हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मारे जाने के बाद भी जिंदा है लेखक

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/30/2015 05:20:00 PM


भाषा सिंह अपनी इस ताजा रिपोर्ट में बता रही हैं कि कैसे प्रभुत्वशाली विचारों, प्रथाओं और सामाजिक संरचनाओं को चुनौती देने वाले लेखकों की इस मुल्क में जीते जी 'हत्या' कर दी जाती है. यहां वे तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन से हुई अपनी हालिया मुलाकात को पेश कर रही हैं, और साथ ही वे उनके उपन्यास के बारे में हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा पैदा किए गए विवाद और इसकी पृष्ठभूमि की जानकारी दे रही हैं.

अब भी दिमाग मेरे दिमाग में 7-8 उपन्यास हैं। कई का तो पूरा नक्शा भी तैयार है, बस देर है उन्हें उतारने की। इन सभी उपन्यासों की विषयवस्तु एक से बढ़ कर है। मुझे लिखने में वैसे भी ज्यादा समय नहीं लगता। आपको पता है, अभी जनवरी में ही मेरे दो उपन्यास अलावायन और अर्द्धनारी चेन्नई पुस्तक मेले में आए और अच्छी प्रतिक्रिया मिली। ये दोनों उपन्यास मादोरुबागन की अगली कड़ी (सीक्वल) हैं।

यह बताते हुए जबर्दस्त उत्साह में आ जाते हैं 48 वर्षीय पेरुमल मुरुगन। उनके साथ बिताए करीब तीन घंटों में मुरुगन सिर्फ और सिर्फ अपनी लेखनी के बारे में बतियाते रहे। उसी में पूरी तरह से डूबते-उतराते रहे। उनसे कुछ भी और सवाल पूछती, उनका जवाब अपने किसी उपन्यास या कहानी के साथ समाप्त होता। वह धाराप्रवाह अपने रचना संसार के बारे में जिस तरह से बता रहे थे कि विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं तमिलनाडु के उसी चर्चित लेखक के सामने बैठी हूं जिन्होंने अपने लेखक की मृत्यु का ऐलान कर दिया है। उन्होंने किसी भी अपरिचित से मिलना बंद कर रखा है और खुद को अपने परिवार और परिचित दायरे में कैद कर रखा है। मुझसे और मेरे साथ गए कुछ मित्रों से वह सिर्फ इसलिए मिलने को तैयार हो गए क्योंकि हम दिल्ली से हजारों किलोमीटर का सफर तय करके सिर्फ उनसे मिलने पहुंचे थे। हालांकि फोन पर जब हमने उनसे मिलने की ख्वाहिश जताई थी तो उन्होंने कहा कि मिले बिना कोई रचनाकार जिंदा नहीं रह सकता, पर अभी स्थितियां अच्छी नहीं हैं। इस बात का अहसास नामाक्कल में पी. मुरुगन के छोटे से घर के बाहर पहुंचकर हो गया। पुलिस वहां तैनात थी। उनकी पत्नी और दोनों बच्चों के चेहरों पर जबर्दस्त तनाव था। उनकी पत्नी अलिरासी ने, जो खुद तमिल साहित्य की प्राध्यापक और कवि हैं, बस यह कहा कि हमारी जिंदगी में सब कुछ बदल गया। मुरुगन से जब उनकी अगली किताब के बारे में पूछा तो बहुत बोझिल स्वर में उन्होंने जवाब दिया, 'अब कागज नहीं मन पर लिखूंगा, यहां किसी का कोई दखल नहीं हो सकता।'

तमिलनाडु के कोयंबटूर शहर से करीब 200 किलोमीटर दूर है नामाक्कल। बेहद शांत दिखने वाला यह शहर इस समय खदबदाया हुआ है और इसकी खदबदाहट का असर तमिलनाडु की राजनीति से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक में महसूस हो रही है। पेरुमल मुरुगन के तमिल उपन्यास मादोरुबागन (2010) का 2014 में अंग्रेजी में तर्जुमा पेंगुइन प्रकाशन से वन पार्ट वुमन नाम से आया। रातों-रात इस पर आर्श्चयजनक ढंग से हिंदुत्वादी और जातिवादी राजनीति गरमा गई। निश्चित तौर पर इसका संबंध राज्य में भाजपा और उग्र हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा सांप्रदायिक-जातिवादी ध्रुवीकरण तेज करने की कवायदों से है। ये अभियान वॉट्स-अप पर शुरू हुआ। इसकी शुरुआत की, गाउंडर जाति (जिससे खुद लेखक पी.मुरुगन आते हैं) की पार्टी कोंगुनाडू मक्कलकच्छी ने, जिसका राज्य में भारतीय जनता पार्टी से चुनावी गठबंधन रहा है। इस पार्टी के साथ विवादित उग्र संगठन हिंदू मुन्नानी और भाजपा ने नामाक्कल से लेकर चेन्नई तक, लेखक तथा उनकी किताब को निशाने पर लेकर हल्ला बोल दिया। स्थानीय प्रशासन ने इन उग्र संगठनों का साथ देते हुए, लेखक पेरुमल मुरुगन को तीन बैठकों (जनवरी 7, 9 जनवरी और 12 जनवरी) में बुलाया और उन पर दबाव बनाया, किताब वापस लेने और धमकाने की लंबी प्रक्रिया चलाई, जिससे आहत होकर पेरुमल मुरुगन ने 14 जनवरी को फेसबुक पर लिखा, 'लेखक पेरुमल मुरुगन मर गया। वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनर्जीवित नहीं कर सकता। वह पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करता। आगे से, पेरुमल मुरुगन सिर्फ एक अध्यापक के बतौर जिंदा रहेगा, जो वह हरदम रहा है।'

लेखक ने इन शब्दों के माध्यम से जिस गहरी पीड़ा और प्रतिरोध का इजहार किया, उसने साहित्यिक जगत में एक जबर्दस्त बेचैनी का संचार किया। देश भर में पी. मुरुगन के पक्ष में लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी बोलने लगे। चेन्नई में प्रगतिशील लेखक संघ ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की, जिसमें इस असंवैधानिक बैठकों में मादोरुबागन और वन पार्ट वुमन किताब के बारे में लिए गए फैसलों को खारिज करने की अपील की, अभिव्यिक्त की स्वतंत्रता को बचाने की मांग की गई। चेन्नई, बंगलूर से लेकर दिल्ली, जयपुर, कोलकाता तक में मुरुगन की किताब मादोरुबागन का पाठ किया गया। तमाम भाषाओं के लेखक मुरुगन के पक्ष में खड़े हुए और मैं मुरुगन हूं-जैसे अभियान भी चले।

इस तरह से नामाक्कल शहर इस समय चर्चा के केंद्र में आ गया है। उनकी किताब मादोरुबागन और उसके अंग्रेजी संस्करण वन पार्ट वुमन को कोयंबटूर शहर में दो घंटे ढूंढ़ने में नाकाम रहने के बाद समझ आया कि किसी किताब पर अघोषित प्रतिबंध कैसे लगाया जाता है। हालांकि एक पुस्तक विक्रेता ने कहा, इस हंगामे की वजह से मुरुगन की यह किताब और नामक्कल शहर दुनिया भर में मशहूर हो गया। इन तमाम बातों से बेहद विनम्र स्वर में बात करने वाले पी. मुरुगन वाकिफ हैं और उन्हें लग रहा है कि लेखन पर गहराया संकट जल्द नहीं हटने वाला है। जाति के बारे में पूछने पर वह कहते हैं कि यह मेरे लिए तो बड़ा मुद्दा नहीं है लेकिन समाज में एक बड़ा मुद्दा है। कैसे हम इससे बाहर आ सकते हैं, यह कोई नहीं जान पाया। हालांकि यह पेरियार की जमीन है, जिन्होंने जातिवाद, ब्राह्मणवाद और अंधविश्वास के खिलाफ ऐतिहासिक सफल आंदोलन चलाया लेकिन फिर भी जाति लोगों को संगठित करने का सबसे बड़ा औजार बनी हुई है। मैंने 2013 में पूक्कली (अर्थी) उपन्यास अंतर्जातीय विवाह पर होने वाली राजनीति पर ही लिखा था और इस उपन्यास को तमिलनाडु में अंतर्जातीय विवाह करने के बाद मारे गए दलित युवक इलावरसन और—को समर्पित किया था। यह किताब भी अंग्रेजी में अनुवाद हो रही है।

मुरुगन ने बताया कि तिरुचेंगोड गांव के एक गरीब भूमिहीन परिवार में जन्मे और खानदान के पहले शिक्षित व्यक्ति थे। इसी गांव के अर्धनारीश्वर मंदिर की एक प्रथा का जिक्र पी. मुरुगन ने अपने उपन्यास मादोरुबागन में किया है, जिसमें निस्संतान महिलाओं के लिए सहमति से किसी देवता से शारीरिक संबंध बनाने की छूट होती है। उपन्यास के इसी हिस्से को तिरुचेंगोडु की महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला और उनके चरित्र पर सवाल उठाने वाला बताया गया और इसके खिलाफ आवाज उठाने का आहृवान सभी हिंदुओं से किया गया। इस विवाद के बारे में पी. मुरुगन सीधे कुछ भी बोलने के बजाय, यह कहते हैं, 'मेरे सारे उपन्यास जमीनी हकीकत पर आधारित हैं। कल्पना का पुट साहित्य में होता है, लेकिन मैं हकीकत से जुदा होकर लिखने में विश्वास नहीं करता।'

अब तक 35 किताबें लिख चुके मुरुगम पेरियार, मार्क्स और अंबेडकर की विचारधारा से गहरे रूप से प्रभावित हैं। हालांकि वह किसी वामपंथी पार्टी से नहीं जुड़े हैं लेकिन खुद को मार्क्सवादी मानते हैं। अपने उपन्यासों में उन्हें सबसे प्रिय है सीजन्स ऑफ पाम, जिसमें उन्होंने एक दलित-अरुधंतियार भूमिहीन बंधुआ मजदूर की कहानी लिखी है। उन्होंने अब तक नौ उपन्यास लिखे हैं जिसमें से पांच पिछले पांच साल में आए।

बातचीत के दौरान अनगिनत लोगों की आवाजाही बनी रही। पेरियार के अनुयायी द्रविड़ कयगम के वालिएंटरों का दस्ता काली कमीज में लेखक के साथ मुस्तैद था। मुरुगन अभी इस विवाद पर कुछ बोलना नहीं चाहते, वह संकट कटने का खामोशी के साथ इंतजार करना चाहते हैं। सरकार वहां अन्नाद्रमुक की है और वह इसमें हिंदुत्वादी संगठनों को संरक्षण दे रही है, द्रमुक पार्टी के नेता स्टालिन लेखक के पक्ष में बयान देने तक सीमित रहे, वाम दल समर्थन में हैं। लेकिन मुरुगन की खामोशी उनके कई साथियों को चुभ रही है। तमिल लेखिका वासंती का कहना है कि मुरुगन को इस तरह से हथियार नहीं डालना चाहिए। हालांकि चेन्नई की महिला कार्यकर्ता के. मंजुला का कहना है कि हम मुरुगन के शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने निस्संतान महिला के लिए विषम स्थितियों को उजागर किया। पी. मुरुगन के सहकर्मी प्रो. मुत्तूस्वामी का मानना है कि इस पूरे प्रसंग में जीत लेखक की हुई है। उनकी लेखनी विजयी हुई है। पूरे देश और दुनिया में लोगों का लेखक के पक्ष में आना इसका सबूत है।

तमिल साहित्य के जुझारू इतिहास में पहली बार किसी लेखक ने अपने लेखक की मौत की घोषणा की है। हालांकि इसे भी प्रतिरोध की उस अमर श्रृंखला के साथ ही जोड़ के देखा जा रहा है, जिसमें तमिल के प्रख्यात कवि भारतीयार ने कहा था, 'अगर एक व्यक्ति के पास खाने को अन्न नहीं है तो हम उस दुनिया को जला देंगे।'

मादोरुबागन पर क्यूं हंगामा

यह उपन्यास कोंगू अंचल में एक निस्संतान किसान दंपत्ति पोन्ना (पत्नी) और काली (पति) की दास्तां है, जिनमें बेहद प्रेम है। इस प्रेम पर बच्चा न होने की वजह से समाज और परिवार के ताने तथा दबाव कैसे कहर बरपाते हैं, इसका मार्मिक चित्रण है। इसमें तिरुचेंगोडु में स्थित शिव के अर्दनारीश्वर मंदिर में हर साल लगने वाले एक 14 दिन लंबे मेले का जिक्र है, जिसमें मान्यता है कि अंतिम दिन मेले में उपस्थित सभी पुरुष देवता हो जाते हैं और निस्संतान स्त्रियां किसी भी देवता के साथ समागम कर संतान प्राप्ति कर सकती हैं। मान्यता के अनुसार ऐसी संतानों को देवता का प्रसाद माना जाता है। इस ट्रैजिक उपन्यास में नायिका यहां जाती है। इसी हिस्से पर हिंदुत्वादी संगठनों ने सारा कहर बरपा किया।

हिंदी आउटलुक के 1-15 फरवरी 2015 अंक में प्रकाशित. साभार. 

गणतंत्र दिवस के अतिथि

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/25/2015 01:11:00 AM


अनुज लुगुन ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रतिनिधि, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत आने पर यह कविता लिखी है. ओबामा इसे यकीनी बनाने के लिए आए हैं कि भारतीय राज्य जनता के जल-जंगल-जमीन को छीन कर साम्राज्यवादी कंपनियों को सौंपना जारी रखे और इस तरह अमेरिकी साम्राज्य के वजूद को कायम रखे. साथ में, ब्राह्मणवादी-सामंती-फासीवादी परियोजनाएं भी चलती रहें.

सिर्फ इतना ही कर सकता हूँ
कि आज के तुम्हारे कार्यक्रम में
मैं शामिल नहीं होऊंगा
और कर भी क्या सकता हूँ
तुम्हारे अभेद्य सुरक्षा कवच के सामने.?
वैसे और क्या हो सकता है इससे बेहतर
तुम्हारा लोकतांत्रिक बहिष्कार
कि लोकतंत्र के कथित महाप्रभु को
उसी के जुमलों से जवाब दिया जाए?

जब सारी दुनिया
तुम्हारे ताकत के दंभ और शोहरत की
अंधभक्ति कर रही हो
तब मेरे ही भाई-बन्धु हसेंगे
मेरे इस निर्णय पर
और सीआईए अगर
इसकी भी सूचना दे दे
तो शायद तुम्हें भी
हिंदी के इस आदिवासी कवि पर हंसी आ जाए

आज कार्यक्रम में शामिल नहीं होऊंगा
तो इसका मतलब
तुम मुझसे बेहतर समझते हो कि
मैं तुम्हारे हर उस निर्णय में शामिल नहीं हूँ
जिसने दुनिया को ‘डॉलर’ की जंजीर पहनाई है
जिसने जने हैं दुनिया में
नाटो, खाड़ी, तालिबान, ईराक
लीबिया, उ.कोरिया, ईरान
और भी ऐसी अनगिनत अंधेरी खाइयां
जिनमें मानवता दफ़न की जा रही है

मेरे इस इनकार का मतलब
तुम भली भांति समझते हो
कि मैं तुमसे और तुम्हारे अधिकांश
पूर्वजों से असहमत हूँ
तुम यह भी जानते हो कि
आज तुम जिस जमीन पर खड़े होकर
आतंकवाद और विश्व शान्ति की बात कर रहे हो
उसी जमीन के खिलाफ
तुम्हारे पूर्वजों ने जहाजी बेड़ा भेजा था

मुझे पता है
तुम और तुम्हारा सीआईए
कहेगा कि मैं सोवियतों का पिछलग्गू रहा हूँ
कहोगे कि मैं चे, कास्त्रो या शावेज का गुप्तचर हूँ
कहोगे कि मैं तालिबानी हूँ
कहोगे कि मैं इस्लामिक स्टेट का हूँ
तुम कुछ भी कहोगे और उसे साबित भी कर दोगे
लेकिन तुम कभी नहीं कहोगे कि
मैं ब्लैक हिल्स या डकोटा प्रान्त का वंशज हूँ
नहीं कहोगे कि मैं रेड इंडियनों का वंशज हूँ
ऐसा कहकर तुम और सीआईए
कभी भी अपने इतिहास का
नकाब नोचने की हिमाकत नहीं करेगा

मुझे पता है
तुम कुछ भी ऐसा नहीं करोगे
जिससे साबित हो कि
तुम्हारे सिवाय और भी सभ्यता रही है
और भी मौजूद हैं दूसरे सहजीवी विकल्प

आज तुम बापू को धन्य धन्य कहोगे
मार्टिन लूथर किंग जूनियर की दास्तान कहोगे
और जब कल यहाँ से वापस लौट जाओगे
हथियारों के अंतराष्ट्रीय बाजार में
तुम्हारी रैंकिंग फिर से सबसे ऊपर होगी

फिर से होगी
तीसरी-अश्वेत-अफ़्रीकी-दुनिया में
तुम्हारे लड़ाकू युद्ध पोतों
और जहाजी बेड़ों के उतरने तक
हथियारों की काला बाजारी

आज मेरे देश की
बलिदानी धरती पर होने के बावजूद भी
तुमसे दूसरी छोर पर रहूँगा
मैं यहाँ अपने जंगलों और नदियों के साथ
यहीं अपने जनवादी गणतंत्र का गीत गाऊंगा |

हिंदुत्व का शिकंजा और दलित-जातिवादी राजनीति

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/24/2015 08:00:00 AM


प्रो. तुलसी राम का यह लेख हिंदुत्व के फासीवादी तीखे होते हमलों के दौर में दलित-जातिवादी राजनीति का एक आकलन पेश करता है. 

पिछले पचीस सालों में दलितों के साथ पिछड़े वर्ग की राजनीति में जातिवाद अपनी चरम सीमा पार कर गया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि विशुद्ध हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा ने अकेले बहुमत पाकर भारत की सत्ता प्राप्त कर ली। भारतीय जाति-व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसे धर्म और ईश्वर से जोड़ दिया गया। यही कारण था कि इसे ईश्वरीय देन मान लिया गया। गांधीजी जैसे व्यक्ति भी इसी अवधारणा में विश्वास करते थे। इस अवधारणा का प्रचार सारे हिंदू ग्रंथ करते हैं। इसलिए हिंदुत्व पूर्णरूपेण जाति-व्यवस्था पर आधारित दर्शन है।

विभिन्न जातियां हिंदुत्व की सबसे मजबूत स्तंभ हैं। इसलिए इन स्तंभों की रक्षा के लिए ही भारत के सभी देवी-देवताओं को हथियारबंद दिखाया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि दलितों पर आज भी वैदिक हथियारों से हमले जारी हैं। ऐसी स्थिति में जब जाति को मजबूत किया जाता है, तो हिंदुत्व स्वत: मजबूत होता चला जाता है। पिछले पचीस वर्षों में ऐसा ही हुआ है।

नब्बे के दशक में कांशीराम ने एक अत्यंत खतरनाक नारा दिया था- ‘अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो’। इसी नारे पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) खड़ी हुई। परिणामस्वरूप डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन की अवधारणा को मायावती ने शुद्ध जातिवादी अवधारणा में बदल दिया। इतना ही नहीं, गौतम बुद्ध द्वारा दी गई ‘बहुजन हिताय’ की अवधारणा को चकनाचूर करके उन्होंने ‘सर्वजन हिताय’ का नारा दिया, जिसका व्यावहारिक रूप सभी जातियों के गठबंधन के अलावा कुछ भी नहीं था। परिणामस्वरूप दलितों की विभिन्न जातियों के साथ-साथ ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के अलग-अलग सम्मेलनों की बसपा ने भरमार कर दी, जिससे हर जाति का दंभी गौरव खूब पनपने लगा।

ब्राह्मण सम्मेलनों के दौरान बसपा के मंचों पर हवन कुंड खोदे जाने लगे और वैदिक मंत्रों के बीच ब्राह्मणत्व का प्रतीक परशुराम का फरसा (वह भी चांदी का) मायावती को भेंट किया जाने लगा। इस दौरान दलित बड़े गर्व के साथ नारा लगाते थे- ‘हाथी नहीं, गणेश हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं’। मायावती हर मंच से दावा करने लगीं कि ब्राह्मण हाशिये पर चले गए हैं, इसलिए वे उनका खोया हुआ गौरव वापस दिलाएंगी। वे इस तथ्य को जरा भी समझ नहीं पार्इं कि ब्राह्मण कभी भी हाशिये पर नहीं जाते हैं। उनका सबसे बड़ा हथियार धर्म और ईश्वर है। इन्हीं हथियारों के बल पर ब्राह्मणों ने हमेशा समाज की बागडोर अपने हाथ में रखी।

इससे पहले मायावती तीन बार भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं और गठबंधन की सरकार चलाई। इतना ही नहीं, भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए मायावती विश्व हिंदू परिषद के त्रिशूल दीक्षा समारोह में भी शामिल हुर्इं। पर जब वे मोदी का प्रचार करने गुजरात गर्इं, तो उन्होंने धार्मिक उन्माद पर खुलेआम ठप्पा लगा दिया। दलित सत्ता के नारे के साथ मायावती ने जातीय सत्ता की प्रतिस्पर्द्धा को जन्म दिया। इस जातीय सत्ता की होड़ में मंडलवादियों ने शामिल होकर धर्म के स्तंभों को और मजबूत किया।

अगर राजनीति में धर्म का इस्तेमाल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध है, तो धर्म से उत्पन्न जाति का इस्तेमाल कैसे धर्म-निरपेक्ष हो सकता है? इसलिए धर्म का राजनीति में इस्तेमाल जितना खतरनाक है, जाति का इस्तेमाल उससे कम खतरनाक नहीं है। इस तथ्य को न कभी मायावती समझ पार्इं और न ही मंडलवादी। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव और नीतीश कुमार आदि सब ने जातिवादी राजनीति के माध्यम से धर्म की राजनीति को मजबूत किया।

आज नरेंद्र मोदी जो छप्पन इंच का सीना तान कर घूम रहे हैं, उसकी पृष्ठभूमि में जातिवादी राजनीति रही है। उक्त सारे नेताओं द्वारा जाति के साथ-साथ मुसलिम वोटों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने के प्रयास से आम हिंदू नाराज होकर पूरी तरह भाजपा की तरफ चला गया। इसलिए संघ परिवार जिसकी वकालत बरसों से कर रहा था, उसमें वह पूर्णत: सफल रहा। भाजपा ने धर्म और जाति, दोनों का इस्तेमाल बड़ी रणनीति के साथ किया, जिसके पीछे वह चालाकी से ‘विकास’ की बात करके जनता को भ्रमित करने में सफल रही, जबकि असली मुद्दा धार्मिक ध्रुवीकरण का ही था।

मायावती ने डॉ. आंबेडकर की मूर्तियों और पार्कों की आड़ में दलितों को उनके रास्ते से भटकाने का काम बड़ी सफलता से किया। डॉ. आंबेडकर ने दलितों को सामाजिक और धार्मिक भेदभाव से मुक्ति दिलाने के लिए एक दोहरी रणनीति अपनाई थी। एक तरफ उन्होंने जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन का सूत्रपात करके ‘मनुस्मृति’ को जलाया था और दूसरी तरफ जातिवाद को स्थापित करने वाले वैदिक ब्राह्मण धर्म के विकल्प के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाया था। मायावती डॉ. आंबेडकर की दोनों रणनीतियों को दरकिनार करके जातिवादी राजनीति के चंगुल में फंसती चली गर्इं।

एक बार कांशीराम ने घोषणा की थी कि वे डॉ. आंबेडकर से कहीं ज्यादा लोगों के साथ, यानी बीस लाख से अधिक लोगों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण करेंगे, पर स्वास्थ्य की समस्या के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए। बाद में मायावती ने कहा कि बौद्ध धर्म ग्रहण करने से सामाजिक सद्भावना के बिगड़ने की संभावना है, इसलिए जब वे प्रधानमंत्री बन जाएंगी, तो बौद्ध धर्म ग्रहण करेंगी। जाहिर है, जब उन्होंने उक्त बातें कहीं, उस समय मायावती भाजपा के साथ उत्तर प्रदेश की सरकार चला रही थीं।

डॉ. आंबेडकर के दर्शन के बारे में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे भारत के लिए द्वि-दलीय प्रणाली की वकालत करते थे, इसलिए वे दलित नाम से कोई पार्टी नहीं चलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी को प्रस्तावित किया। कांग्रेस का यही विकल्प उन्होंने प्रस्तुत किया था। पर एक बात उन्होंने जोर देकर कही थी कि दलितों को आरएसएस और हिंदू महासभा (वर्तमान विश्व हिंदू परिषद) जैसे संगठनों के साथ कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए।

संघ ने 1951 में जनसंघ की स्थापना की थी, पर आंबेडकर के समय में उसका प्रभाव नगण्य था। इसीलिए सीधे-सीधे उन्होंने संघ से किसी भी तरह का समझौता करने से दलितों को मना किया था। मायावती ने डॉ. आंबेडकर के हर कदम को नजरअंदाज करके संघ-परिवार का हाथ मजबूत किया। डॉ. आंबेडकर का जनतंत्र में अटूट विश्वास था, जिसकी झलक भारत के संविधान में साफ तौर पर मिलती है। उनका मानना था कि जाति-व्यवस्था एक तरह से तानाशाही वाली व्यवस्था थी, जिसके चलते दलित हर तरह के मानवीय अधिकारों से वंचित रहे। इसलिए जनतांत्रिक प्रणाली को वे दलितों के लिए सर्वोत्तम प्रणाली समझते थे।

पर सारी जातिवादी पार्टियां अपनी ही जाति के लोगों को हमेशा जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित करती रही हैं। ऐसी पार्टी के नेताओं में मायावती का नाम सबसे ऊपर आता है। यहां तक कि बैठकों के दौरान न सिर्फ मायावती कुर्सी पर बैठा करती थीं और बाकी नेता जमीन पर बैठते थे; विधानसभा हो या संसद, उनके डर से कोई पार्टी विधायक या सांसद कुछ भी बोलने से डरता था। उनका व्यवहार एकदम सामंती हो गया था। उन्हें आम सभाओं में चांदी-सोने के ताज पहनाए जाते थे और उनके हर जन्म दिवस पर लाखों रुपए की भारी-भरकम माला भी पहनाई जाती थी। 1951 में मुंबई के दलितों ने बड़ी मुश्किल से दो सौ चौवन रुपए की एक थैली डॉ. आंबेडकर को उनके जन्मदिन पर भेंट की थी, जिस पर नाराज होकर उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर कहीं भी ऐसा दोबारा किया तो वे ऐसे समारोहों का बहिष्कार करेंगे।

पिछली दफा राज्यसभा का परचा दाखिल करते हुए मायावती ने आमदनी वाले कॉलम में एक सौ तेईस करोड़ रुपए की संपत्ति दिखाई थी। हकीकत यह थी कि मायावती के गैर-जनतांत्रिक व्यवहार के चलते बसपा में भ्रष्ट और अपराधी तत्त्वों की भरमार हो गई थी, जिसके कारण पूरा दलित समाज न सिर्फ बदनाम हुआ, बल्कि इससे दलित विरोधी भावनाएं भी समाज में खूब विकसित हुर्इं। एक तरह से मायावती दलित वोटों का व्यापार करने लगी थीं। पिछले अनेक वर्षों में चमार और जाटव समाज के लोग उत्तर प्रदेश में भेड़ की तरह मायावती के पीछे चलने लगे थे। इसलिए वे भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को चुन कर विधानसभा और संसद में भेजने लगे थे।

बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधानसभा में बोलते हुए एक बार कहा था, ‘धर्म में नायक पूजा किसी को मुक्ति प्रदान कर सकती है, पर राजनीति में नायक पूजा निश्चित रूप से तानाशाही की ओर ले जाएगी।’ मायावती के संदर्भ में यह शत-प्रतिशत सही सिद्ध हुआ। राजा-रानियों की तरह मायावती ने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करते हुए प्रेस सम्मेलन में कहा था, ‘मेरा उत्तराधिकारी चमार जाति का ही होगा, जिसका नाम मैंने एक लिफाफे में बंद कर दिया है। यह लिफाफा मेरी मृत्यु के बाद खोला जाएगा।’ इससे एक बात साफ हो गई कि मायावती के रहते कोई अन्य दलित नेता नहीं बन सकता था।

उनके द्वारा बार-बार चमार जाति के उल्लेख से दलित की गैर-चमार जातियां बसपा से कटती चली गर्इं और उनमें से अधिकतर या तो भाजपा के साथ हो गर्इं या मुलायम सिंह यादव के साथ चली गर्इं। उत्तराधिकारी की घोषणा के बाद एक रोचक घटना हुई। मीडिया वालों ने अंदाजवश आजमगढ़ के राजाराम के रूप में उत्तराधिकारी की पहचान कर ली। परिणामस्वरूप मायावती ने अविलंब राजाराम को पार्टी से बर्खास्त कर दिया।

जब मायावती सामाजिक अभियांत्रिकी (सोशल इंजीनियरी) के नाम पर ब्राह्मणों को सतीश मिश्रा के माध्यम से अपनी तरफ खींचने का अभियान चला रही थीं तो दलितों के विरुद्ध उसका दूरगामी प्रभाव पड़ा। इससे पहले चुनावी राजनीति में ही सही, सारी पार्टियां दलितों को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करती थीं और उनके लिए तरह-तरह के वादे भी किया करती थीं, जिसका परिणाम अनेक अवसरों पर काफी सकारात्मक भी हुआ करता था। इसलिए दलित हमेशा एक दबाव समूह का काम करते थे। पर मायावती उस तथाकथित सामाजिक अभियांत्रिकी के चलते हर पार्टी के लिए ब्राह्मण खुद दबाव समूह के लिए दलितों को हाशिये पर डाल दिए। परिणामस्वरूप मायावती के चक्कर में दलित हर पार्टी के लिए दुश्मन बन गए। अब उनके कल्याण के लिए कोई भी पार्टी तत्पर नहीं दिखाई पड़ती। सच ही कहा गया है, ‘माया मिली न राम।’

मायावती के एक अन्य दलित-विरोधी फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ा। किसी गैर-दलित मुख्यमंत्री की कभी हिम्मत नहीं पड़ी कि वह ‘दलित अत्याचार विरोधी अधिनियम’ से छेड़छाड़ करे। पर मायावती जब भाजपा के साथ संयुक्त सरकार चला रही थीन, तो उन्होंने गैर-दलितों को खुश करने के लिए उपरोक्त अधिनियम में संशोधन करके यह प्रावधान कर दिया कि दलित महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे अपराधों को पुलिस तब तक दर्ज न करे, जब तक कि डॉक्टर प्रमाणित न कर दे कि सही मायने में बलात्कार हुआ है। मायावती के इस आदेश का परिणाम यह हुआ कि दलितों पर तरह-तरह के अत्याचार होते रहे, पर पुलिस अधिकतर मामलों में आज भी केस दर्ज नहीं करती है।

इस बार लोकसभा चुनावों में जब बसपा का सफाया हो गया, तो मायावती ने इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा दिया। हकीकत तो यह है कि मायावती अपनी व्यक्तिगत सत्ता के लिए लगातार जातिवादी नीतियां अपनाती रही हैं, जिससे दलित निरंतर सबसे कटते चले गए। पिछले पचीस सालों के अनुभव से पता चलता है कि अब देश को जातिवादी पार्टियों की जरूरत नहीं है, बल्कि सबके सहयोग से जाति-व्यवस्था विरोधी एक मोर्चे की आवश्यकता है, अन्यथा जातियां मजबूत होती रहेंगी, जिससे धर्म की राजनीति को ऑक्सीजन मिलता रहेगा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान डॉ. आंबेडकर ने गांधीजी से कहा था, ‘स्वतंत्रता आंदोलन में सारा देश एक तरफ है, पर जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन सारे देश के खिलाफ है, इसलिए यह काम बहुत मुश्किल है।’ उम्मीद है, दलित इतिहास से कुछ सीख अवश्य लेंगे।

कस्बा के बहाने कुछ बातें

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/22/2015 03:36:00 PM

कस्बा के बहाने कुछ बातें, कुछ यादें और एक टीवी एंकर पर लघु शोध प्रबंध

(मसलन रवीश कुमार के साहित्य में मीडिया चेतना अथवा रवीश कुमार: भाषा एवं सृजन कर्म)

शुभम श्री
 

पटना में भी अलबत्त लोग मिलेंगे । सीधे पूछिए, टेढ़ा बताएंगे । टेढ़ा पूछिए, माथा पर चढ़ के नाचने लगेंगे, मने ननिहाल को दें कि ददिहाल को, सात पुश्त को गरियाएंगे जरूर । जैसे कि आप पूछिए “बेली रोड कहां है ?”  “हम्मर कपार पर ।” “चिड़ैयांखाना केन्ने है हो ?” “हम आमदी बुझाते है कि जेनावर”, “अरे पहिले चिड़ैयांखाना न बताइए”, “नहीं पहिले आप किलियर किजिए आमदी कि जेनावर ।” मतलब अकच्च कर देगे एकदम से । अपने मन से किसी के लिए दो शब्द बढ़िया भले नहीं निकले, दूसरा कोई उरेब बोल दे, फिर देखिए । “अरे बिहार में कहां कोई हीरो हुआ है जी ।“ “हुआ नहीं है आंय । सतरूघ्घन सीन्हा, मनोज बाजपेई का है ।“ “भक्क मनोज बाजपेई हीरो थोड़े हुआ, उ तो सिनेमा में एक्टींग करता है । हीरे मने अमिताबच्चन, सारुक्खान, सन्नी दिओल ।“ “का बात करते है मर्दे । साला सतरूघ्घन सीन्हा बोलता है तो हिला देता है । ब्बात करते हैं ।“ आप नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर लीजिए, कदमकुंआ में आपके पड़ोसी कहेंगे, आही रे दादा, उ चसमुलवा के नोबेल भेट गेलई । एहिजे खेलत रहल हलई । जिसको ठीक से बुझाया नहीं कि आप किए क्या हैं, का जनी कौची करत हलई दिल्ली में, अच्छा पइसा कमाब हई । ऐसे सीन में कुछ लोग गर्दा करने वाले भी होते हैं । जनले कि न, उ नटुलिया के भइबा एसएससी कर गेलऊ । इनकम टेक्स भेतटई सीधे । रेलवे, एसएससी, बेंक पीओ माने गर्दा । बीपीएससी चाहे यूपीएससी तहलका । आइआइटी मने उ सब एभरेज माइंड नहीं न है जी ।

इ सब भूमिका है थोड़ा । छोटू मामा के अनुसार तूम कमीसन में गायरेंटीड फेलियर । टू द पवांइट बोलो, एन्ने ओन्ने मत लसको । लेकिन लसकना परता है । पिछले साल पटना गए तो गप चला कौन क्या, कहां । गुड्डू मामा बताने लगे कि पटना केतना एडभांस हो गया है, फलाई ओभर बन रहा है, उसी में चर्चा चला । अरे इ रबीस कुमार तो गजब नाम कमाया । हां उनका रिपोर्ट बहुत अच्छा होता है । उसको पराइम टाइम न दे दिया जी । तुम समझे नहीं, उ सब रिपोटर रैंक से बहूत उप्पर चल गया की । हम त कहलिक मारले हई जमा कर के । अ जानित हें, अइसेंही बोल हई । हां मामाजी । फिर मामाजी को फील हो गया कि अब रिवर्स गियर में जाना चाहिए । अरे इ लोग तो हम लोग के सामने आया है । उ तो एहिजे साइकिल चलाते रहता था । बंगाली से न सादी किया है ।

कौन जात हई, केकरा से बियाह करले हई, ये कांसटेट वेरियेबल है हर किसी के लिए । ऐसा नहीं था कि पहले बिहार में कम पत्रकार हुए थे लेकिन रवीश कुमार के फेनोमेनन को, फेनोमेनन कहना ज्यादा सही होगा, अलग तरह से देखने की जरूरत है । बिहार में लंबे समय से चल रहे पलायन के इतिहास को देखें तो भोजपुर क्षेत्र से दूर दराज नौकरी की तलाश में गए लोगों की दास्तान मौजूद है । कलकत्ता से लेकर आसाम तक बिहार के मजदूर फैले हुए थे । फिर यह चलन पंजाब, हरयाणा की ओर हुआ । लेकिन नब्बे के बाद पहली बार बड़ी संख्या में बिहार से विद्यार्थियों ने पलायन करना शुरू किया । इसकी एक वजह में बिहार में शिक्षा व्यवस्था का अपंग हो जाना था, दूसरी वजह नौकरी की जरूरत थी । जिनके पास जमीनें थीं, उन पर कब्जा हो रहा था, फसल कटाई के लिए पुलिस बुलानी पड़ रही थी । ले देकर गांव देहात के विद्यार्थियों के लिए एक ठिकाना था पटना लेकिन पटना में महेन्द्रू घाट या बहादुरपुर के लॉज में रहकर एक के बाद एक अटेंप्ट देते छात्रों के लिए दो रास्ते थे, परीक्षा में सेटिंग कराना, पैरवी चलवाना और कुछ ले देकर नौकरी पा लेना वरना प्राइवेट । प्राइवेट की मजबूरी में बड़ी संख्या ने दिल्ली का रुख किया । इसमें एक वर्ग उन छात्रों का था जो तैयारी के लिए पटना के बजाय दिल्ली जाने लगे । ये वो लोग थे जो सो कॉल्ड कमीसन मेटेरियल माने जाते थे ।

अच्छे विद्यार्थी की एक ही निशानी थी- मैथ ठोस । इंग्लिस ठोस का मतलब था ट्रांसलेसन बनाना । जिसने नवोदय निकाला वो अच्छा, सैनिक निकाला वो साइनिंग और जो नेतरहाट कर गया वो क्रीम । इस पैमाने पर चक्रवर्ती ब्याज गणित, रेपीडेक्स, रिजनिंग तीनों घोल कर पी जाने वाले आते थे । लेकिन नेतरहाट क्रैक करने वाले क्रीम तक के लिए इंग्लिस ठोस मतलब ट्रांसलेसन ही था । फर्राटा इंग्लिस वो दुखती रग थी जिसकी कमी पहली बार दिल्ली जाने वालों ने महसूस की । प्राइवेट नौकरियों के लिए बाहर निकले लोगों ने अपने घरों में इस जरूरत को महसूस कराया कि इंग्लिस मीडियम फोकस और फूस फास नहीं है । मैथ में भुसगोल चलेगा, अंग्रेजी कमजोर नहीं चलेगा । हिन्दी माध्यम से पढ़े छात्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही थी । चुनोती तो खैर शुद्ध हिंदी बोलना भी थी । शुद्ध मतलब बिना दरभंगा, आरा, छपरा, बेगूसराय के टोन के । हम औयेंगे नै तब तुम जांनां । उ लरका गिड़ गया । वैं उठने नय सका । हम नय जाएंगे । बहुत कोशिश के बाद, नियम कानून बनाने के बाद भी मुंह से रिक्सा निकल जाता था, नय नहीं बंद हो पाता, र ड़ की उलझन तो खैर थी ही । इसलिए पुण्य प्रसून वाजपेयी की नकल का जब क्रेज चला तो नई उमर के लड़के कॉपी मोडडकर कोशिश करते- नमस्कार मैं हूं पुन्य परसून बाजपेई । पुण्य प्रसून मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था । ये नब्बे का आखिरी दौर रहा होगा । जब दिल्ली से लौट कर आने वाले मजदूर फर्राटेदार मैं, मेरे को झाड़ने लगे । यह मध्यवर्गीय घरों के लिए शॉक था । पटना के ऊपरी आमदनी युक्त घरों में मार काट मचा कर माइकल, जोसेफ, नेटरोडम के लिए हात पांव मारे जाने लगे । इसी दौर में घरों में नियम बनाए जाने लगे कि पढ़ने के समय इंग्लिस में बात करना है, फ्लो बनेगा । पापा से इंग्लिस में बात करना है, कोई आया तो इंग्लिस बोलना है । इंग्लिस वर्ड यूज करन है । इस नाजी शासन की मार में आंय और काहे बोलने से तौबा नहीं कर पाने वालों की भारी कुटाई हुई ।

पटना का वो तबका जो एलीट था, जिनकी पहुंच थी यानी जिनके यहां सेंट माइकेल और सेंट जोसेफ के बाद वीमेंस कॉलेज या साइंस कॉलेज जाने का रिवाज था उसके नीचे पटना के मध्यवर्ग और बाबू समुदाय ही नहीं बिहार भर में बाहर निकलने की लहर चल चुकी थी । बी.एड कॉलेज लालू यादव ने बंद करा दिए थे, बीपीएससी में खुल कर धांधली चल रही थी, उपाय नहीं था । बाहर निकलने का रास्ता था इंग्लिस और टोन से निजात पाना । दोनों ही मुश्किल था ।

रवीश कुमार बिहार के उन ब्यूरोक्रेट या जमींदार परिवारों से नहीं है जिनके लिए आम लोग कहें कि उनका छोडिए ना । रवीश कुमार का प्राइम टाइम में आना उस आहत बिहारी के लिए इगो बूस्टर है जो आंय और काहे से निजात नहीं पा सका । कोई हमारे जैसा, रलवे, बैंक, कमीसन बिरादरी का, जो टीवी में आ गया । यह आपसी रिश्ता है जिसके कारण पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा का कोई भी चौड़ाई लेकर आपको नोएडा फिल्म सिटी में डॉयलॉग मारता मिल जाएगा । अरे उ तो अपना आदमी है । रबीस कुमार को नही जानते हैं, अरे उ जो अएंकर है ।

इस पहचना को बनाने में टीवी ने बड़ी भऊमिका निभाई । बेरोजगारी के जिस दौर में क्रीम स्टूडेंट बाहर निकल रहे थे, उसी दौर में लंबी बेरोजगारी से त्रस्त होकर कई लोग केबल के धंधे में उतर रहे थे । जिनके घरों में कभी अखबार नहीं आया, उनके यहां केबल आया । जिनकी रंगीन टीवी खरीदने की औकात नहीं थी, उनके यहां भी टीवी आया क्योंकि उस दौर में लगभग हर दहेज में हीरो होंडा मोटरसाइकिल और रंगीन टीवी दिए गए । इतिहास में दर्ज होना चाहिए कि भारतीय औरतों ने रंगीन टीवी के लिए सबसे ज्यादा कुर्बानी दी । कितनी बहुओं की हत्याएं रंगीन टीवी के कारण हुईं, यह आंकड़ों में दर्ज है । यही दौर था जब रोहतास में बीडीओ देवरानी को स्टार प्लस देखने वाली क्लर्क जेठानी डाउन मार्केट समझने लगी । बीडीओ और क्लर्क जाहिर है उऩके पति थे लेकिन उस नाते वह खुद को उसी रेंक का मानती थीं । टीवी मध्यवर्गीय घरों में एक एलीट सदस्य था । वह दूसरी भाषा बोलता था, वह दूरदर्शन के कृषि दर्शन से आगे बढ़ कर चमकदार हो गया था । संजीव कपूर के कुकरी शो से कद्दूकस को ग्रेट करना, छीलने को पील करना और मेरिनेट करना सीख कर बी.एन मंडल से फर्स्ट डिवीडन दीदियां अपनी धाक जमाने लगीं और खुद को वीमेस कॉलेज की ग्रेजुएट बताने लगीं । टीवी अपने साथ आत्म विश्वास लाया । अब सरस सलिल की क्लीवेज दिखाती कवर पेज वाली लड़की, सेक्सोलॉजी दर्पण या ब्लू फिल्म का घिर घिर करने वाला वीसीआर नहीं था । अब फैशन टीवी था जहां बिकनी पहन कर मॉडल चलती थीं । नंगी औरतों का तूफान आ गया था, दुनिया बदल गई थी ।

ये दुनिया दिन रात आंखों के सामने थी, यह लालसा थी, मध्यवर्ग टीवी की गिऱफ्त में था । टीवी नीचे पहुंच रहा था । वह मिट्टी के घरों का रुख कर रहा था । चार पांच साल पहले की बात होगी । बासुकीनाथ-देवघर रोड पर आदिवासी घर था । दादी लगातार गाली देती जा रही थी और अपनी पोती को बुलाती जा रही थी । सात फेरे शुरू होने वाला था और पोती गायब । अंत में उस औरत ने अपनी चाय की दुकान में बैठी बोल बम औरतों से सात फेरे देखने की पेशकश की ताकि वे उसे नाहर और सलोनी के डॉयलॉग ठीक ठीक समझा सकें । टीवी ने उन युवाओं को सुविधा दी कि वे रेपीडेक्स और ट्रांसलेसन के चक्कर में पीछे रह गए फ्लो को आगे बढ़ाएं । उनके पास हर्षा भोगले था जो समझ में आता था ।

उस टीवी पर अपनी बिरादरी से निकल कर किसी को देखना, जिसने न टोन ठीक किया, न अंग्रेजी, हीनभावना से ग्रस्त, असफलता से आक्रांत बिहारी के लिए खुद को देखना था, यह उसकी जीत थी । जैसे सचिन का शतक भारतीय अहम के लिए आत्मविश्वास का सबब था । सचिन जैसे तैसे होना नहीं, बेस्ट होना था, और वह भारतीयों के लिए खुद को बेस्ट समझने का सबब था । रवीश कुमार और उन जैसे कई लोगों ने अपनी पहचान कुछ इस तरह बनाई कि अंग्रेजीदां तबकों में कुछ ऐसे परिचय दिया जाने लगा कि अंग्रेजी उनकी कमजोर है पर हिन्दी में बेहतरीन लिखते हैं । यह हिन्दी माध्यम का धारा के विपरीत तैरना था । धारा को बदलने का काम टीवी ने किया । जैसे धारा को बदलने का काम इंटरनेट कर रहा है । भदेस होना स्टाइल हो गया, वह हम्बल और रूटेड होना हो गया । कुछ तो सबआल्टर्न की इज्जत बचाने में बुद्धिजीवी इंपोरियम का गमछा टांग कर घूमने लगे, देसी भाषा बोलने लगे, कुछ उन लोगों ने भदेस को स्टेटमेंट बनाया जिन्होंने सत्ता में समीकरण बदला और अंग्रेजीदां, एलीट वर्चस्व को तोड़ कर खुद को खड़ा किया ।

रवीश कुमार ने पत्रकारिता में वैसा ही स्टेटमेंट खड़ा किया । आप किसी भी आम आदमी से पूछिए, वो रवीश कुमार को जानता है, पी. साईनाथ को नहीं जानता । यह अंतर इसलिए है क्योंकि नीचे के पांच प्रतिशत की बात आप ऊपर के पांच प्रतिशत की भाषा में कहते हैं । इसलिए वही आपको नहीं जानते जिनकी आप बात करते हैं । दुर्भाग्य से भारतीय बुद्धिजीवियों का यही अभिशाप है कि जीवन भर जिनके लिए लिखा, सोचा वही उन्हें नहीं जानते । खैर उन महीन मुद्दों पर बात करने की अपन की औकात नहीं फिलहाल । तो रवीश की रिपोर्ट ने पहली बार टीवी पर उस भाषा को गंभीर रिपोर्ट के लिए इस्तेमाल किया जो बॉलीवुड या छोटे पर्दे पर सिर्फ कॉमेडी के लिए इस्तेमाल होती थी । यह शुद्ध हिंदी नहीं थी, यह टोनरहित भाषा नहीं थी । एलीट एंकर की काया में, न्यूजरूम में पहली बार एक मध्यवर्गीय आत्मविश्वास ने प्रवेश किया था । यह वो क्रीम बच्चा नहीं था जो टप से पनरह पचे पछोतर से बोलना चाहे पर फिफ्टीन फाइव जा सेवेंटी फाइव की हिचक में चुप रह जाए, दब जाए ।

भारतीय न्यूज चैनल पर अफसोस कि ऐसे उदाहरण अपवाद रह गए । अलग अलग जगहों से, अलग अलग भाषाओं की टोन लिए, अलग अलग जातियों के लोग स्क्रीन का समीकरण पूरी तरह बदलने नहीं आ सके । उसकी जगह महंगे मीडिया स्कूलों के अधकचरे ट्रेनी और इंटर्न ने ले ली । जो डिफरेंट है वो एक समय तक ही डिफरेंट रहता है, फिर वो मेनस्ट्रीम हो जाता है, सत्ता खुद में उसे जज्ब कर लेती है । जैसे रवीश कुमार सेलिब्रेटी बनते गए, वे लिखें शुक्रिया या वाह तो उस पर भी पचास लाइक । लेकिन रवीश की रिपोर्ट बंद हो गई । क्रांति करने के लिए आपके हाथ पैर बंधे हुए हैं । यह हिन्दी पब्लिक स्फीयर का अनिवार्य गुण है । वह आपको देवता बनाकर पूजेगा भी और मां-बहन की गाली भी देगा लेकिन वह आपको स्पेस नहीं देगा, वह आपको विकसित होने का मौका नहीं देगा । यह ब्रांड वैल्यू और ग्लैमर का दौर है । एनडीटीवी आपको पहचान देगी, काम को नहीं । जैसे रवीश की रिपोर्ट बंद होने के बाद दिल्ली मेट्रो में बड़े बड़े होर्डिंग लगे, भारत का नं 1 एंकर, प्राइम टाइम । प्राइम टाइम की बहस, उसका कंटेट सीन से बाहर । व्यक्ति को प्रोजेक्ट करना मार्केटिंग की पहली स्ट्रैटेडी होती है क्योंकि विचारधारा उसके पीछे छुप जाती है । जैसे मोदी के पीछे भाजपा और संघ छुप गए, केजरीवाल के पीछे आप की विचारधारा छुप गई । विचारधारा पर बात करना, उसे समझना मुश्किल होता है, कोई दिमाग नहीं लगाना चाहता । इंसान को आगे कीजिए, सब आसान हो जाएगा । उसकी निजी जिंदगी, उसका रहन सहन, बोल चाल, चीजें आसान हो जाती हैं । मीडिया पत्रकार को खत्म कर के सेलिब्रेटी की स्थापना करता है । यही सबसे बड़ी ट्रैजिडी है ।

हम कस्बा पर लिखने के लिए लिखना सुरु किए थे और भयानक डेविएट हो गए हैं । इसलिए अब पकाऊ हो जाएगा लेकिन हम बाज नहीं आएंगे । जय हनुमान ।

कहने का मन करता है

हिन्दुस्तान में कॉलम आता था ब्लॉग पर ब्लॉग वार्ता । वह ब्लॉगिंग का नया नया दौर था । हर हफ्ते कुछ ब्लॉग्स की चर्चा होती थी । कस्बा खुद कॉलम लेखक का ब्लॉग था । लेकिन वह ब्लॉग भर नहीं था । वहां कितनी रिपोर्ट, कविताएं, तस्वीरें, कितने प्राइमरी सोर्स, कितना कुछ था जो हैक हो गया । एक रिसर्चर के लिए फील्ड वर्क में नाक रगड़ कर भी जो कर पाना संभव नहीं था, वो कस्बा पर था । कहानियां थी, लप्रेक था । अंतिका प्रकाशन से रवीश की किताब आई थी देखते रहिए । महा रद्दी छपाई । गोबर जैसा कवर और प्रूफ की भारी गलती हर जगह । जैसे राजकमल ने इश्क में शहर होना छापी है भैयाजी टर्न्ड डूड/ बहनजी टर्न्ड बेब टाइप । मने जींस पहिन लिए लिवाइस का लेकिन दशहरा के मेला का गिलट वाला पायल भी पहनेंगे और नाक में गुलभी भी सोना का । उस पर से चोटी बना लेंगे और टॉप के ऊपर दुपट्टा ओढ़ लेंगे । हाय रे फैसन । कस्बा था जहां उन पोस्ट्स को, कहानियों को पढ़ने का मजा था । अब जब कि वो हैक हो गया है, बानर काव्य से लेकर एंकर काव्य तक सब नहीं है । हमारी वो मुस्कान, हमारी हंसी जो इन्हें पढ़ते हुए आई थी । कस्बा वो जगह थी जहां एक परेशान एंकर अपना दुख सुख लिखता था । सेलिब्रेटी बनने की मार से त्रस्त इंसान अपनी दुविधा साझा करता था । वह उस इंसान के लिए राहत का सबब था जो खुदरा लिख कर संतोष करता था क्योंकि पूरा लेखक होना संभव नहीं था । हिन्दी में संभव नहीं रहा कि आपकी भाषा में संगीत हो, आप लिखना चाहें और सिर्फ लेखक होकर जिंदा रहने की सोच लें । बेरोजगारी और भूख की मार झेलें और महान साहित्य लिखें या नौकरी करें और खुदरा साहित्य लिखें । ऐसा भी नहीं था कि कस्बा पर रोज कोई बम विस्फोट हो रहा था । इन जगहों पर इस तरह के हमले होना दुखद है । जिनको सरकार से तनख्वाह मिल रही है लिखने पढ़ने के लिए, सो कॉल्ड शोधार्थी और शोध निर्देशक, उन्हें ओल में कच्चू पैदा करने से फुरसत नहीं है । ले देकर जो भी स्पेस है, जहां भी नया कुछ लिखा जा रहा है उन्हें बंद करने की कोशिश हो रही है । रवीश की रिपोर्ट बंद हुई, कस्बा बंद हुआ । लेकिन फिर भी उम्मीद ..

(अब हम और नहीं लिख सकते । थक गए । ऊपर जो आलोख है उसको शोधपरक समझा जाए, हालांकि रिसर्च मेथडोलॉजी की हमने बाकायदा क्लास की है पर सीखा यही कि पैरवी कैसे लगानी चाहिए । ज्ञानीजन छिमा करेंगे । नीचे की टीप को हमारा चेपा हुआ फेसबुक पोस्ट समझा जाए।)

जय हिंद जय भारत ।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

फीड पाएं

रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:
अपना ई मेल लिखें :

कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

हाशिये में खोजें

Loading...