हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

लोकतंत्र और शांति के नाम पर गरीबों के बेहतर विकल्प की हत्या

Written by Reyaz-ul-haque on 11/20/2009 02:19:00 PM

अगर आप नोम चोम्स्की के इस आलेख को भारत में सरकार और मीडिया द्वारा किये जा रहे उन्मादी प्रचार के साथ जोड़ कर देखें तो पाएंगे कि अहिंसा और लोकतंत्र का पाखंड रचने में भारत आपने स्वामी अमेरिका से पीछे नहीं है. किस तरह हिंसा खत्म करने के नाम पर यह देश कार्पोरेट जगत और साम्राज्यवाद की दलाली में और अधिक क्रूर और हिंसक होता गया है और नतीजे में जनता के आन्दोलनों और प्रतिरोधों का दमन करता गया है-और अब तो खुली युद्ध कि शुरुआत भी हो चुकी है-यह देखने के काबिल है. पढिए नोम चोम्स्की को. अनुवाद अनिल एकलव्य का है और इसे जेडनेट से साभार लिया गया है.


सभ्यताओं का टकराव
नोम चॉम्स्की

हंटिंगटन के सिद्धांत का प्रसंग याद करें जिसमें इसे पेश किया गया था। यह शीत युद्ध के बाद की बात है। पचास साल तक, संयुक्त राज्य तथा सोवियत संघ दोनों ने शीत युद्ध को बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया था, उन सब अत्याचारों के लिए जो वे करना चाहते थे। तो अगर रूसी पूर्वी बर्लिन में टैंक भेजना चाहते थे तो उसका कारण शीत युद्ध था। और अगर अमरीका दक्षिण वियतनाम पर आक्रमण करना चाहता था तथा हिंद-चीन को तबाह करना चाहता था तो वो शीत युद्ध के कारण था। अगर आप इस दौर के इतिहास पर नज़र डालें तो बहाने का कारणों से कोई लेना-देना नहीं था। अत्याचारों के जो कारण थे उनका मूल तो घरेलू सत्ता स्वार्थों में था, पर शीत युद्ध ने एक बहाना दे दिया। आप जो भी अत्याचार करें, आप कह सकते थे कि यह दूसरे पक्ष से बचाव के लिए है।

सोवियत संघ के पतन के बाद वो बहाना तो चला गया। नीतियाँ वही हैं, सिर्फ़ हथकंडों में कुछ बदलाव के साथ, लेकिन अब आपको चाहिए एक नया बहाना। और असल में तो बहानों की खोज हो भी रही है काफ़ी लंबे समय से। सही में तो इसकी शुरुआत बीस साल पहले हुई थी। जब रीगन प्रशासन सत्ता में आया, तब ही यह बिल्कुल साफ़ था कि रूसियों के खतरे का बहाना ज़्यादा समय चलने वाला नहीं था। तो वे यह कहते हुए सत्ता में आए कि उनकी विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य होगा अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के प्लेग के विरुद्ध संघर्ष करना

यह बीस साल पहले की बात है। इसमें नया कुछ नहीं है। हमें आतंकवादियों से अपना बचाव करना है। और उस प्लेग के विरूद्ध प्रतिक्रिया में उन्होंने दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का सबसे असाधारण जाल बुनना शुरू किया, जिसने मध्य अमरीका में तथा दक्षिणी अफ़्रीका में और बाकी सारी जगह भी भयंकर आतंकवादी गतिविधियाँ चलानी शुरू कर दीं। सच तो यह है कि यह जाल इतना अतिवादी था कि उसकी गतिविधियों की निंदा विश्व न्यायालय तथा सुरक्षा समिति के द्वारा भी की गई। 1989 के आते-आते आपको कुछ नये कारण चाहिए थे। यह बात कोई ढकी-छुपी नहीं थी। याद रखें, बुद्धिजीवियों का एक काम, एक गुरू-गंभीर काम, यह होता है कि वे लोगों को ना समझने दें कि क्या चल रहा है। और इस काम को पूरा करने के लिए आपको, उहाहरण के लिए, सरकारी दस्तावेजों को नज़रअंदाज़ करना होता है जो आपको बता सकते हैं कि असल में क्या-क्या चल रहा है। ऐसा ही मामला यह भी है।

आपको सिर्फ़ एक मिसाल देता हूँ। व्हाइट हाउस हर साल कौंग्रेस के सामने एक लिखित बयान पेश करता है यह बताने के लिए कि हमें विशाल सैनिक बजट की ज़रूरत क्यों है। हर साल यह एक ही चीज़ होती थी: रूसी आ रहे हैं। रूसी आ रहे हैं इसलिए हमें इस दैत्याकार सैनिक बजट की ज़रूरत है। वो सवाल जो हर उस व्यक्ति को अपने-आप से पूछना चाहिए था जिसकी अंतर्राष्ट्रीय मामलों में रुचि है, वो सवाल यह है कि ये लोग मार्च 1990 में क्या कहने वाले हैं? वह कौंग्रेस के सामने पहली प्रस्तुति थी तब जब रूसी निश्चित तौर पर नहीं आ रहे थे – वो मैदान में थे ही नहीं। तो यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथा अत्यंत रोचक दस्तावेज़ है। और जाहिर है इसका कहीं ज़िक्र नहीं होता, क्योंकि यह बहुत ही रोचक है। वो मार्च 1990 था और पहला बुश प्रशासन कौंग्रेस के सामने अपली प्रस्तुति दे रहा था।

बात इस बार भी हर साल वाली ही थी। हमें विशाल सैनिक बजट चाहिए। हमें हस्तक्षेप के लिए ढेर सारी सेना चाहिए, ज़्यादातर मध्य-पूर्व की तरफ डटी हुई। हमें उस चीज़ की रक्षा करनी है जिसे 'रक्षा औद्योगिक आधार' कहा जाता है। हमें यह सुनिश्चित करना है कि जनता उच्च-तकनीकी उद्योग का खर्चा देती रहे, सैनिक प्रतिष्ठान के माध्यम से, रक्षा के बहाने पर।

तो बात तो एकदम पुरानी वाली ही थी। अंतर सिर्फ़ पेश किए गए कारणों में था। पता चला कि हमारे यह सब चाहने का कारण यह नहीं था कि रूसी आ रहे थे – मैं उद्धरित कर रहा हूं – बल्कि कारण था 'तीसरी दुनिया की बढ़ती हुई तकनीकी सक्षमता'। इसलिए हमें विशाल सैनिक बजट चाहिए। जो ढेर सारी सेना मध्य-पूर्व की तरफ डटी है उसमे वहीं डटे रहना है, औरयहाँ आता है एक रोचक वाक्यांश। यह है कि उन्हें अभी भी मध्य-पूर्व की तरफ डटे रहना है जहाँ 'हमारे हितों को खतरा क्रेमलिन के दरवाजे पर नहीं डाला जा सकता'। दूसरे शब्दों में, माफ़ करें, मैं आपसे पचास साल से झूठ बोलता रहा हूं, पर अब क्रेमलिन है ही नहीं तो मुझे आपको सच बताना पड़ेगा: 'हमारे हितों को खतरा क्रेमलिन के दरवाजे पर नहीं डाला जा सकता'।

याद रहे, इसे ईराक़ के दरवाजे पर भी नहीं डाला जा सकता था, क्योंकि उस समय सद्दाम हुसैन संयुक्त राज्य का करीबी मित्र और साथी था। वह अपने सबसे बुरे अत्याचार कर चुका था, जैसे कुर्दों पर ज़हरीली गैस की बमबारी करना और दूसरी तमाम चीज़ें, लेकिन वह अभी एक भला बंदा था, जिसने अभी तक आदेशों की अवहेलना नहीं की थी – एकमात्र अपराध जिससे फ़र्क पड़ता है। तो कुछ भी ईराक़ के दरवाजे पर नहीं डाला जा सकता था, या क्नेमलिन के दरवाजे पर।

असली खतरा हमेशा की तरह यह था कि कहीं वो क्षेत्र अपने भाग्य का निर्णायक खुद ना बन जाए, अपनी संपदाओं सहित। और ऐसी बात को तो किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। तो हमें आतताई राज्यों, जैसे सऊदी अरब तथा अन्य, का समर्थन करना था, यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे यथास्थिति बनाए रखें जिसमें तेल से मिला लाभ (तेल से ज़्यादा तेल से मिला लाभ) उन लोगों तक जाए जो उस के हकदार हैं: धनवान पश्चिमी निगम या संयुक्त राज्य का राजकोष विभाग या बेकटेल कंस्ट्रक्शन वगैरह। तो यह असली कारण है जिसके लिए हमें विशाल सैनिक बजट चाहिए। उसके अलावा सारी कहानी वही है।

इस सब का हंटिंगटन के सिद्धांत से क्या लेना है? बात यह है कि वे एक सम्मानित बुद्धिजीवी हैं। वे ऐसा कह नहीं सकते। वे कह नहीं सकते कि, देखो, जिस तरीके से संपन्न लोग दुनिया को चलाते हैं वो तो बिल्कुल पहले जैसा ही है, और सबसे बड़ा टकराव वही है जो हमेशा था: संपन्नता तथा शक्ति के छोटे संकेंद्रित खंड बनाम बाकी सारे लोग। आप ऐसा नहीं कह सकते। और वास्तव में अगर आप सभ्यताओं के टकराव के उन अनुच्छेदों को देखें तो उनका कहना है कि भविष्य में संघर्ष आर्थिक आधार पर नहीं होगा। तो उसको तो हमें अपने दिमाग से निकाल ही देना चाहिए। आप संपन्न शक्तियों तथा निगमों द्वारा लोगों का शोषण करने के बारे में नहीं सोच सकते, वह तो संघर्ष हो ही नहीं सकता। संघर्ष को कुछ और ही होना पड़ेगा। तो यह 'सभ्यताओं का टकराव' होगा – पश्चिमी सभ्यताएं बनाम इस्लामिक एवं कन्फ्यूशियसवाद।

अब आप चाहें तो इसकी जाँच कर सकते हैं। यह अजीब सा विचार है लेकिन आप इसकी जाँच कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, आप यह पूछ कर जाँच कर सकते हैं कि संयुक्त राज्य, जो पश्चिमी सभ्यता का नेता है, की इस्लामिक बुनियादपरस्तों के तरफ़ क्या प्रतिक्रिया रही है। तो जवाब यह है कि वह उनका प्रमुख समर्थक रहा है। मिसाल के तौर पर उस समय विश्व का सबसे अधिक बुनियादपरस्त राज्य सऊदी अरब था। शायद उसकी जगह अब तालिबान ने ले ली है, पर वह भी सऊदी अरब की वहाबीयत से निकली एक शाखा है।

सऊदी अरब अपने जन्म से ही संयुक्त राज्य का एक ग्राहक रहा है। और कारण यह है कि वह अपनी सही भूमिका निभाता है। वह इस बात को सुनिश्चित करता है कि क्षेत्र की संपदा सही लोगों तक जाए: काहिरा की झुग्गियों में रहने वाले लोगों तक नहीं बल्कि न्यूयॉर्क के ऐग्ज़ेकेटिव सुइट्स में रहने वालों तक। जब तक वे ऐसा करते रहते हैं, सऊदी अरब के नेता महिलाओं के साथ चाहे जैसा बुरा बर्ताव कर सकते हैं, वे अस्तित्व के सर्वाधिक अतिवादी बुनियादपरस्त हो सकते हैं, और वे एकदम भले लोग हैं। यह तो बात हुई विश्व के सर्वाधिक अतिवादी बुनियादपरस्त राज्य की।

दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम राज्य कौनसा है? इंडोनेशिया। और संयुक्त राज्य तथा इंडोनेशिया के बीच क्या संबंध है? ऐसा है कि 1965 तक तो संयुक्त राज्य के संबंध इंडानेशिया से खराब थे। वो इसलिए कि इंडोनेशिया गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल था। संयुक्त राज्य नेहरू से घृणा करता था, उनसे चिढ़ता था, बिल्कुल उसी कारण के लिए। तो वे इंडोनेशिया से चिढ़ते थे। वह स्वतंत्र था। यही नहीं, वह एक खतरनाक देश था क्योंकि वहाँ एक जनवादी राजनीतिक दल था, पी. के.आई., जो गरीबों का दल था, मूलतः किसानों का दल। और वह खुली जनतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत शक्ति हासिल कर रहा था, इसलिए उसे रोकना ज़रूरी था।

संयुक्त राज्य ने 1958 में एक विद्रोह का समर्थन करके उसे रोकने की कोशिश की। वो प्रयास असफल हो गया। तब उन्होंने इंडोनेशियाई सेना का समर्थन करना शुरू किया, और 1965 में सेना ने जनरल सुहार्तो के नेतृत्व में सत्ता-पलट करने में सफलता हासिल कर ली। उन्होंने लाखों, शायद दस लाख, लोगों (ज़्यादातर भूमिहीन किसान) को व्यापक हत्याकांड में मार डाला, और एकमात्र जनवादी दल को मिटा डाला। इसका स्वागत पश्चिम में निरंकुश उन्माद के साथ हुआ। संयुक्त राज्य में, ब्रिटेन में, ऑस्ट्रेलिया में – यह इतनी शानदार घटना थी कि वे खुद पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे थे।

समाचारों के शीर्षक थे, 'एशिया में प्रकाश की किरण', 'एक उम्मीद जहाँ पहले कोई नहीं थी', 'इंडोनेशियाई मॉडरेटों द्वारा एक उबलता हुआ रक्तपात'। मेरा मतलब है वे जो हुआ था उसे छिपा भी नहीं रहे थे – 'भयंकर हत्याकांड', 'इतिहास की महानतम घटना'। सी. आई. ए. ने इसकी तुलना स्टॉलिन तथा हिटलर के हत्याकांडों से की, और यह सब अद्भुत था। और उस समय के बाद से इंडोनेशिया संयुक्त राज्य का पसंदीदा साथी बन गया।

उसका रिकॉर्ड बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में सबसे खूनी में से एक रहा है (पूर्वा तीमोर में व्यापक हत्याकांड, असहमत लोगों को भयानक यातनाएं देना, वगैरह), लेकिन यह सब ठीक था। यह दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामिक राज्य था पर इसमें कोई दिक़्क़त नहीं थी। सुहार्तो 'हमारी तरह का बंदा' था, जैसे कि क्लिंटन ने उसके बारे में कहा, नब्बे के दशक के मध्य में अपनी यात्रा के दौरान। और वह संयुक्त राज्य का दोस्त बना रहा जब तक कि उसने एक गलती नहीं कर दी। उसने गलती की आई. एम. एफ़. के आदेशों पर अपने कदम घसीटने में।

एशियाई आर्थिक गिरावट के बाद आई. एम. एफ़. ने बहुत सख्त आदेश जारी किए, और सुहार्तो ने वैसे उनका पालन नहीं किया जैसी उससे उम्मीद थी। और उसने समाज पर नियंत्रण भी खो दिया। यह भी एक गलती है। तो इसी बिन्दु पर विदेश मंत्री मैडेलीन ऑलब्राइट ने सुहार्तो को फ़ोन किया और बिल्कुल इन्हीं शब्दों में कहा, 'हमारा विचार है कि अब जनतांत्रिक बदलाव का वक़्त आ गया है'। महज संयोग से, चार ही घंटे बाद उसने सत्ता छोड़ दी, पर इंडोनेशिया संयुक्त राज्य का पसंदीदा साथी बना रहा।

ये तो हुए दो मुख्य इस्लामिक राज्य। उन ग़ैर-सरकारी अतिवादी इस्लामिक बुनियादपरस्त दलों का क्या, मिसाल के लिए अल-क़ायदा का जाल। उन्हें किस ने बनाया? उनकी रचना की सी. आई. ए., ब्रिटिश खुफ़िया दलों, सऊदी अरब वित्त, मिस्र वगैरह ने। वे सर्वाधिक अतिवादी रैडिकल बुनियादपरस्तों को जहाँ से भी हो सका, ढूंढ के लाए, उत्तरी अफ़्रीका या मध्य पूर्व से, और उन्हें प्रशिक्षित किया, हथियारबंद किया, उनका पोषण किया ताकि वे रूसियों को तंग करें – अफ़ग़ानों की सहायता करने के लिए नहीं। ये बंदे शुरू से ही आतंकवाद चला रहे थे। उन्होंने बीस साल पहले राष्ट्रपति सादात की हत्या की थी। लेकिन वे ही प्रमुख समूह थे जिनका समर्थन संयुक्त राज्य कर रहा था। तो, सभ्यताओं का टकराव है कहाँ?

चलिए हम थोड़ा आगे चलते हैं। 1980 के दशक में संयुक्त राज्य ने मध्य अमरीका में एक बड़ा युद्ध चलाया था। कई लाख लोग मारे गए थे, चार देशों को लगभग नष्ट कर दिया गया, कहने का मतलब है यह एक व्यापक युद्ध था। उस युद्ध का निशाना कौन था? प्रमुख निशानों में से एक था कैथोलिक चर्च। 1980 के दशक की शुरुआत हुई थी एक आर्चबिशप की हत्या से। उसका अंत हुआ छः प्रमुख जेसूट बौद्धिकों की हत्या से, जिनमें एक मुख्य विश्वविद्यालय के रेक्टर भी शामिल थे। उनकी हत्या की गई मूलतः उन्हीं लोगों द्वारा – आतंकवादी दल जिन्हें संगठित करने, हथियार देने तथा प्रशिक्षित करने का काम किया था संयुक्त राज्य ने।

इस अवधि के दौरान ढेर सारे चर्च के लोग मारे गए। लाखों किसान और गरीब लोग भी मारे गए, हमेशा की तरह, पर एक मुख्य निशाना था कैथोलिक चर्च। क्यों? हुआ यह कि कैथोलिक चर्च ने लैटिन अमरीका में भारी पाप कर डाला था। सदियों से यह अमीरों का चर्च था। तब तक सब ठीक था। लेकिन 1960 के दशक में लैटिन अमरीकी पादरियों ने एक विचार को अपना लिया जो था 'गरीबों के लिए बेहतर विकल्प'। उसी क्षण वे इंडोनेशिया के उस जनवादी दल के जैसे बन गए जो गरीबों और किसानों का दल था और जाहिर है जिसे मिटा डालना ज़रूरी था। तो कैथोलिक चर्च का विध्वंस करना ज़रूरी था।

शुरुआत पर वापस आते हुए, यह सभ्यताओं का टकराव है कहाँ, किस जगह? मेरा मतलब है टकराव तो ज़रूर है। टकराव है उन लोगों के साथ जो गरीबों के लिए बेहतर विकल्प की बात करते हैं, चाहे वे जो भी हों। वे कैथोलिक हो सकते हैं, वे कम्यूनिस्ट हो सकते हैं, वे और कुछ भी हो सकते हैं। वे गोरे, काले, हरे, कुछ भी हो सकते हैं। पश्चिमी आतंक पूरी तरह सार्वभौम है। यह वास्तव में नस्लवादी नहीं है – वे किसी को भी मार देंगे जो मुख्य मुद्दों पर गलत रवैया इख्तियार करते हैं।

पर अगर आप बुद्धिजीवी हैं तो आप ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि यह तो एकदम साफ़ तौर पर सही है। औप आप लोगों को वो समझने नहीं दे सकते जो एकदम साफ़ तौर पर सही है। आपको ऐसे गहरे सिद्धांत बनाने पड़ते हैं जिन्हें सिर्फ़ वही लोग समझ सकें जिनके पास हार्वर्ड से पी. एच. डी. या वैसा ही कुछ है। तो हमें दी जाती दिया जाता है सभ्यताओं का सिद्धांत और उम्मीद की जाती है कि हम उसकी पूजा करें। लेकिन उसकी एकदम कोई तुक नहीं बनती। 

नक्सलवाद को समस्या और आंदोलन के रूप में देखने का नजरिया

Written by Reyaz-ul-haque on 11/19/2009 02:00:00 PM

अनिल चमड़िया

मनमोहन सिंह जब से देश के प्रधानमंत्री बनें है तब से वे इस बात को कई बार दोहरा चुके हैं कि नक्सलवाद देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है। साठ के दशक के अर्थशास्त्री मनमोहन सिह भी शिक्षण संस्थानों में डिग्री लेने वाले देश के दूसरे बुद्धिजीवियों की तरह पहले नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखने वालों में रहे हैं। पंजाब के मशहूर नक्सलवादी नेता हाकाम सिंह की माने तो उन्होने यदि मनमोहन सिंह को बचाने की कोशिश न की होती तो वे उस समय नक्सलवादियों के समर्थक होने के आरोप में जेल में होते। पंजाब के नक्सलवादी नेता हाकाम सिंह के बारे में देश के कई बड़े संसदीय नेताओं ने जैसा वर्णन किया है उससे उनकी बातों पर भरोसा नहीं करने का कोई कारण नहीं समझ में आता है। तमिलनाडु के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव रह चुके स्वर्गीय हरकिशन सिंह सुरजीत का कहना है कि हाकाम सिंह समाऊ देश के महान क्रांतिकारी थे।

मनमोहन सिंह ने दिल्ली में उच्चाधिकारियों के साथ एक बैठक में कहा था कि नक्सलवाद अब बुद्दिजीवियों का आकर्षण नहीं रहा।लेकिन उन्होने नक्सलवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए इस तथ्य का उल्लेख किया था कि देश के 180 से ज्यादा जिलों में नक्सलवाद फैल चुका हैं। मनमोहन  सिंह जब बार बार नक्सलवाद के प्रभाव में आने वाले जिलों की बढ़ती तादाद का उल्लेख करते हैं तो हाकाम सिंह समाऊ की बताई कहानी याद आने लगती है। हाकाम सिंह ने पंजाब की मशहूर लेखिका जसबीर कौर को चंडीगढ़ में एक बैंक लूटने के प्रयास की घटना का उल्लेख किया था।हाकाम सिंह के अनुसार तब पुलिस ने उनपर मनमोहन सिंह को इस मामले में शामिल होने की बात को कबूल करने के लिए  दबाव बनाया था। लेकिन उन्होने इस दबाव में आने से इंकार कर दिया था। मनमोहन सिंह उस समय पंजाब विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक थे। पंजाब के नक्सलवादी आंदोलन के नायक शीर्षक पुस्तक में पंजाबी के मशहूर लेखक सुदर्शन नट ने कई कहानियों को शामिल किया है।इसमें सुरजीत सिंह बरनाला , हरकिशन सिंह सुरजीत के अलावा पूर्व प्रधानमत्री चन्द्रशेखर और साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक  अजमेर सिंह औलख,सीपीआई के पूर्व सासंद जगजीत सिंह आनंद( आनंद पंजाबी दैनिक नवां जमाना के संपादक भी रह चुके हैं ),पूर्व न्यायाधीश आर के त्यागी, सीपीआई एम एल लिबरेशन के पोलित ब्यूरों के सदस्य स्वपन मुखर्जी और पंजाबी विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग के पूर्व अध्यक्ष गुरूभगत सिंह आदि के संस्मरण हैं।पुस्तक के पेज नंबर 204 और 205 में हाकाम सिंह की 1991 में सुनाए गए इस किस्से को भी शामिल किया गया है। मनमोहन सिंह उस समय देश के वित्त मंत्री थे।हाकाम सिंह ने आपातकाल के दिनों को याद करते हुए बताया है कि चंडीगढ़ में एक बैंक के लूटने के प्रयास की घटना में नक्सलवादियों के होने की आशंका पुलिस वालों को थी।पुलिस उस समय तो किसी को इस घटना के आरोप में गिरफ्तार नहीं कर सकी लेकिन पुलिस के यहां यह मामला फाइलों में पड़ा रहा। जब हाकाम सिंह को गिरफ्तार किया गया तो पुलिस ने उनसे कई मामलों में पूछताछ की। इसमें बैंक कांड भी शामिल था। हाकाम सिंह ने एक रणनीति ये बनाई कि पुलिस को वे केवल उन्हीं नामों के बारे में  बताएंगे जो या तो भूमिगत हो गए है या फिर शहीद हो गए हैं। वे संपर्क और सहानुभूति रखने वालों को किसी भी तरह बचाने की सोच रहे थे। पुलिस बैंक मामले में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर ( मनमोहन सिंह) के नाम पर जोर देकर ये कहने की कोशिश कर रही थी कि उन्होने उसकी डुप्लीकेट चाबी बनाई है जिस चाबी से बैंक को लूटने का प्रयास किया गया।लेकिन हाकाम सिंह ने साफतौर पर कहा कि वे किसी ऐसे व्यक्ति को न तो जानते हैं और ना ही उनसे उनकी मुलाकात हुई है। पुलिस ने उन्हें   तस्वीर भी दिखाई। तर्कशील प्रकाशन अंबाला द्वारा 2004 में प्रकाशित इस पुस्तक में कई दिलचस्प कहानियों के बीच हाकाम सिंह बताते है कि उन्होने तस्वीर देखकर सोचा कि दूसरे बुद्दिजीवियों और अर्थशास्त्र के शिक्षकों की तरह ये जरूर नक्सलवाद का समर्थक होगा।बहुत दबावों के बाद हाकाम सिंह ने पुलिस के सामने एक ऐसा दांव फेंका कि वह काम आ गया। उन्होने पुलिस वालों से पूछा कि आपलोगों को इस मामले की जांच का भार कैसे दे दिया गया जबकि आपको कुछ बुनियादी बातों की ही जानकारी नहीं है। पुलिस वाले आश्चर्यचकित होकर हाकाम सिंह को देखने लगे। पुलिस ने पूछा कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं। तब हाकाम सिंह ने कहा कि वे कम से कम उन नक्सलवादियों की सामाजिक पृष्ठभूमि का अध्धयन क्यों नहीं करते है जिन्हें या तो मारा गया है या फिर पुलिस ने जिन्हें गिरफ्तार किया है। हाकाम सिंह ने पुलिस को बताया कि नक्सलवादी आंदोलन के साथ सिखों में व्यवसायी समुदाय जिन्हें बापा सिख कहा जाता है के किसी भी सदस्य को जब नहीं पाते हैं तो भला ये शख्स कैसे हो सकता हैं। मजे कि बात कि मनमोहन सिंह के व्यवसायी जाति से होने की बात को हाकाम सिंह पक्के तौर पर नहीं जानते थे लेकिन उन्होने अनुमान लगाया था।

दरअसल ये कहानी और लंबी है। लेकिन जिस संदर्भ में इसका उल्लेख किया गया है उसके लिए पर्याप्त है। संदर्भ नक्सलवादी आंदोलन और उसे आज सबसे बड़ा खतरा बताने के विषय से जुड़ा है। मनमोहन सिंह इसके बाद 7 अप्रैल 1980 से 14 सितंबर 82 तक योजना आयोग के सदस्य सचिव थे तब उन्होने बिहार के ग्रामीण अंचलों में उभर रहे असंतोष का अनुभव करने के लिए एक अध्ययन टीम के साथ उन इलाकों का दौरा किया था। उनकी उस रिपोर्ट के हवाले से नक्सलवाद के विस्तार के कारणों पर प्रकाश डाला गया था। इस तरह दो स्तरों पर मनमोहन सिंह की नजरों में नक्सलवाद को खतरे के रूप में नहीं देखा जा रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें सबसे ज्यादा खतरा नक्सलवाद में ही दिखाई दे रहा है।

किसी भी आंदोलन को आप कहां से देख रहे हैं। ये सवाल सबसे महत्वपूर्ण होता है। संसदीय राजनीति में ये अक्सर देखा जाता है कि जो पार्टी या नेता सत्ता से बाहर होता है उसके लिए विरोध के जो मुद्दे होते है वे मुद्दे सरकार में जाने के बाद उसके मुद्दे नहीं रह जाते हैं। वे भी सरकार चलाने वाली पार्टी की तरह का ही व्यवहार करने लगते हैं।पी वी नरसिम्हा राव ने तो साफतौर पर कहा था कि भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करने पर विपक्ष की पार्टियां विपक्ष में रहते हुए चाहें जो करें लेकिन सत्ता में आकर वे उसका विरोध नहीं कर सकती है। आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव , चन्द्रबाबू नायडू से लेकर पिछले दिनों हवाई दुर्घटना में मारे गए मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर रेड्डी के विपक्ष से सत्ता तक की यात्रा के दौरान नक्सलवाद के प्रति बदलते रूख को भी यहां देखा जा सकता है। लेकिन पहला सवाल है कि  नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा बताने के बावजूद उसका प्रभाव क्षेत्र कैसे बढ़ता चला गया है। तमाम तरह की दमनात्मक कार्रवाईयों के बावजूद और सैकड़ों कार्यकर्ताओं को मुठभेड़ के नाम पर मारने के वाबजूद उसके प्रभाव के विस्तार को रोका नहीं जा सका है। लेकिन यहां एक दूसरे सवाल को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। जब नक्सलवाद के प्रभाव के विस्तार की बात की जाती है तो यह दावा कौन किस नजरिये से कर रहा है इसे समझना जरूरी होता है। सरकार देश में जिलों की तादाद बताकर नक्सलवाद के प्रभाव के जिलों की संख्या बताती है। लेकिन जब देश के कुल जिलों में नक्सलवाद के प्रभाव वाले जिलों की तादाद बताई जाएगी तो वह भारत के नक्शे पर बहुत बड़ा दिखेगा। उससे ज्यादा नक्सलवाद के बढ़ते प्रभावों को राज्यवार बताया जाएगा तो वह और ज्यादा दिखेगा। क्योंकि कम संख्या में जो प्रतिशत निकलता है वह ज्यादा दिखाई देता है। लेकिन नक्सलवाद के प्रभावों का आकलन देश में कुल गावों की संख्या के आधार पर निकाला जाएगा तो उसका प्रभाव दो से तीन प्रतिशत गावों में ही दिखाई देगा। प्रचार की भाषा अपनी योजनाओं और रणनीतियों के अनुसार तय की जाती है। देश के लोगों के सामने जब तस्वीर इस तरह प्रस्तुत की जाएगी कि अस्सी प्रतिशत से ज्यादा राज्यों में ये समस्या है तो उसका संदेश भिन्न होगा। इसीलिए सरकारें जिस तरह से नक्सलवाद के प्रभाव के विस्तार का वर्णन करती है उसके पीछे उसके इरादे कुछ और होते हैं।इसीलिए वह इसे एक समस्या के रूप में प्रस्तुत करती है। समस्या के प्रभाव का विस्तार हो रहा है तो ये किसकी जिम्मेदारी है। रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद की समस्या को तो आंदोलन कहा जा सकता है लेकिन नक्सलवाद को आंदोलन के रूप में स्वीकार करने में राजनीतिक परेशानी खड़ी हो जाती है। लेकिन नक्सलवाद समाज को बदलने वाली एक राजनीतिक विचारधारा पर आधारित है । चाहें उसे गलत और सही कहा जा सकता है।

नक्सलवाद के प्रभाव के विस्तार को रोकने के लिए सरकार पहले इसे आर्थिक , सामाजिक और राजनीतिक समस्या के रूप में देखती थी। ये मानकर चलती थी कि जिन इलाकों में पिछड़ापन है और समाज का जो हिस्सा बेहद पिछड़ा है उसके बीच में इनका प्रभाव होता है। तब सरकार इनके लिए कई तरह के विकास के कार्यक्रम चलाने की योजना बनाती थी। लेकिन देश के कई हिस्सों में ये देखा जा चुका है कि तमाम तरह की योजनाओं को लागू करने का दावा करने के बाद भी नक्सलवाद के प्रभाव को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सका है। नक्सलवादी आंदोलन का नेतृत्व करने वाली पार्टियों के नाम जरूर बदलते रहे हैं। तब सरकार भूमि सुघार कानून को लागू करने पर भी जोर देती थी। लेकिन जब से अमेरिकी परस्त भूमंडलीकरण की आर्थिक नीतियों को लागू किया गया है तब से भूमि सुधार के कार्यक्रमों को लागू करने की औपचारिकता तक खत्म कर दी गई है। संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषणों में उसकी चर्चा तक नहीं होती है। पिछले चुनाव के दौरान तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भूमि रखने की अधिकतम सीमा बढ़ाने का भी वादा किया था। स्थितियां इस कदर की हो गई है कि 76 प्रतिशत लोग रोजाना बीस रूपये से कम पर गुजारा कर रहे हैं। जिन इलाकों में सरकार नई नीतियों के तहत नये नये उद्योग विकसित करना चाहती है वहां तो भूखमरी की खबरें आई हैं।

इस तरह ये साफतौर पर देखा जा सकता है कि सरकार नक्सलवाद को केवल कानून एवं व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश करने में लगी है। केन्द्र में जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सरकार थी तब ये कोशिश शुरू की गई थी कि सरकारी दस्तावेजों से नक्सलवाद को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्या भले माना जाए लेकिन व्यवहार में इसे केवल कानून एवं व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश किया जाए। भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा विकेन्द्रीकरण की नहीं है। केन्द्रीयकृत सत्ता में यकीन करती है और पुलिसिया रौब दांव को जरूरी मानती है। वह आर एस एस जैसे फांसीवादी संगठनों का चुनावी मुखौटा है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के बाद जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार बनी तब भी पुरानी नीतियों को ही लागू किया गया।कांग्रेस की राजनीति उसके सामने खड़ी राजनीतिक पार्टी को देखकर तय होती है। कांग्रेस का जहां भी सामना भारतीय जनता पार्टी से होता है वह भारतीय जनता पार्टी की नीतियों के करीब खड़ी दिखाई देती है। दरअसल सोचने का तरीका अब तक ये रहा है कि सत्ता में जो पार्टी जा रही है वह अपने कार्यक्रमों को लागू करने पर जोर देगी। लेकिन स्थितियां अब बदल चुकी है। पार्टियां सत्ता चलाने जरूर जाती है लेकिन सत्ता उन्हें चलाती है। किसी भी पार्टी में अब इतनी ताकत नहीं बची है कि वह अपनी उन घोषित नीतियों को लागू कर सकें जो सत्ता की नीतियों के विपरीत हो। सत्ता पर जिस वर्ग का वर्चस्व है वह सत्ता को अपने तरीके से चलाता है।पार्टियां उसका अनुसरण करती है। इसकी सबसे अच्छी मिसाल छत्तीस गढ़ में देखने को मिल सकती है जब कांग्रेस विधायक के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के सहयोग से सल्वा जुडुम  चलाया गया। वह अब भी जारी है। पहले बिहार के गावों में निजी सेना का जो स्वरूप था वह बदल गया है ।पहले निजी सेनाओं में पुलिस बल , सरकारी अधिकारियों और विभिन्न पार्टियों के नेताओं की भूमिका बतायी जाती थी। लेकिन अब पार्टियों के नेता नहीं पूरी पार्टी और उनकी सरकारें उसके समर्थन में खड़ी दिखाई देने लगी है। पहले निजी सेनाओं के लिए हाथियार मुहैया कराए जाते थे लेकिन अब नक्सलवादियों के खिलाफ लड़ने के लिए सेना तैयार की जा रही है। सेना में नक्सलवाद के प्रभाव वाले इलाकों के युवाओं को खासतौर से शामिल करने का अभियान चलाया जाता है। महाराष्ट्र में तो सरकार ने आदिवासियों की बटालियन खड़ी करने का फैसला किया है। पहले सरकार की काउंटर इंसर्जेसी में सरकार की रणनीति ये होती थी कि गैरजातीय सेना को लगाया जाए। जैसे पंजाब में गैर सिख पृष्ठभूमि के सैनिकों को भेजा जाता था तो उत्तर पूर्व में सिख और दूसरी पृष्ठभूमि के सैनिकों की बटालियनें लगायी जाती थी। अब ये रणनीति बदल गई हैं। नक्सलवादियों से निपटने के मामले में नक्सलवादी प्रभाव वाले इलाके और खासतौर से आदिवासियों की ही बटालियन लगाए जाने की योजना है। सल्वा जुड़ुम में आदिवासी बनाम आदिवासी लड़ाई खड़ी करने की कोशिश की गई।

एक बदलाव  और आया है कि कानून एवं व्यवस्था विषय को केन्द्र ने ज्यादा से ज्यादा अपने हाथों में ले लिया है। केन्द्र सरकार ने पहले कानून एवं व्यवस्था के रूप में नक्सलवादियों से लड़ने के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार की। वह इस तरह से तैयार की गई कि केन्द्र ने पुलिस बलों को ज्यादा से ज्यादा हथियारों से लैश करने के लिए करोड़ों की हर वर्ष राशि दी। राज्यों यानी प्रदेशों को लगा कि ये उनके वित्तीय समस्या का समाधान है। वे इस तरह मिलने वाली राशि की तरफ मुंह बांए खड़े रहने लगे। नतीजा ये निकला कि गणतंत्र में प्रदेश की नक्सलवादियों के बारे में जो समझ हो लेकिन उन्हें केन्द्र की योजनाओं को लागू करना पड़ता है। कानून एवं व्यवस्था का विषय राज्यों के हाथों से निकल सा गया है। राजनीतिक स्थितियां ऐसी हो गई है कि किसी भी राज्य स्तरीय राजनीतिक नेतृत्व की ताकत स्वायतता के पक्ष में बात करने की नहीं रही।

पूरी दुनिया में देखा गया कि किस तरह से भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करने के लिए सरकारों ने विकास और सुरक्षा के नारे को एक साथ जोड दिया। विकास का जहां नारा रोटी कपड़ा और मकान था वहां वह बिजली सड़क और पानी में परिवर्तित कर दिया गया।यह एक बुनियादी बदलाव रहा है। रोटी कपड़ा और मकान की जरूरत हर किसी के लिए जमीन मुहैया कराने के सवाल से जुड़ा था। बिजली , सड़क और पानी वाला विकास का नारा नई नीतियों को स्वीकार करने की स्थितियां तैयार करने के लिए दिया गया। एक ऐसा वातावरण बनाया गया कि लोग सरकार की नीतियों का समर्थन करने के पक्ष में खड़े हो जाए। सरकार के विकास के नारे के साथ ही विकास के लिए सुरक्षा के नारे का भी समर्थन करने लगे। देश के कुल राज्यों में से पचहत्तर प्रतिशत राज्यो में  नक्सलवाद का प्रभाव गिनाने के पीछे यही योजना रही है। जबकि जहानाबाद में रह चुके एक अधिकारी ने बताया कि जिस समय नक्सलवादी गतिविधियां चरम पर थी उस समय भी उन्हें सरकारी विकास की योजनाओं को लागू करने में नक्सलवादियों की तरफ से कोई रूकावट नहीं दिखी। सुरक्षा के नाम पर सरकार ने मनमाने विकास को रोकने वाले तमाम तरह के आंदोलनों को कुचलने के लिए एक वातावरण तैयार किया । आज सरकार इस मायने में सफल साबित हुई है कि नक्सलवाद के नाम पर किसी को मुठभेड़ में मार दिया जाता है तो लोग उससे जुड़े कानूनी सवाल भी उठाने से कतरा जाते हैं। सैकड़ों की तादाद में नक्सली के नाम पर लोग मार दिए जाते हैं। किसी भी जागरूक और लड़ाकू राजनीतिक कार्यकर्ता को नक्सलवादी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है। डा. विनायक सेन को छत्तीसगढ़ में दो वर्षों तक बेवजह जेल में रखा गया। सुप्रीम कोर्ट की जमानत पर छुटे। सरकार की नीति ये है कि किसी को भी जेल में डाला जाता है तो उसे वर्ष दो वर्ष के लिए कानूनी पेचिदगियों में फंसाकर रखा जा सकता है। यदि बाद में न्यायालय से वह बरी भी होता है तो सरकार को उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। लिहाजा राजनीतिक कार्यकर्ताओं में सरकार की नीतियों का विरोध करने का एक डर बैठ गया है।
यदि देखा जाए तो नक्सलादियों को जिन इलाकों में सरकार सबसे ज्यादा सक्रिय बताती  है वे कौन से इलाके हैं। क्या वे वैसे इलाके नहीं है जहां कि देश की आखिरी पंक्ति में खड़ी जमात रहती है। जहां वह रहती है उसके घर के नीचे खनिज सम्पदा है। प्राकृतिक संसाधनों से वह भरपूर हैं। जंगल है। पानी है।लोगों को जीने के अधिकार से वंचित करके रखा गया है। सरकार उन्हें बंदूकधारी बता रही है। पूरे देश में ऐसी क्यों स्थिति है कि सबसे कमजोर समझी जाने वाले आदिवासी समुदायों की जमीन और दूसरे संसाधनों पर सभी तरह की विचारधारा की रंग वाली पार्टियों की सरकारें टूट पड़ी है। ये उनके खिलाफ युद्ध नहीं तो क्या है। अमेरिका के राष्ट्रपति बुश ने इराक और अफगानिस्तान पर हमला करते वक्त कहा कि जो उसके साथ नहीं है वह आतंकवादियों के साथ है। दरअसल यही नारा छत्तीसगढ़ जैसे राज्यो में भी दोहराया गया और अब पूरे देश में दोहराया जा रहा है। नक्सलवादी राजनीति से किसी का विरोध हो सकता है लेकिन वे आतंकवादी तो नहीं कहें जा सकते हैं।जिन संगठनों का एक राजनीतिक आधार  होता है यदि वे बंदूक से भी लड़ते है तो उन्हें आतंकवादी संगठन नहीं कहा जा सकता है।हमास के बारे में भी एक अमेरिकी विश्लेषक की यही राय रही है। नक्सलवादी गतिविधियों को अब माओवादी के रूप में ही प्रचारित किया जाता है। माओवादी विचारधारा के बूते ही चीन की मौजूदा सत्ता बनी है। वह दुनिया के ताकतवर देशों में एक है। भारत में यदि तमाम लड़ने वालों को माओवादी कहकर सरकार ये समझती है कि वह अपनी मनचाही नीतियों को लागू करना चाहेगी तो माओवाद का विस्तार ही होगा।माओवादी या नक्सलवादी गतिविधियों को एक राजनीतिक नजरिये से देखा जाना चाहिए। जिन लोगों के हक हकूक छिने गए हैं या जो अपने अधिकारों से वंचित है उन्हें वंचित बनाए रखने की ये कोशिश ठीक नहीं है।मनमोहन सिंह की सरकार भले ही उन्हें सबसे बड़े खतरे के रूप में चित्रित करें लेकिन उनके यह चित्रित करने में माओवाद का विस्तार हुआ है। उसे सैनिक बल बूते रोकने की कोशिश का अर्थ ये तो नहीं हो जाएगा कि जो मौजूदा स्थितियां है वह खत्म हो जाएगी। मकसद लड़ने से रोकना है या फिर लड़ाईयों के जो कारण है उन्हें खत्म करना है।  

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें
हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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