हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

हिंदुस्तान या प्रतिबंधस्थान?

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/18/2015 09:38:00 PM

 
विचार, कला, लेखन, फिल्म, धर्म, यात्रा, आहार-सब पर पाबंदी यानी पूरा देश ही बन गया पवित्र गौ। यह मत करो, वह मत देखो, यह मत खाओ, वह मत पढ़ो, यह मत पहनो, यहां-वहां मत जाओ, इस तरह की बंदिशें पूरे समाज पर कसी जा रही हैं। महाराष्ट्र की भाजपा सरकार द्वारा गाय को मारने पर प्रतिबंध लगाए जाने और फिल्म इंडियाज डॉटर पर लगी रोक ने देश भर में खलबली पैदा कर दी। आउटलुक की पत्रकारभाषा सिंह की रिपोर्ट और उनके द्वारा किए गए कुछ साक्षात्कार।
भारत में भारत की बेटियों (इंडियाज डॉटर्स) पर बनी फिल्म देखना चाहे तो नहीं देख सकते, इस पर प्रतिबंध है। महाराष्ट्र में कोई गौ-मांस से बनी कोई डिश खाना चाहे, वह नहीं खा सकता, उसे बेचना चाहे नहीं बेच सकता-इस पर प्रतिबंध है। केरल या गुजरात में शराब का सेवन करना चाहे नहीं कर सकते, इस पर प्रतिबंध है। वेंडी डोनिगर की किताब द हिंदूजः एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री की किताब पढ़ना चाहते हैं, लेकिन नहीं पढ़ सकते, इस पर रोक ही नहीं लगी, इसे रद्दी में तब्दील कर दिया गया। फिल्म फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे देखना चाहते हैं, लेकिन अफसोस नहीं देख सकते, यह प्रतिबंधित है। अहमदाबाद में फना फिल्म देखना संभव नहीं, यह प्रतिबंधित है। विदेश जाकर लोगों-आदिवासियों के बारे में बात करना चाहते हैं, मुश्किल है। आपको राष्ट्र हितों के खिलाफ बताकर रोका जा सकता है। विदेश से आकर आप भारत में आंदोलनों का जायजा लेना चाहते हैं, आपको हवाई अड्डे से बाहर नहीं आने दिया जाएगा, वापसी फ्लाइट से भेज दिया जाएगा।

प्रतिबंध-प्रतिबंध और प्रतिबंध। हिंदुस्तान नहीं प्रतिबंधस्थान में तब्दील हो रहा है देश। हर तरह रोक लगाने का तैयारी चल रही है। कई प्रतिबंध कानून से लगाए जा रहे हैं और कई सामाजिक दबाव तथा तनाव के जरिए डाले जा रहे हैं। अंतरजातीय शादियों और अंतरधार्मिक शादियों पर पहले से कुफ्र बरपा है। हिंदुत्ववादी ताकतें ऐसी शादियों पर हिंसक हमला करने के लिए तैयार बैठी रहती है। ऐसी शादियों पर जातियों के बीच हिंसक टकराव की घटनाएं देश भर में फैली हुई हैं। अंतर-धार्मिक शादियों के खिलाफ अघोषित प्रतिबंध लगाने की घोषणा करने वाले अनगिनत हिंदुत्ववादी संगठन घूम रहे हैं। खाप पंचायतों का इन रिश्तों पर खौफ तारी है। वे बेलगाम होकर प्रेमी युगलों को निशाना बना रही हैं। इनकी हत्याएं हो रही हैं और इन हत्याओं के पक्ष में बयान दिए जा रहे हैं।

वरिष्ठ इतिहासकार डी.एन. झा के शब्दों में कहा जाए तो देश एक अंधकारमय दौर से गुजर रहा है। इस दौर में आम जनता के रोज-मर्रा के जीवन के हर पहलू में सरकार का दखल बढ़ता जा रहा है। सरकार यह तय कर रही है कि हम क्या खाएं, क्या पहने, क्या पढ़े, क्या देखें। निर्भया बलात्कार कांड पर बनी लेसली उडविन की फिल्म को प्रतिबंधित करके जहां पितृसत्ता के खिलाफ उठी आवाज को दबाने की कोशिश की गई, वहीं गाय को मारने पर देश में राजनीति फिर गरम हो रही है। भारत दुनिया में ब्राजील के बाद दूसरे नंबर का गौ-मांस का नियार्तक है। फिर भी तमाम राज्यों में इस पर प्रतिबंध लगाने की कवायद तेज हो रही है। महाराष्ट्र में गाय-बैल-सांड को मारने को अपराध बना दिया गया है। इनके मांस को बेचने और रखना सब अपराध बना दिया गया है। इसके लिए पांच साल तक की सजा और 10 हजार रुपये तक का जुर्माना करने का प्रावधान है। हरियाणा में भाजपा ने तो अपने चुनावी घोषणापत्र में ही गाय को मारने को धारा 302 यानी इंसान की हत्या के बराबर करने का अपराध घोषित करने का वादा किया था। अब हरियाणा की भाजपा सरकार इसी वादे को पूरा करने के लिए अपने बजट सत्र में यहा कानून लाने जा रही है। महाराष्ट्र सरकार के बाद अब झारखंड में भाजपा सरकार भी गाय को मारने पर रोक लगाने की तैयारी हो रही है। जबकि झारखंड में आदिवासी समुदायों की संस्कृति का हिस्सा है गाय को खाना। यानी अब तमाम राज्यों में गाय को मारने पर कड़े से कड़ा कानून बनाने की होड़ लग गई है। उधर, पश्चिम बंगाल में भी भाजपा ने गाय को मारने और उसके मांस को बांग्लादेश भेजे जाने को एक बड़ी मुद्दा बनाना शुरू कर दिया है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में गाय को मारने पर रोक नहीं है और गाय के मांस को खाया जाता है।

महाराष्ट्र में आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार के इस फैसले से करीब दो करोड़ लोगों का रोजगार प्रभावित होगा। महाराष्ट्र सरकार के इस कदम का देश भर में कड़ा विरोध हो रहा है। महाराष्ट्र में मुस्लिम संगठनों के अलावा दलित संगठनों ने सरकार के इस फैसले की कड़ी आलोचना की। विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र उच्च न्यायालय में सामाजिक कार्यकर्ता कीतन तिरोदकर ने जनहित याचिका दाखिल करके राज्य सरकार द्वारा गौ-मांस पर लगाई रोक को गलत बताया है। उन्होंने कहा कि गौ-मांस को खाना और बेचना अपराध नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इससे खाने के अधिकार का हनन होता है। कीतन ने अपनी याचिका में कहा कि गौ-मांस खाना किसी भी व्यक्ति का निजी मामला है, इसे आपराधिक कृत्य बनाना खतरनाक है और गैर-कानूनी है। मुंबई के बीफ डीलर्स वेलफेयर एसोसिएशन के उपाध्‍यक्ष इंतजार कुरैशी का कहना है कि इस प्रतिबंध से करोड़ों लोगों की जिंदगी पर संकट आ गया है। मुंबई के मीट कारोबारी अकरम कुरैशी का कहना है कि जब गाय की हत्‍या पर पहले ही रोक लगी है तब बैल के मांस पर रोक लगाने का कोई तुक नहीं है। मुंबई में बीफ खरीदारों में अच्‍छी खासी तादाद हिंदुओं की होती है ऐसे में इस मुद्दे को बेवजह धार्मिक और राजनैतिक रंग दिया जा रहा है।

महाराष्ट्र में लगे प्रतिबंध के खिलाफ देश भर से आवाजें उठ रही हैं। केरल में बीफ फेस्टिवल आयोजित किया गया, जिसमें बड़े पैमाने पर हिंदुओं और मुस्लिमों ने मौ मांस से बने व्यंजन खाए। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद एम.बी. राजेश ने बताया कि गौ मांस खाने वालों की संख्या भी बहुत है और उनके अधिकारों का भी सम्मान होना चाहिए। केरल में मुस्लिम लीग से जुड़े सी.के. सुबैर ने आउटलुक को बताया कि सिर्फ केरल ही नहीं देश के कई राज्यों में गाय का मांस खाया जाता है। इस तरह से उसे अपराध बनाना देश में खाने-पीने की विविधता को नकारना है। यह सांप्रदायिक फासीवाद है, जो एक तरह की सोच, एक तरह का खानपान सारे देश पर लादना चाहता है।

इस मसले पर आउटलुक ने जब पंजाब के लुधियाना शहर में रहने वाले 48 वर्षीय सुभाष देसावर से बात की तो उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र और हरियाणा में जिस तरह से गाय को खाने पर रोक लगाई जा रही है, वह सही नहीं है। यह निजी पंसद-नापसंद का मामला है। खाने में भी सरकारें धर्म को डाल रही है। सुभाष ने बताया कि वह गौ-मांस खा चुके हैं। पंजाब और हरियाणा में इस पर रोक लगने की वजह से उन्हें दिल्ली में आकर अपने दोस्तों के साथ इसे खाया। सुभाष का कहना है कि गौ-मांस खाने या न खाने से कैसे कोई हिंदू हो सकता है। देश में बड़ी संख्या में लोग जिसमें दलित भी शामिल हैं, गौ-मांस खाते हैं और उन्हें यह खाने की आजादी होनी चाहिए।

हरियाणा के पानीपत में रहने वाले राजकुमार ने दो टूक शब्दों में कहा कि उन्हें गौ-मांस खाना पसंद है और इसकी दो वजहें हैं। पहली तो यह कि यह सस्ता होता है और दूसरा स्वादिष्ट भी। उन्होंने बताया कि हरियाणा की दलित और मुस्लिम बस्तियों में यह खूब खाया जाता है। प्रतिबंध लगने की वजह से चोरी-छिपे इसका कारोबार चल रहा है, जिससे खाने वालों को बहुत मुश्किल होती है। राजकुमार ने बताया, इस मीट की एक प्लेट 20-25 रुपये में मिल जाती है और दस रुपये की रोटी लेकर हमारा पेट भर जाता है।–इससे सस्ता और पौष्टिक खाना और क्या हो सकता है। राजकुमार ने बताया कि वाल्मिकी समुदाय शुरू से गौ-मांस खाता रहा है। उन्होंने बताया कि उनके दादा मरी हुई गाय को साफ करते थे। इसके बाद उसे घर के लोग मिलकर उसके कुछ हिस्से को सुखाते थे और बाकी हिस्सा खाया जाता था। अब ऐसा नहीं रहा क्योंकि  लोगों मरी गाय को गाड़ दिया जाता है। 


राजकुमार ने जो कहा वही बात इतिहासकार डी.एन. झा ने कही। देश की गरीब जनता के लिए गाय का मीट सबसे सस्ता उच्च कोटि का प्रोटीन होता है। इसके साथ ही जिन राज्यों में यह प्रतिबंधित है, वहां भी गरीब आबादी इस पर आश्रित है।

तमिलनाडू की डॉ. दीप्ति ने आउटलुक को बताया कि गौ-मांस खाना एक सांस्कृतिक चुनाव है। दलितों की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। इसकी वजह यह रही है कि दलितों की बहुत सी जातियां मरे हुए जानवरों को साफ करने का काम करती रही हैं। तमिलनाडू में दलित जातियों में अरुंधतियार, मादिगा, चकलियारस में गो-मांस खाया जाता है। एक बार तमिलनाडू में इसे प्रतिबंधित करने की कोशिश हुई लेकिन राज्य में कड़े विरोध के बाद इसे वापस लेना पड़ा था। हालांकि यहां भी खुलकर लोग यह बताना पसंद नहीं करते कि वह गौ-मांस खाते हैं क्योंकि ब्राहमणवाद का असर यहां पर भी है। दीप्ति का मानना है कि महाराष्ट्र में जिस तरह से यह प्रतिबंध लगाया गया है वह हिंदुत्ववादी संस्कृति को फैलाने की साजिश का हिस्सा है। दीप्ति का कहना है कि एक तरफ सरकार इंडियाज डॉटर फिल्म को प्रतिबंधित कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ लोगों के खानपान पर रोक लगा रही है। सरकार खाने की मेज पर बैठ गई है और खाने पर नकेल कस रही है। दीप्ति सीधा सा सवाल पूछती हैं, गाय किसके लिए पवित्र है, मेरे लिए तो नहीं है। देश में मुसलमानों के लिए सुअर का मांस हराम है तो क्या उसे प्रतिबंधित किया जाता है, नहीं न। उसी तरह का रवैया गो-मांस के लिए रहना चाहिए।
 

गाय प्रजाति को मारने पर लगी रोक से देशभर के करोड़ों लोगों के जनजीवन पर सीधा असर पड़ रहा है। मामला सिर्फ खान-पान तक ही सीमित नहीं है, इसका सीधा रिश्ता अर्थव्यवस्था से भी है। इस सवाल का जवाब प्रतिबंध लगाने वाली किसी भी सरकार के पास नहीं है कि बूढ़ी, बीमार गायों-बैलों का क्या होगा। पहले से गहरा संकट झेल रहे किसान किस तरह इस बोझ से ऊबर पाएंगे। वहीं, दूसरी तरफ कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने महाराष्ट्र में गौ मांस पर लगे प्रतिबंध को जायज ठहराया और कहा कि अर्थव्यवस्था की आड़ में गौ हत्या का बचाव उचित नहीं है। वह मानते हैं कि अगर प्रयास किए जाएं तो गोबर और गौमूत्र के इस्तेमाल से नुकसान की भरपाई हो सकती है।

प्रतिबंध की तलवार सिर्फ खान-पान तक ही सीमित नहीं है। क्या लोग देखें, क्या लोग पढ़े, क्या सुने, क्या बनाएं, सब पर नैतिक पुलिस का पहरा बढ़ता जा रहा है। 2012 में हुए निर्भया बलात्कार कांड पर बीबीसी के लिए लेसली उडविन द्वारा बनाई गई फिल्म इंडियाज डॉटर पर जिस तरह से भारत सरकार ने आनन फानन में रोक लगाई, उसकी देश-विदेश में तीखी आलोचना हुई। सरकार का तर्क है कि इस फिल्म से भारत की छवि खराब हो रही है। लेसली उडविन की इस फिल्म को लेकर देश भर में खूब हंगामा रहा। निर्भया बलात्कार कांड की पीड़िता के पिता का कहना है कि इस फिल्म को हर किसी को देखना चाहिए। यह भारत की बेटियों के पक्ष में फिल्म है, देश के खिलाफ नहीं। आप यह सोचिए कि व्यक्ति जेल में ऐसी बातें कह रहा है, वह बाहर कितना जालिम होगा। ऐसे लोगों का पर्दाफाश होना चाहिए। माकपा की सांसद बृंदा कारात ने कहा कि मैंने यह डॉक्यूमेंटरी फिल्म देखी है। यह सशक्त फिल्म है। यह चौथी बार है जब सरकार ने बिना देखे ही किसी फिल्म को प्रतिबंधित किया है। फिल्म से पूरी तरह से सहमत न होने के बावजूद अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णन का कहना है कि फिल्म पर प्रतिबंध लगाना सरासर गलत कदम है। वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर का कहना है कि औरतों की जिंदगी में जरूरत से ज्यादा दखल बढ़ रहा है।  एडवा की नेता सुभाषिनी अली का कहना है कि महिलाओं की बढ़ी हुई पहलकदमी को रोकने के लिए हिंदुत्ववादी और कट्टरपंथी ताकतें पूरी तरह से सक्रिय है। वे बहुसंख्यवाद को ही राष्ट्रीय संस्कृति का पर्याय बनाना चाहती हैं। औरतों को कितने बच्चे पैदा करने चाहिए से लेकर देशवासियों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, वे सब बता रही हैं। गौ-मांस पर प्रतिबंध के जरिए पूरी बेशर्मी से धार्मिक ध्रुवीकरण किया जा रहा है। इसे हिंदू बनाम मुस्लिम मुद्दा बनाने की साजिश हो रही है।

औरत से हुए बलात्कार पर फिल्म बनाना राष्ट्रीय गरिमा के खिलाफ, लड़कियां जींस पहने तो यह संस्कृति के खिलाफ, लड़कियां मोबाइल ले तो यह खतरनाक, पसंद से शादी करें तो अपराध। यह मध्ययुगीन दौर की खतरनाक वापसी है।
 

रोक की संस्कृति और रोक की राजनीति का बोलबाला हर तरफ है। आज के दौर में सरकार की नीतियों-परियोजनाओं के खिलाफ बोलना भी राष्ट्र हित के खिलाफ परिभाषित किया जाने लगा है। स्वयंसेवी संस्था ग्रीनपीस की कार्यकर्ता प्रिया पिल्लै को लंदन जाने से रोका जाना, ऐसी ही प्रतिबंधकारी राजनीति का एक कदम था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार के इस कदम के खिलाफ फैसला देते हुए कहा कि प्रिया पिल्लै का यात्रा करने का अधिकार मौलिक अधिकार है और इसे छीना नहीं जा सकता। प्रिया पिल्ले की वकील इंदिरा जयसिंह का कहा कि कितनी हैरानी की बात है कि देश का कोई कानून किसी भी नागरिक को अपने विचार रखने से नहीं रोकता। अभिव्यक्ति की आजादी संविधान की धारा 19 (2) के तहत ही की जा सकती है। प्रिया के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं था। दरअसल सरकार ने जिस तरह से यह तर्क गढ़ा कि प्रिया पिल्लै एस्सार द्वारा चलाई जा रही महान परियोजना का विरोध करने जा रही हैं और इससे भारत में  विदेशी निवेश प्रभावित होगा। सरकार ने प्रिया पिल्लै का लंदन जाना राष्ट्रीय हित के खिलाफ बताया था, जो किसी भी सूरत में न्यायसंगत नहीं था।

एक तरफ भारत के लोगों को विदेश जाने से रोका जा रहा है वही विदेशियों को भारत आने से रोका जा रहा है। बिट्रेन की अकादमिक पैनी वेरा सांसो को 2014 में हैदराबाद में हवाई अड्डे पर रोक लिया गया और वापसी फ्लाइट से ही वापस भेज दिया गया। वजह वह भारत के वृद्धजनों पर काम कर रही थीं और उनकी तस्वीरों की प्रदर्शनियां लगा रही थीं। इन प्रदर्शनियों में वृद्धों के कठिन जीवन और उनके जीवट की कहानी बयां होती थी। यह प्रदर्शनी केंद्र सरकार को राष्ट्र के खिलाफ लगी। ऐसा ही कुडनकुलन में परमाणु संयत्र विरोधी आंदोलन के दौरान कई विदेशियों को वापस भेजा गया था। एक स्वीडिश नागरिक को केरल में एक चरम वामपंथी जनसभा में शिरकत करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया, जिसे बाद में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन बताते हुए अदालत ने रिहा किया।

असहमति की तमाम आवाजों को भी दबाने का एक लंबा सिलसिला रहा है, जो अब ज्यादा आक्रामक हो गया है। यह अकारण नहीं है कि केंद्र सरकार ने 69 स्वयंसेवी संस्थाओं पर विदेशी धन लेने पर रोक लगा दी है। इनमें से 30 अल्पसंख्यकों के सवालों पर सक्रिय है। इन संस्थाओं पर आरोप है कि विकास विरोधी आंदोलनों को समर्थन देकर देश की सकल घरेलू उत्पाद में 2 से 3 फीसदी का नुकसान कर रहे हैं।

नौकरशाही पर तो लगाम कसी ही जा रही है। लेखकों पर हमले तेज हुए हैं। तमिल लेखक पुलियूर मुरुगेसन को उनके एक उपन्यास बालाचंद्रन इनरा पेयारम इनाकुंदु के लिए मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। इससे पहले तमिलनाडू के लिए लेखक पेरुमाल मुरुगन को ऐसे ही दबाव के चलते अपने लेखक की मौत की घोषणा करनी पड़ी थी। कांग्रेस के शासनकाल में जेवियर मोरो की किताब लाल साड़ी प्रतिबंधित रही। प्रतिबंध झेलने वाले लेखकों की फहरिस्त लंबी है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने ए.के. रामानुजम के थ्री हंड्रेड रामायणाज पर भी उतना ही उपद्रव किया था जितना रोहिंटन मिस्त्री की किताब पर शिव सेना ने। मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर तस्लीमा नसरीन से लेकर सलमान रुश्दी रहे। आलम यह है कि जयपुर साहित्य महोत्सव में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सलमान रुश्दी के वक्तव्य को कट्टर मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति कर रुकवा दिया था। समय के सबसे बड़े चित्रकारों में से एक एम.एफ हुसैन को उग्र हिंदुत्ववादी ताकतों ने देश में ही प्रतिबंधित कर दिया और बहादुरशाह जफर की तरह उन्हें भारत में दो गज़ जमीन भी न मिली। 
 

अंतर बस यह आया है कि ये प्रतिबंध अब ज्यादा उग्र हो गए हैं और उन्हें गाहे-बगाहे राजनीतिक सरकारी वरदहस्त प्राप्त है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नारा तो दिया मेक इन इंडिया लेकिन जमीन पर वह दिखाई दे रहा है बैन्ड इन इंडिया (प्रतिबंध का भारत)।
 

गाय पर फिर ध्रुवीकरण का खेल

पवित्र गाय का मिथक जैसी विचारोत्तेजक किताब लिखने का जोखिम उठाने वाले अग्रणी इतिहासकार द्विजेंद्रनारायण झा, जिन्हें डी.एन.झा के रूप में ज्यादा जाना जाता है, देश के मौजूदा हालात से बहुत आहत हैं। यह एतिहासिक किताब 2001 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई औऱ इस पर प्रतिबंध लगा, हंगामा हुआ, उन पर हमला हुआ, लेकिन वह डिगे नहीं। यह किताब हिंदी में आई और इसने गाय के इर्द-गिर्द गढ़े गए कई मिथकों को तोड़ने की कोशिश की। उनका मानना है कि इतिहास को नकार कर गलत चीजों के लिए भारत को गर्व करने का जो सिलसिला चल रहा है, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है। डी.एन.झा का मानना है कि हम एक अंधकार युग में जी रहे हैं, जहां जीवन के हर कोने में राज्य का दखल बढ़ता जा रहा है। आउटलुक की ब्यूरो प्रमुख भाषा सिंह ने उनसे देश भर में लगाए जा रहे प्रतिबंधों पर लंबी बात की, पेश हैं उसके अंशः

एक के बाद एक प्रतिबंध लग रहे हैं। गाय से लेकर फिल्में, सब पर रोक। ऐसे एतिहासिक संदर्भ में आप कैसे देखते हैं

अगर सरकार तय करने लगे कि लोगों को क्या खाना है, क्या पहनना है, क्या देखना है, कितने बच्चे पैदा करने हैं, तो यह लोकतंत्र कहां है। यह तो तानाशाही है। मेरा मानना है कि हम अंधकारमय युग में जी रहे हैं और यह सब उसी की प्रतिध्वनियां हैं। महाराष्ट्र सरकार द्वारा लगाया गया प्रतिबंध मामूली नहीं है। इस प्रतिबंध का कोई आधार नहीं है, कोई जरूरत नहीं है। सीधे-सीधे राज्य यह बता रहा है कि नागरिक की थाली में क्या होगा, क्या वह खाएगा यह व्यक्ति नहीं सरकार तय करेगे। यह तो तानाशाही की बात हो गई, है न। दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार पर बनी फिल्म पर रोक लगाकर आखिर क्या संदेश दिया सरकार ने। उसने इस मुद्दे को भी झूठे राष्ट्रीय सम्मान से जोड़ दिया। यह सीधे-सीधे पितृसत्ता को पोषण करने वाला कदम है। किताबों पर पहले ही हमला बोला जाता रहा है। दरअसल जो भी विचार हिंदुत्ववादी ताकतों, कट्टरपंथी ताकतों से मेल नहीं खाता, उस विचार को खत्म करने के लिए वे आक्रामक हो रही हैं। 

महाराष्ट्र सरकार द्वारा लगाया गया गाय, बैल, सांड को मारने, उसका मीट रखने पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून का क्या प्रभाव पड़ेगा। देश भर में इस तरह के प्रतिबंधों की क्यों जरूरत पड़ी

यह प्रतिबंध पूरी तरह से सांप्रदायिक है। यह सिर्फ मुसलमान विरोधी ही नहीं, दलित विरोधी, केरल और उत्तर पूर्व विरोधी है। असल में यह गरीब विरोधी है। गरीबों को सबसे सस्ता और पौष्टिक प्रोटीन गाय के मांस से मिलता है। इनसे क्यों वंचित किया जा रहा है, सिर्फ इसलिए कि हिंदू धर्म के कुछ लोगों को लगता है कि गाय पवित्र है।   

गाय को पवित्र गाय के रूप में लंबे समय से भारतीय राजनीति में पल्लवित-पोषित किया गया। आपका काम यह बताता है कि गौ मांस पहले हिंदू खाते थे। फिर यह बदला क्यों

गाय का मसला हिंदुत्ववादी ताकतों के लिए ध्रुवीकरण का औजार लंबे समय से रहा है। ऐतिहासिक दृष्टि से इस बात के साक्ष्य बहुत मजबूत है कि गाय खाई जाती थी। धर्मशास्त्रों-वैदिक साहित्य में इस बात का प्रचुर उल्लेख है कि यज्ञों में गाय-भैंस चढ़ाई जाती थीं। गौतम बुद्ध ने सुअर और गाय का मांस खाया। यह सब ऐतिहासिक तथ्य हैं, जिन्हें कोई नकारना चाहे तो भी नहीं नकार सकता। ये सब मैंने नहीं लिखा है, वेदों में है, श्लोकों में दर्ज है। यानी यह कहना कि हिंदू गाय का मांस नहीं खाते थे या खाते हैं, गलत है। 

फिर यह कैसे बदला

कृषि के विकास के साथ इसमें तब्दीली आई। मवेशियों की रक्षा की जरूरत सामने आई। उसे मारने से बचने की बातें आईं। धीरे-धीरे धर्मशास्त्रों में इसका उल्लेख कम होता गया। फिर वैष्णव धर्म का प्रभाव बढ़ने के साथ-साथ शाकाहार का असर बढ़ा। लेकिन खाने वाले तब भी खाते थे। सबसे पहले 19वी सदी में आर्यसमाज के दयानंद सरस्वती ने गौ रक्षा का अभियान चलाया। एक मजेदार तथ्य सामने आया जिसमें 1872 में राजस्थान में सामाजिक समूह यह फैसला लेता है कि वह गाय का मांस नहीं खाएगा। यानी वहां गो मांस खाया जा रहा था, तभी तो वह यह फैसला लिया गया कि अब से नहीं खाएगा।

उत्तर भारत में गाय की पवित्रता का बोध ज्यादा रहा जबकि दक्षिण भारत में इतना नहीं रहा। वहां अभी भी बड़े पैमाने में खाया जाता है। ऐसा क्यों

देखिए यह देश शुरू से एक राष्ट्र तो था नहीं। हर इलाके की अपनी खासियतें थी, अपना रहन-सहन और खानपान था। यह अपनी जरूरतों और उपलब्ध साधनों के हिसाब से तय होता था। कहां क्या सामाजिक आंदोलन रहा और उसका असर दूसरी जगह पर क्यों नहीं पड़ा यह अलग से शोध का विषय हो सकता है। पर एतिहासिक रूप से यह कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत, उत्तर पूर्व, बंगाल आदि में गाय का मांस खाया जाता रहा।

प्रतिबंधों में भारत की विदेशों में छवि खराब

देश भर में मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वाली शख्सियत हैं कोलिन गोंसालविस। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन से एक के बाद एक लगाए जा रहे प्रतिबंधों पर भाषा सिंह ने बात की, पेश से संक्षिप्त अंशः

प्रतिबंध का रास्ता क्यों अख्तियार कर रही है सरकार

यह लोकतंत्रातिक परंपराओं का ह्रास है। दरअसल, यह सर्वसत्तावादी शासन की निशानी है। जो भी उसकी इच्छा के अनुरूप न हो, उस पर प्रतिबंधित कर दो। सहिषुणता की समाप्ति हो रही है।

लेकिन प्रतिबंध तो पिछली सरकारें भी लगाती रही हैं, इस बार नया क्या है

यह बात सही है कि सरकारें प्रतिबंध का रास्ता अख्तियार करती रही हैं। अब सरकार एक स्पष्ट एजेंडे के साथ पूरे आक्रामक अंदाज में विरोधी विचार को प्रतिबंधित करने की ओर बढ़ रही है। सरकार नागरिकों के जीवन के हर क्षेत्र में घुसपैठ कर रही है। नैतिक पुलिस की भूमिका में यह बता रही है कि हमें क्या किताब पढ़नी चाहिए, क्या शब्द फिल्मों में इस्तेमाल करने चाहिए, क्या फिल्में देखनी चाहिए और हमारी थाली में क्या खाना होना चाहिए। राज्य की यह भूमिका सरासर लोकतंत्र विरोधी है। 

क्या इन प्रतिबंधों को कानूनी चुनौती दी जा सकती है

हां, बिल्कुल दी जा सकती है। और दी भी जाएगी। जल्द ही ये तथ्य भी सामने आएगा कि लोगों में प्रतिबंधों की इस राजनीति को लेकर कितना आक्रोश है। गौ-हत्या को लेकर जो भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस लोहाटी का फैसला था वह बेहद खराब था। उसकी वजह से भी बहुत दिक्कतें आ रही हैं। 

गौ-हत्या को लेकर महाराष्ट्र के अलावा भी कई राज्य कानून बना चुके हैं

लेकिन महाराष्ट्र का कानून सबसे खतरनाक है। यह गौ-मांस को रखने को भी अपराध बनाता है। दलित, मुसलमान, ईसाई आदिवासी गौ-मांस खाते हैं, बहुत से हिंदू खाते हैं। उनसे आप उनके खाने के अधिकार को कैसे छीन सकते हैं।

फिल्म से लेकर गौ-मांस पर प्रतिबंध से क्या भारत की छवि विदेशों में प्रभावित होगी?

हो चुकी है। ये तमाम प्रतिबंध वाकई शर्मनाक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहां दावा कर रहे थे कि वह देश को आगे ले जाएंगे, ये सारे कदम देश को पीछे ले जाने वाले हैं। ये कदम शर्मनाक हैं। (साभार)

आप की शुरुआत और नया 'औजार'

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/10/2015 09:49:00 AM

 आनंद तेलतुंबड़े


आम आदमी पार्टी (आप) ने हालिया दिल्ली विधान सभा चुनावों में 95.71 फीसदी सीटों और 54.3 फीसदी लोकप्रिय वोटों को हासिल करके एक चुनावी इतिहास बनाया है. उसके पहले ऐसी तीन मिसालें रही हैं और सभी सिक्कम से हैं, जहां नर बहादुर भंडारी के नेतृत्व में सिक्किम संग्राम परिषद (एसएसपी), और पांच बार मुख्यमंत्री रहे पवन कुमार चामलिंग के सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसपीएफ) दोनों ने 1989 और 2009 में होने वाले चुनावों में क्रमश: सभी 32 सीटें जीती थीं और 2004 में एसडीएफ ने 96.9 फीसदी विधान सभा सीटों (32 में 31) पर जीत हासिल की थी. हालांकि ये आंकड़े इतिहास के रूप में ही अहम हैं,जबकि आप की जीत अनेक मायने में अनोखी है. पहली बात तो यह है कि अतीत में कोई भी पार्टी स्वच्छ शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के आधार पर चुनाव नहीं जीत पाई है. दूसरी बात है, बेहतर या तुलनात्मक रूप से चुनावी प्रदर्शन सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दों पर क्षेत्रीय दलों द्वारा ही आता रहा है, उनमें से कोई भी मुख्यधारा की सत्ताधारी पार्टी को ललकारा नहीं और स्थापित राजनीति के तौर-तरीकों को चुनौती नहीं दी. जिस संदर्भ में आप की जीत हुई है, वो असल में अनेक तरह से इसे अनोखा बनाता है. यह संदर्भ एक तरह से मोदी-शाह की जोड़ी द्वारा पिछले आम चुनावों के बाद छेड़े गए अश्वमेध का संदर्भ है, जिसने उन्हें पूरे देश भर में चुनाव दर चुनाव जिताया है और उन्हें अपराजेय के रूप में पेश किया है. एक के बाद एक मिल रही इन जीतों से पैदा हुई उद्दंडता ने उनके फासीवादी पंजों को नंगा कर दिया है और जनवाद पसंद लोगों के लिए दु:स्वप्नों की शुरुआत हुई है. यह डरावना तथ्य खौफनाक रूप में हकीकत बनने लगा है कि फासीवाद चुनावों के जरिए सत्ता में आता है लेकिन उसे चुनावों के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता. यह वो भयावह संदर्भ है जिसमें आप की ऐतिहासिक जीत अनोखे रूप में अहम बन गई है.

यह स्वाभाविक है कि इस जीत पर जनता के ज्यादातर हिस्से ने खुशी जाहिर की. कम से कम 2014 के आम चुनावों में भाजपा को मिली 52 फीसदी सीटें महज 31 फीसदी वोटों से हासिल हुई थीं. वोटों का यह हिस्सा संसद में बहुमत हासिल करने वाली किसी भी दल के वोट फीसदी में सबसे कम है. इसके मायने यह हैं कि 69 फीसदी लोग, जो अब भी भाजपा के साथ नहीं हैं, वो आप की जीत का जश्न मनाएंगे. हालांकि आप की उम्मीद भरी जीत ने जो खुशी भरा उन्माद पैदा किया है, उससे हमें इस जीत को वस्तुगत रूप से समझ ने की जरूरत के प्रति अंधा नहीं हो जाना चाहिए और हमें इसे गंवा नहीं देना चाहिए कि इसके सकारात्मक और यथार्थवादी तथा साथ ही साथ नकारात्मक पहलू क्या हैं.

यह मोदी की हार है

दिल्ली के चुनाव एक सामान्य चुनाव हो सकते थे, लेकिन ये मोदी के शासन पर जनमत संग्रह के रूप में बदल गए. भाजपा ने दिल्ली पर कब्जा करने के लिए अपनी पूरी रणनीतिक ताकत झोंक दी. यह दीगर बात है कि इस प्रक्रिया में इसने एक के बाद एक भारी गलतियां कीं. मई 2014 में आम चुनावों में हासिल हुई जीत के बाद मोदी की बढ़ती हुई लहर पर सवार होकर भाजपा दिल्ली चुनावों की घोषणा कर सकती थी और तब इसके जीतने के मौके कहीं बेहतर थे. तब आप, लोगों के मन पर छाए गुस्से से नहीं उबर सकी थी और अपनी भारी भूल के बाद पूरी तरह बिखरी हुई थी जब उसने जनलोकपाल के मुद्दे पर बचकाने तरीके से सरकार से इस्तीफा दे दिया था, बिना संगठनात्मक समर्थन या संसाधनों के पूरे देश में लोकसभा चुनाव लड़ने की बेवकूफी की थी और वाराणसी में मोदी से टक्कर लेने की गुस्ताखी दिखाई थी. लेकिन तब भाजपा मौके की नहीं बल्कि अपनी जीत को मजबूत करने की चाह में थी. मोदी की आत्ममुग्धता ने उनको भरोसा दिला दिया था कि समय गुजरने के साथ वे मोदी के प्रदर्शन के साथ दिल्ली के मतदाताओं को आसानी से मोहित कर लेंगे. झारखंड, जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र में लगातार मिली जीतों के बाद, यह बात उनके दिमाग में बैठ गई थी कि वे अपराजेय हैं, हालांकि इन नतीजों में हालिया लोक सभा चुनावों की तुलना में उनका वोट प्रतिशत घटा था. उनका भरोसा सिर्फ और सिर्फ अपने सुपरस्टार मोदी के करिश्मे पर टिका हुआ था.

चुनावों की घोषना के बाद इसने आरएसएस के हजारों कैडरों के समर्थन से अपना ठोक-बजा कर बनाया हुआ प्रचार अभियान छेड़ा. जमीन खोखली होने के संकेत मिलते ही मोदी कैबिनेट के दिग्गजों को चुनाव के बारीक से बारीक प्रबंधन के लिए लगाया गया. और आखिरकार केजरीवाल जैसी एक छोटी सी मक्खी को कुचलने के लिए रौद्र रूप के साथ महायोद्धा भी दिल्ली में उतरा. मानो अपने अश्वमेध पर जोर डालने के लिए वह गरजा, ‘जो देश का मूड है वही दिल्ली का मूड है’, और तब उसे इसका जरा सा भी भान नहीं था कि यह बात पलट कर उसे नुकसान भी पहुंचा सकती है. भाजपा के तरकश में मौजूद मोदी, पैसा, कीचड़ उछालने की सियासत और बहुसंख्यकपरस्ती भी दिल्ली के मतदाताओं का दिल नहीं जीत सकी जिन्होंने इसे करारी मात दी और भाजपा को महज तीन सीटें ही हासिल हो सकीं. उसे लोकसभा चुनावों में 60 विधानसभा सीटों में हुई जीत में 95 फीसदी की गिरावट आई. वोटों में यह गिरावट 13 फीसदी है. चुनावों के दौरान आजमाए गए तरीकों में, जिसमें (अप)यश को छुपाने के लिए किरण बेदी को लाया जाना भी शामिल था और जिन्होंने अपनी बेवकूफी से भाजपा के विनाश में सिर्फ इजाफा ही किया, लेकिन यह साफ था कि मोदी दिल्ली में भाजपा के अभियान का चेहरा थे. भाजपा की हार उसको मिली सजा थी कि उसने गरीबों के साथ होने का ढोंग किया जबकि वह कॉरपोरेट दुनिया की सेवा करती रही और इसके लिए उसने अध्यादेशों जैसे कदमों की मदद भी ली जिन पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं. यह मोदी के लिए एक सजा थी, कि वे उनके सत्ता में आने के बाद से छुट्टा घूम रहे किताब जलाने वालों, फिल्मों पर तोड़-फोड़ करने वालों और धार्मिक नफरत फैलाने वालों पर खामोशी साधे हुए उनका साथ देते रहे.

एक नवउदारवादी शुरुआत

आप की इस हैरान कर देने वाली कामयाबी के पीछे क्या राज है? यहां तक कि 2013 के अपने पहले चुनाव में भी उसने सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर और कांग्रेस के बिन मांगे समर्थन पर सरकार बना कर अनेक राजनीतिक जानकारों को हैरान कर दिया था. इसने राजनीतिक व्यवहार के प्रदर्शन में कोई गलती नहीं की. मीडिया और मध्य वर्ग इसकी अनेक कार्रवाइयों को समझने में नाकाम रहे लेकिन पार्टी ने साधारण जनता की कल्पना को अपनी तरफ खींचा. पहले वाला समूह जहां पुलिस के खिलाफ केजरीवाल के विरोध प्रदर्शनों को अराजकतावादी कह कर खारिज करता रहा, साधारण जनता के लिए यह देख कर अच्छा लगा कि एक मुख्यमंत्री सड़क पर सो रहा है, दिल्ली की ठिठुराने वाली सर्दी को चुनौती देते हुए उस पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है, जो राज्य का सबसे शैतानी चेहरा है. अपनी सियासी शुरुआत के बतौर यह जिस अशांतिकारक विचार का प्रतिनिधित्व करती थी, वह उस पर कायम रही. लेकिन जल्दी ही इसने सारी सहानुभूति खो दी, जब उसने साउथ ब्लॉक पर नजरें गड़ाते हुए इस्तीफा दे दिया. सियासत के बाजार में जमे-जमाए धाकड़ खिलाड़ियों से लोहा लेने में इसने गंभीर रूप से गलत दांव चले. लड़ाई से यह इस कदर जख्मी होकर बाहर निकली कि अनेक माहिर लोगों ने इसके फिर से उभर पाने की काबिलियत को ही खारिज कर दिया. लेकिन शुरुआत की शानदार फुर्ती के साथ, इसने खुद को फिर से संगठित किया, अपने ग्राहकों से अपनी गलती के लिए साफ-साफ माफी मांगी, उत्सुकता के साथ उन्हें सुना और उनके सुर में अपना सुर मिलाने के लिए अपनी मांगों को सुधारा. बेशक उसे इसमें मोदी के कुशासन और उनके दोस्तों की गंदी हरकतों के खिलाफ बढ़ रहे गुस्से ने भी मदद की.

असल में आप की शुरुआत काफी हद तक एक तकनीकी शुरुआत जैसी है जो स्थापित दिग्गजों को अपने कुशल कारोबारी मॉडल, फुर्तीलेपन और नई-नई चीजों को खोज निकालने की महारत के साथ कड़ी टक्कर देती है. हमारे महानगरों की आत्म-विश्वासी नवउदारवादी पीढ़ी ऐसी किसी चीज की इच्छा कर रही थी,, जिसको एक महाशक्ति के रूप में भारत की अनंत कुशलता पर भरोसा है, और जिन्हें लगता है कि पिछड़ चुके, भ्रष्ट और नाकाबिल राजनेता इसमें रुकावट डाल रहे हैं. इसीलिए वे देश को जन लोकपाल जैसे संस्थान के जरिए भ्रष्टाचार से मुक्त करने के विरोध प्रदर्शन में वे उत्साह से कूद पड़े, जिसे अन्ना हजारे जैसे एक छुटभैए नैतिक सनकी के चेहरे की मदद से शुरू किया गया था. अपने इस कामयाब बाजार की परख (टेस्ट मार्केटिंग) के साथ आप ने एक राजनीति-विरोधी राजनीतिक उद्यम के रूप में शुरुआत की. यह फौरन विचारधारा विहीन आदर्शवादियों की चहेती बन गई. नए विचारों की हिमायत में विचारधारा के बोझ को खारिज करना इस उत्तर-विचारधारात्मक युग में कारगर हो सकता है लेकिन इसमें पुराने गड्ढे में फिसल कर गिर जाने का भी खतरा है. जो भी हो, विचारधारा का ढोल पीटने के बावजूद सभी पुराने खिलाड़ियों में से किसी के पास भी कोई विचारधारा नहीं थी और सिर्फ मुफ्त में चीजें बांटने की बात करने वाले गरीब परस्ती और बहुसंख्यकवादी अपीलें ही काम करती आई थीं. बदकिस्मती से, आप इस सिलसिले को पलटती हुई नहीं दिखती.

आगे बढ़ने के विचार

शुरुआत करने से पहले सबसे बड़ी चुनौती आगे बढ़ने की या फिर बड़ी मछली द्वारा निगल लिए जाने की होती है. याद रखिए कि माइक्रोसॉफ्ट ने नेस्केप के साथ क्या किया. इन विचारों के अभाव में शुरुआतें आखिर में व्यापारी पूंजीपतियों और प्रमोटरों की तिजोरियां भरने के काम आती हैं.

अपने घोषणापत्र में आप ने दिल्ली के लिए 70सूत्री कार्ययोजना का वादा किया है, जिनके बारे में बताया जा रहा है कि उन्हें जनता के साथ सलाह-मशविरा करने के बाद बनाया गया है. उनमें से अनेक में भारी खर्च होगा, इसके अलावा केंद्र में संभावित विरोधियों और दिल्ली राज्य के भीतर घटकों के साथ सियासी लड़ाई की जरूरत पड़ेगी. जैसा कि एक अर्थशास्त्री (अशोक लाहिड़ी, इंडिया टुडे, 23 फरवरी 2015) ने बहुत सतर्क रूप से संकेत किया है, पांच बरसों के लिए वित्तीय खर्च 69,000 करोड़ या 13,800 करोड़ रुपए प्रति वर्ष होगा. यह दिल्ली के बजट का एक तिहाई है जिसका आधा वेतन और रख-रखाव में खर्च होता रहा है. संसाधनों में इतनी गहरी खाई है कि उन्हें कम करके नहीं देखा जा सकता. इसमें संदेह नहीं है कि आप इस योजना को लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी, क्योंकि उसे पता है कि वह इस बार कोई चूक नहीं कर सकती. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भाजपा आप के फीके वादों को निचोड़े बिना उसको इतनी आसानी से यश का भागी नहीं बनने दे सकती. चीजें कैसे रंग लाएंगी, यह देखना बाकी है. ये सुधारात्मक कदम जरूरी हो सकते हैं, लेकिन वे गुणात्मक रूप से उन कदमों जैसे ही हैं, जो पुरानी पार्टियां हर वक्त करती आई हैं. यकीनन, आगे बढ़ने के लिए यह कोई सही खयाल नहीं है.

अपनी साख को खोए बिना आगे बढ़ने का सबसे कारगर तरीका, जनता के लिए एक नए जनवादी आदर्श की रचना करना है. वीआईपी संस्कृति और मोहल्ला समितियों में सत्ता के विकेंद्रीकरण को खत्म करने जैसे विचार आप के एजेंडे में पहले से ही रहे हैं. उनको नव-उदारवादी आदर्शों से परे, उनके गहरे मर्म तक ले जाने की जरूरत है. जनवाद का मर्म इसमें है कि मूल्यों के बंटवारे में जनता के बीच भेदभाव किया जाए और जनता के अलग अलग हिस्से को अलग अलग मूल्य दिए जाएं चाहे वो राष्ट्रपति हो या प्रधान मंत्री या कोई और. उनकी जिंदगियां एक सफाईकर्मी (मैला ढोनेवाले) या गांव के स्कूल टीचर से ज्यादा अहम नहीं हैं. जनवाद की एक दूसरी और शायद सबसे बड़ी दुश्मन शख्सियतों की पूजा (व्यक्तित्व पूजा) है, जो सभी गैर-जनवादी दस्तूरों और रिवाजों की जड़ है. आप को अरविंद केजरीवाल के इर्द-गिर्द बुनी जा रही शख्सियत को रोकना चाहिए. कहा जाता है कि चीन के देंग जियाओ पिंग की तरह वे भी बिल्लियों का रंग जानने में रुचि नहीं रखते, कि वे सफेद हैं या काली, जब तक वे चूहे पकड़ रही हैं. अच्छा हो या बुरा, उन्हें वाजिब तरीके से याद दिलाया जाना चाहिए कि देंग की सबसे बड़ी अच्छाई ये थी कि उसने अपने इर्द-गिर्द व्यक्ति पूजा को पनपने नहीं दिया. उसने माओ द्वारा किए गए कामों को पलटते हुए भी माओ को एक पूजनीय शख्सियत के रूप में बने रहने दिया.
 

अनुवाद- रेयाज उल हक

परिवर्तनकामी संस्कृतिकर्मी अनिल ओझा

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/04/2015 08:00:00 AM


अनीश अंकुर 
लगभग 16 वर्ष पहले 5 फरवरी 1998 को अनिल ओझा कदमकुआं स्थित वामपंथी पुस्तकों की दुकान समकालीन प्रकाशन गए। प्रगतिशील एवं वामपंथी साहित्य के प्रचार-प्रसार में रुचि लेने वाले वयोवृद्ध जगदीश जी उस दौरान किताब की दुकान पर बैठा करते थे। अनिल ने वहां से चार किताबें- मंथली रिव्यू (चेग्वारा विशेषांक), ए स्टडीज इन मार्क्सिज़्म; (पीपीएच) , डीडी कोशाम्बी की साइंस, सोसायटी एंड पीस और एक्जैसपिरेटिंग एसेज खरीदीं।

किताबें खरीद कर वे गांधी मैदान स्थित ‘प्रेरणा’ कार्यालय के लिए चल पड़े जहां ‘कविता और संगीत’ विषय पर होने वाली बातचीत में उन्हें शामिल होना था। लेकिन अनिल ओझा अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सके। बीच रास्ते में क्या हुआ किसी को आज तक ठीक से नहीं मालूम। सात दिनों के बाद 12 फरवरी, 1998 को वे पीएमसीएच में मृत पाए गए। मृत देह के समीप वे चारों पुस्तकें भी पायी गयीं। अनिल की उम्र मात्र 28 वर्ष थी।

अनिल एक नाटककार, कवि, संगठक, राजनैतिक कार्यकर्ता और सबसे बढ़कर दृष्टिसंपन्न संस्कृतिकर्मी थे। छपरा जिले के कुम्हैला गांव के रहने वाले अनिल माता-पिता द्वारा यू़पीएससी की तैयारी करने के लिए दिल्ली भेजे गए। उसी दौरान उनका परिचय मार्क्सवादी दर्शन से हुआ। परिणामस्वरूप वे गरीबों के बीच में काम करने गरीबों के बीच चले आए। अनिल ने सांस्कृतिक मोर्चे पर काम को प्राथमिकता दी।

पिछले वर्ष प्रेमंचद जयंती के मौके पर वरिष्ठ रंगकर्मी सुमन कुमार द्वारा प्रेमचंद की दो मशहूर कहानियों ‘सद्गति’ व ठाकुर का कुआं’ का नाट्य मंचन किया था। इन दोनों कहानियों को एक ही नाटक में रूपांतरित करने का काम अनिल ओझा ने किया था। अनिल का एक और नुक्कड़ नाटक ‘शिक्षा का सर्कस’ भी काफी लोकप्रिय रहा है। अनिल की पुण्यतिथि पर 12 फरवरी को नवोदित संस्था ‘स्ट्रगलर्स’ के बैनर तले ‘शिक्षा का सर्कस’ का प्रेमंचद रंगशाला में प्रदर्शन किया। युवा रंगकर्मियों के इस समूह ने मौजूदा शिक्षा व्यवस्था पर बुनियादी किस्म के प्रश्न खड़े करने वाले इस नाटक के ढेरों मंचन किए। लेकिन नाटक का नाम बदलकर ‘करप्शन इन एजुकेशन’ कर दिया गया है। अनिल के अन्य नाटकों में प्रमुख है गिरी रूपल्ली, (मुद्रास्फीति के कारण रुपये की दुर्गति पर) ‘उस शहर का नाम भोपाल है’ (भोपाल गैस त्रासदी के दसवें वर्ष पर लिखा गया नाटक)। प्रख्यात मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी की हत्या पर लिखा अनिल का नाटक भी खासा चर्चित रहा था। अंतिम नाटक जो अनिल लिख रहे थे वो बाथे जनसंहार पर था। यह जनसंहार उनकी मौत के डेढ़ महीने पूर्व घटित हुआ था। इस जनसंहार में सामंतों की निजी सेना द्वारा 59 दलितों की नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी गयी थी। इस जनसंहार ने उन्हें बेचैन और उद्वेलित कर दिया था। लेकिन असमय निधन के कारण यह नाटक पूरा न हो पाया। अनिल मुक्तिबोध की प्रख्यात रचना ‘अंधेर में’ के नाट्य रूपांतरण की भी योजना बना रहे थे। अनिल खुद अभिनेता भी थे लेकिन अधिकांशत: अभिनय नुक्कड़ नाटकों में ही किया।

पटना रंगमंच पर अनिल ‘अभिव्यक्ति सांस्कृतिक मंच’ से जुड़े रहे। चर्चित रंगकर्मी पुंज प्रकाश का पटना में रंगमंचीय जीवन का प्रारंभ ‘अभिव्यक्ति’ से ही हुआ था। दिल्ली से बिहार लौटने के बाद अनिल सक्रियता से काम करते रहे। अनिल की सक्रियता में बाधा तब पड़ी जब वे पलामू में तेंदू पत्ता मजदूरों के बीच काम करने के दौरान नक्सली बताकर पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। सात महीने तक वे गढ़वा जेल में बंद रहे। उन पर कानून की धारा 120 बी लगायी गयी। यह धारा उस समय भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पर भी लगायी गयी थीं। कानून की एक ही धारा कैसे दो हैसियत वाले लोगों के साथ व्यवहार करती है इस पर अनिल ने एक कविता लिखी ‘धारा 120 बी’। कविता कुछ यों है।

नरसिम्हा राव
मैं और तुम
दोनों धारा 120 बी के अभियुक्त हैं
धारा 120 बी के अंतर्गत होने वाले षडयंत्र को
तुमने देश के खिलाफ रचा
और मैंने तुम्हारे खिलाफ
मैं जेल में हूं
तुम्हारे ऊपर संसद में बहस हो रही है
मुझे अदालत के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है
जबकि अदालत तुम्हारे दरवाजे पर जा रही है
मैं इस जेल से तब तक बाहर नहीं आऊंगा
जब तक बेगुनाह साबित न हो जाऊं
तुम इस जेल में तब तक नहीं आओगे
जब तक दोषी न करार दे दिए जाओ
ये हमारी तुम्हारी हैसियत का ही फर्क है नरसिम्हा राव
कि धारा 120 बी मेरे ऊपर अभियोग है
जबकि तुम धारा 120 बी के ऊपर अभियोग हो।

6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद गुंबद ढाहा गया उस दौरान कुछ कारसेवक भी मारे गए थे। अनिल ने उन कारसेवकों को आधार बनाकर सांप्रदायिकता विरोधी कविता लिखी ‘एक इकबालिया बयान’।

मैं जो हिंदू था
कब्र में गाड़ा जा रहा था
मैं जो मंदिर बनाने गया था
मस्जिद में मर रहा था, मारा जा रहा था
नहीं थी दिमाग में ऐसी कोई बात
समूची चेतना के साथ इतना सोच रहा था
कि किसी तरह मस्जिद का गिरना रुक जाए
तो जान बच जाए

अनिल ओझा की एक और मशहूर कविता है ‘टार्चरमैन’। पुलिस की टार्चर से लड़ते साथी को समर्पित ये कविता काफी लोकप्रिय हुई।

मैं ये जानता हूं टार्चर मैन
तुम्हारा और मेरा रिश्ता वह नहीं है
जो तुमने इस कमरे में बनाया था
पूंजी पर टिक रिश्ते का इस्तकबाल
करने वाले मेरे दोस्त
इस रिश्ते को तुम्हारी तनख्वाह
और तुम्हारे आकाओं के
हुक्म ने गढ़ा था
यही वो बात थी जिसके खिलाफ
मैं अड़ा था, लड़ा था
तुम्हीं बताओ जिस युद्ध में
मैं तुम्हारे सामने खड़ा था
उसमें पूंजी कहां थी,
धर्म कहां था, राष्ट् कहां था

इस कविता के कई नाट्य प्रदर्शन भी किए गए। अनिल का गांधी मैदान के पास ‘प्रेरणा’ कार्यालय में काफी आना-जाना था। ‘प्रेरणा’ और अनिल की संस्था ‘अभिव्यक्ति’ ने मिलकर आजादी की 50वीं सालगिरह के मौके पर सरकारी उत्सवों के समानांतर ‘जनोत्सव’ आयोजित करना तय किया। ‘जनोत्सव’ बेहद सफल सांस्कृतिक आयोजन रहा था। एक सप्ताह तक प्रतिदिन नुक्कड़ नाटक, काव्य पाठ, सेमिनार और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। इस आयोजन में आनंद पटवर्धन की चर्चित डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘राम के नाम’ और ‘बंबई आवर सिटी’ का प्रदर्शन किया गया था। अनिल ने इस आयोजन में प्रमुख भूमिका निभायी थी।

रंगमंच के कलाकारों में दुनिया के सरोकारों से भी जोड़ने के सवाल को अनिल बेहद प्रमुखता से उठाया करते। वे मानते थे कि रंगमंच में सृजनात्मक ऊंचाई हासिल करने के लिए ये बेहद आवश्यक है कि एक अनुकूल वैचारिक माहौल बनाया जाए। रोजर्मे की मामूली बातों को बड़े राजनैतिक सवालों से जोड़ने की उनकी क्षमता के सभी कायल थे। राजनीति और विचार की दुनिया के पेचीदे मसलों को जिस बोधगम्य भाषा में अनिल अभिव्यक्त करते वो दुर्लभ था।

अनिल की मौत ने उस वक्त परिवर्तनकामी एक्टीविस्टों को स्तब्ध कर दिया था। सभी समझ रहे थे कि अनिल की मौत एक ऐसी क्षति है जो आगे आने वाले समय में शायद ही भरी जा सके। उनकी मौत के पश्चात एक पुस्तिका ‘अभिव्यक्ति’ के साथियों ने छपवायी थी जिसमें उनकी कुछ कविताएं, नाटक एवं डायरी के अंश प्रकाशित किए गए थे। बदलाव के रास्ते में अपनी मौत के सवाल को भी अनिल अपनी एक कविता में उठाते हैं।

मैं मरूंगा या मारा जाऊंगा
यह मेरी जीत-हार के सवालों को तय नहीं करता
क्योंकि हमारे धंधे में मौत कोई हार होती ही नहीं
मैं अपने साथियों के साथ संघर्ष की सरहद पर
तुम्हें और किसी सूरत में मिल सकता हूं.

सारा लोहा उन गीतों का

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/02/2015 10:33:00 PM

आज कुछ क्रांतिकारी, जनवादी गीत. अलग अलग समय और कार्यक्रमों में रिकॉर्ड किए गए इन गीतों में भारतीय किसान-मजदूर और आदिवासी जनता और महिलाओं की आजादी की आवाज बुलंद हुई है. हेम, कबीर कला मंच के साथियों और उन सभी जनवादी कलाकारों के नाम जो आज अपने गीतों की वजह से जेलों में बंद हैं.

जागो रे जागो रे जागो जागो : मुकेश



 

लाल झंडा लेकर कॉमरेड : वासु



 

हम त हईं मजदूर किसान : मुकेश

 


 

भईया हो भईया मजदूर भईया : आरसीएफ 

 

 

तुम्हारे हाथ: आरसीएफ


सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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