर वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य बने, तो उन्होंने एक सीधा-सा नोट लिखा, जिसे वायसराय ने मंजूर कर लिया और इस तरह 1943 में एक कोटा सिस्टम लागू हुआ. मैं यह दलील दे सकता हूं कि इन दोनों में कोई विराधाभास नहीं था, क्योंकि जातियों को उनके हिंदू कुनबे से अलग कर दिया गया था और अब वे ‘अनुसूचित जातियों’ की एक प्रशासनिक श्रेणी बन गई थीं. बदकिस्मती से, नतीजा इसी अर्थ में सामने नहीं आया. उपनिवेशवाद के बाद के भारत में, जिन देशी अभिजातों के हाथ में सत्ता की बागडोर आई, उनके पास ब्राह्मणवादी चालाकी और उसके भीतर औपनिवेशिक मालिकों से सीखी गई तरकीबें थीं और वे आसानी से इस बात को यकीनी बना सके कि संविधान में प्रतिष्ठित जातियां और धर्म (एक दूसरा कारक) अवाम को बांटने का एक हथियार बने रहें. जातियों पर आधारित आरक्षण जातियों के उन्मूलन का विरोधाभासी बन गया, क्योंकि इसने ऊपर जाने की उम्मीद कर रहे दलितों के एक तबके में निहित स्वार्थ विकसित कर दिए, और फिर यह अवाम के लिए एक आदर्श (रोल मॉडल) बन गया. इसमें मदद किया चुनाव की फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट की व्यवस्था ने, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को प्रतिनिधि चुन लिया जाता है. यह असल में भारत जैसे एक देश के लिए सबसे प्रतिकूल व्यवस्था है, जो निराशाजनक रूप से जातियों, समुदायों, भाषाओं, जातीयताओं वगैरह में बंटा हुआ था और यहां इस व्यवस्था को लोकतांत्रिक शासन के एक औजार के रूप में अपनाया गया. इन दोनों का मेल जातियों के खात्मे के खिलाफ एक खतरनाक मोर्चाबंदी बन गया.

हैदराबाद विश्वविद्यालय में हुई घटनाओं और रोहिथ की बदकिस्मत खुदकुशी ने शासक वर्गों के रवैए को साफ-साफ उजागर किया है, जो दलितों से पिछले किसी भी समय के मुकाबले सबसे ज्यादा प्यार दिखा रहे हैं. और जब वे यह सब कर रहे हैं और सब कुछ को दांव पर लगा कर आंबेडकर को एक प्रतीक के रूप में स्थापित कर रहे हैं, वहीं वे रेडिकल दलित नजरिए के उभरने को बर्दाश्त नहीं करेंगे. वो उन्हें उग्रवादी, राष्ट्र-विरोधी वगैरह कह कर बदनाम करेंगे, और यह इसके लिए काफी है कि दलित उन्हें नकार दें. दलित जनता ने, राज्य के छिपे हुए समर्थन से अपने मध्य वर्ग के असर में आंबेडकर का सरलीकरण कर दिया है. इस सरलीकृत आंबेडकर की एक धारणा यह है कि वे किसी भी तरह के उग्रवाद और रेडिकलिज्म के खिलाफ थे. इस धारणा के साथ वे आसानी से उन दलित नौजवानों को खारिज कर देंगे, जो रेडिकल आवाजें उठाते हैं. रोहिथ की मौत ने असल में भावनाओं को झकझोरा, लेकिन वो अभी भी दलितों में अपना रेडिकल संदेश नहीं जगा पाया जो जातियों के खात्मे की बात करता है. सभी छात्र संगठनों से मिले भारी समर्थन के बावजूद, जिसने एक वक्त पर एबीवीपी को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया था, इसको रेडिकल संभावनाओं के बिना बस पहचान (आइडेंटिटी) के आधार पर ही उठाया जा रहा है.

सवाल: रोहिथ वेमुला के हादसे और जेएनयू में संघर्ष ने कम से कम कैंपसों में वामपंथ और आंबेडकरी आंदोलनों के बीच गठबंधन की संभावनाओं को पेश किया है. क्या आप सोचते हैं कि दोनों धाराओं के बीच बनी इस नई नई करीबी को भाजपा और संघ परिवार की सांप्रदायिकता को कारगर तरीके से चुनौती देने और उसका मुकाबला करने के लिए एक संगठित शक्ल दी जा सकती है.

जवाब: बेशक, मैं सोचता हूं कि हमारे कैंपसों के नौजवान ही वो अकेली ताकत हो सकते हैं जो उत्पीड़ित अवाम की राजनीति की विचारधारात्मक गड़बड़ियों को साफ कर सकते हैं. हमारे कैंपसों से आने वाले संकेत खासे हौसला बढ़ाने वाले हैं. हैदराबाद विवि का मामला भाजपा की रणनीति का हिस्सा था कि राष्ट्रवाद-विरोध, उग्रवाद वगैरह के हौवे को खड़ा करके छात्रों को दो अलग अलग खेमों में बांट दिया जाए. उन्होंने हैदराबाद विवि को चुना क्योंकि यह दलित छात्रों की रेडिकल आवाजों का केंद्र बन गया था. अगर वो यहां कामयाब रहे तो उनके छात्र संगठन के लिए दूसरे कैंपसों में और खास कर दलित छात्रों के बीच जगह बनाना बहुत आसान हो जाएगा. लेकिन उनकी बदकिस्मती से, रोहिथ की बदकिस्मत मौत ने पूरे मामले को पलट दिया. फिर सावधानी बरतते हुए उन्होंने जेएनयू को चुना और उन्होंने ऐसा ही मामला वहां गढ़ा, लेकिन इससे दलित पहलू को बाहर रखा. वहां यह सिर्फ राष्ट्रवाद-विरोध, देशभक्ति वगैरह का मामला था. लेकिन इसने वहां कन्हैया पैदा कर दिया. जेएनयू छात्रों ने जो सबसे अच्छी बात की, वो ये थी कि उन्होंने इसे रोहिथ के संघर्ष के साथ जोड़ दिया. इसने विचारधारात्मक बंटवारों (मैं इसे गड़बड़झाला कहूंगा) को दबा दिया और संघर्ष को उन सवालों पर टिकाया, जिनका सामना आज जनता कर रही है. ऐसा करने के लिए मैं कन्हैया को पूरे अंक दूंगा क्योंकि मैं सोचता हूं कि जनसंघर्षों का आज यही तरीका होना चाहिए. मार्क्स और आंबेडकर में से कोई भी (किसी और को तो छोड़ ही दीजिए) आपको इन शासक वर्गों से लड़ने के सारे साधन नहीं दे सकता है, जिनका जानकारियों और आधुनिक तकनीक से लैस राज्य
अभूतपूर्व ढंग से ताकतवर है. हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, उसे न तो मार्क्स ही पहचान पाएंगे और न आंबेडकर और इसलिए हमें अपने संघर्षों के लिए अपनी रणनीतियां खुद बनानी होंगी. मार्क्स, आंबेडकर और उनके जैसे अनेक महान लोग हमें राह दिखा सकते हैं, हमें प्रेरणा दे सकते हैं लेकिन हमें अपनी लड़ाइयों के लिए बने बनाए औजार और साज-सामान नहीं मुहैया करा सकते.

इस प्रक्रिया में मुश्किलें आ सकती हैं. मिसाल के लिए, जब हैदराबाद विवि में सभी छात्र संगठन एक साथ आए, तो मैंने वहां छात्रों के कुछ नेतृत्वकारी लोगों को सलाह दी थी कि एबीवीपी को अलग करके इस एकता को एक संगठनात्मक शक्ल दें. यह हिंदुत्व या सांप्रदायिकता के खिलाफ मोर्चा या ऐसा ही कोई नाम हो सकता था. यह बड़ी आसानी से हो सकता था, जब हैदराबाद विवि में लोहा गर्म था और फिर उसको आसानी से दूसरी जगह अपनाया जा सकता था. लेकिन बदकिस्मती से ऐसा नहीं हो पाया. मैंने अपने तरीके से इसमें कोशिश की, लेकिन वह कारगर नहीं रही. इसकी जगह पर ‘जस्टिस टू रोहिथ’ के लिए बनाई गईं ज्वाइंट एक्शन कमेटियां धीरे धीरे और भीतर ही भीतर पहचान (आइडेंटिटी) की पुरानी लीक पर चलने लगीं जिन्होंने प्रतिक्रियावादी तत्वों का हौसला बढ़ाया कि वे कन्हैया को भूमिहार के रूप में देखें. मौजूदा हालात में इससे ज्यादा बदकिस्मत बात कुछ नहीं हो सकती है. लेकिन अभी भी मुझे इसका भरोसा है कि छात्र इन मुश्किलों को पार कर लेंगे. इस राह में अनेक और बाधाएं हो सकती हैं. मिसाल के लिए, शासक वर्ग ने जेएनयू के छात्रों पर कड़ी सजाएं थोप दी हैं, जिसके खिलाफ वे भूख हड़ताल पर हैं. उन्हें इसका अहसास होगा कि आने वाले कल में क्या करना बेहतर होगा. मुझे यकीन है कि वे भाजपा/एबीवीपी की मिली जुली शैतानी साजिशों को हरा देंगे. जहां तक आंबेडकर और मार्क्स के बीच अनोखी एकता की बात है, जेएनयू के छात्र इस मामले में एकदम सही रास्ते पर हैं. उन्होंने जो तरीका अपनाया है, वो मायावतियों और उनके चेलों की जातिवादी दलीलों को अप्रासंगिक बना देगा. मुझे इसको लेकर खासी उम्मीद है कि ये लड़के और लड़कियां वह करेंगे जो अब तक नहीं किया गया है. क्योंकि अगर वे नाकाम रहे, तो भारत के लिए उम्मीद ही खत्म हो जाएगी.

शैतानों का खुला खेल: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/14/2016 08:11:00 AM


मौजूदा फासीवादी राज्य, सत्ताधारी पार्टी और आरएसएस में बाबासाहेब आंबेडकर को अपना बताने और उन्हें अपनाने की सोची-समझी और एक शातिर बेचैनी दिख रही है. इसके लिए झूठ पर झूठ रचे जा रहे हैं. लेकिन आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि कैसे बाबासाहेब आंबेडकर इस राज्य, भाजपा और आरएसएस का प्रतिनिधित्व करने वाली हर चीज के खिलाफ खड़े होते हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक

खुद को संविधान का निर्माता कहे जाने के खिलाफ राज्य सभा में अपने गुस्से पर बाद में बोलते हुए बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था, ‘हमने भगवान के लिए एक मंदिर बनाया...लेकिन उसमें भगवान की स्थापना हो पाती, इसके पहले ही शैतान ने आकर उस पर कब्जा कर लिया.’ कांग्रेस पर इस बात का इल्जाम लगाते हुए कि उसने उन्हें किराए के लेखक के रूप में इस्तेमाल किया था, उन्होंने न सिर्फ संविधान से खुद को अलग कर लिया था बल्कि इसे बेकार बता कर खारिज भी कर दिया था. तब से लेकर अब तक शासकों की शैतानियत में इजाफा ही हुआ है. अगर पिछले कुछ महीनों की घटनाओं को देखने के लिए आंबेडकर जिंदा होते, तो या तो वे हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) के रोहिथ वेमुला बन गए होते और गुस्से में खुदकुशी कर ली होती, या फिर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कन्हैया कुमार, उमर खालिद या अनिर्बाण भट्टाचार्य हो गए होते और उन पर राजद्रोह और राष्ट्र-विरोधी होने का इल्जाम लग गया होता.

कहने का मतलब ये नहीं है कि कुछ महीने पहले तक चीजें बहुत अलग थीं. यह तथ्य कि आंबेडकर का भ्रम टूटने में तीन साल भी नहीं लगे, जिन्हें अपनी उपलब्धियों को लेकर इतनी उम्मीदें थीं कि उन्होंने अपने अनुयायियों से गुजारिश की थी वे विरोध के तरीके छोड़ दें और अपने खिलाफ नाइंसाफियों को खत्म करने के लिए सिर्फ संवैधानिक तरीके ही अपनाएं, दिखाता है कि चीजें तब से ही इस कदर खराब थीं जब से देशी लोगों ने सत्ता की लगाम अपने हाथ में ली थी. उन्होंने औपनिवेशिक शासन को एक शैतानी चेहरा दिया, जिसने पहली बार जातियों के नासूर वाली इस जमीन पर वह चीज स्थापित की थी, जिसे कानून का शासन कहते हैं और अवाम में अधिकारों को लेकर सजगता और लोकतंत्र के बीज बोए थे. नए शासकों ने औपनिवेशिक शासन के ऊपरी ढांचे को बुनियादी रूप से अपना लिया, जिसमें अच्छी लगने वाली संवैधानिक बातों की सजावट की गई थी, लेकिन उन्होंने इसके पश्चिमी उदारवादी मर्म की जगह अपनी ब्राह्मणवादी मक्कारी को लाकर बिठा दिया, जिसने कारगर तरीके से हर चीज का मतलब बदल दिया: लोकतंत्र मुट्ठी भर लोगों का शासन हो गया; पूंजीवाद, समाजवाद बन गई; आजादी गुलामी में तब्दील हो गई; धर्मनिरपेक्षता, हिंदुत्व में और इसी तरह दूसरी तमाम चीजें. उपनिवेशवाद के बाद के बरसों में यह सब कुछ जहां ढंके-छिपे तरीके से हो रहा था, केंद्र की सत्ता में भाजपा के उभार के साथ और इस बार साफ बहुमत के साथ आते ही, सारे मुखौटों को उतार फेंका गया है ताकि अवाम को सत्ता का नंगा चेहरा दिखाया जा सके.

झूठ बोलने की कला
 

11 से 13 मार्च तक चली स्वयंभू गुरु श्री श्री रवि शंकर के तीन दिनों की बेतुकी सांस्कृतिक तड़क-भड़क बिना किसी रुकावट के आखिरकार समापन को पहुंची और इसका समापन किसी और के नहीं बल्कि खुद धर्मनिरपेक्ष भारत के प्रधानमंत्री के हाथों हुआ, जिन्होंने यहां आकर इसे अपना समर्थन दिया और सरेआम उन आलोचकों को फटकारा जिन्होंने इस आयोजन से यमुना पुश्ता को होने वाले पर्यावरणीय नुकसानों और दूसरे अनुचित कामों के बारे में गंभीर सवाल उठाए थे. यह पर्यावरण को लेकर उत्साही कुछ लोगों द्वारा खड़ा किया गया कोई विवाद भर नहीं था बल्कि कानून का एक खुल्लमखुल्ला उल्लंघन था और यहां तक कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की संवैधानिक सत्ता की नाफरमानी भी थी जिसने सत्ता के करीब रहने के इस गंदे प्रदर्शन पर सवाल उठाए थे. जब विवाद खड़ा हुआ, अनेक तथ्य अवाम के सामने उजागर हुए: कि कैसे आयोजकों की हरेक मांग को सरकारी अधिकारियों द्वारा मान लिया गया था. शहरी विकास मंत्रालय के तहत दिल्ली विकास प्राधिकरण ने एक अधूरी दरख्वास्त के आधार पर आयोजन की मंजूरी दी थी, जिसमें तथ्यों को बड़े पैमाने पर छुपाया गया था. एनजीटी पारिस्थितिकी के लिहाज से नाजुक यमुना पुश्ता के इलाके में किसी भी आयोजन के खिलाफ रहा है. उसने आईआईटी दिल्ली के एके गोसाईं की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट के आधार पर आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन से मांग की कि वो नुकसानों की भरपाई के लिए 120 करोड़ रुपए जमा करे. आयोजकों ने इसकी अनदेखी कर दी. अगली दफे एनजीटी ने रकम को बेहद कम करते हुए महज 5 करोड़ कर दिया, लेकिन श्री श्री ने इसको देने से भी इन्कार कर दिया और धमकी दी कि वे एक पैसा भी चुकाने के बजाए वे जेल जाना पसंद करेंगे. हालांकि बाबा ने अपनी बात वापस ली और 25 लाख रुपए चुकाए जिसे एनजीटी ने अपना मान रखने के लिए कबूल कर लिया. एनजीटी के पास इस मामले में काफी ताकत हासिल थी और उसके द्वारा अपना रुख बदलते जाना यह दिखाता है कि शैतान से आपकी करीबी आपको किस तरह किसी भी तरह की परेशानी से बचा सकती है.

उतना ही गंभीर मुद्दा और शायद उससे ज्यादा बुरे संकेतों वाली बात इस आयोजन के लिए  पीपा पुल बनाने के लिए फौज को बुलाया जाना है, जो असल में एक निजी आयोजन था. सेवारत और रिटायर हो चुके फौजी जनरलों तथा नागरिकों ने इस तरह फौजी इंजीनियरों और जंगी साज-सामान के दुरूपयोग के खिलाफ विरोध किया, लेकिन शैतानों पर इसका कोई असर नहीं हुआ. रूलबुक (रेगुलेशंस फॉर द आर्मी, पैराग्राफ 301, पेज 100) उन्हें इस बात का अधिकार देती है कि वो नागरिक अधिकारियों की मदद के लिए सेना को बुला सकें, लेकिन उनमें उन हालात का साफ साफ ब्योरा दिया गया है, जिनमें ऐसा किया जा सकता है, जैसे कि कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए; बुनियादी सेवाओं को कायम रखने के लिए; भूकंप और बाढ़ जैसी कुदरती आपदाओं के दौरान; और किसी भी दूसरी तरह की मदद जिसकी जरूरत नागरिक पदाधिकारियों को पड़ सकती है. इसमें से कुछ भी श्री श्री के सांस्कृतिक तमाशे पर लागू नहीं होता था, बस आखिरी वाली स्थिति को छोड़ कर जिसमें लगभग हर तरह की आकस्मिक स्थिति शामिल है और जिसे बजाहिर तौर पर रक्षा मंत्री द्वारा इस्तेमाल किया गया. हालांकि रूलबुक की ओट में मुंह छुपाए जाने के बावजूद अवाम की निगाहों से यह बात छिपी नहीं रह सकी कि यह एक सियासी उपकार था. श्री श्री संघ परिवार के घरेलु गुरु के रूप में सामने आए हैं और उन्होंने पिछले चुनावों में मोदी के लिए अपने समर्थन को कोई राज नहीं रहने दिया था. हालांकि फौजी जनरल (मिसाल के लिए वी.के. सिंह) हिंदुत्व के समर्थक रहे हैं, लेकिन इसके पहले कभी किसी राजनीतिक सत्ता ने सेना को एक राजनीतिक औजार के रूप में इस तरह खुल्लमखुल्ला उसका दुरुपयोग नहीं किया था. यहां तक कि भारतीय लोकतंत्र का यह आखिरी हथियार भी अनछुआ नहीं रह गया!

शैतान के लंगोटिए यार
 

बेशक रवि शंकर हिंदुत्व गिरोह से ताल्लुक रखते हैं. उनका आर्ट ऑफ लिविंग एक कारोबारी संगठन है जो हिंदू धर्म से ली गई कच्ची सामग्री से बने आध्यात्मिक उत्पादों को दुनिया में बेचता है. यमुना का मेला हिंदू धर्म की ताकत को दिखाने का ऐसा ही एक बाजारी आयोजन था. ऐसे एक आयोजन को राज्य की मदद अगर और कुछ नहीं तो कम से कम संविधान का उल्लंघन तो थी ही. प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के दुराचारों को छुपाने के लिए इसकी तुलना कुंभ मेले से कर दी, मानो एक गलती को दूसरी गलती से ढंका जा सकता है. जहां तक कुंभ मेले को कानून-व्यवस्था से परे जाकर राज्य द्वारा मदद दिए जाने की बात है, वह भी संवैधानिक रूप से निंदनीय है, इस अहंकारी मेले की तो कुंभ मेले से किसी भी तरह तुलना नहीं हो सकती थी. कुंभ मेला भोली-भाली जनता की धार्मिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है जिसको सरकार संविधान में बताए गए तरीके से वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देकर कमजोर कर सकती थी. लेकिन इसके बजाए, इसने उसके लिए सुविधाओं में इजाफा करके उन्हें मजबूत ही किया है. शैतान लोग संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा की हत्या करने के गुनहगार रहे हैं और ये हत्या उन्होंने बाबाओं और गुरुओं, साध्वियों और संतों की फौज के जरिए रूढ़िवाद को बढ़ावा देते हुए की है.

शैतानों के लंगोटिए यारों के एक दूसरे किस्म के गिरोह के नुमाइंदे विजय माल्या हैं: जनता के पैसे पर सुख भोगने वाले परम सुखवादी. माल्या के कर्जे 2011 में नन परफॉर्मिंग असेट्स बन गए थे, उन्हें पहले कोलकाता स्थिति यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया द्वारा सितंबर 2014 में इरादतन दिवालिया घोषित किया गया लेकिन ये बहुत दिनों तक नहीं कायम रह सका क्योंकि कोलकाता उच्च न्यायालय ने बैंक की इस घोषणा को अवैध ठहरा दिया. यह साहसिक कदम उठाने वाले बैंक के उस ईमानदार कार्यकारी निदेशक पर विभिन्न कार्यालयों ने आरोपों की बौछार कर दी और उसे तंग किया जाता रहा और मार्च 2015 में उसके रिटायर होने पर उसकी पेंशन तक रोक दी गई. बाद में भारतीय स्टेट बैंक और पंजाब नेशनल बैंक ने भी माल्या को इरादतन दिवालिया घोषित कर दिया. रवि शंकर की ही तरह, माल्या पर भी न सिर्फ बैंक कर्जों और कर्मचारियों के वेतन के भुगतान का बकाया था, बल्कि आयकर, सेवा कर और भविष्य निधि की रकमों का वैधानिक बकाया भी था, जिनके लिए उसे आसानी से गिरफ्तार किया जा सकता था. लेकिन शैतानों ने न सिर्फ उसे आम राय का उल्लंघन करते हुए खुला छोड़ रखा था, बल्कि उसे राज्य सभा का सदस्य भी बन जाने दिया. उसके देश छोड़ कर चले जाने के बाद जो नाटक हुआ, वो अप्रासंगिक ब्योरे को लेकर था और इसने इस बुनियादी तथ्य को दबा दिया कि क्यों सरकार ने उसके द्वारा अंजाम दिए गए ठोस अपराधों के लिए उसे पहले ही गिरफ्तार नहीं कर लिया था. इत्तेफाक से माल्या न तो अकेला ऐसा दिवालिया था न ही वह उनमें से सबसे बड़ा है, और न ही सरकारों के साथ गलबंहिया करने वाले पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) की सड़ांध पहली बार उजागर हुई है. भारत में, पूंजीपति लोग उत्पादक पूंजी में निवेश नहीं करते; वे शैतान के साथ रिश्तों में पैसा लगाते हैं जिससे उन्हें जनता का पैसा बेधड़क लूटने की छूट मिल जाती है. आईसीआईसीआई सेक्योरिटीज की 16 मार्च 2015 की एक रिपोर्ट के मुताबिक बैंकों की कुल समस्याग्रस्त परिसंपत्ति 10.31 लाख करोड़ है और इनमें सबसे ज्यादा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की परिसंपत्तियां हैं. एसबीआई उनमें से सबसे बड़ी है, जिसकी कुल कीमत का 60 फीसदी और इंडियन ओवरसीज़ बैंक की कुल कीमत का 221 फीसदी समस्याग्रस्त परिसंपत्तियों में शामिल है.

शैतान बनाम अवाम
 

रवि शंकर और माल्य उस शैतानियत के महज चेहरे हैं, जिसके बारे में आंबेडकर ने आधी सदी पहले बात की थी. असली तकलीफें अवाम सहती है जिसके बारे में माना जाता है कि वो इस मुल्क की संप्रभु सत्ता है लेकिन जिसे एक ऐसा लाचार जीव बना कर छोड़ दिया गया है जो बस शैतान के रहमोकरम पर ही जिंदा रह सकती है. अवाम की मुसीबतों की सबसे सटीक झलक उन घटनाओं में देखी जा सकती है, जो अभी छत्तीसगढ़ में घट रही हैं. यहां राज्य और माओवादी करार दिए गए आदिवासियों के बीच एक तरह की जंग चल रही है.

शैतानों ने माओवादियों की इतनी बुरी सूरत पेश की है कि उन्हें आम अवाम के नुमाइंदे के बारे में कबूल करना तो दूर, उन्हें इंसानों के रूप में भी नहीं लिया जा सके. बस्तर की एक आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी की दास्तान ऐसी ही एक दास्तान है जो एक माओवादी समर्थक नहीं बल्कि पिछले चुनावों में आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार थीं. उनका अकेला अपराध ये था कि उन्होंने अपने जैसी आदिवासी जनता पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई. पहले उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें यौन यातनाएं दी गईं. अब वे एक जानी-मानी शख्सियत हैं और हाल ही में उनके चेहरे पर कोई केमिकल फेंक कर उनके चेहरे को बिगाड़ दिया गया. उनके बुजुर्ग पिता, उनकी बहन और उनके पूरे परिवार को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें इस कदर परेशान किया गया है कि उनके पत्रकार भतीजे को सरेआम खुदकुशी करने की धमकी देनी पड़ी.

महिला वकीलों के एक संगठन जगदलपुर लीगल एड ग्रुप का मामला भी शैतानियत की इस हुकूमत की एक निशानी है, जो जुलाई 2013 से लगातार आदिवासों को मुफ्त में कानूनी मदद मुहैया कराता आ रहा है. प्रशासन ने इसके बारे में प्रचार किया कि यह एक ‘नक्सली संगठन’ है. इसकी वकीलों को पुलिस के एक हत्यारे समूह सामाजिक एकता मंच द्वारा ‘खून के प्यासे नक्सलियों’ को बचानेवाली वकीलों के रूप में सरेआम पीटा गया. यह मंच बदनाम सलवा जुडूम का एक और भी खतरनाक रूप है. उनके खिलाफ बेनाम शिकायतें करके उन्हें परेशान किया गया. स्थानीय बार असोसिएशन ने उन्हें बाहरी बता कर प्रैक्टिस करने पर पाबंदी लगा दी. वे प्रैक्टिस करने के लिए राज्य बार काउंसिल से एक अंतरिम आदेश हासिल करने में कामयाब रहीं. लेकिन इस साल फरवरी से पुलिस ने उनके मकान मालिकों पर दबाव डालने और उनकी मदद करने वाले लोगों को तंग करने की एक नई तरकीब अपनाई है जिसकी वजह से उन्हें जगदलपुर छोड़ देने पर मजबूर होना पड़ा. संविधान (अनुच्छे 39ए) राज्य को इसकी जिम्मेदारी देता है कि वो अपने नागरिकों के लिए कानूनी मदद को यकीनी बनाए, लेकिन शैतान इसकी इजाजत नहीं देगा. एक और बाहरी, स्क्रॉल डॉट इन के एक पत्रकार को भी इसी तरह परेशान किया गया और उसे बस्तर छोड़ने पर मजबूर किया गया, जिसने आदिवासियों के मुद्दों, पुलिस की बेरहमी, हाल में इलाके में सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी औरतों के खिलाफ की गई यौन हिंसा की व्यापक रूप से खबरें दी थीं.

और यह सब आंबेडकर के संविधान के नाम पर हो रहा है!

दो माह बाद: जेएनयू के मामले पर एक बारीक नजर

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/10/2016 05:27:00 PM


दो महीने के बाद हाशिया लौट आया है. इस मुद्दत में जेएनयू और देश में काफी कुछ हुआ है और इन सब पर काफी कुछ लिखा और पढ़ा गया. हाशिया में उन पर गौर करने की कोशिश की जाएगी. इसी सिलसिले में यह पहली पोस्ट, जिसमें सौम्यब्रत चौधरी बता रहे हैं कि दो महीने पहले 9 फरवरी को जेएनयू में हुए आयोजन में कथित रूप से बोले गए शब्दों के मायने क्या हैं और उनका हमारी राष्ट्रीय समझदारी पर क्या असर पड़ा है. वे फिलहाल स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड ऐस्थेटिक्स, जेएनयू में पढ़ा रहे हैं. उन्होंने इसके पहले सीएसएसएससी, कोलकाता में पढ़ाया है और वे सीएसडीएस, दिल्ली और आईआईएएस, शिमला में फेलो रहे हैं. 2013 में आई उनकी किताब थिएटर, नंबर, इवेंट: थ्री स्टडीज ऑन द रिलेशनशिप ऑफ सॉवरेंटी, पावर एंड ट्रुथ राष्ट्रों की संप्रभुता और रंगमंच के साथ इसके रिश्ते पर गौर करती है. उनका हालिया काम बाबासाहेब आंबेडकर और जाति के प्रश्न पर है. मूल लेख: काफिला. अनुवाद: रेयाज उल हक.

पोलोनियस: ‘आप क्या पढ़ रहे हैं जहांपनाह?’
हैमलेट (नई दिल्ली, 2016): ‘भारत, पाकिस्तान, सुरक्षा, संप्रभुता, राष्ट्र, राष्ट्र-विरोधी...शब्द, शब्द, शब्द.’


सिगमंड फ्रायड के मुताबिक, जब हम सपनों में होते हैं और जब हम दिमागी बीमारी की वजह से होने वाले वहम से गुजर रहे होते हैं तो हम शब्दों को तस्वीरों और चीजों के रूप में लेने लगते हैं. इन हालात में एक शब्द का जो मतलब होता है, वह उस शब्द की शक्ल ले लेता है और हमें ऐसा लगने लगता है कि हम उसके भौतिक प्रभाव को, उससे लगने वाली चोट को महसूस कर रहे हों. तब यह बात हमारी समझ से परे चली जाती है कि एक शब्द बाहरी दुनिया की किसी चीज या किसी विचार का एक संदर्भ है या एक उपमा के रूप में या एक छुपी हुई तुलना या बिंब के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. हम शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहने के एक खास अंदाज (रेटरिक) में कही जा रही बात को भी कबूल नहीं कर पाते, जिसका मकसद हमें अपनी बात मनवाना, समझाना, किसी बात को खारिज करके नई बात कहना या अपमानित करना है. अगर कोई भी इंसान ऐसी बातचीत करना चाहता है तो उसकी ऐसी हरेक बात में हम महसूस करते हैं कि हम उसके शब्दों से शारीरिक, भावनात्मक और इसके नतीजे में मानसिक रूप से आहत हैं मानों वे शब्द कोई धक्का या हमला हों.

इसलिए, इसके जवाब में हम पलट कर बोलने वाले को अपनी बात मनवाने की कोशिश नहीं करते, उसे समझाते नहीं, उसकी बात को खारिज नहीं करते और न ही उसका अपमान करते हैं, बल्कि हम उसे शाप देते हैं (इस मुकाम पर यह किसी मानीखेज बातचीत की सबसे ऊपरी सीमा है), पीटते हैं, बोलने वाले का गला पकड़ लेते हैं, अगर हमारे पास छुरी या बंदूक में से कोई चीज हुई तो उसे उठा लेते हैं – या फिर हम घबरा जाते हैं, रोते हैं, अपना सिर अपने हाथ में ले लेते हैं और हाय-तौबा मचाने लगते हैं. अब सचमुच की दिमागी बीमारी से होने वाले वहम की हालत में इसकी कम ही संभावना है कि हम इस बात के काबिल हो पाएंगे कि एक खास कानून या कानून के एक खास प्रावधान का अपने पक्ष में इस्तेमाल करें और जाकर पुलिस में शिकायत कर दें. ऐसी हालत में हम अपनी हरकतों को वाजिब ठहराने के लिए एक जोरदार किस्म की भाषाई तस्वीर का इस्तेमाल कर पाने के काबिल नहीं होते. ‘हमने जो किया, उसके सिवाय हमारे पास कोई और रास्ता नहीं था, क्योंकि उन्होंने हमारी भारत माता का अपमान किया है.’ सचमुच की दिमागी बीमारी की हालत में, इसकी संभावना ही ज्यादा है कि हमें ही कानून की गिरफ्त में ले लिया जाए.

इसलिए सरकार, स्मृति ईरानी और राजनाथ सिंह, दूसरे भाजपा मंत्री, आरएसएस के विचारक, पटियाला हाउस में वकीलों के लबादे में आए गुंडे और मीडिया एंकर असल में दिमागी रूप से बीमार नहीं हैं, भले ही वे दिखते जैसे भी हों. हालांकि जो दिख रहा है, वो खासा साफ है और उस पर थोड़ा गौर किया जाना जरूरी है. उसे मोटे तौर पर घटनाओं और दलीलों की यह तरतीब दी जा सकती है: जेएनयू में छात्रों का एक समूह अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का ऐलान करता है जिसमें गीत, कविताएं और भाषण शामिल थे. पोस्टर में वे अपने नामों के पहले संक्षिप्त हिस्से का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वे कौन लोग हैं यह अभी बहुत कम अहमियत रखता है. पहचानों में दिलचस्पी सिर्फ तभी जाकर पैदा है जब उन्हें बहुत साफ साफ तरीके से छुपाया जाए या फिर उन्हें नाटकीय तौर पर उभारा जाए. छात्रों ने इनमें से कोई तरीका नहीं अपनाया था, वे ‘सामान्य’ हैं. फिर कार्यक्रम होता है और बहुत जोखिम न लेते हुए यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी मौके पर या कुछ मौकों पर कुछ नारे लगाए और सुने गए. क्या अभी इस मौके पर नारे लगाने वालों की पहचानें अहमियत रखती हैं? असल में नहीं, क्योंकि जिन्होंने भी नारे लगाए, उन्होंने न तो अपनी पहचान को छुपाने की कोशिश की और न ही उन्होंने उन्हें खास तौर से उभार कर पेश किया. उन्होंने जो कुछ भी किया, खुले तौर पर किया, और ऐसा करते हुए उन्होंने वहां मौजूद बाकी लोगों से खुद को अलग नहीं किया. इसलिए बाद में जब एक खास मंशा रखने वाली ताकतें व्यक्तियों और समूहों की पहचान करना चाहेंगी, तो यह दावा करते हुए कि कौन से नारे किन लोगों ने लगाए थे, उन्हें नारे लगाती हुई आवाजों की ऊंचाई और निचाई के साथ सबूतों की कमी का सामना करना होगा.

हालांकि उन नारों में जो बात कही गई थी, उसमें थोड़ी देर के लिए कुछ दम है और उसकी अहमियत है. इसी के साथ यह देखते हुए कि मामला कानूनी और फोरेंसिक मसले में तब्दील हो गया है, यह बात कहनी भी जरूरी है कि शब्द अभी भी ‘कथित तौर पर’ ही कहे गए हैं. कोई भी एकदम यकीन के साथ बोले गए नारों के बारे में दावा नहीं कर सकता. हालांकि कुछ देर के लिए अभी मान लेते हैं इन नारों में आने वाले कुछ मुख्य शब्द (जिसमें कुछ नाम भी शामिल हैं) इस तरह थे – अफजल गुरु, शहीद, कश्मीर, आजादी, भारत, पाकिस्तान, जिंदाबाद, मुर्दाबाद... इनमें से कुछ शब्द और नाम साफ तौर पर एक राजनीतिक सभा में रस्मी तौर पर इस्तेमाल किए जाने के लिए बने हैं ताकि भविष्य की राजनीति के लिए एक इंसानी तस्वीर पेश की जाए – अफजल गुरु को शहीद बना दिया गया. यह बात दूसरे शब्दों और नामों के साथ मिला कर वहां मौजूद लोगों से कही जा रही थी, ताकि उन्हें एक शहादत का यकीन दिलाया जाए. या फिर इसके लिए उनका हौसला बढ़ाया जाए कि वे इसमें यकीन करने लगें. इसी सिलसिले में, नारों की व्यापक होती हुई दहलीज “भारत” के टुकड़े कर देने की पुकार के साथ सामने आई. फिर क्या पाकिस्तान की तारीफ जले पर नमक छिड़कने के लिए की गई?

अजीब तौर पर, ऐसा लगता है कि जहां तक कश्मीर के साथ भारतीय राज्य के राजनीतिक इतिहास का मामला है, नारे बात को मनवाने, समझाने या पहले से कही गई बातों को खारिज करने तक जाते हैं...लेकिन “पाकिस्तान” का मामला आते ही, वे एक खरी-खरी कल्पना रच देते हैं. असल में अगर कोई भारतीय राज्य की संप्रभुता की हिंसा की आलोचना करता है तो इसका मतलब ये नहीं निकलता कि पाकिस्तान एक बेहतर वैकल्पिक संप्रभुता है. पाकिस्तान एक सचमुच के राष्ट्र का नाम है, जिसकी संप्रभु हिंसा का एक इतिहास है. यह इतिहास कश्मीरियों के लिए तसल्ली या भरोसा दिलाने वाला कोई भी वादा नहीं करता, सिवाय इसके कि अपने सबसे अच्छे रूप में यह एक संदिग्ध इस्लामी माहौल का वादा करता है और अपने सबसे खराब रूप में एक बहुसंख्यकपरस्त मुस्लिम पहचान का, यह वादा भी तब कोई मायने रखता है जब वे कश्मीरी लोग मुसलमान हों. पाकिस्तान, कश्मीरी अवाम के आत्म-निर्णय की मांग की मांग से भी नहीं आता, ठीक ठीक इसलिए क्योंकि वे अपना फैसला भारतीय और पाकिस्तानी दोनों राष्ट्रों में से किसी भी एक राष्ट्र के बतौर नहीं करना चाहते. लेकिन यह मुमकिन है कि अपने बारे में अपना फैसला आप करने की कश्मीरी ख्वाहिश अब तक पाकिस्तान की कल्पना से जुड़ने की ख्वाहिश रही हो क्योंकि पाकिस्तान अपने आप में ही कश्मीर का एक नया नाम है, पाकिस्तान की जो सचमुच की ऐतिहासिक अवधारणा रही है उसके रूप में नहीं बल्कि कश्मीरियों के सपनों की आजाद हैसियत के रूप में. इस तर्क के हिसाब से, पाकिस्तान सचमुच के कश्मीरी अवाम की अपनी ख्वाहिशों की संप्रभुता का एक काल्पनिक नाम बन जाता है और जेएनयू में - और दूसरी जगहों पर – नारे इसी मानीखेज लेकिन भड़काने वाली कल्पना को पेश करते हैं. पाकिस्तान एक ऐसे वक्त में सपनों के भावी कश्मीर का काल्पनिक नाम है, जब मौजूदा दौर में “आजाद कश्मीर” का नाम लेने पर पाबंदी है. तब इस दलील के मुताबिक, पाकिस्तान का नाम भारत का अपमान करने के लिए नहीं बल्कि उससे छुटकारे के लिए पुकारा जाता है.

इस मामले में ऊपर से जो कुछ भी दिखाई दे रहा है और जिसको हमने एक तरतीब दी है, उसमें पक्के तौर पर ऐसी नई कुछ बातें या कार्रवाइयां हो सकती हैं जो सामूहिक राजनीतिक दावेदारियों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती हों और उनमें से कुछ बातों के कानूनी पेंच हो सकते हैं, या शायद न भी हों. इसके बावजूद, यह देखने के लिए किसी तीसरी आंख की जरूरत नहीं है, कि घटनाओं और बातों का यह सिलसिला पूरी तरह एक विद्रोही शैली में राजनीतिक बेबाकी के साथ भाषा के दायरे में ही सामने आता है, उसमें रत्ती भर भी भौतिक हिंसा नहीं है. हम यहां विद्रोही उसूलों को देखते हैं, जिसके लिए आत्म निर्णय भारतीय राज्य या राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ एकजुट होने या फिर काम करने की साजिश करने की खातिर एक कदम है, लेकिन कोई राजद्रोही योजना इसका हिस्सा नहीं है. हम देखते हैं कि जेएनयू में तार्किक तरीके से सोचने वाली जनता जमा हुई और जिसने एक सभा की, जिसने कुछ कायदों – और कानूनों को भी? – लांघ दिया. लेकिन यह किसी विद्रोही आपराधिक इरादे वाले खुफिया संगठन (सीक्रेट सोसायटी) की बैठक नहीं थी. यह एक ऐसी जनता है जो तर्कों के आधार पर सोचती है और ऐसा दिख रहा है कि उसने एक विद्रोही कायदे और लोगों को भड़काने वाली काल्पनिक बातों की मदद लेते हुए, बेबाकी से बोलते हुए कुछ निश्चित दावेदारियों को खतरे में डाल दिया. इस मुकाम तक इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि उन लोगों की खास पहचान क्या है जिन्होंने बोलने के इस काम को अंजाम दिया चूंकि उन्होंने न तो अपनी पहचान को छुपाया था और न ही उसका ढिंढोरा पीटा था.

और फिर अब तक जो कुछ भी दिख रहा था, उन सब पर पागलपन सवार हो गया. एक टेलिविजन एंकर को दौरा पड़ गया जिसके बारे में ऐसा लगने लगा है कि वो खत्म ही नहीं होगा. और दूसरे अनेक एंकरों ने उसके साथ सुर में सुर मिलाते हुए मीडिया की घेरेबंदी का एक भयावह नजारा पेश किया. गृह मंत्री, शिक्षा मंत्री, पार्टी सरगना, वकील-गुंडे-भारतीय संस्कृति के भाषाओं के जानकार ठेकेदारों लोगों ने जेएनयू में लगे नारों में सुने गए शब्दों पर एक सुर में हंगामा खड़ा कर दिया. पगलाए हुए, भाषाओं के जानकार कहते हैं कि भारत माता को इन शब्दों से चोट लगी है और उन शब्दों में भारत की मौत छुपी हुई है. यह एक दिलचस्प बात है क्योंकि बजाहिर पगलाए हुए इन जानकारों की समझ के उलट, इन नारों - जो यकीनन ही जेएनयू, भारत और दुनिया में पहली बार नहीं सुने गए हैं - और वे जिन शब्दों से बने हैं उनकी ठोस राजनीतिक व्याख्या हमें बताएगी कि इस संदर्भ में “मुर्दाबाद” भौतिक और शारीरिक रूप से बर्बाद करने की नहीं बल्कि ढांचे का अंत करने की इच्छा को जाहिर करती है. मिसाल के लिए जब “वाइस चांसलर मुर्दाबाद” का नारा लगाया जाता है तो कोई भी उस व्यक्ति का जैविक खात्मा नहीं चाहता और न ही इसका इरादा रखता है, बल्कि वह सत्ता की एक निश्चित व्यवस्था के अंत के लिए आवाज उठाता है, वाइस चांसलर जिसका प्रतिनिधित्व करता है. राष्ट्रीय पैमाने पर इस दलील के विस्तार का एक विद्रोही सैद्धांतिक मतलब है कि संप्रभु सत्ता का, अपने वास्तविक ऐतिहासिक अर्थ में और सचमुच की जनता द्वारा किए गए अनुभव के रूप में, अपनी समग्रता में विरोध किया जा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई महज एक विद्रोही उसूल के इस ऐलान के जरिए ही संप्रभु क्षेत्र के भीतर और इस संप्रभु क्षेत्र की भौतिक नुकसान, तबाही और मौत की योजना बना रहा है. इसी के साथ, इसका यह मतलब भी नहीं है कि उसूलन एक इलाके में फैला हुआ हर कोई सत्ता के अपने अलग अलग ऐतिहासिक अनुभवों के साथ संप्रभुता और इलाके को, कानून और विरासत के बेदाग मेलजोल को जस का तस कबूल कर लेता है.

दूसरी तरफ भाषा के पगलाए हुए जानकार इन शब्दों को तस्वीरों के रूप में देखते हैं, उन्हें सचमुच के धक्कों के जरिए किए जाने वाले हमलों के रूप में महसूस करते हैं. कायदे से कहें तो ये दिमागी बीमारी के आसार हैं और ऐसा लग सकता है कि भारत माता के अपमान से पागल हुए भाषा शास्त्री असल में पागल हो गए हैं, क्योंकि यह बातचीत और विचार-विमर्श के स्तर पर भी अपमान को सुन या पढ़ नहीं सकते हैं. बहरहाल अपमानित करने की एक लंबी और खासी प्रतिष्ठित बौद्धिक परंपरा रही है, और इस देश में भी रही है. न तो मार्क्स ने और न ही आंबेडकर ने अपने विरोधियों को अपने तीखी आलोचनाओं से बख्शा; उन्हें ऊंचे राजनीतिक जोखिम वाली एक वाद-विवाद की संस्कृति पसंद थी, जिसमें विषय को लेकर कोई पाबंदी नहीं थी. आंबेडकर अपने वक्त में देश के पूरे अवाम के सामने मुस्लिम बहुसंख्यक इलाकों में आत्म निर्णय के सवाल को उठाने के लिए भारत में विजय, संघर्षों और उन पर किए जाने वाले हमलों के बदसूरत इतिहास पर गौर करने में नहीं हिचके. उन्होंने 1940 और 1945 में हरेक से इस सवाल पर फैसला करने को कहा: पाकिस्तान बने या न बने?

आत्म निर्णय आम तौर पर, उसूल के बतौर और खास तौर पर कोई ऐसा प्रस्ताव नहीं था, जो समझ से परे हो. यहां तक कि इसके खिलाफ फैसला करने के लिए भी हमें इसके बारे में सोचना पड़ेगा. जोतिबा फुले ने आधुनिक भारतीय ऐतिहासिक साहित्य की महानतम और सबसे ज्यादा मुक्तिकारी, अपमानित करने वाली रचना गुलामगीरी की रचना हिंदू जड़सूत्रों, मिथक और कानून, की व्यवस्था को तहस-नहस करने के लिए की, जिन्हें एक मनुस्मृति में पिरोया हुआ है. उन्होंने भाषाई बिंबों के खेल को इस महारत के साथ खेला कि उन्होंने ब्रह्मा के शरीर से पैदा हुए चार वर्णों के हिंदू किस्से को शब्दश: पेश करते हुए ‘अपने आप में हंसी का पात्र’ बना दिया. अगर ब्रह्मा ने सचमुच में इन सभी वर्गों को अपनी देह से पैदा किया था, तो उनकी देह किस किस्म की थी? मर्द या औरत की? यौन संबंधों में सक्षम थी या दैवीय थी? जैविक देह थी या परम देह थी? आज जब भाषा की व्यवस्था शब्दश: बिंबों में बदल गई है और बिंब ही बुनियादी अर्थ बन गए हैं, यानी दूसरे शब्दों में जो विमर्शों का तंत्र हुआ करता है वह सनक के तंत्र में, बेवकूफी के तंत्र में तब्दील हो गया है, तब फुले की तर्क पर आधारित और एक मुक्तिकारी अपमान की परंपरा को उलट देना एक गहन प्रतिक्रांतिकारी कोशिश लगती है.

सभी प्रतिक्रांतियों की तरह, यह भी इस तथ्य से नफरत करती है कि यह अपने वजूद के लिए मूल क्रांति की एहसानमंद है – और इस तथ्य को भूलने के लिए यह एक विचार के रूप में क्रांति को एक गैर प्रतिक्रांतिकारी तरीके से खारिज करना पसंद नहीं करेगी, बल्कि यह उन सब लोगों के सफाए को पसंद करेगी जिनको यह “क्रांतिकारी” मानती है. मौजूदा हुकूमत के मुताबिक ‘जेएनयू टाइप’ से उसे उस तरह का खतरा नहीं है जैसे एक आतंकवादी से होता है, जो अपने सबसे भयानक रूप में भी बस एक स्थानीय और बाहरी खतरा है; यह कथित टाइप (‘जेएनयू टाइप’) सत्ता को अधिक व्यवस्थित रूप से और बुनियादी तौर पर खतरे में डालता है, जैसे कि क्रांतिकारी करते हैं. और इसलिए, अजीब तरह से दिमागी बीमारी के आसारों के सिलसिले में एक प्रति-क्रांतिकारी रणनीति उजागर हो गई है – वो वजह जो बेवकूफियों के एक तंत्र की बुनियाद में है जिसका मकसद राष्ट्र को बेवकूफों की एक हुकूमत के तौर तरीकों से हांकना है, और वह वजह है एक कुरूप और विकृत संप्रभुता.

अब संप्रभु सत्ता की कुरूपता के दो पहलू हैं: इसमें (1) कानून से परे जाकर समाज से अपने लिए वैधता हासिल की जाती है (जिसके लिए लगातार कानून के अक्षरों को, प्रावधानों को, शब्दों को बेवकूफी के साथ सूत्रों और मंत्रों की तरह जपा जाता है); (2) समाज को कुसूरों के समाज में ढाला जाता है ताकि कानून से परे जाकर इस वैधता को हासिल किया जाए. दूसरे पहलू पर पहले बात करते हैं: सत्ता इस गहरे संदेह के आधार पर बनी होने की वजह से कि संप्रभु सत्ता को अपने शासन के प्रति किसी न किसी तरह की नाफरमानी का सामना करना पड़ता है, वो इस संदेह को समाज के दायरे में ले आती है. इस तरह सत्ता के प्रति हर नाफरमानी सामाजिक मूल्य के रूप में सत्ता के मूल्य की नाफरमानी के रूप में ली जाने लगती है. एक सीमित संभावना के रूप में, हालांकि यह संभावना भी खत्म होती जा रही है, ऐसे मूल्य सामुदायिक और धार्मिक स्थानीयताओं में निहित होते हैं. इसलिए समाज अपनी धार्मिक, रस्मी और पारिवारिक भावनाओं के आहत होने या उनकी आलोचना होने पर गुस्से में तिलमिला उठता रहा है और यह अब भी जारी है. हर बार आहत होने पर, समाज को इस तरह पेश किया जाता है कि एक बुनियादी संस्था के रूप में समाज पर एक दुश्मन से खतरा है, यह संस्था जख्मी है, कि समाज की सरहदों पर दुश्मन की फौज खड़ी है. जब संभावनाओं का विस्तार कर दिया जाता है और खतरों को बढ़ी हुई एक शक्ल दी जाती है, तब समाज की सरहदें राष्ट्र की सरहदें बन जाती हैं, जिसमें इसकी सरहदों से लगे दुश्मन राष्ट्र की कल्पना बुनियादी तौर पर दुश्मन समाज के रूप में की जाने लगती है. राज्य की संप्रभुता और समाज की संस्था के इस मेल के साथ, राष्ट्र को गुमराही में राष्ट्रीय समाज के रूप में देखा जाने लगता है जिसको राष्ट्रीय (विरोधी) समाज (विरोधी) से खतरा है. फरेब के इस रंगमंच पर भारत और पाकिस्तान ने लंबे, बहुत लंबे अरसे से एक किस्म का दुश्मन-दुश्मन का खेल खेलना अब तक जारी रखा है.

हालांकि फौरी हालात में कुसूरों के समाज की रचना में देश के भीतर ही हर कहीं उस दुश्मन की खोज की जाती है जिसके साथ दुश्मन-दुश्मन खेला जा सके - और जेएनयू जैसी निश्चित स्थानीयताओं के बारे में यह भ्रम फैलाया जाता है कि वहीं संप्रभु फरमान के प्रति सारा परायापन, सारी पराई गवाहियां, सारी नाफरमानी पैदा होती है. इसलिए समाज को सबसे पहले तो परायों की पहचान करना और उन्हें कसूरवार ठहराना जरूरी है ताकि यह अपने उन दुश्मनों से छुटकारा पा सके, जिनके साथ दुश्मन-दुश्मन खेला करता है – वे समाज विरोधी, राष्ट्र विरोधी, आजादी परस्त, पाकिस्तान परस्त, भारत विरोधी लोग (जो भारतीय हैं, हमेशा भारतीय!). उनकी पहचान करने और उनको कसूरवार ठहराने का काम समाज के सामूहिक मतिभ्रम यानी मीडिया के जरिए किया जाता है– और इसके बाद पुलिस को बुलाया जाता है. जेएनयू के छात्रों के साथ जो हुआ, उसे आजाद भारत में अपने नागरिकों को झूठे तरीके से फंसाने की सबसे बड़ी घटना कहा जा सकता है, जिसमें कानून ने सिर्फ संप्रभु फैसलों का पालन किया है. लेकिन संप्रभु फैसला अपने आप में समाज से वैधता हासिल करता है, ऐसे समाज से जो खुद अपने सदस्यों की पहचान करने और उन्हें कसूरवार ठहराने में मसरूफ है. राजनाथ सिंह बड़ी खुशी खुशी और बेवकूफी भरे तरीके से जेएनयू के छात्रों के साथ हाफिज सईद के रिश्ते की बात करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी कुरूप संप्रभु हुकूमत समाज द्वारा ‘राष्ट्र-विरोधियों’ को कसूरवार ठहराने की कोशिशों के साथ लगातार मेल खाती हुई चल रही है. इससे क्या फर्क पड़ता है कि हाफिज सईद वाली यह पूरी बात तथ्यात्मक रूप से सच नहीं है, क्योंकि अगर कोई एक “राष्ट्र विरोधी है”, उसका हाफिज सईद में यकीन करना तो लाजिमी ही है. और यह काल्पनिक नाम ‘हाफिज सईज’ दिल्ली पुलिस को धूमधाम से काम पर लगाने के लिए पर्याप्त रूप से एक वाजिब वजह है. जब नारे “पाकिस्तान” की मनगढ़ंत की बेबाक तरीके से और सरेआम तारीफ करते हैं जिसमें उन्हें इस खतरनाक मनगढ़ंत के अलावा और किसी की मदद हासिल नहीं है, एक ऐसा इंसान जो असल में इन नारों से भले ही किसी भी तरह जुड़ा हो या नहीं, उसकी पहचान की जाती है, उसको कसूरवार ठहराया जाता है और गिरफ्तार कर लिया जाता है. लेकिन सरसरी तौर पर इन कार्रवाइयों का आधार सरकार द्वारा साजिशन गढ़ी गई एक कहानी है, जिसका नाम “हाफिज सईद” है. एक मनगढ़ंत बात का सिर्फ डंका ही पीटा जा सकता है, इसका जितना शोर मचाया जाएगा, उतना ही यह सार्वजनिक तफ्तीश के दायरे में आएगा. दूसरी मनगढ़ंत को लागू किया जा सकता है और लागू किया गया है, और इसे जितना ही लागू किया जाता है, उतना ही यह सच्चाई का ढोंग करती है, जिसको संप्रभुता की गोपनीयता की सुरक्षा हासिल होती है (“आप खुफिया रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं कर सकते”).

यह सारा तामझाम संप्रभु हुकूमत के कुरूप चेहरे की हिफाजत करने के लिए किया जाता है, जिसका तरीका है: संप्रभु सत्ता जितनी ही बदसूरत दिखेगी, जितनी ही नफरत के काबिल लगेगी, जितने ही क्रूर तरीके से काम करेगी और जितनी बेवकूफी भरी बातें करेगी, वह अपने अख्तियार पर उतने ही कारगर तरीके से पकड़ बनाए रखेगी, उसको बढ़ाएगी और उसे और धारदार बना सकेगी. किसी ने भी नहीं सोचा था कि ज़ॉर्ज डब्ल्यू. बुश खास तौर से होनहार थे, लेकिन उनकी कम अक्ली की शोहरत का सीधे सीधे रिश्ता उनके खौफनाक लेकिन कारगर मंसूबों से था, जिनके तहत वे जिस देश पर चाहते थे, हमले कर देते थे. इस तरीके की संप्रभुता, अपनी संप्रभु सत्ता पर अमल करने वाली सभी सरकारों का सपना है, जिसमें उन्हें वैधता दिलाने वाली परंपरागत रणनीतियों की जरूरत नहीं होती और तब भी उन्हें महज कानून की हद से परे जाकर समाज द्वारा क्रूर तरीके से वैधता हासिल होती है. आज भाजपा हिंसक तरीके से इस सपने को साकार कर रही है और जिस अवाम ने उसे चुना है, उससे यह कहती हुई दिख रही है कि “हम तुम्हें बेवकूफ और पागल दिख रहे हैं, खैर, वो तो हम हैं ही और बेहतर होगा तुम इसको पसंद करना सीख जाओ!” यह कहने का मतलब यह है कि इस पागलपन के वक्त पागल बनने का फैसला करने में समझदारी है. और अगर सुनने में यह बहुत बेरहम बात लग रही है तो यह शायद ऐसी है ही. और अगर यह ऐसी ही है तो इसे तर्क के आधार सोच-समझ कर ही तैयार किया गया होगा, यह बिना तर्क के नहीं किया जा सकता! यह किसका तर्क है, इस दिमागी बीमारी की रणनीति और बेवकूफी की व्यवस्था से सबसे ज्यादा फायदा किसको हो रहा है इस पर अगले लेख में गौर किया जाएगा.

लेकिन एक ऐसे समय में ये रूखी-सूखी बातें, जब जेएनयू के छात्र जो कुछ रच रहे हैं, वह इस कदर बेपनाह खूबसूरत है कि दिल ने कभी भी इतना भरापूरा महसूस नहीं किया था.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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