वापस बर्बरता की ओर: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/10/2018 07:08:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े अपने इस स्तंभ में भाजपा के शासनकाल में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा और बलात्कार की घटनाओं की चर्चा कर रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

महाराष्ट्र के पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और अब मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह ने, जिन पर भारत के युवाओं की शिक्षा के प्रशासन की जिम्मेदारी है, अपनी समझदारी का नमूना दिखाते हुए यह दावा किया कि डार्विन गलत थे. लेकिन कठुआ में संघ परिवार के उनके संगियों की करतूत को देखते हुए यह सोचा जा सकता है कि शायद वो सही हैं. आठ साल की आसिफा को अगवा करने में जो बर्बरता दिखाई गई, वह इस धरती पर किसी भी ऐसे सभ्य इंसान को झकझोर देने और शर्मिंदा कर देने के लिए काफी है जिसे इन लोगों के इस बदतर हालत में विकसित हो जाने में यकीन हो: उसे एक मंदिर में बंद करके भूखे रखा गया और पांच दिनों तक उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, बेरहमी से उसकी हत्या की गई और उसकी कुचली हुई लाश को एक जंगल में फेंक दिया गया, ताकि उसके मुस्लिम बाकरवाल समुदाय को डरा कर उस इलाके से भगा दिया जाए. और मानो यह बर्बरता ही काफी न हो, सत्यपाल की ही वैचारिक मंडली के लोगों ने, जम्मू बार असोसिएशन में हिंदू एकता मंच के सदस्य और संघ परिवार से जुड़े दूसरे गिरोहों ने बलात्कारियों के समर्थन में एक घिनौना जुलूस निकाला, जिसका नेतृत्व भाजपा के मंत्री कर रहे थे. यह बताने के लिए वे राष्ट्रीय झंडे फहरा रहे थे कि वह अमानवीय करतूत एक राष्ट्रवादी उपलब्धि थी. यह डार्विन के गलत होने का एक और सबूत था – जानवर से इंसान बनने (यानी उद्विकास) की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरने के बाद, इंसानी शरीर वाले लोग वहशी जानवरों से तो बदतर नहीं ही हो सकते. ऐसी अनेक करतूतें भी हैं, जिनकी इस करतूत के साथ ठीक-ठीक तुलना तो नहीं की जा सकती, लेकिन जो पक्के तौर पर इसकी निशानी हैं कि हमने सभ्य दुनिया में अपनी जगह पर दावा करते हुए जो थोड़ी-बहुत तरक्की की थी, हम उससे पीछे जा रहे हैं.

आती हुई गर्मियों की गहमागहमी

अप्रैल में गर्मियों के मौसम की शुरुआत में ऐसी अनेक घटनाएं घटीं, जिन्होंने हमारे वक्त की हताशा और गमगीनी को और गहरा कर दिया. जिन दिनों इस देश को जनवरी में आसिफा के साथ घटी घटना का पता लगा, जब बलात्कारियों के समर्थन में हिंदुत्व कट्टरपंथियों ने प्रदर्शन किए, उन्हीं दिनों एक 17 साल की लड़की की त्रासद दास्तान भी सामने आई, जिसका उत्तर प्रदेश में उन्नाव विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने 4 जून 2017 को बलात्कार किया था और इसके बाद विधायक के तीन साथियों द्वारा उसका अपहरण करके उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था. यह घटना तब उजागर हुई जब लड़की ने 9 अप्रैल को योगी आदित्यनाथ के आवास के सामने खुद को जलाने की कोशिश की. उसी दिन उसके पिता की न्यायिक हिरासत में मौत हो गई थी. उन्हें सेंगर के भाई के नेतृत्व में सेंगर समर्थकों ने बुरी तरह मारा था क्योंकि उन्होंने एफआईआर वापस लेने से इन्कार कर दिया था. पुलिस ने हमलावरों को गिरफ्तार करने के बजाए लड़की के पिता को ही न्यायिक हिरासत में ले लिया, जहां उनकी मौत हो गई. इसके बाद भड़के गुस्से के नतीजे में ही जाकर सेंगर के नाम पर एक बाकायदा एफआईआर दर्ज हुआ और सीबीआई ने उसे पूछताछ के लिए हिरासत में लिया.

नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार के इन दो मामलों के सामने आने के बाद, खबरों में लड़कियों के साथ बलात्कार और उनकी हत्या की इतनी खबरें आने लगीं मानो लग रहा था कि भारत ‘बच्चियों के बलात्कार’ का एक महीना मना रहा हो. चार महीने की बच्चियां तक इसकी शिकार बन रही थीं. एक तरफ तो नागरिक समाज में ऐसी घटनाएं हो रही थीं, वहीं उनके साथ राज्य द्वारा लिए जाने वाले फैसले और कार्रवाइयों का सिलसिला मानो एक होड़ लगा रहा था. अगर कुछेक की ही मिसाल दें, तो सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी अनेक याचिकाओं को बड़ी नाराजगी के साथ खारिज कर दिया, जिनमें रहस्यमय हालात में और संदिग्ध राजनीतिक मोड़ पर जज लोया की अचानक होने वाली मौत की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी; गुजरात उच्च न्यायालय ने माया कोडनानी को बरी कर दिया, जिसे 2012 में एक विशेष अदालत ने 2002 में गुजरात दंगों के दौरान नरोदा पाटिया मामले की ‘मुख्य साजिशकर्ता’ बताया था, जिसमें 97 मुसलमान मार दिए गए थे – और यह पहली रिहाई नहीं थी; गुजरात 2002 में शामिल ज्यादातर अपराधी छूट चुके हैं, और इसके पीड़ितों के लिए इंसाफ की मांग करने वाला सबसे प्रमुख चेहरे तीस्ता सीतलवाड़ को लगातार परेशान किया जा रहा है. आतंक-विरोधी एक विशेष अदालत ने हिंदू साधु स्वामी असीमानंद और चार दूसरे लोगों को 2007 के मक्का मस्जिद बम धमाके के मामले में रिहा कर दिया, जिसमें 18 मई 2007 को नौ लोग मारे गए थे और 58 घायल हुए थे. गुजरात 2002 की ही तरह, ‘भगवा’ आतंक की इन कार्रवाइयों के ज्यादातर आरोपित छूट चुके हैं, और दूसरी तरफ पुलिस 31 दिसंबर 2017 को पुणे में यलगार परिषद के संबंध में कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे मार रही है.

इस आखिरी मामले में, महाराष्ट्र के नरेंद्र मोदी माने जाने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने एक बयान दिया कि इन छापों का यलगार परिषद से कोई लेना-देना नहीं था. यह झूठ फौरन ही उजागर हो गया, जब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तलाशी वारंट की एक कॉपी लोगों के बीच प्रसारित की, जिसमें साफ-साफ भीमा-कोरेगांव हिंसा का हवाला था. अगर वे सचमुच में भीमा-कोरेगांव से संबंधित थे, तो फिर यह समझना मुश्किल है कि तब नागपुर में वकील सुरेंद्र गडलिंग और दिल्ली में रोना विल्सन के घरों पर किस तर्क से छापा मारा गया, जिनका यलगार परिषद या भीमा-कोरेगांव हिंसा से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था. जहां फड़नवीस ने 1 जनवरी 2018 को हुई हिंसा के लिए एक एफआईआर में पहले आरोपित संभाजी भिडे को क्लीन चिट दे दी, वहीं वे उन कार्यकर्ताओं को लगातार परेशान कर रहे हैं, जो एक दिन पहले हुए यलगार परिषद के साथ जुड़े थे या न भी जुड़े हों.

बलात्कार और भाजपा

भाजपा के मई 2014 में सत्ता में आने के बाद से, बलात्कार की घटनाओं में साफ तौर पर तेजी से इजाफा हुआ है. एनसीआरबी की क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2010 से 2016 के बीच प्रति एक लाख आबादी पर बलात्कार की घटनाएं और उनकी दर इस प्रकार है:





यह साफ-साफ दिखाता है कि जहां बरसों के दौरान बलात्कार की घटनाओं में लगातार एक इजाफा हो रहा था और संप्रग सरकार के आखिरी साल (2013) में इसमें खासा उछाल आया, वहीं इसके बाद इसमें एक तीखी बढ़ोतरी हुई है. संप्रग और राजग के तीन सालों के दौरान बलात्कार की घटनाओं का औसत क्रमश: 27613 और 36778 है, और प्रति लाख आबादी पर घटनाओं की दर क्रमश: 4.7 और 6.23 है, जिसका मतलब है कि भाजपा के शासन काल में बलात्कार की घटनाओं में और इसकी दर, दोनों में ही 33 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. संभव है कि इस चिंताजनक इजाफे की कोई ऐसी वजह पेश करना मुश्किल हो जिसको निर्विवाद रूप से कबूल किया जा सके, लेकिन इस पर जरूर गौर किया जा सकता है कि इस इजाफे में ज्यादातर भाजपा की हुकूमत वाले राज्यों का योगदान है. क्या ऐसा भारत के सामंती अतीत के वैचारिक महिमामंडन की वजह से हो रहा है, जिसमें औरतों को मर्दों के लिए महज एक यौन वस्तु समझा जाता था? ज्यादातर हिंदू धर्मशास्त्रों में – जिसकी एक प्रमुख मिसाल मनुस्मृति हो सकती है – औरतों को लेकर बेहद खौफनाक हवाले हैं.[1]  गर्भ में ही बच्चियों को मार देने की घटनाएं हिंदुओं में सबसे ज्यादा हैं, जो भाजपा शासित राज्यों में चिंताजनक लैंगिक अनुपात से जाहिर होता है. लैन्सेट द्वारा 2011 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक पिछले तीन दशकों में 1 करोड़ 20 लाख बच्चियों को जन्म से पहले ही मार दिया गया.[2]

बलात्कार के ऐसे मामलों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है, जिनमें भाजपा नेता अभियुक्त हैं. इस बात की गंभीरता को समझने के लिए 2016 और 2017 की कुछेक घटनाओं की एक झलक काफी है: उत्तराखंड पुलिस ने भाजपा नेता हरक सिंह रावत को एक 32 वर्षीय महिला के बलात्कार और उत्पीड़न के लिए गिरफ्तार किया. [3] एक भाजपा नेता वेंकटेश मौर्य पर चित्रदुर्ग की एक 38 वर्षीय महिला के बलात्कार के मामले में आरोप लगाए गए.[4]  गुजरात में एक स्थानीय भाजपा नेता अशोक मकवाना को 29 मई को इंडिगो एयरलाइंस की गोआ-अहमदाबाद उड़ान के दौरान 13 साल की एक लड़की के साथ छेड़खानी के आरोप में गिरफ्तार किया गया.[5] मध्य प्रदेश में एक स्थानीय भाजपा नेता और उसके पांच साथियों पर एक आदिवासी लड़की को अगवा करके उसके साथ सामूहिक बलात्कार करने के आरोप हैं, क्योंकि पुलिस के मुताबिक, उसने भाजपा नेता पर दर्ज कराए गए छेड़खानी के मामले को वापस लेने से मना कर दिया था.[6]  एक कॉरपोरेटर और भाजपा की मीरा-भयंदर ईकाई के महासचिव और म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन की वार्ड समिति के अध्यक्ष अनिल भोसले पर एक 44 वर्षीया महिला का बलात्कार और अप्राकृतिक सेक्स करने का आरोप है.[7]  एक स्थानीय भाजपा नेता भोजपाल सिंह जादोन और उसके दो साथियों पर एक दलित महिला का सामूहिक बलात्कार करने का आरोप दर्ज है. मध्य प्रदेश में मोरेना में सुमावली गांव की निवासी इस महिला को बीपीएल कार्ड दिलाने में मदद करने का वादा किया गया था.[8]  दिल्ली में भाजपा के पूर्व विधायक विजय जॉली पर बलात्कार का मामला दर्ज है. शिकायतकर्ता ने बताया कि जॉली ने गुड़गांव के एक रिज़ॉर्ट में उसके ड्रिंक में नशीली दवा मिला कर उसका यौन उत्पीड़न किया था.[9]  गुजरात से भाजपा के एक विधायक जयेश पटेल के खिलाफ, जो वडोदरा में निजी मालिकाने वाली पारुल यूनिवर्सिटी का संस्थापक अध्यक्ष है, एक 22 वर्षीय नर्सिंग छात्रा के बलात्कार का मामला दर्ज है.[10] रेक्टर भावना पटेल पर भी अपराध में मददगार होने का मामला दर्ज है.  ये बलात्कार के इक्के-दुक्के मामले भर नहीं हैं, जिनमें भाजपा के लोगों पर अपराध के आरोप लगे हैं. बलात्कार की पीड़ित एक महिला के लिए ताकतवर लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना भी कितना मुश्किल होता है, यह बात उन्नाव मामले से भी उजागर होती है.

तेजरफ्तार पतन

धूमधाम से होने वाले सरकारी प्रचार के बावजूद, भाजपा की हुकूमत के ये चार साल लोकतंत्र के तेज रफ्तार पतन को दिखाते हैं, जिसमें कानून व्यवस्था और तार्किक और वैज्ञानिक नजरिए की जड़ें उखड़ती जा रही हैं. देश में सभी संस्थानों का भगवाकरण होना और स्वतंत्र न्यायपालिका का, जो भारत में अवाम की आखिरी उम्मीद है, कमजोर पड़ते जाना लोकतंत्र के भविष्य के लिहाज से चिंताजनक है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को लेकर पैदा हुआ विवाद है, जिनके खिलाफ अभूतपूर्व तरीके से सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ जजों ने खास तौर पर बुलाई गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी बातें रखीं और हाल ही में विपक्ष जिनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लेकर आया. फिलहाल पूर्व भाजपा अध्यक्ष और अब राज्य सभा के सभापति वेंकैया नायडू ने महाभियोग के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिससे किसी और अभूतपूर्व संवैधानिक विवाद के खड़ा होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता.


एक तरफ जहां सभी संवैधानिक अच्छाइयों को व्यवस्थित तरीके से खत्म किया जा रहा है, वहीं इस संविधान के शिल्पकार कहे जाने वाले आंबेडकर को भव्य स्मारकीय छवि दी जा रही है. अप्रैल में एक अहम आयोजन उनके नाम पर हुआ, जिसमें दिल्ली के 26 अलीपुर रोड में उनके लिए एक भव्य राष्ट्रीय स्मारक का उद्घाटन किया गया. उलझन में पड़े दलितों के मन में यह सवाल पैदा होता है कि कहीं आंबेडकर के नाम पर स्मारक, उनकी आवाज को दफनाए जाने के लिए तो नहीं बनाए जा रहे हैं. क्या यह हिंदू धर्म में औरतों को देवियों का दर्जा देने, लेकिन जीती-जागती औरतों को अमानवीय स्तर तक दबा कर और कुचल कर रखने के तरीके से मेल नहीं खाता है?

भाजपा के शासन का एक और शिकार तार्किकता और वैज्ञानिक नजरिया है, जिन्हें प्रोत्साहित करने की बात खुद संविधान में ही कही गई है, जो उन्हें लोकतंत्र का जरूरी उपकरण मानता है. छोटा हो या बड़ा, हरेक भाजपा नेता ने अतार्किकता को बढ़ावा देने में भारी योगदान दिया है, और इस अभियान की अगली कतार में खुद प्रधानमंत्री ही खड़े रहे हैं. याद कीजिए कि 2014 में ही उन्होंने कहा था कि भारत में प्रजनन की जीन तकनीक और प्लास्टिक सर्जरी महाभारत काल में मौजूद थी. हाल ही में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने कहा कि महाभारत काल में इंटरनेट मौजूद था और राज्य के राज्यपाल तथागत रॉय ने उन्हें अपना समर्थन दिया, जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे राष्ट्र के विवेक की रखवाली करेंगे. वे सभी जो अब तक डार्विन में यकीन रखते आए हैं कि इंसान तरक्की की राह पर आगे बढ़ रहे हैं, वे इस घनौनी पतनशीलता पर अवाक रह जाएंगे. इसीलिए, सत्यपाल सिंह ही सही मालूम पड़ते हैं जब वे कहते हैं कि डार्विन गलत थे!



नोट्स
  1. सृष्टि गोविलकर, ‘दीज 33 शॉकिंग वर्सेज़ फ्रॉम मनुस्मृति अबाउट वुमेन विल इन्फ्युरिएट यू’, http://www.youthconnect.in/2015/07/09/33-shocking-verses-from-manusmriti-about-women/
  2. नीता भल्ला द्वारा उद्धृत, https://in.reuters.com/journalists/nita-bhalla
  3. जी न्यूज, 30 जुलाई 2016
  4. डेक्कन क्रॉनिकल, 19 अक्तूबर 2016
  5. द हिंदू, 1 नवंबर 2016.
  6. डेक्कन क्रॉनिकल, 18 दिसंबर 2016.
  7. टाइम्स ऑफ इंडिया, 20 जनवरी, 2017.
  8. हिंदुस्तान टाइम्स 1 मार्च 2017.
  9. इंडिया टुडे, 23 फरवरी 2017.
  10. इंडियन एक्सप्रेस, 20 जून 2016.

मंदिर की वापसी: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/15/2018 05:18:00 PM


अपने नियमित स्तंभ में आनंद तेलतुंबड़े इस बार अयोध्या में राम मंदिर बनाने की कवायदों पर टिप्पणी कर रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक

वैश्विक पूंजी के समर्थन के साथ, ‘भ्रष्ट’ कांग्रेस के खिलाफ तूफानी हमला करते हुए नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता में आए तो उन्होंने अच्छे दिन और स्वच्छ भारत जैसे नारों से जनता को मुग्ध कर दिया था, जिनका मतलब जितना सीधा था उतना ही प्रतीकात्मक भी. लेकिन पिछले तीन बरसों में उन्होंने हमारे सार्वजनिक जीवन के हरेक पहलू को जितनी गलाजत से भर दिया है, उससे आने वाले कई बरसों में उबरना मुश्किल होगा. सामाजिक तौर पर, भगवा गिरोह को इसके लिए मजबूती मिली है कि वे अल्पसंख्यकों पर अपना आतंक थोपने और सांप्रदायिक जहर फैलाने की अपनी फासीवादी हरकतों को आगे बढ़ाएं. राजनीतिक तौर पर, लोकतांत्रिक कायदे व्यवस्थित रूप से खोखले किए गए हैं, संसदीय शिष्टाचार को कमजोर किया गया है और संस्थानों का भगवाकरण किया गया है. आर्थिक रूप से नोटबंदी और आनन-फानन में जीएसटी लागू करने जैसे अतार्किक फैसले लिए गए हैं और अर्थव्यवस्था में वृद्धि का रुझान पलट गया है: ये बातें उनकी हुकूमत की पहचान हैं. अब, जब पास आते 2019 के चुनावों के मद्देनजर उनकी नाटकीय भाषणबाजी से मदहोश लोगों की आंखें खुलने लगी हैं और हकीकत दिखने लगी है, जिसकी झलक हाल में चुनावों में उनकी पार्टी के प्रदर्शन में आई गिरावट में देखी जा सकती है, तो इस बात के साफ संकेत मिल रहे हैं कि राम मंदिर के नाम पर लोगों को सांप्रदायिक रूप से बांटने की रणनीति को फिर से आजमाया जा रहा है. आने वाले सालों में यह देश फिर से एक बुरे दौर से गुजरने जा रहा है.

सांप्रदायिकता की गलाजत

यह सब जानते हैं कि राम मंदिर, कश्मीर पर अनुच्छेद 370 और पाकिस्तान (दुश्मन) ऐसे तीन मुद्दे रहे हैं, जिन्होंने भाजपा को एक छोटी-मोटी, किनारे पर खड़ी पार्टी से धकेल कर एक खौफनाक सत्ताधारी पार्टी बना दिया. लेकिन इसने असल में राम मंदिर के मुद्दे से ही उड़ान भरी, जिसमें तब जान पड़ गई जब राजीव गांधी सरकार ने 1 फरवरी 1986 को फैजाबाद जज के फैसले के घंटे भर के भीतर ही बड़े उत्साह से बाबरी मस्जिद का ताला खोलने का आदेश दे दिया था. उनका इरादा 1984 से शुरू भाजपा के राम मंदिर अभियान की हवा निकालने का था, लेकिन संघ परिवार ने इस पहलकदमी को झटक लिया और सरकार के फैसले का असर उल्टा पड़ा. गांधी के इस फैसले ने भाजपा को (जो तब जनसंघ थी) खासा फायदा पहुंचाया, जिसने इसे 1984 की दो सीटों के आंकड़े से बढ़ा कर 1989 में 86 सीटों पर पहुंचा दिया. अपनी कामयाबी के उत्साह में तब भाजपा के अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को गुजरात में सोमनाथ से अयोध्या तक एक रथ यात्रा शुरू की. अगर गृह राज्य मंत्री प्रदीपसिंह जडेजा पर यकीन किया जाए तो इस घिनौनी रथयात्रा के शिल्पकार और कोई नहीं बल्कि मोदी थे (इंडियन एक्सप्रेस, 22.04.2017). 23 अक्तूबर को समस्तीपुर में लालू प्रसाद यादव की सरकार द्वारा आडवाणी की गिरफ्तारी, इसके बाद अयोध्या में जमा कारसेवकों के उन्माद, 30 अक्तूबर को उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार द्वारा उन पर गोलीबारी का अंत आखिरकार 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने पर हुआ. इसने देश भर में, खास कर मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, कानपुर, दिल्ली, भोपाल जैसे शहरों में दंगों की आग फैला दी, जिसके नतीजे में 2000 से ज्यादा मौतें हुईं, जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे, और करोड़ों रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ. इसी मंदिर मुद्दे की ही अगली कड़ी में मोदी ने 2002 में गुजरात में 2000 मुसलमानों के कत्लेआम के जरिए इस पूरे कारनामे में एक अहम योगदान दिया.

इन सांप्रदायिक जनसंहारों से भाजपा को भारी फायदा हुआ. यात्राएं लोगों में सांप्रदायिक उन्माद भड़काने का भाजपा का खास तरीका बन गईं. आडवाणी के बाद दूसरी यात्रा एकता यात्रा थी, जिसे भाजपा के मुखिया मुरली मनोहर जोशी ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक निकाला, जो भाजपा के थोड़े से नेताओं के साथ खत्म हुई. इसकी शुरुआत 1992 के गणतंत्र दिवस के मौके पर श्रीनगर के लाल चौक पर कड़ी सुरक्षा के बीच तिरंगा फहराने से हुई थी. इस यात्रा में भी मोदी शामिल थे जो इसके संयोजक थे. 2011 में एक और यात्रा ‘राष्ट्रीय एकता यात्रा’ की शुरुआत की गई, जिसे श्रीनगर में राष्ट्रीय झंडा फहराने के लिए भाजपा के युवा मोर्चा ने कोलकाता से निकाला. इसे जम्मू और कश्मीर में उमर अब्दुल्ला सरकार ने रोक दिया, जो उन दिनों जारी शांति प्रक्रिया को पटरी से उतार सकती थी. भाजपा जैसे-जैसे ताकत हासिल करती गई, इसने इन मुद्दों पर रणनीतिक चुप्पी साधे रखी और इनकी बजाए इसने विकास को अपने चुनावी मुद्दे के रूप में पेश किया. एक व्यापक पहुंच हासिल करने के लिए तो यह जरूरी था ही, वैश्विक पूंजी के अपने सरपरस्तों को मनाने के लिए भी यह जरूरी था. अब जब पार्टी महसूस कर रही है कि उसके नीचे की जमीन धंस रही है और लोगों के ऊपर हकीकत साफ होती जा रही है कि यह सरकार कुछ खास नहीं कर रही है, तो ऐसा लग रहा है कि पार्टी अपने जनाधार को मजबूत करने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अपने पुराने खेल का सहारा लेने लगी है.

फिर से राम मंदिर

भाजपा के वैश्विक सरपरस्त लेकिन इस विचार से हो सकता है कि सहमत न हों और इसलिए यह 41 दिनों तक चलने वाली रामराज्य यात्रा से खुद को अलग रखे हुए है, जिसे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को झंडी दिखा कर रवाना करना था. लेकिन आखिरकार इसे 13 फरवरी को अयोध्या में भाजपा सासंद द्वारा रवाना किया गया, और यह यात्रा 6,000 किमी दूरी तय करते हुए तमिलनाडु के रामेश्वरम तक पहुंचेगी. बताया जाता है कि यात्रा का आयोजन महाराष्ट्र के एक अनजान से संगठन श्री राम दास मिशन यूनिवर्सल सोसायटी ने किया है, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े दो संगठनों विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने समर्थन दिया है. इसका मकसद ‘रामराज्य’ और राम मंदिर के बारे में ‘जागरुकता पैदा करना’ है. सवाल यह है कि ऐसा करने के लिए क्या उन्हें यात्राओं की जरूरत है? केंद्र और ज्यादातर राज्यों में भाजपा के सत्ता में है, जिनमें वे राज्य भी शामिल हैं जहां से यात्रा को गुजरना है, और इन राज्यों की मिसाल बखूबी बता सकती है कि रामराज्य कैसा होता है. मोदी की परिभाषा में यह एक कल्याणकारी राज्य है. अगर ऐसा है तो भाजपा सरकारें इसका ठीक उल्टी कही जा सकती हैं. भाजपा का सियासी एजेंडा सबकी नजरों के सामने है: यह यात्रा छह राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में 224 लोक सभा सीटों से गुजरेगी और यह कम अहम बात नहीं है कि कर्नाटक में अप्रैल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. हालांकि भाजपा सरकार ने यात्रा से खुद को एक सुरक्षित दूरी पर रखा है, लेकिन यात्रा जिन राज्यों से गुजरने वाली है वहां के पुलिस प्रमुखों को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लिखा है कि वे इसके आगे सफर को संभव बनाएं. यह दिलचस्प है कि जो सरकार, किसी रैली को तो छोड़ ही दें, एक छोटी सी आम सभा के लिए भी कार्यकर्ताओं को बेवजह ही अनुमति देने से मना कर देती है, उसने न सिर्फ इस यात्रा की इजाजत दी है, बल्कि अपनी व्यवस्था के लिए फरमान जारी किया है कि वो उसे मुमकिन बनाए, जबकि यह कानून-व्यवस्था के लिहाज से संभावित तौर पर खतरा है. रामराज्य की इसकी मांग भी अर्थपूर्ण है: रामराज्य की स्थापना, स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में रामायण को शामिल करना, रविवार की जगह गुरुवार को साप्ताहिक छुट्टी और विश्व हिंदू दिवस के रूप में एक दिवस का ऐलान. इस परियोजना का एक और पहलू भी है, वो यह है कि हिंदुत्व ताकतें रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का अदालत से बाहर निबटारा चाहती हैं, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में 15 मार्च से अंतिम सुनवाई होने वाली है. यह यात्रा मुस्लिम समूहों पर एक दबाव का काम कर सकती है, कि वे इसके लिए सहमत हो जाएं, क्योंकि अदालत के फैसले के बारे में पक्के तौर पर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है.

यह देखना दिलचस्प होगा कि यह रामराज्य क्या है. पहली बार गांधी ने अपने आजादी के आंदोलन में लोगों को फुसला कर जोड़ने के लिए इस अवधारणा का इस्तेमाल किया था, जब उन्होंने वादा किया था कि एक बार आजादी मिल जाने के बाद वे राम राज्य की स्थापना करेंगे. अपने खास अंदाज में गांधी इसकी व्याख्याएं बदलते रहे और आगे चल कर हिंदू धर्म से इसका रिश्ता तोड़ दिया. 26 फरवरी 1947 को उन्होंने लिखा, ‘कोई यह सोचने की भूल न करे कि रामराज्य का मतलब हिंदुओं का राज्य है. मेरा राम, खुदा या गॉड का दूसरा नाम है. मैं खुदा राज चाहता हूं, जो धरती पर ईश्वर के राज्य के समान है.’ गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने रामराज्य का मतलब एक ‘कल्याणकारी राज्य’ लगाया, लेकिन उन्होंने वहां जो कुछ भी किया वह आम लोगों का हक मार कर अंबानी और अडाणी जैसे लोगों की न बुझने वाली लालच की सेवा करने का ही काम किया. व्यवहार में रामराज्य ऐसा लगता है कि भोले-भाले हिंदुओं को प्रभावित करने के लिए सभी सियासी दलों द्वारा एक लफ्फाजी के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है. 1989 में अयोध्या के करीब ही राजीव गांधी ने कांग्रेस पार्टी के चुनावी अभियान की शुरुआत रामराज्य लाने के वादे के साथ की थी, जैसा आज उनके बेटे करते हैं. रामायण में जैसे रामराज्य को बताया गया, उसे बिना किसी आलोचना के आदर्श शासन के रूप में लिया जाता है. वाल्मीकि रामायण के छठे कांड (लंकाकांड) में बाकी बातों के अलावा यह कहा गया है, ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने कर्तव्य निभा रहे थे, अपने कामों से संतुष्ट थे और लालच से मुक्त थे.’ यह ठेठ वर्ण व्यवस्था है, जिसमें गांधी विश्वास करते थे और जो हमारे शासकों को पसंद है. लेकिन उन दलितों, आदिवासियों, शूद्रों और गैर-हिंदुओं का क्या, जो मिल कर एक व्यापक बहुसंख्या बनाते हैं और जो यकीनन ही ऐसे एक रामराज्य से इन्कार करेंगे?

इस चुप्पी का सबब?

भाजपा के हिंदुत्व का विरोध करने की जब बात आती है, तो कोई भी राजनीतिक विपक्ष नहीं मिलता. असल बात तो यह है कि भारत में कोई विपक्षी पार्टी ही नहीं है. सभी पार्टियां व्यापक जनविरोधी गठबंधन में एक साथ खड़ी हैं. मौजूदा मिसाल लें तो दो संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों (भाकपा और भाकपा-मार्क्सवादी) को छोड़ कर औपचारिक राजनीतिक धाराओं की ओर से विरोध की फुसफुसाहट भी नहीं है. इन पार्टियों का विरोध भी इस तरह के संकोची बयानों तक सीमित है कि यात्रा से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होगा, मानो एक सांप्रदायिक पार्टी से कोई और उम्मीद की जा सकती है. पश्चिम बंगाल में जिस तृणमूल कांग्रेस पर ‘अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण’ का आरोप लग रहा था, क्योंकि राज्य में उनकी तादाद अपेक्षाकृत ज्यादा है, उसने भी हाल ही में एक व्यापक ‘ब्राह्मण और पुरोहित सम्मेलन’ का आयोजन किया. इसे पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और तृणमूल के बीरभूम जिला अध्यक्ष अनुब्रत मंडल द्वारा संगठित किया गया. सम्मेलन में आए सभी पुरोहितों को गीता की एक प्रति, एक शॉल और रामकृष्ण परमहंस और उनकी पत्नी शारदा देवी की एक तस्वीर  भेंट की गई. सभी दलों की असलियत एक ही है. जिस कांग्रेस से विपक्षी की भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है, उसे यह दिखाने की फिक्र है कि वह हिंदू विरोधी नहीं है और इसलिए वह अपने नरम हिंदुत्व के साथ एक हास्यास्पद प्रतिद्वंद्वी बन कर रह गई है. जिस तरह से कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को जनेऊधारी ब्राह्मण के रूप में पेश किया जा रहा है, उसकी निंदा होनी चाहिए, लेकिन ‘सेक्युलर’ भारत में यह भी बिक रहा है.

हालिया गुजरात चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने इस पर जोर देने के लिए 27 मंदिरों का दौरा किया कि वे भी हिंदू हैं. कांग्रेस यह समझती है कि 18 सीटें वह उन विधानसभा इलाकों में जीती, जहां ये मंदिर स्थित थे, और 10 सीटें वह भाजपा से हथिया पाई क्योंकि राहुल गांधी ने मंदिरों की दौड़ लगाई थी. इसको इस बात से भी शर्म नहीं आती कि राज्य में जो भाजपा-विरोधी गर्म माहौल मौजूद था, उसके बावजूद वह भाजपा से सत्ता नहीं हथिया सकी, और न ही यह इस बात को समझ पाई है कि यह हिंदुत्व के मंच पर भाजपा से होड़ नहीं कर सकती है. आज जिन्होंने राहुल गांधी के नरम हिंदुत्व को कबूल किया, जल्दी ही वही उनसे कट्टर रुख की मांग करेंगे. यह एक खतरनाक घटनाक्रम है, जो भारत में हिंदू राष्ट्र की स्थापना को और करीब ही लाएगा. यह भले ही सच है कि चुनावी सफलता धार्मिक और जातीय हिसाब-किताब के आधार पर मिलती है न कि सामाजिक और राजनीतिक सेवाओं के रेकॉर्ड के आधार पर, लेकिन यह एक स्वाभाविक बात नहीं है. शासक वर्गों ने जानबूझ कर संविधान में जातियों और समुदायों को कायम रखने की साजिश रची और अनेक चीजों की ही तरह सेक्युलरिज्म के मामले में भी अवाम को धोखा दिया. धर्मनिरपेक्षता, सेक्युलरिज्म नहीं है, बल्कि यह बहुसंख्या के धर्म के प्रभुत्व को बनाए रखने की साजिश है, जिसे आज हम भारत में देख रहे हैं. अगर भारत सचमुच सेक्युलर होता, तो हमें हिंदू राष्ट्र के इन प्रेतों का सामना नहीं करना पड़ता.

अकादमिक चिंतन की धुंध से परे: अलां बादिऊ

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/24/2018 06:07:00 PM


दुनिया के अग्रणी दार्शनिकों में से एक, फ्रांसीसी नाटककार और उपन्यासकार अलां बादिऊ का यह लेख रूसी क्रांति को याद करने की मौजूदा रणनीतियों के खिलाफ एक दखल है. यह दलील देती है कि रूसी क्रांति के मानक अकादमिक चिंतन से पैदा हुई धुंध को खत्म करके ही हम इसकी समकालीन वास्तविकता को समझने की शुरुआत कर सकते हैं. इसलिए यह 1917 की परिघटना को इंसानी इतिहास में रख कर देखता है और दिखाता है कि कैसे यह हमें यह सोचने में मदद करती है कि इस नजरिए से पूंजीवाद अतीत की एक चीज बन चुका है. अनुवाद: रेयाज उल हक

 

1917 की रूसी अक्तूबर क्रांति के बारे में

एक इंसानी जिंदगी की छोटी सी मुद्दत में यह देखना हमेशा ही प्रभावशाली होता है कि एक ऐतिहासिक घटना (इवेंट) अपनी उम्र को पहुंचे, उसे झुर्रियां पड़ें, उसका जिस्म सिकुड़ने लगे और फिर वह गुजर जाए. एक ऐतिहासिक घटना की मौत तब होती है जब करीब करीब पूरी इंसानियत उसे भूलने लग जाती है. जब अवाम के हजूम की जिंदगी को रोशन करने और उसे राह दिखाने के बजाए, वह घटना महज तारीख की खास स्कूली किताबों में ही दिखाई देने लगे, बल्कि उनमें भी दिखाई देना बंद हो जाए. वह मर चुकी घटना अभिलेखागारों की धूल में दफ्न हो जाए.

असल में मैं कह सकता हूं कि मैंने अपनी निजी जिंदगी में 1917 की अक्तूबर क्रांति को अगर मरते हुए नहीं देखा तो कम से कम से मौत के करीब पहुंचते हुए जरूर देखा है. आप कहेंगे: आप उतने युवा नहीं हैं और इससे भी बड़ी बात यह है कि आप क्रांति के बीस बरसों के बाद पैदा हुए. इसके बावजूद, इसकी एक खूबसूरत जिंदगी थी! और इसके अलावा, हर कोई हर जगह इसकी एक सौवीं सालगिरह की बातें कर रहा है.

मेरा जवाब यह होगा: असल में हर जगह यह सौवीं सालगिरह उस चीज को छुपाएगी और उसे समझने से चूक जाएगी, जो इस क्रांति का मूल मुद्दा थी, और जिसकी वजह से कम से कम पिछले साठ बरसों में यह यूरोप से लेकर लातीनी-अमेरिका, यूनान से लेकर चीन, दक्षिण अफ्रीका से लेकर इंडोनेशिया तक, दसियों लाख नौजवानों की हौसलाअफजाई करती आई है. और जिसकी वजह से इसी मुद्दत में, उसने हमारे थोड़े से असली मालिकों को, पूंजियों के मुट्ठी भर मालिकों के निजाम को भी उतना ही खौफजदा भी किया है और इसीलिए दुनिया भर में इसे अहम झटके खाने पड़े हैं जिससे इसकी राह दुश्वार हुई है.

यह सच है कि लोगों के जेहन और उनकी यादों में एक क्रांतिकारी घटना की मौत को मुमकिन बनाने के लिए असलियत को बदलना पड़ता है, उसे एक खूनी और घिनौनी दास्तान में बदल देना पड़ता है. एक क्रांति की मौत को इल्मी तोहमतों के जरिए अंजाम दिया जाता है. सही बात है कि लोग इसके बारे में बातें करते हैं, इसकी सौवीं सालगिरह मनाते हैं! लेकिन इल्म के जरियों को दी गई इस शर्त के मातहत कि इन सभी बातों का यही नतीजा होना चाहिए: क्रांति, फिर से कभी नहीं!

मैं यह याद करना चाहता हूं कि फ्रांसीसी क्रांति के साथ भी यही सब हो चुका है. इस क्रांति के नायकों, रॉब्सपियर, सां-जुस्त, कदन को दशकों तक तानाशाहों के रूप में, हत्यारों का लिबास पहने कड़वे और महत्वाकांक्षी लोगों के रूप में पेश किया गया. यहां तक कि मिशेले जैसे फ्रांसीसी क्रांति के ऐलानिया हिमायती की ख्वाहिश भी रॉब्सपियर को एक तानाशाह के रूप में पेश करने की थी.
यहां मुझे यह भी दर्ज करना चाहिए कि ऐसा करते हुए मिशेले ने एक ऐसी चीज ईजाद की, जिसका उसे पेटेंट करा लेना चाहिए था, क्योंकि कामयाब रही. आज, ‘तानाशाह’ (डिक्टेटर) शब्द तक एक ऐसी तलवार है जो किसी भी बहस को धकिया कर उसकी जगह ले लेती है. लेनिन, माओ, कास्त्रो, बल्कि वेनेसुएला में शावेज और हैती में आरिस्तिदे क्या हैं? तानाशाह. बात खत्म.

असल में ये कम्युनिस्ट इतिहासकारों की एक पूरी पीढ़ी थी, जिसके अगुवा अलबर्ट माथिएज थे, जिनकी बदौलत पिछली सदी के बीस के दशक के बाद फ्रांसीसी क्रांति को इसकी समतावादी और सार्वभौम अहमियत के साथ सचमुच में दोबारा एक नई जिंदगी मिली. इसलिए, 1917 की रूसी क्रांति की ही बदौलत भविष्य को जन्म देने वाली फ्रांसीसी क्रांति के बुनियादी पल के बारे में, 1792 और 1794 के बीच के मोंताना कन्वेन्शन के बारे में, एक दोबारा पैदा हुई जिंदादिली और जुझारू तरीके से सोचा जा सका.

इससे जाहिर होता है कि एक सच्ची क्रांति हमेशा ही अपने से पहले की क्रांतियों को नई जिंदगी देती है: रूसी क्रांति ने 1871 के पेरिस कम्यून में जान डाली थी, और रोब्सपियर कन्वेन्शन और यहां तक कि हैती में तुसैं-लोवेर्तर के साथ काले गुलामों की बगावत को और यहां तक कि 16वीं सदी की जर्मनी में टॉमस म्वेन्त्सर की रहनुमाई में किसानों की बगावत को और उससे भी पहले, रोमन साम्राज्य में लौटें तो स्पार्टाकस के नेतृत्व में ग्लैडिएटरों और गुलामों की बगावत को दोबारा जिंदा किया.

स्पार्टाकस, टॉमस म्वेन्त्सर, रॉब्सपियर, सां-जुस्त, तुसैं-लोवेर्तर, वर्लिन लिसागरे और कम्यून के हथियारबंद मेहनतकश: इतने सारे ‘तानाशाह’, जिनके माथे बेशक झूठी तोहमतें और बदनामियां मढ़ दी गईं और जिन्हें भुला दिया गया, और जिन्हें लेनिन, ट्रॉट्स्की या माओ त्से-तुंग जैसे तानाशाहों ने उनका असली रुतबा हासिल कराया: वे अवामी मुक्ति के नायक थे, वे बेपनाह तारीख की मंजिलें थे, जिनसे होकर इंसानियत सामूहिक खुदमख्तारी की राह पर आगे बढ़ी.

आज, यानी पिछले तीस या चालीस बरसों से, चीन में सांस्कृतिक क्रांति के अंत के बाद से, बल्कि 1976 में माओ की मौत के बाद से इस पूरी बेपनाह तारीख की बाकायदा मौत की तैयारियां की जा रही हैं. हालात ऐसे हैं कि इसकी ओर वापसी की चाहत भी नामुमकिन करार दी जा रही है. हर रोज हमें बताया जाता है कि अपने मालिकों को बेदखल कर देना और दुनिया भर में एक समतापरक वजूद के लिए काम करना एक आपराधिक खामखयाली है और एक खूनी तानाशाही की शैतानी ख्वाहिश है. रीढ़विहीन बुद्धिजीवियों की एक फौज ने, खास तौर से हमारे मुल्क फ्रांस में, एक प्रति-क्रांतिकारी चुगलखोरी में महारत हासिल कर ली है और पूंजीवादी और साम्राज्यी हुक्मरानी की मजबूत तरफदारी का हुनर पाया है. गैरबराबरी के निगहबान, और बेबस अवाम के, गरीबों के, खानाबदोश मेहनतकशों के उत्पीड़न के निगहबान लोग ही हर जगह हुक्मरान हैं, काबिज हैं. उन्होंने बराबरी के विचार को लेकर चलने वाली सारी सियासी हुक्मरानियों को एक खास पहचान देने के लिए ‘टोटलिटेरियन’ (सर्वसत्तात्मक) शब्द ईजाद किया है.

इस पर गौर किया जाना चाहिए कि 1917 की रूसी क्रांति हर वह चीज थी, जो उससे होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन वह टोटलिटेरियन हरगिज नहीं थी. वह बेशुमार रुझानों से वाकिफ थी, उसने नए-नए अंतर्विरोध खड़े किए, वह अलग-अलग तरह के बेशुमार लोगों को साथ लेकर आई और उन्हें एकजुट किया, महान बुद्धिजीवी, कारखानों के मजदूर, सुदूर टूंड्रा के किसान. बेरहम खानाजंगी और जोशो-खरोश से भरी सियासी बहसों में इसने 1917 से 1929 तक कम से कम बारह साल गुजारे. यह किसी टोटलिटेरियन टोटलिटी की निशानी तो हरगिज नहीं थी, बल्कि यह एक गैरमामूली तौर पर सक्रिय उथल-पुथल की निशानी थी, जो इसके बावजूद एक विचार की रोशनी में अंजाम दिया जा रहा था.
 

1917 की रूसी क्रांति को ‘तानाशाही’ और ‘टोटलिटेरियन’ शब्दों के जरिए समझने की न तो गलती की जा सकती है और न ही उसे भुलाया जा सकता है.

इस क्रांति के बारे में कुछ भी समझने के लिए, इस क्रांति के बारे में कही जाने वाली हर एक चीज को पूरी तरह भुलाना होगा. हमें उस बेहद लंबे इंसानी इतिहास में लौटना होगा, और यह दिखाना होगा कि क्यों और कैसे 1917 की रूसी क्रांति अपने आप में ही आने वाली इंसानियत की बुलंदी की एक निशानी है.

यही वजह है कि मैं, हमारी प्रजाति के बेइंतहा इंसानी इतिहास की एक छोटी सी कहानी से शुरुआत करना चाहता हूं, जो इंसानी जीव का इतिहास है, इस अजीबोगरीब और खतरनाक, होशियार  और खौफनाक जानवर का इतिहास जिसे इंसान कहा जाता है और यूनानी दार्शनिकों ने जिसके बारे में कहा था: बिना परों वाला एक दोपाया जानवर. ‘बिना परों वाला दोपाया जानवर’ क्यों? क्योंकि जमीन की सतह पर रहने वाले सारे भारी-भरकम जानवर चार पैरों वाले हैं, लेकिन इंसान दो पैरों वाला है. और सभी चिड़ियां दो पैरों वाली होती हैं, लेकिन उन सभी के पर होते हैं और इंसान के पर नहीं होते. इसलिए सिर्फ इंसान ही ऐसा जानवर है जिसके दो पैर हैं लेकिन पंख नहीं हैं. 1917 की रूसी अक्तूबर क्रांति को असल में बिना परों वाले दोपायों के एक अहम मजमे ने अंजाम दिया था.
 

इस जानवर की प्रजाति के बारे में, जो हम सभी हैं, और क्या कहने को रह जाता है, सिवाय इस ऐतिहासिक और बहुत बुरे तरीके से साफ हो चुकी बात के कि यह बिना परों का दो पैरों वाला एक जानवर है?

आइए सबसे पहले हम इस बात को दर्ज करें कि हमारे छोटे से और नाचीज ग्रह पर जीवन के आम इतिहास के लिहाज से यह असल में एक ताजा जीव है. अगर खुले दिल से हिसाब लगाया जाए तो यह दो लाख साल से ज्यादा पुराना नहीं है, जबकि जीवन के वजूद की परिघटना के बारे में अंदाजा है कि यह अपने आप में ही करोड़ों साल पुरानी है.

इस हालिया प्रजाति की सबसे आम खासियतें क्या हैं?

जैसा कि आप जानते हैं, एक प्रजाति की जैविक कसौटी यह होती है कि एक प्रजाति के मर्द और औरत के आपस में बनाए गए शारीरिक संबंधों से प्रजाति की नई औलादें पैदा हो सकती हैं. और हमारी प्रजाति की भी यह खासियत है. इंसानी प्रजाति के लिए अक्सर ही पक्के तौर पर इसकी तस्दीक हो चुकी है, चाहे उनका रंग कोई भी हो, वे कहीं के भी बाशिंदे हों, उनका कद, उनके विचार, उनके साथी का सामाजिक संगठन कोई भी हो. यह पहला नुक्ता है.

इसके आगे, दूसरा नुक्ता यह है कि इंसानी जीवन की मीयाद, जो एक और भौतिक कसौटी है, अगर बहुत दिल खोल कर अंदाजा लगाया जाए तब भी फिलहाल 130 बरसों से आगे जाती हुई नहीं दिखती. ये सारी बातें आप पहले से ही जानते हैं. लेकिन पहले से ही मालूम इन बातों से हमें दो बहुत ही सीधी-सादी बातें कहने की इजाजत मिल जाती है जो, मैं यकीन करता हूं कि सादगी के बावजूद बुनियादी बातें हैं, और अक्तूबर 1917 की रूसी क्रांति की हैसियत को साफ साफ तय करने में भी बुनियादी हैं.

पहली बात यह है कि अगर इंसानी प्रजाति के बारे में ऐसा कहा जा सकता है तो इंसानी जीव का इस धरती पर रोमांचक सफर (कॉस्मिक एडवेंचर) असल में छोटा है. इसलिए अपने बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल है, क्योंकि दो लाख साल भी एक व्यापक धुंध में ओझल दिखाई देते हैं, खास तौर से कमोबेश सौ बरसों की मीयाद की वजह से जो हमारे निजी सफर पर कड़ाई से पाबंदी लगा देती है.

लेकिन इसी के साथ इस मामूली बात को भी याद किया जाना चाहिए: जीवन के आलमी इतिहास के हवाले से देखें तो, ‘होमो सैपियंस’ प्रजाति – हमारा खुद को यह कहना आडंबर से भरपूर है - का वजूद बहुत ही खास और छोटी सी मुद्दत से है. इसलिए इस बात को रेखांकित किया जा सकता है कि शायद हमारा सफर अभी शुरू ही हुआ है, कि शायद हम इस खास सफर की शुरुआत में ही हैं. ऐसा इसलिए कि इंसान के सामूहिक वजूद के बनने के बारे में जो बातें हम कह सकते हैं और सोच सकते हैं, उसका एक पैमाना तय किया जा सके. डायनासोर बहुत खुशनुमा नहीं थे, कम से कम हमारी कसौटियों के हिसाब से, लेकिन हमारी प्रजाति के पैमाने से देखें तो उनका वजूद कहीं ज्यादा लंबा था. उनके वजूद की मुद्दत हजारों बरसों नहीं बल्कि करोड़ों बरसों में गिनी जाती है. जैसा हम जानते हैं उसके लिहाज से, इंसानियत खुद को एक तरह की जरा सी शुरुआत के रूप में ही पेश कर सकती है.

किसकी शुरुआत? आप जानते हैं कि फ्रांसीसी क्रांति के भागीदारों ने असल में खुद यह सोचा था कि वे ही शुरुआत हैं. सबूत: उन्होंने कैलेंडर बदल दिया. और इस नए कैलेंडर में पहला साल वह साल था जिसमें क्रांति ने फ्रांसीसी गणतंत्र कायम किया था. उनके लिए गणतंत्र, स्वतंत्रता, मैत्री, बराबरी, सदियों के निरंकुश शासन और अवाम की जिंदगियों की बदकिस्मती के बाद इंसानी प्रजाति की एक नई शुरुआत थी. और यह सिर्फ फ्रांस और फ्रांसीसी अवाम के लिए ही एक शुरुआत नहीं थी, बल्कि असल में पूरी की पूरी इंसानियत के लिए भी यह एक शुरुआत थी. इत्तेफाक से, 1793 के क्रांतिकारियों के लिए इंसानियत और फ्रांस में बहुत फर्क नहीं था. मिसाल के लिए 1793 के संविधान में यह ऐलान किया गया कि दुनिया में जो कोई भी एक यतीम का खयाल रखता है या एक बुजुर्ग आदमी का जिम्मा लेता है, उसे गणतंत्र का एक नागरिक माना जाना चाहिए. आपको पहले से ही इसका पुख्ता यकीन है कि क्रांति के साथ इंसानियत बदल जाती है, कि इसकी परिभाषा जस की तस नहीं रहती.

और रूसी क्रांति? इसने भी यही सोचा था कि इसने इंसानी प्रजाति के लिए एक नई मंजिल की बुनियाद रखी, एक कम्युनिस्ट मंजिल की, एक मंजिल जिसमें पूरी की पूरी इंसानियत अपने साझे मूल्यों के बारे में फैसला करेगी, मुल्कों और राष्ट्रों के पार जाकर खुद को संगठित करेगी. ‘कम्युनिज्म’ इस बात की तस्दीक है कि सारे इंसानों के लिए जो कुछ भी साझा है उसे हरदम हमारी सोच, कार्रवाई और संगठन का विषय होना चाहिए.

हमारी पहली बात इतनी भर ही है: शायद इंसानी प्रजाति ने अभी शुरुआत ही की है. और शायद ‘क्रांति’ के नाम से और खास तौर से ‘1917 की क्रांति’ के नाम से यह समझना चाहिए: शुरुआत, या इंसानी प्रजाति के इतिहास की दोबारा शुरुआत.
 

दूसरी बात यह है कि जैविक चरित्र के बारे में, प्रजातियों के पुनरुत्पादन के बारे में, सेक्सुएशन के बारे में, उनकी पैदाइश के बारे में एक निर्विवाद भौतिक स्तर मौजूद है, जहां कुछ मायनों में यह साबित हो चुका है कि हम सब बराबर हैं. शायद इस खास स्तर पर सभी बराबर हैं. लेकिन इस स्तर पर, जो वजूद में है और जो भौतिक रूप से काम कर रहा है. और फिर मौत का सवाल भी है, जो कमोबेश तयशुदा समय पर आता है.

सो, बात के खारिज होने के जोखिम के बिना यह कहा जा सकता है कि इस तरह इंसानियत की एक पहचान है. और अंतिम जायजे में, हमें कभी भी, और मैं जोर देकर कह रहा हूं कि कभी भी इंसानियत की इस पहचान के वजूद को नहीं भूलना चाहिए चाहे कुदरती तौर पर बेशुमार फर्क मौजूद हों, मसलन राष्ट्रों, सेक्स, संस्कृतियों और ऐतिहासिक भागीदारियों के फर्क, जिनकी पड़ताल हम दूसरे मामलों में करेंगे. इसके बावजूद इंसानियत की पहचान को बनाने वाला एक निर्विवाद खांचा मौजूद है. जब क्रांतिकारियों ने, और इसमें रूसी क्रांतिकारी भी शामिल हैं, यह गाया कि ‘द इंटरनेशनल इंसानी नस्ल को एकजुट करता है’ तो वे यही कह रहे थे कि इंसानी प्रजाति बुनियादी तौर पर एक ही है. मार्क्स यह बात कह चुके हैं: सर्वहारा, मजदूर, किसान, जिनसे इंसानियत की बहुसंख्या बनती है, उनका एक साझा नसीब होता है और उन्हें सोच और काम की एक साझी सरहद पर आकर मिलना चाहिए. उन्होंने बेरहमी के साथ कहा था: ‘सर्वहारा की कोई मातृभूमि नहीं होती’. इसका मतलब हमें यह समझना चाहिए: इंसानियत उनकी मातृभूमि है.

उन नौजवानों को तो यह बात अच्छी तरह समझ में आनी चाहिए जो माली से, सोमालिया से या बांग्लादेश या किसी और जगह से परदेशी बन कर कहीं और काम करने जाते हैं: जो समंदर को पार करके एक ऐसी जगह जाकर रहना चाहते हैं जहां उन्हें लगता है कि वे जिंदगी गुजार सकते हैं, जैसा वे अपने मुल्कों में रहते हुए नहीं कर सकते; जो सैकड़ों बार अपनी जान जोखिम में डालते हैं; जिन्हें धोखेबाज तस्करों को पैसे देने पड़ते हैं, जो तीन या दस अलग अलग मुल्कों को पार करते हैं, लीबिया, इटली, स्विटजरलैंड या स्लोवानिया, जर्मनी या हंगरी; जो तीन या चार भाषाएं जानते हैं; जो तीन या चार या दस नौकरियां करते हैं. हां, ये खानाबदोश सर्वहारा हैं और हर मुल्क उनकी मातृभूमि है. आज वे इंसानी दुनिया का दिल हैं, वे जानते हैं कि जहां कहीं भी इंसान मौजूद हैं वहां कैसे जीया जा सकता है. वे इसका सबूत हैं कि इंसानियत एक है, साझी है.

मैं एक और कम्युनिस्ट दलील पेश करूंगा. इसके सबूत भी मौजूद हैं कि इंसानियत की दिमागी काबिलियत एक ऐसी काबिलियत है जो एक जैसी है.

पक्के तौर पर इंसानियत के आज तक के इतिहास में, जो 12000 और 5000 बरसों के बीच का है, एक बुनियादी क्रांति हुई थी, जो इंसानी जीव के इतिहास की अब तक की सबसे अहम क्रांति थी. इसे नियोलिथिक क्रांति कहते हैं. उस समय मौजूद इंसानियत ने, जिसके 100,000 वर्ष के इतिहास से हम वाकिफ हैं, करीब हजार वर्ष मानी जाने वाली एक मुद्दत के दौरान घुमंतू खेती की खोज की, बरतनों में अनाज जमा करके रखने का तरीका खोजा, इस तरह परवरिश के लिए जरूरी चीजों की जरूरत से ज्यादा खेप को जमा करके रखने की गुंजाइश बनी, इस तरह इस अतिरिक्त पर पलने वाले लोगों का एक वर्ग वजूद में आया और जिसने उत्पादक कामों में अपनी सीधी भागीदारी से छुट्टी पा ली, इस तरह एक राज्य वजूद में आया, जिसको धातु के हथियार चलाने वालों की ताकत हासिल थी, इस तरह हाथ की लिखाई शुरू शुरू में मवेशीपालकों को गिनने और उन पर कर लगाने के लिए इस्तेमाल हुई. और इस संदर्भ में, हर किस्म की तकनीकी को बचाने, उसे फैलाने और उसमें तरक्की लाने का काम बहुत जानदार तरीके से आगे बढ़ा. हमने महान शहरों को जन्म लेते और जमीनी और समुद्री रास्तों से एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय कारोबार की शुरुआत को देखा है.

कुछ हजार साल पहले आए इस बदलाव के नजरिए से देखें तो कोई भी दूसरा बदलाव फिलहाल सचमुच में दोयम दर्जे का होगा क्योंकि एक लिहाज से हम अभी भी उन्हीं दायरों में बने हुए हैं जो इस जमाने में खींचे गए थे. उल्लेखनीय रूप से, प्रभुत्वशाली और फुरसतिया वर्गों का वजूद, एक निरंकुश राज्य का वजूद और पेशेवर सेनाओं का वजूद, राष्ट्रों के बीच युद्धों का वजूद, यह सब कुछ हमें शिकार करने वालों और जंगल से चीजें जुटा कर गुजर-बसर करने वालों के उस छोटे से समूह से अलग कायम करता है, जो पहले इंसानियत की नुमाइंदगी किया करते थे. हम नियोलिथिक लोग हैं.

लेकिन दिमागी काबिलियत के नजरिए से इस क्रांति का मतलब यह नहीं था कि हम नियोलिथिक क्रांति से पहले के इंसानों से बेहतर होंगे. हमें पैंतीस हजार साल पुराने शॉवे गुफाओं की पेंटिग्स को याद करना चाहिए, जो एक ऐसे जमाने की तस्वीरें हैं जब अधिक से अधिक इसकी संभावना है कि नियोलिथिक दौर से काफी पहले, शिकारियों-संग्राहकों का बस एक छोटा सा समूह ही मौजूद रहा होगा. महज इन पेंटिंग्स का वजूद ही इस बात की तस्दीक करता है कि इंसानी जीव की विचार करने की, सोचने की और कल्पनाएं करने की काबिलियत और साथ ही इसका तकनीकी हुनर जस का तस तब भी मौजूद था जैसा आज है.

इसलिए न सिर्फ जीववैज्ञानिक और भौतिक आधार पर इस इंसानी पहचान को, इसके रोमांचक सफर के आरपार, कबूल किया जाना चाहिए, बल्कि बिना किसी शक के उस चीज के आधार पर भी इसे कबूल किया जाना चाहिए जिसे दिमागी काबिलियत कहा जाता है. यह बुनियादी एकता, यह जैविक और जेहनी ‘एक जैसापन’ हमेशा ही उन सिद्धांतों की राह की बुनियादी रुकावट रहा है जिनके मुताबिक इंसानियत समान नहीं है, वे सिद्धांत जिनके मुताबिक बुनियादी तौर पर अलग उप जातियां मौजूद हैं जिन्हें आम तौर पर नस्लें कहा जाता है. जैसा आप जानते हैं, नस्लवादी जिनको उच्चतर नस्लें और कमतर नस्लें घोषित करते है, उन नस्लों के सदस्यों के बीच आपस में शादी की कौन कहे, यौन संबंधों तक से हमेशा ही खौफ खाते हैं और उन पर पाबंदी लगाते रहे हैं. उन्होंने ऐसे खौफनाक कानून बनाए, जिनके तहत कभी भी काले लोग गोरी औरतों तक नहीं पहुंच सकते या यहूदी उन औरतों तक नहीं पहुंच सकते, जिन्हें आर्य माना जाता है. इस तरह नस्ली धाराओं के इतिहास का जाना-पहचाना उत्पीड़न, इंसानियत की आदिम एकता के सबूतों को नकारने की कोशिश करता है, और जिसने इंसान-इंसान के बीच सामाजिक फर्क जैसे दूसरे फर्क भी पैदा कर दिए हैं. लोग अच्छी तरह जानते हैं कि आखिरकार एक प्रभुत्वशाली वर्ग की एक औरत को मजदूर वर्गों के एक आदमी के साथ शादी नहीं करनी चाहिए, उनके बीच यौन रिश्ता भी नहीं होना चाहिए, बच्चे तो और भी नहीं होने चाहिए. मालिकों को गुलाम प्रजातियों से औलादों को जन्म नहीं देना चाहिए, वगैरह वगैरह. दूसरी तरह से रखें तो, इन सबके बावजूद ऐसे लंबे जमाने भी आए हैं जिनमें प्रजातियों ने जब अपनी एकता की पुष्टि की तो इससे भरपूर सामाजिक उथल-पुथल पैदा हुई.

फ्रांसीसी क्रांति की लीक पर, रूसी क्रांति इंसानी प्रजातियों की समतापरक हुक्मरानी को हमेशा के लिए कायम करना चाहती थी.
 

लेकिन इसमें शक नहीं है कि आज सबसे बुनियादी नुक्ते का रिश्ता प्रभुत्वशाली सामाजिक संगठन से है. प्रभुत्वशाली, बल्कि असल में प्रभुत्वशाली से भी कहीं ज्यादा प्रभुत्वशाली सामाजिक संगठन जिसने इंसानी सफर की समग्रता को अपनी गिरफ्त में ले रखा है, जो दुनिया की सारी जगहों की समग्रता पर हावी है. इसे पूंजीवाद कहा जाता है, यह इसका खास नाम है और यह इंसानी प्रजातियों के बीच एकता के उसूल के भीतर गैरबराबरी के और इसीलिए पराएपन के शैतानी रूपों को पैदा करता है, वरना तो यह इस एकता पर भी सफलता के साथ अपना दावा ठोक सकता है.
 

इसके आंकड़े बहुत जाने-माने हैं, लेकिन अक्सर मैं उन्हें दोहराता हूं क्योंकि उनकी जानकारी रखना जरूरी है. असलियत में, इसको एक वाक्य में कहा जा सकता है: आज दुनिया में बहुत थोड़े से लोगों की हुकूमत अरबों लोगों को सीधी-सादी जिंदगी जीने की गुंजाइश से भी महरूम कर देती है, जो एक काम की तलाश में, अपने परिवार को पालने के लिए, दुनिया भर में भटकते फिर रहे हैं.
 

इसलिए शायद यही तथ्य सही है कि इंसानियत अभी अपने ऐतिहासिक वजूद की शुरुआत में ही है. इसलिए हमें यह समझना होगा कि व्यावहारिक मानवता के स्तर पर वास्तविक इंसानियत का फिलहाल जैसा संगठन प्रभुत्व में है, वह बेहद कमजोर है. अभी भी यह नियोलिथिक मानवता है, इसका मतलब यह है: अभी इंसानियत जो उपजाती है, यह जो काम करती है और जिस तरह से संगठित करती है, वह अपने सबसे अच्छे स्वरूप में भी इसकी सैद्धांतिक एकता के स्तर तक नहीं पहुंची है. शायद इंसानियत का ऐतिहासिक वजूद इस बात में निहित है कि सामूहिक वजूद के प्रयोग किए जाएं और उसे हासिल किया जाए, जो इसकी बुनियादी एकता के उसूलों की बुलंदी होगी. हो सकता है कि हम अभी ऐसे मुकाम पर हैं जो अभी अस्थायी हैं और इस परियोजना तक नहीं पहुंच पाए हैं.

सार्त्र ने एक बार कहा था कि अगर इंसानियत कम्युनिज्म को साकार करने में नाकाम साबित हुई – अगर मैं कह सकूं तो कहूंगा कि यह वह दौर था जब इस शब्द को लोग मासूमियत से इस्तेमाल किया करते थे – तो यह कहा जा सकता है कि इसके अंत के बाद इसमें दिलचस्पी या इसकी अहमियत चींटियों से ज्यादा नहीं रह जाएगी. साफ जाहिर है कि वे क्या कहना चाहते थे – चींटियों की ऊंच-नीच की सामूहिक अर्थव्यवस्था को तानाशाह संगठन का एक मॉडल माना जाता है; वे कहना चाहते थे कि अगर कोई इस विचार के साथ इंसानियत के इतिहास का जायजा ले कि इंसानियत को अपनी बुनियादी एकता के शिखर पर एक ऐसा सामाजिक संगठन तैयार करना चाहिए, और यह काम वह कर सकती है, जो सचेत रूप से इस बात की तस्दीक करे कि यह एक एकीकृत प्रजाति है, वे यह कहना चाहते थे कि इसमें पूरी तरह नाकामी बाकी बातों के अलावा इंसानियत को जानवरों के सांचे में वापस धकेल देगी, जो अभी भी बस अपने वजूद को बनाए रखने की जद्दोजहद के कायदे पर चल रहे हैं, जहां अलग अलग व्यक्ति मिल कर काम करते हैं लेकिन जीतता सबसे ताकतवर ही है.
 

आइए, इसको दूसरे तरह से कहते हैं. कोई सोच सकता है कि कि यह निश्चित है कि मौजूदा सदियों में, या अगर जरूरी हुआ तो आने वाली सहस्राब्दि में, नियोलिथिक क्रांति के बाद एक दूसरी क्रांति होनी ही चाहिए, जिसका पैमाना हम तय नहीं कर सकते. एक क्रांति जो अपनी अहमियत में नियोलिथिक क्रांति की बुलंदी होगी, लेकिन जो समाज के फौरी संगठन के वाजिब कायदे को इंसानियत की मौलिक एकता पर दोबारा कायम कर देगी. नियोलिथिक क्रांति ने इंसानियत को फैलाव के, वजूद के, टकरावों के और इल्म के जरिए मुहैया कराए थे जिसकी इसके पहले कोई मिसाल नहीं मिलती, लेकिन इसने गैरबराबरियों, ऊंच-नीच के वजूद का अंत नहीं किया था और न ही इसने हिंसा और ताकत के उन खाकों का अंत किया, जिसे वह इतने गैरमामूली पैमाने पर लेकर आई थी. न सिर्फ इसने इनका अंत ही नहीं किया, बल्कि इसने कई मायनों में उन्हें और गंभीर बना दिया. दूसरी क्रांति – इसे एक बड़े ही सामान्य अर्थ में परिभाषित करते हैं क्योंकि अगर मैं कहूं तो हम अभी पूर्व-राजनीतिक स्तर पर ही हैं – इंसानियत की एकता को, इसकी असंदिग्ध एकता को और इसकी अपनी नियति पर अपने अख्तियार को वापस बहाल करेगी. इंसानियत की एकता महज एक तथ्य नहीं रह जाएगी, यह कुछ मायनों में एक कायदा बन जाएगी, इंसानियत को अपनी वाजिब इंसानियत को कबूल करना होगा और उसे साकार करना होगा, न कि यह उसको फर्कों, गैरबराबरियों, राष्ट्रों, धर्मों, भाषाओं की व्यवस्थाओं के बिखरे हुए टुकड़ों के खाकों (फिगर्स) में बनाए रखेगी. दूसरी क्रांति दौलत और जिंदगी की शक्लों में गैरबराबरी की नीयत को खत्म कर देगी, जो इंसानियत की एकता के नजरिए से एक आपराधिक नीयत है.
 

यह कहा जा सकता है कि 1792-94 की फ्रांसीसी क्रांति के बाद से, असली बराबरी के मकसद से की जाने वाली कोशिशें नदारद नहीं रही हैं, वे लोकतंत्र, समाजवाद, कम्युनिज्म आदि अलग अलग नामों से चलती ही रही हैं. यह भी सोचा जा सकता है कि मौजूदा दौर में दुनिया के पैमाने पर मुट्ठी भर लोगों के एक समूह की हुक्मरानी की अस्थायी विजय इन कोशिशों के लिए एक धक्का है, लेकिन यह सोचा जा सकता है कि यह धक्का बहुत लंबे समय तक नहीं बना रहेगा और अगर इंसानियत की एकता के वजूद के पैमाने पर खड़े होकर देखा जाए तो इस धक्के से कुछ भी साबित नहीं होता. ऐसी एक समस्या अगले चुनावों से हल नहीं होती – उससे तो कुछ भी हल नहीं होता –, यह सदियों का एक पैमाना है. और असल में, फिलहाल हमारे पास इसके अलावा कहने को कुछ नहीं है कि ‘खैर हम नाकाम रहे, लेकिन चलो लड़ना जारी रखते हैं.’
 

लेकिन यह नुक्ता हमें अक्तूबर 17 की रूसी क्रांति पर करीबी से गौर करने की तरफ ले जाता है. यहां नाकामियां और नाकामियां हैं. इसलिए मेरी थीसिस यह है: रूसी क्रांति ने इतिहास में पहली बार यह दिखाया है कि जीतना मुमकिन है. यह बात हमेशा ही कही जा सकती है कि दीर्घकालिक नजरिए से देखें तो अंतिम दशकों में यह नाकाम रही. लेकिन यह हमारी यादों में फिर से जिंदा हुई और इसे होना ही चाहिए, भले ही जीत नहीं तो कम से कम जीत की संभावना ही जिंदा हुई. इसलिए कहेंगे कि रूसी क्रांति ने इंसानियत को अपने आप के साथ मेल-मिलाप करने की संभावना की संभावना को जाहिर किया.

लेकिन हम ठीक ठीक किस किस्म की जीत की बात कर रहे हैं?
 

ज्यादातर कुछ सदियों से गिनें तो बहुत हाल ही में राज्यों के आर्थिक आधार का सवाल सियासी बहस का केंद्र बना है. इससे यह बात समझी जा सकती है या दिखाई भी जा सकती है कि राज्य का (निजी सत्ता या लोकतंत्र के) चाहे जो चेहरा हो, उसके पीछे वही उत्पीड़नकारी और भेदभाव वाला सामाजिक संगठन अपनी जगह बना लेता है, जिसके सबसे अहम राज्यवादी (स्टेटिस्ट) फैसले अपार रूप से निजी संपत्ति की सुरक्षा से सरोकार रखते हैं, वे परिवारों में निजी संपत्ति के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में बढ़ते जाने से, और शैतानी गैरबराबरी को बरकरार रखने, और उन्हें कुदरती और अटल समझते हुए उन्हें कायम रखने से सरोकार रखते हैं.
 

हमारे मुल्क में, जो एक विशेषाधिकार वाला मुल्क है और जो अपने लोकतंत्र की शेखी बघारता रहता है, हम जानते हैं कि कुल दौलत के 50 फीसदी से ज्यादा पर कम से कम 10 फीसदी आबादी की मिल्कियत है! हम यह भी जानते हैं कि आधे से ज्यादा आबादी के पास असल में कुछ भी नहीं है. अगर दुनिया के पैमाने पर देखा जाए तो चीजें बदतर हालात में हैं: कुछ सौ लोगों के हाथ में जितनी दौलत है वह दूसरे तीन अरब लोगों लोगों की कुल दौलत के बराबर है. और दो अरब लोगों से ज्यादा लोगों के पास कुछ भी नहीं है.
 

जब निजी संपत्ति और इससे जुड़ी शैतानी गैर बराबरी का सवाल साफ हो गया, तो दूसरी व्यवस्था के लिए ऐसी क्रांतिकारी कोशिशें हुईं जो सिर्फ राजनीतिक सत्ता में दखल देना चाहती थीं. इन कोशिशों का मकसद पूरी सामाजिक दुनिया को बदलना था. उन्होंने एक सच्ची बराबरी को कायम करने का मकसद अपने सामने रखा. वे मजदूरों और किसानों, गरीबों, बदहाल लोगों और ठुकराए हुए लोगों को समाज की रहनुमाई देना चाहती थी. इन बगावतों के गीत को ‘इंटरनेशनल’ कहा गया. इसमें कहा गया: ‘हम कुछ भी नहीं है, चलो हम सब कुछ बन जाएं.’ इसमें कहा गया: ‘दुनिया की बुनियाद बदल जाएगी.’ पूरी की पूरी 19वीं सदी इस लीक पर चली कोशिशों की खून सनी नाकामियों से भरी हुई है. पेरिस के पत्थर बिछे रास्तों पर तीस हजार लाशों वाला पेरिस कम्यून, इन सभी तबाहियों में सबसे शानदार रहा. इसने ‘कम्यून’ के नाम से एक बराबरी वाली सत्ता की खोज की. लेकिन कुछ हफ्तों के भीतर ही, केंद्रीय हुकूमत की फौज पेरिस में दाखिल हुई और शहर के लोकप्रिय मुहल्लों के तीखे प्रतिरोध के बावजूद, उसने बागी मजदूरों का बेरहमी से कत्लेआम किया और लाखों बागियों को बंदी बना लिया या फिर देशनिकाला दे दिया. नाकामियों ने, जनाजों का सिलसिला जारी रखा.

यही वह मोड़ है, जहां हमें यह बात याद करनी है: जब रूसी क्रांति ने पेरिस कम्यून की उम्र पार कर ली, तो उसके अगले दिन क्रांति के रहनुमा लेनिन बर्फ पर नाच उठे थे. उन्हें इस बात का अहसास था कि चाहे कितनी ही खौफनाक मुश्किलें आएं, लेकिन नाकामी का दाग मिट गया था!

हुआ क्या था?

पहली बात, 1914-15 में रूस के निरंकुश केंद्रीय राज्य की ताकत अहम रूप से कमजोर हुई थी, जो बेवकूफी में 14-18 के महायुद्ध में शामिल हो गया था. फरवरी 1917 में, एक क्लासिक जनवादी क्रांति ने राज्य को जमींदोज कर दिया. इसमें कोई नई बात नहीं थी: फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी ने सरकार के चुनावों के प्रावधान वाला संसदीय शासन पहले ही कायम कर लिया था. एक मायने में जमींदारों की कुलीन ताकत वाली जार की तानाशाही अपने समय से काफी पीछे चल रही थी. लेकिन आंदोलन इस जनवादी क्रांति पर ही नहीं ठहरा. रूस में ऐसे बेहद सक्रिय क्रांतिकारी बौद्धिक समूह बरसों से रहे हैं, जिनकी निगाह पश्चिमी लोकतंत्र की सीधे सीधे नकल से आगे तक जाती है. एक युवा मजदूर वर्ग तैयार हो रहा है, जिसमें क्रांति के प्रति झुकाव है और जिसके ऊपर रूढ़िवादी मजदूर संघों की निगरानी नहीं है. बेइंतहा गरीब और सताए हुए किसानों का एक हुजूम है. जंग की वजह से लाखों फौजी और हथियारबंद जहाजी मौजूद हैं जो जंग से नफरत करते हैं जिसके बारे में उनकी वाजिब सोच है कि यह जर्मनों जैसे कमतर साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की तुलना में सबसे बढ़ कर फ्रांस और ग्रेट ब्रिटेन जैसे साम्राज्यवादी हितों की सेवा कर रही है. और आखिरकार एक जिंदादिल, पुख्ता क्रांतिकारी पार्टी है, जो मजदूरों के साथ करीबी से जुड़ी हुई है. इस पार्टी को बोल्शेविक पार्टी कहा जाता है. यह बहसों में जानदार होने के साथ साथ बाकियों के मुकाबले कहीं ज्यादा अनुशासित और सक्रिय है. इसकी रहनुमाई में हम लेनिन और ट्रॉट्स्की जैसे लोगों को पाते हैं, जो लोग एक मजबूत मार्क्सवादी संस्कृति और लंबे मिलिटेंट अनुभवों का मेल हैं और जो पेरिस कम्यून के सबकों से बखूबी वाकिफ हैं. और सबसे आखिर में और सबसे ऊपर हैं स्थानीय लोकप्रिय संगठन जो हर जगह, बड़े शहरों में, कारखानों में बनाए गए और जिन्होंने पहली क्रांति के आंदोलन को खड़ा किया था लेकिन अपने मकसद के साथ जो आखिर में इस मांग पर लौटा कि सत्ता को, फैसला करने के अधिकार को, सभाओं को सौंपा जाए न कि एक सुदूर बैठी, घबराई हुई सरकार के पास सत्ता बनी रहे, जो अभी भी पुरानी रूसी दुनिया को बचा कर रखे हुए थी. इन संगठनों को सोवियत कहा गया. बोल्शेविकों की अनुशासित ताकत और सोवियत कही जाने वाली व्यापक-जनवाद की सभाओं का मेल ही 1917 के पतझड़ में हुई दूसरी क्रांति की चाबी थी.

इंसानियत के इतिहास के इस पल में अनोखी बात थी एक क्रांति का बदलाव, जिसका मकसद सिर्फ एक सियासी हुकूमत को बदलना था, राज्य के स्वरूप को बदलना था, लेकिन जो एक बिल्कुल ही अलग क्रांति में बदल गई जिसका मकसद बन गया पूरे समाज के संगठन को बदलना, मुट्ठी भर लोगों की अर्थव्यवस्था को बदलना. उसका मकसद बन गया कि कुछेक लोगों की निजी संपत्ति के हाथ में औद्योगिक और खेतिहर उत्पादन को नहीं छोड़ा जाए, बल्कि इसे उन सभी लोगों के प्रशासनिक फैसलों के ऊपर छोड़ा जाए, जो काम करते हैं, मेहनत करते हैं.

इसे जरूर देखा जाना चाहिए कि इस परियोजना की चाहत पेश की गई और इसे संगठित किया गया, जो रूसी क्रांति, सत्ता पर कब्जे, गृह युद्ध, घेराबंदी, विदेशी दखल के भयानक तूफान में एक सचमुच की चीज बन जाने वाली थी. इन सबका सामान्य विचार सफल हो सका, क्योंकि इसे निश्चित रूप से बोल्शेविक पार्टी की बहुसंख्या के बीच में, लेकिन 1917 की गर्मियों का अंत आते आते सोवियतों की बहुसंख्या में और उल्लेखनीय रूप से सबसे उल्लेखनीय राजधानी पेत्रोग्राद की सोवियत में एक बेहद सचेत और उत्साही अंदाज में पेश किया गया था.

सबसे जबरदस्त मिसाल 1917 के बसंत के एक सामान्य कार्यक्रम में निहित है, जिसे लेनिन ने पार्टी में प्रचारित किया ताकि देश में हर जगह बहस खड़ी की जा सके. इस कार्यक्रम के सभी घटक, भावी फैसलों के इस समूह के सभी घटक, असल में नियोलिथिक दौर के बाद से वजूद में रही हर चीज में संपूर्ण और वैश्विक क्रांति के विचार पर केंद्रित थे. (देखें अप्रैल थीसिस).

इन आधारों पर, और रूस के खास हालात से जुड़ी भारी-भरकम मुश्किलों के पार अक्तूबर 17 की शुरुआत में पूरे इंसानी इतिहास में नियोलिथिक क्रांति के बाद की पहली जीत हुई. इसका मतलब एक ऐसी क्रांति से है जो एक ऐसी सत्ता को कायम करती है जिसका घोषित मकसद उन सभी समाजों की युगों पुरानी बुनियादों को पूरी तरह हिला देना था, जो खुद को ‘आधुनिक’ मानते हैं: यानी उन सभी लोगों की एक छुपी हुई तानाशाही का अंत जिनका उत्पादन और विनिमय के वित्तीय नक्शों पर मालिकाना है. एक क्रांति जिसने नई आधुनिकता की बुनियादों को आजाद किया. इस बेइंतहा महानता का सामान्य नाम ‘कम्युनिज्म’ रहा है और मेरी समझ से यह अभी भी सच है. यही वह नाम है जिसके साए तले दुनिया भर में लाखों लोगों को, हर किस्म के लोगों को, मजदूरों और किसानों के लोकप्रिय हुजूम से लेकर बुद्धिजीवियों और कलाकारों तक को, उत्साह के साथ कबूल किया गया और उनका स्वागत किया गया, जो उस प्रतिशोध के बराबर है जो पिछली सदी की बेपनाह नाकामियों के बाद इसने कायम किया. अब लेनिन यह कह पाने के लायक हुए कि जीतने वाली क्रांतियों का जमाना आ गया है.
 

यकीनन तीस के दशक की शुरुआत से जो कुछ हुआ, उनकी रोशनी में इस पर विचार किया जा सकता है, जिसकी शुरुआत अनोखे रूप से 1929 में स्तालिन के निर्मम नेतृत्व में हुई, पंच वर्षीय परियोजना और ‘सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में’ से लेकर हम ‘सारी सत्ता कम्युनिस्ट पार्टी और राज्य के मुकम्मल घालमेल के हाथ में’ तक पहुंचते हैं और इस तरह सोवियतों की सत्ता का अंत हो जाता है.

लेकिन इस अभूतपूर्व रोमांचक सफर में इन बदलावों का जो कुछ भी हुआ हो, और मौजूदा हालात जो कुछ भी रहे हों, जिनमें समकालीन नियोलिथिक गिरोह पूरी दुनिया का शासक बना हुआ है, हम जान सकते हैं कि हम कामयाबी के साथ नियोलिथिक दुनिया के आगे भी जा सकते हैं. कि ऐसी एक दुनिया वजूद में आ सकती है, रह सकती है और इसीलिए उसे रहना ही चाहिए. और यह कि आखिरकार मौजूदा दुनियावी हुक्मरानी बिना हितों या भविष्य वाली महज एक कतरन कभी नहीं रही है. इंसानियत के वजूद में आने के वक्त के पैमाने पर और वक्ती तौर पर इस इंसानियत की शक्ल चाहे जो, अक्तूबर 1917 की कम्युनिस्ट क्रांति एक ऐसी चीज बनी हुई है, जिसकी बदौलत हम जानते हैं कि अभी जो पूंजीवाद हुकूमत पर काबिज है, वह हमेशा के लिए अतीत की एक चीज बन चुका है.

भीमा-कोरेगांव: मिथक, रूपक और अभियान

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/24/2018 05:57:00 PM


भीमा-कोरेगांव पर बहस के संदर्भ में आनंद तेलतुंबड़े का स्तंभ. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह मनाने के लिए जस्टिस बीपी सावंत की अध्यक्षता में 31 दिसंबर को पुणे में दलितों, ओबीसी, मुस्लिमों और मराठा संगठनों द्वारा एक साथ मिल कर बुलाए गए यलगार कॉन्फ्रेंस की पूर्व संध्या पर मैंने द वायर में एक लेख लिखा था ‘द मिथ ऑफ भीमा-कोरेगांव रीइन्फोर्सेज द आइडेंटिटीज इट सीक्स टू ट्रान्सेंड’.[1] यह कॉन्फ्रेंस (जिसके संयोजकों में से एक मैं भी था) मौजूदा सत्ताधारी हिंदुत्व गिरोह की प्रतिक्रियावादी जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ था. इसके लिए एक महीने से ज्यादा चलने वाले अभियान के बावजूद, नागपुर, शिरूर और मुंबई से आयोजन स्थल शनिवारवाड़ा तक पहुंचने वाले लॉन्ग मार्चों में, मुझे बताया गया कि, सिर्फ 30-35 लोगों ने ही भागीदारी की. लॉन्ग मार्चों में सिर्फ 30-35 लोग ही क्यों शामिल हुए जबकि 1 जनवरी को भीमा-कोरेगांव में आने वालों की तादाद लाखों की होने वाली थी? यह देखना निराशाजनक था कि ‘नई पेशवाई’ से लड़ने के लिए लोगों को तैयार करने वाले सम्मेलन का नतीजा बस शायद यह निकले कि उससे भीमा-कोरेगांव में स्तंभ पर पहले से ही जुटने वाली भारी भीड़ में कुछ लाख लोग और बढ़ जाएं. सिर्फ बाबासाहेब आंबेडकर के साथ इसके जुड़ाव की वजह से ही, जिन्हें सीमित करके दलितों ने अपनी पहचान की निशानी बना कर रख दिया है, भीमा-कोरेगांव पर और ऐसी ही दूसरी जगहों पर हाल के बरसों में दलितों की भीड़ में इजाफा हुआ है.

इस लेख पर उग्र प्रतिक्रियाएं आईं, इनमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं शामिल हैं. सकारात्मक प्रतिक्रियाएं देश भर के प्रगतिशील दायरों से आईं, और नकारात्मक प्रतिक्रियाएं दिलचस्प तौर पर दलितों और हिंदुत्ववादी दकियानूस लोगों की तरफ से आईं जो ज्यादातर नाराजगी और दुर्व्यवहार से भरी हुई थीं. दलितों ने आमतौर पर ‘मिथक’ वाले हिस्से को पकड़ा[2], अपने दिल को तसल्ली देने के लिए मनमाने तरीके से उसे तोड़ा-मरोड़ा और इस तरह की अफवाहें फैला कर लोगों की भावनाएं भड़काने की कोशिश की कि यह आंबेडकर के खिलाफ था. यहां तक कि कांचा इलैया शेफर्ड जैसे विद्वान भी मेरी कही हुई बात को तोड़ने-मरोड़ने के इस शोर-शराबे में शामिल हो गए ताकि मुझे बदनाम कर सकें. मिसाल के लिए, उन्होंने लिखा, ‘आनंद तेलतुंबड़े, जो यह मानते हैं कि महार सैनिकों ने राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए अपनी जान नहीं दी’ जबकि मैंने साफ-साफ इसकी उल्टी बात लिखी थी: ‘ऐतिहासिक तथ्यों को एक ना-मौजूद राष्ट्र के चश्मे से देखना उतना ही निंदनीय है.’(3) लेख में पेश किए गए तथ्यों के लिहाज से एक भी चीज ऐसी नहीं थी जिस पर उंगली उठाई जा सके, लेकिन जब जुनून सिर चढ़ कर बोल रहा हो तो तर्क की कोई नहीं सुनता.
 

मिथकों के पीछे की सच्चाई
  
इस पर कोई मतभेद नहीं है कि भीमा-कोरेगांव में खड़ा स्तंभ महार सैनिकों के शौर्य की निशानी है, बल्कि इसके भी आगे कहें तो ये ज्यादातर दलित सैनिक ही थे जिन्होंने ब्रिटिशों को उनका साम्राज्य जीत कर दिया.(4) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की अनेक लड़ाइयों में सांकेतिक रूप से खास 1757 की पलासी की पहली लड़ाई से लेकर 1818 की भीमा कोरेगांव की आखिरी लड़ाई तक, दलित सैनिकों ने उनमें जीत हासिल करने में इंतहाई बड़ी भूमिका अदा की थी. जब अहसानफरामोश ब्रिटिशों ने यह बहाना बनाते हुए 1892 में दलितों की भर्ती बंद कर दी कि वे लड़ाकू नस्ल नहीं थे, तो दलित इससे नाराज हुए और उन्होंने वापस अपनी बहाली की मांग की. इसका नेतृत्व दलित आंदोलन के रहनुमाओं जैसे गोपाल बाबा वालंगकार, शिवराम जनबा कांबले ने किया और उनमें बाबासाहेब आंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी आंबेडकर थे, जिन्होंने लड़ाकू नस्ल होने के अपने दावे के लिए वाजिब ही कोरेगांव स्तंभ की गवाही का इस्तेमाल किया.

लेकिन इस बात का संकेत देना एक मिथक है कि महारों ने कोरेगांव की लड़ाई को पेशवाओं द्वारा अपने अपमान का बदला लेने के लिए जीता था. बाबासाहेब आंबेडकर ने 119 साल बाद 1 जनवरी 1927 को पहली बार इस स्तंभ का दौरा किया और कहते हैं कि इसके बाद वे कई बार वहां गए. उन्होंने इसका इस्तेमाल महारों को प्रेरित करने के लिए किया कि वे ब्राह्मणवाद के खिलाफ वैसी ही लड़ाई लड़ें जैसा उनके पुरखों ने पेशवाओं के खिलाफ लड़ी थी.(5) महाड सम्मेलन में उन्होंने यह बताते हुए कि उनके पुरखे कितने ज्ञानी लोग थे, उनको अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रेरित करने की कोशिश की. आगे चल कर उन्हें जातीय पहचान की सीमाओं का अहसास हुआ और उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के तहत अपने आह्वान को व्यापक बनाते हुए मजदूरों और किसानों तक उसका विस्तार किया, जिसके भीतर दलित भी आते थे. इसके पहले और इसके बाद भी भीमा-कोरेगांव भुला दिया गया था और 1990 के दशक तक ऐसा ही रहा, जब दलित वहां जमा होने शुरू हुए - ये तथ्य अपने आप में ही दलितों द्वारा इसका मतलब लगाए जाने और दलित विद्वानों द्वारा इसके बारे में बुने जाने वाले सिद्धांतों की कहानी कहते हैं. जिन बाबासाहेब आंबेडकर की समाधि की जगह पर एक छोटा सा ढांचा भी नहीं था जब तक कि उनके बेटे ने 1967 में मौजूदा स्तूप का निर्माण नहीं कराया, या फिर अन्य मांगों के अलावा जिनकी तस्वीर संसद के हॉल में लगाने के लिए दलितों को 1965 में एक व्यापक जेल भरो अभियान चलाना पड़ा था, वही आंबेडकर 1960 के दशक के आखिरी दौर में एक अहम प्रतीक बन गए. इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं है. चुनावी राजनीति में लगातार प्रतिद्वंद्विता तेज होती जा रही थी, क्योंकि उत्तर-औपनिवेशिक राजनीतिक अर्थव्यवस्था ने जातियों के ढांचे में सबसे ज्यादा आबादी वाली शूद्र जातियों में जो एक ग्रामीण धनी तबका पैदा किया था, उनकी क्षेत्रीय पार्टियां उभरने लगी थीं. इन हालात में शासक वर्गों ने बड़ी महारत से आंबेडकर को एक प्रतीक में ढाल दिया, ताकि दलितों को लुभाया जा सके जो अपने आंदोलन की शिकस्त के बाद अतीत के प्रति मोह के साथ आंबेडकर को भक्ति-भाव से देखने लगे थे. 1960 के दशक के आखिरी दौर तक जिस चैत्य भूमि पर उनके परिजनों समेत महज कुछ सौ लोग 6 दिसंबर को उन्हें याद करने के लिए जमा होते थे, वहां आज जमा होने वाले लोगों की तादाद बीस लाख के पार चली जाती है. आंबेडकर के बाद बढ़ती हुई तादाद में स्मारकों पर जमा होने वाले लोगों की तादाद में इजाफा, पहचान के उस जुनून की अभिव्यक्ति है, जिसे समकालीन राजनीतिक बदलावों ने जन्म दिया है.
 

पेशवाई का रूपक 

1990 के दशक से अब तक भीमा-कोरेगांव पर बिना किसी दिक्कत के लोग जुटते रहे हैं. फिर इस साल यह घटना क्यों घटी? जवाब इस बात में है कि ‘नई पेशवाई’ के खिलाफ इसका नारा जिन ताकतों ने पेश दिया वे दलितों, मुसलमानों, ओबीसी और मराठाओं के एक साथ एक जगह आने का एक झलक देते हैं. महाराष्ट्र में यह बदलाव सत्ताधारी भाजपा के लिए खतरनाक हो सकता है, खास कर ऐसे समय में जब चुनाव नजदीक आ रहे हैं. पिछले साल राज्य को जिस मराठा आंदोलन ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था, वह राजनीतिक रूप से उलझन का शिकार था, क्योंकि भले ही इसे एक राजनीतिक दल ने उकसाया था, मगर वह दल इसके फायदे को अपने प्रतिद्वंद्वी दलों की झोली में जाने से रोक नहीं सका, साथ ही वह दलितों और ओबीसी के बीच अलगाव को भी नहीं रोक पाया. मराठाओं ने तय किया कि वे सत्ताधारी ब्राह्मणवादी भाजपा को निशाना बनाने के लिए दलितों से दोस्ती करेंगे. इस नई नई एकता को तोड़ने के लिए हिंदुत्व ताकतों ने शंभाजी भिडे और मिलिंग एकबोटे जैसे उकसावेबाजों को लगाया ताकि पास के वाडु बुडरूक गांव में संभाजी स्मारक के मुद्दे पर मराठाओं को दलितों के खिलाफ खड़ा किया जा सके. उन्होंने यह इतिहास का यह झूठ गढ़ा कि संभाजी के शव का अंतिम संस्कार गोविंद महार ने नहीं बल्कि एक मराठा परिवार ने किया था. 28 दिसंबर को उन्होंने गोविंद महार के स्मारक को नुकसान पहुंचाया, आसपास के गांवों में बंद का आह्वान किया, दलितों पर हमले की योजना बनाई और 1 जनवरी को इस पर अमल किया. इसमें राजसत्ता की मिलीभगत बहुत साफ थी. अत्याचार अधिनियम (एट्रॉसिटी एक्ट) के तहत अपराधियों पर एफआईआर के बावजूद, और राज्य की निष्क्रियता पर विश्वव्यापी नाराजगी के बावजूद, राज्य ने उन्हें गिरफ्तार करने से इन्कार कर दिया, बल्कि उल्टे इन हमलों के विरोध में 3 जनवरी को एक शांतिपूर्ण बंद में भाग लेने के लिए राज्य भर से हजारों दलित नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया.

पेशवाई प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणवादी शासन का एक रूपक बन गई थी, जिसके उत्पीड़नकारी इतिहास का ब्योरा अपना थूक जमा करने के लिए एक महार के गले में बंधी मिट्टी के घड़े और अपने कदमों के निशान मिटाने के लिए कमर में बंधी कंटीली झाड़ी से दिया जाता है.(6) नई पेशवाई मौजूदा सत्ताधारी हिंदुत्ववादी गिरोह के रूपक के बतौर काम करती है. इसे सिर्फ जातियों के पहलू के लिहाज से देख कर, इसके पुराने संस्करण के साथ इसका मिलान मत कीजिए. यह अपनी व्यापकता और फासीवादी क्षमताओं की वजह से उससे कहीं ज्यादा घातक है. इसके फासीवादी गुणों पर वामपंथी बुद्धिजीवियों की बहसें अपनी जगह, यह यूरोप में 1920 और 30 के दशकों में आई बदनाम फासीवादी हुकूमतों से भी कहीं बदतर होने जा रही है. अपने सैकड़ों सिरों वाले संगठन, ब्राह्मणवाद की विचारधारा जो दुनिया में समता-विरोधी सबसे पुरानी विचारधारा है, वैश्विक पूंजीवाद का समर्थन और अनुकूल राजनीतिक हालात इसे संभावित रूप से मुसोलिनी के इटली या हिटलर के जर्मनी से भी कहीं अधिक नुकसानदेह बनाते हैं. यह सत्ताधारी गिरोह अपने संस्थापकों की परिकल्पना के अति-फासीवादी चरित्र वाले हिंदू राष्ट्र के अपने सपने को हकीकत में उतारने के लिए अगले चुनावों को आखिरी मौके के रूप में देख रहे हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि यह दलितों के लिए खतरनाक होने जा रहा है क्योंकि हिंदुत्व ताकतों के लिए वे ही असली ‘अन्य’ हैं.
 

दलितों का अपना मिशन 

बदकिस्मती की बात यह है कि दलित, फासीवाद, साम्राज्यवाद को अजनबी शब्दों की तरह लेते हैं, जो उनके लिए महज कम्युनिस्टों की बेमतलब की बकवास है. उनका अपना मिशन, उनका सर्वोच्च मकसद अपने जातीय उत्पीड़न से लड़ना है. लेकिन इस लड़ाई की प्रकृति क्या है? क्या वे इस पैमाने को उलटना चाहते हैं या जातियों का खात्मा करना चाहते हैं? पहचान (अस्मिता) की जो हसरत दिखाई देती है, उससे पक्के तौर पर तो यही इशारे मिलते हैं कि दलित जातीय ढांचे के भीतर ही एक तरह के शासक समुदाय जैसी प्रभुत्वशाली हैसियत पा लेंगे, जैसा कि कहीं पर आंबेडकर ने कहा था. इसके तहत मन ही मन यह मान लिया गया है कि जातियों का खात्मा नहीं हो सकता है. लेकिन इस मान्यता के साथ दिक्कत यह है कि यह जातीय पहचान के चरित्र को लेकर नादानी को ही जाहिर करती है, क्योंकि जातीय पहचान का बुनियादी गुण ऊंच-नीच का क्रम (हाइरार्की) है. यह जातियों को अमीबा की तरह बांटती और अलग करती है. इसका सबूत यह है कि आंबेडकर ने दलित नाम की जो श्रेणी बनाई, वह भी दलित जातियों को एक साथ नहीं रख सकी और न ही उन्हें उप-जातियों में टूटने से बचा सकी. जातीय पहचान के आधार पर बनाई गई कोई भी चीज जनता की एक व्यापक एकता नहीं बना सकती है. शासक समुदाय बनने का सपना, ऊपर उठ रहे दलितों के एक छोटे से तबके को प्रेरणा भले दे दे, लेकिन यह हमेशा ही एक ऐसा हसीन सपना बना रहेगा, जो कभी हकीकत नहीं बन पाएगा.

दलितों का असली मकसद, बल्कि देश का ही असली मकसद जातियों का खात्मा होना चाहिए, जिसकी पैरवी इत्तेफाक से खुद आंबेडकर ने ही की है. उन्होंने बीमारी की पहचान करते हुए कहा था कि जातियों की जड़ें हिंदू धर्म के धर्मशास्त्रों में हैं और चूंकि हिंदू कभी भी इन धर्मशास्त्रों को नष्ट करने को तैयार नहीं होंगे, इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म को छोड़ने का फैसला किया और बौद्ध धर्म अपनाया. यह समाधान कितना कारगर था, इस बहस में न जाते हुए, यह बात समझनी जरूरी है कि अकेले दलित कभी भी जातियों का खात्मा नहीं कर सकते. इसके अलावा यह बात भी है कि जातियां आज पुराने दौर की जातियां नहीं रह गई हैं जैसी आंबेडकर के चिंतन में दिखती हैं, बल्कि वे वर्ग के साथ घुल-मिल गई हैं, जो समकालीन दुनिया की एक प्रभुत्वशाली श्रेणी है. इसके अलावा, ऐसी घोर ढांचागत बाधाएं भी हैं जिन्हें उत्तर-औपनिवेशिक शासक वर्गों ने संविधान में ही तैयार किया, जिसे वे पवित्र मानते हैं. जाति और वर्ग के इस जटिल मकड़जाल को, सिर्फ अवाम के ऐसे एकजुट संघर्ष से ही तोड़ा जा सकता है जो वर्गीय पहचान की बुनियाद पर कायम हुआ हो.
 

जिन दलितों को इस पेशकश में कुफ्र की बू आ रही हो उनके लिए मैं आंबेडकर की ही बात को पेश कर सकता हूं:
‘कोई भी महान आदमी अपना फर्ज अदा नहीं कर रहा है अगर वह अपने शिष्य पर अपने उसूलों या अपने नतीजों को जबरदस्ती थोपते हुए उसे पंगु बना दे. महान आदमी अपने शिष्यों पर अपने उसूल नहीं थोपते. ...अगर एक शिष्य अपने गुरु के उसूलों या नतीजों को कबूल नहीं करता तो इसमें कोई भी कृतघ्नता नहीं है. क्योंकि जब वह उन्हें नकारता है तो वह गहरी श्रद्धा के साथ अपने गुरु के आगे यह भी कबूल करता है कि ‘‘आपने मेरी आंखें खोलीं कि मैं अपना आपा हासिल कर सकूं: इसके लिए आपका शुक्रिया.’’ गुरु इससे कम किसी चीज का हकदार नहीं है. और शिष्य इससे ज्यादा कुछ देने के लिए मजबूर नहीं है.’’(7)

नोट्स
1.    https://thewire.in/209824/myth-bhima-koregaon-reinforces-identities-seeks-transcend/.
2.    वह वाक्य था: “लेकिन जब बाबासाहेब आंबेडकर ने भीमा कोरेगांव की लड़ाई को पेशवा शासन में जातीय उत्पीड़न के खिलाफ महार सैनिकों की लड़ाई के रूप में पेश किया, वो एक शुद्ध मिथक रच रहे थे.”
3.    देखें “Why the Mahar Soldier Was the First Freedom Seeker in 1818,  https://thewire.in/213987/understanding-mahar-soldier-bhima-koregaon/.
4.    Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches (BAWS), Govt of Maharashtra, Mumbai, Vol. 12, p. 88.
5.    BAWS, Vol. 17/1, p.307.
6.    R.V. Russell, The Tribes and Castes of the Central Provinces of India, Vol.4, Maclillan & Co, London, 1916, http://www.gutenberg.org/files/20668/20668-h/20668-h.htm.
7.    BAWS (Ranande, Gandhi and Jinnah), Vol. 1, p.240.

गुजरात चुनाव में राहुल गांधी का ‘जबरदस्त झटका’

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/08/2018 07:31:00 PM


अपने नियमित स्तंभ में आनंद तेलतुंबड़े इस बार गुजरात चुनावों के नतीजों का विश्लेषण कर रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

कांग्रेस के नए-नए अध्यक्ष नियुक्त हुए राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों के नतीजों पर यह कहते हुए प्रतिक्रिया दी कि चुनावों ने भाजपा को जबरदस्त झटका दिया है और नरेंद्र मोदी की विश्वसनीयता के संकट को उजागर किया है. (टाइम्स ऑफ इंडिया, 20 दिसंबर 2017) गुजरात के चुनाव कोई मामूली चुनाव नहीं थे, उन्हें 2019 के आम चुनाव की आजमाइश के रूप में लिया जा सकता है, जिनमें अगर भाजपा के रथ को जीत का अपना सफर जारी रखने की इजाजत मिल गई तो भारत के औपचारिक रूप से एक फासीवादी हिंदू राष्ट्र में बदल दिए जाने का एक सचमुच का खतरा सामने आ खड़ा होगा.

गुजरात ने कांग्रेस को जीतने के लिए एक अनोखा मौका मुहैया कराया था. पिछले 22 सालों में यह पहला चुना था, जिसमें करिश्माई मोदी को राज्य मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया गया और न ही उनकी जगह किसी भरोसेमंद चेहरे को लाया गया. इसने सत्ताधारी दल के लिए मुश्किलें खड़ी कीं, जिसमें भाजपा के अपने स्थायी आत्मविश्वास और उद्दंडता का भी योगदान था, खास कर जब मोदी के गुजरात मॉडल का खोखलापन जगजाहिर हो गया है. इन चुनावों में सभी उल्लेखनीय समुदाय मुखर रूप से भाजपा के खिलाफ थे – हार्दिक पटेल के पीछे खड़े पाटीदार भाजपा को सबक सिखाने का ऐलान कर रहे थे, अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) अल्पेश ठाकुर के साथ कांग्रेस के पक्ष में खड़े थे और जिग्नेश मेवाणी द्वारा गोलबंद किए गए दलित भाजपा को हराने की कसमें खा रहे थे. किसान सबसे बुरे खेतिहर संकट झेल रहे हैं, नौजवान बढ़ती हुई बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं, भाजपा का मुख्य जनाधार रहे व्यापारी और छोटे कारोबारी नोटबंदी और जीएसटी से परेशान होकर खुलेआम अपनी नाराजी जाहिर कर रहे थे और आम जनता भी गैरमामूली तौर पर चुनावों को लेकर अपनी बेपरवाही दिखा रही थी. विपक्ष इससे और ज्यादा क्या उम्मीद कर सकता था? अगर इन सारी मुश्किलों के बावजूद, भाजपा वोट प्रतिशत में इजाफे के साथ ही विधानसभा में एक आरामदेह बहुमत से जीत गई तो हैरानी होती है कि राहुल गांधी किस झटके की बात कर रहे हैं.
 

होड़ में पिछड़ी कांग्रेस 

इस बार गुजरात में वोटों का कुल प्रतिशत 68.3 फीसदी था, जो 2012 के 71.3 फीसदी से कम है. यह लोगों में उत्साह की कमी को जाहिर करता है. इसे नोटा को भारी संख्या में मिले वोटों ने भी रेखांकित किया है. 5.52 लाख वोटरों ने, जो कुल वोटों का 1.8 फीसदी है, नोटा विकल्प को चुना और सियासत के हालात को लेकर अपनी मौन असहमति जाहिर की. नोटा को मिले वोटों की तादाद बहुजन समाज पार्टी और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी को मिले क्रमश: 2.07 और 1.85 लाख वोटों से कहीं अधिक है. ज्यादातर टिप्पणीकारों ने कांग्रेस के प्रदर्शन की तारीफ की है, जिसे पांच साल पहले मिली सीटों से 16 सीटें ज्यादा हासिल हुई हैं. भाजपा का कुल वोट शेयर 2014 के लोक सभा चुनावों के 60.11 फीसदी से गिर कर 49.1 फीसदी पर आ गया, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों के 47.85 फीसदी वोट शेयर के मुकाबले इजाफा ही हुआ है. इस बार कांग्रेस का वोट शेयर भी बढ़ कर 41.4 हो गया है, जबकि यह 2014 के लोकसभा चुनावों में 33 फीसदी और 2012 के विधान सभा चुनावों में 38.9 फीसदी था. उनके बीच के वोट शेयर का फर्क भी 2012 के 8.85 फीसदी से घट कर इस बार 7.7 फीसदी पर आ गया है, जो 2002 में गुजरात दंगों के फौरन बाद हुए चुनावों में 10.4 फीसदी और 2007 के चुनावों में 9.49 फीसदी था. लोक सभा चुनाव 2014 के आधार पर देखें तो भाजपा ने 66 सीटें खोई हैं और कांग्रेस ने 63 हासिल की हैं. भारत में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने (एफपीटीपी) की चुनाव प्रणाली  की बदौलत, अपने वोट शेयर में 1.25 फीसदी इजाफे के बावजूद भाजपा ने 17 सीटें खोईं. बेशक कांग्रेस को 19 सीटों का फायदा हुआ. यकीनी रूप से, कांग्रेस ने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन एफपीटीपी चुनाव प्रणाली में इसका क्या फायदा है?

इस बार कांग्रेस को अनोखी और साफ-साफ दिखने वाली बढ़त हासिल थी. परंपरागत रूप से भाजपा को वोट करने वाला समुदाय पाटीदार या पटेल आबादी का 14 फीसदा हिस्सा बनाते हैं और पिछली विधान सभा में इस समुदाय के 25 फीसदी विधायक थे. इस बार के चुनावों में 182 विधानसभा सीटों में से 65 पर उन्हें प्रभावशाली माना गया और वे आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा के खिलाफ कमर कसे हुए थे. लेकिन वोटिंग में वे बंटे हुए दिखे. ग्रामीण आबादी ने कांग्रेस को वोट दिया, जबकि शहरी मतदाताओं ने भाजपा के लिए वोट किया. कुछ हद तक इसकी उम्मीद की जा रही थी, लेकिन भाजपा ने निश्चित रूप से हार्दिक पटेल के कुछ साथियों को खरीद कर, हार्दिक के नेतृत्व वाले पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) में अपनी पैठ बना ली थी. ओबीसी वोट गुजरात में कुल वोटों का 45 से 50 फीसदी है और वे 71 सीटों पर प्रभावशाली हैं और इसलिए उन पर मोदी का रहमोकरम खूब रहा है. लेकिन इस बार उन्होंने ऐलानिया तौर पर कांग्रेस की हिमायत की. आबादी में 7 फीसदी तादाद वाले दलि परंपरागत रूप से कांग्रेस को वोट देते आए हैं और खुलेआम भाजपा के खिलाफ थे. राज्य की आबादी का 14.75 फीसदी हिस्सा, आदिवासी कुल 37 सीटों पर प्रभावशाली थे और भाजपा और कांग्रेस में बंटे हुए थे. भले ही ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि ये सारे समुदाय एकजुट होकर एक जगह वोट डालेंगे, लेकिन जब चुनावों का ऐलान हुआ तो साफ तौर पर कांग्रेस की ओर उनका झुकाव था. इसके बावजूद कांग्रेस इन समुदायों में भाजपा को मात नहीं दे पाई. उन 52 सीटों में से भाजपा ने 28 सीटें जीतीं, जहां पाटीदार आबादी 20 फीसदी या उससे ज्यादा है, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 23 सीटें ही मिलीं, और एक सीट एक निर्दलीय को गई. अनुसूचित जातियों में, भाजपा ने 8 सीटें जीतीं और कांग्रेस को 5 सीटें हासिल हुईं, जिनमें जिग्नेश मेवाणी की निर्दलीय सीट भी शामिल है, जिनको कांग्रेस ने समर्थन दिया था. सिर्फ अनुसूचित जनजातियों में ही भाजपा की 9 सीटों के मुकाबले कांग्रेस को 16 सीटें हासिल हुईं. लेकिन आदिवासी बहुल सीटों पर, भाजपा ने 19 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस ने सिर्फ 15, दो सीटें भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) और एक सीट निर्दलीय को गई.
 

मोदी की मुकाबले की ताकत 

गुजरात में हालात ऐसे थे कि मोदी के बिना भाजपा यकीनी रूप से चुनाव हार जाती. मोदी 2019 के आम चुनावों के अभ्यास के रूप में गुजरात की अहमियत को जानते थे और अपने पद की गरिमा और मर्यादा को भुला कर किसी भी कीमत पर इसे जीतने पर उतारू हो गए. शुरुआत में, दब्बू चुनाव आयोग के जरिए चुनावों को भाजपा के लिए एक सुविधाजनक समय आने तक तक टाला जाता रहा. संसद के शीत सत्र को बुलाने की रिवायत को भी इसके लिए तोड़ा गया. आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए नाराज वोटरों को मनाने के लिए जीएसटी में सुधार किए गए. लेकिन इन सबके बावजूद, गुजरात जब उनकी गिरफ्त से फिसलता हुआ दिखा तो वे हरसंभव घटिया स्तर पर उतरने से भी नहीं हिचके, जब उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, एक पूर्व भारतीय सेना प्रमुख दीपक कपूर, चार विदेश सचिवों और पाकिस्तान में एक पूर्व भारतीय कूटनीतिज्ञ और साथ ही कुछ फौजी मामलों के माहिर लोगों पर आरोप मढ़ दिया कि वे गुजरात चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. यहां तक कि उन्होंने हिंदुओं को सांप्रदायिक रूप से उकसाने की अपनी पुरानी तरकीब के तहत, सोमनाथ मंदिर में दाखिले के लिए किसी द्वारा राहुल गांधी का नाम गैर हिंदुओं के रजिस्टर में लिख दिए जाने को और अयोध्या मामले में कपिल सिब्बल की दखल को भी कांग्रेस को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किया. राष्ट्रवाद पर खड़े किए गए अंधराष्ट्रवादी शोरशराबे में गुजरात मॉडल या विकास पर एक शब्द नहीं कहा गया, जिसके बूते उन्होंने 2014 चुनावों में लोगों को बेवकूफ बना कर उनका वोट हासिल किया और सत्ता में आए.

उन्होंने शहरी मतदाताओं को आसानी से मना लिया कि वे नोटबंदी और जीएसटी की अपनी शिकायतों को भूल जाएं और शहरों के 48 में से 42 सीटें उनकी झोली में डाल दें. यह शहरी स्थानीय निकाय के चुनावों का दोहराव ही था, जिसमें 2016 की शुरुआत में भाजपा ने विजयी रही थी. लेकिन वे गांवों के मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पाए जो गहराते खेतिहर संकट और भाजपा शासन की आपराधिक अनदेखी का खामियाजा भुगत रहे हैं, जो राज्य में क्रोनी-पूंजीवाद को बढ़ावा दे रही है. इससे कांग्रेस को ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में 50 फीसदी से ज्यादा सीटें हासिल हुईं, खास कर मूंगफली और कपास के किसानों के बीच. कांग्रेस का प्रदर्शन सौराष्ट्र इलाके में सबसे प्रभावशाली रहा, जहां उसने अमरेली, मोरबी, गिर सोमनाथ और सुरेंद्रनगर जिलों में भारी जीत दर्ज की. इन नतीजों के लिए इन इलाकों में पाटीदारों के संगठन पास की जिस ताकत से जोड़ा जा रहा है, वह अपने आप में खेतिहर संकट की ही अभिव्यक्ति है. 182 सदस्यों वाली विधानसभा में 134 सीटें ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों से आती हैं. कांग्रेस को उनमें से 71 सीटें मिलीं, इसके बाद 57 सीटों के साथ भाजपा, दो सीटों के साथ बीटीपी, एक सीट के साथ एनसीपी और तीन निर्दलीय हैं. एक तरह से ये चुनावी नतीजे करीब दो साल पहले के जिला पंचायत और तालुका पंचायत चुनावों का दोहराव भी थे. इस तरह से, कहा जा सकता है कि मोदी का जादू चल रहा है और यह सिर्फ बदतर रुझानों की तरफ ही ले जा रहा है.
 

राहुल का नाकाबिल प्रदर्शन
 
यह तो तय है कि राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों को गंभीरता से लिया, 23 दिन वहां गुजारे और राज्य भर में 65 से ज्यादा रैलियों या सभाओं को संबोधित किया. इस बार उनके नारे भी थोड़े बेहतर थे जैसे कि ‘विकास गांडो थायो छे’ या ‘शाह-ज्यादा’ (अमित शाह के बेटे के लिए). लेकिन कुछ मुर्खता भरे नारे भी थे जैसे ‘गब्बर सिंह टैक्स’ या अपने वंश की तरक्की के बचाव में ‘अभिषेक बच्चन भी डायनेस्ट है’. लेकिन मीडिया के जायजे और अपने अंध-समर्थकों की तारीफों के उलट, वे अपने ताकतवर प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले टिक पाने में फिर से नाकाम रहे. कांग्रेस अभी भी शतुरमुर्ग की तरह बैठी मतदाताओं के भाजपा से मोहभंग होने का इंतजार कर रही है और अपनी ही घटती जा रही प्रासंगिकता को देखने से इन्कार कर रही है. भाजपा की ठोक-बजा कर बनाई गई चुनावी मशीन का रणनीतिक रूप से जवाब देने के बजाए गांधी बेवकूफी भरे तरीके से ‘मैं भी किसी से कम नहीं’ की रणनीति पर चल रहे हैं और खुद को सीधे सीधे मोदी के मुकाबले में खड़ा कर रहे हैं. वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि तय है कि इस तरह की रणनीति से वे नुकसान में ही रहेंगे. एक नेता की काबिलियत इसमें होती है कि वह अपने अनुयायियों को इसके लिए प्रेरित करे कि वे उसके विजन, उसके नजरिए को, जमीन पर उतार सकें, न कि इसमें होती है कि वह खुद को एक योद्धा के रूप में पेश करे. मोदी के पास उनकी गैरमामूली भाषणबाजी और ड्रामेबाजी का हुनर है, जिसकी मदद से वे झांसा देने वाली बातों और झूठों को बड़ी महारत के साथ फैलाते रहते हैं और भारतीय जनता को प्रभावित किया है, जिसकी परवरिश ही नायक पूजा पर हुई है. लेकिन साथ ही, मोदी वैश्विक पूंजी की पसंद भी हैं. गांधी के पास इनमें से कुछ भी नहीं है और वे सीधी टक्कर में उनसे होड़ नहीं ले सकते. उनके लिए जरूरी है कि वे एक तरह की स्वोट एनालिसिस यानी ताकत-कमजोरी-मौका-जोखिम का जायजा लें- ऐसा न सिर्फ वे अपनी पार्टी के साथ करें बल्कि अपने साथ भी करें और फिर एक व्यावहारिक रणनीति तैयार करें जो मोदी की राह रोक सके. उन्हें बार बार जो नाकामियां हासिल हुईं हैं उनको देखते हुए उनमें ऐसा कोई विजन दिखाई नहीं देता और न ही ऐसी सियासी समझ दिखाई देती है जो यह महसूस कर सके कि उनके सामने कैसा फौरी खतरा मौजूद है.

भाजपा की कामयाबी उसकी अकेली अपनी कामयाबी नहीं है. उसे काफी कुछ यह कामयाबी कांग्रेस की नालायकी की बदौलत भी हासिल हुई है. अगर महज हाल की ही कुछ घटनाओं को याद करें तो अगर राजीव गांधी ने शाहबानो फैसले को नहीं पलटा होता या अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाए होते या नरसिंह राव ने बाबरी मस्जिद के पास हिंदुत्ववादी गुंडों को जमा होने की इजाजत नहीं दी होती, तो मोदी वहां कभी नहीं पहुंच पाते जहां वे आज हैं. यह सड़न और गहराई तक जाती है, उन दिनों तक पहुंचती है जब कांग्रेस के क्रूर बहुमत के तहत उत्तर-औपनिवेशिक राज्य का निर्माण किया जा रहा था और इसने संविधान में ही जातियों और धर्म के लिए जगह तैयार की थी. आज भी, बहुसंख्यक आबादी भाजपा के पक्ष में नहीं है, 2014 में इसका लोकप्रिय वोट महज 31 फीसदी था. कांग्रेस के पुराने गुनाहों को जानने के बावजूद भारत के सारे प्रगतिशील लोग चुनावों में कांग्रेस के समर्थन में उतरे हैं, सिर्फ इसलिए कि भाजपा के शैतानी मकसद को साकार होने से रोका जा सके. लेकिन राहुल गांधी अपने उलझन भरे व्यवहारों से उन्हें निराश करते रहेंगे. वे मोदी के फंदे में फंस गए और गुजरात में 27 हिंदू मंदिरों का दौरा किया और यह भी दावा किया किया कि वे एक जनेऊ-धारी ब्राह्मण हैं. इस तरह न सिर्फ उन्होंने ‘नरम हिंदुत्व’ का प्रदर्शन किया, बल्कि घिनौने ऊंची-जातिवाद की शेखी भी बघारी. इससे पूरी निचली जातियां, खास कर दलित आसानी से उनसे अलग हो सकती हैं. वे बुजुर्ग गांधी (मोहनदास करमचंद) की तरह यह दावा क्यों नहीं कर सकते कि वे हिंदू होने के चलते अपनी मर्जी से एक भंगी हैं? यह कल्पना करना एक रणनीतिक दिवालियापन है कि वे अपने हिंदूपन और ब्राह्मणपन के बूते भाजपा को मात दे देंगे. बल्कि वे इस तरह भाजपा की सियासत को ही जायज ठहराते हैं, जैसा कि उनसे पहले के कांग्रेसी करते आए हैं.

बदकिस्मती से, जितना वक्त हमारे हाथ में है उसे देखते हुए, जनता के पास उन पर भरोसा करने के अलावा और कोई चारा नहीं है कि वे भारत को फासीवादी होने से बचाएंगे.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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